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Friday, May 12, 2017

बचपन की बेफिक्री


पिताजी की कमजोरी बढ़ती जा रही है, अब वे अपने आप उठने-बैठने में भी असमर्थता महसूस करने लगे हैं. स्नान के लिए भी उनके पास शक्ति नहीं थी आज, एक सहायक रख लिया है उनके लिए. उसी ने सहायता की. नाश्ता भी ठीक से नहीं खाया. इस जगत से प्रयाण कैसे धीरे-धीरे होता है. अचानक कोई नहीं जाता. जन्मते ही मृत्यु भी साथ हो लेती है. टीवी पर वर्षा के कारण कोई सिगनल नहीं आ रहा है. उसने एक सीडी लगाकर सुना, संत कह रहे थे, जिस कर्म और उसके फल में आसक्ति न हो तो वह कर्म भक्ति में बदल जाता है. कठिन काम करने से काम करने की योग्यता भी बढ़ती है. अभी-अभी नन्हे की एक मित्र व उसकी माँ से बात की. दो महीने बाद वे उन लोगों से मिलेंगे. जून अभी तक नहीं आये हैं, बादलों के कारण शाम जल्दी हो गयी है. छह बजे उसे क्लब जाना है, पत्रिका के लिए फोटोग्राफी होनी है. उसने सोचा अपना कैमरा भी ले जाएगी. बड़ी भांजी ने वसंत ऋत का सुंदर फोटो शूट किया है.

अज चैत्र नवरात्रि का पहला दिन है. चेट्टी चाँद भी आज है. रात कोई स्वप्न नहीं आया, आया भी हो याद नहीं है. दो दिन पूर्व का अजीब सा स्वप्न अब भी पहेली बनकर मन में बना हुआ है. माँ भी थीं उसमें, नन्हा छोटा था तब, उसके शरीर से अनवरत जलधार निकल रही है, जैसे शिव से गंगा की धारा, पर माँ कहती हैं, इसमें हवा भी है, जिसकी गंध अच्छी नहीं है, पर वह रुकता ही नहीं. वह समझदार है और कल तो उसने विवाह के लिए हाँ भी कह दिया, देखें अब लड़की के पिताजी कब तक नम्र पड़ते हैं. कल वे नये घर में नहीं जा सके, आज जून की मीटिंग है, वह अकेले ही जाएगी. वहाँ काम शुरू हो गया है. बड़ी भाभी का आपरेशन ठीक हो गया, अभी भी अस्पताल में हैं, समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई ऐसा भाई ने कहा. उन्हें अपने भीतर की शक्ति जगानी होगी.

पिताजी को आज अस्पताल ले जाना ही पड़ा. कल रात को जून चौंक कर उठ गये. उन्हें लगा जैसे पिताजी ने आवाज दी है, पर वे उस वक्त सोये थे. उनकी कमजोरी बहुत बढ़ गयी है. भोजन भी बहुत कम खाते हैं, बैठे-बैठे सो जाते हैं, नहाना भी नहीं चाहते. दो कदम चलना भी मुश्किल हो गया है उनके लिए. अब तो इतनी भी शक्ति नहीं है भीतर कि अपनी समस्या कह सकें, या आँसू ही बहा सकें. उसी कमरा नम्बर चार में उन्हें जगह मिली है जहाँ एक वर्ष पूर्व माँ रही थीं. जून उन्हें भोजन खिला के आयेंगे. वह सुबह मिलकर आई. नैनी की बिटिया गाना गा रही है झूम-झूम कर, यह उम्र कितनी बेफिक्र होती है.
सुबह के साढ़े सात बजे हैं, उस समय वर्षा हो रही थी जब जून सुबह बहुत जल्दी ही अस्पताल चले गये, पिताजी की देखभाल के लिए जो सहायक रखा है, उसे सुबह रिलीज करना था. उसने बताया रात को उन्हें नींद नहीं आ रही थी, तीन बजे वे दोनों सोये. परमात्मा मानव को शोधित करने के लिए ही दुःख देता है, पिताजी का दुःख उन्हें भी तपाकर शुद्ध कर रहा है. आत्मा के निकट हो जाना जिसने जीते जी सीखा हो, वही तो मृत्यु को सामने देखकर भी प्रसन्न रहता है.  


