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Thursday, April 9, 2026

बैनरघट्टा नेचर कैंप’

बैनरघट्टा नेचर कैंप


आज शाम वे दोनों आश्रम गये थे। वहाँ संगीतमय फ़ौवारे चल रहे थे, और लड़ियों के प्रकाश से विशालाक्षी मंटप सजा हुआ था। वीडियो कॉल पर पापाजी को आश्रम के दर्शन कराये। जून ने अपने एक मित्र को भी आश्रम का सौंदर्य दिखाया। कुछ देर वहाँ के दिव्य वातावरण में बैठे रहे। स्टोर से कुछ किताबें और उपहार ख़रीदे। दिवाली के लिए घी के दीपक भी लिए। नूना दोपहर को तीन घंटे अनुलेखन कार्य करती रही। पिछवाड़े के बगीचे में पपीते का पेड़ जून ने कटवा दिया है, उसके स्थान पर दूसरा पेड़ लगा दिया है। सौ से अधिक फल दिये होंगे इस एक वृक्ष ने, उन्होंने कई लोगों को वितरित भी किए। भारत ने सौ करोड़ वैक्सीन लगाने का रिकॉर्ड बना लिया है।


पापाजी से बात हुई तो उन्होंने कहा, दुनिया में कई लोग ठगने के लिए बैठे हैं, हरेक को सतर्क रहना होगा। साइबर अपराध की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। इस उम्र में भी वह नियम से दो अख़बार पढ़ते हैं, ये समाचार उन्हें वहीं से मिलते हैं। शाम को जून एक नयी झील दिखाने ले गये, जिसका नाम मरियापुरा झील है, थतगुप्पे नामक गाँव में स्थित है। गुरुजी पर बनी एक कॉमिक बुक पढ़ी, बहुत रोचक है।जून प्रतिदिन नौ बजे दफ़्तर जाते हैं, बारह बजे लौट आते हैं।आज उन्होंने सोसाइटी के लिए फ़ैसिलिटी मैनेजर का इंटरव्यू लिया।  


आज शाम जून का हाथ भाप से जल गया, वह मूँग दाल का हलवा बना रहे थे। दाल कुकर में भूनी थी, नूना ने पानी डाला तो भाप ऊपर आ गयी, दो सेकंड ही छुआ होगा भाप ने, पर बहुत ही दर्द हुआ। ठंडे पानी में हाथ रखने से लाभ हुआ।आज नन्हा अपने दो सहयोगियों के साथ किसी अन्य कंपनी के मर्जर की बात करने गया है। कल उसके यहाँ जाना है।


आज सुबह सवा छह बजे वे दोनों नन्हे के यहाँ से लौट आये, कल रात वहीं रुक गये थे।सुबह जून मीटिंग से देर से लौटे। काम आगे बढ़ रहा है, उन्हें यह काम अच्छा लग रहा है। कह रहे थे, दिल की जगह दिमाग़ से काम लेना उन्हें अच्छी तरह आता है।पापाजी से बात हुई, वह अपने मित्र की तेहरवीं में नहीं गये। वह कर्ता भाव से मुक्त होने की बात भी कह रहे थे। नूना से कहा, एक ग़ज़ल में कहीं पर लय टूट रही है, उसे ठीक कर ले। वह कल उसे दुरस्त करने के बाद दुबारा भेजेगी।कल एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग एक-दो दिन उनके यहाँ रुकेंगे।


सुबह नौ बजे मेहमान आ गये थे। शाम की चाय के बाद जून उन्हें झील पर ले गये और उसके बाद सभी टीके फॉल अर्थात थॉटिकल्लू झरना देखने गये। यह मौसमी झरना अति विशाल और बेहद आकर्षक है, वहाँ तक जाने का रास्ता भी अति रोमांचक है।वे सब कभी बैठ कर कभी एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर फिसलन भरी चट्टानों पर बढ़ते हुए ऊपर पहुँचे, तो वहाँ का नजारा अतुलनीय था। अति वेग से श्वेत जल धाराएँ बहती हुई आ रही थीं। वापसी में जून एक अन्य झील दिखाने ले गये। सबने कई सुंदर तस्वीरें उतारीं। रात्रि भोजन में पनीर  की सब्ज़ी जून ने बनायी। उनकी बिटिया को यहाँ रहना अच्छा लग रहा है।अमेरिका में रहने वाले उनके पुत्र से भी बात की।


आज सुबह नाश्ते के बाद जून सभी को 40 एकड़ में फैले पिरामिड वैली स्थान दिखाने ले गये। जहाँ दुनिया का सबसे बड़ा दस मंज़िल ऊँचा मैत्रेय बुद्ध ध्यान पिरामिड है।इसे ब्रह्मर्षि पत्रिजी ने 2003 में बनवाया था।स्वागत कक्ष में उन्हें ध्यान का महत्व बताया गया और छोटा सा ध्यान कराया भी गया, ताकि मुख्य हॉल में जाकर सभी को ध्यान का कुछ न कुछ अनुभव हो सके। दोपहर को लौटकर पहली बार नूना ने शेफ़ कॉर्नर से कुछ भोजन मंगाया, कुछ घर पर बनाया। कल सुबह मेहमान वापस जा रहे हैं। 


जून को कर्नाटक के राज्य दिवस पर एक छोटा सा भाषण देना है। जिसका कुछ अंश उन्हें कन्नड़ भाषा में बोलना होगा।उन्होंने तैयारी कर ली है। रविवार को जून के पूर्व अधिकारी के पूरे परिवार के लिए आयोजित विशेष भोज अच्छा रहा। नन्हा व सोनू अपने कुक से एक दो व्यंजन बनवा कर ले आये थे। जून ने उन्हें घर दिखाया तथा सोसाइटी का एक चक्कर लगवा कर लाए। शाम को असम के एक पुराने परिचित आये, वे आश्रम में एडवांस कोर्स करने आये थे, गुरुजी से भी मिले। उसी समय ‘हेलोवीन’ के लिए विचित्र पोशाकों में सजे बच्चे ट्रीट लेने आये।बड़े उत्साह में भरे वे बच्चे एक घर से दूसरे घर जा रहे थे, जैसे वे लोग बचपन में लोहड़ी माँगने घर-घर जाते थे। 

राज्योत्सव का कार्यक्रम अच्छा रहा।आज गुरुजी द्वारा निर्देशित ध्यान किया। उन्होंने कहा, जब कोई प्रसन्न होता है, भीतर कुछ फैलता है, जब दुखी होता है, भीतर कुछ सिकुड़ता है। जो फैलता व सिकुड़ता है, वह अहंकार है। आत्मा न कभी फैलती है, न कभी सिकुड़ती है।यदि किसी के भीतर अहंकार बना हुआ है, तो यह घाव है, जिसे चोट लगेगी तो दर्द भी होगा। जब दर्द होगा तभी अहंकार का अहसास भी होगा। प्रकृति या परमात्मा चेताते हैं कि यदि दर्द से बचना है तो इस अहंकार से छुटकारा पा लो, यह सारे अनर्थों की जड़ है। इसे मिटाने का एक ही तरीक़ा है, प्रेम, वे प्रेम को प्रकट होने से रोकते हैं और स्वयं को अन्यों से काट लेते हैं। परमात्मा प्रेम है और वे परमात्मा का अंश होने से प्रेम ही हुए !   

     

दिवाली की तैयारी चल रही है।छत पर लाइट्स भी लग गई हैं। जून ढेर सारे फूल ले आये हैं। नन्हे ने दिये भेजे हैं। बड़ी ननद ने चिक्की भेजी है। कल सुबह डेंटिस्ट के पास भी जाना है, नूना को दायीं तरफ़ का ऊपर वाला एक विजडम टूथ निकलवाना है। इन्हें अक़्ल दाढ़ क्यों कहा जाता है, शायद इसलिए कि यह काफ़ी बड़े होने के बाद निकलते हैं।


आज शाम  नन्हा और सोनू आ गये थे, पूजा के बाद सबने दीपक जलाये। सभी परिवार जनों से बात की, विशेष भोज किया और पैदल व कार से घूम कर सोसाइटी के घरों में जल रहे दीपक और लड़ियाँ निहारीं। बाद में वे लोग वापस चले गये। 


आज गोवर्धन पूजा है, यानि छप्पन भोग बनाने का दिन। आज के दिन मंदिरों में विशेष प्रसाद बनाया जाता है। पापा जी ने बताया, उन सभी ने मंदिर में बना भोजन दोपहर को ग्रहण किया। छोटी बहन एक चित्र बना रही थी। कल भाईदूज पर वे लोग दीदी से मिलने जा रहे हैं। 


आज भाईदूज पर नूना ने सभी भाइयों से बात की। जून ने कहा है, इस बार नये साल का स्वागत वे लोग शहर की भीड़भाड़ से दूर जंगल में ‘बैनरघट्टा नेचर कैंप’ में रहकर करेंगे।आज ही वे लोग जिसे देखने गये थे। 


 


Friday, December 4, 2020

गोल्डन पगोडा

 

अभी-अभी छोटी ननद से बात की. वे लोग गोहाटी पहुंच गए हैं कल सुबह यहाँ पहुंच जायेंगे. अगले नौ दिन काफी व्यस्त होंगे और अलग भी. नैनी ने बरामदे में एक सुंदर रंगोली बना दी है उनके स्वागत में. उसके हाथों में हुनर है और दिल में जोश भी. उसने अपने पति को काम दिलवाने के बारे में कहा है पर वे चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. उसे कहा, वह जो काम कर रहा है उसे ही ठीक से करे. क्लब में होने वाली कविता प्रतियोगिता के लिए उसने गुलजार की एक कविता ‘किताबें’ चुनी है, अवश्य ही सबको पसन्द आएगी. 

