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Friday, June 23, 2017

सर्दी-जुकाम


फिर एक अन्तराल..नया वर्ष आया और पहला माह समाप्त होने को है, उसने लगभग हर दिन कुछ पंक्तियाँ लिखीं, छोटी-छोटी कविताएँ..गद्य लिखने का मन ही नहीं हुआ. पद्य सुकोमल है, गद्य जीवन का यथार्थ है. जून आज फिर गोहाटी गये हैं, परसों आ जायेंगे. उनका गला खराब था, कालीमिर्च, गुड़ और गाय के घी का नुस्खा अपनाना शुरू किया, उससे लाभ भी हुआ. पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय से वे शाम को सीडी लगाकर प्रवचन सुन रहे थे, आज भगवद् गीता पर आधारित प्रवचन है. साहित्य अमृत के स्वामी विवेकानंद पर आधारित अंक को पढ़कर कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे जब छोटे मन से दुनिया को देखते हैं तो अभाव नजर आता है, जब गहराई से देखते हैं तब पूर्णता का अनुभव होता है.

आज सुबह वह नींद में थी पर महसूस हो रहा था कोई जगा रहा है, जब तक नहीं जागी तब तक वह प्रयास करता रहा. एक स्वप्न जैसा कुछ देखा, जिसमें स्वयं को तितली के रूप में देखा. उस दिन नन्हे को फोन पर स्वयं को कहते सुना था कि हर योनि में जैसे तितली, परमात्मा या प्रकृति सबके साथ होते हैं, उन पर नजर रखते हैं. ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, एक बार स्वयं का चेहरा कुछ बदला सा दर्पण में देखा. स्नान करने गयी तो गाउन के बार्डर में कुछ भारीपन महसूस हुआ, छूकर देखा तो  कान का वह बुंदा था, जो कुछ दिन पहले खो गया था, पर वह वहाँ कैसे गया होगा, चारों तरफ देखा कहीं से भी सिलाई खुली नहीं है. इतने दिन से वहीं था तो आज ही उसका पता क्यों चला. कल स्कूल में बच्चों को सिखा सकी, वह भी तो परमात्मा की कृपा ही थी. उनके जीवन में वह कितना निकट है, बस देखने के लिए नजर चाहिए. टीवी पर जैसे ही गुरूजी का प्रवचन सुनना शुरू किया तो पहला वाक्य था, ‘जीवन एक पहेली है, इसे समझना और सुलझाना सीखना पड़ता है, फिर भी कुछ अनसुलझा रह जाता है’.

कल से सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है, पिछले दिनों जब जून को खांसी थी, उन्हें परेशान देखकर एक बार उसने प्रार्थना की थी, जून की तबियत ठीक हो जाये, भले उसकी खराब हो, वह स्वयं को ठीक कर सकती है. इसी अहंकार को मिटाने के लिए शायद प्रकृति ने यह उपहार भेजा है. जून अब पहले की तरह स्वस्थ व प्रसन्न हैं. कल शाम महिला क्लब की पार्टी थी. अस्सी महिलाएं आई थीं, हो सकता है उनमें से किसी से संक्रमण पकड़ लिया हो. छोटी बहन से बात की, उसकी गर्दन में भी दर्द था, पिछले हफ्ते बीती उसके विवाह की वर्षगांठ अलबत्ता उन्होंने अच्छी तरह मनायी. आज उसका एक छात्र पढ़ने नहीं आया, पहले सोचा शायद घर पर ही पढ़ रहा होगा, फिर फोन कर लिया. बहुत हँसी आयी जब पता चला उसने माँ से कह दिया था, टीचर ने आने के लिए मना किया है. कुछ बच्चे कितनी आसानी से झूठ बोल देते हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं होता कि यह झूठ है.


