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Sunday, March 29, 2020

राखी का उत्सव


आज मृणाल ज्योति में बच्चों के साथ दो दिन पहले ही राखी का उत्सव मनाया, बड़ा सा नीला कार्पेट ले गयी थी, जिसपे दो पंक्तियों में उन्हें बैठाया, जो इस समय धूप में सूख रहा है. वह खीर बनाकर ले गई और एक सखी आलू बोंडा, उन्होंने टीचर्स को भी राखियाँ बाँधी, तस्वीरें उतारीं. बड़ी ननद की राखी आज मिल गयी, उसकी भेजी राखियां भी सभी भाइयों को मिल चुकी हैं. कल सुबह ड्राइविंग टेस्ट देने जाना है. आज सुबह क्लब की प्रेसीडेंट के यहां अकेले कार लेकर गयी, वह तो उनका हाल-चाल पूछने गयी थी, पर उन्होंने क्लब का रजिस्टर, चेकबुक आदि सब सौंप दिया, टीचर्स डे के लिए भी चेक दिया, वे मृणाल ज्योति के टीचर्स के लिए अच्छा सा उपहार खरीद सकते हैं. परसों वह चेकअप के लिए बाहर जा रही हैं, एक हफ्ता लग जायेगा. इसी महीने मीटिंग है, कविता पाठ की प्रतियोगिता कराने में उसे सहायता करनी है. 

आज प्रातः भ्रमण से लौटते समय शब्द भीतर गूँज रहे थे, कविता के शब्द ! जैसे कोई जलप्रपात बह रहा हो ! सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, वह गाड़ी चला रही है( आजकल गाड़ी चलाने के स्वप्न अक्सर आते हैं) ड्राइवर साथ वाली सीट पर है, यानि अभी तक अकेले चलाना शुरू नहीं किया है. पीछे दो सखियाँ बैठी हैं. मंजिल आ गयी तो रुककर  वह उतर जाती है. पीछे गली में स्कूल ड्रेस पहने चार लड़कियाँ हैं जो आपस में लड़ रही हैं, वह उन्हें समझाती है, धमकाती है तो क्या देखा वे सभी एकजुट होकर उसे ही चोट पहुँचाने के इरादे से आने लगती हैं, तभी भीतर ख्याल आता है, इन्हें उसने ही तो रचा है.  वह खुद ही कार थी, स्वयं ही ड्राइवर, स्वयं ही यात्री और स्वयं ही लड़ाकू लड़कियाँ ! अपनी ही कृति से डरने की क्या जरूरत है, उठने के बाद भी यह भाव दृढ होता गया. परमात्मा स्वयं ही सब कुछ बना है, यानि आत्मा ही सब कुछ बनी है. वह ही वह सब ओर दिखाई देने लगी. जून ने जब कहा, उन्होंने जब अपने पुराने सहकर्मी श्री और श्रीमती पी को देखा, काफी ऊंची इमारत से कूदने का अभ्यास करते हुए तो उन्हें कहा, यह मन की ही रचना है, उनका मन उन दोनों को खतरा मोल लेने वाले साहसी  व्यक्तियों की तरह देखता है. कविता के शब्द अब याद नहीं हैं, वे तो अस्तित्त्व में विलीन हो गए लेकिन भाव भीतर हैं तो वे नए शब्दों को ढूंढ ही लेंगे स्वयं को व्यक्त करने के लिए. 

आज राखी है, सभी भाइयों से बात हुई, पिताजी व चाची जी से भी, दोनों ननदों से भी. व्हाट्सएप पर बहुत लोगों को संदेश भेजे, फेसबुक पर राखी की कविता पोस्ट की. सुबह वर्षा में भीगे, जून ने भी वर्षा का आनंद लिया, बगीचे में पानी भर गया था, अभी भी बाहर काफी पानी भरा है, वर्षा जो सुबह से लगातार हो रही थी, इस समय रुक गयी है. टीवी पर मूक और बधिर  व्यक्तियों के लिए समाचार आ रहे हैं. साइन लैंगुएज में उद्घोषिका को समाचार दिखाते हुए देखना मन में विपरीत भावों को एक साथ जगा गया. अच्छा भी लगा उसे इस कुशलता से पढ़ते हुए देखकर, साथ ही दुःख भी कि जो लोग सुन नहीं सकते, कितनी बड़ी संपदा से वंचित रह जाते होंगे. टीवी पर ‘मन की बात' शुरू हो गयी है. प्रधानमंत्री राखी व जन्माष्टमी की शुभकामनायें दे रहे हैं. आज संस्कृत दिवस भी है, भारत इस बात का गर्व करता है कि तमिल पुरातन भाषा है और संस्कृत वेदों से लेकर आज तक ज्ञान का प्रसार करती आ रही है. केरल में आपदा आयी है, पर सेना के जवान पूरी मुस्तैदी से जुटे हैं. प्रधानमंत्री अटलजी के कार्यों के बारे में बता रहे हैं. उन्होंने संसद में तथा देश में कई सुधारों के द्वारा परिवर्तन किया. तिरंगा फहराने का अधिकार सामान्य लोगों को दिया. इसी महीने राष्ट्रीय खेल दिवस है, जकार्ता में एशियन गेम्स चल रहे हैं, अब भारतीय खिलाड़ियों को कई पदक मिलते हैं, देश का माहौल बदल रहा है. 

Wednesday, April 10, 2019

स्वच्छ भारत



सवा ग्यारह बजने को हैं. आज जून की मनपसन्द पकौड़ों वाली कढ़ी बनायी है. दो सप्ताह तक गाय के दूध की एकत्र की हुई मलाई से ‘घी’ बनाया और बचे हुए अंश में आता भूनकर गेहूँ का चूर्ण भी. सारी सुबह रसोईघर में ही बीत गयी जैसे. अभी-अभी एक परिचिता का फोन आया, स्व्च्छता पर कम्पनी की तरफ से आयोजित ‘स्लोगन प्रतियोगिता’ के बारे में बताया, उसने हिंदी में कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं, भाषा शुद्ध है या नहीं, पूछ रही थी. परसों यहाँ कम्पनी की तरफ से स्वच्छता पखवाड़ा मनाने के कार्यक्रम में ‘वाकाथन’ है यानि कुछ दूर तक बैनर लिए पैदल चलना है. रास्ते में गंदगी भी दिखेगी, उसे साफ नहीं करना है बस लोग साफ करें इसका प्रचार करना है. पता नहीं मनुष्य अपने आप को कब तक धोखा देता रहेगा. अचानक तेज वर्षा होने लगी है. घर के बाहर नाले में पानी भर जाता है जो वर्षा समाप्त होने के घंटों बाद तक भी बना रहता है, बड़े नाले से उसका सम्पर्क शायद टूट गया है. आज सिविल विभाग से कोई कर्मचारी देखने के लिए आया है. सुबह तरणताल गयी पर बहुत भीड़ थी, ठीक से अभ्यास नहीं हो पाया. कल से वह समय चुनेगी जब कम से कम लोग हों. कल मृणाल ज्योति की वार्षिक सभा है.

आज जुलाई का अंतिम दिन है. टीवी पर प्रधानमन्त्री का ‘मन की बात’ कार्यक्रम आ रहा है. वह कह रहे हैं, वर्षा मनोहारी है पर बाढ़ की विभीषिका भयंकर होती है. बरसात में हर वर्ष देश के कितने ही भागों में बाढ़ आती है. वह जीएसटी की बात भी कर रहे हैं. उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन तथा अगस्त क्रांति की बात भी कही. साथ ही कहा, इस वर्ष को संकल्प वर्ष के रूप में मनाएं तो पांच वर्ष में भारत का चित्र बदल जायेगा. संकल्प को सिद्धि में बदलना है. गणेश पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि इस पूजा को मनाते हुए इस वर्ष सवा सौ वर्ष हो जायेंगे. प्रधान मंत्री कुछ ही देर में इतने सारे विषयों को लेते हुए इतना सार गर्भित भाषण देते हैं. महिलाओं के सशक्तिकरण की बात की तो साथ ही राखी बनाने वाले कारीगरों की भी.