सुबह समय पर मेहमान आ गए, स्वागत के लिए आरती की थाली सजाई थी, फूलों से उनका स्वागत किया. नाश्ते में अनानास खिलाये, जामुन का जूस दिया और दोपहर को बगीचे से तोड़े नारियल का पानी. वे लोग अपने साथ ढेर सारे बनारसी आम लाये हैं. दोपहर बाद उन्हें ब्रह्मपुत्र नदी पर बना बोगी बील पुल दिखाने ले गए, एक सखी और उसकी बेटी भी साथ गए थे. आज शाम को स्थानीय पाइप से बना पुल देखने जाना है. 


रात्रि के आठ बजने वाले हैं. वे नामसाई वापस लौट आये हैं. कल सुबह नाश्ते के बाद रोइंग होते हुए गोल्डन पगोड़ा पहुंचे थे. भगवान बुद्ध की बहुत विशाल मूर्ति के दर्शन किये और रात्रि में निकट स्थित गेस्ट हाउस में रहे. उनके साथ एक परिवार और गया था. सभी महिलाएं एक गाड़ी में और सभी पुरुष दूसरी गाड़ी में. उन्होंने खूब गाने गए, अंताक्षरी खेली और पहेलियाँ पूछीं, कहानियाँ सुनायीं, सुनीं, गढ़ीं. एक साथ भोजन किया और प्रकृति के नजारों का आनंद लिया. ढेर सारे फोटो खींचे. घर लौटे तो पता चला कि किचन का दरवाजा लॉक हो गया है. कुछ देर तक अपनेआप प्रयत्न करने के बाद मदद के लिए फोन किया, आधे घण्टे बाद खुल गया और फिर रात्रि का भोजन बनाया. 


सुबह अलार्म बजा उसके पूर्व भीतर एक गीत सुनाई दिया, जिसकी एक पंक्ति थी, “आ गयी शुभ घड़ी” कोई है भीतर जो जानता है कि उठने का वक्त हो गया. आज धूप निकली है. पिछले दिनों दिन भर वर्षा होती रही. कल शाम मेहमानों को वापस जाना है. सुबह जामुन के बीजों का पाउडर बनाया जो ननद ले जाएगी. उनके लिए अनानास भी मंगाए हैं. कल शाम उस सखी ने जो उनके साथ घूमने गयी थी, डिनर पर बुलाया था, बहुत सारी डिशेज बनायी थीं. उसके पिताजी से मिलने गयी तो बोले, वह उसे पहचानते ही नहीं, उन्हें अल्जाइमर है. आज सुबह एक सखी के पतिदेव को माइल्ड हार्ट अटैक आया, वह उन्हें लेकर डिब्रूगढ़ गयी है. जबकि सुबह अपना बगीचा दिखाने के लिए उन सभी को बुलाया था. अकेले ही सुंदर बगीचा देखा, उसके बाद सब मृणाल ज्योति गए.  दोपहर को महीनों बाद कैरम खेला. नैनी की देवरानी अपनी मेडिकल रिपोर्ट दिखाने आई, उसका हीमोग्लोबिन बेहद कम था, ईएसआर बहुत ज्यादा, उसे खून चढ़ाना होगा. अगले महीने जून को दो दिनों के लिए गोहाटी जाना पड़ सकता है, असम छोड़ने से पूर्व वह भी एक बार वहां जाना चाहती है.  एक दिन वे कामाख्या जायेंगे और दूसरे दिन कुछ परिचितों के घर मिलने.  


आज सुबह उठे तो वर्षा हो रही थी, छाता लेकर टहलने गए, वापस आकर योग साधना. जून होर्लिक्स पीकर दफ्तर चले गए फिर सवा आठ बजे लौटकर नाश्ता किया.  पिछले एक हफ्ते से यही कार्यक्रम था उनका. घर के सामने वाले हैलीपैड पर आज एक हैलीकॉप्टर उतरा और कुछ देर बाद उड़ गया. गेट पर से ही एक वीडियो बनाया. ननद बाजार गयी है, कुछ सामान खरीदने जो उसे यहां से साथ ले जाना है. पिछले आठ दिन कैसे पंख लगाकर उड़ गए, पता ही नहीं चला. आज उसका मन जैसे पिघल गया है, बात-बात पर बहने को तैयार बैठा है. 


बरसों पुरानी डायरी में लिखी महादेवी वर्मा की ये पंक्तियाँ भी कुछ इसी भाव को दर्शाती हैं - 


प्रथम जब भर आतीं चुपचाप

मोतियों से आँखें नादान 

आंकती तब आंसू का मोल 

तभी तो आ जाता यह ध्यान !


घुमड़ घिर क्यों रोते नव मेघ 

रात बरसा जाती क्यों ओस

पिघल क्यों हिम का उर  अवदात 

भरा  करता सरिता के कोष !

........

जिसका रोदन जिसकी किलकन

मुखरित कर देते सूनापन 

इन मिलन-विरह शिशुओं के बिन 

विस्तृत जग का आंगन सूना 


तेरी सुधि बिन क्षण-क्षण सूना ! 



Tuesday, August 8, 2017

जीवन-चित्र-विचित्र


आज शाम को क्लब में मैजिक शो है. कल ‘गुरू पर्व’ है, ‘देव दीवाली भी’, दूरदर्शन पर वाराणसी से सीधा प्रसारण किया जायेगा, प्रधानमन्त्री भी जायेंगे. परसों वह दो अन्य महिलाओं के साथ दिगबोई व तिनसुकिया के स्कूलों में जायेगी. विकलांग दिवस के अवसर पर मृणाल ज्योति में एक चित्रकला व निबन्ध प्रतियोगिता के लिए निमन्त्रण देना है. सप्ताहांत में एक स्कूल में उसे वाद-विवाद प्रतियोगिता में निर्णायक के रूप में जाना है. लेडिज क्लब की पत्रिका के लिए लेख लिखना है. इस बार विषय क्लब से संबंधित होना चाहिए. बरसों से वह इसमें जा रही है. कितनी ही यादें हैं. लिखना शुरू करे तो कई पन्ने भर जायेंगे. जब इसकी सदस्या बनी थी, उस वक्त को याद करती है तो लगता है कल की ही बात है. आरम्भ में तो अधिक सक्रिय नहीं रही, केवल मीटिंग में सम्मिलित होना ही याद है. फिर एक दिन स्वरचित कविता का पाठ किया जिसके बाद सेक्रेटरी ने वार्षिक कार्यक्रम के लिए हिंदी में कुछ लिखने का काम दिया था. क्लब की पत्रिका में हिंदी लेखों के संपादन का कार्य भी कई बार किया. कितनी ही बार समूह गान में भाग लिया, जिनकी रिहर्सल में जाना एक यादगार अनुभव बन गया है. उन दिनों मीटिंग के बाद की चाय के लिए भोजन घरों पर ही बनाया जाता था. उसे याद है दोपहर को कुछ महिलाएं किसी एक घर में एकत्र होकर यह कार्य करती थीं. रात को भोजन बच जाने पर सभी के यहाँ पहुंचाया जाता था. तब से अब तक बहुत सा पानी गंगा में बह चुका है. अब लोग ज्यादा परिपक्व हो चुके हैं, अब भोजन कुक बनाते हैं परोसने का काम भी उन्हीं के लोग करते हैं. उस समय ज्यादा वक्त वेशभूषा तथा साज-सज्जा पर खर्च होता था, पर आज की महिला अपने को एक पूर्ण व्यक्तित्त्व मानती है. वह समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पहचानती है, उन्हें निभाना चाहती है. क्लब द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न प्रोजेक्ट इसकी गवाही देते हैं.