Tuesday, December 2, 2014

प्रयोगात्मक रेकी

praktikal 

जीवन होश से जीयें, मन में यदि प्रेम का बीज उगे तो उसकी रक्षा करनी पडती है, लोक व्यवहार की चिंता करते रहे तो भगवद् भक्ति टिकेगी नहीं. मन को गहराई से जानना होगा, जागृत अवस्था में ही नहीं, स्वप्नावस्था में भी सचेत रहना होगा. अपने स्वप्नों की समीक्षा करते हुए पता चलेगा की गाँठ कहाँ बंधी है”. आज गुरू माँ ने उपरोक्त वचन अपने प्रवचन के दौरान कहे. उसके जीवन में प्रेम है, जून, नन्हा, भाई-बहन, पिता, ससुराल के सभी लोग, चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्रगण के परिवार, पड़ोसी, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, प्रकृति, उनका देश, यह ग्रह, यह ब्रह्मांड.. सबके लिए प्रेम है. यह प्रेम भी आसक्ति रहित होना चाहिए, निष्काम होना चाहिए, इन सब से उसे क्या मिलने वाला है इसकी रत्तीमात्र भी परवाह न करते हुए वह इनके लिए क्या कर सकती है यही भाव रहना चाहिए. मन हल्का रहेगा. यूँ भी जीवन का कोई भरोसा नहीं, कब किस वक्त क्या देखना पड़ सकता है कोई कुछ नहीं कह सकता. अब बाबाजी आ गये हैं, उनकी शांत मुद्रा हृदय में शांति उत्पन्न करती है, नश्वर वस्तुओं के ध्यान से मति भ्रमित हो जाती है और कोई अपने वास्तविक रूप को जान नहीं पाता, लेकिन जब सुख की चाह वस्तुओं से नहीं होती, विचार पावन होते हैं. आत्मबल बढ़ता है. सत्संग सर्वश्रेष्ठ फल देने वाला है. संग दोष से बल घटता है.

पिछले पांच दिनों से स्वयं के निकट आने का अवसर नहीं मिला. शनिवार, इतवार को वैसे ही समय नहीं मिलता. एक दिन जुकाम से परेशान थी. कल पन्द्रह अगस्त की पार्टी थी, परसों जून का जन्मदिन था. अभी भी पूरी तरह जुकाम ठीक नहीं हुआ है. आज भी अमृत वचन सुने थे सुबह, कुछ-कुछ याद है, बाबाजी ने कहा, जो अपने साथ ईमानदार नहीं वह किसी के साथ ईमानदार नहीं हो सकता. सहजता जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति साधारण हो जाता है, दम्भ नहीं रहता, अभिमान सूक्ष्म रूप में भी हो तो उतना ही हानिप्रद है, उसे अपनी देश भक्ति का अभिमान है, यह भी गलत है, यदि कोई अपने देश से प्रेम करता है तो यह एक सहज, स्वाभाविक बात होनी चाहिए न कि कोई विशेष बात. संत की परिभाषा भी उन्होंने बतायी, वे लोग, जो अपने घर का रास्ता भूल गये हैं, असंत हैं, जिसे अपने घर का रास्ता याद है वह संत है. अभयदान सब दानों में श्रेष्ठ है.

आठ बजने को हैं. कल शाम वे क्लब गये, लाइब्रेरी में क्विज बुक (विज्ञान) के लिए आलमारी खोली तो practical reiki किताब मिली जिसमें step by step स्वयं को व दूसरों को रेकी देने की बात सचित्र समझाई है. उसका गला अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, अध्यापिका को अभी-अभी फोन करके मना किया. स्टार टीवी पर ‘आत्मा’ आ रहा है. “हमारी बुद्धि देहात्म हो गयी है, हम देह के परिचय को स्वयं मान बैठे हैं अर्थात आत्मा मान बैठते हैं”. अभी एक सखी का फोन आया, वह कम्प्यूटर ऑफ करने का तरीका पूछ रही थी. सुबह नन्हे ने इन्टरनेट कनेक्ट किया तो दो-तीन इमेल मिले अभी देख नहीं पाये हैं, सुबह-सुबह इतना वक्त नहीं होता. नन्हा लगभग रोज ही भागते-दौड़ते बस पकड़ता है. आज सुबह जून और वह दोनों उसके बारे में बात कर रहे थे. वह आजकल छोटी-छोटी बात पर चुप हो जाता है, शायद पैर के दर्द की वजह से. जून की तरह उसका भी फ़्लैट फीट है, पैर में दर्द स्वाभाविक है. कुछ व्यायाम जो पैर में कर्व बनाने में सहायक हैं, जून ने सिखाये हैं. कल art of living के बेसिक कोर्स के लिए फार्म भी आ गया है. यकीनन उसे इस कोर्स से लाभ होगा. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं. दोपहर को नन्हे का पायजामा सिलना है. कई दिनों से व्यायाम/अभ्यास रुका है. सोमवार से सम्भवतः वह पूर्ण स्वस्थ हो जाएगी.