अगले हफ्ते रक्षाबन्धन का त्यौहार है. अभी अभी मृणाल ज्योति से फोन आया, पूछ रही थी, क्या वह और कुछ अन्य महिलाएं उस दिन स्कूल आएँगी. राखियाँ अभी तक बन नहीं पाई हैं, पर तब तक बन जाएँगी, अन्यथा वे बाजार से भी खरीद सकते हैं. आज तैराकी में हाथ चलाना सिखाया, दांया हाथ उठाकर श्वास लेना है. अब लगता है कुछ आगे बढ़ रही है. आजकल योग दर्शन पर नियमित व्याख्यान सुन रही है, काफी कुछ स्पष्ट हो रहा है. आज शाम को योग कक्षा में ‘क्रिया’ के बारे में ठीक से बताना है. सुना कि अन्तरायों का अभाव होने लगता है जब आत्मदर्शन होता है. कोई कहता है अंतराय खत्म होने पर आत्मदर्शन होता है ! ‘व्याधि’ और ‘उपाधि’ आदि अंतराय ही उन्हें समाधि से दूर रखते हैं. योग के प्रभाव से ही वे स्वस्थ रहते हैं, यानि ‘स्व’ में स्थित रहते हैं. ‘स्व’ में प्रतिष्ठित होने पर ही वे जगत में अभय को प्राप्त होते हैं. चित्त की शुद्धि होने पर ही ‘स्व’ का दर्शन होता है. इन्द्रियों पर जय होने पर ही चित्त शुद्ध होता है. एकाग्रता में ही इन्द्रियों पर जय होती है और चित्त में आत्मा की झलक मिलती है.

Sunday, July 16, 2017

फुटबाल का विश्वकप


कल से उसके बाँए कान में सुनाई देना कम हो गया है और एक आवाज भी आती है. शायद इन्फेक्शन है या पानी चला गया है, अथवा तो वैक्स है और या तो ज्यादा सुनने से कान की श्रवण शक्ति कम हो गयी है. उम्र के साथ-साथ भी शरीर में कई परिवर्तन होते हैं. आज इतवार है और जून ने लंच में विशेष पुलाव तो बनाया ही था, शाम को ब्लू बेरी, रोस्टेड आलमंड, डेट्स तथा बगीचे से तोड़ा ताजा भुना हुआ भुट्टा. कल सिनेमा हॉल में HSKD देखी, फिल्म उसे ज्यादा पसंद नहीं आयी. अमेरिकन कॉर्न खाए और चालीस रूपये कप वाली चाय पी, यानि कल दिन भर मस्ती की. शाम को सत्संग में गये. गुरू पूर्णिमा  उत्सव के कारण गुरू पूजा थी. आज ट्विटर पर गुरूजी का संदेश देखा, यू ट्यूब पर उनका कल का संदेश भी कुछ देर के लिए सुना था. अभी वे कुछ देर बैडमिंटन खेलेंगे फिर शेष भाग सुनेंगे. फुटबाल के विश्व कप के खेल समाप्त हो चुके हैं. जर्मनी जीत गया है, ब्राजील चौथे स्थान पर है. जून भी डायरी लिख रहे हैं. लिखने से बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है. जीवन को एक दिशा मिलती है. वे वही हो जाते हैं जैसा सोचते हैं. चेतना जब परम के साथ जुड़ी होती है तब कोई दुःख कोई परेशानी उन्हें छू भी नहीं सकती.

आज भी वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण स्थगित करना पड़ा, शाम को यदि मौसम खुल गया तो जा सकते हैं. उनके बगीचे में अन्नानास लगा है पर जून ने बाजार से लाये अनानास की तस्वीर व्हाट्स ऐप के एक ग्रुप में डाल दी, सब लोग खुश हैं और अगले वर्ष यहाँ आने का प्रोग्राम बना रहे हैं. अभी कुछ देर पहले ही आँख-कान-गला विशेषज्ञ से मिलकर आ रही है. उनके केबिन के बाहर काफी लोग बैठे थे. जून ने फोन कर दिया था सो सबसे पहले उसे ही बुलाया. कान साफ किया और अब खुला-खुला लग रह है, कान में डालने की दवा भी दी है. उसका गला भी थोड़ा सा खराब है पर डाक्टर ने देखकर कुछ कहा नहीं है. दवा के काउंटर पर भी काफी भीड़ थी. जनसंख्या इतनी बढ़ रही है सो हर जगह भीड़ तो बढ़ेगी ही, धैर्य सिखाती है भीड़ भी. वहाँ बातूनी सखी मिली, उसे भी इन्फेक्शन था, एक कोर्स कर चुकी है पर ठीक नहीं हुआ. नैनी ने तुलसी लाकर दी, फिर गर्म पानी भी थर्मस में भर दिया है, वह बहुत ख्याल रखती है हर बात का. सलाद सजाने में उसका जवाब नहीं. आज भी वर्षा हो रही है, जून अभी आने वाले हैं. उन्हें भी उसका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगता होगा जैसे उसे लिखकर लगता है. आज सुबह उन्हें कुछ अच्छी बातें परमात्मा ने कहलवायीं इस मुख से, वे अवश्य ही उन्हें याद रख पाएंगे. उसका जीवन भी सद्मार्ग से विचलित न हो, ऐसी प्रार्थना उसने अपने लिए की.

आज सुबह फिर एक अनोखे स्वप्न ने जगाया. एक नई ब्याहता को उसके पति का नवजात शिशु थमाया जाता है, जिसकी माँ मर चुकी है. वह उसे स्तनपान कराती है और लो..उसके स्तनों में दुग्ध उतर आता है. वात्सल्य की गहरी भावना उसके मन में जगती है और यह चमत्कार घटता है. ऐसे ही परमात्मा की गोद में जब वे अबोध शिशु की तरह वे जाते हैं तो उसका असीम आनंद उन्हें सहज ही मिलने लगता है. वह वहाँ था ही, उसे प्रकट भर होना था. तभी संतजन परमात्मा को माँ के रूप में भजते हैं. माँ कहने का भाव तभी सिद्ध होगा जब वे अबोध शिशु बन जाएँ, जो वास्तविक भी है. क्या जानते हैं वे इस संसार के बारे में, उनकी जानकारी अल्प है और अज्ञान अनंत है. उससे पूर्व भी कुछ स्वप्न देखे. एक में लोभ की प्रवृत्ति स्पष्ट दिख रही थी. स्वप्नों की दुनिया भी कितनी विचित्र है. कल रात बिजली चली गयी थी. वे पहले पूजा रूम में गये, जहाँ पांच खिड़कियाँ हैं, फिर बिजली आने पर अपने कमरे में, पुनः वहाँ जाना पड़ा और फिर लौटे, नींद लेकिन आ ही गयी. परमात्मा की कृपा ही है गहरी निद्रा, लेकिन अभी भी उसे स्वप्न बहुत आते हैं. जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति में भी तूरीया यानि चौथी अवस्था बनी रहे, ऐसी ही कामना साधक की होती है, पर वह अवस्था कामना से नहीं मिलती.