कल भी भीतर क्रोध का धुआं उठा, एक क्षण को ही सही, अब याद भी नहीं क्यों ? बाहर कारण कुछ भी रहा हो, उसे केवल भीतर देखना है. आज शाम को फिर ऐसा हुआ, लगता है कोई कर्म जगा है. मन की न जाने कितनी परतें हैं, किस जगह से क्या उठेगा, पता नहीं चलता. ध्यान आजकल नहीं हो पा रह है. पिछले चार दिनों से पिताजी अस्पताल में हैं, घर से अस्पताल जाते-जाते जून भी परेशान हैं. उन्हें कष्ट में देखकर मन भी द्रवित होता होगा. ऊपर से कितना भी कहें कि एक न एक दिन सबके साथ ऐसा होता है, पर अपने सामने किसी को धीरे-धीरे जाते देखना बहुत कष्टदायी है. उसका अंतर भी इस समय दुःख से भरा है, खुद भी आश्चर्य हो रहा है, सदा आनन्द से ओत-प्रोत रहने वाला मन क्यों ऐसा अनुभव कर रहा है, पर उसे तो इस दुःख को भी साक्षी होकर देखना है. जीवन रहस्यमय है. वे मन को कितना भी जानने का दावा करें, वह अथाह है. आत्मा द्रष्टा है, वे उससे जरा नीचे उतरे तो दुःख के शिकार होने ही वाले हैं. इसलिए तो कृष्ण को अच्युत कहते हैं. वह कभी अपने दृष्टाभाव से च्युत नहीं होते, जब वे स्वयं को मन, बुद्धि या अहंकार मानते हैं या कोई धारणा मानते हैं तो नीचे ही उतर आते हैं. आत्मा सदा सर्वदा एकरस है. व्यवहार करते समय उन्हें नीचे उतरना पड़ता है पर तब भी स्वयं को द्रष्टा मानना है. एक अभिनय ही तो करना है, अभिनय को सच्चा मानने से ही पीड़ा होती है. कल रात भी स्वप्न में दो हाथी देखे, एक बड़ा एक छोटा, नन्हे को भी देखा, पता नहीं काले मोटे जानवर और उसे एक साथ क्यों देखती है. कुछ भी तो पता नहीं है उसे..सिवाय उस एक के जो सदा हजार आँखों से उस पर नजर रखे है. परमात्मा और सद्गुरू का साथ न हो तो संवेदनशील व्यक्ति का इस जगत में रहना कितना कठिन है .  

Sunday, October 9, 2016

जाप साहिब का पाठ


सूर्य की किरणें इस डायरी को छू रही हैं और उसके भीतर भी भर रही हैं ऊष्मा, ताप और सृजन करने की क्षमता ! इस क्षण और आज सुबह से हर क्षण अपनी अनंत क्षमता का अहसास उसे अनुप्राणित किये हुए है, उनके भीतर अपार सम्भावनाएं हैं. उनमें से हरेक ब्रह्म का अधिकारी है, तृप्त है, आनन्द से भरा है और अपने भीतर का प्रेम व शांति इस जगत के लिए बाँट सकता है. दोनों हाथों से उलीचे तो भी खत्म न हो इतना वह अपने भीतर भरे है ! आज वर्षों पूर्व लिखी एक कविता हिन्दयुग्म में भेजी. सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, जागते ही तिरोहित हो गया. ऐसे ही तो जीवन में आने वाली हर परिस्थिति एक स्वप्न ही है, जागकर देखें तो एक खेल ही लगता है सब कुछ. परसों मृणाल ज्योति में बीहू का उत्सव है, जून और उसे बुलाया है. सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल को जा रहा है, शाम के सत्संग की तयारी उसने कर ली है. एक फोन की उसे प्रतीक्षा थी, नहीं आया, एक बच्ची का फोन, हिंदी का कक्षा कार्य करने में उसे सहायता चाहिए थी. परसों एक संबंधी का जन्मदिन है, फेसबुक ने याद दिलाया, उसने एक कविता लिखी. आज उसने गुरु माँ द्वारा ‘गुरू गोविन्द सिंह जी’ के प्रकाशपर्व पर जाप साहिब का पहला भाग सुना. उन्होंने कहा ‘मानव मन यदि समाधि का अनुभव कर ले तो भी उसके भीतर अदृश्य इच्छाएं रहती हैं, जो समाज के हित में लगने के लिए प्रेरित करती हैं. सारी कामनाओं का त्याग कर ऋषि जंगल में जाता है पर पूर्ण सत्य का साक्षात्कार कर पुनः समाज में लौटता है. समाज को कुछ देने के लिए, ऊर्जा तो उसके भीतर पहले की तरह ही है बल्कि कहीं ज्यादा’. उससे भी परमात्मा कुछ कराए इसके लिए वह तैयार है. उसकी शक्ति व्यर्थ न जाये, उसकी श्वासें इस जगत के लिए हों. उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, जो सदा ही उसकी प्रार्थना का उत्तर देते आये थे, उसके पास जो कुछ भी, उस पर सबका अधिकार हो..प्रकृति जिस तरह लुटाती है, संत जिस तरह लुटाता है, उसके अंतर का प्रेम भी सहज ही प्रवाहित होता रहे !    

