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Thursday, October 17, 2024

भोर का तारा

भोर का तारा


आज इतवार है, सुबह साढ़े नौ बजे बच्चे आ गये थे। दोपहर को नन्हे ने यू ट्यूब से देखकर काले चने की स्वादिष्ट सब्ज़ी बनायी। उन्होंने बच्चों को “साइकिल” फ़िल्म के बारे में बताया, पिछले हफ़्ते देखी बहुत अच्छी मलयालम फ़िल्म है। शाम को अचानक तेज हवा चलने लगी, छोटी-मोटी आँधी ही थी। वे छत पर टहल रहे थे, पड़ोसी परिवार भी अपनी छत पर था।पापाजी से बात हुई, उन्हें कोरोना का पता चले एक हफ़्ता हो गया है। उन्होंने कहा, भाई ज़्यादा बात नहीं करता, चुपचुप रहता है। उसे अस्वस्थ हुए ग्यारह दिन हो गये हैं, ऐसे में कोई भी इंसान परेशान हो जाएगा। उसने ईश्वर से प्रार्थना की, विश्व में सभी लोग कोरोना से मुक्त हो जायें। कल 'विश्व स्वास्थ्य दिवस' पर वेबिनार होने जा रहा है, उसे गुरुजी के प्रारंभिक उद्बोधन को ट्रांस्क्राइब करना है। प्रधानमंत्री की ‘परीक्षा पर चर्चा’ सुनी। उन्होंने छात्रों के प्रश्नों के उत्तर बहुत समझदारी और स्पष्टता के साथ दिये। प्रधानमंत्री होते हुए युवाओं व बच्चों से उनका संबंध बहुत अनूठा है। 


आश्रम के एक स्वयंसेवक से ज्ञात हुआ, गुरुजी का गला भी ख़राब है, वह एकांतवास में हैं, वेबिनार में उनका संदेश पढ़कर सुनाया गया। पापाजी को उनके भेजे बिस्किट आज मिल गये, उन्हें अच्छा लगा। अभी भी पूर्ण स्वास्थ्य नहीं मिला है। भाई को भी ठंड लग रही थी।परिवार के तीनों डाक्टर्स के संपर्क में है वह। तीनों से उसे कुछ न कछ सहायता मिल रही है। हेल्थ ऐप तो है ही सहयोग देने के लिए।सुबह अस्तित्त्व ने एक कविता लिखवायी। मौसम अपेक्षाकृत गर्म था। द्वादशी का चंद्रमा बेहद मोहक लग रहा था और  कुछ दूरी पर भोर का तारा भी चमचमा रहा था। लौटकर सूर्योदय को कैमरे में उतारा। पाचन तंत्र कुछ शिकायत कर रहा था, सो आज आयुर्वेद का एक नुस्ख़ा लिया है, रात्रि को दूध के साथ। घर पर बात हुई, दोनों मरीज़ अब बेहतर हैं। सुबह उनके लिए शुभकामनाएँ भेजी थीं और मानसिक उपचार का भाव भी किया था।दुआओं में बहुत असर होता है यदि वे दिल से निकली हों।पापाजी से की बातचीत उन्होंने रिकॉर्ड कर ली है। उन्हें फ़ोन पर बात करना अच्छा लगता है। कल रात देखे अपने दो स्वप्न उन्होंने बताये, एक में एक व्यक्ति उनसे पूछता है, कितने साल से पेंशन  ले रहे हो, और कब तक लेने का इरादा है। दूसरे स्वप्न में वे भाई के साथ पेंशन लेने जाते हैं, पर वहाँ बहुत देर हो जाती है। फिर वे निकाले हुए पैसे भाई को दे देते हैं, और वह उन्हें छोड़कर बस में बैठकर चला जाता है ।मन में छिपे हुए भय ही स्वप्नों में प्रकट हो जाते हैं।