सुबह किस स्वप्न ने जगाया याद नहीं, वर्षा नहीं थी सो टहलने गये, आकाश गुलाबी था और हवा में हल्की सी ठंडक. दोपहर को वह बाजार गयी, राखी बनाने का सामान खरीदा. अगले महीने की दस तारीख को राखी है, उसे बच्चों के लिए ढेर सारी राखियाँ बनानी हैं. उन्हें भेजने की तैयारी भी करनी चाहिए. सुबह कविता लिखी ब्लॉग पर और दोपहर को व्हाट्सएप पर पढ़ी. छोटी बहन ने सुंदर भजन गाया. शाम को पुरानी पड़ोसिन का फोन आया, उसके पुत्र की मंगनी की खबर देने के लिए, दिसम्बर में विवाह है. नन्हे ने बताया अगले तीन महीनों में उसकी कम्पनी में काम करने वालों की संख्या दुगनी हो जाएगी.  



Friday, June 9, 2017

बूँदा-बाँदी


दो दिनों का अन्तराल..परसों राखी थी, वह दो अन्य महिलाओं के साथ  मृणाल ज्योति गयी, सबने बच्चों को राखी बांधी, लड़के-लडकियों दोनों को..ये विशेष बच्चे जो हैं. कल भी वार्षिक सभा में वहाँ जाना है, हर बार की तरह उसने इस अवसर के लिए एक कविता लिखी है. राखी पर मन में कामना उठी थी कि उसने भेजी है तो भाईयों की ओर से भी फोन तो आने चाहिए, पर इस वर्ष भेजते वक्त भी मन में हर वर्ष की तरह उत्साह नहीं था, सो परिणाम भी वही हुआ. किसी ने फोन नहीं किया. अब अंतर के स्नेह के लिए किसी माध्यम की भी क्या आवश्यकता भला..यह तो आसक्ति ही हुई. ईश्वर आसक्तियों के धागे एक-एक करके तुड़वाता जा रहा है. जो हो सो हो, कोई आग्रह नहीं रहा अब भीतर. मन इच्छा का ही दूसरा नाम है, इच्छा न रहे तो मन नहीं रहता और तब अहंकार को टिकने के लिए कोई जगह नहीं रहती. कर्ता भाव भी तो तभी मिटेगा. जब कर्म किया हो तभी उसके प्रतिफल की आशा रहती है, जब वे करने वाले ही नहीं तब परमात्मा ही जाने, और वह कभी कुछ चाहता ही नहीं तभी तो वह परमात्मा है. आत्मा, देह, मन, बुद्धि से पृथक है, उसे अपने आप में सुखी रहना आ जाये तो देह भी स्वस्थ रहेगी और मन भी. 

सुबह हल्की बूँदा-बाँदी में छाता लेकर टहलना अच्छा लग रहा था. मनन-चिन्तन भी चल रहा था. अज्ञान दशा में कोई न कोई अभाव ही उन्ह कृत्य में लगाता आया है, वे कुछ बनकर, कुछ करके दिखाना चाहते हैं ताकि अपने भीतर के अभाव को ढक सकें, वे जो दिखाना चाहते हैं, वास्तव में उससे विपरीत होते हैं. ज्ञान होते ही समीकरण बदल जाते हैं, कृत्य सहज स्फूर्त होते हैं, भीतर जो भी शुभ-अशुभ होता है उससे संबंध मात्र दर्शक का ही रह जाता है. अज्ञानवश उससे स्वयं को चिपका कर वे सुख-दुःख का अनुभव मन द्वारा करते हैं. संवेदनाओं से जो सुख मिलता है वह कितना उथला होता है, इन्द्रधनुष जैसा..ओस की बूंद जैसा..भीतर शाश्वत सुख है, वही वे हैं, वही उन्हें मुक्त करता है !   


अज गर्मी कुछ ज्यादा है. उसने सोचा दोपहर के भोजन में खिचड़ी बनाएगी, तीन दालों वाली खिचड़ी, जून को पसंद आएगी. स्वयं के साथ यदि किसी का संबंध दृढ़ हो जाये तो संसार के साथ अपने आप ही जाता है. स्वयं पर विश्वास हो तो जगत भी विश्वासी नजर आता है. जून और उसका रिश्ता और दृढ हो गया है, बल्कि जगत में किसी से भी जुड़ना अब कितना सहज लगता है जैसे श्वास लेना. एक वक्त था जब परिचय होने पर भी बात करना कठिन लगता था, अब कोई अजनबी लगता ही नहीं. परमात्मा भी तब दूर था, और अब तो वह अपना आप ही है, निकट से भी निकट. उसकी शक्ति अपनी हो गयी है, उसकी प्रीत भी, संसार और परमात्मा दो नहीं हैं. स्वयं से जुड़ने के बाद ही उस शांति का अनुभव कोई कर सकता है जिसका जिक्र धर्म ग्रन्थों में मिलता है. सारी दौड़ समाप्त हो जाती है, कोई हीनता-दीनता भी नहीं रहती. किसी के सम्मुख अब कुछ सिद्ध नहीं करना होता, किसी को कुछ नहीं सिखाना होता उस तरह जैसे पहले सिखाना चाहता है कोई. हर की अपनी यात्रा कर रहा है. हरेक एक पास अपनी पूंजी है. हरेक के पैरों में अपना बल है. हर कोई तो उससे जुड़ा हुआ है पर सबको इसका ज्ञान नहीं है जैसे पहले उसे भी नहीं था, उन्हें भी एक न एक दिन हो ही जायेगा. उनका यह क्षण ठीक रहे बस इतना ही पुरुषार्थ करना है, वे स्वयं से जुड़े रहें, स्वयं से पीठ न फेर लें, बस इतनी सी प्रार्थना है !

Sunday, January 22, 2017

अन्ना हजारे का अनशन


बड़े भैया को राखी मिल गयी है, फुफेरे भाई ने फोन करके यह सूचना दी. बुआजी का नया घर बन गया है व उनकी स्वर्गवासिनी बेटी की बेटी के यहाँ पुत्र हुआ है. ये सारी खबरें देते हुए वे लोग बहुत खुश लग रहे थे. आज सुबह जून ने उठाया, उसने सोचा सचमुच उन्होंने उसके जागरण में बहुत योगदान दिया है. सारा धार्मिक साहित्य जो उसने पढ़ा, सारे उपदेश जो सुने, साधना के लिए प्रेरित करना(अपरोक्ष रूप से) भी उन्हीं का कार्य है. जीवन में कुछ भी अचानक नहीं होता. पुरानी घटनाओं को देखे तो यह बात समझ में आती है. अंत:प्राज्ञ कोर्स के द्वारा ध्यान से परिचय, एओएल के द्वारा सद्गुरू से परिचय, ये भी उन्ही के कारण हुआ. परमात्मा हरेक को विकसित होने के लिए पूरी  व्यवस्था कर देते हैं. स्वयं छिप जाते हैं, लुका-छिपी का खेल ही चलता रहता है जीवन भर जीवात्मा व परमात्मा के मध्य..कल रात स्वप्न में भी जागरण का अनुभव हुआ. यदि स्वप्न में भी होश बना रहे तो वे स्वप्न को अपनी इच्छा से बदल भी सकते हैं. एक बार नींद न आने की शिकायत की तो ऐसा स्वप्न दिखाया कि उठना ही पड़ा..इसी को कृष्ण सुषुप्ति में जाग्रति कहते हैं भगवद गीता में ! योगी जगते हुए सोता है और सोते हुए जगता है ! जून को अब भी कभी-कभी दर्द होता है, अब वह उसे बताते नहीं है. उस दिन उसने कहा यदि कोई प्रकृति से सुख लेगा तो दुःख से उसकी कीमत चुकानी होगी. वह भी तो यदि स्वादिष्ट पदार्थों के द्वारा प्रकृति से सुख चाहती है तो इसकी कीमत कभी न कभी रोग के रूप में चुकानी पड़ेगी. साक्षी भाव में रहकर स्वयं को आत्मा मानकर यदि वे जीते हैं तो सहज स्वाभाविक सुख की स्थिति बनी ही रहती है. उन्हें कुछ पाकर सुखी नहीं होना पड़ता. मन हर क्षण परमात्मा से जुड़ा है..बस उसे महसूस करना है. विचार आते और चले जाते हैं, पीछे चिदाकाश ज्यों का त्यों रहता है. वह सबका भला चाहता है, जो उनके लिए अच्छा है वे नहीं जानते पर परमात्मा जानता है. कल वे मृणाल ज्योति जायेंगे बच्चों को राखी बांधने, साथ में पूरी, सब्जी व मिठाई लेकर. अन्ना हज़ारे का अनशन आरम्भ हो गया है. जनता उनके समर्थन में आगे आयी है, इस बार लगता है सरकार को झुकना पड़ेगा.

