Showing posts with label समाधि. Show all posts
Showing posts with label समाधि. Show all posts

Monday, December 9, 2019

मन की शांति



“दुःख, उदासी, शरीर में अस्थिरता, श्वास में कंपन आदि समाधि में अंतराय होते हैं. आध्यात्मिक दुःख यदि न हों तो अन्य दो प्रभावित नहीं कर सकते”. आज सुबह टीवी पर उपरोक्त वाक्य सुना. वैदिक चैनल पर डॉ सुमन विद्यार्थियों को ‘पतंजलि योग सूत्र’ पढ़ाते समय कह रही थीं. समाधि शब्द सुनते ही उसके भीतर कोई कमल खिल जाता है. सम्भवतः योग के हर साधक का यही लक्ष्य होता है, वह भाव समाधि का अनुभव कर चुकी है, निर्विकल्प समाधि का अनुभव इसी जन्म में होगा, ऐसा स्वप्न भी कितनी बार देखती है. परमात्मा की कृपा से ही यह सम्भव होगा. कल सुबह की तैयारी हो चुकी है, सामान काफी हो गया है इस बार. ग्यारह दिनों के लिए वे बाहर जा रहे हैं. चार रात्रियाँ कोलकाता में, सात भूटान में. तीन थिम्पू, दो-दो पुनाखा और पारो में। आज योग कक्ष का रेगुलेटर बदल गया है. पुराने में अंक स्पष्ट नहीं दिखते थे, पर इतने वर्षों से काम चला रहे थे वे. कई बार समस्या का हल कितना आसान होता है पर उन्हें समस्या के साथ रहने की आदत पड़ जाती है. जैसे मानव देह के रोग, कमजोरी आदि से परेशान रहता है, पर आत्मा की खोज नहीं करता. परेशानी के साथ जीने की आदत डाल लेता है. आज सुबह अकेले ही प्राणायाम किया, जून तैयारी में लगे थे. उन्हें साधना के लिए प्रेरित करने का अब मन नहीं होता, वह स्वयं के लिए निर्णय लेने में समर्थ हैं. वाणी का दोष स्पष्ट नजर आने लगा है, सो बोलने से पूर्व बोलने का तरीका भी स्पष्ट हो रहा है. परमात्मा कितना धैर्यपूर्वक उन्हें सिखाते हैं, वैसे वे खुद हैं ही कहाँ, वही तो है, वही खुद को संवार रहा है, उसी का एक अंश... जिसने स्वयं को उससे जुदा मान लिया था भ्रम वश ! 

अभी कुछ देर पहले ही यात्रा से वह घर लौटी है, जून घर नहीं आये, सीधा दफ्तर चले गए. उन्हें किसी मीटिंग में जाना था. नैनी ने सफाई का काम करवा  दिया है. सफाई कर्मचारी भी आ गया था और धोबी भी, घर कुछ ही घण्टों में व्यवस्थित हो गया है. सुबह की फ्लाइट से आने का कितना फायदा है. आज पूरे ग्यारह दिनों बाद यह डायरी खोली है. भूटान में हर दिन का यात्रा विवरण लिखा था, छोटी डायरी में. आज दोपहर से टाइप करने आरंभ करेगी. मृणाल ज्योति के लिए भी कुछ लिखना है. पिछले दिनों जे कृष्णामूर्ति की किताब पढ़ती रही. कोलकाता में कल काफी समय मिला. बहुत कुछ स्पष्ट होता जा रहा है. मन किस तरह स्वयं ही स्वयं का विरोध करता है, फिर स्वयं के जाल में फंस जाता है. मन यदि स्थिर हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के प्रति जैसे ही मन कोई राय बनाता है उससे दूर हो जाता है. अब वह राय ही उसकी आँख पर पर्दा बन जाती है. जैसे गोयनका जी  कहते हैं, प्रतिक्रिया करने के बाद उनका मन प्रतिक्रिया से उत्पन्न संवेदना के प्रति प्रतिक्रिया करता है, मूल कारण तो पीछे छूट जाता है. मन जो भी विचार करता है वे  अतीत के अनुभवों पर आधारित होते हैं, यानि अतीत की लहरें वर्तमान के तट से टकराती हैं और भविष्य का जन्म होता है. शुद्ध वर्तमान को वे देख ही नहीं पाते. मन अपनी धारणाओं, मान्यताओं और विश्वासों के आधार पर एक मशीन की तरह काम करता है. ‘ऐसा होगा तो ऐसा करना है’, उसका अपना नियत एजेंडा है. 