Thursday, January 23, 2014

हिंदी सप्ताह


यह कर देंगे, वह कर लेंगे, संकल्प नित नये बुनता है मन
सम्मुख है जो पल अपने जीना उसको सीख न पाए

अजीबोगरीब उलझनों में स्वयं को उलझा लेता है मन का पागल हिरण फिर उस जाल में से निकलने का प्रयास करता छटपटाता रहता है, मन की कैसी अजीब दुनिया है यह, इसी से निस्तार पाने के लिए ध्यान, योग साधना की खोज हुई होगी, मन में विचारों के बवंडर उठते ही रहते हैं, चारों ओर धूल ही धूल, कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं देता, धूल जब स्थिर होकर बैठ जाती है तब भी नहीं, इस उहापोह से निकलने के लिए j Krishnamurti इंटेलिजेंस को जगाने की बात करते हैं. इन्सान का मन असंतुष्ट सा क्यों रहता है, खोया-खोया सा, बिखरा-बिखरा सा, लुटा-पिटा सा. क्यों नहीं सदा एक सा रहता, शांत...स्वयं में डूबा हुआ, पर क्या वह भी पलायन नहीं होगा. किताबों से दूर जाना भी तो वह इसीलिए चाहती थी कि उनमें लिखी बातें भी दिमाग को एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती हैं. वह भी तो एक मानसिक नशा हुआ या नहीं, वास्तविकता से दूर भागना ही तो नशा सिखाता है. जून कहीं ज्यादा स्थिर मना दिखाई देते हैं. वह सबल भी मालूम पड़ते हैं और वह कई बार न चाहते हुए भी उनकी हर बात मान लेती है.

आज नन्हा घर पर है, परसों शाम से ही उसे जुकाम ने परेशान किया है, सम्भवतः पिछले दिनों शाम को डेढ़-दो घंटे तैरने का परिणाम है. मौसम आज सोमवार को भी ठंडा है, उस दिन यानि शुक्रवार को उनके बगीचे के लिए आधा ट्रक गोबर आया था पर तब से लगातार वर्षा से बुरी तरह भीग गया है, अब धूप निकलने पर ही उसका उपयोग किया जा सकता है. कल सुबह जून उसे ‘हिंदी सप्ताह’ में कविता पाठ प्रतियोगिता में ले गये और दोपहर बाद अपना काम (रिपोर्ट आदि लिखना) करके उसे जीके पढ़ाते रहे. शाम को वे टहलने गये, चारों ओर शांति थी और नन्हा भी चुपचाप था, एक अनोखी निस्तब्धता का अहसास हो रहा था. कल आखिर उसकी क्रोशिये की जैकेट भी पूरी हो गयी. कल ‘विश्वकर्मा पूजा’ है, उन्हें जून के दफ्तर जाना है लंच के लिए, हर साल इस दिन वे डिपार्टमेंट जाते हैं, कुछ देर उनके रूम में बैठते हैं और फिर सामूहिक भोज होता है, पूजा सुबह ही हो जाती है.

उसने पढ़ा-
Meditation is total release of energy. When there is complete understanding of oneself, then there is the ending of conflict and that is meditation. It means awareness, both of the world and of the whole movement of oneself, to see exactly what is, without any choice, without any distortion. We can know ourselves in relationship, the observation of myself takes place only when there is response and reaction in relationship. To have a relationship with another without friction causes no wastage of energy. That is possible only when we understand what love is, and that is the denial of what love is not ie jealousy, ambition, greed, self centered activity.

