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Thursday, April 9, 2026

बैनरघट्टा नेचर कैंप’

बैनरघट्टा नेचर कैंप


आज शाम वे दोनों आश्रम गये थे। वहाँ संगीतमय फ़ौवारे चल रहे थे, और लड़ियों के प्रकाश से विशालाक्षी मंटप सजा हुआ था। वीडियो कॉल पर पापाजी को आश्रम के दर्शन कराये। जून ने अपने एक मित्र को भी आश्रम का सौंदर्य दिखाया। कुछ देर वहाँ के दिव्य वातावरण में बैठे रहे। स्टोर से कुछ किताबें और उपहार ख़रीदे। दिवाली के लिए घी के दीपक भी लिए। नूना दोपहर को तीन घंटे अनुलेखन कार्य करती रही। पिछवाड़े के बगीचे में पपीते का पेड़ जून ने कटवा दिया है, उसके स्थान पर दूसरा पेड़ लगा दिया है। सौ से अधिक फल दिये होंगे इस एक वृक्ष ने, उन्होंने कई लोगों को वितरित भी किए। भारत ने सौ करोड़ वैक्सीन लगाने का रिकॉर्ड बना लिया है।


पापाजी से बात हुई तो उन्होंने कहा, दुनिया में कई लोग ठगने के लिए बैठे हैं, हरेक को सतर्क रहना होगा। साइबर अपराध की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। इस उम्र में भी वह नियम से दो अख़बार पढ़ते हैं, ये समाचार उन्हें वहीं से मिलते हैं। शाम को जून एक नयी झील दिखाने ले गये, जिसका नाम मरियापुरा झील है, थतगुप्पे नामक गाँव में स्थित है। गुरुजी पर बनी एक कॉमिक बुक पढ़ी, बहुत रोचक है।जून प्रतिदिन नौ बजे दफ़्तर जाते हैं, बारह बजे लौट आते हैं।आज उन्होंने सोसाइटी के लिए फ़ैसिलिटी मैनेजर का इंटरव्यू लिया।  


आज शाम जून का हाथ भाप से जल गया, वह मूँग दाल का हलवा बना रहे थे। दाल कुकर में भूनी थी, नूना ने पानी डाला तो भाप ऊपर आ गयी, दो सेकंड ही छुआ होगा भाप ने, पर बहुत ही दर्द हुआ। ठंडे पानी में हाथ रखने से लाभ हुआ।आज नन्हा अपने दो सहयोगियों के साथ किसी अन्य कंपनी के मर्जर की बात करने गया है। कल उसके यहाँ जाना है।


आज सुबह सवा छह बजे वे दोनों नन्हे के यहाँ से लौट आये, कल रात वहीं रुक गये थे।सुबह जून मीटिंग से देर से लौटे। काम आगे बढ़ रहा है, उन्हें यह काम अच्छा लग रहा है। कह रहे थे, दिल की जगह दिमाग़ से काम लेना उन्हें अच्छी तरह आता है।पापाजी से बात हुई, वह अपने मित्र की तेहरवीं में नहीं गये। वह कर्ता भाव से मुक्त होने की बात भी कह रहे थे। नूना से कहा, एक ग़ज़ल में कहीं पर लय टूट रही है, उसे ठीक कर ले। वह कल उसे दुरस्त करने के बाद दुबारा भेजेगी।कल एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग एक-दो दिन उनके यहाँ रुकेंगे।


सुबह नौ बजे मेहमान आ गये थे। शाम की चाय के बाद जून उन्हें झील पर ले गये और उसके बाद सभी टीके फॉल अर्थात थॉटिकल्लू झरना देखने गये। यह मौसमी झरना अति विशाल और बेहद आकर्षक है, वहाँ तक जाने का रास्ता भी अति रोमांचक है।वे सब कभी बैठ कर कभी एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर फिसलन भरी चट्टानों पर बढ़ते हुए ऊपर पहुँचे, तो वहाँ का नजारा अतुलनीय था। अति वेग से श्वेत जल धाराएँ बहती हुई आ रही थीं। वापसी में जून एक अन्य झील दिखाने ले गये। सबने कई सुंदर तस्वीरें उतारीं। रात्रि भोजन में पनीर  की सब्ज़ी जून ने बनायी। उनकी बिटिया को यहाँ रहना अच्छा लग रहा है।अमेरिका में रहने वाले उनके पुत्र से भी बात की।


