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Wednesday, June 13, 2018

अच्छाई की कठिनाई



Just now she saw some documentary on solar system. It is amazing to see the Sun,  Moon , movement of earth and other planets. The universe is so vast and no one knows how vast it is! Only God knows but no one knows God! He only knows himself. Today she went to school, did some yoga exercices. Children love to laugh, elders also. Peace and happiness, they feel after each session is contagious. Yesterday Jun said she may go to Delhi for three-four days during world cultural festival of art of living. In the morning she saw once again the dream of nice food, she has food vasnaas, will get rid of them also with the grace of God! He is so powerful and so loving. While coming back from school, she went to see the company guest house garden. It is an amazingly beautiful garden with so many flowers at one place. Today she also saw the video of Anita Moorjani, who had cancer and went in coma, then she came back and got healed up. She experienced her true self.
अभी-अभी दीदी व बड़े भाई से बात की. ढेर सारे समाचार मिले. भाई बिटिया के घर पर रह रहे हैं, परसों नन्हे से मिलने जायेंगे. दीदी के घर छोटे बेटे की वधू तथा उसकी माँ आने वाले हैं. होली से पहले लंच पार्टी होगी. आजकल वह गुरूचरणदास की किताब पढ़ रही है ‘अच्छाई की कठिनाई’. जिसमें महाभारत के पात्रों को लेकर जीवन के मूलभूत प्रश्नों का विश्लेष्ण किया गया है. समाधि के बार में सुना, समाधि में वही जा सकता है जिसे मृत्यु का भय न हो. कल उन्हें मृणाल ज्योति जाना है. विशेष बच्चों को योग कराके ख़ुशी मिलती है. ख़ुशी बांटने से ही बढ़ती है, इसका तो पता चल चल गया है, और उनके पास है ही क्या बांटने को..वही तो एकमात्र अपनी संपदा है, ख़ुशी, प्रेम, शांति और आनन्द ...
पिछले दिनों एक स्वपन देखा, अथवा तो दृश्य देखा, पूरा होश था देखते समय कि किसी जन्म में उसका विवाह एक ऐसे परिवार में होता है जो चोरी के कर्म में लिप्त है. इसलिए भीतर चोरी के भय का संस्कार समा गया है, यदि कोई वस्तु निर्धारित स्थान पर नहीं मिलती है तो झट पहला ख्याल आता है चोरी न हो गयी हो. एक क्षण का शतांश भी नहीं लगता इस विचार को आने में पर अगले ही क्षण अपनी मूर्खता पर हँसी आती है. उनके संस्कार कितने दृढ़ होते हैं. इन्सान उनके हाथों का एक खिलौना ही तो है यदि सजग न रहे, यदि ज्ञान में स्थित न हो ! इसी तरह देह के प्रति आकर्षण का संस्कार जिसका जितना गहरा होता है, वह अन्यों को वस्तु रूप में ही देखता है, जड़ वस्तु के रूप में. चेतन का उसे बोध ही नहीं होता, मन ही मनुष्य के बंधन का कारण है ! योग वसिष्ठ में इसी बात को समझाया गया है.
पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. जून के आने पर दिनचर्या बदल जाती है, समय की सीमा का ध्यान रखना होता है. आज वह दिल्ली जा रही है. भाई लेने आयेंगे. कल वहीं से पिताजी से मिलने तीन दिनों के लिए घर जाएगी. बाद में दिल्ली में ‘विश्व सांस्कृतिक सम्मेलन’ का तीन दिन का कार्यक्रम है. आज महा शिवरात्रि है, हो सका तो रात को जागरण करेगी, कल दोपहर को फ्लाइट में सोया जा सकता है. उसकी अनुपस्थिति में भी घर में योग कक्षा चलती रहे इसका प्रबंध करके जाना है. आज एक परिचिता के यहाँ किसी काम से गयी तो उनका बगीचा देखा, बहुत सुंदर है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, कुछ देर पहले उसने मंझली भाभी से बात की थी. जून ने भाई से बात की, शाम को एयरपोर्ट से वह मेट्रो से घर ले जायेंगे. उनके घर की सफाई भी करवानी है, कल करेंगे, भाभी की स्मृति में होने वाले हवन की तैयारी भी. जब जिस वक्त जहाँ जो जरूरत होती है. अस्तित्त्व उसकी तैयारी कर ही देता है, वे निमित्त मात्र ही बनते हैं.