आज चौथा दिन हैं उन्हें वापस लौटे, अभी भी मन भूटान की स्मृतियों से भरा है. जून ने जिस किताब का ऑर्डर वहाँ से किया था, वह आ गयी है. काफी मोटी पुस्तक है, भूटानी इतिहासकार की. उसे पढ़ना शुरू किया है, अभी यात्रा विवरण लिखना आरम्भ नहीं किया. आज सुबह स्वप्न में भगवान शिव की एक मूर्ति देखी। अंग स्पष्ट नहीं थे, पत्थर की आकृति से जान पड़ता था कि शिव हैं, फिर कुछ क्षण बाद श्वेत पत्थर की नन्दी की मूर्ति की झलक मिली. कल सुबह भी शिव-पार्वती दोनों की मूर्ति दिखी थी और बाद में भीतर शब्द प्रकट हुए थे दुर्गा,लक्ष्मी, सरस्वती.... भीतर कोई पुरानी स्मृति जाग उठी थी शायद ! आजकल भिन्न-भिन्न गंधों को महसूस करती है, ज्यादातर समय कोई मधुर गन्ध, कभी-कभी धुंए की गन्ध, पता नहीं यह कोई अनुभव है या रोग.. कुछ भी तो नहीं ज्ञात ! कल गुरूजी को सुना, उन्होंने बहुत सरल शब्दों में गूढ़ बातें बतायीं. एक लेखक को क्या और कैसे लिखना चाहिए, यह भी बताया. आज शाम को मीटिंग है, क्लब की एक सदस्या की बेटी का स्वागत समारोह, वह आईएएस में उत्तीर्ण हुई है. कुछ देर पूर्व छोटी बहन से बात हुई, वह खुश थी, परसों से उसे अपने भीतर शांति का अनुभव हो रहा है, ईश्वर उसे सदा इसी तरह प्रसन्न रखे ! उसके भीतर भी शांति का साम्राज्य है, जो अब खण्डित नहीं होता, होता भी है तो कुछ क्षणों के लिये. मन अपने पुराने स्वभाव में लौटना चाहता है, पर मन वास्तविक नहीं है, एक मिराज है ! एक इंद्रधनुष जैसा... मन का कहना नहीं मानना चाहिए अर्थात मन का भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मन को कोई तवज्जो नहीं देनी चाहिए जब यह कुछ नासाज हो ! 

Friday, April 5, 2019

बाड़ी में कुम्हड़ा



रात्रि के साढ़े नौ हुए हैं. शाम को योग कक्षा में आठ महिलाएं आईं थीं. उन्होंने गुरूजी की किताब ‘नित्यदिन के ज्ञानसूत्र’ भी पढ़ी. कल शाम को मीटिंग है सो चार बजे ही उन्हें बुलाया है. दोपहर को भी सर्वेंट लाइन से बच्चे व महिलाएं आये, गर्मी के बावजूद उन्होंने पूरे सेशन में भाग लिया. दोपहर को लंच में खीरा खाने के बाद दांत में दर्द शुरू हो गया, लौंग का तेल लगाया निरापद समझ कर, दर्द तो कम हो गया पर स्वाद की कणिकाएं ही जैसे नष्ट हो गयीं. किसी भी वस्तु का स्वाद नहीं आ रहा है, न मीठा, न खट्टा, न ठंडा..अर्थात स्वाद वस्तुओं में नहीं है, उनकी ग्रहण करने की क्षमता में है. सुबह बाजार भी गयी, राखियाँ बनाने का ढेर सारा सामान खरीदा है.   

परसों लाइब्रेरी से दो पुस्तकें लायी, काश्मीर पर आर.एस.दौलत की लिखी किताब पढ़कर वापस की. बरखा दत्त की किताब This Unique Land लायी है. जून के लिए OIL, पिछली किताब भी आयल वेल्स में हुए ब्लो आउट पर थी. BP के साथ यह दुर्घटना घटी थी, जिस पर बनी फिल्म भी जून ने देखी बाद में. आज महिला क्लब की मीटिंग है, हिंदी के लिए उसे ‘भाग लेने का’ पुरस्कार मिलेगा. पिछले तीन वर्ष तो प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया, क्योंकि कमेटी में थी. आज मुरारीबापू के ओशो पर विचार सुने. ओशो ने तुलसी के बारे में कई बार कुछ कहा है, पर संत लोग किसी को एक बात से जज नहीं करते. वे बीस वर्ष के थे जब पहली बार मुम्बई में ओशो को सुनने गये थे. दूसरी बार पूना में सुना, देखा. लाओत्से के बारे में उन्होंने ओशो से ही जाना. दांत में हल्का सा दर्द अभी भी है. जून कल आ रहे हैं, शायद कल ही वे डेंटिस्ट के पास जा सकें. आज सुबह स्विमिंग के लिए गयी. कल रात तेज वर्षा हुई, पूल में पानी का स्तर बढ़ गया था.

जून सुबह आ गये, दो टॉप लाये हैं. एक तैरने की पोशाक पर पहनने के लिए दूसरा योग अभ्यास के समय पहनने के लिए. आज से योग दर्शन सुनना आरम्भ किया है. योग के तीन अर्थ हैं, एक जोड़ना, दूसरा समाधि, तीसरा संयमन ! योग दर्शन में योग का अर्थ है समाधि ! समाधि का अनुभव ही तो साधक का लक्ष्य है. ‘मोक्ष’ का अर्थ है छोड़ना, ‘अपवर्ग’ का अर्थ भी अलग होने में है, ‘केवल’ का अर्थ भी हटने का तात्पर्य देता है. समाधि का अर्थ है समाधान, समता रहे मन में और बढ़ती रहे. सम्यक रूप से और अधिक से अधिक समता को चित्त में धारण करना ही समाधि है. जो अच्छा हो और पूरा भी हो, ऐसा चित्त समाधि को प्राप्त होता है.

