Showing posts with label टैगोर. Show all posts
Showing posts with label टैगोर. Show all posts

Monday, April 13, 2026

टैगोर की आत्मकथा

टैगोर की आत्मकथा 

आज ही नूना को कत्थई रंग की यह डायरी मिली है।स्टेट बैंक के ब्रांच मैनेजर तथा एक मुख्य अधिकारी आये थे, उन्होंने जून को नयी डायरी तथा कैलेंडर दिये। सुबह सात बजे केक व उपहार लेकर नन्हा और सोनू भी आ गये। सभी के फ़ोन भी आये।आज वर्षों बाद गुरुजी के भक्तों के साथ गुरुपूजा का आयोजन किया। बहुत आनंद आया। गुरुजी आजकल अमेरिका में हैं, पर वह हर उस जगह हैं जहाँ लोग उन्हें याद करते हैं। ‘सौदमिनी’ सोसाइटी से एक वरिष्ठ शिक्षक आये थे, उनकी आवाज़ बहुत अच्छी है। उन्होंने पूजा करने के बाद अनेक सुंदर भजन गाये।जून ने प्रसाद में खिचड़ी, हलुआ तथा रायता बना दिया था। कुल मिलाकर उनके विवाह की सैंतीसवीं वर्षगाँठ बहुत अच्छी तरह से मनायी । छोटी बहन ने बताया, उनके यहाँ एओएल की संगीत की महफ़िल जमती है और फ़ॉलो अप भी होता है। जीवन एक उपहार है, गुरुजी की यह बात आज कितनी सत्य प्रतीत हो रही है। भीतर जो भी महसूस होता है, उसे कोई शब्दों में कह पाये तो काव्य का जन्म होता है। कविता पहले भीतर जन्मती है फिर बाहर प्रकटती है।नूना को एक कविता के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर मिला। 