आज सुबह नाश्ते के बाद जून सभी को 40 एकड़ में फैले पिरामिड वैली स्थान दिखाने ले गये। जहाँ दुनिया का सबसे बड़ा दस मंज़िल ऊँचा मैत्रेय बुद्ध ध्यान पिरामिड है।इसे ब्रह्मर्षि पत्रिजी ने 2003 में बनवाया था।स्वागत कक्ष में उन्हें ध्यान का महत्व बताया गया और छोटा सा ध्यान कराया भी गया, ताकि मुख्य हॉल में जाकर सभी को ध्यान का कुछ न कुछ अनुभव हो सके। दोपहर को लौटकर पहली बार नूना ने शेफ़ कॉर्नर से कुछ भोजन मंगाया, कुछ घर पर बनाया। कल सुबह मेहमान वापस जा रहे हैं। 


जून को कर्नाटक के राज्य दिवस पर एक छोटा सा भाषण देना है। जिसका कुछ अंश उन्हें कन्नड़ भाषा में बोलना होगा।उन्होंने तैयारी कर ली है। रविवार को जून के पूर्व अधिकारी के पूरे परिवार के लिए आयोजित विशेष भोज अच्छा रहा। नन्हा व सोनू अपने कुक से एक दो व्यंजन बनवा कर ले आये थे। जून ने उन्हें घर दिखाया तथा सोसाइटी का एक चक्कर लगवा कर लाए। शाम को असम के एक पुराने परिचित आये, वे आश्रम में एडवांस कोर्स करने आये थे, गुरुजी से भी मिले। उसी समय ‘हेलोवीन’ के लिए विचित्र पोशाकों में सजे बच्चे ट्रीट लेने आये।बड़े उत्साह में भरे वे बच्चे एक घर से दूसरे घर जा रहे थे, जैसे वे लोग बचपन में लोहड़ी माँगने घर-घर जाते थे। 

राज्योत्सव का कार्यक्रम अच्छा रहा।आज गुरुजी द्वारा निर्देशित ध्यान किया। उन्होंने कहा, जब कोई प्रसन्न होता है, भीतर कुछ फैलता है, जब दुखी होता है, भीतर कुछ सिकुड़ता है। जो फैलता व सिकुड़ता है, वह अहंकार है। आत्मा न कभी फैलती है, न कभी सिकुड़ती है।यदि किसी के भीतर अहंकार बना हुआ है, तो यह घाव है, जिसे चोट लगेगी तो दर्द भी होगा। जब दर्द होगा तभी अहंकार का अहसास भी होगा। प्रकृति या परमात्मा चेताते हैं कि यदि दर्द से बचना है तो इस अहंकार से छुटकारा पा लो, यह सारे अनर्थों की जड़ है। इसे मिटाने का एक ही तरीक़ा है, प्रेम, वे प्रेम को प्रकट होने से रोकते हैं और स्वयं को अन्यों से काट लेते हैं। परमात्मा प्रेम है और वे परमात्मा का अंश होने से प्रेम ही हुए !   

     

दिवाली की तैयारी चल रही है।छत पर लाइट्स भी लग गई हैं। जून ढेर सारे फूल ले आये हैं। नन्हे ने दिये भेजे हैं। बड़ी ननद ने चिक्की भेजी है। कल सुबह डेंटिस्ट के पास भी जाना है, नूना को दायीं तरफ़ का ऊपर वाला एक विजडम टूथ निकलवाना है। इन्हें अक़्ल दाढ़ क्यों कहा जाता है, शायद इसलिए कि यह काफ़ी बड़े होने के बाद निकलते हैं।


आज शाम  नन्हा और सोनू आ गये थे, पूजा के बाद सबने दीपक जलाये। सभी परिवार जनों से बात की, विशेष भोज किया और पैदल व कार से घूम कर सोसाइटी के घरों में जल रहे दीपक और लड़ियाँ निहारीं। बाद में वे लोग वापस चले गये। 