All our life is based on thought which is measurable. It measures God, it measures its relationship with another through the image. It tries to improve itself according to what it should be. Meditation is the seeing of what is and going beyond it. When the body, mind and heart are completely one then one lives a different kind of life.

आज सुबह बहुत दिनों के बाद पीटीवी पर धारावाहिक देखा, ‘यह आजाद लोग’, दोनों देशों के हालात एक से हैं, समस्याएं एक सी हैं और लोगों के सोचने का ढंग एक सा है. एक अजीब सी कशमकश में ले जाकर ड्रामा वापस सतह पर ले आता है, जैसे कोई डूबते डूबते तैर कर वापस आ जाये. नन्हा आज स्कूल गया है, जून ने कुछ देर पहले पूछा, कुछ मंगवाना तो नहीं है बाजार से, उन्हें घर का ध्यान सदा रहता है. कल शाम जून दीपावली पर घर जाने के लिये बहुत उत्सुक हो रहे थे, बड़ी ननद के घर आने के कारण माँ-पिता इस बार नहीं आ पाएंगे. यात्रा की बातें करते-करते ही उनके मन पुलकित हो उठे, यात्रा सचमुच मन को जीवंत कर देती है.






Friday, October 5, 2012

मनभावन मृगतृष्णा



उसने पेन में हरे रंग की रीफिल लगायी तो पेन कुछ और ही लिखने लगा..

तुम मेरे हमदम मेरे लिए क्या हो
क्या तुम नहीं जानते
नहीं जानते कि धागे में फूलों की तरह
पिरोये हैं हम एक-दूसरे में
भावनाएं और विचार हमारे, एक में समोए हुए हैं
और वह एक है ज्योति ‘प्रेम’ की
जो दोनों के मध्य जाने कब से बह रहा है
प्यार की शाश्वतता व अटूटता पर विश्वास क्यों नहीं करते लोग
जब ईश्वर पर करते हैं
पर मैं और तुम जानते हैं कि
ईश्वर वहीं है जहाँ प्रेम है  
एक-दूजे को बुलाते समय हम उसे भी बुलाते हैं
हमारे बीच फासले वक्त के हों या विवशता के
नहीं रोक पाएंगे उस अविरल धारा को क्योंकि
तुम्हारे हृदय में भी यही मेरा दिल धड़कता है न....

कल पेन ने साथ तो दिया पर वक्त ने न दिया पता नहीं, अब याद नहीं आता, क्या करने लगी थी लिखना बीच में ही छोड़कर, जरूर ही कोई अति आवश्यक कार्य रहा होगा. जून के आने में सिर्फ तीन दिन, आज का छोड़ के दो दिन शेष हैं. अभी तक तय नहीं हो पाया है कि वह वहाँ जा पायेगी अर्थात स्टेशन, उन्हें लेने अथवा नहीं. नन्हा अब ठीक है और उसका जुकाम भी कई दिन हुए ठीक हो गया है. कल रात सोनू की जिद के कारण छत पर सोयी थी, पर ठंड बहुत थी आधी रात को ही नीचे आ गयी. नन्हा कुछ ओढ़ना तो चाहता ही नहीं है. जून के आने के बाद भी ऐसा ही मौसम रहे, शीतल सा सुकून दायक, तो कितना अच्छा हो. इतने दिनों बाद उसे देखकर कैसा लगेगा, समझ नहीं आता. कितना सुंदर होगा वह क्षण ! वह कुछ ही दिन तो रहेंगे फिर अकेले अकेले.., कब जायेंगे हम वापस यह भविष्य ही बताएगा. तभी उसे ध्यान आया कि टीवी समाचार का वक्त होने में कुछ वक्त है तब तक कपड़े धो सकती है, वह रोज सुबह उसी वक्त समाचार सुनती है, समय क्या उसकी या किसी की सुविधा से आगे बढता है, उसे तो बढ़ते ही जाना है अब उस दुर्घटना को हुए आठ महीने होने को हैं.

