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Friday, June 23, 2017

सर्दी-जुकाम


फिर एक अन्तराल..नया वर्ष आया और पहला माह समाप्त होने को है, उसने लगभग हर दिन कुछ पंक्तियाँ लिखीं, छोटी-छोटी कविताएँ..गद्य लिखने का मन ही नहीं हुआ. पद्य सुकोमल है, गद्य जीवन का यथार्थ है. जून आज फिर गोहाटी गये हैं, परसों आ जायेंगे. उनका गला खराब था, कालीमिर्च, गुड़ और गाय के घी का नुस्खा अपनाना शुरू किया, उससे लाभ भी हुआ. पिछले एक हफ्ते से भी अधिक समय से वे शाम को सीडी लगाकर प्रवचन सुन रहे थे, आज भगवद् गीता पर आधारित प्रवचन है. साहित्य अमृत के स्वामी विवेकानंद पर आधारित अंक को पढ़कर कई नई जानकारियां मिल रही हैं. वे जब छोटे मन से दुनिया को देखते हैं तो अभाव नजर आता है, जब गहराई से देखते हैं तब पूर्णता का अनुभव होता है.

आज सुबह वह नींद में थी पर महसूस हो रहा था कोई जगा रहा है, जब तक नहीं जागी तब तक वह प्रयास करता रहा. एक स्वप्न जैसा कुछ देखा, जिसमें स्वयं को तितली के रूप में देखा. उस दिन नन्हे को फोन पर स्वयं को कहते सुना था कि हर योनि में जैसे तितली, परमात्मा या प्रकृति सबके साथ होते हैं, उन पर नजर रखते हैं. ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, एक बार स्वयं का चेहरा कुछ बदला सा दर्पण में देखा. स्नान करने गयी तो गाउन के बार्डर में कुछ भारीपन महसूस हुआ, छूकर देखा तो  कान का वह बुंदा था, जो कुछ दिन पहले खो गया था, पर वह वहाँ कैसे गया होगा, चारों तरफ देखा कहीं से भी सिलाई खुली नहीं है. इतने दिन से वहीं था तो आज ही उसका पता क्यों चला. कल स्कूल में बच्चों को सिखा सकी, वह भी तो परमात्मा की कृपा ही थी. उनके जीवन में वह कितना निकट है, बस देखने के लिए नजर चाहिए. टीवी पर जैसे ही गुरूजी का प्रवचन सुनना शुरू किया तो पहला वाक्य था, ‘जीवन एक पहेली है, इसे समझना और सुलझाना सीखना पड़ता है, फिर भी कुछ अनसुलझा रह जाता है’.

कल से सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है, पिछले दिनों जब जून को खांसी थी, उन्हें परेशान देखकर एक बार उसने प्रार्थना की थी, जून की तबियत ठीक हो जाये, भले उसकी खराब हो, वह स्वयं को ठीक कर सकती है. इसी अहंकार को मिटाने के लिए शायद प्रकृति ने यह उपहार भेजा है. जून अब पहले की तरह स्वस्थ व प्रसन्न हैं. कल शाम महिला क्लब की पार्टी थी. अस्सी महिलाएं आई थीं, हो सकता है उनमें से किसी से संक्रमण पकड़ लिया हो. छोटी बहन से बात की, उसकी गर्दन में भी दर्द था, पिछले हफ्ते बीती उसके विवाह की वर्षगांठ अलबत्ता उन्होंने अच्छी तरह मनायी. आज उसका एक छात्र पढ़ने नहीं आया, पहले सोचा शायद घर पर ही पढ़ रहा होगा, फिर फोन कर लिया. बहुत हँसी आयी जब पता चला उसने माँ से कह दिया था, टीचर ने आने के लिए मना किया है. कुछ बच्चे कितनी आसानी से झूठ बोल देते हैं, उन्हें शायद पता भी नहीं होता कि यह झूठ है.


