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Tuesday, January 22, 2019

एलोवेरा का जूस



नया वर्ष आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये हैं, आज यह पीले रंग की डायरी उसे मिली है. इतने वर्षों में नीली, भूरी, काली, मैरून रंग की डायरियां ही मिलती रहीं, पहली बार पीले रंग के कवर वाली डायरी. रात्रि के सवा नौ बजने को हैं, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं. आज से उन्हें ह्यूस्टन से आये मेहमानों के साथ कुछ समय बिताना होगा, शायद कुछ दिन तक रोज ही आने में देर हो. कल शाम भी वे क्लब गये थे, तीन जनों का विदाई समारोह था. उनमें से एक की पत्नी लेडीज क्लब की सदस्या भी हैं, वह उनके लिए कविता लिखेगी. सुबह सुहानी थी, जून को बाहर तक छोड़ कर आई तो अपने आप ही हाथ कविता वाली डायरी की और बढ़ गये, कुछ पंक्तियाँ फूटने लगीं, जैसे भूमि से समय आने पर अंकुर फूटने लगते हैं. उसे आश्चर्य होता है, शब्द भीतर कहाँ सोये रहते हैं, कभी तो एक उड़ता हुआ ख्याल भी नहीं आता कि कुछ लिखे और कभी भावों का दरिया बेसाख्ता बहने लगता है. शायद वे ही समझदारी का बाँध लगा देते हैं और हिसाबी बुद्धि को भला कविता से क्या काम. दिगबोई क्लब पत्रिका के लिए लेख माँगा है, पहले का लिखा ही कोई कल भेजेगी. उसने दो सखियों को नन्हे के विवाह की खबर दी, हो सकता है बंगाली सखी इस खबर को सुनकर ही आये. जून ने रजिस्टर्ड विवाह के लिए फार्म आदि भरकर जमा कर दिए हैं. इस महीने के अंत में वह और सोनू कानूनी रूप से एक पावन बंधन में बंध जायेंगे. आज उसके जन्म के समय लिखी डायरी का एक पन्ना पढ़ा, कितना सरल था तब जीवन. सेब का दाम चौदह रूपये प्रति किलो था और मंहगे लग रहे थे.  

शाम के साढ़े पांच बजे हैं. चार बजे जून आये थे जब किचन के प्लेटफार्म पर लगाने के लिए ठेले वाला काले रंग का ग्रेनाइट लाया था. कल से घर में रंगाई-पुताई का काम शुरू हो रहा है, जो बीहू तक चलेगा. उसने आंवला-एलोवेरा-लौकी का जूस बनाया था और खीरा-टमाटर का सूप, साथ में मौसमी फल, यानि सेहत के लिए सभी मुफीद वस्तुएं ! सुबह धनिये वाले आलू बनाये थे, छोटे-छोटे सफेद आलू इसी मौसम में मिलते हैं. उससे पूर्व स्वामी रामदेव व आचार्य बालकृष्ण को सुना. सन्यास के बाईस वर्ष पूर्ण होने पर वे अपने संस्मरण सुना रहे थे. बेहद रोचक ढंग से उन्होंने अपनी युवावस्था के, गुरूकुल के प्रवास के प्रसंग सुनाये.

कल रात तीन अद्भुत स्वप्न देखे. एक में भूमि की गहराई से एक सुंदर शिवलिंग प्रकट होता हुआ दिखा, दूसरे में एक विशाल पक्षी आसमान से उतरता हुआ दिखा, वह विशाल पंखों वाला था. तीसरे में घर में ही एक कमरे में विशाल कमल ! स्वप्नों की दुनिया उसे सदा ही विस्मयों से भरती रही है. वर्षों पहले एक कविता लिखी थी कि ईश्वर कितना भी अदृश्य रहे पर स्वप्नों में वह छुपा हुआ नहीं रह पाता, उसका वैभव प्रकट हो ही जाता है. किसी अदृश्य लोक से ही आते हैं स्वप्न...दोपहर को ब्लॉग पर लिखा. पुराने दिनों की डायरी पढ़ी, नन्हे के बचपन की बातें ! नन्हे के जीवन में एक नया मोड़ आ रहा है, शायद इसलिए वह उसका बचपन याद कर रही है, मन की थाह कौन लगा सकता है, उसके अवचेतन में क्या चल रहा है, जो अचानक भीतर वात्सल्य भाव उमड़ रहा है.