पौने ग्यारह बजे हैं. धोबी अभी-अभी आकर गया है, अपनी मेडिकल रिपोर्ट दिखा रहा था. उसे सुनाई कम देता है, इसलिए बात ज्यादातर एकतरफा ही होती है. पर हर बार कोई न कोई बात उसके पास होती है. नन्हा जब छोटा सा था तब से वह उनके घर आ रहा है. कान की शक्ति कम होने का न उसे अहसास है न ही कोई चिंता, बड़े आराम से जीवन चल रहा है उसका. आज उसने बाड़ी से मिला कुम्हड़ा बनाया है, एक और मिला है हरा और कोमल. कल शाम को पका हुआ कटहल काटा, बेहद मीठा है और स्वादिष्ट भी. जून को इसकी गंध पसंद नहीं है. उसने नैनी के घर रखवा दिया है. परसों संडे क्लास में बच्चों को देगी. आज को ओपरेटिव गयी, जीएसटी का जिक्र हो रहा था, सभी व्यस्त थे, उनका काम बढ़ गया है, कुछ दिनों में सामान्य हो जायेगा. सुबह तरणताल से लौट कर पोहा बनाया, ध्यान कहीं और था, सब्जी जल गयी. सुबह ड्राइवर भी कुछ देर से आया. कल शाम डेंटिस्ट ने कहा, अभी कुछ करना नहीं है, सुबह-शाम ठीक से देखभाल करनी है. कोई कर्म उदय हुआ है ऐसा लगा. राखी की कविता जून प्रिंट करके ले आये हैं, दोपहर को लिफाफे तैयार करेगी. शाम को क्लब में टेक्निकल फोरम में कोई वक्ता आयेंगे.

Friday, March 15, 2019

नींद और जागरण



आज से नन्हे और सोनू ने योग सीखना आरम्भ किया है, ईश्वर से प्रार्थना है कि वे इसे जारी रखें और अपने जीवन को शुद्धतम बनाएं. आज स्कूल गयी थी, रास्ते में एक सहकर्मी अध्यापिका ने बताया, अभी तक उसके माँ-पिता जी उसका ध्यान रखते हैं और अकेले यात्रा करने पर चिंता व्यक्त करते हैं. उसकी खुद की बिटिया इतनी बड़ी हो गयी है कि जॉब कर रही है पर माता-पिता के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते. कल कई कविताओं की मात्राएँ ठीक कीं, अतुकांत कविताओं के विषय में पढना होगा.
उसने एक बार पुनः सुना, विवेक का अर्थ है देह से स्वयं को पृथक जान लेना. देह में स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथ कारण शरीर तीनों ही आ जाते हैं. ज्ञानी विदेह अवस्था में रहता है. जगत में रहते हुए भी मुक्त अवस्था में ! साधना के बिना ऐसा होना सम्भव नहीं है. विवेक की प्राप्ति में यह संसार सहायक है पर एक बार विवेक हो जाने के बाद संसार होते हुए भी विलीन हो जाता है. भक्ति, ज्ञान अथवा कर्म के मार्ग पर चलकर मन को शुद्ध करना प्रथम साधना है, जो साधक को करनी है. मन जितना-जितना शुद्ध होता जाता है, पुराने संस्कार नष्ट होते जाते हैं, अथवा तो ध्यान का संस्कार दृढ़ हटा जाता है और अंत में समाधि का अनुभव होता है. समाधि के समय क्या बोध होता है, इसको सुनना ही कितनी शांति से भर जाता है. चित्त समाधि का अनुभव करता है तो उस पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. समाधि के लिए ज्ञान और वैराग्य जीवन में साधना है. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा यदि जीवन में होगी तभी साधना दृढ़ होगी.

ग्यारह बजने को हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के ‘अभ्यास’ व ‘सत्व’ एप ने उसकी सुबहें ज्यादा प्राणवान बना दी हैं. सुबह क्रिया की फिर सूर्य नमस्कार व पद्म साधना भी. बाद में दो ध्यान किये, रुचिकर थे. कल बड़े भाई व छोटी बहन को भी इस एप के बारे में बताया. मौसम आज बेहद सुहावना है, कल रात वर्षा हुई. कल रात स्वप्न भी थे, जागरण भी था, नींद गहरी नहीं थी, पर वर्षा का पता भी नहीं चला, अर्थात भीतर का होश था बाहर का नहीं. कल दो हफ्ते के लिए नैनी की सास गाँव गयी है, उसके बिना सारे बच्चे व दोनों बहुएँ असहाय महसूस कर रहे हैं, एक-दो दिन में अभ्यास हो जायेगा उन्हें. जून आज जल्दी आने वाले हैं. सुबह अस्पताल गये थे रक्त की जाँच कराने, भोजन के बाद भी एक टेस्ट होगा. महीनों बाद आज कढ़ी बनाई है. काव्यालय से उपहार की सूचना आई है, एक पुस्तक ‘कनुप्रिया’ तथा एक चित्र अथवा तो गीति काव्य का एक सॉफ्टवेयर !

कल शाम नैनी को चावल चोरी करने के लिए मना किया. उसने स्वीकारा तो नहीं पर वह जानती है कि उसके सिवा कोई स्टोर में जाता ही नहीं. आज सुबह आई तो रोज की तरह ही व्यवहार कर रही थी, अर्थात उसका संस्कार गहरा है. परमात्मा ने उसे इस घटना का साक्षी बनाया है तो इसके पीछे कोई गहरा कारण है. उसके भीतर भी संदेह था. रोज सुनती पढ़ती है, ‘विचार ही वास्तविकता बन जाते हैं, अच्छे विचार चुनें’, तो जो विचार भीतर था वही सम्मुख आकर प्रकट हो गया है. न जाने कितनी बार भीतर संदेह का विचार पनपा होगा. यह सही है कि भरोसा किया था पर भीतर गहराई में संदेह भी था. जैसे वह संस्कार बदल नहीं पाती, नैनी भी अपने इस संस्कार को बदलने में अशक्य है. जीवन में उन्हें जो भी अनुभव होते हैं वह उनके ही पूर्व कर्मों के कारण होते हैं. बाहर माली द्वारा भेजा गया एक बूढ़ा व्यक्ति घास काट रहा है, उसे भी थोड़ा सा भोजन आज देना होगा.