आज जन्माष्टमी का अवकाश है. अन्ना हजारे के अनशन का सातवाँ दिन है. सरकार अब बात करना चाहती है. हजारों, लाखों की संख्या में लोग घरों से निकलकर समर्थन के लिए जुलूस, रैलियां निकाल रहे हैं. आज शाम को उनके घर पर सत्संग है. नन्हे के नर्सरी स्कूल की पत्रिका के लिए एक लेख माँगा है वहाँ की प्रिंसिपल ने, उसने उसके बचपन की यादों को ताजा करता हुआ एक लेख लिखा है, नन्हे को भी अच्छा लगेगा. एक कविता भी लिखी क्लब की एक सदस्या के लिए. छोटी बहन से बात हुई, उसने नया जॉब शुरू कर दिया है, दीदी नये रिश्तेदारों से मिल रही हैं. बड़ी ननद का फोन आया, बिटिया की शादी के लिए साड़ियाँ आदि खरीदने व जून के लिए शेरवानी खरीदने की बात कह रही थी. नूना के मायके में सबका पता भी मांग रही थी, उन्हें निमन्त्रण देना चाहती है.

आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ. योग वशिष्ठ में जो पढ़ा है, अष्टावक्र गीता में जो पढ़ा है, भगवद्गीता में जो कृष्ण कहते हैं, वह ज्ञान अनुभव में आया. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं. उसके सिवा कोई कर्ता नहीं है. आत्मा अपने आप में पूर्ण शुद्ध एक अद्वैत सत्ता है. अब उसे लगता है इसी जन्म में आत्म ज्ञान की पूर्णता सिद्ध होगी. भीतर एक अपूर्व शांति का अनुभव हो रहा है, कहीं कोई द्वंद्व नहीं है. अभी जो लोग इस अनुभव को प्राप्त नहीं हुआ हैं, वे करुणा और प्रेम के ही पात्र हो सकते हैं, क्यों कि वे भी कुछ और नहीं उसी एक परमात्मा का चमत्कार ही है. Accept people as they are का यही अर्थ है कि वे भी उनका ही रूप हैं. जैसे वे अपनी किसी भूल को स्वीकार करते हैं वैसे ही उन्हें उनकी भी हर भूल को स्वीकार करना ही होगा. परमात्मा का अनुभव मानव देह में ही किया जा सकता है, परमात्मा को स्वयं भी अपना अनुभव करना हो तो मानव देह का आश्रय  लेना पड़ता है, क्योंकि शुद्ध चैतन्य में कोई दूसरा है ही नहीं, एक ही सत्ता है उसी को बुद्ध ने शून्य कहा है. जो जानता है कि वह है, जो जानता है कि वह आनन्द स्वरूप है, लेकिन व्यक्त नहीं कर सकता, उसके लिए आवश्यकता होगी देह, मन, बुद्धि की..की पता न भी होती हो, उसके बारे में कुछ भी कहे कैसे..जो कहेगा वह उससे कम ही होगा.. नन्हे के लिए लिखे लेख को आज चर्चामंच में शामिल किया गया है. दीदी को भी वह अच्छा लगा.

  



Monday, September 5, 2016

मेलुहा के मृत्युंजय


परसों राखी है, क्यों न राखी पर एक और भी कविता लिखे, छोटी सी पर प्रेम भरी...

रंगबिरंगी
छूती दिल को
जाने कितने भाव समेटे
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

दूर-दूर सफर तय करतीं
मीलों की दूरी को हरतीं
यादों के तारों को बुनतीं
मस्तक पर तिलक लगाए
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

चमचम गोटे तारों वाली
सलमे और सितारों वाली
रेशम के धागों से बनी हैं
चमकीली मोती, माणिक से
सजाती हैं कलाइयाँ
मनमोहक राखियाँ

आज सुबह नींद खुली तो छह बजकर दस मिनट हो गये थे. रात को देर से सोई, सम्भवतः एक बजे..नन्हे ने जो किताब भेजी है The Immortal of Mehula, बहुत रोचक है, देर तक पढ़ती रही. सुबह घर की सफाई का काम पिताजी के साथ मिलकर किया, माँ दर्शक बनकर चुपचाप देखती रहती हैं, किसी काम में हाथ नहीं बंटाती, उनकी चेतना किसी और ही तल पर रहती है. शाम को क्लब जाना है और कल मृणाल ज्योति, वहाँ राखी का उत्सव मनाने. लेडीज क्लब का वार्षिक समारोह आने वाला है, उसके लिए थीम मांगी है. उसे तो एक ही शब्द याद आता है – निर्वाण NIRVANA, N - naturalness, I - intuition, R - rest, V - vitality, A - awareness, N - novelty, A – amazement. ज्ञान, करुना, समन्वय, स्थिरता और आनन्द का प्रदाता, जहाँ न कोई दुःख है न चिंता, केवल आनंद, मुक्ति सुख और शांति ! संतोष और जागरण का कालातीत अनुभव. निर्वाण और संसार दो नहीं हैं, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. संसार समस्या है तो निर्वाण समाधान है, सीमाहीन, अनंत आकाश की तरह मुक्त मन ही निर्वाण है. सतरंगी इन्द्रधनुष की तरह यह प्रेम, आनंद, सुख, पवित्रता, ज्ञान, शांति, ऊर्जा और ज्ञान के सप्तरंगों से बुना है.

 It is alluring! Untouched and virgin, pure state of mind. It is ultimate a human can feel. It is fullness of heart! It is unconditioned love! It is immense gratitude and great fullness! It is rejoicing in self without any conflict! Reposing in oneself without any sorrow! It is stilling, cooling and peace of mind. It is the highest happiness enduring happiness attained through knowledge rather than the happiness derived through impermanent things.