Monday, July 30, 2018

मछलियों की बारिश



आज क्लब में मीटिंग है, ‘काव्य पाठ’ प्रतियोगिता भी है. निर्णायकों के लिए उपहार आ चुके हैं और प्रतिभागियों के लिए पुरस्कार लेने वह एक सखी के साथ को-ओपरेटिव गयी, जहाँ पुरस्कार पैक भी हो रहे हैं. इस सखी के दांत में दर्द था उसका रक्तचाप भी बढ़ा हुआ है. वे अपने तन की देखभाल अच्छी तरह नहीं करते, तभी वह उनके लिए दर्द का कारण बनता है. उसकी कमर का घेरा इस ड्रेस में स्पष्ट नजर आ रहा है, आधा घंटा टहलना उपयुक्त रहेगा तैयार होने से पूर्व. अभी कुछ देर पूर्व उसने रसीद स्कैन की जो ट्रेजरर को देनी है, तीन-चार महीने में तो पैसे मिल ही जायेंगे, कार्यक्रम अच्छा होना चाहिए. इस महिला को पैसे देने में बहुत तकलीफ होती है, वह चाहती है क्लब में कोई खर्च ही न हो. कल एक सदस्या का फोन आया, उसने ‘मातृ दिवस’ पर एक गीत लिखा है, जो क्लब के कार्यक्रम में प्रस्तुत करना चाहती है. आज ब्लॉग पर ‘अयोध्या काण्ड’ का सैतींसवा सर्ग लिखा, कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है.

आज मौसम कितना अच्छा है, मंद पवन का स्पर्श और झूले पर बैठकर लिखना एक सुखद अनुभव है. वर्षों बाद मुरारी बापू की कथा सुनी, आज ही ब्लॉग पर पढ़ा कि पहले कैसे सुनती थी. सीता जी का पालन-पोषण महलों में हुआ था पर वह वन में भी कितनी प्रसन्न हैं, क्योंकि वह बचपन से ही प्रकृति के सान्निध्य में पली-बढ़ी थीं. बचपन में दिए संस्कार जीवन भर साथ चलते हैं. आज सुबह एक वरिष्ठ सदस्या का फोन आया, कल उसके कहने पर उन्होंने कविता पाठ में भाग लिया, पर उन्हें कहा गया, निर्णायक महोदय को संबोधित करने के कारण उनके अंक कम हो गये और पुरस्कार नहीं मिला. एक सखी का फोन आया, उन वरिष्ठ सदस्या ने उसे स्टेज के सामने जाकर एक महिला का फोटो खींचने के लिए, फटकारा, प्रेम भरा उलाहना ही रहा होगा. महिला क्लब भी राजनीति का अखाड़ा बन गया है क्या, खैर, उसे क्या फर्क पड़ता है, बल्कि एक कविता का जन्म हो गया उनसे बातचीत के बाद. कल के कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत भी था, सुगम संगीत भी और पश्चिमी संगीत भी.

एक सखी का फोन हृदय को सुखद अहसास से भर गया जो वर्षों पहले यहाँ से चली गयी थी, वे लोग दुबारा यहाँ आ रहे हैं. एक अन्य सखी से वर्षों बाद फेसबुक पर पुनः मुलाकात हुई. नन्हे की मित्र से बात हुई, हिंदी की किताबें ‘रश्मिरथी’ और ‘मधुशाला’ के बारे में राय पूछ रही थी, किसी को उपहार में देनी हैं. दोपहर के तीन बजे हैं, न ठंडा न गर्म, न वर्षा..बल्कि वसंत का मौसम ! शाम को क्लब में युवा गायक ‘पापोन’ का कार्यक्रम है, पर वे तेज आवाज में संगीत नहीं सुन सकते. दोपहर को अभ्यास के समय ही ड्रम की आवाज क्लब से घर तक आ रही थी. उसका गीत मोबाइल पर सुन रही है, आवाज तो अच्छी है उसकी, ‘बर्फी’ में भी उसने गाया है. कल रात तेज वर्षा के कारण बोगेनविलिया जो गुलमोहर पर टिका था, गिर गया, कुछ भाग ही गिरा है, मुख्य भाग अभी भी शेष है. आकाश से मछलियाँ गिरने का एक वीडियो देखा, गूगल में पढ़ा, वर्षा में ऐसा होना कोई नई बात नहीं है. सदियों से ऐसा होता आया है, पहले समुद्र से वे ऊपर जाती हैं फिर नीचे आती हैं.