Tuesday, April 29, 2014

लोक कथाओं का संसार


Health is wealth इस बात का सही मूल्यांकन एक फ्लू का मरीज ही कर सकता है, जब जिन्दगी एक बिस्तर तक ही सीमित रह गयी हो. मुँह का स्वाद इतना कड़वा हो चुका हो कि चाय, दूध, कॉफ़ी और सूप का अंतर ही पता न चले. सुबह कब हुई, दोपहर कब शाम में ढल गयी, जगती-सोती आँखों को इसकी खबर ही न हो. लोगों से मिलना-जिलना दुश्वार हो जाये. कभी यह डर कि उतरा हुआ चेहरा देखकर आईने से ही बैर न हो जाये. आज पांचवा दिन है उसके बुखार का, मुख का स्वाद इस वक्त बेहद कड़वा है, कसैलेपन की हद तक कड़वा. छाती में जैसे कुछ अटका हुआ है. दोपहर को लगा था जैसे इस कैद से छुटकारा मिलने ही वाला है, भगवान करे यह सच ही हो. Indian Folk Tales पिछले दो-तीन दिनों से पढ़ रही है, बड़ी मजेदार कहानियाँ हैं, कोई-कोई तो इतनी अच्छी कि बस.. जून आज सुबह भी कल की तरह जल्दी आ गये थे, उसे दाल का पानी दिया, खाना बनाया और सुबह-सुबह नन्हे को स्कूल भेजा. दुनिया वैसे की वैसे चल रही है बस कमी है तो उसकी शक्ति की जो बुखार ने छीन ली है. कल शाम दीदी का फोन आया वह ठीक से बात कर सकी बिना यह जाहिर किये कि वह अस्वस्थ है. ऐसा क्यों  है, आखिर वह किसी को बताने से क्यों डरती है, क्या इसके पीछे वह उस रात को माँ-पापा के बीच हुई बात है जो उसने सुनी थी. इस तरह की होने के कारण उसे सहना भी पड़ता है अकेले-अकेले, नहीं, जून और नन्हे के साथ !

आज वह ठीक है, कल शाम को बुखार उतर गया था, जून ने जब देखकर बताया कि थर्मामीटर का पारा ९८.६ पर रुका है तो पहले उसे विश्वास ही नहीं हुआ था पर उस वक्त से अब तक फिर नहीं चढ़ा है. स्वाद अभी भी कड़वा है और कमजोरी भी, पर पहले की तुलना में तो यह कुछ भी नहीं. अभी कुछ देर पहले दो सखियों के फोन आये, दोनों को जन्मदिन की पार्टी में पता चला. आज नन्हा घर पर ही था, सुबह खाना बनाने में उसका बड़ा हाथ था. दोपहर को उसके लिए खीरे पर नमक, काली मिर्च, अमचूर और नींबू का रस डालकर लाया कि “अब आपके मुंह का स्वाद बिलकुल ठीक हो जायेगा.” शाम को जून के साथ ‘रिश्ते’ में एक अच्छी कहानी देखी जिसमें हीरो रेस्तरां में सामने बैठी लडकी को देखकर कल्पनाओं में खो जाता है और उसी सपने में उससे शादी भी कर लेता है. जून ने आज मक्खन में आलू-पनीर की सब्जी बनाई है, वह उसे काजू, बिस्किट, दूध खिला-पिला कर जल्दी से ठीक कर देना चाहते हैं. परसों नन्हे के स्कूल का वार्षिक दिवस है, वे दिगबोई जायेंगे. आज उसने एक अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना शुरू किया जो वर्षों पहले पढ़ा था. सुबह से एक भी folk tale नहीं पढ़ी.

पिछले दो दिन पूरी तरह आराम किया फिर भी अभी खांसी ठीक नहीं हुई है, सो आज भी घर पर ही रहेगी, संगीत क्लास अगले हफ्ते से ही शुरू होगी. साढ़े आठ बजने को हैं, जून हिदायत देकर गये हैं कि वह ज्यादा काम न करे, वह चाहते हैं कि पूरी तरह स्वस्थ हो जाये तभी अपनी सामान्य दिनचर्या अपनाये.