आखिर तय हो गया कल सुबह वह जून के मित्र के साथ उन्हें लेने स्टेशन जा रही है, उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि मौसम बिल्कुल ठीक रहे जिससे उनकी फ्लाईट में कोई बाधा न हो, और समय से कलकत्ता स्टेशन भी पहुंच जाएँ. आज अभी से कितनी उमस है, बादल हैं पर हवा का नाम नहीं. कल रात उसने एक मलयालम कला फिल्म देखी, उस वक्त भी जून को याद किया, उसे अजीब सी पुलक महसूस हो रही है उन दिनों के बारे में सोचकर जब वे साथ होंगे.

छह बजे हैं, कल सुबह जून आ गये थे, उनके स्टेशन पहुंचने से पहले ही वह बाहर निकल कर जा चुके थे. कल दिन भर सामान्य रहा अर्थात वैसा ही जैसा कि इतने दिनों के बाद किसी प्रिय के आने पर होता है, बातें, बातें और बातें. टिकट भी मिल गयी उन सबकी वापसी की. समझ नहीं आ रहा कि इसमें खुश होये या उदास. कल शाम से ही स्वयं को समझ पाने में असमर्थ है. क्या यह जो वह अनुभव कर रही है और लोग भी करते होंगे, क्या सब कुछ रेत का घर होता है, ताश का महल, हवा के हल्के से झोंके से ढह जाने वाला. उदासीन हैं तन और मन दोनों. कहीं कोई आकुलता नहीं, क्या सब कुछ मृगतृष्णा थी, एक छलावा ही तो कहेंगे इसे, मन इतना विद्रोही क्यों हो जाता है, काँटों की चुभन, कांटे जो दूसरों को चुभोये, खुद को भी महसूस करनी पडती है. शायद यही कारण है, किन्तु क्या वह सच्चाई नहीं थी जैसे यह सच्चाई है. जिससे कहा वह पात्र उचित नहीं था. जन्म भर के लिए स्वयं का दुश्मन बन जाना क्या उचित कहलायेगा. अथवा इन और उन सब बातों को सारहीन समझ कर तटस्थ होकर धारा के साथ बहते जाना ही उचित है. अभी एक बंदर उसके बिलकुल पास से गुजर गया उसे बाद में पता चला, भय का संचार हुआ, अभी जीवन का मोह शेष है, यही सत्य है. कभी जो स्वर्ण लगता है मगर वास्तव में स्वर्ण नहीं होता वक्त के साथ काला पड़ जाता है. उसका नकली मंगलसूत्र जैसे, अब कभी नहीं पहनेगी उसे. नन्हा सोया है अभी, पेपर देखने गयी थी, नहीं आया.
उसने आगे टेढ़े-मेढे शब्दों में लिखा-मेरे मीत, अभी नौ बजे हैं तुम्हारी ट्रेन चलने वाली होगी न..या अभी-अभी चली गयी होगी. तुम दो दिन के लिए अपनी शक्ल दिखाकर, नेह में भिगोकर चले गए हो..कहाँ चले गए हो..चित्रहार आ रहा है पर मन कहीं और है शायद तुम्हारे पास...

  

Thursday, October 4, 2012

उफ़ ! यह कॉमन कोल्ड



यहाँ आए उसे चार दिन हो गए हैं. कल व परसों भी घर में चहल-पहल होने के कारण कुछ लिख नहीं सकी. चाचीजी और उनके बच्चे कल चले गए. परसों वह भी उनके घर जायेगी, उसी घर में जहां उसका बचपन बीता था. माँ उसे लेकर बाजार गयीं, सास, ननद, नन्हे व उसके लिए कपड़े खरीद कर दिए. नन्हा यहाँ भी उतना ही खुश है पर खाना ठीक से नहीं खाता है. आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेंगे, उसने सोचा. जून के दो पत्र मिले यहाँ आकर, वह उसे अपने पास क्यों नहीं बुला लेता उसके मन में ख्याल आया. कल वह अपना वजन करवाने गयी थी, केवल बयालीस केजी...कितना कम है.

ननद का पत्र आया है, उसका प्रवेशपत्र आ गया है, चौदह को परीक्षा है, उसे कम से कम दो-तीन दिन पहले जाना चाहिए. कल वे दीदी के घर गए थे, परसों जीजा जी आए थे, कल सुबह अपने साथ ले गए. वहाँ अच्छा लगा, दीदी, जीजाजी, व बच्चे सभी उन्हें अपने बीच पाकर बहुत खुश थे. उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा था. उन्हें एक पत्र लिखेंगे उसने मन ही मन सोचा.

कई दिन बाद डायरी लिखने बैठी है. इस बीच कितनी ही बातें हुईं, ऐसी भी जो यादगार बन गयीं पर आलस्य वश ही कहना चाहिए, लिखा नहीं. एक बार क्रम टूट जाये तो जल्दी जुड़ता नहीं है. उसे दो दिन से जुकाम ने परेशान किया है, कमजोरी भी महसूस होती है, और..कभी कभी बेचैनी भी. खुशी है तो बस इस बात की कि जून दस दिन बाद आ रहे हैं. आज भी उनका पत्र आया है, दोपहर उसने सभी को पत्र लिखे. कल परीक्षा हो गयी. उसने पढ़ाई जरूर की पर सोच-समझ कर नहीं की. खैर, जो होना था हुआ, अब उसे बदला नहीं जा सकता, यदि उसका दाखिला नहीं हुआ तो यह भले ही शर्म की बात हो, वह वापस जा सकेगी, यह क्या कम होगा, जून के साथ-साथ रहने का, जीने का  मन होता है, खुले आकाश में, अपने निज के घर में, अपने मन से जीने का...यहाँ सब कुछ ठीक है पर फिर भी अपना घर तो अपना ही है. उसका मन फिर पीछे लौट गया...समाचार भी ध्यान से सुने होते पिछले तीन-चार दिनों से तो..यह आत्मग्लानि मानव की सबसे बड़ी शत्रु है, क्या स्वयं को छोटा किये बिना मनुष्य कुछ सीख नहीं सकता...शायद नहीं.

फिर दो दिन का अंतराल. वह स्वस्थ हुई तो सोनू को सर्दी हो गयी, अभी भी खांसी है, इस समय सोया है इसी कारण, दिन में सोना उसे जरा भी पसंद नहीं, बहुत मना कर सुलाना पड़ता है. आज  उसे स्नान में काफी वक्त लग गया पर वास्तविक स्नान इसे ही कहते हैं, मालिश से भी कैसे तन में जान आ जाती है. यहाँ आयी है तब से वह ननद के लिए टॉप पर कढ़ाई कर रही है, लगभग एक तिहाई हो गया है, जून के आने से पहले ही पूरा हो जाये तभी अच्छा है, उसका पत्र आया है पर तिथि नहीं लिखी है. भूल ही गया है शायद.. आजकल वह अक्सर खुद को इस बारे में सोचते हुए पाती है कि जब वह यहाँ होगा तो इस वक्त वे क्या कर रहे होंगे.

कल रात जब पिता काम से वापस आये तो उनके हाथ में चोट लगी हुई थी. उसे इस बात का पता बाद में लगा जब वह सोनू की लगातार होती हुई खांसी के कारण उसे दवा पिलाने व नीचे सुलाने ला रही थी. उस वक्त भी सिर्फ उनके हाथ पर बंधा कपड़ा दिखा था. अभी सुबह कुछ देर पहले माँ ने बताया कि चोट काफी गहरी थी और वह रात भर ठीक से सो नहीं सके. सोनू दवा लेने के बाद आराम से सोया रहा, शुरू में कुछ देर तो बेचैन था पर बाद में ठीक से ही सोया रहा. बल्कि उसकी नींद ही बार-बार खुलती रही.


Tuesday, August 21, 2012

फिर आया भूमि कंप



आज सोनू जल्दी उठ गया, उसकी नाक जुकाम से लाल हो गयी है. बीच-बीच में उसे सम्भालते व कपड़े धोते आज काफ़ी समय लग गया, सारा काम व्यवस्थित ढंग से नहीं हो पाया जैसे रोज होता है. उसका खुद का गला भी खिचखिच कर रहा है. कल शाम जब जून आया तो वह पिछले दरवाजे से बाहर जाकर खिड़की के पास खड़ी थी, लगातार खांसी हो रही थी और आँखों से पानी आ रहा था. ऐसे में किसी के सामने रहना उसे अच्छा नहीं लगता, जून की बात और है, वह उसे अंदर ले गया, पानी दिया और सहेजा. बाद में उनके एक परिचित दम्पत्ति अपनी सुंदर नन्हीं बिटिया को लेकर आये. जन्मदिन के फोटो बन कर आ गए है, पर वह बात नहीं है जो होनी चाहिए थी.

आज कितनी गर्मी है, पसीना पोंछते-पोंछते तौलिया भीग जाता है, सुबह से इधर-उधर चलते भागते काम करते सवा दस हो गए हैं. सुबह देर से उठो तो सभी कामों में देर होती चली जाती है. अगर घर का काम करते ही रहो तो कभी खत्म होने को ही नहीं आता, सुरसा के मुँह की तरह फैलता ही चला  जाता है. आराम करने के लिये भी वक्त चुराना पड़ता है दस मिनट ही सही, नन्हा आज ठीक लग रहा है, अभी बाहर पड़ोस की दीदी के साथ उसके घर गया है. सभी के पत्रों के जवाब लिखने हैं  उसने सोचा दोपहर में लिखेगी जब नन्हा सो जायेगा.

परसों वह सासूमाँ व ननद को लेकर अपनी एक तेलुगु मित्र के यहाँ गई थी और कल शाम उड़िया दम्पत्ति के यहाँ. नई दुल्हन ने बहुत अच्छा खाना बनाया था, पांच तरह की सब्जियां थीं. जून इस समय नहरकटिया गए हैं. तेरह को यदि बंद हुआ तो माँ की वापसी की टिकट कैंसिल करानी होगी.

कल सुबह वह किचन में दलिया निकाल रही थी कि भूकम्प का झटका लगा. जून ने आवाज दी और उसके बाद एकाध मिनट तक पूरा घर जैसे झूल रहा था. रात को समाचारों में सुना कि पश्चिम बंगाल, बिहार व दिल्ली में भी भूचाल आया था.

पिछ्ले एक घंटे से लगातार तेज वर्षा हो रही है. सब ओर पानी ही पानी झरर झरर झरता हुआ और बादलों की गड़गड़ाहट ! मानों आकाश में हजारों छेद हो गए हैं जिनमें से पानी छन रहा है. कल  दोपहर वे तिनसुकिया गए थे, उसने कितने दिनों से सोचा था कि वाल्मीकि रामायण लायेंगे पर वहाँ जाकर पता करना याद ही नहीं रहा. भोजन में आज वह उत्तपम बना रही है, सो केवल नन्हें के लिये खिचड़ी बनानी है जिसमें वह सभी सब्जियां डाल देगी. वह बाहर खेलने गया है, दादी व बुआ कार्ड्स खेलने के लिये बुला रही हैं.

Wednesday, August 1, 2012

कॉसमॉस के अंकुर


कल रात वह शायद गहरी नींद में थी, नन्हा एक बार कुनमुनाया, उसका बिस्तर गीला था, पर उसके कपड़े व चादर नहीं बदले और कुछ देर बाद जब वह रोया तो देखा उसकी नाक से पानी बह रहा है और खिड़की से आती ठंडी हवा व गीले कपड़ों के कारण वह थोड़ा परेशान है. विक्स लगाकर उन्होंने उसे सूखे में सुलाया, अभी तक तो सोया है, ईश्वर उसे स्वस्थ रखे. जुकाम का रोग उससे दूर ही रहे. उसने शांति से सोये नन्हे को देखकर मन ही मन दुआ की. कल वर्षा की कुछ बूंदें भी उस पर पडीं दो तीन बार, सभी बातों का मिला-जुला असर हुआ लगता है. महरी अब आयी है काम पर, कल क्यों नहीं आयी यह पूछना व्यर्थ है फिर भी पूछना तो होगा ही. और कल उनका टीवी फिर से बोलने लगा बहुत अच्छी तस्वीर भी आती है एकदम साफ, कभी कभी डिस्टर्बेन्स होती है वह संचार केन्द्र से ही होती होगी. जून और उसके मित्रों ने बहुत मेहनत से लगाया एंटीना. कॉसमॉस के अंकुर तो फूट आये हैं पर जीनिया के अभी नहीं, शायद एक दो दिन में निकल आयें.

