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Friday, April 5, 2013

होली आने वाली है




पिछले तीन-चार दिन डायरी नहीं खोली, लिखने-पढ़ने का क्रम भी छूट सा गया. इसका कोई कारण समझ में नहीं आ रहा, ऐसा कुछ विशेष कार्य भी नहीं था, हाँ, शनि-इतवार बस यूँ ही गुजर जाते हैं हमेशा ही. शनिवार को वे तिनसुकिया गए थे, जून ने नया दांत लगवा लिया है पर उसके कारण उन्हें दिक्कत होती है, खासकर खाते समय. रविवार को दो मित्र परिवार आये शाम को, उससे पहले वे पड़ोसी के यहाँ गए थे, उनकी सोने की चेन जो खोयी थी, मिली नहीं है और न ही मिलने की उम्मीद है. इस बात के कारण पिछले दिनों उसके मन में व्यर्थ का भ्रम था, इतने दिनों के संशय और उहापोह का अंत सिर्फ फोन में था और वह फोन आखिर उसे ही करना था क्योकि परेशान वह ही थी अपनी भावुकता के कारण. दीदी ने भी पत्र में लिखा है वे तीनों ही सेंटीमेंटल हैं. कल एक अंतराल के बाद दीदी का खत आया है, बहुत बड़ा सा और बेहद अच्छा, उन्हें जल्दी ही जवाब देना है कल नन्हे का अंग्रेजी का टेस्ट था, एक गलती कर दी, जो वह अक्सर करता है. सुबह उठते ही उसने एक अच्छा सा स्वप्न सुनाया हवाई-जहाजों का, बेहद खुश था. कल उसने केक बनाया, सोचा था बहुत अच्छा बनेगा पर अच्छा ही बन पड़ा है, बहुत अच्छा नहीं.. जून ने कहा है आज उबला हुआ भोजन खायेंगे, उसने दाल और सब्जी बस उबाल कर रख दी हैं.

  पिछले हफ्ते उसने डायरी खोली तो है कुछ पंक्तियाँ कादम्बिनी की चित्र देखकर कविता लिखने की प्रतियोगिता के लिए और कुछ होली के लिए लिखने हेतु, पर बात बनी नहीं-
“दे रहे निमंत्रण अधर मधुर
मनुहार छिपी है आँखों में
बिंदिया चमकी कंगन खनके
यूँ अंगड़ाई ली उमंगों में
यूँ बही फागुनी पुरवाई
प्यार बसाये रंगों में....”

यूँ तो सारा आलम उनका वैसे ही दीवाना था
ऊपर से थापें कदमों की न जाने कितने तीर चले

दिल का मामला निकला यह कोई छोटी बात नहीं
हाल सभी के दिल का जानें वह तो छुपे रुस्तम निकले

झूठमूठ के शिकवे शिकायत झूठी अपनी सारी लड़ाई
एक दूजे के लिए बने हैं वे हर्फ यही बस सच निकले

अब के बरस तो रुत होली पर संग संग हैं वे दोनों
दूना रंग लगाने उनको दिल के सब अरमां निकले

  जून कल से मोरान गए हैं, आज आ जायेंगे, तीन-चार बार फोन कर चुके हैं, उनका मन जैसे नन्हे और नूना में ही लगा हुआ है, जैसे उन दोनों का उनमें. आज मौसम ठीक है, कल शाम की भयंकर आंधी और तूफान ने तो डरा ही दिया था, पर आज धूप निकली है. उन्हें घर जाने को आज पूरा एक महीना रह गया है. कुछ देर पहले मन में एक विचार आया कि होली पर जो कुछ लोगों को बुलाने का विचार है उसे रहने दें, नन्हे की परीक्षाएं भी नजदीक आ रही हैं, और वैसे भी तो शायद यह एक औपचारिकता मात्र ही नहीं है क्या, मिलने आना तो दूर फोन तक करने में जो कंजूसी करें उन्हें.... ?