आज गोवर्धन पूजा है, यानि छप्पन भोग बनाने का दिन। आज के दिन मंदिरों में विशेष प्रसाद बनाया जाता है। पापा जी ने बताया, उन सभी ने मंदिर में बना भोजन दोपहर को ग्रहण किया। छोटी बहन एक चित्र बना रही थी। कल भाईदूज पर वे लोग दीदी से मिलने जा रहे हैं। 


आज भाईदूज पर नूना ने सभी भाइयों से बात की। जून ने कहा है, इस बार नये साल का स्वागत वे लोग शहर की भीड़भाड़ से दूर जंगल में ‘बैनरघट्टा नेचर कैंप’ में रहकर करेंगे।आज ही वे लोग जिसे देखने गये थे। 


 


Friday, September 8, 2023

झील के तट पर


रोज़ की तरह वे प्रात: भ्रमण के लिए गये और विशेष बात यह हुई कि वापस आकर कुछ देर साइकिल भी चलायी। नाश्ते के बाद सोसाइटी के पीछे वाली सड़क पर जून दूर तक कार चलाकर ले गये तो एक जगह गुलदाउदी के फूलों का खेत देखा। खिली हुई धूप में फूलों का रंग बहुत शोख़ लग रहा था, ढेर सारी तस्वीरें खींचीं। आज गुरुजी की ज़ूम मीटिंग थी, आयुष तंत्र की दवाओं पर शोध तथा उनके प्रचार के लिए। उसे ट्रांस्क्रिप्शन का काम करना था, फिर हिन्दी में अनुवाद भी। पापाजी को वह वार्तालाप अच्छा लगा, जो उसने उनके साथ की बातचीत पर लिखा था। कल बड़े भाई का जन्मदिन है, उसने उनके लिए भी एक कविता लिखी है। छोटे भाई की नातिन नयी मेहमान अभी अस्पताल से घर नहीं आयी है। पापाजी अभी कुछ दिन वहीं रहेंगे। छोटी भाभी ने अपनी माँ के साथ बिटिया और उसकी बिटिया की तस्वीर भेजी है, चार पीढ़ियों की एक साथ फ़ोटो बहुत सुंदर लग रही है। 


वर्ष के अंतिम माह का प्रथम दिन ! आज सुबह के सभी काम हो जाने के बाद वे निकट स्थित एक झील पर गये, कुछ जल पक्षी तैर रहे थे  और किनारे पर बैंगनी रंग के जंगली फूल शोभित हो रहे थे। तट पर लगे वृक्षों का सुंदर प्रतिबिंब झील के पानी में पड़ रहा था। दोपहर को छोटी बहन से बात हुई, उसे आज सुबह एक स्वप्न आया, गुरुजी ने अपने मस्तक का तिलक उसके मस्तक से स्पर्श कराया है, उसके माथे में सनसनी हो रही थी । वाक़ई यह बहुत सुंदर अनुभव है, इसे अनमोल मानना चाहिए। गुरु से किसी का संबंध अपनी आत्मा से संबंध जैसा होता है। 


रात्रि का समय है। कुछ देर पूर्व सोनू से बात हुई, कल वे लोग ब्रह्मपुत्र में क्रूज़ पर जा रहे हैं, ‘उमानंद’ द्वीप भी जाएँगे। उसे याद आया, पिछले वर्ष वे भी गये थे। अगले दिन वे डैफ़ोडिल नर्सरी भी जाने वाले हैं, जहां से उनके लटकाने वाले गमलों के लिये पिटुनिया के पौधे लेंगे। आज नापा स्थित एक किसान से जून ताजी पालक ख़रीद कर लाये। समाचारों में सुना, केरल और तमिलनाडु में एक और तूफ़ान आने की चेतावनी दे दी गई है। 