आज मृणाल ज्योति के संस्थापक महोदय ने अपने जीवन के अनुभव बताये. बहुत रोचक और रोमांचभरी कहानी है उनकी. जीवन में उन्होंने इतने संघर्ष झेले हैं पर उनमें काम करने का जज्बा कूट-कूट कर भरा है. एक बार वह एक बस में यात्रा कर रहे थे. हाथ में रूसी लेखक बोरिस येल्स्तीव की पुस्तक थी. साथ बैठे व्यक्ति ने पूछा, यह पुस्तक कहाँ से मिली, तो उन्होंने कहा, खरीदी है, क्योंकि ऐसी किताबें पढने का शौक है’. उस व्यक्ति ने अपना पता दिया और मिलने को कहा. उन्हें एक सीक्रेट संस्था में काम मिल गया, मगर वह किसी को इस बारे में बता नहीं सकते थे, कोई पहचान पत्र नहीं था. पुलिस तक को पता नहीं था कि ऐसी कोई सरकारी संस्था है. उन्हें वैसी कई पुस्तकें पढने को दी गयीं. नक्सल आन्दोलन तथा गुरिल्ला युद्ध के बारे में जानकारी मिली. प्रशिक्षण दिया गया. उसी दौरान एक बार ऊँचाई से गिर गये, काफी चोट आई. छह महीने इलाज चला. जॉब जारी रहा पर बाद में तनाव बढ़ने लगा. गिरने के कारण सर में चोट आई थी, उसका भी असर था. नौकरी छोड़ दी. आगे पढ़ाई की और अध्यापक बने. उसी दौरान एक केस के सिलसिले में बड़ी बहन ने कहा, इस काम को ऐसे अंजाम दो, तब पता चला वह भी उसी संस्था में थी, अभी तक उसी क्षेत्र में है. घर में किसी भी पता नहीं था कि वह यह काम करती है. जीवन कितना विचित्र है, इतनी बड़ी धरती पर कब, कहाँ क्या हो रहा है, कौन जान सकता है.


कल जून वापस आ गये, घर जैसे भर गया है, पहले की दिनचर्या आरम्भ हो गयी है. आज एकादशी है, लंच में साबूदाने की खिचड़ी बना रही है. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का कोर्स आरम्भ हो रहा है. आज सुबह एक दु:स्वप्न देखा. मेहमान के लिए भोजन बना रही है पर बन नहीं पा रहा है. कभी जल जाता है कभी कुछ और समस्या. मेहमान भी वही है जिसके बारे में एक व्यर्थ विचार मन में जागृत अवस्था में आया था, अर्थात उस स्वप्न का बीज तब बोया गया था. उनके हर भाव, विचार तथा कृत्य का फल मिलता है. कर्म पर ही उनका अधिकार है, फल पर नहीं, फल तो भोगना ही पड़ेगा. यदि उस समय जग जाती तो स्वप्न टूट जाता. सद्गुरू के अनुसार इसी तरह अज्ञान की नींद से जगने पर भी भीतर के सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं. 

Monday, July 10, 2017

देवों के देव


अप्रैल का अंतिम दिन ! आज शाम को घर पर मेहमान आ रहे हैं, एक नन्हा होशियार बच्चा नानू, उसकी माँ और नानी-नाना, एक पुरानी सखी और उसके पतिदेव. भोजन तैयार है, रोटी और चावल तभी बनेंगे. लोभिया, आलू-मुँगौड़ी, सॉस पनीर, भिन्डी, आम की चटनी, रायता, सलाद व मीठे में फिरनी व संदेश. आज की शाम सचमुच बहुत अच्छी रहेगी. कल मई दिवस का अवकाश है या कहें अम्बेडकर जयंती का अवकाश जो बीहू के अवकाश के कारण तब नहीं मिला था. वे तिनसुकिया जाने वाले हैं. उसे जूता खरीदना है और जून को टीशर्ट.

सुबह कोयल की मधुर आवाज से नींद खुली, कमरे के पीछे बाहर आम पेड़ पर रहती है शायद. गुरूजी को भी सुना, बहुत भावपूर्ण संबोधन था उनका. आत्मा को जानने की प्रेरणा दे रहे थे. ज्ञान-प्रवाह में सुना, तन्मात्रा भी समुदाय है, परमात्मा सूक्ष्मतम है, उसका कोई समुदाय नहीं है, वह अकेला है. मई दिवस के कारण नन्हे की भी आज छुट्टी है. छोटी बहन ने आज से फिर जॉब आरम्भ की है. दीदी नार्वे में हैं. छोटी, व मंझली भाभियाँ व्हाट्सएप पर सम्पर्क में हैं. मोबाइल ने सबको करीब ला दिया है. दोपहर को क्लब की एक सदस्य के घर गयी, साहित्यिक प्रतियोगिता के लिए आये लेखों, कविताओं आदि को फ़ाइल में लगाया, नाम हटाये तथा उन्हें क्रमांक दिए. शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर के घर गये, उनकी माँ का कुछ दिन पहले देहांत हुआ था. नर्सरी से पाँच पौधे भी लायी.

सुबह उठी तो लगा भीतर कोई कुछ कह रहा है, बहुत धीमी थी उसकी आवाज पर बहुत स्पष्ट...मन आजकल कितना ठहरा रहता है. कोई उपस्थिति ख़ुशबू बनकर फैली रहती है. टहलने गये तो मध्य से ही आना पड़ा, वर्षा शुरू हो गयी जो अब जाकर थमी है. दिन भर फुहार पड़ती रही. अभी-अभी आकाश में चाँद व एक तारा दिखा. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को बच्चों को सूर्य नमस्कार कराया. ओशो को सुना, आर्ट ऑफ़ लिविंग रेडियो पर भजन सुने. इस तरह एक और दिन, मिल गया था जो उपहार में, बीत गया. परमात्मा की कृपा का अनुभव अब अलग से नहीं होता. हर श्वास उसी की दी हुई है, हर कोई उसी की वजह से है. उसी की लीला खेली जा रही है. पिताजी से बात हुई, नन्हे से भी.

आज सुबह से लगातार वर्ष हो रही है. न सुबह का भ्रमण हुआ न ही शाम को बाहर जा सके, हाँ आधा घंटा जरूर ड्राइव वे पर छाता लगाये टहले. यू ट्यूब पर ‘भारत एक खोज’ में स्वामी विवेकानन्द पर एक एपिसोड देखा. नया फोन तो कमाल का है. इसमें बहुत कुछ कर सकते हैं, देख सकते हैं. सुबह टीवी पर महादेव में इतना डूब गयी थी कि स्वीपर ने आकर कहा, कोई आया है तो समझ ही नहीं पायी. उसने कहा भी कुछ धीरे से, सांकेतिक भाषा में था, पर सजग रहना चाहिए था. दोपहर लिखने में बीती. ‘ध्यान’ का विचार सुबह आया था पर अब जब मन हर समय एक सुमिरन में रहता ही है, अलग से ध्यान करने का मन नहीं होता, इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है, गुरू की कितनी आवश्यकता है साधक को. मनमानी साधना उन्हें मंजिल तक कैसे पहुंचा सकती है, कभी लगता है मंजिल पर ही हैं वे, परमात्मा तो यहीं है, अभी है फिर गुरू की चेतावनी याद आती है कि जिसने सोचा वह पहुंच गया वह भटक गया, यहाँ जो एक बार चल देता है, वह चलता ही रहता है. परमात्मा का कोई अंत नहीं, उसे कोई जान नहीं सकता, उसकी कृपा का अनुभव भर कर सकता है. उसका प्रेम अनुभव कर सकता है, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव से भर सकता है ! वह परमात्मा उनका अपना है !    