Monday, May 30, 2016

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !     






Tuesday, September 24, 2013

इक़बाल की शायरी


आज मदहोश हुआ जाये रे...मेरा मन..मेरा मन...शरारत करने को ललचाये रे..मेरा मन ..और सचमुच मन बेकाबू हो गया है. इस उम्र में यूँ बहकना कोई शराफत तो नहीं, पर आँखें हैं कि उम्र का लिहाज नहीं करतीं, फिर दिल तो है दिल लेकिन वह सरसराहट जो बरसों पहले महसूस की थी, सोचती थी वह सब पीछे छूट गया पर दुनिया में इतने अफसाने यूँ ही तो नहीं लिखे गये, हर उम्र में एक बचपन छुपा होता है और उसी तरह एक यौवन भी. उसका सुबह का काम हो चुका है, आज बहुत दिनों बाद धनिये की चटनी बनाई है, यहाँ के बड़े-बड़े नीबुओं में रस बहुत होता है, उसी को डाला है खटाई के लिए, उसका अचार भी बन सकता है पर मुश्किल यह है कि खायेगा कौन ? कल दोपहर एक सखी के यहाँ गयी, उसकी छत पर पर एक अपने-आप उग आया एक जंगली बगीचा देखा, अच्छा लग रहा था. जून की गाड़ी खिड़की से दिखाई दी सो उसने लिखना बंद किया.

कल जो तामसिकता मन पर छाई थी आज उतर गयी है और एक बार फिर हे ईश्वर ! वह उसकी कृपा के घेरे में आ गयी है. रास्ता भटक गयी भेड़ फिर चरवाहे के पीछे-पीछे चलने लगी है. भटकाव में काँटों ने उसे लहुलुहान कर दिया था और आँखों में जहरीले पत्तों का रस चला गया था, वह जो कुछ देख रही थी वह भ्रामक था पर अब चरवाहे ने उसको पहले सा स्वस्थ कर दिया है. आज भी हल्की-हल्की फुहार के बीच बसंती बयार बह रही है. पीटीवी पर इक़बाल की नज्म सुनी- ‘सूरज’

चाँद तारों के ऊपर जाते-जाते सूरज
श्याम सियाह अमा को उफक से लाली के फूल दे गया...

कुछ ऐसे ही थी पहली लाइन, इक़बाल की शायरी की एक किताब उसके पास भी है, उसने सोचा आज पढ़ेगी. और better sight without glasses पढ़ने का विचार भी कई दिनों से है. स्वामी रामतीर्थ की पुस्तक भी अभी पढ़नी शेष है. पिछले दिनों उसने अख़बार और पत्रिकाओं के अलावा कुछ नहीं पढ़ा, शायद इसी का असर हो कल की अहमकाना हरकतों पर..खैर, अब आज का तस्सवुर करना चाहिए.

किन राहों पर चलना होगा कितनी दूर ठिकाना है
तेरी आवाजों के पीछे और कहाँ तक जाना है

यह शेर किसी हद तक उसके दिल की हालत बयाँ करता है. अक्टूबर का महीना शुरू हो गया है यानि हरसिंगार की भीनी-भीनी खुशबू का महीना, दीवाली की तैयारी और घर की सफाई का महीना. २९ अक्तूबर को माँ-पापा भी आ रहे हैं उनके आने से दीवाली की खुशी दुगनी हो जाएगी. नन्हा आज भी cubs की ड्रेस पहन कर गया है, उसके स्कूल में इंस्पेक्शन है. कल कह रहा था की हिंदी के टीचर कह रहे हैं, दो दिन स्कूल में ड्रामा चलेगा. हर जगह आडम्बर है, ऊपर से कुछ अंदर से कुछ, सच से लोगों को घबराहट होती है, डर भी लगता है.

