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Monday, December 28, 2015

जाता हुआ वर्ष


वे कल घर लौट आये, अभी यात्रा की थकान पूरी तरह नहीं गयी है. घर भी पूरी तरह पुनः व्यवस्थित नहीं हुआ है. पेट में कैसी खलबली मची है. तरह-तरह के भोजन, जगह-जगह का पानी पीकर कुछ तो असर पड़ना ही था. मौसम भी एकदम से बदल गया है, वहाँ गर्मी थी यहाँ ठंड जोरों पर है. आज सुबह बहन व परिवार के अन्य सभी सदस्यों पर कविताएँ लिखीं, छोटी-छोटी तुकबन्दियाँ ! दोपहर को एक आलेख शुरू किया है, अभी दोएक दिन लगेंगे, मन में कितनी ही बातें हैं. कल रात स्वप्न में यूएइ ही देखती रही, खबूस खायी. जो मन पर अंकित है, वही तो पन्नों पर अंकित हो रहा है. यहाँ बगीचे में गुलदाउदी खिली है. शेष फूलों की पौध अभी लगनी है. वर्ष का यह अंतिम महीना है.

आज सुबह पांच बजे उठे, ठंड काफी थी पर ऐसी ठंड में भी उनकी नैनी बिना स्वेटर पहने ही रहती है, पता नहीं वह किस मिट्टी की बनी है. उसने ठंड पर विजय पा ली है, यहाँ वह है दो स्वेटर पहने है, तिस पर भी धूप में बैठी है. बरामदे में धूप आ रही है. भोजन बन गया है, सुबह के सभी आवश्यक कार्य भी हो चुके हैं. नैनी की बेटी पढ़ने आती है पर आज अभी तक नहीं आई, उसकी माँ को पढ़ाई का महत्व पता नहीं है, स्वयं अनपढ़ है सो क्या जाने कि पढ़ना-लिखना इन्सान के लिए कितना आवश्यक है. नन्हा परसों आ रहा है, वे उसे लेने जायेंगे. कल शाम वे एक मित्र परिवार के यहाँ गये, जन्मदिन की बधाई देने, वापसी में वह अपना पर्स वहीं भूल आई, दुबारा जाकर लाना पड़ा, मन कितना बेहोशी में जीता है. मन तो जड़ है ही, वे सजग नहीं रह पाते, मशीनवत काम करते हैं. मन कहीं और होता है, हाथ कुछ और कर रहे होते हैं. असजगता ही बंधन है वही दुःख में डालती है.


साल का अंतिम दिन ! कल मैराथन में भाग लिया, जैसी उम्मीद थी, प्रथम आई. रास्ते में एक बार लड़खड़ा गयी पर जैसे किसी ने सम्भाल लिया, कुछ विशेष चोट भी नहीं लगी, न ही उसके कारण कोई आगे निकल पाया. दिन भर खूब आराम किया. थोड़ी थकन अभी भी है तन में, पर मन तो जैसे है ही नहीं, प्रेम का अनुभव उसे गलाये जा रहा है. प्रेम इन्सान को कितना महान बना देता है. एक क्षुद्र, अनपढ़ गाँव का भोला व्यक्ति भी यदि अपने भीतर प्रेम का अनुभव करता है तो वह संसार का सबसे धनी व्यक्ति होगा. वह सद्गुरू के प्रति, परमात्मा के प्रति और उसकी इस अनमोल सृष्टि के प्रति असीम प्रेम का अनुभव करती है, भीतर जो संगीत गूंजता है, वह उसे भुलाने नहीं देता जो सार्थक है, जो शाश्वत है और जो सत्य है, इस अस्तित्त्व से प्रेम करना जिसे आ जाता है, अस्तित्त्व भी उससे प्रेम करता है. इस वर्ष उसकी चेतना और मुखर हुई है, विकसित हुई है. अब इस बात का डर नहीं है कि कहीं पथ से विचलित न हो जाए, क्योंकि अब भीतर कुछ जग गया है कुछ पनप गया है जो अब खुद जगायेगा. अब मन पहले से जल्दी ठहर जाता है. इस वर्ष कवितायें भी कुछ अधिक लिखी गयीं, ऐसे कवितायें जो कुछ लोगों को ख़ुशी दे गयीं. सभी के भीतर उसी परमात्मा को देखने का अभ्यास भी बढ़ा है और भीतर शांति का झरना भी निरंतर बहता है. जाता हुआ साल ढेर सारी यादें देकर जा रहा है, पर अब वर्तमान में रहने की इतनी आदत हो गयी है कि इस वक्त कुछ भी याद नहीं आ रहा !