आज वे रात्रि भ्रमण  के लिए निकले तो सड़क बिल्कुल सुनसान थी। पार्क नंबर नौ यानी फ़ौवरे वाले पार्क से होते हुए आम के बगीचे की बायीं ओर ढलान वाली सड़क से होते हुए लौटे। पार्क छह के बाहर एक माँ दो बच्चों को अपने दोनों ओर बिठाए एक किताब पढ़कर सुना रही थी। एक बच्चा बहुत खुश लग रहा था। थोड़ा आगे एक चौकीदार मिला जो सदा ही सलाम करता है। सभी ने मास्क पहने हुए थे। एक वर्ष पूर्व जैसा भय का माहौल था, कुछ वैसा ही फिर से बन रहा है। उन्होंने शाम को बाहर निकलना ही छोड़ दिया है। ‘देवों के देव’ में रामायण की कहानी चल रही है, महादेव की बहुत बड़ी भूमिका है रामायण में, उनके एक अंश का ही अवतार हैं हनुमान! पापा जी का स्वास्थ्य सुधर रहा है, उन्होंने फ़ेसबुक देखना आरंभ कर दिया है। सुबह क्रिया के बाद बहुत सुंदर अनुभव हुआ, आज्ञा चक्र पर सफ़ेद मोती दिखे ढेर सारे ! परमात्मा को महसूस करना हो तो वर्तमान के क्षण में ही किया जा सकता है, अभी और यहीं। वह इस वक्त है यहीं, उनके पास, उनसे स्वयं को पहचनवाता हुआ, वे उसे जान सकें यह वह चाहता है। वह उनके माध्यम से व्यक्त होना चाहता है, एक तरह से हो ही रहा है, पर अनजाने ही, उनके जाने बिना ही, जब वे जान लेते हैं तो उसके आनंद में भागीदार बन जाते हैं ! 



   


Sunday, May 3, 2020

ओस की बूँदें



आज दिन भर व्यस्तता बनी रही, इस समय टीवी पर कोई हास्य धारावाहिक चल रहा है पर आवाज बन्द है, जून की फोन पर बात चलती रहती है. कल उन्हें एक हफ्ते के लिए अहमदाबाद व जयपुर जाना है. पैकिंग कल शाम को ही कर ली थी. आज शाम हेयर कट के लिये रखी थी, उनके छोटे या बड़े सभी काम योजना बद्ध होते हैं. उसके भी जाने की बात थी पहले पर इन दिनों उसके पास भी कई काम हैं. शाम को स्कूल में मीटिंग थी. उससे पूर्व क्लब की सेक्रेटरी के साथ गिफ्ट बांटने के लिए सूची बनाने का काम था. दोपहर को मृणाल ज्योति में हिंदी कक्षा लेने गयी.  पांच विद्यार्थी हैं दो छात्रायें और तीन छात्र, वे बोल नहीं सकते पर आपस में सब कुछ कह-सुन लेते हैं. उनके चेहरों की मुस्कान कुछ अलग ही होती है, वह जितना हो सके इशारों व चित्रों के माध्यम से से उन्हें हिंदी लिखना-पढ़ना सिखा रही है. सुबह ड्राइविंग का अभ्यास किया एक योग साधिका को देखने गयी जो कुछ दिन से अस्वस्थ है, वह बहुत कमजोर लग रही थी. इसी तरह दिन कुछ न कुछ करते बीत गया. जून लन्च पर नहीं आये, उनके दफ्तर में एक लैब अटेंडेंट का विदाई समारोह था. बड़े भाई का बुखार आखिर उतर गया, मंझले भाई का फोन आया, वह बहुत खुश था, भाभी ने बहुत सहायता की. छोटी बहन ने कहा वह डेंगू पर एक कविता लिखे. दोपहर को पुराना माली आया. कहने लगा, उसके पास फोन आया, आपका इनाम निकला है, अपना अकॉउंट नम्बर भेज दीजिये. वह पूछ रहा था, भेजे कि नहीं. वे लोग आधार नम्बर भी मांग रहे थे, उसे मना किया. कल ही उसके पास केबीसी की तरफ से एक फोन आया, कि उसका चुनाव हुआ है, यकीन नहीं हुआ उसे, क्योंकि कभी कोशिश ही नहीं की थी. सोनू ने बताया, वह फोन असली नहीं था. 

आज सुबह बेहद सुहानी थी, सितम्बर समाप्त होने को है, मौसम में हल्की ठंडक बढ़ गयी है. उसे पंछियों की आवाजों ने जगाया, लगा जैसे वे भोर होने का एलान कर रहे थे और कह रहे थे, मानव कुदरत की इस नेमत से खुद को वंचित क्यों रखता है, जब पेड़, पंछी, हवाएं और आसमान सभी सूरज का स्वागत कर रहे हैं तब वह घर में मुंह ढक के सोया रहता है. वह झट बगीचे में गयी, लॉन की ह्री शीतल घास का स्पर्श अनोखा था और हल्की धुंध ने जैसे वातावरण को तिलस्मी बना दिया था. देखते-ही देखते सूरज ऊपर आ गया और ओस की बूंदें विलीन होने लगीं. दोपहर पूर्व  लेखन कार्य को आगे बढ़ाया, फिर योग कक्षा में पेट की चर्बी कम करने के व्यायाम कराए, आजकल कमर जैसे कमरा होती जा रही है. शाम को भजन संध्या थी. आज उसे मिलाकर पूरी एक दर्जन साधिकाएं थीं. उसने खजूर का प्रसाद दिया, एक महिला मीठी इडली बनाकर लायी थी, चावल, दूध, नारियल, चीनी व इलाइची पाउडर से बनी, बहुत स्वादिष्ट थी. जून अहमदाबाद पहुँच गए हैं. 