आज से ठंड का अहसास बढ़ गया है, सुबह स्नान करते समय भी गर्म पानी की आवश्यकता महसूस हुई और इस समय पंखा चलाने पर ठंडक महसूस हुई. गुलाबी ठंड वाली सर्दियां उसे अच्छी लगती हैं आज एक तेलुगु सखी जा रही है, पिछले दस-बारह वर्षों का उनका परिचय था, एक बार मिलकर आने का मन है. जून को एक-दो बार कहना पड़ेगा लेकिन फिर वह मान ही जायेंगे. आज वह नन्हे के खिलौनों का शोकेस भी साफ करेगी. कल उसके हिंदी अध्यापक ने एक लेख लिखने को कहा था, स्कूल जाने तक लिख रहा था.

परसों वे तिनसुकिया गये और डाइनिंग टेबल का ऑर्डर दे ही दिया, कल यानि मंगलवार को यहाँ आ भी जाएगी, थोड़ी मंहगी है पर जून को सस्ती चीजें पसंद भी कहाँ आती हैं. उनके घर के बाहर किचन गार्डन में डालने के लिये जो मिट्टी का ढेर पड़ा है उस पर चढ़कर बच्चे खेल रहे हैं, दिल कहता है खेलने दो पर दिमाग का तकाजा है कि मिटटी बिखर जाएगी और व्यर्थ जाएगी. सो मना करन ही ठीक है. उसकी बांयी आँख से कुछ दिन से पानी आ रहा है, शायद tear duct block हो गयी है. मेडिकल गाइड में पढ़ा अपने आप भी खुल सकती है. कल छोटे भाई और दीदी के पत्र मिले, विस्तृत पत्र.. बड़े मन से लिखे गये हों जैसे. उसका मन कृतज्ञता से भर गया.





Wednesday, August 14, 2013

आखिर किसे दें वोट


वे यात्रा से कुछ दिन पहले वापस लौट आये, अप्रैल के भी दस दिन बीत गये हैं, परसों बैसाखी है, आज बहुत दिनों बाद कुछ लिख रही है वह, हर दिन सुबह  कोई न कोई काम आ जाता था और दोपहर को याद ही नहीं आया...लेकिन कलम हाथ से खिसका जा रहा है, अर्थात लिखाई बिगड़ी जा रही है, लगता है शुभ मुहूर्त अभी नहीं आया है.

१९ अप्रैल. आज नन्हे ने पहली बार उसके सामने जानबूझ कर झूठ बोला, पता नहीं उसने ऐसा क्यों किया, उसकी आदतें कुछ बदलती जा रही हैं. रोज सुबह  की घबराहट और सुबह का मूड, शायद वह बड़ा हो रहा है, किशोरावस्था की शुरुआत है यह, धीरे-धीरे दुनियादारी सीखता जायेगा या फिर बच्चे भी उतने निर्दोष और भोले नहीं होते जितना लोग उन्हें समझते हैं, उसके अपने बचपन की कुछ घटनाएँ जो आज तक उसे याद हैं, इसका प्रमाण हैं. लेकिन वह नन्हे को ऐसा कुछ नहीं करने देगी कि बड़ा होकर वह भी उन बातों को याद करके पश्चाताप करे. आज सुबह ‘जागरण’ में बापू ने ईश्वर के अवतारों के बारे में बताया. ईश्वर बार-बार हंमारी सहायता करते हैं, प्रेरणा देते हैं मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं लेकिन हम कृतघ्न होकर उन्हें धन्यवाद देना तो दूर याद भी नहीं करते.