Wednesday, October 12, 2016

अ टाउन कॉल्ड मालगुडी

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तीन दिन देखते-देखते बीत गये, उत्सव के दिन. लिखने का समय ही नहीं मिला. आज सुबह से बदली छायी है. कल रात भर वर्षा होती रही, ठंड बढ़ गयी है. उसने दो स्वेटर पहने हैं. फिर भी ध्यान में कंपकंपी होने लगी थी. सुबह-सुबह बाबा रामदेव मात्र धोती पहने योग सिखाते हैं. जून शिवसागर गये हैं, शाम तक आ जायेंगे. सुबह पिताजी ने कहा, रात को तीन बजे उठने पर उन्हें ठंड लगी, उसे ऊनी टोपी बनाने को कहा है. उसने कहा, उठते ही कुछ पहन लेना चाहिए, आल्मारी में उनके लिए मफलर व ऊनी मोज़े भी रखे हैं, पर वे पहनना नहीं चाहते. उन्हें इस बात से ही ख़ुशी होगी कि उसने उनके लिए टोपी बनाई, पहनें या नहीं, इससे ज्यादा अंतर नहीं पड़ता. जून ने कहा, वे चाहते हैं कोई उन्हें याद दिलाये. इंसान अपनी भी जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता. उधर छोटी ननद उनके बिना अकेलापन महसूस कर रही है, वे लोग चाहते हैं घर के पास तबादला हो जाये. मानव को कितने प्रकार के भय सताते हैं. आज वर्षों पहले मंझले भाई द्वारा डायरी में लिखी कविता से प्रेरित होकर लिखी कविता ब्लॉग पर डाली. सुबह दृश्य और द्रष्टा के भेद का वर्णन सुना. सुख में छिपे दुःख को पहचानकर उससे मुक्ति पाने का उपाय समाधि है.

आज धूप निकली है अपने घर से, बल्कि कहें कि बादलों ने उसका रास्ता नहीं रोका है न कुहरे न न कुहासे ने. चारों तरफ कैसी रौनक हो गयी है, रंग निखर आते हैं धूप में, पिछले दो दिन सारा दृश्य एक ही रंग का प्रतीत होता था. जून के ऑफिस में एक विदेशी भूवैज्ञानिक आये हैं क्रिस्टोफर कॉनकार्ड, कल शाम वह एक मित्र परिवार के यहाँ उनसे मिली. वे लन्दन के एक गाँव में रहते हैं. पैंतीस वर्ष के थे तो अपनी पत्नी के साथ मिलकर तेल के क्षेत्र में अपनी कंसल्टेंसी की कम्पनी शुरू की, पत्नी प्रबंध करती है और वह पूरे विश्व में घूम-घूमकर अपना ज्ञान बांटते हैं. दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी, बेटी के तीन बच्चे हैं, लिखती है, बेटा सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता है. दोनों के बचपन की बातें बड़े चाव से बता रहे थे, बातें करने में कुशल हैं. उनके पूर्वज भारत में रहे, काम किया. पत्नी के दादा भी यहाँ रहे थे, हिंदी से परिचित हैं क्योंकि बचपन में सुनी थी. असम कई बार आ चुके हैं, आसपास के तेल क्षेत्र से परिचित हैं. बासठ वर्ष के हैं, इस उम्र में भी बच्चों का सा जोश है. बच्चों से प्यार भी है. जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के स्कूलों में जाकर बच्चों से मिलते हैं और दान भी करते हैं. कुल मिलाकर सीधे, सरल व एक सहृदय कोमल दिल वाले इन्सान हैं. सेन्स ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत है. उनके बारे में एक छोटी सी कविता वह लिखेगी. आज वे उनके साथ मृणाल ज्योति जा रहे हैं.

कल उसने एक छोटी सी कविता लिखी, श्री क्रिस्टोफर के लिए, मृणाल ज्योति का ट्रिप अच्छा रहा. शाम को उन्होंने कविता का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया. आज धूप बहुत तेज है, माँ-पिताजी बाहर धूप में ही बैठे हैं. सुबह सुना मानव को अपने बल का उपयोग संसार की सेवा के लिए करना है न कि अपने सुख के लिए !

आज नेताजी पर एक कविता लिखी. मौसम अब कम ठंडा है, बदली के बावजूद. कल पुनः आग जलायी और आग के चारों ओर बैठकर सर्दियों में मिलने वाली वस्तुएं गजक आदि खायीं, विदेशी मेहमान को बुलाया था. जो भारतीय भोजन आराम से खा लेते हैं. रात को और सुबह भी तमस भर गया था, ध्यान किया तो सत् पुनः प्रबल हो गया. साक्षी होकर इन तीन गुणों का खेल देखते ही बनता है. इस वक्त मन शांत है अर्थात सत् की प्रमुखता है. जून कल लाइब्रेरी से लायी पुस्तक पढ़ रहे हैं आर के नारायण की ‘अ टाउन कॉल्ड मालगुडी’ उसकी पढ़ाई आजकल नहीं हो पाती है. सुबह पाठ करने व नेट पर कवितायें पढ़ने के अलावा कुछ नहीं पढ़ पाती है.      


Friday, August 19, 2016

फूल-पत्तियों वाले कार्ड


आज अभी कुछ ही देर बाद मेहमान आने वाले हैं. पिताजी को भी उनके आने का इंतजार है, माँ को अब किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. मौसम अच्छा है आज भीगा-भीगा सा. उसने सोचा  उनके लिए कुछ लिखे -  
बरस के बादलों ने भी स्वागत किया है
इंतजार क्यों न करे, अति उत्सुक हिया है

दूर देश से उड़ के आये, अधरों पर ओढ़े मुस्कान
दिल्ली में रहे मौज मनाये, अब आये हैं वे आसाम

जून ने अगले कुछ दिनों के लिए अवकाश ले लिया है. आज वे उन्हें लेकर दिगबोई गये. मौसम पहले-पहल अच्छा था, फिर धूप निकल आई. धूप में भी भांजियों ने खूब मस्ती की, विभिन्न पोज देकर तस्वीरें उतारीं. वापसी में मौसम पुनः अच्छा हो गया. वे म्यूजियम भी गये, पार्क में बोटिंग की.

आज दोपहर वे उसके साथ बच्चों की सन्डे योग कक्षा में गये. डाक्टर बहन ने उन्हें स्वच्छता के विषय में जानकारी दी. नाड़ी तथा हृदय के बारे में बताया. चार्ट पेपर पर एक क्रॉसवर्ड बनाकर शरीर के अंगों के नाम सिखाये. लडकियों ने उन्हें प्लास्टिक की बोतल से पेन होल्डर बनाना सिखाया. फूलों और पत्तियों को कागज पर चिपका कर कार्ड बनाना सिखाया. बच्चों को बहुत आनंद आया. रेन क्लैपिंग में तो वाकई उन्हें बहुत खुशी हुई. उनके दिन अच्छे बीत रहे हैं.

कल सुबह छोटी भांजी क्लब में तैरने गयी. वह अच्छी तैराक है. शाम को जून आयल फील्ड दिखाने ले गये, उन्होंने समझाया किस तरह तेल को पानी व गैस से अलग किया जाता है. वापस आकर सभी मिलजुल कर घर का काम करते हैं. छोटी भांजी सलाद सजाती है तो बड़ी टेबल लगा देती है. बीच-बीच में ज्ञान चर्चा भी होती है. माँ-पिताजी को भी उनका साथ भाने लगा है.

कल वे आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर गये थे जहाँ साप्ताहिक सत्संग था, उसके पूर्व गुरुद्वारे तथा काली बाड़ी दिखाए. आज वह बहन को मृणाल ज्योति ले गयी, जहाँ उसे एक मीटिंग में भाग लेना था. मीटिंग के दौरान बहन बाहर टहलती रही, उसे अपना वजन घटाना है सो दिन में कई बार टहलने जाती है. वहाँ उसने एक छोटी तिपहिया साइकिल दान में दी.

आज सभी वापस चले गये हैं. रोजाना की सुबह-सुबह की सैर आज नहीं हुई, क्योंकि वर्षा काफी तेज थी. प्राणायाम किया. जून आज पांच दिनों के बाद दफ्तर गये. वह बहन को एक पड़ोसिन से मिलाने ले गयी. तुलसी का एक पौधा वहाँ से लायी जिसे अभी तक लगाया नहीं है. जाते-जाते बच्चों का वीडियो भी लिया जैसा आते वक्त लिया था. बहन अपनी डायरी छोड़ गयी है ताकि उसे पढ़कर वह कोई कहानी लिख दे ! छोटी भांजी ने भी अपनी एक कहानी दी है, हिंदी अनुवाद के लिए. उनके ढेर सारे चित्र हैं और ढेर सारी यादें हैं. उनके साथ बिताये दिन सुखद याद बन गये हैं !


अज गुरु पूर्णिमा है, सुबह वे सेंटर गये थे. दोपहर को पूजा में भाग लिया, एक बार तो लगा कि जैसे तस्वीर में गुरूजी सजीव हो उठे हैं, उनकी मुस्कान कितनी वास्तविक लग रही थी. आज माँ घर से बाहर जाने के लिए कह रही थीं. आजकल उनको खाने-पीने से अरुचि हो गयी है. पिताजी भी उनकी हालत देखकर परेशान हो गये हैं. 