Thursday, May 17, 2018

गुलाब की टहनियाँ



सुबह एक अजीब सा स्वप्न देखा, वह एक नदी के तट पर है, उस पार से एक छोटी सी नौका में बैठकर एक नन्हा सा बच्चा उसके पास आता है. उसके हाथों में पीले-सफेद फूलों की एक सूखी माला है, जो वह उसे देता है. वह बदले में उसे कुछ देने के लिए, उसे वहीं छोड़कर भीतर आती है, फूल के बिना गुलाब की टहनियाँ हैं, कांटों से बचाने के लिए वह केवल पत्तियाँ तोड़ती है कि बाहर से किसी महिला के रोने की आवाज आती है, मेरा बच्चा पानी में डूब रहा है, उसे बचाओ, फिर आवाज आती है, डूब गया. वह घर के भीतर से ही समझ रही है कि महिला उसके घर की तरफ हिकारत भरी नजर से देख रही है, तभी नींद खुल जाती है. यह दुःस्वप्न अवश्य ही आत्मा ने जगाने के लिए गढ़ा होगा. आत्मा कितनी विचित्र है, कितनी मनमोहिनी ! सुबह वह स्कूल गयी थी, बच्चों व अध्यापिकाओं के साथ ध्यान किया. दोपहर को काफी दिन बाद ब्लॉग पर लिखा. इस समय रात्रि के दस बजने को हैं. पूरे गर्जन-तर्जन के साथ बाहर वर्षा हो रही है. शाम को देर तक मालिन ने बगीचे में पानी डाला था, और अब बादल भेज रहे हैं. मालिन का बेटा जो कल अस्पताल में भर्ती था आज खेल रहा था. जून कल देहली गये हैं, परसों लौटेंगे. देहली का मकान अगले महीने बिक जायेगा. सप्ताहांत में उन्हें बंगलूरू जाना है.

पौने छह बजे हैं शाम के, कुछ देर में योग कक्षा आरम्भ होगी और एक घंटा कैसे बीत जायेगा पता ही नहीं चलेगा. सुबह एक स्वप्न देख रही थी कि मध्य में ही नींद खुल गयी, कोई कह रहा था, यह तो स्वप्न है, कितना आनंद आया. ऐसे ही एक दिन नींद में भी पता चल जायेगा कि यह तो नींद है और तब स्वप्न आने ही समाप्त हो जायेंगे. दिवास्वप्न तो अब बहुत कम हो गये हैं, हर पल भीतर जागरण की एक धारा बहती रहे, यह प्रयास रहता है. आज क्लब की एक डाक्टर सदस्या से मिलने उनके घर गयी, अगले महीने वह सदा के लिए यहाँ से जा रही हैं. उन्होंने बताया, डिब्रूगढ़ में जन्मी थीं. वे लोग चार भाई तथा तीन बहने हैं, सभी पढ़े-लिखे तथा उच्च पदों पर हैं. पिता चाय बागान में फैक्ट्री प्रमुख थे. उन्होंने आसाम मेडिकल कालेज से डाक्टरी की पढ़ाई की, फिर एपीएससी की परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी में आ गयीं. वर्तमान में वह तिनसुकिया में स्वास्थ्य विभाग में डिस्ट्रिक्ट प्रमुख हैं. स्कूल के समय से ही उन्हें पेन फ्रेंड बनाने का शौक था, पतिदेव पहले पेन फ्रेंड बने, फिर फ्रेंड और अंत में हसबेंड. अब वे समाजसेवा से जुड़ना चाहती हैं. चाय बागान के मजदूरों काम लिए कुछ काम करना चाहती हैं. उसने इन सभी बातों का जिक्र करते हुए उनके लिए एक कविता लिखी, ताकि क्लब की अन्य सदस्याओं को भी उनके कर्मशील जीवन के बारे में जानकारी हो. समाज को ऐसी महिलाओं की बहुत आवश्यकता है.

Friday, April 24, 2015

मोमबत्ती का प्रकाश


जीव चेतन स्वरूप हैं पर जड़ की ओर उनका झुकाव है. जब वे अपनी चेतना को परम चेतना की ओर लगाते हैं तो सारे कार्य कर्मयोग बन जाते हैं, अन्यथा कर्म भी जड़वत प्रतीत होंगे. इस क्षण उसका हृदय पूर्णतया संतुष्ट है, कुछ भी पाने की न तो आकांक्षा है और न ही कुछ खो जाने की चिंता है. उसे न किसी से भय है न ही किसी को उससे भय मिले ऐसी कामना है. सभी की मित्रता उसे मिले और इस सृष्टि के सभी स्थावर-जंगम प्राणी उसकी मित्रता पायें ! जहाँ कहीं भी शुभ हो उसकी दृष्टि उसे ही देखे, अन्यों के दोषों पर नजर न जाये. अगर जाये भी तो हृदय में कटुता का उदय न हो, उन्हें उनके सम्पूर्ण गुणों व दोषों सहित वह अपना ले. कभी भी ऐसा न हो कि अपने लक्ष्य से विचलित हो जाये ! इस समय शाम के छह बजने को हैं, नन्हा कोचिंग गया है. जून पिताजी को लेकर सुबह ही डिब्रूगढ़ गये थे, सात बजे तक आएंगे. मौसम बादलों भरा है. कल शाम को जो आंधी आई थी, उसके बाद से वर्षा लगातार ही हो रही है. कल बिजली चली गयी थी और रात्रि भोजन मोमबत्ती के प्रकाश में किया. अभी कुछ देर पूर्व ही बिजली आई है. बड़े भाई का फोन आया अभी कुछ देर पहले.

टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, गुरूमाँ कह रही हैं, पानी जैसे तापमान के बदलने पर अपनी अवस्था बदलता रहता है वैसे ही मन बदलता रहता है. लेकिन इन सबको देखने वाला निर्विकार आत्मा है जो अचल है. उसे लगता है जब कोई अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ता है तो हानि-लाभ की चिंता से मुक्त हो जाता है. कर्म सहज होते हैं. कोई कामना पूर्ति उनका लक्ष्य नहीं होती. अंतर में समता जगती है. प्रेम की भावना का उदय होता है, प्रेम ही जीवन को रसमय करता है. आज वर्षा थमी है. कल शाम उसने लिखना शुरू किया था कि जून आ गये, डाक्टर ने कहा है आपरेशन करना पड़ेगा.

आज उसे लग रहा है, उनकी कथनी और करनी में कितना अंतर होता है. किसी निकट के सम्बन्धी ने उनसे मदद मांगी और उन्होंने खुले दिल से फौरन मदद करने की बजाय सोच-विचार शुरू किया. मन जो सदा संदेह करता है, कैसे-कैसे तर्क देने लगा. मन के लोभ का कोई अंत नहीं है. उसने जून को सही सलाह नहीं दी या उनकी स्वयं की भी यही इच्छा रही होगी और उसे समर्थन मिल गया. वे धर्म की सिर्फ ऊपरी सतह तक ही पहुंचे हैं, अभी मन विशाल नहीं हुआ है. गुरू से प्रेम करने वाले भी यदि मन छोटा रखें तो इसका अर्थ है कि प्रेम अभी हुआ ही नहीं, स्वार्थ से ऊपर अभी उठे ही नहीं, अविश्वास दिल से निकला ही नहीं, अविश्वास भी अपने ही जन के प्रति..अभी बहुत दूर जाना है ! स्वय को यदि कष्ट होता हो तो भी यदि कोई कुछ मांगता है तो मुँह से ‘ना’ न निकले, ईश्वर ऐसा हृदय उन्हें दे. ईश्वर की प्रसन्नता भी इसी में है कि उसके भक्त उसके मार्ग पर चलें. ईश्वर उन्हें हर क्षण कुछ न कुछ प्रदान करता है, अनवरत उसकी कृपा का प्रसाद उन्हें मिलता है ..तो वे क्यों कृपण बनें ! भक्त तो विश्वास की ज्योति की लौ के सहारे-सहारे अंदर-बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है.

आज सुबह ध्यान में एक अनोखी अनुभूति हुई, सही होगा यह कहना कि ईश्वर ने अपनी उपस्थिति का अहसास कराया ! मन कृतज्ञता से भर उठा था...और उस क्षण की स्मृति चित्त में अंकित हो गयी है. मौसम भी आज सुहावना है. विश्वास गहरा हो तो कोई निश्चिन्त होकर जीवन बिताता है, एक-एक क्षण का आनंद लेता है. भक्ति के कितने ही कीर्तिमान संतों व भक्तों ने बनाये हैं और कुछ हो सकने की सम्भावना उनके भीतर भी है. उसके लिए कुछ होने का अर्थ है..उसका होना ! ईश्वर की सुखद स्मृति में मन को सदा लगाये रखना..इन्द्रियों, मन व वाणी पर नियन्त्रण ही उसे इस पथ पर आगे ले जायेगा ! देह रूपी यंत्र को स्वस्थ रखना उनका कर्त्तव्य है जिससे आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके. आत्मा को साधन रूपी मन तथा तन मिले हैं, जिन्हें सजग रहकर  स्वस्थ रखना है यह करने का मार्ग भी आत्मा ही सिखाता है.








Wednesday, April 22, 2015

चावल की कचरी


पिछले तीन दिन वह फिर नहीं लिख सकी, पर आज से तय किया है नियमित लिखेगी. टीवी पर जागरण आ रहा है. पिताजी यहीं बैठकर सुन रहे हैं, उनका इलाज आरम्भ हो गया है. सम्भवतः चेन्नई जाना पड़ेगा. माँ स्नान के लिए गयी हैं. कल उन्हें आये पूरा एक हफ्ता हो जायेगा, उनके दिन अच्छे बीत रहे हैं, जीवन में एक रंग भर गया है. कल शाम वह क्लब गयी, मासिक मीटिंग के सिलसिले में. उसे कविता पाठ व मेहँदी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया है. वह प्रतिपल इश्वर की स्मृति में रहने का प्रयत्न करती है और निन्यानवे बार यह सफल भी होता है. आज सुबह चार बजे उठे वे, क्रिया आदि की. आज ‘विश्वकर्मा पूजा’ है, जून ऑफिस से जल्दी आ जायेंगे.