Monday, May 30, 2016

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Wednesday, April 6, 2016

राखी के धागे


आज ‘अंकुर बाल संस्कार केंद्र’ में बच्चों से राखियाँ बनवानी हैं, अगले शनिवार को रक्षाबंधन का त्योहार है. वे सभी मिलकर मनाएंगे. कल शाम मीटिंग में साहित्य सभा ‘जोनाली सारू’ के बारे में पता चला. मंगल को है शाम चार बजे. वह जा सकती है, जून को बताना होगा. धीरे-धीरे उसका कार्य क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. कृष्णाय अर्पणमस्तु सब उसी की लीला है. जो कुछ भी इस सृष्टि में हो रहा है वही करा हो रहा है, मूल तो वही है, जो हो सो हो उसके सारे कर्म उसी को अर्पित हैं, मन द्वारा सोचना भी तो एक कर्म है, वाणी का कर्म तथा स्थूल कर्म, सभी उसी की लिए हों. कल रात सुना अहंकार का भोजन दुःख ही है, दुःख के कीट खाकर ही वह जीवित रहता है और अहंकार किये बिना मानव रह नहीं सकता. कितना सही कहते हैं सद्गुरु, ‘मैं’ को मिटाए बिना उनके दुखों का अंत नहीं हो सकता और ‘मैं’ को दिन-रात पोषने का वे उपाय करते हैं, चाहते हैं शीतलता और मिलती है जलन, क्योंकि बढ़ते हैं आग की तरफ, दुःख को सम्भाल कर रखते हैं, शायद वे दुःख ही चाहते हैं.
परसों उन्हें मृणाल ज्योति जाना है, राखी का त्यौहार मनाने. उसने स्कूल की हेड मिस्ट्रेस से बात की, उन्होंने हिंदी में स्कूल का एक एक छोटा सा परिचय लिखने को भी उसे कहा है. कल पुस्तकालय का कार्यक्रम ठीक हो गया, दुलियाजान कालेज के एक रिटायर्ड अध्यापक से मिलना हुआ. कल कवि गोष्ठी है, उससे कहा गया है कि हिंदी के लिए भी ऐसी ही शुरुआत वह करे ! उनके पास ऊर्जा है, काम करने की इच्छा है तो कोई भी कार्य असम्भव नहीं है. आज दोपहर को वस्त्रों की आलमारी ठीक करनी है, पुराने वस्त्र निकलने हैं नयों को सहेज कर रखना है, ऐसे ही उनका मन है, पुराने सड़े-गले अनुभवों को, विचारों को निकाल कर नये ताजे शुभ विचारों से इसे भरना है ताकि निरंतर आगे बढने की प्रेरणा मिलती रहे ! इसी हफ्ते दोनों कमरों में पेंट भी होना है, दीवाली से पूर्व की सफाई ! आज ध्यान में परमात्मा से एकता का अनुभव कितना स्पष्ट था, उसे आँखें बंद करते ही आत्मा का अनुभव करवाता है वही, उससे परे भी वही है, कितनी गहन शांति का अनुभव मन करता है. वे ध्यान नहीं जानते तो जीवन के एक सुंदर अनुभव से वंचित रह जाते हैं, अपने आपको जाने बिना जीवन कितना सूना होता होगा, लेकिन जब तक इसका अनुभव नहीं होता तब तक यह सूनापन भी कहाँ दिखता है ?  

कल शाम वह साहित्य सभा की मीटिंग में गई, उसे जून को बताना याद ही नहीं रहा, वहीं से फोन करके बताया, वे थोड़ा क्रोधित हुए पर जल्दी ही सामान्य हो गये, जब देखा कि उनके क्रोध का उस पर कोई असर नहीं हो रहा है. पर बाद में उसे अहसास हुआ अपनी ख़ुशी के लिए किसी को परेशान करने का उसे कोई हक नहीं है. उसे उनके लिए एक कविता भी लिखनी है कल उनका जन्मदिन है, दोपहर को उन्होंने पहली बार उसे एक मनोवैज्ञानिक की तरह समझाया, जैसे पहले कई बार वह उन्हें कुछ कहती रही है. ईश्वर कितने-कितने रूपों में उनके सम्मुख आता है. वह परिपक्व हो रहे हैं, जीवन में हर एक को धीरे-धीरे ऊपर आना है, कोई जल्दी कोई देर से, पर कोई-कोई ही आत्मा को लक्ष्य बनाकर चलता है. अहंकार मुक्त होकर ही कोई शुद्ध चेतना के रूप में स्वयं को जानता है. अहंकार का अर्थ ही है वह अन्यों से भिन्न है, श्रेष्ठ है, तथा उसे संसार के सारे सुख-आराम चाहिए, उसे जीना भी है और स्वयं को कुछ मनवाकर जीना है, लोग कहें, देखो, यह फलाना है, अर्थात इस ‘मैं’ का भोजन  है द्वेष, स्पर्धा, भेद और यही सब क्रोध का कारण है, क्रोध दुःख का कारण है अर्थात अहंकार का भोजन दुःख ही हुआ, जैसे ही कोई अपने शुद्ध स्वरूप को जान लेता है, सारा विश्व एक ही सत्ता से बना है, प्रकट हो जाता है, माया का खेल खत्म  हो जाता है, अब न कुछ पाना है न किसी से आगे बढ़ना है, न कुछ करके दिखाना है, अब तो बस खेलना है, लीला मात्र शेष रह जाती है. वह असीम सत्ता जैसे छोटी सी देह में, मन में समा जाती है, अब जो भी होगा वह उसी के द्वारा होगा और वह तो एक ही काम जानता है, खेल उत्सव, मस्ती और उसके लिए सुख-दुःख, मान-अपमान समान है, वह कालातीत है, द्वन्द्वातीत है, गुणातीत है, अपरिमेय है, आनन्द, शांति, प्रेम, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और सुख का भंडार है. उसे कुछ करके कुछ पाना ही नहीं है, तो अब सारी दौड़ समाप्त हो गयी, सारा दुःख समाप्त हो गया, जन्मों-जन्मों की तलाश समाप्त हो गयी, अब तो बस होना मात्र शेष है !  

Wednesday, April 8, 2015

कच्चे धागे पक्के रंग


आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद ध्यान अपने आप लग गया, फिर भ्रामरी करते समय अद्भुत  दृश्य दिखे, कितनी सुन्दरता भीतर छिपी है. ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौन्दर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की उसकी आकांक्षा को इन चिह्नों से बल मिलता है. सुबह सुना था, साधना को कभी त्यागना नहीं है, बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भीतर की यात्रा पर जाने से वे रोके नहीं. एक वर्ष होने को आया है उसे प्रथम अनुभव हुए. अगले वर्ष में और प्रगति होगी और उसे पूर्ण विश्वास है कि इसी जन्म में उसे आत्म साक्षात्कार होगा. उसे संगदोष का विशेष ध्यान रखना होगा, जल में कमल के समान रहने की कला सीखनी होगी ताकि संसार प्रभाव न डाल सके. वाणी का संयम सबसे अधिक आवश्यक है. मन को भीतर की ओर मोड़ना है. मधुमय, रसमय और आनंद मय उस प्रभु को पाना किना सरल है. अंतर्मुख होना है. चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्पष्ट करना है, वह अटल तो शाश्वत है ही.

अभी-अभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि शीघ्रता पूर्वक लिखने से उसका लेख बिगड़ गया है. ईश्वर को चाहने वाले का तो सभी कार्य सुंदर होना चाहिए, क्योंकि वह इतना सुंदर है ! कृष्ण के बारे में कल विवेकानन्द के विचार पढ़े, वह उन्हें महापुरुष मानते थे, बहुत सम्मान करते थे और मन ही मन उन्हें प्यार भी करते रहे होंगे, ईश्वर भी मानते रहे होंगे. कृष्ण ऐसे मनमोहक हैं कि उनके बारे में पढ़कर, जानकर उन्हें कोई भी चाहे बिना नहीं रह सकता है. आज धूप सुबह से ही नजर आ रही है. सुबह वे आधा  घंटा देर से उठे, नन्हे को स्कूल नहीं जाना था, पर साढ़े छह तक सभी कार्य कर योगासन के लिए तैयार थी . सुबह संत मुख से तुकाराम के जीवन पर आधारित घटनाएँ सुनी. सभी संतों ने काफी कष्ट झेले हैं, उसके बाद ही उन्हें मान्यता मिली है. आग में तपकर ही सोना निखरता है. गुरुमाँ ने अंगुलिमाल की कथा सुनाई. अतीत कैसा भी यदि कोई सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भविष्य में ज्ञान का मार्ग पकड़े तो ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि वे इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल उठाने का सामर्थ्य ईश्वर देते हैं फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. उसने अपना मार्ग तय कर लिया है, मन में जो भी थोड़ी बहुत आशंका थी उसे गुरू की कृपा ने मिटा दिया है और अब ईश्वर ही एकमात्र उसके जीवन का केंद्र है, जिसका हाथ पकड़ा है और ईश्वर ने उसका !


आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उससे फोन पर बात की पर बधाई देना भूल गयी, राखी की शुभकामनायें जरुर दे दिन. पिताजी आज घर पर अकेले रहेंगे, उनका समय टीवी, अख़बार, किताबें और संगीत में अच्छा गुजरता है. बड़े भैया-भाभी का फोन भी आया, छोटी बहन को उन्होंने किया. छोटी ननद का आया, बड़ी को उन्होंने किया. अब बाबाजी आ गये हैं, कह रहे हैं, रक्षाबन्धन आवेश और आवेग को नियंत्रित रखने का दिन है. सारे भयों से मुक्त होने का दिन है, ईश्वर के निकट जाने का तथा सभी के लिए मंगल कामनाएं करने का दिन है. कच्चे धागों का लेकिन सच्चे प्रेम का दिन है. अपने चित्त को अवसाद से बचना है, चित्त की सौम्यता की रक्षा हर हाल में करनी है. अभी प्रभात की सुमधुर बेला है, मन स्वतः ही शांत है, दिन भर सप्रयास इसे इसी भाव में रखने का पर्ण है ताकि रात्रि को सोते समय भी ईश का ध्यान शांत भाव में दृढ़ रखे ! अभी पड़ोसिन का फोन आया वह भी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जाएगी. आज पूर्णिमा है, उपवास का दिन, होता अक्सर यह है कि इसी दिन उसे व्यस्तता ज्यादा होती है, उपवास के दिन भर मौन रहने का विचार मन में है एक दिन तो ऐसा होगा ही. 

Friday, August 1, 2014

राखी का उत्सव


कल रात से केबल गायब है, सो टीवी शांत है. कहीं से कोई आवाज नहीं, पंछियों की मद्धिम से आवाजें आ रही हैं या नैनी की डस्टिंग करने की आवाज, आज किचन की मंथली सफाई कर रही है. कल रात भर तेज वर्षा होती रही गर्जन-तर्जन और विद्युत की चौंध के बीच कई बार नींद खुली, स्वप्न भी आते रहे अअजीबोगरीब, नींद में व्यक्ति कितना बेबस हो जाता है, उसका स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रह जाता. किन्तु यह साधारण व्यक्ति की बात है, योगियों की बात और है. आज सुबह ध्यान करने के बाद एक प्रेरणा हुई है. प्रतिदिन एक कविता लिखने की प्रेरणा जैसे उसने कई अन्य कार्य अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिए हैं. आज नन्हे की क्लास में Talk Competition है. कल शाम उसने अपना लिखा subject matter सुनाया, अच्छा लिख लेता है, उसे नन्हे पर गर्व हुआ.

Mother Teresa has said- we are all pencils in the hands of God. And she thinks, she is a pen in the hands of God. It is 10 am now weather is cool and calm like her mind today.  Today she heard one more talk on Vipasna by shri Goyenka ji and tried to experience it through meditation also by trying to keep an eye on her mind. He said, mind is made of four parts. One is the consciousness which knows, second identifies and judges, third inspires the feeling and fourth reacts. A common mind reacts sharply, his first part is week. All one has to do is to make it strong by making fourth part week ie by not reacting. One’s reaction should be as a line on water, temporary.. so every moment of life will be in peace. In meditation one should watch all the thoughts  that come in the mind and should not judge them or react against or in favour of them. They will grow and automatically wither away.

Today she talked to two friends. One is going home on Thursday they will go to meet them tomorrow. Other one wants one  letter from them for father-in-law which she will take with her to introduce herself.  Father-mother and all of them will definitely will be happy to meet her. Today is Tinsukiya district “Band” so Nanha has come back from bus stop after one hour. Dentist has called her for final checkup on Friday.Today weather is not so cool it is stuffy and humid but with her music practice she will get cool and calm, so  let her start.

आज बाबाजी की बातें सुनकर उसके मन में विचारों का प्रवाह चल पड़ा है. जैसे तरंग सागर में है और सागर तरंग में है वैसे ही बुद्धि चैतन्य में है और चैतन्य बुद्धि में है, इसका अनुभव हो जाये तो ही कोई व्यर्थ की चेष्टाओं से मुक्त रहकर अपने सामर्थ्य का पूर्ण उपयोग कर सकता है. अभी तो उनकी चेष्टाएँ ऐसी ही हैं जैसे पानी को कूटना हो या मृत देह को सजाना अथवा क्षुधित के पेट पर अन्न का लेप करना. मन से भी व्यर्थ का चिन्तन चलता रहता है, स्वयं को गुलाम वह स्वयं ही बनाता है, अपनी आदतों, इच्छाओं, लालसाओं का गुलाम, अपनी चाबी दूसरों के हाथों में सौंपकर स्वयं को एक खिलौना बना डाला है. यह जीवन कब अपने अंतिम क्षण को प्राप्त करेगा किसी को ज्ञात नहीं. इस नश्वर देह को लेकर अभिमान में चूर मन परछाइयों के पीछे दौड़ता रहता है. यह जगत एक विशाल भूलभुलैया है, जिसके एक कोने में खड़े वे भटकते रहते हैं. इससे ऊपर उठकर यदि देखें तो रास्ता नजर आयेगा पर वे तो शहद फंसी मक्खी के समान इसमें लिप्त रहते हैं, फिर यदि मन सदा एक उलझन सी रहे तो आश्चर्य कैसा ? ये बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, इन पर अमल भी करते है पर थोड़े ही दिनों में भुला दी जाती हैं और वे अपने मन के अधीन होकर ऐसे कार्य करते रहते हैं जो नहीं करने चाहिए, मन में दृढ़ता की कमी है.

अज मौसम ठंडा है सुबह-सुबह माँ व भाई-भाभी से बात की, अब राखी भेजने का उत्साह बढ़ गया है. मंझले भाई ने कम्प्यूटर लिया है, यह खबर वह स्वयं देता तो ज्यादा ख़ुशी होती, पर अब भी ख़ुशी हुई है., और ख़ुशी तो ख़ुशी है ज्यादा या कम यह उनके मन का भ्रम है. कल एक सखी ने कहा घर जाते समय वे उनके यहाँ होते हुए जायेंगे, अच्छा लगा, मित्रता का तकाजा है कि एक दूसरे के काम आयें और एक दूसरे से मिलते-जुलते रहें, वे लम्बी छुट्टी पर घर जा रहे हैं. प्रतिपल सजग रहने का उसका प्रयास टीवी के कारण (या उसके प्रति आकर्षण के कारण) असफल हो जाता है क्योंकि कुछ देखते समय मन उसी में खो जाता है, उसी का हो जाता है अपने आप को भूल जाता है. ऐसा यदि ध्यान के वक्त हो तो ध्यान सफल हो. जून और नन्हे के अनुसार उसे स्वयं ही कम्प्यूटर ज्ञान बढ़ाना चाहिए.