आज वह बगीचे से तोड़ी शिमला मिर्च की सब्जी बना रही है, किचन से उसकी खुशबू यहाँ तक आ रही है नन्हे का स्कूल बंद है. परसों शाम वे क्लब से आ रहे थे कि असम के मुख्यमंत्री श्री सैकिया जी के देहांत का समाचार मिला, आज उनका अंतिम संस्कार नाजीरा में किया जायेगा, सभी को उनकी असामायिक मृत्यु का दुःख है. तीन दिन बाद चुनाव शुरू हो रहे हैं, पर उसका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है सो वोट देने नहीं जा पायेगी हालाँकि उसका मन बहुत है. पर अभी तक यह तय नहीं कर पायी है अगर जाती तो किसे वोट देती, कांग्रेस या बीजेपी, शायद उस वक्त जो मन में आता वही करती. कल शाम वे एक मित्र के साथ यहाँ से कुछ दूर स्थित एक मन्दिर में गये, मौसम बहुत अच्छा था, ठंडी हवा चेहरे को सहलाती जा रही थी और खेतों में फैली हरीतिमा मन को. मन्दिर जाना और आना अच्छा लगा पर वहाँ पूजा करना उसके बस की बात नहीं है, यह इतना निजी मामला है उसके लिए कि सबके सामने करना कुछ अच्छा नहीं लगता. इस वक्त नन्हा सामने बैठकर ‘साइंस वर्कबुक’ में अभ्यास कर रहा है पर कितने-कितने प्रश्न पूछता है,, हर दूसरे मिनट में एक प्रश्न उसे भी तभी अच्छा लगता है जब वह खुशदिल रहता है, थोड़ी देर भी चुप हो जाये या गम्भीर तो लगता है पता नहीं क्या कारण है. उसका स्कूल अब कुछ ही दिन और खुलेगा  फिर ग्रीष्मावकाश के लिए बंद हो जायेगा, उन दिनों उसे व्यस्त रखने के लिए उसे कुछ रोचक कामों के बारे में सोचना होगा.

Today again after so many days at 10 am she is with herself alone. Almost all the work is done and all is silent around her. Dada Vasvani told about life after death, He says that there is a thin curtain between living and dead, and he gave an example of a dead mother, who was helping her son. I may be true but till today she has seen dead persons only in dreams. One day when she will be dead she may find the truthfulness of this, and then she will also help others. किन्तु ये बातें अभी यही रहने दें क्योकि अभी कई साल उसे और जीना है, एक जीवित व्यक्ति को मृत्यु कितनी दूर की चीज लगती है. परसों यहाँ चुनाव के कारण छुट्टी है, फिर इतवार है और सोमवार को कोई मुस्लिम त्योहार  है, शायद इस बार ईदुलजुहा है. परसों ही उनके एक मित्र के यहाँ विवाह की वर्षगाँठ में जाना है, उसने सोचा उसके लिए अगर वह एक कविता लिखे तो क्या उसे पसंद आएगी. हफ्तों हो गये कोई अछूता सा अहसास मन को हुए, जैसे.. गन्धराज के फूलों से खुशबू उड़कर हवा को नशीली बना दे, या बादलों के घरौंदों में कोई उड़ता पंछी कैद हो जाये, वह उड़ता पंछी चाँद भी हो सकता है और सूरज भी ! आज दोपहर को कल शाम की तरह उसे लेडीज क्लब के काम के सिलसिले में एक सदस्या के यहाँ जाना है, और वापसी में पैदल आयेगी, ठंडी हवा और हरियाली के  साथ. उसने सोचा, जून अगर उसकी बातें पढ़ लें तो हंसेंगे या फिर वह कुछ समझेंगे ही नहीं, महीनों बीत जाते हैं उन्हें कभी डायरी उठाते, जबकि शुरू-शुरू में वह हर शब्द पर ध्यान देते थे, तब उसे जानने की इच्छा थी पर अब वह उससे जान-पहचान कर चुके हैं, बहुत अच्छी तरह से.