Thursday, August 14, 2014

मन के मंजीरे -शुभा मुद्गल


कुछ देर पूर्व छोटी बहन का फोन आया, जब वे बच्चों और पिताजी के साथ पहाड़ों पर सुबह की सैर से वापस लौटी. भांजी से बात नहीं हो पाई है अभी तक. आज शाम को जून अपने एक विभाग में आये अतिथि को चाय पर बुला रहे हैं. उसने सोचा है वह पाव-भाजी बनाएगी, वे बंगाली हैं तो बाजार से जून रसगुल्ले भी लेते आएंगे. नन्हे के लिए वे कोलकाता से अभी से ISC physics books लाये हैं दसवीं व बारहवीं की. जून लंच पर आये तो उसने उन्हें उड़िया सखी के फोन की बात बताई, वह उससे पूछ रही थी कि क्या वह English classes में जाएगी जो एक परिचिता अपने घर पर लेने वाली हैं. जून का जवाब ‘न’ होगा यह सोचकर उसने मना कर दिया था, पर अब वह कहते हैं कि वह जा सकती है सो उसने सोचा है इस हफ्ते वह तीन दिन घर पर ही दूसरे कमरे में बैठकर पढ़ेगी, यदि जून और नन्हे को कोई असुविधा नहीं हुई तो अगले हफ्ते से ज्वाइन कर लेगी. उस दिन जो किताब लाइब्रेरी से लायी थी उसमें से एक कहानी पढ़ी, कुछ ऐसा ही उसके साथ हुआ था जब वह स्कूल जाती थी. इसलिए उनकी राय जाने बिना ही मना कर बैठी. लेकिन इसका कोई अफ़सोस नहीं है उसे, न ही यह समझौता है बल्कि इससे त्याग के महत्व का पता चला है. अपनी आवश्यकताएं सीमित रखना, तन की ही नहीं मन की भी. अपनी ख़ुशी अपने अंदर तलाशना, हर हाल में संतुष्ट रहना और परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्य को समझना. नन्हे और जून की जगह पर खुद को रखकर उनकी अपेक्षाओं को जानने का प्रयत्न, सबसे बड़ी बात उनके इस छोटे से घर का वातावरण सदा प्रफ्फुलित रखना !

“तप जीवन में आवश्यक है, अन्तर्मुखी होकर, राग-द्वेष मुक्त होकर, आसक्ति को मिटाकर तप किया जा सकता है. मन को संस्कारों से मुक्त करना ही तप है. मन के दर्पण को ऊपर की ओर स्थित करने से उसमें पड़ने वाली छाया ऊपर ही चली जाएगी”. आज भी बाबा जी ने ज्ञान की शिक्षा दी. सुबह वे जल्दी उठे, आज भी भाई के यहाँ फोन किया पर लाइन नहीं मिली, सम्भवतः टेलीफोन कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से. कल जो मेहमान आये थे उन्हें भी घर फोन करना था, पर नहीं मिला. जून को पाव-भाजी अच्छी लगी. उड़िया सखी को सुबह-सुबह फोन करके पपीते के पौधों की जानकारी दी. जब ध्यान में थी, फोन बजा पर उठने का प्रयास नहीं किया. मन को केन्द्रित करना वैसे ही कितना कठिन है, शीशे पर धूप पडती है और उसे हिलाते हैं तो चमक भी हिलती है. ऐसे ही मन रूपी दर्पण पर बाहरी आघात पड़ता है तो मन चंचल हो उठता है. नन्हे ने क्लब की पत्रिका के लिए एक लेख लिखा है, आज शाम वे उसे देने जायेंगे. उसके स्कूल में ड्रामा रिहर्सल भी शुरू हो गयी है, कुछ ही दिनों में उसका प्लास्टर भी खुल जायेगा और वह पहले की तरह रिटेन टेस्ट दे सकेगा.

It is I o’clock and she is with her diary. Few minutes ago she heard again that song, “meri chuunar ur ur jaye… it is a sweet melodious song, every time when she listens it, it attracts, another songs which she likes on Zee music are “piya basnti aa..and “man ke manjire …sung by Shubha Mudgal. All these songs are melodious and soft., they touch one’s heart. Today she talked to two friends, one was worried due to early/voluntary retirement scheme and other due to her son’s exams but she is not worried at all. Last evening they went to jun’s office and did net surfing. They have copied some wall papers from life positive site, while coming back jun purchased one copy of same magazine for her. This magazine touches one in every way. She liked it from its first issue when they saw it in library. Today weather is changing its mood frequently, earlier it was drizzling but now sun has come again. Nanha was smiling in the morning when jun and she helped him like they used to do when he was a small kid. He is slow these days, cause can use only his left hand. But during all these weeks he complained only once. They all three are one strong unit as a family and have many things common, ie why they love so much.





Friday, July 11, 2014

स्वप्न का संगीत


गर्मियों के दिन थे, चारों ओर से खिड़की दरवाजे बंद, भारी पर्दों के कारण दिन में भी कमरे में खासा अँधेरा था, वह एयर कंडीशड कमरे में हल्का मखमली कम्बल ओढ़े लेटी थी. पास ही माँ भी सोयी थीं कि अचानक उसका छोटा भाई कमरे में एक आगंतुका को लेकर दाखिल हुआ और बोला, दीदी यह तुम्हारी मेहमान हैं, उसने कसमसाई आँखों से देखा, उनकी एक परिचिता थीं. वह सिर हिलाते हुए अभिवादन कर जब बाथरूम की ओर बढ़ी कि आँखें व चेहरा धो ले तब तक वह पलंग के एक किनारे पर बैठ चुकी थी. माँ ने कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए कहा, वरुणा, यहाँ बैठो, वहाँ मिसेज राय बैठेंगी तो वह उठकर इधर आ गयीं. उसके छोटे भाई भी पीछे-पीछे आ गये जब वह चेहरे पर पानी के छींटे डाल रही थी, उसने झुंझलाते हुए कहा, मेहमान को बाहर के ड्राइंग रूम में बैठाया जाता है कि सीधा अंदर के कमरे में ले आते हैं, भाई चुप रहा शायद उसे अपनी गलती का अहसास हो रहा था. पर अचानक उनके कानों में कई आवाजें पड़ने लगीं तो झांककर देखा. कमरे में कई महिलाएं आ चुकी थीं और बैठ चुकी थीं. माँ सबको बैठा रही थीं. तब उसे सूझा कि माँ की ‘महिला सभा’ आज उनके यहाँ होने वाली थी, पर माँ ने तो इसके लिए कोई तैयारी नहीं की थी. कम से कम उसकी जानकारी में तो नहीं, देखते ही देखते उनका विशाल कमरा जो बीच का दरवाजा खोल दिए जाने के कारण और बड़ा हो गया था, लोगों से भर गया. माँ ने एक गान शुरू किया तो कुछ महिलाओं ने उनका साथ देना शुरू कर दिया. अब आने वालों में पुरुष भी शामिल हो गये थे. वह भी एक तरफ बैठ गयी थी, तभी एक लड़की ने जो उसकी ही उम्र की रही होगी सबको सम्बोधित करते हुए कहा, अब आपको कुछ शब्द दोहराने हैं, जो अरबी भाषा में थे पर वे धार्मिक अर्थ नहीं रखते थे. इसके बाद की घटनाओं को याद करके अब भी वह सिहर उठती है.