आज उसने सुंदर वचन सुने- ‘सद्ग्रंथों का अध्ययन उन्नत करता है. सद्विचार मन को महकाते हैं. विचारों के गुलाब जब मन के बगीचे में खिलते हैं तो आस-पास सभी कुछ महकने लगता है. चेहरे पर मुस्कुराहट बनाकर आँखों से ही अपनी बात कहने की कला आती है. वाणी जब खामोश हो और मन का चिंतन भी शांत हो जाये. मन उस क्षण न ही बाहरी शब्दों को ग्रहण करता है और न ही मन से विचारों का सम्प्रेषण बाहर की ओर होता है. गहन मौन में ही उस परम सत्ता का वास है’.

अन्तर्मुखी होकर, ध्यानस्थ होकर भीतर जो भी दिखे, वह सहज ज्ञान है. भगवद् ज्ञान कहीं बाहर से मिलने वाला नहीं है बल्कि इस सहज ज्ञान का आश्रय लेकर ही पाया जा सकता है. उद्देश्य यदि दृढ़ हो तो जीवन को एक ऐसी दिशा मिल जाती है जो ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट नहीं होने देती. कल दोपहर को वह कुछ क्षणों के लिए क्रोध का शिकार हुई और वही क्रोध या विरोध जून से भी उसे मिला. जो वे देते हैं वह पूरे ब्याज के साथ वापस मिलता है. प्रेम दें तो प्रेम ही मिलेगा. आनंद देने पर आनंद और विरोध करने पर विरोध ही हाथ आयेगा ! संसार चाहे जितना भी मिल जाये, जब तक वह परम पूर्ण सदा साथ नहीं रहेगा, संसार दुखमय होगा. उसके साथ से यह संसार अनुकूल हो जाता है. उसे भुलाकर वे एक क्षण के लिए भी सुरक्षित नहीं हैं. कर्म बंधन से मुक्ति चाहिए तो कर्म, विचार, वाणी उसी परमात्मा से युक्त होकर होने चाहियें. योग भी तभी सधेगा. सहज रूप से जीने की कला आना ही योग है. उसने प्रार्थना की कि कृपा बनी रहे इसी में उसका कल्याण है और उसके इर्दगिर्द के वातावरण का भी !

आज धूप बहुत तेज है. कल माँ-पिता जी ने चावल की कचरी बनाई थी, सूखने के लिए बहर लॉन में रख दी है. इस समय उसके हृदय में हल्का सा ताप है कितना अजीब सा लगता है गुस्सा करना भी आजकल, पर किये बिना काम ही नहीं करते स्वीपर और कभी-कभी नैनी भी. लेकिन इस क्रोध को लाने के लिए भीतर कहीं क्रोध का बीज तो अवश्य रहा होगा अन्यथा यह हल्की सी जलन भी न होती. पिता अभी तक अस्पताल से आये नहीं हैं, उनका व्यायाम चल रहा होगा. उनके एक हाथ की उँगलियाँ पूरी तरह सीधी नहीं होती. माँ को कल वह सत्संग भी ले गयी थी, उन्हें अच्छा लगा, इस वक्त भी भजन सुन रही हैं. कल भी वह ध्यानस्थ हो सकी ऐसा महसूस हुआ. बीच-बीच में कोई अन्य विचार आ जाता था पर मन सजग था. रात को स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक का कुछ अंश पढ़ा और दोपहर को दिनकर की पुस्तक का पर ध्यान का समय उतना नहीं मिल पाता. उसकी आध्यात्मिक यात्रा में थोडा सा व्यवधान तो आया है. दुनियादारी में फंसा मन प्रभु की स्मृति में इतनी शीघ्रता से नहीं आ पाता जैसे पहले आता था. कृष्ण का नाम लेते ही मन भक्तिभाव से भर जाता था अब जैसे कई परतें मन पर चढ़ गयी हैं. संवेदना मृत हो गयी हो ऐसा भी नहीं है, पर कुछ कम अवश्य हुई है !