केरल में आये चक्रवात बुरेवी का असर बैंगलुरु में भी पड़ा है। आज सुबह से ही बादल बने हुए हैं। कुछ देर वर्षा भी हुई, इस मौसम में पहली बार स्वेटर निकाला। शाम को गुरुजी का लाइव सत्संग था, असम में सोचा करती थी, आश्रम जाकर सत्संग में भाग लेगी, पर एक वर्ष होने को है, अभी तक आश्रम सबके लिए खुला नहीं है। उनके बताये ध्यान वे रोज़ ही करते हैं। आज विश्व विकलांग दिवस है, मृणाल ज्योति में अच्छी तरह मनाया गया, उसने तस्वीरें देखीं, एक अध्यापक ने फ़ेसबुक पर वीडियो भी पोस्ट किया था। उस वे कई दिवस याद आ रहे थे, जब वह महिला क्लब की अन्य महिलाओं के साथ बच्चों के लिए उपहार लेकर जाती थी। कल रात्रि अजीब सा स्वप्न देखा। मन को यह बोध हुआ कि नाम-रूप दोनों भ्रम हैं। दोनों क्षणिक हैं, उनके प्रति आसक्ति दुख को उत्पन्न करने वाली है। इस जगत में कुछ भी स्थायी और स्वतंत्र नहीं है, सभी कुछ आपस में एक-दूसरे पर आश्रित है। 


आज नेवी डे है। मौसम आज भी ठंडा रहा दिन भर, हल्की वर्षा भी हुई।अगले हफ़्ते एक दिन के लिए  बड़ी ननद  और ननदोई आ  रहे हैं। उसी दिन शाम को नौ बजे आश्रम के स्वामी प्रणवानंद जी का ऑन लाइन कार्यक्रम है। शाम को एक पुराने परिचित की बिटिया का फ़ोन आया, एम डी की उसकी परीक्षा अब मार्च या अप्रैल में होग, कोविड के कारण ही यह देरी है। जबकि उसका छोटा भाई एक वर्ष की पढ़ाई कर चुका है। आज बौद्ध धर्म पर एक दो व्याख्यान सुने। शून्यता की परिभाषा समझ में आयी। वेदान्त का ब्रह्म ही बौद्धों का शून्य है। सुबह के भ्रमण में मन को शून्य पर टिकाने का अभ्यास सहज ही होता है। हल्का अंधकार होता है हर तरफ़ सन्नाटा, कुछ भी नहीं होता जो ध्यान खींचे। योग साधना के समय आजकल शंख प्रक्षालन के आसनों के कारण देह हल्की रहती है।


Tuesday, February 8, 2022

उमियम झील के किनारे



परसों वे ‘होलिका दहन’ का आयोजन  देखने गए थे, जो नापा में बड़े ही शानदार तरीक़े से मनाया गया। अगले वर्ष वे भी कुछ मिठाई आदि लेकर जाएँगे। जल्दी आना पड़ा क्योंकि सुबह फ़्लाइट पकड़नी थी असम के लिए। कल सुबह दस बजे होटल पहुँच गये। दोपहर को जूरन में शामिल हुए। असम में विवाह से एक दिन पहले यह रीति होती है। शाम की काकटेल पार्टी भी अच्छी थी, पुराने-नए फ़िल्मी गानों की धुन पर सभी नाच रहे थे। शाम को विवाह है, फिर विशेष भोज। आज दोपहर को सोनू के घर जाना है। जून यहाँ स्थित कम्पनी के दफ़्तर चले गए हैं, जहाँ वे पहले सेवाकाल में कई बार आ चुके हैं। टीवी चल रहा है, मध्यप्रदेश में सरकार गिरने वाली है।ज्योतिराव सिंधिया कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गये हैं, उनके साथ कई एमएलए भी आ गये हैं।, पिछले कई वर्षों से कांग्रेस में उन्हें अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं मिल रहा था, ऐसा उनका कहना है। मानव स्वभाव हर जगह एक सा ही होता है, जहाँ सम्मान न मिले तो व्यक्ति वहाँ रहना नहीं चाहता। 


‘लोभ से भरा मन साधक नहीं हो सकता। इस जगत में पकड़ने जैसा कुछ भी नहीं है, दर्शक की तरह यहाँ से गुजर जाना है।’ टीवी पर ये सुंदर वाक्य सुने अब आकाशवाणी पर समाचार आ रहे हैं। कोरोना अब महामारी बनता जा रहा है। प्रकृति में संतुलन के लिए समय-समय पर अतीत में भी महामारी फैलती रही है। आज सुबह वे जल्दी उठ गये। टहलने गए तो हवा में हल्की ठंडक थी। कम से कम सौ लोग और भी थे उस सड़क पर, जिसे सुबह के समय ट्रैफ़िक के लिए दोनों ओर से बंद कर दिया गया था। कई बड़े शहरों में प्रातः भ्रमण के लिए ऐसा ही प्रबंध होता है आजकल। कुछ लोग खेल रहे थे, कुछ साइकिल चला रहे थे और कुछ व्यायाम भी कर रहे थे। कल शाम विवाह का सुंदर आयोजन सम्पन्न हो गया। अहोम तथा कश्मीरी दोनों तरह की रीति से विवाह हुआ। कई पुराने परिचित लोगों से मुलाक़ात हुई। 