आज सुबह समाधि के लिए मन को पंच क्लेशों से मुक्त करने की बात सुनी. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष व अभिनिवेष ये पांच क्लेश उनके मन को पंचवृत्तियों में भटकाते रहते हैं. पंच वृत्तियाँ (अनुमान, आगम, प्रत्यक्ष), स्वप्न, निद्रा, निरुद्द्ध और एकाग्र ! इस क्षण उसका मन समाहित है, फोन आ गया सो ध्यान से उठना पड़ा. कल लोहड़ी है. तैयारियां हो रही हैं. उत्सव उनके एकरस जीवन में नया रंग भरते हैं. शाम को वे आग जलाएंगे और स्वयं तथा मेहमानों के लिए खिचड़ी, आलू, खट्टी-मीठी चटनी बनायेंगे. जून ढेर सारा सामान जो अहमदाबाद से लाये थे, वह भी रहेगा तथा गाजर का हलवा. वही लेकर वह मृणाल ज्योति भी जाएगी. दीदी, तथा छोटी बहन भी अपने-अपने घरों में यह उत्सव मना रहे हैं. मकर संक्रांति पर लिखी कविता भी उसने सभी को भेजी.

आज कितने सुंदर शब्द सुने –
केसर, कस्तूरी, पुष्प और स्वर्ण सभी को भाते हैं, वैसे ही संतों की ज्योति भी सभी को भाती है.
घी और रेशमी वस्त्र सभी को भाते हैं, भक्त भी सभी को प्रिय होते हैं.
मन प्याला है और परमात्मा के नाम का रस उसमें भरा है.
मृत देह की चषक बनी ज्यों मृत मन का बनता प्याला !

तन में रंग लगा माया का, प्रेम का रंग चढ़े फिर क्योंकर ?
चेतनता आरूढ़ जीव पर, जीव चढ़ा अहंकार पर.
अहंकार है बुद्धि ऊपर, बुद्धि मन पर रही विराजे.
मन चलता है प्राण रथों पर, प्राण इंद्रियरूपी रथ पर.
इन्द्रियां देह पर करें सवारी, देह भूतों से बनी हुई है.

कभी गगन में चमके दिनकर, कभी घोर अँधेरा छाता.
कभी धुआं, कोहरा धुंधलका, कभी चमकती बिजली पल-पल.
रिमझिम बादल बरसा करते, कभी बर्फ के पत्थर पड़ते.
तरह-तरह के शब्द गरजते किन्तु नभ ज्यों का त्यों रहता.
बाढ़ की विभिषका आये, भूचाल भूमि थर्राए.
कितनी उथल-पुथल हो जाये पर वह निर्विकार सदा सम.

ऐसे ही उस परम सत्ता में कुछ भी अंतर आ नहीं सकता.


Thursday, October 29, 2015

बच्चों के खेल


जाग्रति ही प्रेम को जन्म देती है. आज सुंदर वचन सुने, जो जगता है उसका ध्यान परमात्मा करता है. सजगता क्षण-क्षण मुक्त करती है. भीतर से एक ऐसी मुक्तता का अनुभव प्रेम ही सिखाता है. वह  आत्मा का सच्चा स्वरूप है, वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का ज्ञानी और भक्त का लक्ष्य है. हर जाता क्षण जब विश्रांति का अनुभव दे तथा हर आता हुआ शक्ति का तो कोई कर्म करते हुए भी विश्रांति का अनुभव करता है तथा कुछ न करते हुए भी तृप्ति का ! सजगता आती है सजग रहने से..यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का बल प्रभु ही देते हैं !