Friday, September 15, 2017

फूलों पर श्वेत तितली


रात्रि के आठ बजे हैं, अभी-अभी वे बाहर टहल कर आये हैं. गेट के दोनों ओर लगे श्वेत और गुलाबी कंचन के वृक्ष फूलों से भर गये हैं. ठंडी बयार बह रही थी. सुबह का भ्रमण भी सुखद था. मार्च का प्रथम दिन है आज, धूप में अब तेजी आ गयी है. दोपहर को बच्चों को अभ्यास कराया, ध्यान करते हुए वे कितने शांत लग रहे थे, कुछ पल पहले शोर मचाते हुए जो दौड़ रहे थे, कुछ ही पलों में स्थिरता को अनुभव करने लगे थे. उड़िया सखी आयी तो उसे शील, समाधि, प्रज्ञा के बारे में बताया. आठ मार्च को महिला दिवस के अवसर पर गुरूजी ने कुछ विशेष कार्यक्रम करने को कहा है. वह आस-पास की महिलाओं को बुलाकर कुछ बताएगी. आज प्रधान मंत्री को NASCOM के रजत जयंती कार्यक्रम में बोलते सुना, अच्छा लगा. कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी की संयुक्त सरकार बन रही है, यह भी एक बड़ी सफलता है.

एक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना इस देह में रहकर इन्द्रियों द्वारा इस प्रकृति का अनुभव प्राप्त करती है. मन के द्वारा मनन करती है, बुद्धि के द्वारा निर्णय लेती है तथा अहंकार के द्वारा क्रिया करती हुई प्रतीत होती है. जबकि उसका स्वभाव मात्र जानने का है, वह ज्ञाता व द्रष्टा मात्र है. देह स्वभाव के अनुसार कार्य करती है, मन स्वभाव के कारण कभी भूत कभी भविष्य में जाता है. बुद्धि स्वभाव के अनुसार घटनाओं को परखती है, वह आत्मा इन सबको देखती है, वह शुद्ध चेतना भीतर है जो प्रतिपल इन सबको देखती है, तथा वह अपने में पूर्ण है और प्रतिक्षण संतुष्ट है. मन द्वारा कार्य किये जाने पर तथा बार-बार उसे दोहराए जाने पर जो संस्कार अंतर्मन पर पड़ गये हैं, उन्हें भी उभरने पर वह साक्षी भाव से देखती है. आँखों के द्वारा इस सुंदर सृष्टि को निहारना, स्वयं के भीतर ही अद्भुत नाद को सुनना उसे भाता है. स्वयं के अनंत स्वरूप में गहरे उतरते चले जाना और कोई बाधा, कोई अवरोध न पाना भी ! परमात्मा का विभिन्न रूपों में प्रकट होना भी ! आज स्कूल में छोटे बच्चों की योग कक्षा लेते समय एक तितली आयी और एक बच्चे के सिर पर  मंडराने लगी, बड़े बच्चों की कक्षा में एक तितली घायल अवस्था में पड़ी दिखी. पिछली बार उसके मन में पुराने किसी संस्कार के जगने पर हिंसा का विचार आया था. परमात्मा के मार्ग विचित्र हैं. वह रहस्यमय तो है ही, प्रकट होकर भी वह अप्रकट है ! आज एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति भी गयी, जिसके दिव्यांग भाई की वर्षों पहले मृत्यु हो गयी थी, उसके जन्मदिन पर दिव्यांग बच्चों के लिए खाने-पीने का कुछ सामान ले गयी थी वह. जून आज सुबह से ही व्यस्त हैं, ओएनजीसी से कुछ लोग आये हैं.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. तेज वर्षा हो रही है. बादल सुबह भी थे जब वह पैदल चलकर बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी. वह बिस्तर पर बैठकर किताब पढ़ रही थीं, खुश हुईं देखकर. अपनी सेविका की बहुत शिकायत कर रही थीं, जैसे कि अक्सर कुछ वृद्ध व्यक्ति शिकायत करना अपना स्वभाव ही बना लेते हैं. अगले हफ्ते वे गुरूपूजा रखवा रहे हैं. कितनी कृपा है गुरू की उन पर. जीवन का सही अर्थ उन्होंने ही बताया है. धरा पर यदि कोई जागा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए उस तरह जिस तरह ये वास्तव में हैं ! जो दिखाई नहीं देता वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखाई देता है...परमात्मा सदा ही किसी न किसी रूप में धरा पर मौजूद रहता है. वैसे तो वही है हर रूप में..पर इस बात को समझने के लिए जो सूक्ष्म दृष्टि चाहिए वह तो गुरू ही देता है ! आज शाम उन्हें गुलाब जामुन बनाने हैं, कल होली है, वे न भी खेलें तो कोई अतिथि घर आये, उसके स्वागत के लिए कुछ मीठा तो होना ही चाहिए. मौसम आज भी अच्छा है. ठंडी सी सुहावनी हवा बह रही है, एक श्वेत तितली फूलों पर मंडरा रही है, उड़ती हुई तितली कितनी मोहक लगती है ! बड़ी भाभी का स्वास्थ्य अब ठीक हो रहा है, कमजोरी बहुत है ऐसा बड़े भाई ने बताया. उसने मन ही मन प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करे ! कल शाम को आठ महिलाओं को विपासना के बारे में बताया, शील, समाधि व प्रज्ञा के बारे में भी बताया. उन्हें अच्छा लगा, अगले महीने फिर आने को कहा है. कल पुस्तकालय से तीन किताबें लायी. वी. एस. नायपाल की आत्मकथा, डा. मनमोहन सिंह पर एक पुस्तक तथा आर के नारायण की पुराणों से संबंधित एक पुस्तक. तीनों पुस्तकें यकीनन अच्छी होंगी. परमात्मा रह-रह कर किसी न किसी इशारे से अपनी याद दिला देता है ! यदि कुछ देर तक उसका स्मरण न आये तो...    