Thursday, October 4, 2012

उफ़ ! यह कॉमन कोल्ड



यहाँ आए उसे चार दिन हो गए हैं. कल व परसों भी घर में चहल-पहल होने के कारण कुछ लिख नहीं सकी. चाचीजी और उनके बच्चे कल चले गए. परसों वह भी उनके घर जायेगी, उसी घर में जहां उसका बचपन बीता था. माँ उसे लेकर बाजार गयीं, सास, ननद, नन्हे व उसके लिए कपड़े खरीद कर दिए. नन्हा यहाँ भी उतना ही खुश है पर खाना ठीक से नहीं खाता है. आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेंगे, उसने सोचा. जून के दो पत्र मिले यहाँ आकर, वह उसे अपने पास क्यों नहीं बुला लेता उसके मन में ख्याल आया. कल वह अपना वजन करवाने गयी थी, केवल बयालीस केजी...कितना कम है.

ननद का पत्र आया है, उसका प्रवेशपत्र आ गया है, चौदह को परीक्षा है, उसे कम से कम दो-तीन दिन पहले जाना चाहिए. कल वे दीदी के घर गए थे, परसों जीजा जी आए थे, कल सुबह अपने साथ ले गए. वहाँ अच्छा लगा, दीदी, जीजाजी, व बच्चे सभी उन्हें अपने बीच पाकर बहुत खुश थे. उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा था. उन्हें एक पत्र लिखेंगे उसने मन ही मन सोचा.

कई दिन बाद डायरी लिखने बैठी है. इस बीच कितनी ही बातें हुईं, ऐसी भी जो यादगार बन गयीं पर आलस्य वश ही कहना चाहिए, लिखा नहीं. एक बार क्रम टूट जाये तो जल्दी जुड़ता नहीं है. उसे दो दिन से जुकाम ने परेशान किया है, कमजोरी भी महसूस होती है, और..कभी कभी बेचैनी भी. खुशी है तो बस इस बात की कि जून दस दिन बाद आ रहे हैं. आज भी उनका पत्र आया है, दोपहर उसने सभी को पत्र लिखे. कल परीक्षा हो गयी. उसने पढ़ाई जरूर की पर सोच-समझ कर नहीं की. खैर, जो होना था हुआ, अब उसे बदला नहीं जा सकता, यदि उसका दाखिला नहीं हुआ तो यह भले ही शर्म की बात हो, वह वापस जा सकेगी, यह क्या कम होगा, जून के साथ-साथ रहने का, जीने का  मन होता है, खुले आकाश में, अपने निज के घर में, अपने मन से जीने का...यहाँ सब कुछ ठीक है पर फिर भी अपना घर तो अपना ही है. उसका मन फिर पीछे लौट गया...समाचार भी ध्यान से सुने होते पिछले तीन-चार दिनों से तो..यह आत्मग्लानि मानव की सबसे बड़ी शत्रु है, क्या स्वयं को छोटा किये बिना मनुष्य कुछ सीख नहीं सकता...शायद नहीं.

फिर दो दिन का अंतराल. वह स्वस्थ हुई तो सोनू को सर्दी हो गयी, अभी भी खांसी है, इस समय सोया है इसी कारण, दिन में सोना उसे जरा भी पसंद नहीं, बहुत मना कर सुलाना पड़ता है. आज  उसे स्नान में काफी वक्त लग गया पर वास्तविक स्नान इसे ही कहते हैं, मालिश से भी कैसे तन में जान आ जाती है. यहाँ आयी है तब से वह ननद के लिए टॉप पर कढ़ाई कर रही है, लगभग एक तिहाई हो गया है, जून के आने से पहले ही पूरा हो जाये तभी अच्छा है, उसका पत्र आया है पर तिथि नहीं लिखी है. भूल ही गया है शायद.. आजकल वह अक्सर खुद को इस बारे में सोचते हुए पाती है कि जब वह यहाँ होगा तो इस वक्त वे क्या कर रहे होंगे.

कल रात जब पिता काम से वापस आये तो उनके हाथ में चोट लगी हुई थी. उसे इस बात का पता बाद में लगा जब वह सोनू की लगातार होती हुई खांसी के कारण उसे दवा पिलाने व नीचे सुलाने ला रही थी. उस वक्त भी सिर्फ उनके हाथ पर बंधा कपड़ा दिखा था. अभी सुबह कुछ देर पहले माँ ने बताया कि चोट काफी गहरी थी और वह रात भर ठीक से सो नहीं सके. सोनू दवा लेने के बाद आराम से सोया रहा, शुरू में कुछ देर तो बेचैन था पर बाद में ठीक से ही सोया रहा. बल्कि उसकी नींद ही बार-बार खुलती रही.