सभी लोग मनोयोग से कार्यक्रम में भाग ले रहे थे तभी शहनाई वादन की घोषणा हुई, वह माँ की चतुराई की प्रशंसा किये बिना न रह सकी, वह सारा इंतजाम पुख्ता करवा चुकी थीं. वादक जन-समूह से गुजरता हुआ सामने मंच की तरफ बढ़ा, शहनाई के सुर हवा में गूंज रहे थे, वह कुछ देर के लिए उन सुरों में खो गयी थी जब होश आया तो देखा शहनाई उसके हाथ में है और वह पूरी दक्षता से बजा रही है, आयोजकों में से एक ने शहनाई लगभग उससे छीन ही ली, वह इतना ही कह सकी, यह उसके पास कैसे आई ? अगला कार्यक्रम शुरू होने से पूर्व कुछ और घोषणाएं हुईं फिर अख़बार के जैसे कुछ पेपर लोगों को वितरित किये जाने लगे. उसने फिर देखा अपने आप ही उसके हाथों में एक पेपर था, फिर दूसरा और जैसे ही वितरक किसी को पेपर पकड़ाता वह किसी अदृश्य ताकत के बल से उसके हाथों में खिंचा चला आता, आयोजक घबरा गया और टीवी स्क्रीन की ओर सभी का ध्यान आकर्षित करने लगा. उसे भी उसने पढ़ने से मना कर दिया पर न चाहने पर भी उसके हाथ उठने लगे, जिन्हें वह सप्रयास रोकन लगी, कई बार की कोशिश के बाद अचानक हाथ ढीले पढ़ गये और तब उसे लगा कि अब चाह कर भी वह पेपर नहीं पढ़ पायेगी और इस चेतना के होते ही वह फूट-फूट कर रो पड़ी, यह कहते हुए कि उसने इसे हमेशा के लिए खो दिया, कुछ क्षणों के लिए दैवी शक्ति उसे मिली थी पर असावधानीवश उसने उसे खो दिया था. उस पेपर में जाने कौन सा संदेश लिखा था जो प्रकृति उसे सिखाना चाहती थी. उस पल के बाद से उसकी यह कोशिश रहती है कि प्रकृति से दान में मिली प्रतिभा को निखरे उसे व्यर्थ न जाने दे.

कितना अद्भुत स्वप्न उसने कल रात देखा और सुबह उठते ही लिख लिया.    


Thursday, July 10, 2014

चेन्नई की साड़ी


आज ‘जागरण’ में निस्वार्थ सेवा के महत्व के बारे में सुना. उसके सम्मुख भी सेवा एक सुयोग आने वाला है. यह उसकी परीक्षा का समय भी होगा. उस अखंड स्रोत से मन जुड़ा रहे, किसी भी परिस्थिति में झुंझलाहट के चिह्न चेहरे पर न आयें, यही होगी परीक्षा ! कल मीटिंग में वह कविताएँ नहीं पढ़ पायी तो यह बात निराशा का कारण नहीं होनी चाहिए. किन्तु इस क्षण जो उसके हृदय में अकुलाहट हो रही है, इसका कारण क्या है. अन्यों को जज करने की प्रवृत्ति, शासन करने की प्रवृत्ति भी ताप का कारण बनती है. अज्ञान भी ताप को जन्म देता है. देह और मन के साथ सुखी-दुखी होना अज्ञान ही तो है. देह की व्याधि या मन का सुख-दुःख उस शुद्ध स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकते. यदि इसका ज्ञान है तो छोटी-छोटी बातों से स्वयं को तनाव ग्रस्त होने से रोक सकते हैं. कल छोटी बहन का पत्र आया, वह खुश है लेकिन पति की परेशानी को लेकर चिंतित भी. वे लोग मई में उसके पास जायेंगे.

उसने याद किया, ध्यान के लिए कई बातें जरूरी हैं. सबसे पहले तो आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा, फिर सांसारिक बातों से उदासीनता, लक्ष्य का निर्धारण, स्वाध्याय और नियमितता. नियत समय पर नियत विधि से ध्यान किया जाये तो ही परिणाम मिलेगा, लेकिन परिणाम की आकांक्षा न रखते हुए ध्यान करना है. आज सुबह गाइडेड मैडिटेशन में भी वह मन को एकाग्र नहीं रख सकी. सम्भवतः उसकी श्रद्धा दृढ नहीं है, अभी रास्ता बहुत लम्बा है, जिस मार्ग पर बुद्ध, नानक, कबीर, महावीर चले थे इसी रास्ते पर चलना होगा, जाहिर है रास्ता बहुत कठिन है लेकिन असम्भव नहीं. मन को संयत करना अभ्यास और वैराग्य से सम्भव है, ऐसा कृष्ण ने कहा है, कृष्ण ही उसकी सहायता करेंगे. अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए सांसारिक लोभ व आकर्षणों से मुक्त रहने का प्रयास करना होगा. मध्यम मार्ग अपनाते हुए मानसिक विकारों (क्रोध, लोभ, मोह तथा इच्छाएं ) एक-एक कर दूर करते जाना है. मन जितना मुक्त होगा ध्यान उतना ही सम्भव होगा. किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रहे, सचेत रहना है. ईश्वर का ध्यान-भजन करते करते ध्यान स्वयंमेव सिद्ध होने लगेगा.

टीवी पर जागरण आ रहा है, जिसमें मातृ देवो भव ...आदि प्राचीन परंपरा का महत्व बता रहे हैं. आजकल सब अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वृद्ध माता-पिता को भूल जाते है, जिनके कारण वे इस दुनिया में हैं. कल से उसका मन फिर नीचे के स्तरों में चला गया है. कल सुबह से शाम की मीटिंग की बात ध्यान में थी. स्वास्थ्य भी पूर्ण नहीं है, पन्द्रह आने है, शायद यही दो कारण रहे हों. आज सुबह भी मन ध्यान में भटका पर सचेत थी सो वापस लायी. लेकिन बिना किसी व्यवधान के ध्यान कब सधेगा कहना मुश्किल है. मन दुनियावी प्रपंचों में कब खो जाता है पता ही नहीं चलता. सतत् प्रयत्न जारी रखना है मंजिल एक न एक दिन अवश्य मिलेगी. नन्हे की पढ़ाई पूरे जोरों पर है. उसे गणित पढ़ाते वक्त अच्छा लगता है, वह बहुत जल्दी सीख भी जाता है. जून आजकल ठीक हैं, कल उसे लेने आये तो खुश थे, वरना पहले तो हमेशा उदास हो जाते थे. कल उसने चेन्नई से खरीदी नई साड़ी पहली बार पहनी. सोमवार को मेहमान आ रहे हैं, घर की सफाई हो गयी है, सामान भी सब मंगा लिया है. उस समय सारा प्रयास यही रहना चाहिए कि एक क्षण के लिए भी मन उद्व्गिन न हो, ऐसा नहीं कि जबरदस्ती की जाये सहज, स्वाभाविक स्थिति में यदि मन रहे तो स्वतः शांत रहेगा. आतुरता तो वह ऊपर से ओढ़ लेती है. उसे लगा यदि वे भारतीय जीवन शैली अपनायें, संयम, सहन शीलता, सदाचार और प्रेम से ओत-प्रोत हो तो जीवन सहज रह सकता है.


Monday, February 3, 2014

शेफाली का दरख्त


कल-परसों वह कुछ लिख नहीं पायी, आज जून देर से आने वाले हैं, सो समय का सदुपयोग करते हुए डायरी उठा ली है. पर मन में कार्यों की एक सूची बनने लगी है, घर जाने से पहले गाउन ठीक करना है, भाई दूज पर टीका भेजना है. वह तो अपना कर्तव्य पूरा करेगी ही, मन में कई विचार आये और ऊपरी तौर पर हलचल मचाकर चले गये, क्या स्नेह की कोई परीक्षा हो सकती है, या कीमत या बदला, नहीं स्नेह तो बस स्नेह ही है. उसके गले में खराश अभी तक शेष है, पाचन भी पूरी तरह ठीक नहीं है, नन्हे को भी सर्दी लग गयी है, फिर ईश्वर के सिवाय कोई सहाय नजर नहीं आता, वही मदद करेगा जैसे अब तक करता आया है. सुबह दो-तीन फोन करने थे सो व्यायाम भी नहीं कर पायी.

कल दोपहर जून से वह कुछ बात करना चाहती थी, पर वह इसके लिए तैयार नहीं थे. उसने कहीं पढ़ा था, कुछ लोग किसी कीमत पर भी बहस में पड़ना नहीं चाहते सो ऐसी बात कह देते हैं जिन्हें सुनकर सामने वाला घबरा ही जाये. उनका स्वभाव ही ऐसा होता है, खुलकर बात करने से झिझकते हैं, पता नहीं क्यों, सब ठीक-ठाक रहे, दबा छिपा सा, ऊपर से सब सही लगे बस ऐसा ही वे चाहते हैं. सम्बन्धों में खुलापन सहन नहीं कर पाते. किसी विषय पर बात को गहराई तक ले जाना उन्हें नहीं भाता. उथला-उथला ही रहता है सब, ताकि कुछ बिगड़े भी तो ऊपर से संवार दें. यह उनकी परवरिश का हिस्सा है और इसमें यदि वे कुछ चाहें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा नहीं, वह उनके अनुरूप स्वयं को ढाल सके कोशिश तो यही रहती है पर जब कभी अपनी विवशता का अहसास होता है तो..उसके ख्याल से हर स्त्री को अपनी मर्जी से आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जहां उसकी रूचि-अरुचि की परवाह वह स्वयं करे, अपने लिए अपने परिवार के लिए और..यह स्वप्न कभी पूरा होगा...या ?