Wednesday, October 7, 2015

मिनी मैराथन


सदगुरु कहते हैं कि ‘खुदा’ कुछ लोगों को दिखाई नहीं देता पर उन्हें तो उसके सिवा कुछ दिखाई नहीं देता. यह सृष्टि और परमात्मा अलग-अलग नहीं हैं. परमात्मा सबके भीतर उसी तरह समाया है जैसे फूल में खुशबू ! कृषि, ऋषि और ख़ुशी का देश भारत तभी विकास के पथ पर आगे बढ़ सकता है जब वे अपने भीतर गुरू तत्व को जगाएं, अपने आचरण से दूसरों को सिखाएं ! ज्ञान उनके आचरण में झलके ! सदगुरू अपने आचरण से, अपने व्यवहार से सारी दुनिया को यह संदेश दे ही रहे हैं. अब उन्हें देखना है कि उनकी बुद्धि कैसे शुद्ध बने, उनके मन कैसे शांत हों. आज नये वर्ष के प्रथम दिन सुबह-सुबह सदगुरू के अमृत वचन सुने. आने वाले शेष सारे दिनों में भी उनकी स्मृति सदा बनी रहे, यही कामना है. यह वर्ष उसे परमात्मा के और निकट ले जायेगा. सेवा के नये अवसर मिलेंगे और अंतर्मन शुद्ध होगा. सेवा वे अपने मन व वचन से भी कर सकते हैं यदि कर्म से न कर पा रहे हैं. जिसको अपने लिए कुछ करना नहीं, कुछ पाना नहीं और कुछ जानना नहीं, जो कृत-कृत्य है, प्राप्त-प्राप्तव्य और ज्ञात-ज्ञातव्य है, वही ईश्वर-कृपा का अधिकारी है. उसके जीवन का प्रत्येक क्षण जगत के लिए सुखकर हो, शुभ हो ! वाणी सौम्य हो तथा कर्म बंधनकारी न हों. पूर्वजों को सुख देने वाले हों तथा प्रियजनों के लिए हितकारी हों ! उसकी हर श्वास नाम से युक्त हो, पवित्र आत्मा में सदा उसकी स्थिति हो ! भगवान को अपना मानकर जब भक्त उनका स्मरण करता है तो वह सदा योग में बना रहता है, वह असंग रहता है दुःख से भी व सुख से भी. वह अकर्ता भाव में रहता है. उसके संकल्प व्यर्थ नहीं होते, कर्म में अवश्य परिणत होते हैं. उसका हृदय खाली रहता है ताकि प्रभु उसे अपना निवास बना लें.
आज सद्गुरु ने कहा कि जब कोई किसी से प्रेम करता है तो बार-बार उसका नाम पुकारता है, उसकी चर्चा करता है, ऐसे ही भक्त भी जप करता है तो वह प्रेम में होता है. ऐसा जप उसे भीतर से आनंद प्रदान करता है. प्रेम अथवा ध्यान दोनों में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा. आज नन्हा वापस हॉस्टल चला गया, वह शांत है और समझदार भी. नये वर्ष की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान लगभग सभी से हो गया है. आज उसे मिनि मैराथन का पुरस्कार मिलेगा. उसकी छात्रा ने नये वर्ष  का कार्ड दिया, उसे हिंदी पढ़ाना सफल हुआ है. कल एक सखी की सिंगापूर यात्रा के फोटो देखे त्तथा वह सामान भी जो वे वहाँ से लाये हैं, कुछ देर ‘परचर्चा’ भी की. किसी की अनुपस्थिति में उनके बारे में बातें करना ठीक नहीं है. पिछले हफ्ते मन जिस द्वेष के कारण दुखी था, वह अब दूर हो गया है, यदि असंग रहकर कोई घटनाओं को देखे तो कोई दुःख कभी न रहे.