Friday, April 7, 2017

केसरिया बदलियाँ


परमात्मा हर पल उनके मन का द्वार खटखटाता है, वे कभी खोलते ही नहीं, वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है. वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है. चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है. जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी न करें, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है, चेतना एक ही है.  उन्हें अपने ‘होने’ की सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है. वे अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले. जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें. वे किस निमित्त हैं, वे किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में उनका भी योगदान हो, उनके पास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, वे उसके सहचर बन जाएँ. सन्नाटे में भी जो उनके साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो उनके निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है. आज सुबह चार बजे उठी, अकेले ही टहलने गयी, बाहर बगीचे में ध्यान किया, सूर्य की रौशनी में आकश और पेड़ किस अद्भुत तरीके से चमचमा रहे थे !

परमात्मा स्वयं को कितने रूपों में प्रकट कर रहा है, मानव देख नहीं पाता, आश्चर्य है, सुंदर वृक्ष, हरी घास, चहकते पंछी, उगता हुआ सूर्य, प्रातःकालीन शीतल सुगन्धित पवन सभी कुछ उसी की याद दिलाते हैं. उनके भीतर का आकाश अनंत शांति व निस्तब्धता भी उसी की याद दिलाते हैं. सारा जगत एक अलौकिक शांति से भर गया लगता है. इस जगत की हर शै उसी की लीला में सहभागी है. वे मानव ही स्वयं को पृथक मानकर उससे अलग हो जाते हैं !

आज से नया माली काम पर आ रहा है, अमर सिंह, जो सारे पंजाबी लोगों को एक ही मानता है, जैसे उन्हें सारे जापानी एक जैसे लगते हैं. सुबह सूर्य का लाल गोला दिखा पर बीस मिनट बाद ही दृश्य बदल गया, कोहरा आ गया, सूरज श्वेत हो गया था. अभी तक धूप नहीं निकली है, परमात्मा उसे रात को जगाने आता है, पर नींद और स्वप्न की दुनिया में मन कैसे खो जाता है. आज शाम को क्लब की मीटिंग है. बाएं तरफ की पड़ोसिन को-ओर्डीनेटर है, उसे फोन करके न आ पाने के लिए कहेगी.

जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा. ऐसी समाधि जिसे चाहिए जो सहज हो. समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं. समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है. जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया. कितने सुंदर शब्द उसने सुने आज सुबह..आज तीसरा दिन था, सूर्य देवता को अपना रूप बदलते हुए देखा. परसों चमचमाता हुआ बाल सूर्य देखा, कल कोहरे के पीछे श्वेत सूर्य और आज बादलों के पीछे छुपा सूर्य. अभी तक धूप में तेजी नहीं आई है !

एक नन्हे से बीज में जीवित रहने की प्रबल इच्छा होती है, कितनी बाधाएं पार करके वह अंकुरित होता है, पनपता है, वह मिटने को तैयार है तभी वह ‘होता’ है. आज सुबह चार बजे से पहले उठी. सूर्य देवता ने आज नया रूप धरा था. सलेटी बादलों में सुनहरी व केसरिया किरणों का जाल झांक रहा था. प्रकृति का रूप कितना मोहक है, उसके पीछे छिपे उस अव्यक्त चेतन के ही तो कारण, इस सुन्दरता को निहारने वाला भी तो वही चेतन है, वही इस अपार सौन्दर्य को जन्म देने वाला है और वही इसका चितेरा भी ! कल शाम मृणाल ज्योति से फोन आया, आज एक मीटिंग में जाना है. ॐ की ध्वनि आ रही है, पता नहीं कहाँ से अक्सर यह ध्वनि उसे सुनाई देती है, गम्भीर स्वरों में कोई ॐ कहता है !   



Thursday, January 19, 2017

अगस्त का महीना


दो दिनों का अन्तराल ! जून कल शाम वापस आ गये. आज सुबह गर्मी के कारण या अन्य किसी कारण से साधना करने का उत्साह नहीं था. कल दोपहर बच्चों को सिखाते समय खुद की आवाज भी बदली हुई सी लग रही थी, बच्चे ज्यादा थे, नियन्त्रण में नहीं आ रहे थे. आज अगस्त का महीना भी शुरू हो गया. स्वतन्त्रता दिवस, जून का जन्मदिन और कृष्ण जन्माष्टमी भी सम्भवतः इसी महीने में होगी.

बड़ी ननद की बेटी की बात पक्की हो गयी है. वे सभी बहुत खुश हैं. हर साधक के जीवन में कभी न कभी वह पल तो आता होगा जब वह कहे कि, आज वह साधना से भी मुक्त हो गया है. जो पाना था इस साधना से वह पा लिया है. देह अलग और आत्मा अलग भास होने लगी है. अब साधना में पहले की सी रूचि नहीं रह गयी है. समाधि का अनुभव हो गया है. अब कोई संशय नहीं रहा. उसे लगता है वह दिन आने ही वाला है.