आनन्द पर श्रद्धा हो सके तो भीतर आनन्द की लहर दौड़ जाती है. भीतर एक ऐसी दुनिया है जहाँ दिन-रात घुंघरू बज रहे हैं पर किसी को उस पर श्रद्धा ही नहीं होती. आश्चर्य की बात है कि इतने संतों, सदगुरुओं को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उस की तलाश में भीतर जाता है जबकि भीतर जाना कितना सरल है, अपने हाथ में है. अपने को ही तो बेधना है, अपने को ही तो देखना है, परत दर परत जो उसने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. वे नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो भीतर का आनन्द छलक ही रहा है. वह मस्ती तो छा जाने को आतुर है, वे सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर संत कहता है भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है, उन्हें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है, एक साथ दो मार्गों पर तो चला नहीं जा सकता, बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग. भीतर का मार्ग है शून्य हो जाने का मार्ग !

सद्गुरु कहते हैं, उन्हें क्रियाशीलता में मौन ढूँढ़ना है और मौन में क्रिया !  उन्हें  निर्दोषता में बुद्धि की पराकाष्ठा तक पहुंचना है और बुद्धि को भोलेपन में बदलना है, वे सहज हों पर भीतर ज्ञान से भरे हों ! ज्ञान अहंकार से न भर दे. ऐसा ज्ञान जो सहज बनाता है, जो बताता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो वे नहीं जानते बल्कि वे कुछ भी नहीं जानते. ऐसा ज्ञान मुक्त कर देता है. ऐसा ज्ञान जो बेहोशी को तोड़ दे. सद्गुरु की कृपा का दिया उनके भीतर जला है वह प्रकाशित कर रहा है अपने आलोक से. वे प्रेम से सराबोर हो रहे हैं, ऐसा प्रेम जो उन्हें सहज ही प्राप्त है, वे हाथ बढ़ाकर उसे स्वीकारें, कोई पदार्थ, कोई क्रिया उसे दिला नहीं सकती, वह अनमोल प्रेम तो बस कृपा से ही मिलता है.  गुरू की चेतना शुद्ध हो चुकी है, वह परमात्मा से जुड़े हैं और बाँट रहे हैं दिन-रात प्रेम का प्रसाद !

नादाँ सा दिखे और बच्चे सी जान हो जिसकी
वह संत पूरा है पारस जबान हो जिसकी

उनके चारों और धूप है, प्रकाश है, हवा है, आनन्द रूपी आकाश है, वे डूब रहे हैं इन नेमतों के सागर में ! वे सराबोर हैं ख़ुशी के आलम में, सत्य की महक ने उन्हें डुबा दिया है. ध्यान की मस्ती जो भीतर है वही बाहर भी है. परमात्मा ने इस जगत को आनन्द के लिए ही बनाया है. वे आनन्द की तलाश में निकलते जरूर हैं पर रास्ते में ही भटक जाते हैं. एक बच्चा अपनी मस्ती में नाचता है, गाता है, खेलता है वह आनन्द की ही चाह है. आनन्द बिखेरो तो और आनन्द मिलता है, जैसे प्रकाश फ़ैलाने पर और प्रकाश मिलता है. वही बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है सहजता खोने लगता है और तब उसे अपने भीतर जाने का रास्ता भी भूल जाता है, शरम की दीवार, कभी डर की, कभी शिष्टाचार की, कभी क्रोध की दीवार उसे भीतर के आनन्द को पाने से रोकती है और वह बाहर की चीजों से ख़ुशी पाने के तरीके सीखने लगता है. चीजों का ढेर जो उसके आसपास बढ़ता जाता है उसके भीतर भी इकट्ठा होने लगता है !