Wednesday, September 12, 2012

खिलौने की दुकान



खत आया है, ठीक से पहुंच गए थे, एक दिन लेट होने से कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि जीएम नहीं थे. मार्च का अंतिम दिन, फागुन का अवसान, अप्रैल का महीना यानि गर्मियों की शुरुआत ! आज सुबह पांच बजे उठी, नन्हा भी साथ ही उठ गया पर आधे घंटे बाद फिर सो गया. इस वक्त खेल रहा है ऊपर मकान मालिक की छोटी बेटी के साथ. कल अप्रैल फूल है, बचपन याद आ जाता है इस दिन, पडोस की एक लड़की एक बार साबुन को बर्फी की तरह काट कर लायी थी पहचानना मुश्किल था, रेडियो पर अनाउंसर भी सुबह से अजीब-अजीब बातें शुरू कर देते थे. बहुत दिनों बाद उसने रीठा-आंवला-शिकाकाई से बाल धोए. कितना अपनापन लगता है यहाँ कभी-कभी, जून वहाँ अकेले हैं, यही बात खलती है. बाबूजी, मकानमालिक के बूढ़े पिता को गुस्सा आ रहा है कि पड़ोसी उनकी दीवार पर (जो दोनों की साझी दीवार है) टाइल्स क्यों लगा रहा है, पिता भी उनका साथ दे रहे हैं इस क्रोध में.

कल रात एक अजीब हादसा हुआ, बाबूजी के बेटे ने अपनी किशोरी कन्या को टीवी खराब हो जाने के कारण बेतहाशा मारना शुरू कर दिया, वह जरूर नशे रहे होंगे. ननद ने बताया, यह कोई नई बात नहीं है, कितनी ही बार ऐसा लड़ाई-झगड़ा करते हैं. नशे में इंसान, इंसान नहीं रह जाता, हैवान ही बन जाता है. कल रात उसका मन बहुत परेशान हो गया था घर की याद आ रही थी. उसे नहीं लगता कि एक साल वह यहाँ रह पायेगी. उसे याद आया, बाजार से अंतर्देशीय पत्र लाने हैं, सभी को जवाब देने हैं.

अभी उसे दशाश्वमेधघाट जाना है, माँ के साथ टहलने व कुछ सब्जी लेने. कल नन्हें को लेकर पहली बार गयी खिलौने की दुकान में, हर बार वे तीनों साथ होते थे. घर लाते ही एक पंख खराब भी कर दिया पर उसकी खुशी, उसकी आँखों की चमक, खिलौने की दुकान पर जाने का उसका अनुभव भी तो बहुत है, उसे जैसी कार चाहिए थी वैसी नहीं मिली. कल जून, बड़ी भाभी व बड़ी ननद के पत्र आए. जून को उसकी याद उतनी नहीं आती जितनी उसे या वह लिखता नहीं है. उसका पर्स खाली होता जा रहा है, उसे लिखे या पहले वह.

थोड़ी देर पूर्व ही वह पढ़ने बैठी है, पर ऑंखें हैं कि साथ नहीं दे रही हैं. आधा घंटा और बैठकर वह खाना बनाने ऊपर किचन में जायेगी. नन्हें को जो जहाज ले दिया था, खराब कर दिया है उसने, क्या यह धन की अपव्ययता है, शायद नहीं, थोड़ी देर के लिये उसकी खुशी से कीमत वसूल हो गयी. पर ऐसी थोड़ी देर की खुशी कम कीमत के खिलौने से भी मिल सकती थी. खैर जो हुआ सो हुआ. अब उसके पापा ही खरीद देंगे उसे. कल एक पत्र और लिखा, कुल छह पत्र लिख चुकी है पर जवाब एक का ही, कहाँ जाते हैं उसके खत. माँ आज फिर बहुत उदास हैं, उनके मन की क्या अवस्था है वह नहीं जान सकती, पर कब तक, आखिर कब तक वह यूँ निष्क्रियता का आवरण ओढ़े रहेंगी, उदासीन होकर कितने दिन जिया जा सकता है, मन को खुश रखना पड़ता है, उसके लिए कोशिश करनी पडती है, मगर कोई चाहे तब तो.