जून आज पुनः कोलकाता गये हैं. सुबह ध्यान में सिर के ऊपरी भाग में तीव्र संवेदना हुई, एक बार ट्रैक दिखा जिस पर धावक दौड़ रहे थे. ध्यान में बंद आँख के बावजूद वस्तुएं कितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं, आज खुली आँख से एक मूरत के दर्शन किये जो आज्ञा चक्र पर रोज उसे दिखती है. अद्भुत है भीतर की दुनिया और अद्भुत है परमात्मा !


आज सुबह क्रिया के बाद भीतर से कोई बोल रहा था. उसका अवचेतन ही होगा कि वे समाधि भी अहंकार की पुष्टि के लिए पाना चाहते हैं. एक सांसारिक व्यक्ति जैसे सम्मान चाहता है, वह कोई कला सीखता है या कुछ करके दिखाता है. रूप का अभिमान होता है उसे, अपने पद का, प्रतिभा का गुरुर होता है और जब कुछ लोग उसकी तारीफ करते हैं तो उसे एक सुख की प्राप्ति होती है, वैसा ही सुख यदि एक तथाकथित आध्यात्मिक व्यक्ति भी पाना चाहे.. उसे लगता है यह भेद ही गलत है क्योंकि दोनों के पास शरीर, मन व आत्मा है. आध्यात्मिक के पास आत्मा का अनुभव भी है, वह स्वयं को अजन्मा, अनादि, अनंत जान चुका है, वह सुख-दुःख में सम रह सकता है. ग्रीष्म, शीत भी उसे नहीं छूते लेकिन मन अभी भी उसके पास है, जिसमें पुराने संस्कार भी हैं. देह की देखभाल करना व उसे स्वस्थ व सुंदर रखना उसका सहज कर्म है. जो कुछ भी कर्म उससे होते हैं, उनके कारण हुई प्रशंसा को पचा पाना उसे भी सीखना होता है वरना पुरानी आदत पीछा नहीं छोड़ती. उसे यह तो ज्ञात है कि आत्मा की शक्ति से ही सब कुछ हो रहा है, मन, बुद्धि, व देह स्वयं जड़ हैं, यदि आत्मा न हो तो ये कुछ भी नहीं कर सकते. स्वयं को आत्मा मानने का अर्थ है परमात्मा का अंश मानना, करने वाला परमात्मा ही हुआ, अभिमान करे भी तो कौन..जड़ को गर्व करना शोभा नहीं देता और चेतन को कैसा अभिमान..वही तो एक तत्व है..जो एक ही है अभिमान करे भी किससे, दूसरा कोई हुआ ही नहीं ! समाधि का अनुभव इसलिये करना है कि जन्मों के जो अशुभ संस्कार भीतर पड़े हैं, जल जाएँ..अंतर पावन हो जाये जो परमात्मा के चरणों में समर्पित किया जा सके..जून ने सुबह फोन किया, बत्तीस राखियाँ ख्ररीदी हैं उन्होंने. आज सद्गुरू के साथ ध्यान किया आधे घंटे का ऑन लाइन मेडिटेशन !  

Monday, June 27, 2016

आल इज वेल


भजन अभ्यास करने का उद्देश्य है कि आत्मा परमात्मा का अनुभव करे. मन की शांति, देह की निरोगता, सौभाग्य... ये सारी बातें अपने आप ही होने लगती हैं. कल रात टीवी पर कुछ नये कार्यक्रम देखे, सोने गयी तो पीछे वाली लेन से लाउडस्पीकर पर तेज आवाज में बजते गीतों के कारण नींद में व्यवधान पड़ा. सोने-उठने में जैसा अनुशासन जून रखते हैं, वह नहीं रख पाती. आज बाजार जाना है. मृणाल ज्योति के शिक्षकों के लिए नये वर्ष का उपहार- डायरी व पेन, ‘अंकुर’ के बच्चों के लिए भारत व विश्व के मानचित्र तथा घर के लिए सब्जियां व फल खरीदने हैं.

सद्गुरु के वचन अनमोल हैं, वह कहते हैं, साधक चलती-फिरती आग हैं जो सारी बुराइयों को जला कर रख कर देती है, जो बर्फ को पिघला देती है. वे भूल गये हैं कि जीता-जागता प्रकाश उनके भीतर है. मन का विक्षेप, मन की उद्वगिनता तथा मन की कमजोरी तभी उन्हें प्रभावित करती है, जब वे अपने स्वरूप को भूल जाते हैं. श्रद्धा से उनमें समाधि का उदय होता ही है. वीरता के क्षणों में भी पूर्ण होश रहता है. परमात्मा के प्रति समर्पण भी समाधि है ! दृष्टा में पहुंचना ही साधक का लक्ष्य है. वे अगले महीने यहाँ आने वाले हैं. उनके बारे में वे जो भी जानते हैं, उसे ठीक से लिख लेना होगा.