Sunday, November 11, 2012

चार्ली चैप्लिन की फिल्म



कल सुरभि का पत्र आया, अच्छा लगा बहुत दिनों बाद कालेज की सखी का पत्र पाकर, शनिवार को उनका पत्र लिखने का दिन होता है, उसने सोचा वह उसी दिन इस पत्र का जवाब देगी. दो माह पूर्व जो परिवार सदा के लिए चला गया था कल उनका पत्र भी आया, वे परसों उनकी कोई खबर न मिलने की बात कर ही रहे थे, सही कहा है किसी ने कि हर रात के बाद जैसे सुबह होती है हर उलझाव के बाद सुलझाव हो जाता है, सोचा उसने, उसकी असमिया सखी से भी शायद एक दिन सुलझाव हो जाय, वक्त का इंतजार करते हैं. हर कार्य अपने समय पर ही होता है. कल तिनसुकिया जाने से पूर्व जून ‘दिल’ फिल्म का कैसेट दे गए थे, पर वह देख नहीं पाई. वे कार्टून फिल्म के भी दो कैसेट लाए हैं नन्हे के लिए. शाम को कोई परिचित परिवार मिलने आया, सात बजे वे स्वयं भी आ गए. आज नन्हा खुशी-खुशी स्कूल गया है. उसने बताया कि कोई बच्चा उसका टिफिन खा जाता है, अभी थोड़ा वक्त लगेगा उसे अपने को स्कूल के माहौल में एडजस्ट करने में. आज भी उसका कोई टेस्ट है. शाम को नाश्ते में उसे आज इडली बनानी है, उसने सोचा सामने वाले घर से थोड़ा सा करी पत्ता व मिर्च ले आते हैं. रात को एक परिवार को डिनर पर बुलाया है, उसकी भी तैयारी करनी है.

आज फिर तीन-चार दिनों के बाद डायरी खोली है. कल उनके पड़ोस में आए एक नए परिवार से मिलना हुआ. रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है, उसने जून से राखियां लाने को कहा है, वैसे यहाँ पर यह उत्सव नहीं मनाया जाता, पर कहीं न कहीं राखियां मिल ही जाएँगी. आज पता नहीं किस कारणवश बिजली नहीं है, ऐसा यहाँ बहुत कम होता है, कुछ देर पूर्व ही वह  हेयर कट करवा कर आयी है, इस नए हेयर स्टाइल में तो उसकी शक्ल ही बिलकुल बदल गयी है. लम्बे बालों का शौक तो है पर सम्भालना मुश्किल है.

आज छोटी बहन का जन्मदिन है, उसे पत्र व कार्ड भेजा था, दीदी आज परिवार सहित बाहर जा रही है, भारत से बाहर. कल उसने एक आठवीं के विद्यार्थी को भी पढ़ाया, पर लगता है चल नहीं पायेगा, जून और नन्हा, जब तक वह पढ़ाती है, बाहर घूमते रहते हैं, हाँ सुबह उनके उठने से पहले वह पढ़ा सकती है. उसने उस छात्र को शनिवार को आने को कहा है.

उन्होंने कल ‘पंचवटी’ फिल्म देखी, अच्छी है मगर अधूरी सी लगी, जैसी कि लगभग हर आर्ट फिल्म लगती है. समझने के लिए उसने फिर से देखी...तब लगा हाँ, इसके सिवा अंत हो भी क्या सकता था. कुछ दिन पहले टीवी पर एक टेलीफिल्म भी देखी, “विवेक” एक कटु सत्य पर आधारित..

नन्हा सुबह कुछ भी खाने में बहुत नखरे करता है, उसे छह बजे उठाकर ही सात बजे कुछ खिलाया जा सकता है. आज उसका स्कूल बंद है, यहीं बैठकर होमवर्क कर रहा है, इतनी बातें करता है कि...पता नहीं बच्चों के पास इतनी उर्जा कहाँ से आती है. उसका खुद का वजन है कि बढ़ता ही जा रहा है, व्यायाम बंद है और जून जबरदस्ती दाल में घी दाल देते हैं.

कल का इतवार पलक झपकते बीत गया. परसों रात चार्ली चैप्लिन की फिल्म देख कर सोये, ‘ए वोमन ऑफ पेरिस’, सो कल देर से उठे, दोपहर को तिनसुकिया जाना था, एक गाउन लिया, लाल रंग का जिस पर एक सुंदर तितली बनी है, आज सुबह उसने नन्हे को फुल शर्ट पहना दी, तो कहने लगा..कुछ अच्छा सा नहीं लग रहा है, शायद उसको गर्मी लग रही थी. पिछले दिनों वह हावर्ड पास्ट का एक उपन्यास Lola Greg  पढ़ने में भी व्यस्त रही, बहुत रोचक है.






Friday, October 12, 2012

रेल रोको आन्दोलन



कल उसने सभी भाइयों को राखियां भेज दीं, उनके पत्र भी आए हुए थे, जवाब में पत्र भी लिखे. उसके बाद एक किताब पढ़ती रही, पर इस वक्त मन जाने कैसा उखड़ा सा है, अँधेरे घर में सिर्फ टेबल लैम्प जला कर बैठना तो अच्छा लग रहा है पर विचारों को केंद्रित नहीं कर पा रही है. जिस दिन वह योगासन नहीं कर पाती, तभी ऐसा होता है, आज सुबह नींद देर से खुली फिर समय नहीं मिला, कुछ खा लेने के बाद तो आसन किये नहीं जा सकते. पहला कीट आया है रोशनी से आकर्षित होकर, अभी धीरे धीरे पंक्ति लगेगी, उसने सोचा रात्रि भोजन बना लेना चाहिए जब तक नन्हा और जून लौट कर आयें.

नन्हा स्कूल गया है, कल स्कूल से लौटा तो भोजन के बाद बजाय सोने के खेलने जाना चाहता था, उसने समझाया, नहीं माना फिर, डांटा और एक चपत भी लगायी, पर बाद में पश्चाताप हुआ. खुद से वादा किया कि डांटने से वह उसकी बात भले मान ले पर उसके लिए ठीक नहीं है, आज से ध्यान रखेगी. उसे अब गृहकार्य करने में उतना आनंद नहीं आता जितना पहले आता था, पर स्कूल जाना अब भी उसे अच्छा लगता है पर टिफिन खाना नहीं, सब कुछ वैसे ही वापस ले आता है.
उसने कैलेंडर पर नजर डाली, नौ अगस्त, ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का दिन. आखिर आज बनारस से चिर-प्रतीक्षित खत आया है, लेकिन पूरी तरह स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी. उसने सोचा अब उन्हें स्वयं वहाँ जाकर ही स्थिति का आकलन करना होगा. कल जून टिकट लेने तिनसुकिया गए पर लौट आए, आज फिर जायेंगे. कभी-कभी उनका व्यवहार उसे समझ नहीं आता शायद वह स्वयं भी कन्फ्यूज्ड हो गए हैं. अपने भीतर झांकती है तो अब उसे वहाँ जाकर पढ़ाई करने का पहले का सा जोश नहीं है, जून चाहते हैं कि उसे जाना चाहिए और सभी परिचित भी जानते हैं कि वह जा रही है. पर अपने इस शांत जीवन को छोडकर..खैर देखा जायेगा.

कल शाम वे क्लब गए, उसने लाइब्रेरी में पहले की एक अधूरी कहानी पढ़ी. नन्हा भी दस-पन्द्रह मिनट तक किताब पलटता बैठा रहा. अपनी एक मित्र के यहाँ से भी पांच-छह धर्मयुग लायी है, कितने महीने हो गए हैं, धर्मयुग पढ़े, पहले वह नियमित पढ़ती थी. उन्होंने क्लब में ही दोसा भी खाया. 

टिकट मिल गए हैं, वे सभी जा रहे हैं, एक हफ्ता रहकर जून वापस आ जायेंगे. आठ बजे हैं आज नन्हे का स्कूल बंद है, वह सो रहा है, पूरे हफ्ते की नींद जैसे आज ही पूरी करना चाहता है. दाखिला नहीं हुआ तो अक्तूबर में वह वापस आ जायेगी अन्यथा वह अब जून में वापस आयेगी यानि दस महीनों के बाद. उसे ख्याल आया कि कामवाली अभी तक नहीं आई है, पता नहीं अब तक वहाँ भी होगी या नहीं, हर हाल में वहाँ उसे कपड़े तो खुद ही धोने होंगे.