आज वे उमियम झील यानि ‘बड़ा पानी’ में आ गये हैं। गोहाटी से शिलांग पहुँचने से लगभग बारह किमी पहले मीठे पानी की यह एक बड़ी सी झील है, जिसके किनारे सुंदर विश्राम स्थल बन गए हैं। एक रात वहाँ  गुजरने का इरादा है। हिमालय की अचल पर्वत शृंखला के सान्निध्य में स्थित यह शांत झील एक आकर्षक पर्यटक स्थल है। सब कुछ कितना स्थिर लग रहा है। यह पर्वत न जाने कितने काल से ऐसे ही खड़े हैं। दोपहरी का समय है। झील का हरे रंग का पानी भी जैसे विश्राम कर रहा है। किनारों पर उगे चीड़ के वृक्ष भी मौन हैं, जिन पर लगे कोन धूप में चमक रहे हैं । कुदरत का यह सुंदर दृश्य जैसे उन्हें अपने भीतर की स्थिरता को महसूस करने के लिए आमंत्रण दे रहा है। कभी-कभी पंछियों  की आवाज़ें निस्तब्धता को भंग कर देती हैं, झींगुर की आवाज़ भी वातावरण को और अर्थवान बना रही है।  एक श्वेत तितली काफ़ी ऊँचाई पर उड़ रही है। वह प्रकृति की इस लीला को निहार ही रही थी कि अचानक हवा बहने लगी, कुछ वृक्ष मस्ती में झूम रहे हैं।


Monday, September 25, 2017

बड़ा पानी -उमियाम झील


कल शाम चार बजे वे गोहाटी पहुँचे थे. शाम को बाजार गये फिर एक मित्र परिवार से मिलने. रात्रि भोजन भी वहीं किया. आज सुबह ब्रह्मपुत्र के किनारे टहलने गये. नदी के तट पर कई वृक्ष लगे थे, वर्षों पुराने वृक्ष बहुत सुंदर थे पर किनारा टूटा-फूटा था और स्वच्छता का बहुत अभाव था. सड़क के दोनों किनारों पर फूलवालों की कई दुकानें लगी थीं. होटल लौटते समय फल मंडी से होते हुए आये. लौटकर स्नान, नाश्ता आदि कर नौ बजे ही गणेश गुड़ी स्थित पासपोर्ट दफ्तर के लिए रवाना हुए, जहाँ उसे अपने पासपोर्ट का नवीकरण कराना था. वहाँ काफी भीड़ थी पर उन्हें दस बजे से पहले ही बुला लिया गया. तीन भागों में सारी कार्यवाही पूरी हुई, दफ्तर में सभी कार्य काफी व्यवस्थित ढंग से हो रहे थे. साढ़े ग्यारह बजे तक सब काम हो गया. बाजार से असम सिल्क के कुरते के लिए वस्त्र खरीदा. दोपहर बाद पुनः उन्हीं मित्र के यहाँ गये, शाम को जून अपने एक सहकर्मी के घर ले गये. जिनका पुश्तैनी मकान काफी बड़ा है, तथा एक पहाड़ पर बना है. खेती भी है, उनके भाई-भाभी तथा भतीजों से मिलना हुआ. स्वादिष्ट नाश्ता करके वे होटल आ गये हैं. कल सुबह शिलांग के लिए निकलना है. कल वे चेरापूंजी जायेंगे.