आज भी सदगुरू के वचन सुने, अमृत के समान मधुर और हितकारी वचन ! अहंकार से मुक्त होकर जब मन कामना रहित होता है अथवा तो परहित के अतिरिक्त या ईश्वर के प्रति प्रेम के अतिरिक्त कोई कामना नहीं रहती, उसी क्षण मन आत्मा में टिक जाता है. आत्मा में जिसकी सदा ही स्थिति हो ऐसा मन शरणागति में जा सकता है, उसमें कोई उद्वेग नहीं है, वह राग-द्वेष से परे है, उनका लक्ष्य वही है. इस क्षण उसके मन में कोई कामना नहीं है, कैसी गहन शांति है भीतर...गहन मौन..वे कहते हैं इस मौन में ही सत्व का जन्म होता है, उसकी तरंगें न केवल भीतर बल्कि बाहर का वातावरण भी पावन कर देती है. आज दोपहर भूपाली राग का अभ्यास किया, संगीत आत्मा को झंकृत कर देता है. कल शाम नृत्य-संगीत का अद्भुत संगम क्लब के वार्षिक उत्सव के दौरान देखा व हृदयंगम किया, वापस आकर ओशो को सुना. ध्यान का आनंद छुपाओ और फिर जब भीतर लबालब भर जाये तो उसे बाहर लुटाओ, शीघ्रता न करो. उसे अपने भीतर रुनझुन.. कभी वंशी सुनाई देती है, प्रकाश की अद्भुत छटा दिखती है. कभी-कभी अचानक सारा शरीर जड़वत् हो जाता है, लगता है जैसे वह तैर रही है, रोज सुबह परमात्मा उसका नाम लेकर उठाता है !


Wednesday, November 5, 2014

मिनी मैराथन


परसों ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ था, पर एक बार भी याद नहीं आया न ही टीवी या अख़बार में सुना या पढ़ा, इसका सीधा सादा अर्थ उसने यही लगाया कि आजकल वह आँखें, कान, दिल, दिमाग सभी बंद करके जी रही है. अपने इर्दगिर्द के हालात की, लोगों की, उनके विचारों, भावनाओं तक की कोई खबर नहीं रखती, संवेदना शून्य हो जाना इसीको कहते हैं. आज उन्हीं परिचिता से मिलने जाना है, जिनकी विदाई में वह नहीं जा सकी थी. दो दिन बाद वे लोग यहाँ से जा रहे हैं, नन्हे ने एक कार्ड बनाया उन्हें देने के लिए. बाबाजी टीवी पर आ चुके हैं, उन्होंने बताया, नींद नित्य प्रलय है, इसके अतिरिक्त नैमित्तिक प्रलय, आत्यन्तिक प्रलय तथा महाप्रलय भी होती है. फिर कर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला, कर्म चिन्तन पूर्वक होना चाहिए, और चिन्तन शाश्वत हो...पर जिसके मूल में रस नहीं वह फूल खिलेगा कैसे ? जिसके हृदय में स्नेह नहीं, व्यवहार चलेगा कैसे ? जिस दीपक में तेल नहीं वह दीपक जलेगा कैसे ? बाबाजी तो चले गये और उसने उन महिला को फोन किया वह तो मिली नहीं, उनके पतिदेव ने फोन उठाया. आज सुबह इंटरनेट का कनेक्शन नहीं मिला. कल तीन इमेल भेजनी थीं पर सम्भवतः कुछ गड़बड़ है, जून को डर है नहीं पहुँची होंगी. नेपाल में हालात सुधर रहे हैं ऐसा कहना ही पड़ेगा. वाजपेयीजी का आज आपरेशन है, पाकिस्तान के शासक ने शुभकामनायें भजी हैं, इस बार काश्मीर समस्या का स्थायी हल निकल ही जाना चाहिए. रात भर की वर्षा के बाद आज मौसम ठंडा है. उसके अस्थिर मन की तरह लिखाई भी अस्थिर हो रही है ! ईश्वर ही उसकी रक्षा करेंगे !