Monday, December 22, 2014

पूजा का पंडाल


जागरण में सुने आज के वचन उसके मन के भावों से कितने मिलते-जुलते हैं. एकमात्र ईश्वर ही उनके प्रेम का केंद्र हो, जो कहना है उसे ही कहें, अन्यों से प्रेम हो भी तो उसी प्रेम का प्रतिबिम्ब हो. परमात्मा की कृपा जब बरसती है तो अंतर में बयार बहती है, अंतर में तितलियाँ उड़ान भरती हैं, अंतर की ख़ुशी बेसाख्ता बाहर छलकती है ऐसे प्रेम का दिखावा नहीं होता. वह अपनी सुगंध आप बिखेरता है. दुनिया का सौन्दर्य जब उसके सौन्दर्य के सामने फीका पड़ने लगे, उस सत्यं शिवं सुंदरम की आकांक्षा इतनी बलवती हो जाये ! उसके स्वागत के लिए तैयारी अच्छी हो तो उसे आना ही पड़ेगा, अंतर की भूमि इतनी पावन हो कि वह उस पर कदम रखे बिना रह ही न सके ! स्वयं को इतना हल्का बनाना है कि परमात्मा रूपी सूर्य उन्हें अपनी ओर खीँच ले. आदि भौतिक दुनिया में हैं दिव्य दुनिया में जाना है. आत्मबल वहीं से मिलता है. सदैव प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है. बाबाजी कहते हैं, दिले में तस्वीर यार है जब चाहे नजरें मिला लीं..परिस्थिति कैसी भी हो अपने भीतर के नारायण पर दृढ श्रद्धा हो तो हर बाधा हल हो जाती है.


कल वे पूजा देखने गये, पहले कितनी ही बार कितने पूजा-पंडालों में गयी है लेकिन वह जाना अब लगता है व्यर्थ ही था. वे मात्र मूर्ति को देखते थे, भीड़ को देखते थे और चमक-धमक को, जो आँखों को कितनी देर सुख दे सकती थी, पर कल उसे मूर्तियों के पीछे छुपी भावना स्पष्ट दीख रही थी. उनकी आँखें बोलती हुई सी प्रतीत हो रही थीं. ईश्वर जैसे उन मूर्तियों के माध्यम से उसके अंतर में प्रवेश कर रहे थे. लोग जो वहाँ आये थे, पुजारी या नन्हे बच्चे, भक्त लग रहे थे. पवित्रता का अनुभव हो रहा था, कैसी अद्भुत शांति. सब कुछ जैसे किसी व्यवस्था के अंतर्गत धीमे-धीमे से किया जा रहा था. सबके पीछे जैसे कोई महान अर्थ छुपा हुआ था. ईश्वर के कार्य भी कितने रहस्यमय होते हैं. वह पंडाल दर पंडाल उसे अनुभूतियों से तृप्त कर रहा था, उसकी निकटता कितनी मोहक थी. मूर्तियों को गढ़ने वाले, उन्हें रंगने वाले, वस्त्र बनाने, पहनाने वाले, पंडाल बनाने वाले अनेकानेक लोगों के प्रति, उन भक्त आत्माओं के प्रति कितनी निकटता अनुभव हो रही थी. कितने लोगों ने अपने अंतर की सद्भावना का प्रतिरूप उन मूर्तियों में गढ़ा था, वे कितनी सजीव लग रही थीं, जैसे बोल ही पड़ेंगी. उन्हें छोड़कर जाते समय पीड़ा भी हुई और यह महसूस भी हुआ कि ईश्वर पग-पग पर मानव को संरक्षित करते हैं, वह हर क्षण उसके साथ हैं. आज सुबह art of living की एक सदस्या से बात हुई जो तेजपुर में रहती हैं. नन्हा और जून दोनों घर पर हैं, पूजा का अवकाश आरम्भ हो चूका है. कल उसने शास्त्रीय संगीत के चार कैसेट भी खरीदे, जिन्हें अभी सुनना है.

Wednesday, December 3, 2014

चित्रकला का संसार


आज सुबह से ही अपने–आप में नहीं है, एक के बाद एक मूर्खतापूर्ण कार्य और वाणी का प्रयोग उसे असमंजस में डाले जा रहा है. सुबह जून देर से उठे उसकी वजह भी वही थी. कल उसके सामने ही घड़ी reset हो गयी पर न तो उसे ठीक ही किया न ही जून को बताया. सुबह नन्हे को डांटा. जून से असत्य कहा, संगीत कक्षा भी है, फिर शीघ्रता में ही स्वीपर के न आने की खबर सफाई दफ्तर में कर दी जबकि बाद में वह आ गया है, उन्हें कितनी असुविधा हुई होगी उसकी वजह से दूसरा व्यक्ति परेशान हुआ जिसे काम मिल गया था. नैनी को तो उसकी गलती के लिए टोकना आवश्यक था. ...और अब उसका मन उसे ही कोस रहा है या फिर वह मन को...उसे स्वयं पर संयम नहीं था इसी का परिणाम था यह सब. शायद वह संगीत सीखने नहीं जा पायी इसकी वजह से..बाबाजी कहते हैं..छड्डो परे....और ईश्वर से सच्चे दिल से क्षमा मांग लो. परम शांति तो स्वयं की ही है..हर क्षण ..हर पल !