‘नार्थ इस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी’ (नेहू) के पुराने गेस्ट हॉउस के वीआईपी कक्ष ‘संख्या-एक’ में बैठकर डायरी लिखने का सम्भवतः यह पहला और अंतिम अवसर है. आज सुबह ही गोहाटी से शिलांग के लिए बल्कि कहें चेरा पूंजी के लिए रवाना हुए. मेघालय और असम काफी दूर तक साथ-साथ चलते हैं, सड़क के मध्य जो विभाजक है उसके बायीं तरफ असम है और दायीं तरफ मेघालय है. असम की सीमा समाप्त होते ही पहाड़ी रास्ता आरम्भ हो जाता है. सडकें ऊंची-नीची हो जाती हैं तथा चीड़ के वृक्ष दिखने लगते हैं. मार्ग में उमियाम या बड़ा पानी नामक एक सुंदर झील पर रुककर कुछ तस्वीरें उतारीं. यह दस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र वाली अति विशाल कृत्रिम झील है, जहाँ बिजली का उत्पादन भी किया जाता है. 

चेरापूंजी में प्रवेश करते ही दृश्य पटल बदलने लगा, रास्ता अच्छा था. गाड़ी तेज रफ्तार से चल रही थी. एक तरफ घाटियाँ दिखने लगी. पहाड़ों की ढलान जो मीलों तक नीचे गयी थी, घने जंगलों से ढकी थी. दूर के पर्वत नीले लग रहे थे और उनके पीछे धुंध थी. धूप तेज थी. आगे चलकर झरने देखे तथा प्राकृतिक गुफाएं भी, जो बहुत विचित्र हैं. इनके भीतर वर्षा के जल के निरंतर गिरने से पत्थरों ने जाने कितने वर्षों में टूटकर विभिन्न आकर ग्रहण कर लिए हैं. उनमें प्रवेश करके आड़े-तिरछे रास्तों से गुजरकर बाहर आना एक रोचक व रोमांचक अनुभव था. गुफाओं से लौटकर एक शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां ओरेंज कंट्री में भोजन किया. भोजन बनाने वाली महिला थी तथा परोसने वाली भी सभी महिलाएं थीं. वे लगातार उस स्थान को साफ करने में लगी थीं. शिलांग के लिए वापसी की यात्रा में एक अन्य झरना दिखा, जो दूर से दिखाई दे रहा था. काफी ऊँचाई से गिरता हुआ वह नीचे घाटी में मीलों दूर गिर रहा था. शिलांग के सुंदर दृश्यों को देखते हुए वे नेहू वापस आ गये हैं. यह कैम्पस भी बहुत सुंदर है. चीड़ के जंगलों के कारण इसकी सुन्दरता और भी बढ़ जाती है. कल वे शिलांग लेक, लेडी हायड्री पार्क, गोल्फ कोर्स आदि देखने जायेंगे. डॉन बोस्को संग्रहालय भी देखने लायक स्थान होगा. आज नन्हे से बात हुई, उसने एक मित्र के साथ घर लेने का निर्णय किया है. 

Wednesday, June 14, 2017

झील में कमल


कर्तापन का दंश लगा है जीव को, साक्षी इसका इलाज है. वास्तव में आत्मा न करता है न भोक्ता. स्वयं का पता नहीं है सो कभी देह, कभी मन के साथ स्वयं को जोड़कर देखता है, वही मान लेता है खुद को और उनके द्वारा किये कर्मों को स्वयं द्वारा किया मानेगा ही. वे तो प्रारब्ध वश अथवा तो संस्कारों वश अपना काम करते हैं और आत्मा यदि अपने-आप में रहे तो मन, बुद्धि में कभी कुछ इधर-उधर हुआ भी तो वह स्वयं को उसका कर्ता नहीं मानेगा. आज बहुत दिनों के बाद सद्गुरू की वाणी सुनी, जैसे तन को रोज विश्राम और भोजन की आवश्यकता होती है, वैसे ही मन को भी नियमित विश्राम व भोजन चाहिए. मन का भोजन है सत्संग और मन का विश्राम है ध्यान, सो आज से पुनः ध्यान, योग और सत्संग आरम्भ किया है. जीवन को यदि सुंदर बनाना है तो ये सभी आवश्यक हैं. ‘पाठ’ भी नियमित करना होगा. पुरानी दिनचर्या को अपनाना होगा, जिसमें विविध रंग हैं.

बहुत दिनों पूर्व यह इच्छा मन में जगी थी कि बड़े घर के बगीचे में पेड़ के तने से सटकर बैठेगी और कुछ लिखेगी. आज जामुन के पेड़ के नीचे है.

मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है
संस्कारों की मिट्टी है जहाँ
वहीं से रंगो-खुशबू को बाहर लाना है
क्योंकि छिपा है एक स्रोत शुद्ध जल का
मिट्टी की गहराई में
माना चट्टानें भी होंगी मध्य में
कठिन होगी यात्रा
पर जीवन को यदि सचमुच पाना है
तो.. मन की झील में आत्मा का कमल खिलाना है


धूप तेज लग रही है सो लगता है छायादार वृक्ष खोजना होगा. यह सफेद फूलों वाला वृक्ष छाया में है पर यहाँ आस-पास एक अजीब सी गंध है. शायद बाहर से आ रही है या इस वृक्ष की ही गंध है. बिन पत्तों की इसकी शाखाएं कैसी कलाकृति का निर्माण कर रही हैं, एक डाली पर तीन फूल खिले हैं, जिनमें मध्य भाग पीत है. आज उन्हें तिनसुकिया भी जाना है, जीवन वैसे ही चलता रहता है, बाहर कुछ भी नहीं बदलता पर भीतर सब कुछ बदल जाता है. अब भीतर कोई ज्वर नहीं है, सब कुछ स्पष्ट दिखाई देता है. कब विकार जगा, कब कामना उठी, कब मन भूतकल में गया, कब भविष्य की कल्पना में. आत्मा शुद्ध चेतन है, जो प्रकाशक है, जो जानता है, जो देखता है. जब मन शांत होता है तब केवल शुद्ध चेतन ही शेष रहता है. उसे अब पढ़ते व लिखते समय चश्मा लगाना पड़ता है, आँखों की रोशनी कम हो रही है, उम्र बढने के साथ देह में ये परिवर्तन स्वाभाविक हैं. धरती पर बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है, पर उसे फोन अपने साथ रखने चाहिए, शायद फोन की घंटी बज रही है. नैनी लैंड लाइन तो उठा सकती है पर मोबाइल उसे रिसीव करना नहीं आता. अब अंदर जाना चाहिये, उसने सोचा.

आज मृणाल ज्योति जाना हुआ, दो अन्य महिलाएं भी थीं. विश्व विकंलाग दिवस के लिए निमन्त्रण पत्र भी मिले, जो सभी के यहाँ भिजवाने हैं. आज दोपहर के भोजन में सलाद, सूप व फल लिए, काफी हल्का लग रहा है. शाम को वे जल्दी ही रात्रि भोजन करेंगे और बाद में टहलने जायेंगे. अभी कुछ देर पूर्व बच्चे पढ़कर गये हैं. उस दिन नैनी के ससुर की हालत पर तरस खाकर जो भाव मन में उठा था, वह सत्य होता नजर आ रहा है. कुदरत किस तरह उनकी हर बात सुनती है. मन का छोटे सा छोटा विचार भी उसकी नजर से बच नहीं सकता. परमात्मा की महिमा का जितना बखान करे, कम है. जो जीवन अपना ही अहित कर रहा हो, जिसके आगे बढने की कोई गुंजाईश ही नजर न आती हो, उसे बदलना होगा, ताकि एक नया कोरा जीवन पुनः आरम्भ हो. सम्भव है नये परिवेश में वह नये ढंग से जीये. एक मशीन की तरह जिए चले जाना अपने व औरों के दुःख का कारण बनना कहाँ तक उचित है ? ईश्वर ही उसका मार्गदर्शक है, वही प्रेरणा देता है, उसके सिवा और कुछ नहीं. यह देह जब तक रहे, स्वस्थ रहे, मन सजग रहे, बुद्धि भी जगी रहे ताकि न अपने लिए न औरों के लिए दुःख का कारण बने. अनंत सुख की राशि परमात्मा चरों और बिखरा हुआ है, उससे जुड़कर ही मानव के भीतर पड़ा वह बीज खिल सकता है, जिसे आत्मा कहते हैं.   