आज का दिन भी व्यस्तता से भरा था. सुबह के सारे कार्य, भृमण, साधना, नाश्ता आदि करते करते नौ बज गए. उसके बाद कार का अभ्यास. दोपहर को स्कूल व लेखन कार्य कर ही रही थी कि एक सखी का फोन आया, बंगाली सखी की माँ का देहांत हो गया, कई दिनों से बीमार थीं, अस्पताल में थीं. उससे मिलने गयी, कई लोग थे वहाँ, सखी बहुत उदास थी, जो स्वाभाविक ही था. कहने लगी, भाई ने अभी फौरन आने को मना किया है वह चौथ तक घर पहुँच जाएगी.  कुछ देर बैठकर वह वापस आ गयी. शाम को क्लब में मासिक कार्यक्रम था, पूजा का माहौल बन गया था. नृत्य, भजन, गीत सभी कुछ देवी को समर्पित थे फिर स्किट भी हुआ. पड़ोसिन के साथ पैदल चलकर घर आ गयी. हील की चप्पल  और साड़ी पहनकर आना थोड़ा कठिन तो है पर दूरी ज्यादा नहीं है, दस-बारह मिनट ही लगते हैं. वापस आकर पड़ोसिन ने अपने मन की बात कही, उन्हें दुःख था कि पिछले महीने क्लब का एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रेसीडेंट ने उन्हें धन्यवाद नहीं दिया, वह बहुत उदास थीं. उसने कहा, सम्भवतः ज्यादा व्यस्त रहने के कारण वह भूल गयी हों, जानबूझ कर वह कभी ऐसा नहीं करेंगी . ‘सम्मान पाने की आशा ही दुःख का कारण है’, उसने यह सूक्ति लिखी व्हाट्सएप सन्देश में. शायद वह समझ जाएँगी, उन्हें ज्यादा दुःख भी हो सकता है, पर यदि वह इस पर विचार करेंगी तो इस बात का सत्य समझ में आएगा. 

Wednesday, April 25, 2018

हरी मटर की पौध



रविवार होने के बावजूद आज सुबह भी वे भोर होने से पहले ही उठ गये, अँधेरे में ही टहलने गये, पूरे रास्ते में इक्का-दुक्का लोग नजर आए. सुबह की योग कक्षा में सूर्य नमस्कार और सूर्य ध्यान करने व कराने के बाद मन कितना प्रफ्फुलित हो गया था. नाश्ते की तैयारी उसने पहले से कर दी थी. जून ने तंदूर लगा दिया, गर्मागर्म आलू का परांठा और दही का नाश्ता किया. उसके बाद आरम्भ हुआ सभी से फोन पर बातचीत का सिलसिला. हर इतवार को वे सबसे पहले पिताजी से बात करते हैं, उनसे बात करना सदा ही अच्छा लगता है. फिर बहनों से और उसके बाद किसी और से. बड़ी भांजी डाईटीशियन का कोर्स करना चाहती है, उसके पति उसे सहयोग कर रहे हैं, जानकर अच्छा लगा. आज क्लब का वार्षिक उत्सव है, दोनों ने बालों में रंग लगाया. लंच के दौरान पिछले कई वर्षों की तरह एक स्टाल पर उसको भी खड़ा होना था. वे दो बजे क्लब गये, सजी-धजी महिलाएं समूहों में बैठी थीं, अभी भोजन में एक घंटे की देरी थी. लोग मस्त थे, सलाद, फ्राई, स्वादिष्ट भोजन, आइसक्रीम सभी कुछ लाजवाब था, पर पीने का चलन इस दिन कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है. शाम को ‘महाभारत’ का अगला एपिसोड देखा. रात को मकई की रोटी बनाई बगीचे से तोड़े हरे प्याज और मेथी मिलाकर. इस वर्ष मटर को छोड़कर सभी सब्जियों की काफी अच्छी फसल हुई है. मटर की फलियों को पंछी खा जाते हैं.