आज सुबह वह उठी तो मन गुरुजी के लिए कृतज्ञता से भरा था, एक कविता सहज ही मूर्त हो गयी। शाम को एक बार फिर उसे अहसास हुआ, कितना समय मोबाइल पर चला जाता है, इसका उसे भान  ही नहीं रहता।मोबाइल किनारे कर आज उसने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ने के लिए उठायी है। टैगोर एक भक्त कवि थे। वे कलाकार, समाजसेवी, शिक्षाविद् और भी न जाने क्या-क्या थे, पर सबसे पहले वह अपने को कवि मानते हैं। कवि होने का अर्थ है चीजों के पार जाकर कुछ ऐसा देख लेना जो सामान्य लोग नहीं देख पाते।आर्यसमाज के स्वामी परमानंद जी का एक व्याख्यान भी सुना, वह भी बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें समझाते हैं। 
आज जून को जल्दी जाना था, उनकी कमेटी आज वृक्षारोपण कर रही है। बाद में नूना भी उसमें सम्मिलित हुई, उन्होंने हरसिंगार, अमलतास, प्लूमेरिया और भी कई तरह के फूलों के पेड़ लगाये।वहाँ एक सरदारनी से मुलाक़ात हुई, जो मैराथन दौड़ चुकी हैं। शाम को पापाजी से बात हुई, वह आजकल जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक पढ़ रहे हैं।यह भी कहा, उन्हें संस्कृत पढ़ने में दिक्क्त होती है, क्योंकि कभी स्कूल में संस्कृत नहीं पढ़ी। नन्हा और सोनू असम गये हैं। कल वे लोग पासीघाट जाएँगे,जो सियांग नदी के किनारे बसा अरुणाचल प्रदेश का सबसे पुराना शहर है। नूना को वहाँ के हरे-भरे पहाड़, झूलते पुल और पहाड़ी नदियाँ याद आ गयीं, कुछ वर्ष पहले वे दो दिन के लिए वहाँ गये थे। 
सुबह वे दोनों गुलकमाले झील पर गये।आकाश पर बादल थे, हल्का धुँधलका था। वातावरण बहुत शांत था। उन्होंने देखा, दूर पानी में तैरती एक गोल नाव पर टॉर्च की रोशनी हो रही है, शायद नाविक मछली पकड़ रहे थे। लगभग सात बजे सूर्यदेव के दर्शन हुए। पंछी भी आकाश में उड़ान भरने लगे। दो नावें और आ गयीं और झील के उस पार मछली ख़रीदारों की भीड़ बढ़ने लगी। वे घर लौटे तो माली आ चुका था, नूना के अगले ढाई घंटे बगीचे में काम करवाते बीते। तब तक जून ने नाश्ता बना दिया। बोगनवेलिया के फूल अपने शबाब पर हैं और गुलाब का एक पौधा भी। रात की रानी फूलों से एक बार फिर भर गई है। दोपहर को गुरुनानक देव पर एक फ़िल्म देखी, उन्होंने अपने जीवन में २५ हज़ार मील की यात्रा पैदल की थी। उनके दो शिष्य थे, पर फ़िल्म में मरदाना को ही दिखाया गया है।  आज गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती है, उनके बारे में भी वे अधिक नहीं जानते।स्वामी रामकृष्ण और माँ शारदा के कुछ अनोखे वचन पढ़े, श्री श्री तथा ओशो के कुछ वाक्य भी। भगवद् गीता के चंद श्लोकों के साथ टैगोर की पुस्तक का एक पन्ना भी ! कितना अच्छा गद्य भी लिखते हैं वह, कविता उनकी श्वास-श्वास में बसी हुई थी। उनके लिखे ‘गोरा’ उपन्यास पर आधारित डी डी -१ का धारावाहिक देखना शुरू किया है मोबाइल पर। आज बहनोई के जन्मदिन पर शुभकामना के लिए एक कविता लिखी।अगले दो महीनों में वह एक रेस्तराँ खोलने जा रहे हैं।
आज सुबह का ध्यान गहरा था। बाद में पार्क-१ गयी, सफ़ाई चल रही थी। शाम को वे निकट के गाँव तक टहलने गये, भुट्टे और टमाटर के खेत देखे।इस बार मकर संक्रांति पर 'आजादी का अमृत महोत्सव' के अन्तर्गत आयुष मंत्रालय, ७५ लाख से अधिक लोगों के लिए सूर्य नमस्कार का वर्चुअल आयोजन करने वाला है। भारत का उनके लिए क्या अर्थ है, वे इसके लिए क्या कर  रहे हैं और क्या कर सकते हैं ? इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए उसे गणतंत्र दिवस के लिए एक कविता लिखनी है। नापा की पहली इ-पत्रिका कल या परसों प्रकाशित होने के लिए तैयार है। जून ने भी काफ़ी काम किया है इसके लिए, उनका विचार अब साकार होने जा रहा है। 

Friday, February 10, 2023

बिजली की कार


सुबह अभी अंधेरा ही था जब वे प्रातः भ्रमण से लौट आए। योग साधना के बाद दीपक चोपड़ा का ‘चेतना’ के बारे में एक बहुत अच्छा वीडियो सुना।मुख्य विषय था कि यह जगत किस पदार्थ से बना है और चेतना क्या है ? कह रहे थे, उनके पाँच वर्ष के पोते ने उन्हें एक बार यूनिवर्स के बारे में बताया था कि वह दूसरे आयाम से बना है। आगे जे कृष्णामूर्ति का ज़िक्र किया और आइंस्टीन व टैगोर के मध्य हुए एक वार्तालाप का ज़िक्र भी किया, जब १९३० में वे दोनों मिले थे; जिसमें टैगोर कहते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व अनंत ब्रह्मांड को समाहित करता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जो मानव व्यक्तित्व द्वारा समाहित नहीं किया जा सकता है, और यह साबित करता है कि ब्रह्मांड का सत्य मानव का सत्य है। नाश्ता करते समय महादेव का अगला अंक देखा, कथा अत्यंत रोचक होती जा रही है। सती ने उन्हें स्वीकार कर लिया है पर महादेव ने अभी तक सती को नहीं स्वीकारा है. 