कल शाम वह बहुत दिनों बाद टहलने गयी, मौसम में हल्की ठंडक थी, शेफाली के फूलों की हल्की गंध भी थी. लोगों के झुंड पूजा देखने जा रहे थे. आज भी पूजा की छुट्टी है. नन्हे का स्कूल शनिवार को खुलेगा, जून का दफ्तर भी, यानि अगले तीन दिन उनके पास हैं अपनी मनमर्जी के मुताबिक बिताने के लिए. कुकर में काले चने उबालने के लिए रखे हैं, गैस कम करने के बावजूद कुकर की सीटी है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही, कभी-कभी सामान्य सी लगने वाली बात भी कितना irritate कर जाती है. अभी कपड़े धोने हैं और सब्जी बनानी है. जब भी वह काले चने की सब्जी बनाती है तो ननद व सासु माँ के बनाने का ढंग याद आ जाता है. ढेर सारे प्याज, पिसे हुए अलग और कटे हुए अलग, जीरा भी पिसा होने के साथ-साथ साबुत भी, ढेर सारा धनिया पाउडर, और उबने के बाद चनों को मसाले में भूनना. उसका तरीका बिलकुल आसान है. कल सुबह ससुराल से फोन आया था, उनके पत्र उन्हें मिल रहे होंगे पर जवाब फोन से ही देते हैं. छोटी बहन के फोन का भी उसे इंतजार था. आज सुबह उठी तो मन में कोई उत्साह नहीं था, एक नये दिन का स्वागत करे ऐसा कुछ भी नहीं था, बल्कि यह भावना थी कि एक और पहाड़ सा दिन, फिर धीरे-धीरे दिनचर्या शुरू की तो रूचि जगने लगी और यह बात भी याद आई कि इतना व्यस्त रहना चाहिए कि यह सब सोचने का वक्त ही न मिले, पर मन तो हर वक्त अपने साथ रहता है जो यह याद दिलाता रहता है.




Tuesday, August 21, 2012

फिर आया भूमि कंप



आज सोनू जल्दी उठ गया, उसकी नाक जुकाम से लाल हो गयी है. बीच-बीच में उसे सम्भालते व कपड़े धोते आज काफ़ी समय लग गया, सारा काम व्यवस्थित ढंग से नहीं हो पाया जैसे रोज होता है. उसका खुद का गला भी खिचखिच कर रहा है. कल शाम जब जून आया तो वह पिछले दरवाजे से बाहर जाकर खिड़की के पास खड़ी थी, लगातार खांसी हो रही थी और आँखों से पानी आ रहा था. ऐसे में किसी के सामने रहना उसे अच्छा नहीं लगता, जून की बात और है, वह उसे अंदर ले गया, पानी दिया और सहेजा. बाद में उनके एक परिचित दम्पत्ति अपनी सुंदर नन्हीं बिटिया को लेकर आये. जन्मदिन के फोटो बन कर आ गए है, पर वह बात नहीं है जो होनी चाहिए थी.

आज कितनी गर्मी है, पसीना पोंछते-पोंछते तौलिया भीग जाता है, सुबह से इधर-उधर चलते भागते काम करते सवा दस हो गए हैं. सुबह देर से उठो तो सभी कामों में देर होती चली जाती है. अगर घर का काम करते ही रहो तो कभी खत्म होने को ही नहीं आता, सुरसा के मुँह की तरह फैलता ही चला  जाता है. आराम करने के लिये भी वक्त चुराना पड़ता है दस मिनट ही सही, नन्हा आज ठीक लग रहा है, अभी बाहर पड़ोस की दीदी के साथ उसके घर गया है. सभी के पत्रों के जवाब लिखने हैं  उसने सोचा दोपहर में लिखेगी जब नन्हा सो जायेगा.

परसों वह सासूमाँ व ननद को लेकर अपनी एक तेलुगु मित्र के यहाँ गई थी और कल शाम उड़िया दम्पत्ति के यहाँ. नई दुल्हन ने बहुत अच्छा खाना बनाया था, पांच तरह की सब्जियां थीं. जून इस समय नहरकटिया गए हैं. तेरह को यदि बंद हुआ तो माँ की वापसी की टिकट कैंसिल करानी होगी.

कल सुबह वह किचन में दलिया निकाल रही थी कि भूकम्प का झटका लगा. जून ने आवाज दी और उसके बाद एकाध मिनट तक पूरा घर जैसे झूल रहा था. रात को समाचारों में सुना कि पश्चिम बंगाल, बिहार व दिल्ली में भी भूचाल आया था.

पिछ्ले एक घंटे से लगातार तेज वर्षा हो रही है. सब ओर पानी ही पानी झरर झरर झरता हुआ और बादलों की गड़गड़ाहट ! मानों आकाश में हजारों छेद हो गए हैं जिनमें से पानी छन रहा है. कल  दोपहर वे तिनसुकिया गए थे, उसने कितने दिनों से सोचा था कि वाल्मीकि रामायण लायेंगे पर वहाँ जाकर पता करना याद ही नहीं रहा. भोजन में आज वह उत्तपम बना रही है, सो केवल नन्हें के लिये खिचड़ी बनानी है जिसमें वह सभी सब्जियां डाल देगी. वह बाहर खेलने गया है, दादी व बुआ कार्ड्स खेलने के लिये बुला रही हैं.