कल वे मन में कितने बातें लेकर उम्मीदें और सपने लेकर ट्रेन में बनारस जाने के लिए रवाना हुए मगर मरियानी से ही उलटे मुँह वापस आए. बंद के कारण रेलें नहीं जा रही थीं, फिर से सब सामान खोला. आज दिन भर यही तो किया. कल रात बारह बजे वे वापस पहुंचे. अब तो निश्चित हो गया कि उसकी पढ़ाई एक स्वप्न ही रह जायेगी. जून और सोनू गेस्ट रूम में हैं पढ़ाई कर रहे हैं. उसने सोचा है कि वह घर पर ही बच्चों को गणित पढ़ाएगी. कल से नन्हे को भी स्कूल भेजना है.




Wednesday, October 10, 2012

पड़ोस का सैलून



अगस्त का पहला दिन..मन अजीब दुविधा में पड़ा है, बनारस से उस फोन के अलावा और कोई सूचना भी तो नहीं मिली है. उसका एडमिशन यदि नहीं हो पाया तो..बनारस जाना तो था पर इतनी जल्दी जाना पडेगा यह नहीं सोचा था. गर्म पानी के सिस्टम की पाइप की वेल्डिंग करने के लिए कर्मचारी आए हैं, कितना शोर करती है वेल्डिंग मशीन. नन्हा होता तो शौक से देखता, स्कूल गया है उसे लेने भी जाना होगा स्कूल से, जून को फील्ड से आने में देर हो जायेगी. मौसम आज स्वच्छ है यानि खूब गर्मी पड़ेगी. लगातार वर्षा से रेलें भी तो नहीं चल रही हैं. कल बहुत दिनों बाद मंझले भाई का पत्र आया है. इसी महीने रक्षा बंधन भी है. जून को समय मिले तो बाजार जाकर राखी लायें. उसे दो रेसिपीज और मिली हैं, वह अच्छा खेल था, जब कुछ महिलाओं ने मिलकर आपस में रेसिपीज साझा करने का तरीका निकाला था.

कल बेहद गर्मी थी, दोपहर भर बेचैनी थी. आज सुबह के सवा नौ बजे धूप थोड़ी कम है बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है मगर कब तक ? नन्हे को कल सुबह ठंडे पानी से नहला दिया, उसे हल्का सी ठंड लग गयी है, जानबूझ कर हम मुसीबतों को निमंत्रण देते हैं नब्बे प्रतिशत मामलों में. उसे स्कूल लेने आज भी जाना है. जून व्यस्त हैं, कल रात आठ बजे आये. आज उन्होंने किन्हीं परिचित को चाय पर बुलाया है, दोपहर को ही नाश्ता बनाना है और बैठक ठीक-ठाक करनी है.

अभी-अभी जून डिब्रूगढ़ गए हैं अपने एक सहकर्मी के साथ. उनके कान का संक्रमण जो ठीक हो गया सा लगता था अब फिर से हो गया है. बांया कान कभी बंद हो जाता है कभी खुल जाता है. सभी रिपोर्ट लेकर गए हैं. दोपहर बाद तीन-चार बजे तक आयंगे. नन्हे की तबियत आज सुबह भी पूरी तरह ठीक नहीं थी, पता नहीं कैसा होगा, हिम्मती लड़का है मैनेज कर  ही लेगा. आज ट्रांजिस्टर पर कितने मधुर-मधुर गीत आ रहे हैं, प्रेम की चाशनी में पगे हुए, कल रात वे भी ऐसे ही भावों में भर रहे थे. शाम को नाश्ते का आयोजन ठीक रहा, हमारा रात्रि भोजन भी वही नाश्ता ही हो गया. नन्हे को लेने आज भी उसे ही जाना होगा, किसी से लिफ्ट मिल गयी तो ठीक नहीं तो रिक्शा ले लेंगे. बनारस से खत की प्रतीक्षा है पर ट्रेन न चलने की वजह से डाक भी तो समय पर नहीं आ रही है. पूरे देश में बाढ़ ने तबाही मचाई है. हर वर्ष यही होता है, करोड़ों रुपयों का नुकसान, कब हमारा देश सक्षम होगा, इन आपदाओं से निपटने में.

सोनू की खांसी बढ़ गयी है और हल्का बुखार भी है. कल शाम को वह बहुत खुश था, खूब बातें कर रहा था. पर रात वह बेचैन था, साँस तेज चल रही थी. वह उसे गुमसुम देखकर व्यग्र हो गयी, उसका उदास चेहरा देखकर वह भी उदास हो गयी, सुबह वे उसे अस्पताल ले गए थे. छह-सात बोतलें दी हैं डा. ने. बेनाड्रिल दी उसने, पीते ही सो गया, अभी तक उठा नहीं है कि कुछ खाने को दे. उन्हीं की लापरवाही का नतीजा भुगत रहा है यह नन्हा बच्चा. जून कल पांच बजे लौटे, उनका कान ठीक हो गया है, वैक्स जम गया था और कुछ नहीं.

नन्हा आज ठीक है, सुबह स्कूल नहीं गया. कल से भेजेगी. तीन दिन पढ़ाई-लिखाई बंद रही अब उसका गृहकार्य करने में मन ही नहीं लग रहा था. इस समय पापा के साथ अपने मित्र के यहाँ गया है, वही उनके घर के पीछे रहने वाले पड़ोसी. उसे यहाँ आये एक महीना होने को है वे लोग उनके यहाँ नहीं आये, न ही वह गयी. सुबह वह सोनू को यहीं पास में एक पार्लर में ले गयी थी बाल कटवाने के लिए, एक सरदारनी ने खोला है, जो बाल तो अच्छे काटती हैं पर समय बहुत लगाती हैं.

Friday, February 17, 2012

काश्मीर समस्या


राखी का त्यौहार आने वाला है. भैया का पत्र आया है आज उन्होंने अपना पता भी लिखा है, उनके मन में भी रक्षाबन्धन की बात रही होगी. धर्मयुग में काश्मीर पर एक लेख पढ़ा, मन क्षोभ से भर गया, हमारे देश का एक सुंदर प्रदेश आतंक का शिकार हो गया है. मानवता के हजार दुश्मन आज के  युग में पनप रहे हैं, हर जगह उन्हीं का तो राज है. भारत सरकार को शीघ्र ही कड़ा कदम उठाना होगा.
कल सुबह वे साढ़े पांच बजे ही उठ गए. उन्हें मोरान जाना था, कार में आगे वे बैठे थे पीछे और लोग भी थे, एक सीनियर भी, सो वे रास्ते भर ज्यादा बात नहीं कर सके. एक परिचित के यहाँ रुके. गृहणी के साथ उसकी गाँव में रहने वाली नन्द भी थी. अच्छे खुशमिजाज, मिलनसार लोग थे. दोपहर को नूना सो गयी और जून फील्ड चला गया. शाम को गर्मी बहुत थी सो पुनः स्नान किया. बाजार गए. बिजली नहीं थी पर कुछ देर में आ गयी. एक और दम्पति से मुलाकात हुई, श्रीमती को देखकर नूना को कक्षा ३ में पढ़ने वाली उसकी ट्यूशन की छात्रा की याद हो आयी वही लहजा है बोलने का आठ साल की बच्ची का और वही आवाज भी. नूना कुछ थक गयी थी पर जून के साथ ने उसे विश्वास दिला दिया कि अच्छा किया जो वह अकेले पीछे घर में नहीं रुक गयी.