पिछले कई दिनों से अधर्म की वृद्धि हो रही थी और ईश्वर अपने वायदे के अनुसार मन के द्वार पर दस्तक देने आया है. उसके साथ सदा ऐसा ही होता है. जब कभी संसार उसे घेर लेता है एक बेचैनी उसे वहाँ से भागने पर विवश कर देती है. कुछ दिन या कुछ पल यदि ईश्वर के स्मरण के बिना गुजरे हों तो एक छटपटाहट सी होने लगती है जो कहती है कि यह मार्ग उसका नहीं है. आज सुबह गुरुमाँ ने सत्य कहा था कि यदि कोई सुख चाहता है तो उसे याद करे वरना न करे. उसे याद करते रहें तो अपने कर्त्तव्यों का बोध भी बना रहता है. कर्त्तव्य अपने देह, मन, आत्मा के प्रति, अपने परिवार, संबंधियों, पड़ोसियों के प्रति, अपने समाज, शहर व देश के प्रति तथा मानवता के प्रति अपने मातहत काम करने वालों के प्रति. जीवन एक उपहार है जो ईश्वर ने दिया है. हर श्वास पर उसी का अधिकार है, अभिमान करने योग्य यदि कुछ है तो यही कि मानव जन्म पाया है. इसे सार्थक करना या इसका अपमान करना उसके वश में है. आज कैलेंडर देखा तो पता चला कि कल अमावस्या थी, उसके व्रत का दिन पर उसे याद नहीं रहा, इतवार का दिन जो था. अब आने वाले कल रखेगी. कल एक पुराने परिचित आये, उन्हें भोजन कराया वह मिठाई लाये थे अपने शहर की. यह प्रेम का संबंध ही तो है जो उन्हें उनके पास लाता है. ईश्वर के प्रति प्रेम हो तो वही प्रेम अन्यों के प्रति झलकता है. उसका हृदय प्रेमयुक्त हो !


आज गयी थी संगीत सीखने, सो ‘जागरण’ नहीं सुना. लौटी तो ध्यान आदि किया, भोजन बनाया. पत्र अधूरे ही पड़े हैं, कुछ नया लिखा भी नहीं, पत्रिकाएँ पढने का भी समय नहीं मिला. चित्रकला का अभ्यास भी उसने कुछ दिन पहले शुरू किया था, बीच में ही छूट गया है, पर कल नन्हे ने बहुत दिनों के बाद एक चित्र बनाया अपने स्कूल में होने वाली एक प्रदर्शनी के लिए  आज सुबह वह अपने आप ही उठा, फिर बस स्टैंड तक उसे छोड़ने जून गये. अभी-अभी उनका फोन भी आया. कल कहा कि उन सभी को घर पर भी अच्छी वेशभूषा में ही रहना चाहिए, अस्त-व्यस्त सा नहीं. क्लब की मीटिंग का बुलेटिन भी आया है, जाने का अभी तो ज्यादा उत्साह नहीं है लेकिन सदस्या बनी है तो मीटिंग में जाना कर्त्तव्य भी तो है जब तक कि बेहद आवश्यक कार्य न हो अनुपस्थित नहीं होना चाहिए. कल माली ने तीन क्यारियों में खाद डाल दी है, इस बार वे सर्दियों की सब्जियां शीघ्र लगा सकते हैं. अभी एक सखी से बात हुई, उसने घर आने का निमन्त्रण दिया है, वे अवश्य जायेंगे.