Saturday, August 4, 2012

बीहू का अवकाश


वर्षा अभी थमी नहीं है, आज भी बीहू का अवकाश है, नया वर्ष आरम्भ हुआ है तो ‘म्यूजिक कॉर्नर’ वाले उनकी सिलाई मशीन आज ठीक नहीं करेंगे क्योंकि नए वर्ष के पहले दिन वे कोई काम नहीं करते. जून कुछ देर के लिये ओ.सी.एस. गए थे, लौट आये हैं और व्यस्त हैं. नन्हा उनकी नई उड़िया पड़ोसन के घर गया है. पिछले दो दिन से वह कुछ परेशान लगता है, बेवजह ही रोता है, शायद बेवजह नहीं, पर वे समझ नहीं पाते. शायद वे उसकी ओर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं. छुट्टी के दिन वैसे भी घर में काम ज्यादा होता है और सुबह सोकर देर से उठने से और भी समय कम मिलता है. कल शाम नूना का मन अशांत था, जैसे मन में कितना कुछ घुमड़ रहा था. शाम को वे लोग एक पुराने परिचित के यहाँ गए थे, पर उनका व्यवहार उदासीनता भरा था, वह कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है, उसे लगा अब उनके सम्बन्धों में वह पहले जैसी बात नहीं है.

वर्षा के कारण लगता है महरी आज भी काम पर नहीं आयेगी, उसे छाता खरीदने के लिये पैसे देने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं. नन्हा अभी कुछ देर पूर्व ही सोकर उठा है और इस समय दूध पी रहा है, लेकिन कब पीना छोड़ कर खेलने बैठ जायेगा कुछ नहीं कह सकते, बीच-बीच में वह उस पर नजर रखती है. उसका रोज का काम अभी आधा ही हुआ है और यदि बर्तन व कपड़े भी धोने पड़े तो पूरे ग्यारह ही बजेंगे आज. कल शाम उन्होंने नए पड़ोसी उड़िया जोड़े को चाय पर बुलाया था, नयी दुल्हन में उसे बहुत बचपना लगा.

परसों शाम या कहें दिन भर ही कुछ अनाप-शनाप सभी कुछ खाया सो कल सुबह से ही सिर भारी था. शाम को जाकर ठीक हुआ. मानसिक तनाव के कारण सिरदर्द होता है इसका अनुभव उसे कभी नहीं हुआ पर अपच के कारण कई बार हुआ है. जून ने उसकी बहुत देखभाल की. खाना बनाने में भी सहायता की, पर भिन्डी की सब्जी जो उसने बनायी, नमक भूल गया. कल क्लब में उनकी देखी हुई ‘इंकलाब’ फिल्म थी, मौसम ठंडा था वर्षा भी यदाकदा हो जाती थी, सो वे नहीं गए.

आज उसने कई दिन बाद योग के आसन किये. परिणाम पता नहीं क्या हो. चाहे इसका कोई ठोस कारण न हो पर उसे ऐसा लगता है की नन्हे के जन्म के बाद वह जब भी कुछ दिन व्यायाम करती है, दो एक हफ्ते तो ठीक रहती है फिर कुछ न कुछ समस्या अवश्य होती है. सर्दी, जुकाम, सरदर्द या कमर में दर्द कुछ न कुछ. नन्हे के ऊँ ऊँ की आवाज आ रही है, अभी चुप होकर जब वह उसे आवाज देगा तभी वह जायेगी, नहीं तो रोने का जो मूड उठते समय शुरू हुआ है, वह भूलेगा नहीं. कल फिर वर्षा होती रही, वे कहीं नहीं गए, सुबह वह कुछ देर के लिये पड़ोस में गयी और शाम को सामने रहने वाली अकेली लड़की के यहाँ, पर शायद उसे उसके आने की उम्मीद नहीं थी, वह नर्वस हो गयी जब उसके बेड पर सोये एक व्यक्ति को उसने देखा, उसे न तो आश्चर्य हुआ न ही इससे कोई मतलब है, पर उसने तय किया है अब वह उसके घर तभी जायेगी जब पूरा पता हो कि वह अकेली है. कल टीवी पर ‘श्रावंती’ एक अच्छी तेलेगु फिल्म देखी, परसों रात की ‘विद्यापति’ इससे कहीं ऊपर थी.