कल माँ की पुण्य तिथि थी. नौ वर्ष हो गये उनके देहांत को. कल भी मंझले भाई ने उन्हें स्वप्न में देखा, उसने भी कई बार उन्हें स्वप्न में देखा है. ऐसे ही एक दिन उनका जीवन भी स्वप्न हो जायेगा. वे भी किसी के स्वप्न में आने वाली छाया मात्र रह जायेंगे. उससे पूर्व उन्हें अपने सत्य स्वरूप को जान लेना है, जान ही लेना है. इस मायामय जगत के आकर्षण इतने लुभावने हैं कि मन टिककर बैठना ही नहीं चाहता, कामनाओं के जाल में इस तरह उलझा हुआ है कि..यश की कामना, समाज के लिए कुछ करने की कामना...अच्छा बनने की कामना..वे एक क्षण को भी कामना से मुक्त नही होते हैं. समाधि के क्षणों में भी कोई जगा रहता है, सबीज समाधि हुई न, कोई रहता है जो उस सुख को अनुभव कर रहा है, दृष्टा बना ही रहता है. उसकी साधना में जैसे एक समतल स्थान आ गया है. सत्संग में जाना भी छूट गया है. सद्गुरु की वाणी सुनती है, पढ़ने का क्रम भी कम हो गया है. लेकिन मन तृप्त है. कोई विक्षेप नहीं है, इसी बात का भरोसा है कि सद्गुरु हर क्षण उनके साथ हैं, वे उनकी आत्मा हैं, वे भीतर का प्रकाश हैं, जो कभी भी कहीं भी नष्ट नहीं हो सकता, तो फिर भय कैसा ? जो उन्हें चाहिए वह पहले से ही मिला हुआ है और जो व्यर्थ है वह मिले या न मिले, क्या फर्क पड़ता है. टाइम पास ही तो करना है इस जगत में, समभाव से निकाल करना है, कोई नया कर्म बंधन बांधना नहीं है, पुराने खत्म होते जाते हैं. कोई आशा नहीं, कोई अपेक्षा भी नहीं, जीवन सहज गति से चलने वाली धारा की तरह बहा जा रहा है. कल क्लब में 3 इडियट्स है, इस फिल्म की बहुत तारीफ़ सुनी है. समाज में कुछ परिवर्तन लाएगी यह फिल्म, यह उम्मीद की जा सकती है. न लाये तो भी कोई हर्ज नहीं, इस सुंदर जगत को जो भी और सुंदर बनाये उसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए ! बड़ी ननद की बड़ी बेटी के sms भी सुंदर हैं, नन्हे की कम्पनी का newsletter भी सुंदर है ! उन्होंने सभी को सिंगापुर की तस्वीरों का लिंक भेजा है, देखें, कौन-कौन देख पाता है !

Friday, June 3, 2016

मुलेठी की मिठास


आज एकादशी है, भाद्रपद माह की एकादशी, कृष्ण के जन्म का महीना, अगस्त का अंतिम दिन !
कल जून ने ओशो की आत्मकथा का शेष भाग भी डाउनलोड कर दिया. रात को उसने उनसे कहा कि इतने वर्षों के साथ के बाद तो अब सीखना-सिखाना छोड़कर, दूसरा जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लेना सीख लेना चाहिए. जब तक वे दूसरे के दोष देखते हैं उनका प्रेम भीतर बंद ही रहता है. इस दुनिया में उनके आने का एक ही लक्ष्य हो सकता है कि वे अपने भीतर प्रेम जगाएं, प्रेम से अपने आस-पास के वातावरण को भिगो दें ! अब दो-चार मिनट ही शेष हैं उनके लंच के लिए आने में. वह सर्दी-जुकाम से परेशान हैं, स्वाइन फ्लू के इस माहौल में मन में थोडा सा डर भी समाया होगा. आज ध्यान में एक-दो बार झटका लगा, बहुत दिनों के बाद ऐसा अनुभव हुआ. रात की नींद सपनों भरी थी. दिन में जो विचार भीतर चलते रहते हैं वही तो रात को दिखाई देने लगते हैं. रात को अवचेतन मन सक्रिय हो जाता है. जो विचारों से मुक्त है, वही स्वप्नों से मुक्त हो सकता है. विकारों से मुक्त हुए बिना विचारों से मुक्त होना सम्भव नहीं और विकारों में दो मुख्य हैं, राग व द्वेष, मन की समता बनाये रखना ही मन की शुद्धि है. समता की साधना ही एक दिन स्वप्नों से मुक्त कर देगी ! विपासना ध्यान इसमें अति सहायक है, देह को देखकर मन को समता में ले आना ही विपासना का लक्ष्य है.


उसके गले में हल्की खराश है, उज्जायी प्राणायाम तथा मुलेठी का सेवन किया. आज एक सखी से उसके बगीचे से नींबू मंगवाए, एक बार पहले उसने कहा था जब चाहिए तब ले लेने के लिए. उसे सब कुछ बिना किसी झिझक के कह सकती है, वह भी उसके जैसी है. वास्तव में देखें तो सभी सब जैसे हैं. एक का मन जान लें तो सबका मन जान लिया जाता है. एक ही है दो हैं ही नहीं, कोई द्वंद्व नहीं है इस क्षण ! वह इस समय ओपेरा के पेन से लिख रही है, जो बहुत अच्छा लिख रहा है. जून पिताजी को लेकर आज डिब्रूगढ़ जा रहे हैं, उनके दातों का एक्सरे कराना है. सुबह वे जल्दी उठे, जून को पुनः प्राणायाम में उत्सुकता जगी है. कल शाम को ध्यान किया, उसे अब ध्यान करने का मन नहीं होता, कोई सदा ही ध्यान में हो जो उसे अलग से ध्यान करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती, लेकिन ध्यान की गहराई में जाना भी तो जरूरी है, जहाँ समाधि लग जाये. परमात्मा और सद्गुरु स्वयं ही उसे मार्गदर्शन देते हैं, जो आवश्यक होता है वह स्वयं ही उससे करा लेते हैं और शेष छूट जाता है. अभी कुछ देर पूर्व एक दक्षिण भारतीय सखी से बात की, वह दो महीने चेन्नई में रही पर एक बार भी वहीं रहने वाली दूसरी सखी से न मिली, न फोन पर ही बात की. वह इस बात का इंतजार करती रही कि वह उसे फोन करेगी. छोटे से जीवन में वे कितना तनाव अपने भीतर एकत्र कर लेते हैं. अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है ! लाओत्से ने कहा है कि कोई उसे हरा नहीं सका, कोई उसका शत्रु भी न बना, कोई उसे दुःख भी न दे सका क्योंकि उसने न जीत की, न मित्रता की, न सुख की अपेक्षा ही संसार से की, जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा ही है !   