नये वर्ष के दस दिन गुजर गये, समय कितनी तेजी से गुजरता है, उनके लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते. जीवन कितना कुछ छिपाए है, जो अपरिचित ही रहे जाता है. मौसम आज भी काफी ठंडा है, शाम को जून के एक सहकर्मी भोजन  के लिए आ रहे हैं. ‘सिया के राम’ में आज राम मिथिला की तरफ प्रस्थान करेंगे. हजार बार सुनी यह कथा हर बार नई लगती है. आज दुर्योधन का भी अंत होने वाला है ‘महाभारत’ में, मोह का प्रतीक है यह पात्र, इसका नाश होना ही चाहिए. व्हाट्सएप पर एक छोटी सी लडकी को हनुमान चालीसा गाते हुए सुना आज, तकनीक ने कला को कितना बड़ा फलक दे दिया है, देखते-ही देखते यह वीडियो पूरे भारत में प्रसारित हो जाने वाला है. जून आज देहली गये हैं. कल रात सूक्ष्म देह का अनुभव कितना स्पष्ट हो रहा था. वे सूक्ष्म देह के द्वारा भी स्पर्श का अनुभव करते हैं और देखते हैं, अनोखी है भीतर की दुनिया !

आज लोहरी है, सुबह देर से उठी, गले में हल्की खराश थी. नेति आदि करके स्नान किया तो सोचा, प्रातःभ्रमण तो छूट गया, प्राणायाम ही कर ले, पर सुबह-सुबह ही क्लब की सेक्रेटरी का फोन आ गया, कार्यों की एक लम्बी सूची थी सो नाश्ता करके कम्प्यूटर पर काम करने आ गयी, पर स्क्रीन थी कि खुलने को राजी नहीं थी. कल ही जून के जाने से पहले ही लैन से कनेक्ट करके गये थे आईटी विभाग के कर्मचारी. जून को शायद पासवर्ड का ज्ञान हो, पर वह फ्लाईट में थे. कुछ देर की प्रतीक्षा भी सही नहीं गयी. अधीर मन ने कहा, नन्हे को फोन करो, वह क्या करता, इसी बहाने उससे बात हो गयी. तब तक जून का संदेश देखा फोन पर, समस्या पल में हल हो गयी, पर इतनी देर में जो भीतर उत्तेजना को जन्म दिया उसका असर तो होना ही था. सदा शांत रहने वाला मन यदि थोड़ा सा भी ऊपर-नीचे हो तो असर होता ही है. साधक को तो अति सजग रहने की जरूरत है. सवा ग्यारह कब बज गये पता ही नहीं चला. सेक्रेटरी के साथ कार्ड्स बांटने गयी, सवाा एक बजे लौटी, भोजन करके पुनः तीन बजे गयी. उपहार गिनने का कार्य किया, बाजार गये और लौटे तो साढ़े पांच हो चुके थे. उसके बाद योग कक्षा, संध्या भ्रमण, ‘सिया के राम’, रात्रि भोजन और फिर नींद से पूर्व ध्यान. कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं.   