पिछले दिनों मन कुछ खिंचा-खिंचा सा था, वह कहते हैं न sound body has sound mind सो गले की खराश का असर मन पर हुआ और मन का दायीं कोहनी के ऊपर तथा कान पर. पर अब हालात सुधर रहे हैं और साथ ही मन भी. नन्हा भी कल से बेहतर है.

नन्हे के यूनिट टेस्ट खत्म हो गये, परसों उन्हें जाना है. जून उन दोनों को लेकर होमियोपैथी डॉ के पास गये थे, यात्रा के लिए कुछ दवाएं दी हैं. कल दोपहर उसने तीनों आल्मरियाँ साफ कीं, सलीके से लगे हुए कपड़े अच्छे लग रहे हैं. शाम को वे टहलने भी गये, शेफाली का पेड़ श्वेत फूलों से भर गया है और सुगंध बरबस अपनी ओर खींच लेती है. उसने सोचा उसकी उस बातूनी सखी को यह सुगंध और पेड़ अच्छा लगेगा. माँ का पत्र आया है, उन लोगों ने अभी तक नये घर में शिफ्ट नहीं किया है, वह घर जो उनके घर के सामने है, भविष्य में कई वर्षों के वाद जब वे उस घर में रहने जायेंगे तो पड़ोसी अपने ही लोग होंगे. आज सुबह साढ़े चार बजे उठी, अलार्म सुनने के बाद और सायरन बजने के बीच मन सपनों की दुनिया में उठा, गेट खोला, बाहर फूल थे और धुंधली सी सुबह !

उसकी संगीत अध्यापिका के ससुर की मृत्यु हो गयी कल रात आठ बजे यहीं अस्पताल में. अभी अभी पता चला, पिछले कई दिनों से वह अस्वस्थ थे. पिछले कई दिनों से वह उनके घर जा रही थी पर एक दिन भी बात नहीं की. उन्हें उसके जाने से असुविधा भी होती होगी पर अब वह यह कभी जान नहीं पायेगी. मानव जीवन नश्वर है और जितना समय हमें मिला है शांति और सद्भाव के साथ गुजर सकें तो ही उचित है. पर ऐसा हो हो नहीं पाता है. कभी किसी और कभी किसी कारण लोग संतुष्ट नहीं रह पाते. ईश्वर भी तब अपरिचित लगता है. शायद यह असंतोष उसी का नतीजा है. पूर्णतया स्वयं पर निर्भर रहना इतना आसान नहीं है, अपने हर एक क्षण की, हर मूड की जिम्मेदारी स्वयं लेनी पडती है, तो कभी अपराध भाव, कभी उदासी, कभी असंतोष, कभी आत्मविश्वास की कमी यानि सभी के सभी नकारात्मक भावों का सामना करना पड़ता है. जीवन एक कड़वी दवा लगने लगता है और आसपास की शांति भी असहनीय लगने लगती है.

अभी तक गला ठीक नहीं हुआ है न उसका और न ही नन्हे का. शायद आने वाले सफर और आने वाले दिनों के बारे में सोचकर ही मन परेशान है, या फिर शरीर की अस्वस्थता के कारण सदा उत्साहित रहने वाला मन मुरझा सा गया है, हो सकता है इसका कोई और कारण भी हो, जिसके बारे में वह सोचना नहीं चाहती, जिसने जिन्दगी की गाड़ी में पिछली सीट ले ली है. सुबह उसकी असमिया सखी का फोन आया था, उसने एक ऐसी बात बताई जो उसके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, उसके परिवार में एक नया मेहमान आने वाला है और उसने यह बात किसी और को बताने से मना किया है.




Friday, December 13, 2013

सेवेन इयर्स इन तिबत-Heinrich Harrer


अपनी पुरानी जगह पर (बगीचे में खुलने वाली बैठक की खिड़की के पास वाली कुर्सी पर) बैठकर आज हफ्तों बाद डायरी खोली है, पिछले तीन-चार दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. शनिवार को वे तिनसुकिया गये थे, शुक्र को भी छुट्टी थी, नन्ही मेहमान को यहाँ के मार्केट ले गये थे. इतवार को उसे OCS दिखाया, नाहरकटिया भी ले गये. चारों तरफ सड़कों की हालत बहुत बुरी हो गयी है, पहले सी खूबसूरती दिखाई नहीं देती. कल क्लब गये, छत से सारा क्लब दिखाई देता है, उसने भी पहली बार देखा. भांजी ने दो-तीन उपन्यास खत्म कर दिए हैं और अब रुमाल बना रही है, उसे अकेले बैठकर चुपचाप काम करना पसंद हैं. इस मामले में वह उसकी तरह है. seven years in Tibet by Heinrich Harrer उसने ट्रेन में खत्म की थी, रोचक किताब है, कल लाइब्रेरी से चार किताबें और लायी है.
आज घर पूरी तरह साफ लग रहा है. अभी आलमारियां सहेजनी शेष हैं, पर वह बाद में ही करेगी. कल उसकी पड़ोसिन ने पुनः पूछा, लेडीज क्लब के कार्यक्रम में भाग लेने का विचार है या नहीं, सच बात तो यह है कि जो गाना उन्होंने कोरस के लिए चुना है, उसे जरा भी पसंद नहीं है, पर लोकतंत्र में बहुमत की विजय होती है, अब सबने मिलकर पसंद किया है तो साथ खड़ा होना ही पड़ेगा. नन्हे का सभी विषयों का गृहकार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है, कल से उसने नई कक्षा में जाना शुरू किया है. कल वह भी हिंदी कक्षा के लिए गयी थी.

क्यों बेजार होने पर कलम का सहारा लेता है उसका मन, मन की पीड़ा हो या तन का दर्द, जैसे की सिर का दर्द तब भी लगता है ऐसा कुछ पन्नों पर उकरेगा कि...सारा दर्द भी बह जायेगा पर...ऐसा होता कहां है, कुछ पल के लिए ध्यान जरुर बंट जाता है और तब लगता है मुक्ति का क्षण करीब ही है. नन्हे का गृहकार्य कल रात साढ़े दस बजे तक चला. आज उसे ‘हिंदी समाचार’ पढ़ने हैं और कल English में एक स्पीच, उसे सबके सामने बोलने में ज्यादा झिझक नहीं होती.

कल नन्ही मेहमान को वापस जाना है, इतने दिन कितनी जल्दी बीत गये, परसों से दोपहर को उसकी कमी खलेगी, जब वे दोनों टीवी देखते हुए ‘पारले जी’ बिस्किटस् के साथ चाय पीते थे.  कल शाम को वही सहयात्री मित्र परिवार मिलने आया, इतने दिनों बाद मिलकर बहुत खुशी हुई, कल उन्होंने अपनी कुछ घरेलू बातें भी बतायीं, राजस्थान की यात्रा में उनसे दिन-रात का साथ था, निकटता स्वाभाविक है. उनकी एल्बम से कुछ फोटो जो जून ने नहीं खींचें थे, बनवाने हैं. उसने आखिर एक साड़ी में फाल लगाने का कार्य भी खत्म कर लिया है, यह सोचकर कि अपने हाथ से जो काम कर सकें उसे दूसरों पर नहीं डालना चाहिए. पिछले दिनों वापस आकर एक बार छोटे भाई से बात हुई थी, काफी अरसे से बीमार चल रहे छोटे फूफा जी का देहांत हो गया है, बुआ से मिले कई वर्ष हो गये हैं, इतना बड़ा आघात वह कैसे सह पाएंगी, ईश्वर ही उनकी सहायता करेगा. आज भी एक मृत्यु का समाचार मिला है, एक डॉक्टर जिनको ब्रेन कैंसर था, जिनसे पिछले वर्ष इसी महीने फोन पर बात हुई थी, जो अपनी नैनी के लिए चिंतित थे, उनकी कल स्थानीय अस्पताल में मृत्यु हो गयी. उनकी तकलीफों का अंत इसी में था. वे खुशनसीब हैं कि उन्हें ऐसी कोई तकलीफ नहीं है जिससे मुक्ति मृत्यु में ही नसीब होती हो.