Friday, May 15, 2015

लोकल बस का सफर


आज फलाहार का दिन है, मन में शांति का अनुभव हो रहा है और तन भी हल्का है. सद्गुरु को कल भी सुना था, मन आनंद से छलक उठा और सारा दिन जैसे एक सुखद स्वप्न की तरह बीता. आज भी सुबह उनकी बातें सुनीं, सीधी सच्ची बातें जैसे वे लोग करते हैं आपस में और उनके शिष्य दिल खोलकर हँस रहे थे. मन को जैसे भीतर तक साफ करके लौटती हैं उनकी बातें. वे सहज हैं जैसे काश वे भी सदा वैसे ही सहज रह पायें. वे भूल जाते हैं और  और व्यर्थ के चिंतन में मानसिक ऊर्जा को व्यय कर बैठते हैं. सद्गुरु ऐसे में झकझोर कर जगाते हैं. उनमें अग्नि की भांति पवित्रता, धरती की भांति सहिष्णुता, गगन की तरह विशालता, वायु की भांति सूक्ष्मता, और जल की भांति शीतलता हो तो वे ईश्वर की निकटता का अनुभव कर सकते हैं. उसके प्रेम का अनुभव तो वे हर पल करते हैं. हर श्वास जो ग्रहण करते हैं उसी का प्रसाद है और श्वास जो वे छोड़ते हैं उसके प्रति उनकी कृतज्ञता है. प्रकाश जो उनकी आँख में है उसी की देन है. पंच तत्वों से देह बनी है, चेतना भी उसी का अंश है.

आज उसने सुना, जिसे अपने पता नहीं है उसे ही अभिमान, ममता, लोभ सताते हैं. मन का यह नाटक तब तक चलता रहता है जब तक वे अपने शुद्ध स्वरूप को नहीं जानते. खुद को जानना ही जीने की कला है. वे स्वयं के कण-कण से परिचित हों, मन और तन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति सजग रहें. कब कौन सा विकार मन में उठ रहा है इसके प्रति तो विशेष सजग रहें. आधि, व्याधि और उपाधि के रोग से वे सभी ग्रसित हैं, जो क्रमशः मन, तन और धन के रोग हैं, इनका इलाज समाधि है. समाधि में मन यदि समाहित रहे तो कोई दुःख नहीं बचता. क्रोधित होते हुए भी भीतर कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे क्रोध छू भी नहीं पाता, भीतर एक ठोस आधार मिल जाता है, चट्टान की तरह दृढ़. उन्हें कोई भयभीत नहीं कर सकता न किसी को उनसे भयभीत होने की आवश्यकता रहती है. जीवन तभी शुरू होता है. अपने भीतर उस परमात्मा की उपस्थिति को महसूस करते ही सारे अज्ञान और अविद्या से पर्दा हट जाता है. तब देह की उपयोगिता इस आत्मा को धारण करने हेतु ही नजर आती है, सुख पाने हेतु नहीं ! मन सात्विक भावों को प्रश्रय देने का स्थल बन जाता है विकारों की आश्रय स्थली नहीं. तन के रोग हों या मन की पीड़ा अभी का अंत उसका आश्रय लेने पर हो जाता है. सद्गुरु के बिना यह ज्ञान नहीं मिलता, वे उनके सच्चे स्वरूप के दर्शन कराते हैं, उसके बाद तो वह सांवला सलोना स्वयं ही आकर हाथ थाम लेता है, उसको एक बार अपने मान लें तो फिर वह स्वयं से अलग होने नहीं देता !

आज नन्हा दिगबोई गया था, लोकल बस से और वापस भी उसी से आया. साथ में आया उसका एक मित्र, वही जिसकी बहन की शादी का सीडी उसने कल देखा था. दोनों मित्र अच्छी तरह से रह रहे हैं, कल सुबह वापस जायेंगे, एक दिन नन्हे को भी वहाँ रहना होगा. सुबह दीदी को फोन किया, चाचीजी का नम्बर चाहिए था, चाचीजी व बुआजी दोनों से बात हुई. चाचाजी के पैर का घाव ठीक नहीं हो रहा है. ईश्वर की दुनिया में न्याय है. अपराधी यदि दुनिया के कानून से बच भी जाये तो भी उसके कानून से नहीं बच सकता. उन्हें हर क्षण सजग रहना होगा. कायिक, मानसिक, वाचिक किसी भी तरह का अपराध उनसे न हो, न किसी अन्य के प्रति न स्वयं के प्रति. सभी में उसी का वास है. जो पीड़ा में हैं उनके प्रति हृदयों में करुणा का भाव जगे, दूसरों को वे उसी प्रकार माफ़ करें जैसे ईश्वर उन्हें करता है. वह उनके हजार अपराध माफ़ करता है फिर भी वे चेतते नहीं हैं. ज्ञान ही मुक्ति का उपाय है, ज्ञान ही भक्ति का प्रेरक है.