Tuesday, July 21, 2015

नीरू माँ की शिक्षा


आज ध्यान में कैसी खुमारी छा रही थी. नाश्ते में दलिया, पोहा और एक ‘बनाना’, लिया था, अन्न का भी एक नशा होता है. यह ध्यान था या नींद थी, कैसे कह सकते हैं. सद्गुरु कहते हैं ध्यान के बाद तो चेतनता का स्तर बढ़ जाना चाहिए. नींद के बाद भी एक ताजगी आती है पर मन उतना सचेत नहीं रहता. उसका मन पूर्ववत है, एक सा, एक शांत सरोवर की तरह. सर के ऊपरी भाग में एक अजीब सी सनसनाहट का अनुभव हो रहा है. कई बार होता है एक सिहरन या कहें स्पंदन महसूस होता है. कभी-कभी पूरे शरीर में ही अद्भुत रोमांच और कम्पन होता है ध्यान में. पता नहीं कितने रहस्य छुपे हैं चेतना में, जगत भी दीखता है. स्वप्न में भी तो चेतना कितने अद्भुत दृश्य गढ़ लेती है. कल स्वप्न में देखा फिर वह एक मुस्लिम मोहल्ले में फंस गयी है. वहाँ एक के बाद एक घर ही नजर आते हैं, न कोई सड़क न गली, घरों के दरवाजों से गुजरकर ही जाना पड़ता है यदि कहीं बाहर जाना हो. यह स्वप्न उसे अनेकों बार आ चुका है शायद किसी पूर्वजन्म की स्मृति है. गुरुमाँ कहती हैं जिस तरह जगने के बाद स्वप्न महत्वहीन हो जाता है वैसे ही संतजन इस जगत को स्वप्न मानकर कोई महत्व नहीं देते !

“घर में वृद्ध माता-पिता हों तो घर में ही तीर्थ होता है, उनकी सेवा करने से ही सारे तीर्थों का सेवन करने का पुण्य मिल जाता है.” स्वामी रामसुखदास जी का प्रवचन सुनकर हृदय पर कैसा मीठा आघात होता है, शहद की तरह मीठी उनकी वाणी और उससे भी मधुर ईश्वर के प्रेम में रची-बसी जैसे चाशनी में डूबी हो, ऐसी हँसी उसके अंतर को छू जाती है. उसने सद्गुरु को भी सुना. नन्हे बच्चों को कैसे संस्कार दें, इस पर चर्चा कर रहे थे. पहले लिंग, मूर्तिपूजा, मन्त्र जप, मन्दिर आदि के महत्व पर प्रकाश डाला. अद्भुत ज्ञान का भंडार है उनके पास और कैसी सहज, बालवत् निश्छलता. संतों के अलावा जगत में किसको जीने की कला आती है, उधर स्वामी रामदेव जी हैं जो उन्हें कितने भिन्न-भिन्न तरीकों से देह से ऊपर ले जाना चाहते हैं, वे अद्भुत क्रान्तिकारी संत हैं, उनकी वाणी भीतर जोश भरती है. गुरूमाँ तो साक्षात् सरस्वती हैं, कितना प्रेम है उनकी वाणी में, उनके हृदय में. नीरूमाँ की ज्ञान की विधि कैसी अनोखी होगी कि लोग अपनी फाइलें सुधारने लगते हैं. ये सारे संतजन उसे बहुत प्यारे हैं. सभी को उसने अनंत-अनंत नमन किये. सद्गुरु तो और भी निराले हैं, वह कहते हैं कुछ मान के चलो, कुछ जान के चलो. वे भावना पर बल देते हैं. वे भीतर के विश्वास को दृढ करना चाहते हैं वे ज्ञान को बोझिल नहीं बनाते. हर संत अपने आप में अनूठा होता है. सबके रास्ते भिन्न-भिन्न हैं मंजिल एक ही है, उसे भी एक ही मार्ग पर चलना है, सद्गुरु के मार्ग पर !  फिर उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, वही तो हैं जो भिन्न-भिन्न रूप धर कर ज्ञान फैला रहे हैं. एक ही सत्ता है जो चारों ओर फैली है, वही भीतर है वही बाहर है. वही उसे सत्य के मार्ग की ओर ले जाएगी ! उसने प्रार्थना की कि उसका हृदय किसी के प्रति राग-द्वेष से लिप्त न रहे.  


कल उसे हल्का जुकाम था, आज अपेक्षाकृत शरीर स्वस्थ है. सारे रोग प्रज्ञापराध के कारण ही होते हैं. पर इससे उसे कितना कुछ सीखने को मिला है. एक तो देह से अलग जानकर स्वयं को स्वस्थ जानने का अभ्यास. दूसरा नम्रता का पाठ, जो रोग पढ़ाता है. पिछले दिनों उसने अन्यों की बीमारी को देखकर उन्हें दोषदृष्टि से देखा. उससे मुक्त करने के लिए शायद यह रोग आया, ताकि वह स्वयं को सजग तथा अन्यों को असजग न समझे. प्रकृति उसे दोष रहित देखना चाहती है.