Wednesday, October 15, 2014

हाउ टू नो गॉड - दीपक चोपड़ा की किताब


आज बैसाखी है, बीहू और गुड फ्राईडे भी. पूरे भारत में लोग कोई न कोई त्योहार मना रहे हैं. नन्हा और जून दोनों की छुट्टी है पर जून अपने विभाग में किसी कार्य में व्यस्त हो गये हैं. कल रात भी देर से घर आये, वह दिन में छूट गया अपना संगीत अभ्यास कर रही थी. उसके पूर्व मित्र परिवार आया था, उन्होंने स्वादिष्ट केक काटा जो दिन में बनाया था. नन्हा घर पर हो तो आजकल पढ़ाई और कम्प्यूटर गेमिंग ये दो काम ही करता है. आज सुबह वे उठे तो पहले वोल्टेज बहुत कम था फिर बिजली चली गयी. सुबह ‘जागरण’ एक दिन भी न सुने तो दिन की शुरुआत ढंग से नहीं हुई लगती है. सुबह वीमेन’स इरा का क्रॉस वर्ड हल करने में कुछ समय लगाया शेष सामान्य कार्यों में. समाचारों में सुना वाजपेयी जी ईरान के सांस्कृतिक शहर शीरान पहुंच रहे हैं. अमेरिका व चीन में टोही विमान की टक्कर के मामले को लेकर अभी तक आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं. आस्ट्रेलिया में nascom के प्रमुख श्री देवांग जो भारत में सूचना तकनीक के प्रमुख कार्यकर्ता थे, की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हो गयी है. इस वक्त भी हिंदी कविता की किताब उसके पास है. इन छुट्टियों में करने योग्य कई कार्य थे जो अभी तक शुरू भी नहीं किये हैं. उसने देखा है अक्सर योजना बनाकर काम करना सम्भव नहीं हो पाता, कुछ अप्रत्याशित आ जाता है जिसे स्वीकारना होता है. अभी दो पत्र लिखने भी शेष हैं, क्यों न पत्र लिखने से ही शुरुआत की जाये.
कल रात छोटी बहन का फोन आया, उसने कहा कल सुबह उसे शहर में होने वाली cross-country race में जाना है, पांच बजे उसे उठाना है सो वे फोन करके उसे उठा दें. नूना को हँसी भी आई और अच्छा भी लगा. सुबह पांच बजे से पहले ही उसे उठा दिया पर जैसी मूसलाधार बारिश यहाँ इस वक्त हो रही है वैसी ही वहाँ हो रही थी. उसे अंदेशा था की रेस टल जाएगी. कल जून रात को आठ बजे घर आ पाए. उसने शाम को घर का कुछ काम किया, आज पर्दों की धुलाई का भी काम हो गया.
कल सुबह वह लिख नहीं पाई, काफी समय एक सखी से फोन पर बात करने में चला गया. दोपहर को गुलाब जामुन बनाने के बाद टीवी चला लिया सो ‘कविता’ से मुलाकात नहीं हो पायी. लेकिन आज से यह असावधानी और प्रमाद नहीं होगा. उसकी यात्रा जारी रहेगी. कल लाइब्रेरी से दीपक चोपड़ा की किताब लायी है उसने भी उसके विश्वास को बल दिया है. वर्षा का मौसम जारी है. माली ने बगीचे से प्याज की फसल निकल कर दी है अभी कई दिन इसे सूखने में लगेंगे. कल जून ने प्रकाशक से बात की वह किताब के कुछ और नाम बतलाने वाले हैं. वर्षा तेज हो गयी है अभी तक स्वीपर नहीं आया है. उसका ध्यान कुछ देर के लिए नैनी पर चला गया जो कपड़े धो रही है. उसे काम करने का इतना अभ्यास हो गया है कि जिस काम को करने में नूना को आधा घंटा लगता है उसे सिर्फ दस मिनट लगते हैं अभी-अभी सफाई वाला भी आ गया है पानी में तरबतर है उसे उसने जून की एक पुरानी कमीज पहनने को दी है. जब कोई ईश्वर के निकट होता है, वह उसे शुभ की ओर स्वयं ही लगा देता है.  
कल शाम क्लब की एक सदस्या का फोन आया, इस महीने महिला समिति की बैठक में उसे कविता पढ़ने के लिए कहा है. literary meet का आयोजन किया जा रहा है. एक सखी का फोन अभी आया उसकी माँ अस्पताल में किसी जानलेवा रोग से संघर्ष कर रही थीं, कल उन्होंने बहुत दिनों बाद आँख खोली. उसने सोचा पड़ोसिन के साथ वह उससे मिलने जाएगी. नैनी ने अपने बेटे के कुरान की कसम खाने पर विश्वास कर लिया है कि रूपये उसने नहीं चुराए. माँ का दिल ऐसा ही होता है. बेटा लेकिन भविष्य में इससे गहरी चोट भी दे सकता है यदि उसे अभी से संभाला नहीं गया.
‘जागरण’ में परसों सुना था इच्छाओं को निवृत करना है, आवश्यकता की पूर्ति होती रहे क्या इतना पर्याप्त नहीं. आज सुबह से दो बार उसने स्वयं को सुने हुए पर अमल करते देखा. एक बार क्रोध का भाव जगने से पहले ही उसे समझा दूसरी बार इच्छाओं को पोषण करने वाली मानसिक वृत्ति को टोका. इस समय जितना कुछ है पर्याप्त है और की न आवश्यकता है न ही कल्पना करके स्वयं को अपनी ही दृष्टि में गिराने की जरूरत है. व्यर्थ की बातें ही साधक को मार्ग से भटकाती हैं. कल दीपक चोपड़ा की किताब का काफी अंश पढ़ा. बहुत अच्छी पुस्तक है. अपने हृदय के कई प्रश्नों के जवाब उसमें मिले. कई बातों की पुष्टि हुई. एक गुरु की तरह वह सारे संशयों का निराकरण करते जाते हैं. ईश्वर के प्रति उसकी निष्ठा और दृढ हो गयी है, वैसे निष्ठा अगर है तो है, नहीं है तो नहीं है.  