कल उसकी अंगुली में एक कांटा चुभ गया था जो आज सुबह ऑफिस जाने से पूर्व जून ने निकाल दिया इसी तरह वह हर पल उसकी सहायता को तत्पर रहते हैं, हर छोटे-बड़े कार्य में. गेट की आवाज हुई तो उसे लगा आया आयी है या स्वीपर, पर पड़ोस का गेट खुला था. अभी तक उसने उस घर में आयी नई दुल्हन को नहीं देखा है. कल घर से एक और पत्र आया, पर जिस ट्रंक का वे इंतजार कर रहे हैं, उसके बारे में इस बार भी कुछ भी नहीं लिखा. नन्हा कल दिन भर भी जुकाम से परेशान रहा, अभी सो कर नहीं उठा है. कल शाम टीवी पर रिसेप्शन ठीक नहीं था बल्कि कुछ आ ही नहीं रहा था, सो वे नाटक तो देख ही नहीं पाए सीरियल भी आधा ही देखा. सुप्रिया पाठक पहले उसे अच्छी लगती थी, अब उतनी नहीं, उसकी आवाज भी उसे पसंद नहीं है. ज्ञानयोग से कर्मयोग श्रेष्ठ है, पाँचवा अध्याय पढ़ा आज, पढ़ते समय कभी-कभी मन पता नहीं कहाँ-कहाँ भटक जाता है, फिर से पढ़ती है वह उन लाइनों को.  

Thursday, July 26, 2012

सर्दियों का सूरज




आज बुधवार है, पिछले बृहस्पतिवार उसे सर्दी लगी, जो जुकाम और कमजोरी में बदल कर सोमवार को भागी और इतवार की रात नन्हें को भी उससे सर्दी लग गयी. दिन भर स्वस्थ रहता है पर रात को उसका जुकाम बढ़ जाता है. ठंड भी तो कितनी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिनों से लगातार होती वर्षा के कारण. पर सोम, मंगल को भी डायरी न उठाने का कारण है जून की अनुपस्थिति, दो दिन के लिये वे खरसांग गए थे, कल शाम ही वापस आये हैं, कल दीवाली है इसलिए. वैसे भी वहाँ अभी कार्य नहीं था, एक बार फिर जाना होगा तीन-चार दिन के लिए. सुबह के समाचारों में अभी-अभी हुए आतंकवादियों के हमले के बारे में बताया जा रहा है. पता नहीं कब छूटेगा भारत इनके चंगुल से.
आज इंदिरा गाँधी का जन्मदिन है, अगर वह होतीं तो...कितने हफ्तों बाद डायरी उठाई है. सब कुछ व्यवस्थित लग रहा है. बस वह जून का पहले की तरह ध्यान नहीं रख पाती, नन्हें के साथ व्यस्त रहती है, उनके पास शाम का कुछ खाली समय रहता है, जिसमें कुछ कर सकते हैं उसने सोचा, वह उनसे किसी नए कार्य को शुरू करने की बात कहेगी. नन्हा आज देर से उठा अभी उसका स्नान नही हुआ है, वही रात का कुरता पहने है, अच्छा लगता है उसमें वह, शाम को उसकी वह बंगाली मित्र आपने माँ-पापा के साथ आ रही है. अब नन्हे ने ऊं ऊं शुरू कर दिया है.

नवम्बर का आखिरी दिन. सर्दियाँ अपने पूरे शबाब पर हैं. सुबह का सूरज बहुत सुखदायी है और गुलाब ज्यादा लाल हो गए हैं. अब जून को ठंड लग गयी है. धूप तेज हो गयी है वह बाहर से उठकर बरामदे में आ गयी. कल बड़े भाई का जन्मदिन है, उसने मन ही मन उन्हें शुभकामना दी.