Tuesday, June 23, 2015

विवाह की धूमधाम


मकर संक्रांति के दिन वे यात्रा पर निकले थे और दो हफ्ते बाद वापस आये, सो आज कई दिनों के बाद डायरी खोली है. सभी से मिलकर अच्छा लगा, बड़ी भांजी की शादी भी भली प्रकार से हो गयी. उन्होंने नये-नये स्थान देखे, पुराने मित्रों से मिले. कुल मिलाकर दो हफ्ते उनके लिए उम्मीदों व आशाओं से भरे थे. कभी-कभार ऐसे पल भी आए जब मन चिन्तन में लीन था. संगति का असर पड़ना स्वाभाविक था, लोभ भी जगा, कामना भी उठी. नये वस्त्रों की चाह उठी, संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी. चमचमाते बाजार देखकर खरीदने की इच्छा उठी, पर अब अपने पुनः अपने घर लौट आये हैं. यात्रा  बहुत कुछ सिखाती है, बीच-बीच में समय मिला तो सद्गुरु के वचन भी सुने. क्रिया नियमित रूप से की. मन टिका रहा इसी कारण. प्रमाद ने घेरा अवश्य पर भीतर की आग बुझी नहीं. कल रात को एक स्वप्न देखा, जिसमें ईश्वर चर्चा चल रही थी. भीतर जिसने आत्मा को एक बार जाना है वह उससे कभी भी विलग नहीं हो सकता चाहे गला डूब संसार में उसे क्यों न रहना पड़े.

मन जिस भाव में टिकता है, समझना चाहिए उस समय वही प्रबल है. उसका मन स्मरण में न टिककर संसार में जा रहा है. कल फिल्म देखी, जस्सी का भी आकर्षण है. सद्गुरु कहते हैं अपनी परीक्षा स्वयं नहीं लेनी है. अंततः मन लौट कर वहीं तो जाता है जो उसका आश्रय है. आज सुबह सड़क दुर्घटना में डा.विद्यानिवास मिश्र के निधन का समाचार सुना, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. ईश्वर उनके साथ सदा था, उनके भी और उनकी धर्मपत्नी के भी जिनका देहांत अभी डेढ़ महीने पूर्व ही हुआ था. आनंद के महासमुद्र में निरंतर वास करने वाली आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, नित्य है, चेतन है, अविनाशी है तथा प्रेममयी है. इसे जानते हुए यह जगत का व्यवहार उन्हें  करना है. जगत तब उन्हें छू भी नहीं सकता.


आज सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, एक संत जो भक्ति में नृत्य कर रहे थे और गा रहे थे, उसके सम्मुख आए. उनसे दृष्टि मिली, उसके देखते-देखते उनकी दृष्टि प्रखर होती गयी, आँखों की पुतलियाँ जैसे स्थिर हो गयीं और उनमें से कोई तेज निकलने लगा. उसकी आँखों तक पहुंचा और उसके सिर पर रखा दुप्पटा बल से ऊपर उठ गया और शरीर पर किसी आघात का अनुभव हुआ और अगले ही क्षण अभूतपूर्व आनंद तथा हँसी उसके सारे अस्तित्त्व से फूट पड़ी तो उसके आसपास के लोग भी चकित हो रहे थे, तभी अलार्म बजने लगा और उसकी नींद खुल गयी. आज जब ध्यान में बैठी तो निर्विचारिता के क्षण अधिक देर तक टिके तथा मौन का अनुभव भी हुआ. कितना अनोखा अनुभव था, आँखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था. आज की अनुभूति अलग थी. वैसे तो हर दिन का ध्यान अलग होता है. 

Wednesday, May 6, 2015

अवतारों की कथाएं


आज सुबह सुबह बाइबिल की घटनाओं से जुड़ा एक स्वप्न देखा, वह प्रभु को पुकार रही है, जैसे प्रेरित पुकारते थे और वह सारे कष्टों को हर लेता है. कैसा अद्भुत आनंद है ईश्वर में जो निरंतर झरता ही रहता है. उसके कानों में एक झींगुर के गीत सी एक ध्वनि हमेशा गूँजती रहती है. कभी-कभी चिड़ियों के कूजने की आवाज भी और यह हर पल उसे उसकी याद दिलाती है. आज टीवी पर श्रीश्री को भी देखा, सुना. अवतारों की जो कथा उन्होंने उस दिन आरम्भ की थी, आज पूर्ण कर दी. राम अवतार में ईश्वर ने मर्यादा का पालन करना सिखाया तो कृष्ण अवतार में उत्सव मनाना. फिर बुद्ध अवतार में मौन रहकर प्रज्ञा की खोज. कल्कि अवतार यानि वर्तमान में रहते हुए हृदय से परायेपन की भावना का नाश करना. साधना के द्वारा जब हृदय में इतना प्रेम जग जाये कि कोई दूसरा लगे ही नहीं, सभी अपने ही लगें तो समझना चाहिए कि हृदय में कल्कि अवतार हुआ है. सारे अवतार मानव के भीतर भी होते हैं. उन्होंने कितने सरल शब्दों में बताया, कृष्ण संतों के हृदय रूपी नवनीत को चुराते हैं. बाबाजी ने आज बहुत हँसाया, वह इतनी अच्छी राजस्थानी भाषा बोलते हैं. मस्ती से छलकती हुई उनकी वाणी सुनकर ईश्वर की निकटता का अहसास होता है. देहभाव से मुक्त कर वह आत्मभाव में स्थित कर देते हैं. संतों के गुणों का बखान नहीं किया जा सकता, वे सोये हुए ज्ञान को जागृत करते हैं, सत्संग प्रदान करते हैं, जो बहुमूल्य है !

आज भी सद्गुरु के वचन सुने. मन जो इधर-उधर बिखरा हुआ है उसे युक्तिपूर्वक हटाकर एक केंद्र पर लाना ही ध्यान है. ईश्वर की कृपा सहज, स्वाभाविक रूप से सदा प्राप्त होती ही रहती है जैसे सूरज की धूप, तो उसके लिए मन को सहज रूप से ध्यान में लगाना है. इसमें कोई जोर जबरदस्ती नहीं चलती. मन वर्तमान में रहे तो यह अपने आप होता है. आज का वर्तमान ही कल का भूत बनने वाला है और भविष्य तो वर्तमान पर निर्भर है ही. भक्ति पूजा, आराधना और समर्पण सहज कार्य हो जाएँ तो समझना चाहिए की ज्ञान फलित हो रहा है. मन में क्या चल रहा है इस पर नजर रखना भी सहज होना चाहिए.  

आज साधना के तीसरे और चौथे सोपानों – षट सम्पत्ति तथा मुमुक्षत्व के बारे में सुना. मन बेचैन न हो प्रसन्न रहे तो शम की सम्पत्ति पास है. दम अर्थात इन्द्रियों का निग्रह. कुछ मनचाहा हो या अनचाहा, उसे सहन करने की क्षमता का नाम ही श्रद्धा है. ज्ञान को पाने की इच्छा, पाने की सम्भावना ही श्रद्धा है. देह से दिन-रात तरंगें उठती रहती हैं. यह समता में हों तो समाधान है. तरंगे ग्रहण भी की जाती हैं, यह आदान-प्रदान समता में हो तो तृप्ति का अनुभव होता है. किसी भी कार्य में खुश रहने की क्षमता ही उपरति है. उपरति होने से कोई संवेदनशील होता है. वह समष्टि का प्रिय है, और यह समष्टि चाहती है कि वह प्रसन्न रहे. जीवन का अंतिम ध्येय क्या है, इसे जानना ही, जानने की इच्छा ही मुमुक्षत्व है. जब सब कुछ बंधन लगता है, तभी मुक्ति की चाह होती है. आजादी की प्यास ही मुमुक्षत्व है. पूर्ण तृप्ति की प्यास ही मुमुक्षत्व है. नित्य की तृप्ति अनित्य से कैसे हो सकती है !  