Wednesday, September 12, 2012

खिलौने की दुकान



खत आया है, ठीक से पहुंच गए थे, एक दिन लेट होने से कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि जीएम नहीं थे. मार्च का अंतिम दिन, फागुन का अवसान, अप्रैल का महीना यानि गर्मियों की शुरुआत ! आज सुबह पांच बजे उठी, नन्हा भी साथ ही उठ गया पर आधे घंटे बाद फिर सो गया. इस वक्त खेल रहा है ऊपर मकान मालिक की छोटी बेटी के साथ. कल अप्रैल फूल है, बचपन याद आ जाता है इस दिन, पडोस की एक लड़की एक बार साबुन को बर्फी की तरह काट कर लायी थी पहचानना मुश्किल था, रेडियो पर अनाउंसर भी सुबह से अजीब-अजीब बातें शुरू कर देते थे. बहुत दिनों बाद उसने रीठा-आंवला-शिकाकाई से बाल धोए. कितना अपनापन लगता है यहाँ कभी-कभी, जून वहाँ अकेले हैं, यही बात खलती है. बाबूजी, मकानमालिक के बूढ़े पिता को गुस्सा आ रहा है कि पड़ोसी उनकी दीवार पर (जो दोनों की साझी दीवार है) टाइल्स क्यों लगा रहा है, पिता भी उनका साथ दे रहे हैं इस क्रोध में.

कल रात एक अजीब हादसा हुआ, बाबूजी के बेटे ने अपनी किशोरी कन्या को टीवी खराब हो जाने के कारण बेतहाशा मारना शुरू कर दिया, वह जरूर नशे रहे होंगे. ननद ने बताया, यह कोई नई बात नहीं है, कितनी ही बार ऐसा लड़ाई-झगड़ा करते हैं. नशे में इंसान, इंसान नहीं रह जाता, हैवान ही बन जाता है. कल रात उसका मन बहुत परेशान हो गया था घर की याद आ रही थी. उसे नहीं लगता कि एक साल वह यहाँ रह पायेगी. उसे याद आया, बाजार से अंतर्देशीय पत्र लाने हैं, सभी को जवाब देने हैं.

अभी उसे दशाश्वमेधघाट जाना है, माँ के साथ टहलने व कुछ सब्जी लेने. कल नन्हें को लेकर पहली बार गयी खिलौने की दुकान में, हर बार वे तीनों साथ होते थे. घर लाते ही एक पंख खराब भी कर दिया पर उसकी खुशी, उसकी आँखों की चमक, खिलौने की दुकान पर जाने का उसका अनुभव भी तो बहुत है, उसे जैसी कार चाहिए थी वैसी नहीं मिली. कल जून, बड़ी भाभी व बड़ी ननद के पत्र आए. जून को उसकी याद उतनी नहीं आती जितनी उसे या वह लिखता नहीं है. उसका पर्स खाली होता जा रहा है, उसे लिखे या पहले वह.

थोड़ी देर पूर्व ही वह पढ़ने बैठी है, पर ऑंखें हैं कि साथ नहीं दे रही हैं. आधा घंटा और बैठकर वह खाना बनाने ऊपर किचन में जायेगी. नन्हें को जो जहाज ले दिया था, खराब कर दिया है उसने, क्या यह धन की अपव्ययता है, शायद नहीं, थोड़ी देर के लिये उसकी खुशी से कीमत वसूल हो गयी. पर ऐसी थोड़ी देर की खुशी कम कीमत के खिलौने से भी मिल सकती थी. खैर जो हुआ सो हुआ. अब उसके पापा ही खरीद देंगे उसे. कल एक पत्र और लिखा, कुल छह पत्र लिख चुकी है पर जवाब एक का ही, कहाँ जाते हैं उसके खत. माँ आज फिर बहुत उदास हैं, उनके मन की क्या अवस्था है वह नहीं जान सकती, पर कब तक, आखिर कब तक वह यूँ निष्क्रियता का आवरण ओढ़े रहेंगी, उदासीन होकर कितने दिन जिया जा सकता है, मन को खुश रखना पड़ता है, उसके लिए कोशिश करनी पडती है, मगर कोई चाहे तब तो.