कल रात ओशो की किताब पढ़ी थी, सुबह तक उसकी सुवास शेष थी, जो एक कविता की शक्ल में प्रकट हुई.  ‘माँ’ पर  लिखी एक कविता भी आज पोस्ट की। मंझली भांजी का जन्मदिन है, कुछ पंक्तियाँ उसके लिए भी लिखीं. किसान आंदोलन पर दो वीडियो देखे, एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में. हरियाणा व पंजाब की सरकारों को मंडी से बहुत आमदनी होती है, इसलिए वे इस बिल का विरोध कर रहे हैं, अन्य कोई राज्य यह विरोध नहीं कर रहा है. आज ‘कोना’कार वाले टेस्ट ड्राइव के लिए आये थे, सब ठीक था पर दो-तीन जगह हंप पर गाडी नीचे से टकराई. यह गाड़ी कोरिया की है, अभी वे तय नहीं कर पाए हैं कि कौन सी कार खरीदें. आज नंन्हा एक नया बोर्ड गेम लाया, ‘युद्धभूमि’, बहुत सरल है, बच्चों का कोई खेल हो जैसे. वह कई पार्ट्स जोड़कर  एक प्लेन बना रहा है, उस पर पेंट करने के लिए रंग और ब्रश मंगवाए हैं. दोपहर को वह ममेरी बहन का सामान लेकर आया, उसे स्टोर में रखवा दिया है. कोरोना के कारण कई बच्चे घर से काम करने के कारण अपने-अपने घरों को वापस जा रहे हैं. अब सम्भवतः वह अगले वर्ष के प्रारम्भ में लौटेगी. चार बजे वह बाइक से वापस गया तो रास्ते में बारिश आ गयी. कार होती तो भीगने से बच गया होता. 

रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो देखा खेल के मैदान में बड़ा सा स्क्रीन लगाकर आई पी एल मैच दिखाया जा रहा था. कुछ लोग कृत्रिम घास पर नीचे बैठे थे, कुछ खड़े थे. उनके वृद्ध पड़ोसी भी बहुत रूचि से हर मैच देखते हैं, चाहे वह दिन या रात में किसी भी वक्त हो, क्रिकेट, फुटबॉल या टेनिस किसी का भी हो. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द था, पर उसके कारण न तो दिनचर्या में कोई खलल पड़ा, न ही दवा लेनी पड़ी. देह से पृथकता का अनुभव होना शायद इसे ही कहते हैं. नन्हे ने उसकी सुविधा के लिए कम्प्यूटर के लिए नया मॉनिटर भेजा है. माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सॉफ्टवेयर भी खरीद लिया है. पिता जी को कविताओं की इ- बुक ‘शब्द’ भेजी,  कहने लगे, संसार में भी थोड़ा  ध्यान लगाए. कोविड के कारण पार्लियामेंट का सेशन आठ दिन पहले ही समाप्त हो गया है. किसानों का आंदोलन जारी है. उनके सुधार के बिल तो पास हो गए हैं. श्रमिकों के लिए भी कई कानूनों में सुधार किया गया है. 

सुबह वेदांत पर चर्चा सुनी, स्वामी सर्वप्रियानंद कितनी अच्छी तरह माया, जीव व ब्रह्म के बारे में बता रहे थे. ब्रह्म ही माया के कारण जगत प्रतीत होता है; जैसे आकाश वास्तव में शून्य है पर नीला प्रतीत होता है. ध्यान की गहराई में जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों एक हो जाते हैं. तब जो अनुभूति होती है, वह ब्रह्म है. जब जानने वाला तो हो पर जानने को कुछ न हो, तब जो जानना होगा, वह ब्रह्म है. जो कुछ जाना जा सकता है और जो कुछ जाना नहीं जा सकता, उन दोनों के पार है वह ! आज सुबह टाटा मोटर्स का आदमी आकर चेक ले गया ई वी के लिए. पिताजी को बताया तो उन्होंने कहा भविष्य में बिजली की गाड़ियाँ ही चलेंगी, उन्होंने भविष्य को देखकर कार का चुनाव करने के लिए नन्हे व जून को  बधाई दी. 

Monday, May 30, 2016

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !