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Thursday, June 22, 2017

पौधों की आँखें


जून कल गोहाटी गये हैं, आने वाले कल दिल्ली जायेंगे. अभी कुछ देर पहले फोन आया उनका. सवा पांच बजे हैं, कुछ देर में प्राणायाम सीखने माली का पिता और उसकी दो पोतियाँ आयेंगी, अब उन्हें आते हुए एक हफ्ते से ज्यादा समय ही हो गया है. छह बजे से भजन है. नैनी के यहाँ से भी भजनों की मधुर आवाज आ रही है. आज दो सखियों से बात की. कल क्रिसमस है, एक अन्य से कल करेगी. सुबह उठी तो सिर में दर्द था, जो अभी तक बना हुआ है, पर बीच-बीच में गायब हो जाता है. देहभाव जब हट जाता है तभी शायद महसूस नहीं होता होगा. ठंड बढ़ गयी है, पर इस वक्त फायर प्लेस में आग जल रही है, कमरा गर्म है. दीदी से फोन पर बात हुई, देहरादून में भी ठंड है, सुबह वह देर से उठने लगी हैं. छोटे भाई का फोन देवप्रयाग से आया, वह आज गोपेश्वर जा रहा है, ऐसा उसने कहा. वर्षों पूर्व उसने वहाँ की रामलीला में अभिनय किया था. इतने वर्षों बाद भी लोगों को याद था. उसका अभिनय सराहा गया था.

अज क्रिसमस है, बादल हैं, मौसम ठंडा है. सूरज जल्दी अपने घर चला गया है. आज वह नर्सरी गयी थी, कुछ फूलों के पौधे लिए. शायद एक महीने बाद इनमें फूल आयें. रंग-बिरंगे फूल जो पौधों की आँखें हैं ओशो के अनुसार, जिनसे वे जगत को निहारते हैं. वह जब अस्तित्त्व को निहारती है, तो वह एकाएक कितना मुखर हो उठता है. एक कोहरे जैसा श्वेत धुआं सा उठने लगता है. घास कितनी सुंदर हो जाती है, चमकदार और जैसे कोई तिलस्म घट रहा है, परमात्मा कितना सुंदर है और उनके चारों ओर है, भीतर की शांति गहराती जा रही है, एक अनोखा जगत छिपा है, इसी जगत के भीतर जिससे वे अनजान ही बने रहते हैं. समाधि का अनुभव कैसा होता है यह तो नहीं मालूम, लेकिन एक अनोखी शांति इस बार उसने अनुभव की है. जून का बाहर जाना भी शायद परमात्मा की इस लीला का एक हिस्सा है. उनके रहते ध्यान इतना घर नहीं हो पाता, अब लगातार दो घंटे बैठना सम्भव है. सद्गुरु की कृपा का अनुभव भी हर क्षण होता है.

नया वर्ष आरम्भ हो चुका है. आज दूसरा दिन है. परसों वे यात्रा पर गये. उससे पूर्व ही तैयारी करते समय ज्ञात हुआ अभी भी मन प्रतिक्रिया करने से बाज नहीं आता, अपने को ऊपर रखने से भी और स्वयं को सही सिद्ध करने से भी, आश्चर्य करने के सिवा और किया क्या जा सकता है. परमात्मा का इतना-इतना प्रेम पाकर भी ऐसा होता है तो..वैसे जिन लोगों के साथ बर्ताव करना होता है उन्हें परमात्मा की खबर कहाँ है ? शायद सहज रूप से सभी के भीतर से जो भी आता है उसे ही परमात्मा का इशारा समझ कर स्वयं को साधना में आगे बढ़ते देना है. कृष्ण इसलिए ही गीता में कहते हैं, प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह के उत्पन्न होने पर भी जो सम रहता है वही मुक्त है. जो ‘है’, उस पर ध्यान देना है, जो ‘नहीं’ है उस पर नहीं, तो है ही सब कुछ घेर लेगा. परमात्मा भरपूर है, हर जगह है.. हर समय है... वही उसके द्वारा काम कर रहा है. आज इस क्षण यह बात स्पष्ट हो रही है. परमात्मा उसकी वाणी, उसकी लेखनी, उसके रग-रग में समा गया है. वह उससे दूर नहीं है, वह उसीमें है. वह उसे अपनी बाँसुरी बना ले..अपनी कठपुतली.. अपनी आवाज..अपना संदेश...अपना बना ले, बस इतना ही काफी है..वही ऋत है..वही धर्म है..वही सत्य है..वही नियम है..वही है..वही है..!


Thursday, January 5, 2017

हाथ में माउस


दोपहर के दो बजने को हैं. किचन में सफेदी हो रही है. बाहर लॉन में नया माली घास काट रहा है. उसके दाहिने हाथ में हल्का सा दर्द कभी-कभी महसूस होता है, माउस पकड़ने का प्रभाव लगता है. आज ब्लॉग पर नई कविता पोस्ट की है. कुछ दिन से वह दिखाई नहीं दे रही थीं, पता चला ब्लौगर रश्मिप्रभा जी का किडनी का आपरेशन था वापस घर आ गयी हैं. उसने प्राणायाम पर बी के एस आयंगर जी की पुस्तक पढ़नी शुरू की है.

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, उन सबके भीतर एक मार्गदर्शक है जो पग-पग पर उन्हें रास्ता दिखता है पर वे दिमाग पर ज्यादा भरोसा करते हैं और उसकी आवाज को अनसुना कर देते हैं. भय होने पर वही उन्हें सचेत करता है और कोई आवश्यक कार्य यदि वे भूल गये हों तो वही याद दिलाता है. वह उनका सद्गुरू भीतर ही रहता है. वही परमात्मा का दूत है. उस दिन अपने भीतर से आती एक आवाज सुनी थी कि वह अस्वस्थ होने वाली है और आज सुबह कंघी करते समय दाहिने हाथ में पीड़ा का अनुभव हुआ, शायद कम्प्यूटर पर गलत तरीके से माउस पकड़ने के कारण ऐसा हुआ हो या केवल हाथ की मांसपेशियों के ज्यादा उपयोग करने के कारण ही. एक्सरे भी कराया है. माली गमले धो रहा है, जिसमें वे गुलदाउदी के पौधे लगायेंगे. नैनी की बेटी पिताजी के साथ खेल रही है. सवा साल की बच्ची और बयासी साल के वृद्ध की मित्रता देखते ही बनती है. नार्वे में हुआ हत्याकांड तथा बमविस्फोट कितना भयानक था. उस दिन दीदी से बात हुई, कुछ लिखा भी था, जिसे टाइप करना शेष है.

शाम को सेंटर में क्रिया है. अगले महीने रूद्र पूजा है, इस बार वे पूरे परिवार की ओर से पूजा में भाग लेंगे. सभी को आशीष मिलेगा, मिल ही रहा है, वे उसे पहचानने में सफल होंगे. जून को मनाना होगा, लेकिन वह अपनी बुद्धि पर ज्यादा भरोसा करते हैं. कल सेंटर में एन ई एपेक्स बॉडी का सेमिनार है, वहाँ भी वह जाएगी एक सखी के साथ, सम्भव हुआ तो. भगवद गीता में पढ़ा, अहंकृत भाव ही बंधन का कारण है. कुछ होने की जगह यदि कुछ भी न होने का भाव रहे तो कोई बंधन नहीं है. आत्मा न कर्ता है न भोक्ता है. मन ही कर्मों का जाल रचता है और दुःख पाता है. परमात्मा उसे अपनी ओर खींच रहे हैं. एक-एक करके भीतर से सब वासनाओं को निकालने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.


जून आज नुमालीगढ़ गये हैं. पिताजी ने कहा, उन्हें केश कटवाने हैं. गाड़ी मिल सकती हो तो वे जायेंगे. उसका संकोच देखकर वह पैदल ही बाजार जाकर कटवा आए हैं. मन में जो विचार एक बार आ गया उसे पूरा करना ही है. यही स्वभाव जून का भी है. एक बार जो संकल्प आ गया उसे पूर्ण किये बिना चैन नहीं आता. नूना के संकल्पों में इतना बल नहीं है. मौसम आज भी सावन का है. कल शाम को जून ने मालपुए बनाये, तीज की प्रतीक्षा उनसे नहीं हो सकी. कल शाम नन्हे से बात हुई अब उनकी कम्पनी में इक्कीस लोग हो गये हैं. 

Thursday, October 27, 2016

महिला आरक्षण विधेयक


महिला आरक्षण विधेयक, आजादी की ओर बढ़ते कदम कल उपरोक्त विषय पर नेट से देखकर कुछ लिखा. एक सखी भी आई थी, उसने भी कुछ बातें बतायीं. महिलाओं में यदि शिक्षा, जाग्रति, देशभक्ति तथा जनसेवा की भावनाएं न हों तो राजनीति में उनके प्रवेश करने मात्र से कोई विशेष लाभ नहीं होगा ऐसा उसका मानना है. पिछले दस वर्षों से इस विधेयक को पारित करने के प्रयास हो रहे हैं पर संसद में कुछ पार्टियों की असहमति के कारण ऐसा नहीं हो पाया है. अगले महीने की दस तारीख तक उसे इस विषय पर लेख देना है. आज मृणाल ज्योति की हुसूरी के लिए बात की, दो लोगों ने सहमती दी. एक गमछा तथा पान व ताम्बूल लाकर रखना होगा. जून आज मुम्बई पहुंच गये हैं. नन्हे ने उस दिन हैप्पीनेस वाला लेख भेजा था, उसकी दिशा ठीक है, वह भी वास्तविक प्रसन्नता को ही महत्व देता है न कि ऊपरी ताम-झाम को. दीदी ने उसकी हास्य कविता ‘आधुनिक शिक्षा प्रणाली’ पढ़कर कमेन्ट लिखा है.  

सुबह कैसा तो स्वप्न देखकर उठी. कीचड़ और गोबर से भरी एक गली है जिसमें से वह और नन्हे गुजर रहे हैं, उन्हें गुजरना ही है, तभी बीच सड़क में एक कूड़ेदान में लेटा हुआ एक व्यक्ति उठता है, उसके हाथ में गंदगी टपकाती हुई एक डाली है जिसका छींटा वह उस पर डालता है. वह उसे हाथ से पकड़ कर उठाती है और वह एक कपड़े के पुतले सा हाथ में झूल जाता है. आस-पास के घरों से पूछती है यह किसका है, सब मना करते हैं, एक लडकी इशारे से बताती है, दूसरी गली में इसका घर है, नशा करके इधर-उधर पड़ा रहता है. उसकी नींद खुल जाती है. पांच बज चुके थे. सुबह के स्वप्न कुछ अलग ही होते हैं. उसे लगा अहंकार ही वह कीचड़ है जो नन्हे की सहायता से शुरू किए ब्लॉग के कारण उसे हो सकता है. हिन्युग्म पर अपनी एक कविता उसने हटा दी है, जिसमें व्यर्थ ही अपनी प्रशंसा आप करने जैसी बात है. अभी कुछ देर पहले पिताजी ने तारीफ की, उन्हें कम्प्यूटर पर अपनी मेल खोलना आ गया है. सुबह नैनी को दो बार डांटा, प्राणायाम करते समय वह उसी कमरे में डस्टिंग करने आ गयी, मना करने पर भी नहीं जा रही थी, बाद में शीशे का एक गुलदान तोड़ दिया, उसके भीतर कुछ अवश्य हुआ होगा क्षण भर को, लेकिन गुलदान टूटने का दुःख नहीं था वह, काम ठीक से न करने का तथा किसी को दुःख देने का भी, खैर, जो हुआ सो हुआ..भीतर आसक्ति है, कामना है, यश की लालसा है, क्रोध है, अहंकार है. सारे विकार दिख गये, इतना सब होने पर भी भीतर परमात्मा है, साक्षी है, अनंत सुख है, मस्ती है, परमात्मा कितना दयालु है, वह उनकी कमियों पर ध्यान ही नहीं देता, वे उसे पुकारते हैं तो वह तत्क्षण प्रकट हो जाता है. परमात्मा उनके कितने निकट है !

आज से दिनचर्या में काफी फेरबदल किया है उन्होंने. सुबह चार बजे का अलार्म सुनकर उठी. बड़ी भांजी व भांजे को उनके बचपन में देखा, आखिरी सपना नींद खोलने के लिए होता है इस बात का ऐसा प्रमाण मिला कि मन आश्चर्य से भर गया. नींद खुली और उसी क्षण अलार्म बजा. पांच मिनट चिदाकाश में तारे देखते लेटी रही पर पुनः स्वप्न शुरू हो गये ऐसे ही न जाने कितने जन्मों में वे जाग-जाग कर पुनः सो जाते हैं, फिर उठी, वे प्रातः भ्रमण को गये. आकर प्राणायाम किया, जून भ्रार्मरी के बाद शांत बैठे रहे, पहली बार उन्हें इस तरह चुपचाप बैठे देखा. शायद कोई अनुभव हुआ हो, ज्योति की एक झलक भी मानव को बदल सकती है. परमात्मा हर पल साथ है. वह है तो वे हैं, यह संसार है, वह नहीं तो कुछ नहीं, वह भी वही है और सब कुछ भी वही तो है. नैनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, फिर भी काम कर रही है. उसकी बेटी को पिताजी सम्भाल रहे हैं. उनका दिल भी सोने का है, भावनाओं से भरा है. दुनिया देखी है उन्होंने, जीवन को पूर्ण रूप से जीया है. उनके पास भी भोले बाबा हैं..ईश्वर को प्रेम किये बिना कोई जीवन रस से पूर्ण हो ही कैसे सकता है !


Tuesday, October 4, 2016

सलाद पत्ता


आज उसने ब्लॉग पर यीशू पर लिखी एक कविता पोस्ट की है, जिसे और भी कुछ लोगों को भेज सकती है, फेसबुक पर भी. हिन्दयुग्म, हिंदी कविता, सरस्वती सुमन, ऋशिमुख, साहित्य अमृत, नन्हे, पिताजी सभी को भेज सकती है. प्रिंट करके स्थानीय स्कूल के फादर को भी दे सकती है. बड़ी ननद की बड़ी बेटी के लिए जो कविता लिखी थी, उसे भी भेज देना ठीक रहेगा, उसकी शादी की बात पक्की हो गयी है. आज गुलदाउदी के गमले घर के द्वार पर सजाये हैं, घर से निकलते, प्रवेश करते उन पर नजर पड़े और दिल महक जाये, फूल खुदा की खबर देते हैं !

आज क्रिसमस है. सुबह जल्दी उठी, प्राणायाम आदि किया. आज जून ने मेथी का पुलाव बनाया है अभी सलाद पत्ता लेने बाहर बगीचे में गये हैं. क्रिसेन्थमम के फूल घर से निकलते ही दिखाई देते हैं, सुंदर हैं, ऐसे ही जब उनकी आत्मा की कली खिल जाती है तो वे भी फूल बन जाते हैं, उनकी मुस्कान तब कोई नहीं छीन सकता, सारे विरोध समाप्त हो जाते हैं, सारी वासनाएं मिट जाती हैं, कामना का अंत हो जाता है और भीतर एक रस शांति का अनुभव होता है !


आज वह लेडीज क्लब की एक सदस्या से मिलने गयी थी. उनके पैर में प्लास्टर लगा था, बरामदे में बैठी थीं. उनके लिए भी एक कविता लिखी, कल सेक्रेटरी के लिए लिखी थी. पिताजी आज बहुत दिनों बाद टहलने गये. यह वर्ष बीतने को है. नये वर्ष में उसे अपने ब्लॉग को भी बदलना है. आज सुबह अभी नींद में ही थी कि एक सुंदर दृश्य दिखा, वह स्वप्न नहीं था, ध्यान की एक अवस्था थी, सब कुछ स्पष्ट दिखाई दे रहा था. अचानक भाव उठा कि सद्गुरु ऐसे ही सब घटनाओं के बारे में जान जाते होंगे, तभी उन्हें सर्वज्ञ कहते हैं. वह साधक के मन की बातें भी यदि चाहें तो जान सकते हैं. श्रद्धा से मन भर गया और कुछ देर वहीं बैठी रही. न ठंड का अहसास हो रहा था न ही कहीं दर्द या असुविधा का. सद्गुरु का आश्रय लिया है उस शिव तत्व ने, उनका मन स्फटिक सा शुद्ध है, वह परमात्मा ही हो गये हैं अथवा तो हैं, इस भाव को तीव्रता से अनुभव किया. सुबह नौ बजे तक मन इसी भाव दशा में रहा. उनकी उपस्थिति का अहसास इतनी शिद्दत से हुआ. बाद में घर के कामों में वह भाव लुप्त हो गया. अभी-अभी चंपा की गंध आई एक पल के लिए...वह परम उनके द्वारा प्रकट होना चाहता है. वे हर तरह से उसमें बाधा देते हैं. अहंकार, लोभ, मोह, काम, क्रोध, दम्भ और न जाने कितने-कितने अवरोध रास्ते में खड़े कर देते हैं अन्यथा तो वह सदा उपलब्ध है, उपलब्ध ही नहीं वह आतुर भी है, बात एकतरफा नहीं है, एकतरफा यदि हो भी तो उसकी तरफ से ही है, उनमें न वह शक्ति है न वह आतुरता !

Friday, July 1, 2016

तकली और सूत


एक दिन और आधा गुजर गया. अभी तक सिंगापुर पर उसका लेख समाप्त नहीं हुआ है. दोपहर को बापू की मानस सुनती रही, पर कहते हैं न सत्संग में लोग नींद पूरी करने भी जाते हैं सो कब ध्यान नींद में बदल गया पता ही नहीं चला, सवा दो बजे नींद खुली. सिलाई का छोटा-मोटा काम किया, चाय पीकर अब डायरी खोली है. आज सुबह छोटी चाचीजी का फोन आया, उनके बड़े पुत्र का पैर दुर्घटना में घायल हो गया है, आपरेशन करना होगा. उसने सोचा, जा तो नहीं सकती पर इतनी दूर से वह कुछ मदद तो कर सकती है, जून को फोन किया उनका दिल बहुत बड़ा है. कल शाम की  जन्मदिन की पार्टी अच्छी रही, नन्ही सी बच्ची इतनी बातें करती है, पूरे वक्त खेलती रही, वह जरूर जीवन में कुछ उच्च लक्ष्य प्राप्त करेगी. उसका जीवन तो यूँ ही बीता जा रहा है. आज सत्संग का दिन है, पर वह नहीं जा पा रही है. सुबह सीडी लगा कर किचन में ही सत्संग किया. गुरूजी को टीवी पर सुना फिर गाँधीजी के पोते राजमोहन गाँधी को भी सुना, महात्मा के लक्षणों को सुना.
माँ को कई बार कुछ भी समझ में नहीं आता पर कई बार वह बिल्कुल सामान्य लगती हैं, एकदम स्वस्थ मन से भी और तन से भी ! पिताजी आज दांत के डाक्टर के पास दुबारा गये थे. उनकी आवाज बदल जाती है, जब दांत लगा के बात करते हैं, चेहरा ही बदल जाता है. बुढ़ापा स्वयं में एक रोग है. वे भी धीरे-धीरे उसी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. नन्हे का फोन आया दोपहर को, वह उसे आईपॉड के लिए स्ट्रैप भेज रहा है. कल पार्टी में एग लेस केक स्वादिष्ट था, ज्यादा खा लिया, तन शिकायत कर रहा है आज.
टीवी पर कपिला वात्स्यायन जी का भाषण आ रहा है. अज्ञेय से जुड़ी हैं वह. मुरारी बापू का आभार व्यक्त कर रही हैं. महात्मा गाँधी के बारे में भी कुछ कह रही हैं. उन्होंने तकली को प्रतीक बनाकर कहा कि मन भी रुई के समान है जिसमें एकाग्रता से कई सूक्ष्मतम भाव निकाल सकते हैं. मुरारी बापू की कथा पर एक ग्रन्थ का प्रकाशन परवाज साहब ने किया है, उसका लोकार्पण भी किया जा रहा है. 
उन्होंने न जाने कितने भ्रम पाल रखे हैं जो उनकी विनम्रता को विकसित नहीं होने देते. पारिवारिक जीवन में सरसता का कारण विनय का मूल्यांकन ही है ! शांत सहवास अति कठिन है यदि विनय न हो, सहन करने की शक्ति न हो. सुबह जून को थोड़ा सा परेशान किया, जब प्राणायाम करते समय खिड़की खोली. उन्हें ठंड लगी हुई है न भी लगी होती तो सुबह-सुबह खिड़की खोलना उन्हें पसंद नहीं है. लेकिन पहले की तरह वह देर तक इस बात को लेकर परेशान नहीं हुए. उनके मध्य समझ और प्रेम हर दिन बढ़ रहे हैं. भाई-भाभी व छोटे भांजे को ई-कार्ड भेजे. दोपहर को डेंटिस्ट के पास गयी. वहाँ एक मराठी परिचिता के पिता को भी देखा, प्रभावशाली व्यक्तित्त्व है उनका, अच्छी हिंदी बोल रहे थे. लौटी तो माली से काम करवाया. छोटे चचेरे भाई से बात की. उसने कहा, अभी दूसरा आपरेशन नहीं हुआ है भाई का, पैर बचाना मुश्किल है, भाभी के भाई की शादी है, उसका मन कितना परेशान होगा इस वक्त ! जून अभी आये नहीं हैं, माँ-पिताजी शाम के नाश्ते पर उनका इंतजार कर रहे हैं. शाम को वे एक मित्र के यहाँ जायेंगे उनकी बिटिया अस्वस्थ है. कल बुजुर्ग आंटी को देखने अस्पताल. आजकल सभी के साथ कोई न कोई समस्या लगी हुई है. हर तरफ दुःख ही दुःख है, ऐसे में कोई यदि शांत रहना चाहता है तो उसे अपने भीतर के मौन को सुनना सीखना होगा. शून्य को अनुभव करना होगा. बाहर तो उहापोह है, भीतर समाधान है, भीतर परमात्मा का राज्य है, वह द्रष्टा है, कवि है, मनीषी है, सर्वज्ञ है और वह उनका सुहृद है, अकारण दयालु है, हितैषी है, वह है तो वे हैं, वह उनका अपना आप है. उसकी उपासना करते हुए कर्म करते हैं तभी वे मुक्त रह सकते हैं. उनकी मुक्ति ही एकमात्र प्राप्य है, इस जगत में और क्या करना है ? सेवा करना भी मुक्ति के लिए ही है, पर उन्हें बाँधा किसने है ? उन्होंने ही तो !


Thursday, June 9, 2016

आँखों की बीनाई


अभी कुछ देर पहले वह जून के सहकर्मी के यहाँ होकर आई. उनकी पत्नी अपने पिता की मृत्यु पर ग्यारहवां मना रही हैं पूरे उत्साह से, पति बाहर देश गये हैं. कल सुबह वह मृणाल ज्योति गयी थी. बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी योगासन, प्राणायाम कराया. लड्डू बांटे, एक सखी उसके साथ थी. आज कितने वर्षों बाद उसने जून को एक पत्र लिखा, वे उससे नाराज हैं और हर बार की तरह उसकी दृष्टि में नाराज होने का कोई कारण नहीं है. हरेक के सोचने का तरीका भिन्न होता है, दृष्टिकोण भिन्न होता है. उनकी नजर में गृहणी की जो तस्वीर बनी हुई है कि पति घर आये तो पत्नी उसका स्वागत करती हुई घर पर ही मौजूद मिले, पति के घर पर रहते वह अकेले कहीं न जाये. यह तस्वीर बहुत पुरानी हो गयी है. उन्होंने स्वयं ही इंडिया टुडे में एक लेख पढ़ने को उसे कहा था, जमाना बदल रहा है, अब महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में बंद नहीं रखा जा सकता. दूसरी बात यह कि पिछले दस-बारह वर्षों से  वह ध्यान का अभ्यास कर रही है. आर्ट ऑफ़ लिविंग का कोर्स किये उन्हें आठ वर्ष हो गये. उसके सोचने का ढंग बदलना स्वाभाविक है. उसके लिए परिवार का अर्थ केवल चार-पांच प्राणी ही नहीं रह गया है. सारी दुनिया ही उसका परिवार हो गयी है, अगर उसका थोड़ा सा प्रयास किसी के काम आ सकता है तो उसे करके जो आंतरिक ख़ुशी मिलती है उन्हें इसका अंदाजा नहीं है. वह किसी के काम आ सकें तभी उनके होने की सार्थकता है. रही बात सत्संग की तो उसने पहले ही सोच लिया था जब समय बदल जायेगा तब भी वह महीने में एक या दो बार जाएगी. उनके विवाह को दो दशक से अधिक हो गये हैं, एक लम्बी यात्रा उन्होंने साथ-साथ तय की है, कहीं-कहीं कांटे भी मिले हैं लेकिन ज्यादातर फूलों का संग रहा है. उसने जून से कहा, वे जो अपने स्वभाव से विवश होकर नाराज होने पर चुप्पी ओढ़ लेते हैं, इससे उनके कितना नुकसान होता है इसका उन्हें पता ही नहीं. यह सिर्फ आदत है और कुछ नहीं. पहली बार यदि किसी के मन ने निर्णय लिया कि यह बात ठीक नहीं है बस इसके बाद बात उसके हाथ से निकल जाती है. भीतर विषैले हार्मोन्स अपने काम करना शुरू कर देते हैं, बेचैनी उसे उनके कारण ही हो रही होती है, पर वह सोचता है, बाहर जो घटा वह उसके दुःख के लिए जिम्मेदार है. ध्यान में उसने इसका अनुभव स्वयं किया है, इसलिए ही उसने दुखी होना छोड़ दिया है. वह उन्हें हर रूप में हर हाल में बिना किसी शर्त के प्रेम करती है. उनके भीतर भी प्रेम का सोता छिपा है उसे मुक्त होने दें, सहज रहें और अपने मन को इतना विशाल बनाएं कि कोई उससे बाहर न रहे ! फिर उन्हें दुःख की छाया भी न छू पायेगी. अंत में उसने उन्हें सदा प्रसन्न रहने की शुभकामनाएं दीं. 

Cataracts होने की शुरुआत है उसकी दायीं आँख में, कल वे डिब्रूगढ़ गये थे. डा. अग्रवाल ने बताया, कुछ दिनों से देखने में पढ़ने में परेशानी हो रही थी. आँखों में हल्का दर्द भी था. चश्मा बनने भी दिया है. प्रोग्रेसिव लेंस है, दूर का और पास का दोनों एक साथ. जून को भी दायीं आँख में कमजोरी के कारण दवा डालने को दी है. जो उसे दिन में चार बार डालनी थी पर भूल गयी. जून उसके लिए ‘आंखों के लिए योग’ का CD लाये हैं तथा नेट से cataracts पर जानकारी भी. रामदेव जी बता रहे हैं सुबह उठकर आँखों पर ठंडे पानी के छींटे मारने से तथा बाल्टी में आँखें खोलने व बंद करने से आँखें स्वस्थ रहती हैं. लौकी का जूस तथा आंवले का रस लेने से भी आँखें ठीक रहती हैं. कैट्रेक का मुख्य कारण है ओक्सिडेटिव स्ट्रेस जिसको दूर करने का उपाय है एंटी ओक्सिडेंट, जिसका स्रोत है विटामिन ए, सी, इ तथा ल्यूटिन और फल व सब्जियाँ.


Tuesday, October 6, 2015

नारद भक्ति सूत्र


नये वर्ष की दिनचर्या – सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना, उषापान, हल्का व्यायाम, क्रिया, नाश्ता बनाना, स्नान(नेति, धौती), योगासन, प्राणायाम, पाठ, नाश्ता, ध्यान, भोजन बनाना व खाना, संगीत, डायरी लेखन, पढ़ाना, पत्र लेखन, रात्रि भोजन बनाना, टिफिन, टहलना, अख़बार आदि पढ़ना, बागवानी, संध्या, रात्रि भोजन, स्वाध्याय, शयन. पूरे दिन भर में छब्बीस कार्य हैं जो उसे करने हैं. इसी में समय निकाल कर कविता लिखना तथा पहले की कविताओं को टाइप करना भी होगा तथा लोगों से मिलना-जुलना भी होगा, इसमें से कई कार्य जून के साथ ही होंगे और कुछ एकांत में, जीवन को अब एक दिशा मिल गयी है. सद्गुरु हर कदम पर उसके साथ हैं. आज सुबह टीवी पर उनके मुख से ‘नारद भक्ति सूत्र’ पर प्रवचन सुना, नेत्रों में जल भर आया. वह हृदय को छू लेने वाले वचन कहते हैं. वह जो कहते हैं उसे अपने भीतर घटता हुआ दीखता है. जैसा-जैसा वह कहते हैं वैसा ही अनुभव में आता है, पर उनके इस भीतरी अनुभव का लाभ जगत को मिले इसके लिए कार्य भी करना होगा. केवल भक्ति में डूबे रहकर बैठे रहने से तो काम नहीं होगा, अपना कर्त्तव्य निभाते हुए जितना सहजता से हो सके, अपने को जगत को देते जाना होगा..वैसे भी ऊपर जितने कार्य उसने लिखे हैं वह सभी उस भीतर वाले परमात्मा को ही समर्पित हैं. जब स्वयं वह है ही नहीं तो उसके कृत्य कैसे ? ये तो स्वयं को व्यस्त कहने का एक साधन है. वही तो है, उसी के लिए सब कुछ है. उसकी हर श्वास उसी के लिए ही है, उसी की है.

जीवन में यदि योग हो, ईश्वर की लगन हो सदगुरू का अनुग्रह हो और मन में समता हो तो परमात्मा को प्रकट होने में देर नहीं लगती, वह तत्क्षण प्रकट हो जाता है. प्रभु का स्मरण यदि अपने आप होता हो, मन उसके बिना स्वयं को असहाय महसूस करता हो जब वैराग्य सहज हो जाये और जगत में कोई भी आकर्षण न रहे तो पात्रता के अनुसार परमात्मा भीतर प्रकट हो जाता है. जो विराट है, इतने बड़े ब्रह्मांड का मालिक है, वह एक व्यक्ति के छोटे से उर में प्रकट हो जाता है. भक्ति विराट को लघु, असीम को ससीम बनाने में सक्षम है. ऐसी भक्ति ही मानव जीवन का ध्येय है, साध्य है. शरीर, मन, बुद्धि की सार्थकता इसी में है कि इस तन में चैतन्य प्रकटे, मन प्रभु में लीन  हो तथा बुद्धि उसके सम्मुख नतमस्तक हो. उसके सामने बुद्धि की कुछ नहीं चलती.


आज मौसम ठंडा है, धूप नहीं निकली है लेकिन उसके भीतर का मौसम सम है. नया वर्ष आने में मात्र चार दिन रह गये हैं. इस एक वर्ष में उसके भीतर आत्मा का ज्ञान परिपक्व हुआ है. द्रष्टा भाव में रहना सीखा है. क्रोध, मन, माया, लोभ, राग व द्वेष भीतर स्पष्ट दिखने लगे हैं. ईर्ष्या भी खूब दिखी. मन में कटुता का अनुभव होने पर लगता है कोई पापकर्म उदय हुआ है जो मन कि यह हालत हुई है. उन्हें देखते जाओ तो वे नष्ट होते जाते हैं. भीतर विचार प्रकट होते हैं और तत्क्षण लुप्त हो जाते हैं, वे जैसे कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं, किन्तु यदि कोई सजग न रहे तो वे बढ़ते ही चले जाते हैं. सजगता अध्यात्म की पहली और अंतिम सीढ़ी है, बिना सजग रहे कोई कहीं नहीं पहुंच सकता. सद्गुरु से पूछ तो कहेंगे कि कोई प्रेम को अपने मन में धारण करे तो सारे विकार अपने आप दूर हो जायेंगे. विकारों को दूर करने जायेंगे तो उन्हें सत्ता मिलेगी. जो वास्तव में हैं नहीं, होने का भ्रम पैदा करते हैं, वे विकार सत्य और शाश्वत प्रेम के सम्मुख कहाँ तक टिक पाएंगे. प्रेम जो उनका सहज स्वभाव है तभी तो थोडा सा विकार भी सहन नहीं होता. भीतर पल भर के लिए भी उद्वेग हो तो कैसा लगता है..प्रेम यदि सदा बना रहे तो कोई भी उलझन नहीं होती क्योंकि वह मूल है, स्वाभाविक है. दो दिनों बाद नया वर्ष आ रहा है. इस साल ने जाते-जाते एक मोह से मुक्ति दिलाई है. मोह जहाँ भी हो दुःख का कारण होता है. भविष्य में इस मोह के कारण न जाने कितनी बार दुःख उठाना पड़ता, सो अब मन मुक्त है. नये वर्ष का स्वागत मुक्त मन से ही करना चाहिए. सद्गुरु से प्रार्थना है कि उसके अंतर का सारा छोटापन सारी संकीर्णता वह ले लें. 

Thursday, October 1, 2015

ऊर्जा की लहर


भारत-दक्षिण अफ्रीका का मैच हो रहा है, भारतीय टीम पिट रही है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे शक्ति प्रदान करें, वह खेलें तो सही भले ही जीत न पायें. आज वे रोज गार्डन गये, सुंदर गुलाब खिले थे, उनके बगीचे में भी खिले हैं. छोटे भाई का फोन आया परिवार में सब सामान्य है.

आज नवम्बर का अंतिम दिन है. पिछले दिनों नियमित नहीं लिख पायी. लिखे, ऐसा विचार भी नहीं आया. जिस लक्ष्य के लिए लिखना आरम्भ किया था ऐसा लगता है कि कुछ हद तक उसे पा लिया  है, तभी शिथिलता आ गयी थी, लेकिन अपने आपको वे जानकार भी कहाँ जान पाते हैं, वे वास्तव में जो हैं उसे हर क्षण स्मृति में नहीं रख पाते. जब एक क्षण के लिए भी उसकी विस्मृति नहीं होगी तभी वे समझेंगे कि लक्ष्य पा लिया है, तब तक सचेत रहना होगा, निरंतर सजग रहना होगा. इस समय दोपहर के एक बजे हैं, उसका पेट भरा-भरा सा लग रहा है और दांत में हल्का सा दर्द है, देह की हर छोटी-बड़ी संवेदना की तरफ तो ध्यान जाता है पर मन में उठने वाला विकार तब पकड़ में आता है जब देह में कुछ अनुभव होता है. कोई गलत काम होने पर शरीर जैसे जलने लगता है. ऐसा सदा ही होता आया होगा, पर पहले वह अचेत थी. उसने विचार किया कि इस क्षण किसी को कुछ देना शेष तो नहीं रह गया है. तीन दिसम्बर को विश्व विकलांग दिवस है, जाना है तथा आज शाम को सत्संग में जाना है. कल जून ने कहा कि वह उसके बालों को काला रंग कर देंगे, उसके सौन्दर्य की चिंता उससे अधिक उन्हें है. कल शाम भी पिछले दो-तीन दिनों की तरह टीवी पर गुरूजी का कोल्लम से आ रहा सत्संग देखा, वह कन्नड़ में बोल रहे थे या मलयालम में समझ में नहीं आया. जनवरी में वे एडवांस कोर्स करने जायेंगे, फरवरी में शायद कुम्भ मेला देखने जाएँ.

मनोरंजन पर आत्म रंजन का, भोग पर योग का, राग पर विराग का तथा अज्ञान पर ज्ञान का अंकुश लगना चाहिए. अभी कुछ देर पूर्व ही लगा कि अंकुश कुछ ढीला पड़ा, एक क्षण के लिए, किन्तु उतनी ही देर जितनी देर एक लहर पानी में उठे और गिरे ! इस वक्त दोपहर के साढ़े तीन होने को हैं. वह कल सुबह की तैयारी कर रही है. कल सुबह बच्चों को पार्क में बुलाकर उन्हें कुछ सिखाना है, उनसे कुछ सीखना है, प्राणायाम करते हुए बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं, वे सहज ही सब सीख जाते हैं. कल वह उन्हें एक कहानी भी सुनाने वाली है. आज सुबह शुद्धात्मा देखने का एक अवसर मिला और भीतर कैसा सुकून ..वे आत्मा के स्तर पर आपस में जुड़े ही हैं, इस बात को जब एक बार अनुभव के स्तर पर जान लेते हैं तो सदा के लिए शांति की एक कुंजी हाथ लग जाती है. आज सुबह ध्यान में ऊर्जा का अनुभव हुआ, कल एक वृद्धा का अजीब सा चेहरा दिखा था, कुछ झलक सी थी. उनके अवचेतन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार दबे पड़े हैं, जो हर वक्त विचारों के रूप में मन में चक्कर लगाते हैं. विचार जिनकी गिरफ्त से बचना ही साधना है. वे जब किसी न किसी उद्देश्य पूर्ण कार्य में लगे रहते हैं तो भीतर एक ऊर्जा स्वयं ही निर्मित होती रहती है और जब जीवन में कोई ध्येय नहीं होता तो वह ऊर्जा जैसे मंद पड़ जाती है, उसकी आंच कमजोर हो जाती है. लिखने से उसके भीतर एक ऊर्जा का जन्म होता है. ‘लिखना’ बस लिखने के लिए लिखना हो तो !

आज इस क्षण वह बिलकुल अपने सामने है, कहीं कोई दुराव नहीं, जैसी वह है बिलकुल वैसी. इस क्षण उसके भीतर कोई कामना शेष नहीं है, सो भीतर शांति है, कुछ पाना भी नहीं है तो कुछ खोने का भी डर नहीं है. जीवन जैसा है वैसा ही स्वीकार रही है. तन स्वस्थ है, मन समाहित है, हृदय सारी सृष्टि के लिए शुभकामना से भरा है. जीवन एक लय में आगे बढ़ रहा है. इस जगत में जो श्रेष्ठ है वह भीतर पहले से ही है. वह सहज प्राप्य है तो वे और क्या अभिलाषा करें. इस संसार में जो सर्वश्रेष्ठ है वह है प्रेम और वह प्रेम उसके भीतर उदित हुआ है, आत्मा के लिए, परमात्मा के लिए, सद्गुरु के लिए, ज्ञान के लिए तथा सारे जहाँ के लिए. जब प्रेम होता है तो वह सबके लिए होता है, वह कोई भेद नहीं देखता, वह महत्वाकांक्षी भी नहीं होता, वह मृदुल जल के प्रवाह की तरह विनीत होता है, सभी को तृप्त करता है. वह सूर्य की किरणों की तरह सबको प्रकाशित करता है. इस जीवन में उसे जो सहयात्री मिले हैं सभी के लिए ढेरों शुभकामनायें हैं. सभी अपनी-अपनी तरह से अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने में रत हैं. परसों नन्हा आ रहा है उसकी दिनचर्या कुछ बदल जाएगी, घर में कुछ दिन चहल-पहल होगी और कुछ नई बातें होंगी. इसी तरह साल दर साल गुजरते जायंगे और एक दिन मृत्यु उनके सामने खड़ी होगी, वे उसकी आँखों में आँखें डाल कर पूछेंगे, कहो, कहाँ ले जाने आई हो ? इस जीवन को तो पूरा-पूरा जी लिया और किस रूप को दिखाने आई हो ? मृत्यु की बाँह पकड़ कर वे नई यात्रा पर निशंक होकर चल देंगे. जिसको कुछ देना-पावना नहीं मृत्यु तो उसके लिए खेल है !      




Thursday, August 20, 2015

गोपी गीत


आज उनके यहाँ सत्संग है. सुबह सवा पाँच बजे नींद खुली, उसके कुछ देर पूर्व प्रार्थना की तब तंद्रा  थी, गुरूजी कहते हैं वह संध्याकाल है, तब वे आत्मा के निकट होते हैं. जिस तरह वे जागृत, सुषुप्ति तथा स्वप्नावस्था का अनुभव करते हैं, वैसे ही तुरीयावस्था का भी कर सकते हैं. जब वे ध्यान की  गहराई में होते हैं. पिछले कई दिनों से जैसे वह ध्यान ठीक से नहीं कर पाती अथवा तो अब वह उसकी सामान्य दिनचर्या बनता जा रहा है, अथवा तो ध्यान अब अलग से करने जैसी कोई विधि नहीं रह गया है. उसे हर क्षण ही मन पर नजर रखनी है, न व्यर्थ का चिन्तन न व्यर्थ की कल्पनाएँ ही, तभी भीतर की शांति को ऊपर आने का अवसर मिलेगा. अभी एक परिचिता से बात हुई उन्होंने एक अन्य महिला के बारे में बताया, जिनके पति को बोन मैरो का अंतिम स्टेज का कैंसर है. आज ही मद्रास से वे लोग आ रहे हैं. स्वामी रामदेव कहते हैं कि प्राणायाम से कैंसर भी ठीक होता है, आज उनकी बात पर विश्वास करने का मन होता है. आbज सुबह से कुछ नहीं सुना, लगा कि बाहर से अधिक ज्ञान भरने से कहीं अपच न हो जाये, जो सुना है उस पर मनन भी तो करना चाहिए. सभी संत तथा सभी शास्त्र एक ही बात कहते हैं कि स्वयं को देह मानना मोह है. जड़ प्रकृति के साथ अपनी एकता मानना भूल है. स्वयं को परमात्मा का अंश मानना तथा असीमता का अनुभव करना ही उनका ध्येय है. जड़ तथा चेतन के संयोग से उनका जन्म हुआ है, तो वे जड़ को ही क्यों अपना रूप मानें क्यों न चेतन से जुड़ें, क्योंकि जड़ तो मिटने वाला है पर चेतन सदा रहता है वह पुनः जड़ से मिलकर नया शरीर धरेगा. यदि मुक्त हो गया तो विदेह हो जायेगा अन्यथा उसे विवश होकर आना पड़ेगा भिन्न-भिन्न योनियों में !

उसकी एक सखी के पैरों व लोअर बैक में दर्द है, वह अपने इस दर्द को हिम्मत से सह रही है. ठीक ही कहा गया है यह संसार दुखों का घर है, यहाँ वे अपने ही किये पूर्व कर्मों का फल भुगतने को बाध्य हैं. ज्ञान उन्हें सचेत करता है कि आगे ऐसे कर्म न बांधें जो दर्द का कारण बनें. ईश्वर कृपा ही करता है जब कष्ट भेजता है. वे ज्यादा सहिष्णु बनें, सजग बनें और दूसरों के दुःख-दर्द को समझें ऐसा वह उन्हें सिखाना चाहता है. वे उसके इशारे को समझ नहीं पाते, वे सोये रहते हैं, वह चाहता है वे उसके साथ आनंद में नाचें झूमें गएँ ! वह कहाँ चाहता है कि वे दुखी हों, उसने तो मानव को अपने जैसा बनाया था, वह तो उनके साथ खेलना चाहता था, वे ही उसकी ओर पीठ करके बैठ गये और अपने छोटे-छोटे सुखों को.. कांच के टुकड़ों को सहेजने में लग गये, उन्हें हीरे और कांच में भेद करना कहाँ आता है, उन्हीं टुकड़ों को सहेजने में वे कर्म बांधते रहे फिर दुखों के भागी हुए, दोष दूसरों को दिया, अपने ही बनाये जाल में वे बार-बार फंसते रहे. ईश्वर सब देखता है और सद्गुरु को उनके पास भेजता है !


दोपहर के डेढ़ बजने वाले हैं, जून अब तक मलेशिया पहुंच चुके होंगे, शायद कुछ देर में उनका फोन आये. नन्हे से बात हुई, उसके टीचर से भी बात हुई कैमिस्ट्री में उसकी हाजिरी कम है इस सिलसिले में, लापरवाही के कारण उसने मेडिकल सर्टिफिकेट पहले नहीं दिखाया, खैर ! मौसम ठंडा हो गया है, रात भर वर्षा होती रही, सुबह से भी रुक-रुक कर हो रही है, रात को सोने में देर हुई, सखी के यहाँ से आते-आते ही दस बज गये थे. काफी देर नींद नहीं आई, बाद में स्वप्न देखती रही, गुरुमाँ को देखा, उनके घर आई हैं, खूब बातें कर रही हैं, बिलकुल अपनों जैसी. एक बार देखा कि उसके हाथों-पैरों पर लाल रंग के कोई जीव चिपक गये हैं पर वह भय व्यक्त नहीं कर रही, आराम से उन्हें निकाल रही है, स्वप्न की दुनिया कितनी झूठी होती है, वास्तविकता से उसका जरा भी संबंध नहीं, ऐसी ही बाहर का संसार हैं, भीतर की शांति से उसका जरा भी संबंध नहीं. वह शन्ति जो मौन में है, ध्यान में है, मन से भी पार है, जो बस ‘है’, जिसका बोध तब होता है तो बोध करने वाला भी खो जाता है, वह स्वयं बोध ही हो जाता है. कल शाम को एक सखी की प्रतीक्षा करते हुए भक्तियोग पर एक प्रवचन सुना, सगुण साकार ईश्वर की भक्ति से जो आनंद मिलता है वह निराकार की भक्ति से नहीं मिल सकता. भागवत में ‘गोपीगीत’ पढ़ा था, गोपियों का प्रेम कृष्ण के लिए कितना अधिक था, वे उनके प्राण थे. पर उनकी पूजा तो सुविधा पर निर्भर करती है. भगवान भी जानते हैं कि यदि अभी वे उनके पास नहीं गये तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा, वे सोचते हैं अभी तो बहुत वक्त है, आराम से बाद में भक्ति-पूजा कर लेंगे ! जून का फोन आया है, उन्होंने उसके लिए एक स्टिल डिजिटल कैमरा खरीदा है. नन्हा इलेक्ट्रोनिक्स की परीक्षा की तैयारी कर रहा है. कल दीदी और बड़ी ननद से भी फोन पर बात की. 

Tuesday, November 18, 2014

सुदर्शन क्रिया का अभ्यास


आज बाबाजी ने मन को एकाग्र करने की एक सरल युक्ति बतायी, ध्यान के समय जब मन किसी वस्तु का चिन्तन करने लगे तो यह भाव करें कि उस वस्तु को देखने वाला मानस-चक्षु और सोचने वाला मानस भी उसी आत्मा का अंश है ! कल शाम को वे टेक्निकल फोरम में गये थे, श्री राय ने काफी दक्षता से अपने विषय पर व्याख्यान दिया. एक विधि ETP भी सिखायी जो शरीर में होने वाले दर्द अथवा मानसिक परेशानी को दूर करने में सहायक थी. उनके अनुसार श्वास तथा विचारों में बड़ा गहरा संबंध है. साँस को नियंत्रित करके भावनाओं को नियंत्रित किया जा सकता है. इसी तरह शरीर में होने वाले रोग आदि भी नकारात्मक भावनाओं/विचारों का परिणाम हैं. यदि सोच सकारात्मक हो और नियमित प्राणायाम का अभ्यास करें तो सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिल सकती है ! जून ने तीन दिनों की ट्रेनिंग ली जो उनके लिए बेहद उपयोगी है. वह पहले से ज्यादा संवेदनशील हो गये हैं, अधिक सचेत हो गये हैं. उसे भी अपने ध्यान को बढ़ाना होगा और प्राणायाम नियमित करना होगा. आज दोपहर सिर्फ पुस्तक पढ़ते हुए ही नहीं बितानी है बल्कि कुछ लिखना भी है. कल ‘अपने अपने राम’ पूरी पढ़ ली, राम कथा को कहने का यह एक नया अंदाज है लेकिन प्रभावशाली है. कल माली ने गमलों के लिए मिट्टी खोदकर गैराज में रख दी है, गुलदाउदी के पौधों से कटिंग्स लगाने का काम भी इतवार तक हो जायेगा. रात को वर्षा हुई पर वातावरण में उमस पहले की तरह ही है.

आज सुबह भी जून ने उठकर अपना अभ्यास ( प्राणायाम+सुदर्शन क्रिया ) पूरा किया तो वह उठी. जून जैसे ही गये संगीत अध्यापिका का फोन आ गया, वहाँ से लौटते-लौटते साढ़े आठ हो गये. आज राग विहाग सिखाया. अभी तक सफाईवाला नहीं आया तो नैनी को आवाज दी है. जिसकी बेटी को कई दिनों से बुखार है, उस सखी से फोन पर बात की, वे लोग शायद सोमवार को उसे डिब्रूगढ़ ले जायेंगे. बुखार अभी भी है. आज गर्मी बेहद है, रात को भी वर्षा नहीं हुई. आज उसने शनिवार का विशेष भोजन ‘सिन्धी कढ़ी’ बनायी है, जून देर से आएंगे, दफ्तर के किसी काम से तिनसुकिया गये हैं. नन्हा अपने हॉउस का कैप्टन बना है इस साल, अगले हफ्ते उसका जन्मदिन है और उसके अगले दिन से उसके दांत का इलाज शुरू होगा.

कल रात वे जल्दी सोने गये जिससे सुबह जल्दी उठकर जून अपना अभ्यास कर सकें पर आधे घंटे बाद ही उनके एक सहयोगी ने फोन करके जगा दिया, पुनः सोये हुए अभी दो घंटे भी नहीं बीते होंगे कि आंधी-तूफान की आवाज ने नींद खोल दी, रही-सही कसर बिजली गुल हो जाने से पूरी हो गयी. उमस इतनी ज्यादा थी कि खिड़की व बरामदे का दरवाजा खोला, आधा घंटा जगे ही रहे फिर बिजली आ गयी, इसी बीच बादलों की गर्जन-तर्जन व बिजली का चमकना जारी रहा. सुबह उठे तो बगीचा, पेड़-पौधे तूफान की गवाही दे रहे थे, यूँ कल की भीषण गर्मी के बाद वर्षा राहत बनकर आयी है, हवा ठंडी हो गयी है, पर सुबह जल्दी नहीं उठ पाए. दलिया जल गया उसकी लापरवाही के कारण, उस दिन परसों ही तो चावल पतीले में लग गये थे, उसे ज्यादा सचेत होना है न कि रही-सही सुधबुध भी खो देनी है. जून आजकल शांत हो गये हैं, वह पहले की अपेक्षा ज्यादा स्थिर दीखते हैं, जैसे हर वक्त उन्हें पता हो क्या कहना है, क्या करना है. आज नन्हे के लिए केक बनाना है, उसने काले चने बनाने को कहा था पर वह भिगोना भूल गयी, एक और लापरवाही. उसने अभी तक स्नान-ध्यान नहीं किया है, कपड़े प्रेस करते समय बाबाजी को सुना, उन्होंने कहा ध्यान सुप्त शक्तियों को उजागर करने में मदद करता है.कल दोपहर बाद जून का सिरदर्द रेकी( ध्यान की ही एक विधि ) से हल्का हुआ, शनिवार को बांह का दर्द भी इसी तरह ठीक हुआ था, शक्ति पास ही है स्वयं को ठीक करने की भी और अन्यों की सहायता करने की भी ! जरूरत है वे ध्यान में ज्यादा से ज्यादा उतरें !