Wednesday, May 23, 2012

जन्मदिन पर वर्षा


मन का भी यह अजीब रवैया है कि जिसको वह सदा आनंदित देखना चाहता है उसी को पल में उदास भी कर देता है. आज जून को नूना के कारण उदास होकर जाना पड़ा है, क्या वह समझ पाएगा कि ऐसा उसने क्यों किया. आज सुबह वे पांच बजे ही उठ गए थे. आज उसने जन्मदिन पर एक कार्ड भी दिया अपने हाथों से बनाया. बहुत स्नेह छुपा था उसमें और भी कितने उपहार दिए. पर आज उसे अपने कुछ बीते हुए पुराने जन्मदिन याद आ रहे थे, सुबह स्वप्न में छोटे भाई, बहन को देखा, माँ को भी देखा और देर तक उस स्वप्न की स्मृति बनी रही और जून ने सोचा कि उसे उसके दिए उपहार अच्छे नहीं लगे और वह उदास होकर चला गया. बाद में नूना ने सोचा इस समय वह ऑफिस में होगा शायद कहीं बाहर भी जाना पड़ा हो. जियोलॉजीकल लाइब्रेरी या सेंट्रल स्कूल. उसने सोचा जब वह घर आयेगा और उसे प्रसन्न देखेगा तो सहज हो जायेगा, वह उसकी प्रतीक्षा करने लगी उसके जाने के फौरन बाद से ही.

वह बचपन से हर जन्मदिन पर प्रार्थना करती है कि उस दिन वर्षा हो, चाहे दो-चार बूंदें ही गिरें और सदा उसकी इच्छा पूरी होती आयी है. भगवान अब भी उसकी बात सुनते हैं, कल रात हुई वर्षा इसका प्रमाण है, जबकि वह उनकी कही एक भी बात नहीं मानती. कल का दिन बहुत अच्छा रहा, सभी के पत्र व कार्ड मिले.

Thursday, February 23, 2012

कोलम्बो का आकाश


आज सुबह फिर उठने में देर हुई, कल रात देर तक वे अपने-अपने बचपन की बातें करते रहे. दोनों के बचपन में कई बातें मिलती-जुलती लगती थीं. सबके बचपन एक से ही होते हैं पर बड़े होकर सब अपने-अपने दायरों में कैद हो जाते हैं. आज सुबह से ही पानी बहुत कम आ रहा था, बाद में बंद ही हो गया. कल नूना ने जून के साथ शर्त लगाई कि भारत-श्रीलंका क्रिकेट टेस्ट मैच में भारत जीतेगा पर मैच अनिर्णीत रहा. अब कल वन डे है इसमें तो भारत को जीतना ही चाहिए, उसने सोचा. कल वे एक असमिया परिवार से मिलने गए थे, उनका बेटा जिंजू बहुत प्यारा है, शर्मीला व शांत स्वभाव का.
आज इतवार है, सितम्बर माह भीगा भीगा ठंडा सा इतवार ! सुबह से आकाश में बादल छाये रहे, यहाँ भी और कोलम्बो के आकाश में भी, मैच देर से शुरू हुआ और कम रोशनी के कारण जल्द खत्म कर देना पड़ा. जून के साथ वह होमियोपैथिक डॉक्टर के यहाँ गयी थी. आज वे फिर एक परिचित के यहाँ गए नूना ने अपने हाथ से बनायी  टैटिंग की लेस उन्हें दी. उसके बाद वे मोटरसाइकिल से दूर तक घूमने गए, खुली सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन थे. उसने वही पीला कुरता पहना था. शाम जैसे-जैसे बढ़ रही था मच्छर भी बढ़ रहे थे जो आँखों, बालों से टकरा रहे थे.