फिर कुछ दिन का अन्तराल, रोज शाम को उसे कोरस के रिहर्सल के लिए जाना होता था, कल उनकी मीटिंग हो गयी, लेडीज क्लब की मासिक सभा जो इस बार उनके एरिया की तरफ से थी, पहली बार उसने कुछ कविताएँ पढ़ीं, कइयों ने तारीफ की, अच्छा लगा अपने पाठकों को स्वयं सुनाने का मौका मिला, पर उसे ज्यादा वक्त देना चाहिए, कल ढूँढने बैठी तो कोई अच्छी कविता मिल ही नहीं रही थी. परसों दो मित्रों के यहाँ जाना था, एक के यहाँ नॉनवेज खाने की गंध आ रही थी, दूसरे के यहाँ शेष मेहमान इतनी देर से आये कि तब तक भूख लग कर समाप्त ही हो गयी थी, बचपन में सुनी दादी के एक बात याद आई, घर से खाकर जाओ तभी बाहर मिलता है.  




Saturday, July 13, 2013

नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस


And she is back ! she had thought that…anyway this experience of anesthesia was more painful. She was lost… and then gained consciousness. It was full of confusion. Yesterday till 3 pm she was feeling some traces of it and then a feeling of weakness but today morning was good except this moment when some fatigue had gripped her, since last one hour she was writing maths paper for Nanha, it may be the cause of it. Today they went for dressing, doctor has said for it alternate day. Her wound is fresh but her spirit is high.

दुर्गम पहाड़ों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरकर
कंटीले, पथरीले रास्तों की चुभन अपने में जज्ब किये
लौट आई है वापस उसकी आत्मा अपने गाँव में...
उस मुश्किल वक्त में भी उसकी पुकार सिर्फ खुद तक महफूज थी
सारे बंधन, वादे और वफायें
इस दुनिया की रीतें छूट गयीं थीं कहीं पीछे
साथ होकर भी जहाँ कोई साथ नहीं होता
ऐसे अनजाने ग्रहों की यात्रा से वापस लौट आई है उसकी आत्मा

आज वह बहुत खुश है, स्वस्थ है न दर्द न कमजोरी. उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की, वह जहाँ कहीं भी है, उसके अंतर्मन का शुक्रिया स्वीकार करे. जून ने फोन पर बताया उसकी छोटी बहन अपने पति व बेटी के साथ १ अक्तूबर को नॉर्थ इस्ट एक्सप्रेस से गोहाटी आ रही है. २ की शाम को वे लोग डे सुपर बस से यहाँ पहुंचेंगे. आज असम बंद है फिर भी नन्हे की बस आ गयी, हालंकि थोड़ा देर से आई. कल उसका अंतिम इम्तहान है और उसके बाद वे मेहमानों के स्वागत की तैयारी करेंगे. जून ने कहा है कम्पनी के हिंदी अनुभाग में हिंदी अध्यापक की जगह खाली है, सप्ताह में तीन दिन और केवल एक घंटे के लिए जाना होगा. यह उसके लिए अच्छा होगा बल्कि बहुत अच्छा.

Nothing seems important to write. Ladies club secretary rang her to tell that club is going to publish a souvenir this year in Nov and she is supposed to do the editing of hindi articles and poems etc. jun said that he has given her name and bio data for hindi classes.These two things might be enough to give her joy but not. It  means there is nothing in the world which can stimulate her mind when it is sad or God knows what. Those inspiring books and those good thoughts and things which sometimes she likes most, seem meaningless. It means when someone is good only then good things appeal to him/her,otherwise when mind is blank, hard and closed nothing can change its state. It means only inner things can help one not outer. It is truly said  that man is the best friend and as well as the worst enemy of himself.


Wednesday, January 23, 2013

सत्यजीत रे की गण शत्रु



पंजाबी दीदी अगले हफ्ते बुधवार को यहाँ से सदा के लिए जा रही हैं, मंगल को वे लोग उनके यहाँ आएंगे और एक रात रहेंगे, अगले दिने वे उन्हें छोड़ने भी जायेंगे. कल रात यह सुनकर वह उदास हो गयी, जून के प्रश्न का उत्तर भी ठीक से नहीं दिया, पर उसने कितने धैर्य का परिचय दिया. पता नहीं उसे क्या हो गया है, क्यों झुंझलाहट होती है, वह किससे नाराज है ? उसे खुद भी समझ नहीं आता. नन्हा फिर उसे कैसे समझाता है. पर वह इतना जानती है बादलों के पीछे से सूरज फिर से निकलेगा..फिर से वह मुस्कुराएगी और अपने आप से शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा.

कल शाम को कोलकाता के नर्सिंगहोम में महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे का देहांत हो गया. टीवी पर उनकी फिल्म “गणशत्रु” दिखाई जा रही है.

गीत वह जो प्राण भर दे
सदियों से सुप्त उर में
भीषण हुंकार भर दे !

दस दिशाएं गूंज उठें
भीरु कातर इस नगर में
शक्ति का संचार कर दे !

आज फिर संयोग हुआ है अपने करीब आने का, कल एक मित्र के यहाँ गयी थी, अच्छा लगा उससे बातें करके. यह क्या..अपने करीब आने का मौका भी दूसरों के पास जाने में गंवा देना चाहती है...इंसानी मन ही ऐसा है, यह नहीं सोचता कि वह स्वयं क्या है ? क्या सोचता है ? बल्कि ज्यादा यह कि दूसरे क्या सोचते हैं ? जबकि इन दूसरों का जरा भी दखल नहीं होता उनकी जिंदगी में. उस दिन पंजाबी दीदी की प्यारी सी चिट्ठी मिली, आज वह भी उन्हें लिखेगी. एक किताब पढ़ रही है, रोमांचक तो है थोड़ी खतरनाक भी है, क्या लेखिका हैं! उसने पिछले कई दिनों से एक पंक्ति भी नहीं लिखी, समय न मालूम कैसे गुजर जाता है, कुछ हाथ का काम भी नहीं किया. सेंट्रल स्कूल में कक्षा एक में पढ़ने के लिए कल नन्हे का एडमिशन टेस्ट हो गया, तीन दिन बाद रिजल्ट आएगा. इस समय वह भी डायरी लिख रहा है. बचपन में कितनी तुकबन्दियाँ की थीं उसने, कभी किसी ने पढ़ी नहीं, वक्त ही कहाँ था, माँ-पिता के लिए इतने बड़े परिवार को चलाना क्या आसान था ? लेकिन नन्हे को वह पूरा वक्त दे सकती है, उसे पढ़ा सकती है.

आज मौसम बहुत अच्छा है, ठंडा-ठंडा शांत सा..रोजमर्रा का काम तो हो गया है पर सोचा था फ्रिज साफ करना है, वह नहीं हो पाया, घर-गृहस्थी के कामों का कोई अंत ही नहीं है, स्टोर  की सफाई फिर ड्यू हो गयी है और किताबों वाला रैक भी आवाज दे रहा है, पर थोड़े से पल शांत बैठकर अपने आप से बातें करना भी शायद उतना ही जरूरी है, पर बीच में यह ‘शायद’ क्यों? कल जून तिनसुकिया गए थे उनकी कार में कुछ खराबी आ गयी थी, लौटे तो बहुत थके थे, झुंझला गए. पर रात को जब उन्होंने अपने-अपने मन को टटोल कर देखा तो वहाँ एक दूसरे के सिवा कुछ था ही नहीं.

आज जून किसी मेहमान को लंच पर साथ लाने वाले हैं, उसकी सुबह किचन में ही बीती, साढ़े दस बज गए हैं अभी मेज सजाना शेष है और सलाद आदि भी. लेकिन ऐसी व्यस्तता उसे भली लगती है. लगता है कि वह है, जीवित है, स्पंदन है. उसे ही फोन करना पड़ा अपनी मित्र को जब पता चला कि उसकी तबियत ठीक नहीं है तो रहा नहीं गया, पर जिस स्तर पर वह चाहती है उस स्तर पर सम्बन्ध बन नहीं पाते, निस्वार्थ..अपनेपन से भरे..यह मृगमरीचिका ही रहेगी उसके लिए.

नन्हा साईकिल चलाना चाहता है, उसकी पढ़ाई आजकल बिलकुल नहीं हो पाती है. नए स्कूल में उसका दाखिला हो गया है. वे लोग घूमने गए, जून ने उसे जन्मदिन का उपहार ले दिया, दो सूट के कपड़े - नीले कपड़े पर सफेद फूल और काले कपड़े पर सफेद फूल.. नन्हे को भी उसकी पसंद का एक गिफ्ट, उसके अच्छे रिजल्ट के लिए. उस दिन मंदिर में उसने भगवान से शांति की प्रार्थना की थी, वह सुन ली गयी है...ईश्वर अब भी उसकी बात सुनते हैं. बहुत दिनों बाद ढेरों फूल खिले हैं मन में और एक सफेद व बैंगनी रंग का एक नया फूल उनके बगीचे में भी खिला है पहली बार..