Wednesday, April 8, 2015

कच्चे धागे पक्के रंग


आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद ध्यान अपने आप लग गया, फिर भ्रामरी करते समय अद्भुत  दृश्य दिखे, कितनी सुन्दरता भीतर छिपी है. ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौन्दर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की उसकी आकांक्षा को इन चिह्नों से बल मिलता है. सुबह सुना था, साधना को कभी त्यागना नहीं है, बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भीतर की यात्रा पर जाने से वे रोके नहीं. एक वर्ष होने को आया है उसे प्रथम अनुभव हुए. अगले वर्ष में और प्रगति होगी और उसे पूर्ण विश्वास है कि इसी जन्म में उसे आत्म साक्षात्कार होगा. उसे संगदोष का विशेष ध्यान रखना होगा, जल में कमल के समान रहने की कला सीखनी होगी ताकि संसार प्रभाव न डाल सके. वाणी का संयम सबसे अधिक आवश्यक है. मन को भीतर की ओर मोड़ना है. मधुमय, रसमय और आनंद मय उस प्रभु को पाना किना सरल है. अंतर्मुख होना है. चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्पष्ट करना है, वह अटल तो शाश्वत है ही.

अभी-अभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि शीघ्रता पूर्वक लिखने से उसका लेख बिगड़ गया है. ईश्वर को चाहने वाले का तो सभी कार्य सुंदर होना चाहिए, क्योंकि वह इतना सुंदर है ! कृष्ण के बारे में कल विवेकानन्द के विचार पढ़े, वह उन्हें महापुरुष मानते थे, बहुत सम्मान करते थे और मन ही मन उन्हें प्यार भी करते रहे होंगे, ईश्वर भी मानते रहे होंगे. कृष्ण ऐसे मनमोहक हैं कि उनके बारे में पढ़कर, जानकर उन्हें कोई भी चाहे बिना नहीं रह सकता है. आज धूप सुबह से ही नजर आ रही है. सुबह वे आधा  घंटा देर से उठे, नन्हे को स्कूल नहीं जाना था, पर साढ़े छह तक सभी कार्य कर योगासन के लिए तैयार थी . सुबह संत मुख से तुकाराम के जीवन पर आधारित घटनाएँ सुनी. सभी संतों ने काफी कष्ट झेले हैं, उसके बाद ही उन्हें मान्यता मिली है. आग में तपकर ही सोना निखरता है. गुरुमाँ ने अंगुलिमाल की कथा सुनाई. अतीत कैसा भी यदि कोई सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भविष्य में ज्ञान का मार्ग पकड़े तो ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि वे इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल उठाने का सामर्थ्य ईश्वर देते हैं फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. उसने अपना मार्ग तय कर लिया है, मन में जो भी थोड़ी बहुत आशंका थी उसे गुरू की कृपा ने मिटा दिया है और अब ईश्वर ही एकमात्र उसके जीवन का केंद्र है, जिसका हाथ पकड़ा है और ईश्वर ने उसका !


आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उससे फोन पर बात की पर बधाई देना भूल गयी, राखी की शुभकामनायें जरुर दे दिन. पिताजी आज घर पर अकेले रहेंगे, उनका समय टीवी, अख़बार, किताबें और संगीत में अच्छा गुजरता है. बड़े भैया-भाभी का फोन भी आया, छोटी बहन को उन्होंने किया. छोटी ननद का आया, बड़ी को उन्होंने किया. अब बाबाजी आ गये हैं, कह रहे हैं, रक्षाबन्धन आवेश और आवेग को नियंत्रित रखने का दिन है. सारे भयों से मुक्त होने का दिन है, ईश्वर के निकट जाने का तथा सभी के लिए मंगल कामनाएं करने का दिन है. कच्चे धागों का लेकिन सच्चे प्रेम का दिन है. अपने चित्त को अवसाद से बचना है, चित्त की सौम्यता की रक्षा हर हाल में करनी है. अभी प्रभात की सुमधुर बेला है, मन स्वतः ही शांत है, दिन भर सप्रयास इसे इसी भाव में रखने का पर्ण है ताकि रात्रि को सोते समय भी ईश का ध्यान शांत भाव में दृढ़ रखे ! अभी पड़ोसिन का फोन आया वह भी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जाएगी. आज पूर्णिमा है, उपवास का दिन, होता अक्सर यह है कि इसी दिन उसे व्यस्तता ज्यादा होती है, उपवास के दिन भर मौन रहने का विचार मन में है एक दिन तो ऐसा होगा ही.