Showing posts with label साधक. Show all posts
Showing posts with label साधक. Show all posts

Wednesday, December 2, 2020

महादेवी वर्मा की कविताएं

 

रात्रि के आठ बजकर बीस मिनट हुए हैं. जून से अभी-अभी बात हुई, कूर्ग में उनका कार्यक्रम अभी चल रहा है. उन्होंने वहां की एक तस्वीर भेजी है, बहुत सुंदर स्थान है. नन्हे ने बताया, नए घर में फ्रिज ठीक से काम नहीं कर रहा था, बदल कर नया आ गया है. मौसम आज दिनभर वर्षा का ही रहा, दोपहर को मूसलाधार वर्षा हुई, बगीचे में पानी भर गया था. बच्चों के साथ कागज की नाव चलाई. किचन गार्डन की सारी क्यारियां लगभग डूब ही गयी थी. दो छोटी लड़कियाँ पीछे की सर्वेंट लाइन में नयी आयी हैं, कहने लगीं उन्हें भी योग सीखना है । शाम को भजन संध्या थी, एक साधिका खुद की बनाई लौकी की बर्फी लायी थी. दोपहर को एक सखी का फोन आया, उसकी हफ्ते में दो दिन रात्रि की ड्यूटी लगती है, दिल के मरीज आते हैं, रात भर काफी व्यस्त रहना होता है. उसे भारत आना भी है पर विदेश की सुविधाएं भी नहीं छोड़नी, अब दोनों बातें एक साथ कैसे हो सकती हैं ! भारत में उनकी जायदाद है पर एक बार जो विदेश चला जाता है, घर वापसी कठिन होती जाती है. 

आज सुबह ‘पिता’  एक कविता लिखी, बचपन की जो स्मृतियाँ मन पर अंकित थीं, उन्हीं को शब्दों में उतार दिया, दीदी ने लिखा, बचपन याद आ गया. दोपहर को ‘माँ’ एक छोटा सा लेख लिखा, अपने-आप ही शब्द जैसे कम्प्यूटर की स्क्रीन पर उतरते जा रहे थे. भीतर एक शांति का अहसास हुआ, जैसे कोई भार हल्का हुआ हो. पापा जी ने कहा, जीवन बहुत बड़ा होता है, उसे कुछ शब्दों में कहना आसान नहीं है, वह उसके लेख के बारे में कह रहे थे, उन्हें भी कई बातें याद हो आयी होंगी. शाम को गुरूजी को सुना वह जर्मनी में थे सम्भवतः। बताया, अरस या अलस एक ही बात है, आलस्य जिसके जीवन में है, उसके जीवन में रस नहीं है. जब भी उन्हें दुख होता है, वे अपने पद से नीचे आ जाते हैं. कर्म जो उन्होंने बांधे थे राग-द्वेष के कारण, उन्हीं के कारण सुख-दुःख आते हैं. सुबह टहलने जाने से पूर्व बगीचे में जामुन बीने, इतने सारे थे कि सब उठाने में घँटों लग जाएँ, इस साल पेड़ों ने दिल खोल के सौगात दी है. परिचित परिवारों में सभी को बांट दिए हैं, धोबी, दूधवाले सभी को. बच्चे तो दिन भर पेड़ के नीचे से हटते ही नहीं हैं. कल सुबह माली ने अपने मित्र को पेड़ पर चढ़ा दिया और डालियों को हिलाकर वे जामुन नीचे गिराने लगे, कच्चे, पक्के, डालियाँ सभी कुछ,  उसने जाकर मना किया तब वह नीचे उतरा. उन्हें बस तीन महीने और यहाँ रहना है, फिर यह बाग़-बगीचे एक स्वप्न की तरह हो जायेंगे उनके लिए. जून ने वही से फ़ोन करके माली को  काम करने को कहा, उन्हें फ़िक्र है कि मेहमानों के आने से पूर्व बगीचा पूरी तरह से दर्शनीय हो. 


‘गुरु चरणन में दीन दुहाई’ आज सुबह नींद खुलने से पूर्व भीतर यह पंक्ति आयी, जाने कहाँ से आयी यह पंक्ति ! स्वयं को मधुर स्वर में गाते हुए सुना इस पंक्ति को. एक पुस्तक में किसी साधक के अनुभव पढ़े, जिसे भीतर से प्रेरणा हो रही थी कि जो कुछ भी मन में है, उसे बाहर ले आये. जो भी कामना, इच्छा अधूरी है उसे बाहर लाकर स्पष्ट देख ले, यह जन्म अंतिम जन्म है, ऐसा सोचकर कुछ भी ऐसा न रहे जिसके लिए उसे पुनः जन्म-मरण के फेर में आना पड़े. जब साधक खुद के भीतर ही उस शांति व समता को अनुभव कर लेता है, जो किसी भी स्थिति में खंडित नहीं होती तो सत्य को आँख में आँख डालकर देखने में कैसा भय ? उसने अपने भीतर देखा, स्वास्थ्य ठीक रहे यह प्रथम इच्छा है. संसार के किसी काम आ सके, कुछ कर सके समाज के लिए, यह दूसरी इच्छा है. परमात्मा के साथ एक होकर रहे, वाणी में स्थिरता हो, कभी किसी को दुःख न पहुँचे उसके व्यवहार से या वाणी से, ये तीसरी और चौथी इच्छाएं हैं. इतनी सारी इच्छाएं हैं भीतर, इसलिए कभी-कभी मन में हलचल होती है क्षण भर के लिए, पर सदा के लिए मुक्त होने का आनंद लेना हो तो इन सारी कामनाओं को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देना ही उचित है, और मन को सदा खाली रखना होगा.  


कालेज के उन दिनों में महादेवी वर्मा की कितनी ही कविताएं डायरी में उतारा करती थी. 


कैसे कहती हो सपना है 

अलि ! उस मूक मिलन की बात 

भरे हुए अब तक फूलों में 

मेरे आंसू उनके हास ! 


किस भांति कहूँ कैसे थे 

वे जग से परिचय के दिन 

मिश्री सा घुल जाता था 

मन छूते ही आंसू कण 


अपनेपन की छाया तब 

देखी न मुकुट मानस ने 

उसमें प्रतिबिम्बित सबके 

सुख-दुःख लगते थे अपने 


किसने अनजाने आकर 

वह चुरा लिया भोलापन 

उस विस्मृति के सपने से 

चौंकाया छूकर जीवन ! 


Monday, July 6, 2020

ठंड से सिकुड़े फूल


शाम के सवा चार बजे हैं, बगीचे में झूले पर बैठकर मन्द हवा के झोंको और चिड़ियों की चहकार के मध्य लिखने का अवसर कभी-कभी ही मिलता है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका रात्रि भोजन भी बाहर ही होने वाला है सो किचन में भी कोई काम नहीं है. दोपहर को मोदी जी को सुना जब वह मजदूरों के लिए पेंशन स्कीम की योजना का वर्णन दे रहे थे. उनके दिल में वंचितों के लिए बहुत दर्द है. देश के हर व्यक्ति को वह अपने परिवार का एक अंग ही मानते हैं. वह उस राजा की तरह हैं जो अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता है. अगले चुनावों में बीजेपी ही जीतने वाली है. इसमें किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिए. जन औषधि के कारण देश में सस्ती दवाएं मिलने लगी हैं. नए एम्स भी बन रहे हैं. प्रधानमंत्री रोज ही नई-नई योजनाएं आरंभ कर रहे हैं. सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएँ देश में मिल रही हैं. पुलवामा में हुए आतंकी हमले पर भी विपक्ष संदेह करने से बाज नहीं आ रहा है. पाकिस्तान में हुई एयर स्ट्राइक पर तो सवाल उठ ही रहे थे. पिछले दिनों काफी विचारकों को सुना. भारत-पाकिस्तान के बिगड़ते हुए संबंधों का कारण इस्लामिक कट्टरवाद ही है. यह किसी भी मुल्क को आगे बढ़ने से रोकता है. महीने के तीसरे सप्ताह में प्रेसिडेंट का फेयरवेल है, जिसमें  योग साधिकाओं को श्लोक पाठ प्रस्तुत करना है आज से वे रिहर्सल करेंगी. 

संध्या पूर्व का समय है, अभी अभी वे लॉन में टहलकर आये हैं. मौसम आज खुला है, लाल डूबता सूरज पेड़ों के पीछे से झाँक रहा था कुछ समय पूर्व. घास भीगी थी. एजेलिया का पौधा मेजेंटा फूलों से भर गया है जो अपनी ओर खींचता है. आज सुबह नैनी का पति अपने पिता को स्थानीय अस्पताल ले गया. पता चला, गले में कैंसर के कारण डिब्रूगढ़ मेडिकल कालेज ले जाना होगा. उसने ईश्वर से उनके लिए प्रार्थना की. दोपहर को मृणाल ज्योति गयी, एक अध्यापिका का विदाई भोज था, वह बहुत रो रही थी. इंसान का दिल बहुत कोमल होता है वह नफरत को सह लेगा पर प्रेम में पिघल जाता है. क्लब के एक सिलाई-कढ़ाई प्रोजेक्ट में एक सदस्या से मिली, वह बहुत ऊर्जावान है. उसने एक लकड़ी के शोकेस में प्रोजेक्ट का मोटिफ व अन्य नमूने लगाए हैं. आज सुबह उठने से पूर्व मन में एक मंथन चल रहा था, आत्मिक शक्ति को बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए. अपने सुख को किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आश्रित नहीं रखना चाहिए, सबसे पहले तो यही संदेश मिला. साधक को हर पल सजग रहने की आवश्यकता है. परमात्मा सदा उसके साथ है, वह उसे स्वयं से दूर जाने नहीं देता. वह अकारण दयालु है, सखा है, सुहृद है. राजनीति के चक्करों से भी साधक को दूर ही रहना चाहिए. देश में चुनाव होने वाले हैं, बहुत तरह के संदेश दिए जा रहे हैं. जो भी होगा, भला होगा, इस विश्वास के साथ अपने सहज कर्मों को करते जाना है. परसों महिला दिवस है. महिलाएं आज किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं. सेना हो या सिविल दोनों में ही महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. नए घर में पेटिंग का काम आरंभ हो गया है. 

उस पुरानी डायरी में पढ़ा, दादाजी ने अपनी बहन के बारे में बताया, अभी तक वह उनसे नाराज हैं. किस तरह उन्होंने अपने पति के मरने पर उन्होंने दूसरा विवाह किया तो लोगों ने इन्हें कहा, गोली चला दो; पर उनके पिता जी ने कहा कि नहीं, जान लेने से कोई फायदा नहीं, ऐसी घटनाएं और भी हो रही हैं. पिता समझदार निकले. सात भाइयों में से एक को फाँसी भी हो जाती तो भाइयों को दुःख न होता. दादाजी ने एक और मजेदार बात बताई, दादी जी को देखने के लिए नाइन को एक रुपया दिया था उस जमाने में. 

आगे लिखा था, तुम्हें जिसके प्रति आस्था हो उसके प्रति ईमानदार रहो, पर अपनी भूलों पर... उनके लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है, वे अतीत की वस्तुएं हैं, मृत हैं, वर्तमान में तुम क्या हो, महत्व इस बात का है और इस बात का भी कि भविष्य में तुम क्या होगी ! यदि कोई तुम्हें उन बातों का स्मरण भी दिलाये तो चुपचाप सुन लो... न प्रतिवाद न पश्चाताप, वे उन दिनों के फूल थे और ये आज के फूल हैं, फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि फूल किस रंग के हैं. सर्दी के कारण सारे गेंदे के फूल अपनी आकृति खो बैठे हैं तो क्या वे फूल नहीं हैं ? सो यह बिलकुल व्यर्थ की बात है कि पिछले वर्ष तुमने खिचड़ी खायी थी या पुलाव ! 

अवश्य कुछ हुआ होगा पर उसके बारे में कुछ नहीं लिखा है. 

Wednesday, April 25, 2018

हरी मटर की पौध



रविवार होने के बावजूद आज सुबह भी वे भोर होने से पहले ही उठ गये, अँधेरे में ही टहलने गये, पूरे रास्ते में इक्का-दुक्का लोग नजर आए. सुबह की योग कक्षा में सूर्य नमस्कार और सूर्य ध्यान करने व कराने के बाद मन कितना प्रफ्फुलित हो गया था. नाश्ते की तैयारी उसने पहले से कर दी थी. जून ने तंदूर लगा दिया, गर्मागर्म आलू का परांठा और दही का नाश्ता किया. उसके बाद आरम्भ हुआ सभी से फोन पर बातचीत का सिलसिला. हर इतवार को वे सबसे पहले पिताजी से बात करते हैं, उनसे बात करना सदा ही अच्छा लगता है. फिर बहनों से और उसके बाद किसी और से. बड़ी भांजी डाईटीशियन का कोर्स करना चाहती है, उसके पति उसे सहयोग कर रहे हैं, जानकर अच्छा लगा. आज क्लब का वार्षिक उत्सव है, दोनों ने बालों में रंग लगाया. लंच के दौरान पिछले कई वर्षों की तरह एक स्टाल पर उसको भी खड़ा होना था. वे दो बजे क्लब गये, सजी-धजी महिलाएं समूहों में बैठी थीं, अभी भोजन में एक घंटे की देरी थी. लोग मस्त थे, सलाद, फ्राई, स्वादिष्ट भोजन, आइसक्रीम सभी कुछ लाजवाब था, पर पीने का चलन इस दिन कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है. शाम को ‘महाभारत’ का अगला एपिसोड देखा. रात को मकई की रोटी बनाई बगीचे से तोड़े हरे प्याज और मेथी मिलाकर. इस वर्ष मटर को छोड़कर सभी सब्जियों की काफी अच्छी फसल हुई है. मटर की फलियों को पंछी खा जाते हैं.

नये वर्ष के दस दिन गुजर गये, समय कितनी तेजी से गुजरता है, उनके लक्ष्य पूरे नहीं हो पाते. जीवन कितना कुछ छिपाए है, जो अपरिचित ही रहे जाता है. मौसम आज भी काफी ठंडा है, शाम को जून के एक सहकर्मी भोजन  के लिए आ रहे हैं. ‘सिया के राम’ में आज राम मिथिला की तरफ प्रस्थान करेंगे. हजार बार सुनी यह कथा हर बार नई लगती है. आज दुर्योधन का भी अंत होने वाला है ‘महाभारत’ में, मोह का प्रतीक है यह पात्र, इसका नाश होना ही चाहिए. व्हाट्सएप पर एक छोटी सी लडकी को हनुमान चालीसा गाते हुए सुना आज, तकनीक ने कला को कितना बड़ा फलक दे दिया है, देखते-ही देखते यह वीडियो पूरे भारत में प्रसारित हो जाने वाला है. जून आज देहली गये हैं. कल रात सूक्ष्म देह का अनुभव कितना स्पष्ट हो रहा था. वे सूक्ष्म देह के द्वारा भी स्पर्श का अनुभव करते हैं और देखते हैं, अनोखी है भीतर की दुनिया !

आज लोहरी है, सुबह देर से उठी, गले में हल्की खराश थी. नेति आदि करके स्नान किया तो सोचा, प्रातःभ्रमण तो छूट गया, प्राणायाम ही कर ले, पर सुबह-सुबह ही क्लब की सेक्रेटरी का फोन आ गया, कार्यों की एक लम्बी सूची थी सो नाश्ता करके कम्प्यूटर पर काम करने आ गयी, पर स्क्रीन थी कि खुलने को राजी नहीं थी. कल ही जून के जाने से पहले ही लैन से कनेक्ट करके गये थे आईटी विभाग के कर्मचारी. जून को शायद पासवर्ड का ज्ञान हो, पर वह फ्लाईट में थे. कुछ देर की प्रतीक्षा भी सही नहीं गयी. अधीर मन ने कहा, नन्हे को फोन करो, वह क्या करता, इसी बहाने उससे बात हो गयी. तब तक जून का संदेश देखा फोन पर, समस्या पल में हल हो गयी, पर इतनी देर में जो भीतर उत्तेजना को जन्म दिया उसका असर तो होना ही था. सदा शांत रहने वाला मन यदि थोड़ा सा भी ऊपर-नीचे हो तो असर होता ही है. साधक को तो अति सजग रहने की जरूरत है. सवा ग्यारह कब बज गये पता ही नहीं चला. सेक्रेटरी के साथ कार्ड्स बांटने गयी, सवाा एक बजे लौटी, भोजन करके पुनः तीन बजे गयी. उपहार गिनने का कार्य किया, बाजार गये और लौटे तो साढ़े पांच हो चुके थे. उसके बाद योग कक्षा, संध्या भ्रमण, ‘सिया के राम’, रात्रि भोजन और फिर नींद से पूर्व ध्यान. कोई स्वप्न देखा हो याद नहीं.   

Thursday, September 7, 2017

जागती आँखों के स्वप्न



साधकों में विभिन्न राज्यों के व देशों के लोग थे. ग्यारह बजे घंटे की आवाज से दूसरा सत्र खत्म हुआ. यह दोपहर के भोजन का समय था. सात्विक, शाकाहारी भोजन परोसा जाता था, जिसमें पीली दाल, एक आलू की सब्जी जिसमें कभी मटर, कभी सफेद चने, कभी कटहल या टमाटर आदि होते थे. एक सूखी सब्जी, चावल तथा रोटी होती थी. छाछ व मीठी चटनी भी अक्सर मिलती थी. भोजन के पश्चात एक घंटा विश्राम के लिए था. दोपहर एक बजे से पुनः साधना का क्रम शुरू होता जो दो बजे तक चलता. आधे घंटे के विश्राम के बाद फिर ढाई से साढ़े तीन बजे तक तथा पांच मिनट के विश्राम के बाद शाम पांच बजे तक पुनः चलता. लगातर इतने समय बैठा रहना व श्वास पर ध्यान देना इतना सरल कार्य नहीं था. सभी को पैरों में जगह-जगह पीड़ा होने लगती, आसन बदलते, धीरे-धीरे इधर-उधर पैरों को मोड़ते उसी स्थान पर किसी तरह स्वयं को सम्भाले बैठे रहते. आँख भी नहीं खोलनी थी, कुछ मिनट के प्रारम्भिक निर्देशों के बाद स्वयं ही ध्यान करना होता था. पुराने साधक आराम से बैठे रहते. आखिर गोयनका जी की आवाज आती, अन्निचा..एक पद बोलते और सत्र समाप्त होता. पांच बजे का घंटा राहत लाता, यह शाम की चाय का समय था. जिसके साथ कोई एक फल तथा मूड़ी दी जाती जिसमें दो-चार दाने मूंगफली के या भुजिया पड़ी होती. उसके बाद सभी शाम की हवा का आनंद लेते हुए टहलने लगते. धीरे-धीरे चलते हुए अपने भीतर खोये साधक अन्यों की उपस्थिति से बेखबर प्रतीत होते थे. सभी के मन का पुनर्निर्माण आरम्भ हो चुका था. छह बजे पुनः घंटी बजती और सात बजे तक ध्यान चलता. फिर पांच मिनट का विश्राम तथा उसके बाद गोयनकाजी का प्रवचन आरम्भ होता जो साढ़े आठ बजे तक चलता, जिसमें दिन भर में हुई साधना के बारे में तथा आने वाले दिन के लिए साधना के निर्देश दिए जाते तथा विधि को समझाया जाता. जिसके बाद पुनः पांच मिनट का विश्राम फिर रात्रि पूर्व का अंतिम ध्यान होता था.

नौ बजे घंटा बजता और जिन्हें साधना संबंधी कोई प्रश्न पूछना हो वह आचार्य या आचार्या से साढ़े नौ बजे तक पूछ सकते थे. शेष कमरे में आकर सोने की तैयारी करते. पर दिन भर ध्यान करने से सचेत हुआ मन नित नये स्वप्नों की झलक दिखाता. बीते हुए समय की स्मृतियाँ इतने स्पष्ट रूप से देखीं. जिनके साथ कभी मनमुटाव हुआ था उसका कारण जाना, जिसके सूत्र पिछले जन्मों से जुड़े थे, उनसे सुलह हो गयी. एक रात्रि तो हजारों कमल खिलते देखे. हल्के बैगनी रंग के फूल फिर रक्तिम आकृतियाँ...वह रात्रि बहुत विचलित करने वाली थी. आंख खोलते या बंद करते दोनों समय चित्र मानस पटल पर स्पष्ट रूप से चमकदार रंगों में आ रहे थे. ऐसी सुंदर कलाकृतियाँ शायद कोई चित्रकार भी न बना पाए. हरे-नीले शोख रंगों की आकृतियाँ बाद में भय का कारण बनने लगीं. उनका अंत नहीं आ रहा था. फिर कुछ लोग दिखने लगे. एक बैलगाड़ी और कुछ अनजान स्थानों के दृश्य. जगती आँखों के ये स्वप्न अनोखे थे. एक बार तो आँख खोलने पर मच्छर दानी के अंदर ही आकाश के तारे दिखने लगे, फिर उठकर चेहरे धोया, मून लाइट जलाई. रूममेट भी उठ गयी थी पर कोई बात तो करनी नहीं थी, सोचा आचार्यजी के पास जाए पर रात्रि के ग्यारह बज चुके थे. पहली बार घर वालों का ध्यान भी हो आया. जिनसे पिछले कुछ दिनों से कोई सम्पर्क नहीं था. फिर ईश्वर से प्रार्थना की (जिसके लिए मना किया गया था) तय किया कि कल से आगे कोई ध्यान नहीं करेगी. वह छठा दिन था. बाकी चार दिन सेवा का योगदान देगी. लगभग दो बजे तक इसी तरह नींद नहीं आयी, बाद में सो गयी. उस दिन सुबह चार बजे नहीं उठी, सोच लिया था अब आगे साधना नहीं करनी है. छह बजे मंगल पाठ के वक्त गयी. आधा घंटा बैठी रही. आठ बजे के ध्यान से पूर्व ही आचार्या से मिलकर जब सारी बात कही तो उन्होंने कहा, यह तो बहुत अच्छा हो रहा है, मन की गहराई में छिपे संस्कार बाहर निकल रहे हैं. इसमें डरने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. वे बोलीं, उसे तो फूल दिखे, किसी-किसी को भूत-प्रेत दीखते हैं तथा सर्प आदि भी. उन्होंने कहा, यदि भविष्य में ऐसा हो तो हाथ व पैर के तलवे पर ध्यान करना ठीक होगा उनकी बात सुनकर पुनः पूरे जोश में साधना में रत हो गयी. अगले दिन जब ऐसा हुआ तो कुछ भी विचित्र नहीं लगा, श्वास पर ध्यान देने व उनके बताये अनुसार ध्यान करने से सब ठीक हो गया. 

Tuesday, November 24, 2015

फूलों के पेड़


आज सुबह उठने में देर हुई. कपड़े प्रेस करते समय प्रेस में आग की हल्की सी एक लपट निकली, दिखानी होगी. घर के बाहर फूलों के पेड़ लगवाने के लिए गड्ढे खुदवाये और गुरूजी को सुना. कह रहे थे साधक को आत्मग्लानि से सदा बचना चाहिए. अपने मुक्त स्वभाव में रहना चाहिए, न प्रभाव में न अभाव में बल्कि अपने मूल स्वभाव में. जो प्रेम, शांति, करुणा और भक्ति का स्थान है, जहाँ न राग है न द्वेष और वही वास्तव में वह है. कल शाम टहलते हुए वे नन्हे के मित्र से मिलने गये पर घर बंद था. एक सखी से फोन पर बात हुई, वे लोग हिमाचल की यात्रा पर हैं. कल एक सखी ने फोन किया सत्संग के बारे में, वह उत्साही है बस अपने मुख से अपना बखान करती है थोड़ा सा, उसकी सहयोगी है बच्चों के कार्यक्रम अंकुर में.

आज चिदाकाश के बारे में सुना, जिसे बुद्ध शून्य कहते हैं. वह प्रकाश भी नहीं है, रंग भी नहीं और ध्वनि भी नहीं, इसे देखने वाला शुद्ध चैतन्य है, जो आकाश की तरह अनंत है और मुक्त है. जो कुछ भी दिखाई पड़ता है या अनुभव में आता है वह सब क्षणिक है, नष्ट होने वाला है पर वह चेतना सदा एक सी है. मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म शरीर में होकर उसका अनुभव किया जाता है बल्कि वही अनुभव करता है. मन के द्वारा वही सुख-दुःख भोगता है, जब तक कोई उसे मन से पृथक नहीं देख पाता. अधिक से अधिक साधक को उसी में टिकना है. आनन्द स्वरूप उस चेतना में साधक जितना-जितना रहना सीख जायेगा, मृत्यु के क्षण में उतना ही शांत रहेगा. आगे की यात्रा ठीक होगी. ध्यान में साधक उसी में टिकता है या टिकने का प्रयास करता है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न मन, न बुद्धि, न कोई देखने वाला, न दृश्य, न कोई संवेदना, केवल शुद्ध चेतना !

आज गुरूजी ने बताया कि जब साधक से कोई भूल हो जाये तो उसे प्रायश्चित करना चाहिए. गुरु के साथ आत्मा का संबंध, हृदय का संबंध बनाना चाहिए, शरीर व मन दोनों से परे है गुरु ! माँ शारदा कीं कथा पढ़ी, अद्भुत कथा है. ईश्वर चारों ओर न जाने कितने रूपों में है, वे ही उसकी ओर नजर नहीं डालते !

उसे अब समझ में आने लगा है, बोलते समय वाणी के साथ भीतर की तरंगें भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर होगी तो तरंगें प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जाएँगी, और यदि भीतर कटुता है, खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी के पहले तरंगे वही लेकर जाएँगी. वाणी का असर नहीं होगा, बल्कि बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो तभी तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा तभी हो सकता है जब कोई उस जगह रहना सीखे जहाँ कोई विक्षेप नहीं, जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर वर्तमान की सुखद वायु बहती है, मन से परे आत्मा के उस आंगन में अपना निवास बनाना है जहाँ प्रेम आनन्द और शांति के सिवा कुछ है ही नहीं. जब जरूरत हो तब चित्त, बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट आयें. तब विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी, ऐसे में वह शक्ति जो अभी व्यर्थ सोचने, बोलने में चली जाती है, बचेगी, ध्यान में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वत ही होने लगेगा.     




Wednesday, January 7, 2015

दीवाली का उजास


बाबाजी कहते हैं, साधक का परम लक्ष्य स्वयं के केंद्र तक पहुँचना है, बाहर के खेलों में उलझना नहीं, जितना-जितना वे ध्यानस्थ होते जाते हैं उतना-उतना ईश्वर के प्रेम के अधिकारी बनते जाते हैं. पंचभूतों से निर्मित देह धीरे-धीरे उन्हीं में विलीन होता जाता है पर जीवात्मा परमात्मा का अंश है, जो शाश्वत है, ज्ञान और प्रेम स्वरूप है. दीवाली हो या कोई अन्य त्योहार, सारे पर्व उसी शाश्वत स्वरूप की याद दिलाने आते हैं. एक रस जीवन जीते-जीते कभी-कभी उदासीनता का भाव आने लगता है, सत्, चित्, आनंद से उत्पन्न हुए वे त्याग के द्वारा पर्वों पर अपने आप से जुड़ते हैं. स्वच्छता, दीप जलाना, नई वस्तु लाना और सभी के साथ भोजन करने का अर्थ है अपने हृदय को स्वच्छ करना, ज्ञान का दीपक जलाना और प्रेम का प्रसाद बांटना ! मूल को पाने का संकल्प दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता जाये यही प्रार्थना उत्सव पर करनी है ! छोटी ननद ने बताया उनके शहर में बाबाजी आये हैं. वे लोग गये थे, ननदोई जी ने चार दिन सेवा की. संत के दर्शन सदा हितकारी होते हैं. उस दिन गोहाटी में गुरूजी की वह प्रेमिल दृष्टि उसे कभी नहीं भूलेगी. उस दृष्टि में उनका आशीष था जो ईश्वर उसके अंतर में अपनी झलक दिखाते हैं ! कल ध्यान में एक नया अनुभव हुआ उसके सिर के ऊपरी भाग में अद्भुत शीतलता का अहसास हुआ, सिर में आवाजों का आना भी जारी है.

कल दीवाली का उत्सव सम्पन्न हो गया, उनके यहाँ बहुत लोग आये, भोजन साथ-साथ किया. तीनों सखियाँ कुछ बनाकर भी लायी थीं. आज मौसम खुशनुमा है. टीवी पर आत्मा आ रहा है, वाचक ईश्वर के अभय रहने के संदेश का वर्णन कर रहा है. आज म्यूजिक सर भी आयेंगे. उन्हें दिगबोई भी जाना है, नन्हे के अध्यापकों से मिलना है. उसकी पढ़ाई जिस जोश से चलनी चाहिए थी वह दीख नहीं रहा है. अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक का फोन आया गेस्ट हॉउस से, वह तेजपुर की उन वृद्धा साधिका से बात करना चाहते थे. वे उन्हें माँ की तरह मानते हैं बल्कि माँ ही मानते हैं. आज वे उनके यहाँ आ रहे हैं दोपहर को. उसे चने की दाल, पालक पनीर, शिमला मिर्च, गोभी का परांठा और कुछ मीठा बनाना है.

बुद्धि का फल अनाग्रह है, कभी भी तर्क आदि के द्वारा अपनी बात को ऊपर करना स्वयं को साधना के पथ से विचलित करना है, यदि वह गलत है तो दूसरे का आभारी होना चाहिए और यदि वह सही भी है तो निंदा से दुखी नहीं होना होना चाहिए. कल दोपहर को योग शिक्षक उनके यहाँ आये, उन्हें भोजन पसंद भी आया, तारीफ़ करने में वह संकोच नहीं करते. कल शाम वे क्लब गये, योग का छोटा का कार्यक्रम था, उनकी बातें मन को छू लेती हैं. कल शाम से ही उसका मन भावातीत अवस्था में है. ईश्वर जैसे कहीं निकट ही हैं. अधर मुस्काते–मुस्काते थक गये हैं पर रुक नहीं रहे हैं, वैसे भी एक बार ईश्वर को मन में स्थान मिल जाये तो वह उसे छोड़ता नहीं है. वे ही इतर कार्यों में व्यस्त होकर उसे भूल जाते हैं. ईश्वर प्रेम, शांति और आनंद स्वरूप है, और इस वक्त प्रेम, शांति और आनंद की फुहार उसके अंतर में बरस रही है. ज्ञान से अभी दूर है लेकिन जब हृदय प्रेम से लबालब भरा हो तो और किसी के लिए स्थान कहाँ रह जाता है. बुद्धि यदि आत्मा से जुड़ी हो यानि धैर्ययुक्त हो तो मन अज्ञानी नहीं रह जाता. ‘नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात’ ! अभी-अभी एक सखी से बात की, उसके पति इस बात के खिलाफ हैं कि कोई उनके यहाँ कुछ बनाकर ले जाये, एक दूसरी सखी से उसकी इस बारे में बहस भी हो गयी. वे जीवन को कितना जटिल बना लेते हैं जबकि वह कितना सरल है. जीवन में ईश्वर का ज्ञान हो तो जीना आसान हो जाता है. अपने मन के विकारों को लम्बी छुट्टी पर भेजना होगा तब चित्त में कृष्ण होंगे, कृष्ण जो उनके नितांत अपने हैं !  




Friday, December 5, 2014

खुद से मुलाकात


कल “आर्ट ऑफ लिविंग” का पहला दिन था, उनके शिक्षक बंगाली हैं, अति सहजता से उन्होंने सिखाया. उज्जायी प्राणायाम भी किया, इसके अतिरिक्त मुस्कुराने के लाभ, अपने आस-पास के लोगों से मिलना, समय की पाबंदी और जो भी कार्य करें अपनी शत-प्रतिशत ऊर्जा उसमें लगा देनी चाहिए, आदि बताया. मानव अपनी  ऊर्जा का कुछ प्रतिशत ही कार्य में लाता है. आज भी ‘जागरण’ में सुंदर वचन सुने, ईश्वर की परम चेतना के अनुसार यदि उसकी लघु चेतना हो जाये तो मन स्थिर हो सकता है. जगत की वस्तुओं में यदि मन को लगायें तो मन अस्थिर रहता है, क्योंकि वस्तुएं तो बदल ही रही हैं, मन भी प्रतिक्षण बदल रहा है. स्थिर है तो केवल परमात्मा..मानव का अंतिम लक्ष्य तो वही है और वह भीतर है, कहीं दूर जाना नहीं. प्रेम ही उस तक पहुँचने का मार्ग है. अपने अंतर को कोई इतना प्रेम से भर ले कि दूसरी किसी बात के लिए स्थान न रहे, आस-पास के वातावरण को, लोगों को अपने आप इसका भास होने लगे. कहीं कोई काँटा न रहे, कोई उहापोह न रहे. परमात्मा  यही तो चाहते हैं, वह कहते हैं कि उन्हें भी साधक का उतना ही ख्याल है जितना साधक को उनका. वह साधक का कुशल-क्षेम वहन करने को तत्पर हैं, सिर्फ उसे ही अपने बन्धनों को तोडना है, बंधन जो अज्ञान के हैं, मोह और अविद्या के हैं. तीनों गुणों के हैं. उसे शुद्ध स्तर पर मन को ले जाना है, तभी भक्ति व ध्यान सफल होगा.

जो अपने आप में संतुष्ट रहता है, उसके आनंद का स्रोत ईश्वर होता है न कि संसार के विषय. वही स्थितप्रज्ञ है, आत्मानंदी ही ऐसा कर सकता है. कल कोर्स की दूसरी क्लास थी. शिक्षक बेहद मृदुभाषी हैं और सहज रहते हैं. ज्ञान का भंडार सबके भीतर है उसे वह उजागर करने में सहायक हैं ऐसा उन्होंने कहा. कई उदाहरणों तथा कहानियों के माध्यम से अपनी बातों को स्पष्ट किया. कल जून और वह लगभग आठ बजे वापस आये. नन्हा ठीक था, वह अकेले रहना पसंद करता है शायद उसकी तरह. उसे सुबह उठकर बात करना भी पसंद नहीं है, चुपचाप बिना मुस्कुराये अपना काम करता रहता है. वे उसे बदलने का प्रयास व्यर्थ ही करते हैं. आज भी वह छह बजे ही स्कूल चला गया. गुरू माँ तथा बाबाजी दोनों से भेंट हुई, दोनों ने यही कहा कि भौतिक वस्तुओं में आनंद खोजने जायेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी. ‘आत्मा’ में भी सुना, सच्चे आनंद का स्रोत मानव स्वयं ही है. उसे अपना साथ जब भला लगता है तभी वह खुश होता है. सुबह प्राणायाम भी किया, अच्छा लगा. इस कोर्स के बाद उसके बहुत से सवालों के जवाब उसे मिल जायेंगे, she hopes so... और सबसे अच्छी बात यह है कि उसके साथ जून हैं इस कोर्स में. वे पहली बार साथ-साथ घर से बाहर जाकर कुछ कर रहे हैं और यह उनके बंधन को और सुदृढ़ करेगा. उन्हें द्वंद्व से ऊपर उठना है और वह है स्थित प्रज्ञ की स्थिति !

“निर्भय बनना है, सत्व एवं शुद्धि को बढ़ाना है, तभी ज्ञान में स्थिति रहेगी ! चित्त में समता लानी है. सभी के साथ सौजन्य एवं मधुरता का व्यवहार करना है’ ! सुबह सुने  ये वचन उसके मन में गूँज रहे थे, जब वह कक्षा में गयी. कल उसे एक अलौकिक अनुभव हुआ. art of living का चौथा दिन था. कुछ ज्ञान की चर्चा करने के बाद शिक्षक ने उज्जायी, भस्त्रिका करने के बाद ‘सुदर्शन क्रिया’ कराई जिसमें श्री श्री रविशंकर जी की वाणी में, जो बहुत मधुर थी, ‘सोहम’ का उच्चारण किया गया था और उसके साथ श्वास लेनी व छोड़नी थी. कुछ देर तक तो वह अपने मन को देख रही थी, वह कुछ सोच रहा था पर बाद में मन दूर चला गया, हाथ-पाँव की सुध भी जाती रही. पूरे शरीर में रोमांच तो हो ही रहा था फिर अचानक आँसूं आ गये. क्रिया चलती रही और तभी उसके मस्तक से निकलती हुई या उसकी ओर आती हुई प्रकाश की चमकदार रेखा दिखी, जो बहुत तीव्र थी और मोटी भी थी. विभिन्न रंग भी दिखे और उस क्षण ऐसा लगा कि उसने कुछ पा लिया है. अब जग में कुछ भी पाना शेष नहीं है इस भाव के आते ही उसका रुदन और बढ़ गया पर कुछ ही क्षणों में नया विचार आया कि अब तो ईश्वर उसके साथ है अब सब उसी पर छोड़ देना चाहिए और फिर वह हँसने लगी. स्वर्गिक हास्य था, वह क्षण उसका सर्वाधिक सुखद क्षण था. सम्भवतः इसी को परमानन्द कहते हैं या आत्मानंद कहते हैं. उसके बाद निर्देश मिलते रहे. धीरे-धीरे वह सामान्य अवस्था में आ गयी पर उस क्षण से अब तक एक सुखद अनुभुति उसके पोर-पोर में छाई हुई है. उसके चेहरे पर अनोखी मुस्कान है ! उसने स्वयं को देख लिया है !


पौधों का घर


आज गणेश चतुर्थी है, यहाँ यह ‘गणेश पूजा’ के रूप में मनायी जाती है. जिसमें सार्वजनिक पंडाल लगाये जाते हैं, कुछ लोग मिलकर किसी के घर में भी मूर्ति की स्थापना करते हैं. आज छोटे भाई का जन्मदिन भी है, पर माँ की स्मृति में वे लोग नहीं मना रहे हैं, माँ जहाँ भी होंगी उनका आशीष भाई के साथ होगा. ‘आत्मा’ में अभी-अभी बताया “जिनकी बुद्धि एकनिष्ठ नहीं होती, अनेक शाखाओं में विभक्त होती है, उन्हें कहीं ठौर नहीं है, और एकनिष्ठ बुद्धि वाले को कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है”. जून को आज फ़ील्ड जाना है, नन्हा पढ़ने गया है. कल उन्होंने गोभी की पौध के लिए बीज डाले थे. माली को डर था कि तेज वर्षा हुई तो सारे बीज बह जायेंगे सो उसने एक शेड बनाया, सुबह वे उठे तो वाकई तेज वर्षा हो रही थी.

आज नन्हा सुबह छह बजे ही स्कूल चला गया, हिस्ट्री की एक्स्ट्रा क्लास के लिए. वे सभी जल्दी उठे, इसलिए अभी साढ़े सात ही बजे हैं और वह तैयार है. कल वे ‘गणेश पूजा’ देखने गये. शाम को चार पत्र लिखे. बाबाजी ने कहा, साधक के दुःख का कारण राग-द्वेष ही है. उसे लगा वह ठीक कह रहे हैं क्योंकि जब भी वे सांसारिक विषयों के बारे में बात करते हैं तो हानि-लाभ की तराजू में तोलकर करते हैं. अपने विषय में बात करते हैं तो विषाद या आत्मप्रशंसा के भाव के अलावा कोई तीसरा भाव नहीं आता. दूसरों के बारे में बात करते हैं तो निंदा या स्तुति के भाव से घिरे रहते हैं. अर्थात राग-द्वेष कभी पीछा नहीं छोड़ता. सर्वोत्तम यही है कि साधक बातचीत के लिए ऐसे विषयों का चुनाव करे जो भगवद् भाव से जुड़े हों क्योंकि शेष से कोई आत्मिक लाभ नहीं होगा, मात्र क्षणिक सुख की प्राप्ति होती है, वह भी बाद में दुःख का कारण बनती है. मौन रहना असत्य वाचन से श्रेष्ठ है और मन में प्रयोजन हीन विचारों को न उठाना तो अतिश्रेष्ठ है. यह जीवन तो ईश्वर का उपहार है, वही इसे चलाता, पोषता और सम्भालता है, फिर भी कोई कैसे कहता है कि उसके पास साधना के लिए समय नहीं है, सारा समय भी तो उसी का है. पहला अधिकार तो उसी का हुआ न, एकमात्र वही है जो हर पल साथ रहता है.

आज ‘ध्यान’ का एक सूत्र देते हुए गुरू माँ ने कहा कि सत्संग में सुने वचनों पर मनन करते-करते जब मन ठहरने लगे तो मानसिक मौन धारण कर लेना चाहिए या फिर अपने इष्ट की ध्यानस्थ मुर्ति की कल्पना करें और वैसा ही भाव अपने हृदय में लायें, धीरे-धीरे चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगती हैं. तब पिछले कर्म बांध नहीं सकते, बीता हुआ समय, बीते कार्य वर्तमान को प्रभावित नहीं कर सकते. जो बीत गया वह मृत है, अतः मन पर बिना किसी अपराध बोध को रखे नित नये जीवन का स्वागत करना चाहिए !

नन्हा आज बंद के कारण स्कूल नहीं गया, जबकि जून गये हैं. जागरण में सुने वचन हृदय को गहराई तक छू गये हैं. ईश्वर को पाना कितना सरल है, कितना सहज..जैसे श्वास लेना, लेकिन वे सही ढंग से श्वास लेना भी तो नहीं जानते, उथली श्वास लेते हैं जो उथले विचारों की दर्शाती है. श्वास के प्रति जागरूक रहने से कोई वर्तमान में रह सकता है अन्यथा भूत तथा भविष्य की कल्पनाएँ पीछा नहीं छोड़तीं. बाबाजी ने सरल उपाय बताया, ‘प्रतिक्षण श्वास को आते-जाते देखते रहें , सुबह उठकर तन को पहले खींचे फिर ढीला करें. ईश्वर को याद करें और दिन भर के महत्वपूर्ण कार्यों पर नजर डालें, फिर बिस्तर छोड़ें और दिन भर में हर एक घंटे बाद उस परम शक्ति को याद करते हुए दिनचर्या का पालन करें और रात्रि को भी गहरी श्वास लेकर सोयें.’ यह अनुपम जीवन प्रेम की भावना का अनुभव करने के लिए मिला है, अपने सहज रूप में रहते वक्त ही  कोई शांत रहता है, अधरों से गीत अपने आप फूट पड़ता है, जैसे पंछियों के गीत ! कल कविता की डायरी देखी, एक महीने से ज्यादा हो गया है लिखे हुए, उसकी कवितायें वापस आयीं तो लगा स्तरीय नहीं है, लेकिन उनका महत्व उसके स्वयं के लिए तो सदा है, किसी एक दिन स्वतः ही प्रेरणा जगेगी और शुष्क हो गये कविता कूप में फिर से जल छलकेगा. कल दोपहर ‘हंस’ पढ़ती रही, कुछ कहानियाँ बहुत अच्छी थीं. आज सुबह से वर्षा हो रही है. मौसम ठंडा हो गया है. नन्हे के पैर में दर्द अभी ठीक हुआ है.  



Monday, November 10, 2014

अनुपम खेर और बच्चे


गुरू एक डाकिया है जो ईश्वर और मानव के बीच एक माध्यम है जो ईश्वर की सत्यता का परिचय मानव से कराता है, ऐसा उसे लगता है, रोज सुबह टीवी के माध्यम से गुरु आते हैं और प्रेरणादायक संदेश देते हैं. आज सुबह दीदी का इमेल आया, छोटी बुआ की तबियत ठीक नहीं है, पिता वहाँ गये हैं. बुआ का जीवन बचपन से बेहद संघर्षमय रहा है, माता-पिता ने बड़ी उम्र में बेटी को जन्म दिया, शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया, वही उनकी सेवा में लगी रही. विवाह भी हुआ तो बड़े संयुक्त परिवार में. कुछ वर्ष बाद पति के साथ अलग रहीं पर उन्हें फालिज का अटैक हुआ और पति उन्ही पर निर्भर हो गये. अंततः वे विधवा हो गयीं. नौकरी करके बच्चों को पढ़ा रही हैं पर बेटा दो बार फेल हो गया. इसी गम में शायद अस्वस्थ हो गयी हैं. मनोवैज्ञानिक को दिखाना पड़ा है. उनके बेटे से अभी  फोन पर बात की काफी ठीक-ठाक संयत भाषा में जवाब दिए, बच्चों की अपनी एक दुनिया होती है इस उम्र में, वह माँ-बाप को उसमें एक सीमा तक ही प्रवेश करने देते हैं. कल उसने आम का आचार बनाया, जून और नन्हे ने भी पूरा योगदान दिया.

साधक को पग-पग पर अपने व्यवहार को आचरण की कसौटी पर कसना चाहिए. अपने मन के वस्त्र को धोते-धोते कहीं यह और गंदा न हो जाये, अभिमान की धूल न उस पर लग जाये. पानी पीते हुए भी यदि प्यास नहीं बुझती, तो इसका अर्थ है पानी नहीं पीया होगा. इसी तरह मन में ईश्वर को धारण करते हुए भी यदि आनंद नहीं है तो अर्थ है कि...कल सुबह उसकी संगीत अध्यापिका के पतिदेव का फोन आया आठ दिन बाद होने वाले एक हिंदी नाटक में उसे अभिनय के लिए कहा है. जून भी मान गये हैं. कल शाम उसे जाना था पर उसी समय एक मित्र परिवार मिलने आ गया.

आज बाबाजी ने मंत्रों की महत्ता पर प्रकाश डाला. गायत्री मंत्र का महत्व सबसे अधिक है. ‘ओं नमो नारायण’, ‘ओं नमो भगवते वासुदेवाय’ तथा ‘ॐ नमो शांति शन्ति शांति’ का जाप भी फलदायक है. उन्होंने नींद लाने के लिए, पाचन शक्ति के लिए भी मंत्र बताये जो उसे याद नहीं हुए. कल शाम को रिहर्सल ठीक-ठाक ही रही, अभी नाटक प्रारम्भिक स्टेज पर है, सिर्फ एक हफ्ते का समय है. आज पड़ोसी और उनके बेटे को लंच पर बुलाया है, पड़ोसिन नहीं है कुछ दिनों के लिए. कल जून को चेक मिल गया जिसे जमा करके उन्हें मकान के पेपर्स मिल जायेंगे.


आज ग्रीष्मावकाश के बाद नन्हे का स्कूल पुनः खुला है. गर्मी पूर्ववत है, उसने सफाई के कार्य को टाल दिया है, दोपहर को नैनी की साड़ी में पीको करना है. नाटक की रिहर्सल कल भी ठीक रही, उसे डायलाग याद हो गये हैं लेकिन उनमें जान डालनी होगी. ‘जागरण’ में गोयनका जी का प्रवचन सुना, विपासना समझ में तो खूब आती है और जब भी अभ्यास किया है लाभ भी हुआ है लेकिन नियमित नहीं, बाबा जी मंत्रोच्चार पर आज भी जोर दे रहे थे. आज ध्यान से पहले इसे भी करना है लेकिन उसे एक रास्ता पकड़ना चाहिए एक साथ दो नावों में पैर रखने से डूबने का खतरा ही ज्यादा है. धूप धीरे-धीरे कम हो रही है, शायद वर्षा होगी. कल शाम वे एक मित्र की बेटी को देखने गये, जो अस्वस्थ है. वहाँ अनुपम खेर के साथ बच्चों का एक कार्यक्रम देखा, बहुत अच्छा लगा. दीदी को इमेल भेजना था पर सर्वर काम नहीं कर रहा है. 

Tuesday, September 2, 2014

अस्पताल में


नन्हे का होमवर्क अभी भी खत्म नहीं हुआ है, उसका स्कूल अगले हफ्ते खुल रहा है. आज सुबह एक अच्छी बात सुनी, यदि किसी को आध्यात्मिक उन्नति करनी है तो अपनी आस्था, निष्ठा और श्रद्धा को एक बिंदु पर केन्द्रित करना होगा, भटकाव कहीं पहुंचने नहीं देगा, जैसे कोई किसान अपने खेत में जगह-जगह गड्ढे खोदता है, उसका विश्वास डगमगाता रहता है और इस तरह कुआँ कभी पूरा नहीं हो पाता. इसी तरह साधक कभी योगी, कभी भक्त, कभी वेदांती, कभी उपासक बन जाता है, उसकी निष्ठा एक तरफ न होकर अनेक ओर बिखर जाती है. उसका लक्ष्य कभी नहीं मिलता. ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव वह क्षणिक रूप से तो करता है पर सदा उसी में अनुरक्त नहीं रह पाता.

आज के दिन की शुरुआत जून से फोन पर बात के साथ हुई, नैनी आज फिर छुट्टी पर है सो सुबह के काम करते-करते ग्यारह बज गये हैं, आज दोपहर को वह सखी अपने बेटे के साथ आएगी. पड़ोसिन का फोन आया, आजकल वह उसका ज्यादा ध्यान रखने लगी है. जब से उसे सूट लाकर दिया है, लिखकर वह मुस्कुरा दी. आज का प्रवचन करुणा और मैत्री पर था. सुनते समय कई उद्दात भाव हृदय में उठते हैं, संवेदनशीलता, करुणा, सहानुभूति और मैत्री. यही गुण मानव को मानव बनाते हैं. छोटी बहन से बात हुई, उसे बच्चों से अलग रहना मान्य  नहीं, चाहे बीच-बीच में परेशानी खड़ी हो, फ़िलहाल उसकी फील्ड ड्यूटी नहीं है. ‘योग वशिष्ठ’ में श्रीराम की जीवनचर्या का, उनके विषाद का वर्णन पढ़कर मन अभिभूत हो जाता है. रात को वह श्री अरविंद का ‘वेद रहस्य’ पढ़कर सोती है, अभी तक भूमिका ही चल रही है. 

आज उनका फोन डेड है सो जून से बात नहीं हो सकी, वह अवश्य ही प्रतीक्षा कर रहे होंगे. सुबह एक बार तो नींद खुल गयी पर वह पंछियों की आवाजों को सुनने का प्रयत्न  करने लगी, उसी समय हल्का उजाला भी खिड़की से स्पष्ट होने लगता है. सुबह ही सुबह लेडीज क्लब की एक सदस्या का फोन आया, उन्होंने शाम को बुलाया है. ‘हसबैंड नाईट’ के कार्यक्रम के लिए हिंदी में ‘नवरस’ पर कुछ लिखना है, ऐसा उन्होंने कहा. ‘जागरण’ सुना पर मन स्थिर नहीं रह पाया, कभी पढ़े साहित्य के नवरसों में डूबने लगा. महाकुम्भ पर समाचार देखे, दुनिया का विशालतम धार्मिक मेला कुम्भ करोड़ों लोगों के आगमन से सभी के आकर्षण का केंद्र बना है. मेले की व्यापकता का अनुमान लगाना कठिन है. भविष्य में कभी अवसर मिला तो वह अवश्य जाएगी. विदेशी पर्यटकों को योगासन करते व संगम में डुबकी लगाते देखना एक अनोखा अनुभव था. नागा साधुओं का जुलुस भी शोभनीय था. सदियों से यह मेला हिन्दुओं की आस्था का प्रतीक बना हुआ है, ईश्वर की अनोखी कृतियों में यह भी एक है. दोपहर को वह बच्चा आयेगा, पढ़ने में अच्छा है, उसका लेख भी स्पष्ट है.  

कल रात वे सो चुके थे, पता नहीं कितने बजे होंगे, फोन की घंटी बजी, उसने फोन उठाया पर उधर से कोई आवाज नहीं आई. अजीब सी बेचैनी मन पर छाई थी. कुछ देर बाद पुनः घंटी बजी तो उसने जानबूझकर फोन नहीं उठाया. फिर फोन शांत हो गया. कोई बुरी खबर होगी, इसका भी अंदेशा था, अजीब से ख्यालों ने मन को घेर लिया था. रात के सन्नाटे में धीमी आवाजें भी स्पष्ट सुनायी देती हैं. जून के बिना रात डरावनी लग रही थी. ईश्वर भी कहीं दूर चले गये थे, ईश्वर जिसको दिन में अपने आस-पास ही महसूस करती है. फिर पता नहीं कब सो गयी. नन्हा दूसरे कमरे में आराम से सोया था. सुबह फिर फोन की घंटी से ही नींद खुली, बड़ी भाभी का फोन था, माँ अस्पताल में हैं. वे लोग शताब्दी से घर जा रहे हैं. जून से बात हुई तो पता चला, वह भी यहाँ न आकर उनके साथ ही जा रहे हैं. उन्होंने कहा, वहाँ पहुंचकर खबर देंगे.