Sunday, September 11, 2016

भोर के तारे


आज पुनः आल्मारी में वस्त्रों के नीचे छिपाई हुईं टेबलेट्स व अन्य दवाइयाँ मिलीं. पहले भी कई बार बेड के नीचे, गद्दे के नीचे चार-पांच गोलियां मिलती रही हैं. कई दिनों से नहीं मिलीं तो सबने सोचा अब माँ ने मुंह से निकाल कर दवा छिपाना/ फेंकना बंद कर दिया है, पार आज तो पूरी बारह गोलियां थीं. पूछा तो बच्चे की तरह कहने लगीं, हमने ही रखी होंगी. पता नहीं कब रखीं, जबकि पिताजी दवा देकर सामने ही खड़े रहते हैं. कई बार तो दवा खाने की मेज पर ही दी जाती है, पर किसी न किसी तरह वह छिपा लेती होंगी. पिछले सवा साल से दिन भर में दसियों गोलियां खाने पर तो कोई भी ऊब जायेगा और छोड़ देना चाहेगा. इस समय वह अपने कमरे में कुर्सी पर बैठी कुछ धीरे-धीरे बोल रही हैं, शायद जाप कर रही हों. जून पिताजी को दांत के डाक्टर के पास ले गये हैं, उनका डेंचर फिट नहीं हो रहा है. आज शनिवार है, शाम को वे एक मित्र परिवार से मिलने जायेंगे, हो सका तो उसे अपना ब्लॉग दिखाएगी. कल दोपहर की कक्षा में वे एक ड्रामा करवाएंगे, ‘कृष्ण जन्म’, कल बिना ड्रेस के और अगले हफ्ते ड्रेस के साथ. परसों मृणाल ज्योति जाना है. टीचर्स को ध्यान के बारे में बताएगी. एक अवैतनिक अध्यापिका जो हाल ही में विधवा हुई थीं और अब सेवा के भाव से स्कूल आती हैं, काफी परेशान रहती हैं. जब तक परमात्मा को अपने जीवन का केंद्र न बना ले कोई, उसके दुःख कम नहीं हो सकते. यहाँ सभी परेशान हैं, धनी भी निर्धन भी, रोगी भी स्वस्थ भी. यहाँ वही सुखी है जो मन के पार चला गया ! समय का पहिया इसी तरह घूमता जायेगा और एक दिन मृत्यु द्वार पर आ खड़ी होगी. आज सुबह संध्या बेला में तारों भरा गगन देखते समय कितनी सुंदर कविता फूटी थी सहज ही, अब कुछ याद नहीं है. कितनी बार नींद में, तंद्रा में कविता की पंक्तियाँ अपने आप भीतर गूँजने लगती हैं, उन्हें रचा नहीं होता..पर बाद में याद नहीं रहतीं. क्या इसी को वेद के ऋषि द्रष्टा होना कहते थे. वेद वाणी को उन्होंने देखा था, रचा नहीं था..उसे अपने साथ एक छोटी डायरी और पेन रखना चाहिए ताकि फौरन उन्हें लिख ले ! आज सेंट्रल स्कूल जाना है, वाद-विवाद प्रतियोगिता है, ‘क्या भारत विश्व का नेतृत्व कर सकता है, क्या उसके पास यह क्षमता है’ ! उसे निर्णायक बनना है, पहले भी एक बार निर्णायक बनी थी, हिंदी में बोली अंत में, लेकिन आयोजकों का विचार था कि सम्भवतः वह अंग्रेजी में ही बोलेगी. आज अगर बोलने का अवसर आया तो भारत पर लिखी अपनी उस कविता की कुछ पंक्तियाँ ही पढ़ देगी.   

एक-एक पल कीमती है, श्वास-श्वास में उसका नाम लेना है, लूट मच रही है. चारों ओर वह बिखरा हुआ है, उसे कैसे समेटे, समझ में नहीं आता..कहना चाहिए कि कैसे बिखेरे..जो पाया है भीतर कैसे लुटाये उसे अनोखा है यह प्रेम ..जो सृष्टि के कण-कण के लिए भीतर घुमड़ता है, अनोखी है यह प्रीत जो सारे ब्रह्मांड के लिए दौड़ी जाती है, सबको गले लगाने को आतुर है..इतना पाया है भीतर कि समेटे नहीं सिमटता..आत्मा में अनंत शक्ति है, अनंत प्यार है, अनंत आनंद है..अनंत..ये सारे शब्द उसके मुख से प्रकट होते थे अब उनका साक्षात अनुभव होता है..होते होते ही यह घटा है..मिलते-मिलते ही मिला है..भरते-भरते ही घड़ा भरा है..बूंद-बूंद से सागर होता है कितना सही कहा गया है..जीवन जैसे एक वरदान बन गया है, एक उत्सव..परमात्मा की, सद्गुरु की कृपा से जीवन एक मशाल बन गया है, एक फूल बन गया है और बन गया है एक मिसाल...जो शहद से मीठे इस प्रेम को एक बार अनुभव कर ले वह तो जैसे बौरा ही जाता है..कदम बहकने लगते हैं, आँखें चमकने लगती हैं..नयन बरसने लगते हैं..वचन बहने लगते हैं..क्या नहीं होता उस एक की प्रीत में..जो उससे लगन लगा लेता है वह धनी हो जाता है..फिर कुछ भी पाने की लालसा नहीं रहती, इसी का नाम योग है..आत्मा का परमात्मा से योग...!


आज सुबह ध्यान में सद्गुरु की उपस्थिति को बिलकुल स्पष्ट किया उनके बोल भी सुने, परमात्मा हर जगह है, हर समय है इसमें कोई संशय नहीं रह गया है, वही तो है, उसके सिवाय कोई है भी नहीं..अभी-अभी दीदी से बात की, वे लोग चाय पीने जा रहे थे, अब परांठे के साथ वाली चाय छोड़ दी है ! परमात्मा सबका सुहृद है ! आज भी पिछले कई की तरह वर्षा का मौसम बना हुआ है, सुबह वे टहलने भी नहीं जा सके. कल शाम से आज सुबह तक कितनी पंक्तियाँ भीतर गुजरीं पर अब कुछ याद नहीं है, एक में तो देवी-देवों का जिक्र था. त्रिदेव तथा त्रिदेवियाँ साथ में सन्तोषी माँ, शीतला माँ सभी देवता उनके इस तन में ही तो वास करते हैं !