नवरात्रि उत्सव आरम्भ हो गया है. देवी की आराधना का उत्सव अर्थात चेतना की शक्ति की
आराधना. सद्गुरु ने कितनी सहजता से इसका अर्थ बताया. विष्णु के कान के मैल से
उत्पन्न मधु-कैटभ को मारने में जब विष्णु असमर्थ हुए तो देवी को आना पड़ा. चंड-मुंड
का नाश भी देवी करती है. चंड अर्थात ऐसी चेतना जो केवल शरीर के निचले हिस्से में
स्थित है, हृदय को प्रमुखता देती है, भावुक है तथा मुंड जो दिमाग को प्रमुखता देती
है. दोनों ही अकेले-अकेले खतरनाक हैं, दिल व दिमाग का सामंजस्य ही व्यक्ति को
पूर्ण बनाता है. जब आत्मा की शक्ति जगती है तो दोनों में संतुलन होता है. रक्तबीज
का नाश भी देवी ने किया, अर्थात रक्त में घुले विकार चाहे वे शारीरिक रोग हों या
मानसिक रोग, उनका नाश भी आत्मा की शक्ति से सम्भव है. नवरात्रि के नौ दिन गर्भ में
नौ महीनों के वास के समान है, जिसके बाद नई सृष्टि देखने को मिलती है.
बचपन से अभी तक
उससे कितनी ही भूलें हुई हैं, असत्य बोलना, चोरी और वाणी के अनगिनत अपराध, बुरे संकल्पों
के, ईर्ष्या, द्वेष, परनिन्दा व और भी कितने-कितने अपराध होते ही रहे हैं, जो
अनजाने में हुए उन्हें तो परमात्मा भी सम्भवतः क्षमा कर देता हो, लेकिन जो लोभ वश,
स्वार्थ वश, अज्ञान वश, मोह वश हुए या किये उनसे छुटकारा तो वक्त ही देगा, कभी
दुःख के रूप में, कभी ग्लानि के रूप में. लेकिन कल दोपहर मन को एक ग्रन्थि से
छुटकारा मिल गया, भीतर जैसे कोई घड़ों जल डालकर धो गया हो ऐसी स्वच्छता का अनुभव
हुआ ! गुरूजी भी कहते हैं सभी विकार प्रेम का ही विकृत रूप हैं, तो वह प्रेम ही था
जो अभी अपने शुद्ध स्वरूप में नहीं आया था, जो उन दिनों उसे भरमा रहा था. विकृत
प्रेम ही ईर्ष्या है, अब जब स्वयं को आत्मा जान लिया है, भीतर सन्नाटा है. शास्त्र
कहते हैं ज्ञान की अग्नि में सारे संचित कर्म जल जाते हैं, अब केवल प्रारब्ध कर्म
ही शेष हैं. जिनका भुगतान समता से करना है. ससुरल से माँ-पिताजी आये हैं, उन्हें
कोई बात दुःख देने वाली न लगे, वाणी पर नियन्त्रण रहे, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है.
जून अपने दफ्तर में व्यस्त हैं, आईएसओ सर्टिफिकेट लेने के लिए उन्हें काफी काम
करना पड़ रहा है.
आज सुना, उन्हें
स्मृति के साथ-साथ धृति का विकास करना है. धृति का अर्थ है धारणा, धैर्य ! धारणा
यदि दृढ हो, मन यदि एक वस्तु पर टिककर उसी का चिन्तन करे तो समाधान हो जाता है.
धैर्य की कमी से ही आज संबंध बिगड़ रहे हैं. सहन शक्ति की कमी से ही दूसरों के दोष
दिखाई देते हैं, वाणी का अपराध होता है. इस जीवन में सभी को अपनी यात्रा अपने ढंग
से करनी है. साधक को आग्रह त्यागकर प्रेम से मध्य मार्ग निकलना है. जीवन की
परिस्थितियाँ तो बदल रही हैं, उनके हाथ में समता में रहना है, नहीं तो प्रवाह
उन्हें बहा ले जा सकता है. समता से ही आंतरिक प्रसन्नता बनी रह सकती है. परमात्मा
सभी के भीतर है, सभी उसके भीतर हैं और फिर भी वह अप्रकट है, छिपा है, सभी को
उसकी माया ने ढका हुआ है. वेद का ऋषि कहता है उसके भीतर जो परमात्मा रूपी प्रकाश
है उसका आवरण हटा दो, वह उस प्रकाश से ही प्रार्थना करता है. वे इस जगत में प्रेम
अनुभव करने व बांटने ही तो आये हैं, अथवा तो सहयोग करने, शरीर द्वारा सहयोग करना
तथा मन द्वारा प्रेम देना ही तो साधक का लक्ष्य है !