आज की सुबह भी बादलों से घिरी है, रात को वे जैसे ही सोने के लिए लेटे, नींद से आँखें मुंद गयीं. तिनसुकिया में ‘नन्दन कानन’ में व बाद में बाजार में घूमने से काफी थकान हो गयी थी. खाना भी बाहर ही खाया. साल में दो-एक बार ऐसे घूमना और बाहर खाना अच्छा है पर ज्यादा नहीं. कल सुबह वह उन परिचिता से मिलने गयी, दो दिन बाद ट्रक में उनका सामान लोड होगा. बातचीत में दोनों ने कहा, भविष्य में आज से अठारह-उन्नीस वर्षों बाद वे उनसे मिल सकते हैं रिटायर्मेंट के बाद जब वे भी दिल्ली रहने जायेंगे. दोपहर में नन्हे का एक मित्र आ गया और इधर-उधर की बातें करता रहा, बाद में वे तिनसुकिया गये. नैनी के लिए एक पंखा लाकर दिया है, अगले कुछ महीनों में पैसे चुकाएगी, ऐसा उसने कहा है, ज्यादा काम भी करेगी. आज भी बाबाजी ने सुंदर वचन कहे, ईश्वर तो सदा सर्वदा है, उसे खोजना नहीं है बस पर्दा उठाकर उसे देखना भर है. वह सच्चाई है, अंतरात्मा है, जिसे मानव नकारते रहते हैं. कल उसने उस सखी के लिए एक उपहार भी लिया जिसका जन्मदिन अगले हफ्ते है. दो दिन बाद मैराथन दौड़ भी है पर शायद वह नहीं जा पाए, वे जो चाहते हैं हमेशा वही उनके लिए सही नहीं होता. घर से फोन नहीं आया है न ही मकान के पैसों का चेक, जिसे जमा करके जून नई जमीन के कागजात लेंगे, शायद उन्हें जाना भी पड़े. सिवाय प्रतीक्षा के वे फ़िलहाल कुछ नहीं कर सकते. नन्हा कुछ देर बाद पढने जायेगा, उसका सुबह का काम भी तभी शुरू होगा.

ज्ञान को अपने हृदय कलश में भरने के लिए आवश्यक है कि वे अपने मन को खुला रखें, विचारों को संकीर्ण न बनाएं. बल, बुद्धि, विद्या, धैर्य को यदि अपना मित्र बनाना है तो हृदय को विशाल बनाना होगा. आज बाबाजी बच्चों को सिखा रहे हैं. इस समय आठ बजे हैं, उसका स्नान-ध्यान हो चुका है, नन्हा अभी नाश्ता खा रहा है. सुबह उठकर एक घंटा कम्प्यूटर पर बिताया, न्यूज़ पढ़ीं, एक इमेल भी आया था. दीदी और बंगाली सखी ने उसके मेल का जवाब अभी नहीं दिया है. कल मिनी मैराथन है, सम्भवतः वह जा सकेगी, आज शाम को ही वाकिंग करते समय पता चल जायेगा. पुरस्कार न भी मिले तो भी भाग लेना अपने आप में एक अनुभव होगा and she loves walking and jogging आज धूप तेज है, white snow ball का एक पौधा ज्यादा पानी से मरने की कगार पर है कल उन्होंने उसे ट्रांसप्लांट किया था.