Tuesday, December 8, 2015

झील की तलहटी


जब तक कोई अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो ही हजार गुना होकर वापस आता है. सद्गुरू को जब कोई समर्पित हो जाता है तो उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ! जीवन की सारी भयानकता सद्गुरू के मिलने तक ही होती है, उसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! हर घटना तब उसके लिए शुभ ही होती है. नया दृष्टिकोण, नयी विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसको भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
ज्ञान तो मिल जाता है पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. सुख के प्रति आसक्ति और कर्म के प्रति आसक्ति इसमें टिकने नहीं देती. टिकने के बाद तो कण-कण में व्याप्त चेतना का सहज ही अनुभव होने लगेगा.

देह प्रत्यक्ष है, आत्मा परोक्ष है. परोक्ष को पाकर ही एक तृप्ति का, शांति का अनुभव होता है. इस शांति को पाकर यदि राग हो जाये तो यह शांति भी अशांति का कारण बन जाती है. उसके भीतर भी मौन उतर आया है, गहरा मौन, विचार आते हैं पर विचार जैसे ऊपर-ऊपर तैरते हैं, नीचे की झील साफ दिखाई देती है. बस चुपचाप इस झील की तलहटी में बिछी ठंडी गीली रेत पर पड़ी सीपियों में से किसी एक पर उसका ध्यान रहता है. वहाँ से ऊपर जगत के कोलाहल में आने का भी मन नहीं होता. ऐसा ही अनुभव आज ध्यान में हुआ जब डेढ़ घंटे से भी ज्यादा कुछ मिनटों तक वह प्रकाश के समुन्दर में डूबती-उतराती रही. वह प्रकाश अब भी गंध रूप में उसके साथ है !

सद्गुरू वह है जिसके ‘भीतर’ को सारी सुप्त शक्तियाँ धारण करने का मौका मिलता है, वह निस्वार्थ भाव से उन शक्तियों का उपयोग जगत के लिए करता है. उसके भीतर अपार करुणा, अपार कृपा होती है, जो सभी को बिना किसी भेदभाव के मिलती है. उसने साधना इन शक्तियों को पाने के लिए नहीं की होती, वे तो सहज प्रेम के कारण ही चेतना का ध्यान करते हैं, आत्मा में रमन करते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाती है कि वे इस दृश्य जगत के पीछे अदृश्य सत्ता को देख लेते हैं. जगत की क्षण भंगुरता, परिवर्तन शीलता, स्वप्नावस्था तथा नश्वरता को पहचान उसे त्याग देते हैं. स्वरूप से तो नहीं त्याग सकते पर मन से त्याग देते हैं ! उनके पास सारी दृष्टियाँ होती हैं, वह सारे मार्ग बता देते हैं, अपनी अपनी योग्यता व रूचि के अनुसार साधक उनमें से किसी एक पर चलने के लिए समर्थ है !


जीवन का एक सत्य है कि संसार को किसी का मन नहीं चाहिए, उसकी सेवा चाहिए, बस उनका काम होता रहे, मन की किसी को जरूरत नहीं है और यह मन न ही परमात्मा के किसी काम का है, वह तो मन से परे है, तो ध्यान और प्रेम के मार्ग पर इसे मर ही जाना होगा. अहंकार को ही केवल मन चाहिए, यह इसी के बल पर जीता है. ‘मैं’ है तो इच्छा है, डर है, कामना है, सुख है, दुःख है, यदि ‘मैं’ ही नहीं तो इनमें से कोई भी नहीं और तब मन भी नहीं. बिना अहंकार के जीने वाले को हो सकता है यह दुनिया पागल कहे, पर उसकी भी कोई चिंता नहीं, पागल तो हर व्यक्ति यूँ भी हर दूसरे को समझता ही है. हर कोई स्वयं को बुद्धिमान ही जानता है और दूसरे को नासमझ, तो यदि कह भी दिया तो सुन लेना चाहिए. कोई ध्यान के द्वार से लौटा हो या भक्ति के, इसका पता तो चले, कोई रेखा तो हो जो उसे और एक संसारी को नास्तिक को अलग करती हो, पर सद्गुरू यह भी तो कहते हैं कि भेद नहीं है. दो हैं ही नहीं तो भेद हो कैसे, दूसरा कोई है ही नहीं, जो भी हैं वे भी तो उसी परमात्मा का ही रूप हैं. परमात्मा ही विभिन्न रूपों में अपने को व्यक्त कर रहा है. एक बार अपने भीतर प्रवेश मिल गया तो सारे भेद मिट जाते हैं !