Saturday, May 26, 2012

पानी चला गया


कल सुबह पौने नौ बजे पानी व बिजली दोनों नदारद हो गए कुछ घंटो के लिये, वापस आये सवा  तीन बजे, कुछ पानी हमेशा गर्म पानी की टंकी में रहता है सो काम किसी तरह चल गया. कम पानी से काम चलाना कोई उनकी महरी से सीखे, आधी बाल्टी पानी में उसने सारे बर्तन धो दिए फिर उनके इस्तेमाल के लिये कहीं से एक बाल्टी पानी ले आयी. जून ने उसे फिर समझाया कि मनुष्य में हर परिस्थिति में रहने की, सामंजस्य बिठाने की ताकत होनी चाहिए. कल दोपहर गर्मी की वजह से वह बहुत परेशान हो गयी थी.
आज सुबह वे सो ही रहे थे कि उनके पड़ोसी के द्वारा मालूम हुआ कि उनकी पत्नी ने बीती रात साढ़े बारह बजे बेटे को जन्म दिया है, नूना ने सोचा उसका जन्मदिन छह जून को मनाया जायेगा, वह उसे देखने जायेगी,
वह जून के साथ अस्पताल गयी थी उसकी सखी ने बताया कि अंत में आपरेशन करना पड़ा. जून कहता है कि उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं होगी, काश ! ऐसा ही हो, उसने सोचा. देह का दर्द तो सहा जा सकता है पर मन का भय कहीं ज्यादा है. आजकल उसे रात भर में नींद बहुत कम आती है. उसकी मानसिक असहजता बढ़ गयी है, वह जल्दी-जल्दी अधीर हो जाती है. जून उसे समझाता है पर प्रश्न यह है कि उसे दुःख है ही क्या ? सिवाय उसके मन की दुर्बलता के, और इसे और कोई दूर नहीं कर सकता जब तक कि वह स्वयं न चाहे.


Sunday, April 29, 2012

नन्ही बिट्टू


आज वसंत पंचमी है, ऋतुओं का राजा वसंत ! उसका आगमन हो और अंतर पुलक से न भरा हो, यह हो ही नहीं सकता. आज मौसम भी सुहावना है, दिन में धूप खिली थी और इस समय चाँद उगा है, तारे भी टिमटिमा रहे हैं. आज उसका खत आया है, लिखा है, वह जल्दी आयेगा और उसे भी नूना की तरह कभी-कभी रात को देर तक नींद नहीं आती. उसने सोचा, क्या पता वह कब आ जाये, और कहे, “चलो, घर चलो”.
और एक दिन वह सुबह सोकर उठी तो देखा कि जून आ गया है. उसी दिन शाम को वे सहारनपुर गए और उसके अगले दिन वाराणसी के लिये रवाना हो गए.  दो दिन वहाँ रहकर कल ही वे अपने घर आ गए हैं. वह बहुत खुश है.
मार्च का आरम्भ हो चुका है, आजकल उसे लिखने का समय कम मिलता है. कितनी व्यस्त रहती है वह अपने छोटे से परिवार में. नया मेहमान आने में चार महीने से भी कम समय रह गया है. जून उसका बहुत ख्याल रखता है बहुत सारी पौष्टिक वस्तुएं लाकर रख दी हैं. दूध भी दिन में तीन-चार बार पीने को कहता है. कल कह रहा था कि वह बहुत दुबली है, खुश रहे तो जल्दी तंदरुस्त हो जायेगी, यूँ वह खुश तो रहती है इतने दिनों के अलगाव के बाद वे साथ हैं. उसने गिना पूरे ४९ दिन वे दूर थे. कल शाम वे पड़ोस के दो परिवारों से मिलने गए. पुनः नन्ही बिट्टू से मिलकर उन्हें बहुत अच्छा लगा.