 


Monday, October 13, 2014

ब्लैक फारेस्ट केक


मानव हर क्षण अपनी ही मूर्खता का शिकार होता रहता है, जीवन का ढंग यदि सुंदर करना हो तो इस जीवन को प्रश्रय देने वाले से नाता जोड़ना है. चलते, फिरते उठते, बैठते उसका स्मरण बना रहे तो विवेक जाग्रत रहेगा. ज्ञान ही संतुलित होना सिखाता है. सुख की चाहना को त्याग दें तो दुःख से घबराएंगे नहीं.” ये सभी विचार आज सुबह उसने  ‘जागरण’ में सुने. सुनना, पढ़ना तो जारी है पर गुनना कभी-कभी ही हो पाता है और आदर्शों पर चलना, वह तो टेढ़ी खीर है. सुबह जब बाबा जी आये तो एक सखी का फोन आ गया, वह खुश थी, उसके पतिदेव को एक प्रेजेंटेशन के सिलसिले में दिल्ली जाना है, शायद उन्हें पुरस्कार भी मिले. जून जब लंच पर आये तो चौबीस पैकेट दूध के ले आये जैसे कि अगले चौबीस दिन का उन्हें पूरा भरोसा है यहाँ अगले पल की खबर नहीं...फिर उसे याद आया वे लोग तो अन्य सामान भी महीने भर का एक साथ ले आते हैं. पिछले हफ्ते ही उसका अपनी पुरानी डायरियों में से कविताएँ उतारने का कार्य पूर्ण हो गया था, अब नई रचनी हैं, हर दिन एक नई कविता जो भावपूर्ण भी हो और जिसमें अंतरात्मा का प्रकाश झलके. उस दिन उन्नीस साल पुरानी डायरी में सरसों के फूलों पर किसी कवि की बहुत अच्छी एक कविता पढ़ी. कल नैनी का ब्लाउज सिलकर दे दिया तथा साथ ही अपना एक पुराना भी. अज वह नाहरकटिया गयी है. वेलवेट का काला ब्लाउज उसने पहना था, बाहर निकलने पर अच्छा कपड़ा पहनने का उसे शौक है. पूसी अभी तक नीचे नहीं उतरी है, आज भी उसे खाना ऊपर ही दिया.

श्वास-श्वास में सुमिरन चलता रहे, सारी गांठे खुल जाएँ तो मन मुक्त आकाश मन विचरण करेगा, जीवन में सदा ही वसंत ऋतु बनी रहेगी. आज भी पिछले कई दिनों की तरह वर्षा हो रही है, रात भर मूसलाधार वर्षा हुई. कल रात की आंधी वर्षा में तो पूसी ने अपने बच्चों की रक्षा कर ली पर बिलाव से नहीं बचा पायी. रात को उसकी करुण पुकार तथा चीत्कार सुनाई दी थी. सुबह उसने आवाज देने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की, अभी भी वहीं बैठी है. नैनी के बेटे ने सीढ़ी पर चढकर दूध-रोटी दिया तो गुस्सा कर रही थी. इस समय कितना दुःख व क्रोध होगा उसके मन में. जून आज मोरान गये हैं. कल से नन्हे के स्कूल में बीहू का अवकाश शुरू हो रहा है. बैसाखी का उत्सव भी आ रहा है. कल रात उसने स्वप्न में फिर माँ को अस्पताल में देखा, वह बेहद कमजोर लग रही थीं. आज दोपहर को उसने नैनी को स्टोर की सफाई के लिए बुलाया है. इन छुट्टियों में बाकी सफाई भी करनी है. नन्हे के कमरे के पर्दों की धुलाई, ओवन, कम्प्यूटर, हारमोनियम आदि के कवर भी धोने हैं. अलमारियां ठीक-ठाक करनी हैं और बुक केस तथा शो केस भी साफ करने हैं. स्वच्छता पवित्रता की निशानी है, रहने का स्थान स्वच्छ हो तो रहने वालों का मन भी साफ-सुथरा रहता है. जैसे जून का मन है निर्विकार, उन्हें कभी किसी पर टिप्पणी करते कम ही देखा है. कुछ न करते हुए भी वह शांत रहे सकते हैं एक उसका मन है हमेशा किसी न किसी उधेड़बुन में लगा हुआ.

ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे ! अपने आत्मस्वरूप को व जान सके, यह जो संसारिक बुद्धि है जो ऊपर से ओढ़ी हुई है, उसे उतार फेंकें. आज नन्हा घर पर है, फरमाइश की है केक बनाने की, ‘ब्लैक फारेस्ट केक’ पहले भी एक दो बार बना चुके हैं वे. अभी एक सखी का फोन आया तो शाम को उसे आने का निमन्त्रण दे डाला, अब कोई केक की तारीफ करने वाला भी तो होना चाहिए. कल शाम वे स्वयं असमिया सखी के यहाँ गये थे, उसने पकौड़े, मूंगफली, पॉपकॉर्न और नमकीन के साथ चाय परोसी. उसकी बिटिया और बेटे से मिलकर ख़ुशी हुई. नन्ही सी बेटी बहुत प्यारी बातें करती है और बेटा बहुत अच्छी भावपूर्ण कविताएँ लिखता है English में. अभी अभी वे केक ओवन में पकने रख आये हैं. साढ़े दस हो चुके हैं, आज वह रियाज नहीं कर पायी, नन्हा जिस दिन घर रहता है, रूटीन बदल जाता है, अभी सुबह ही है और उससे बातें करके (उस समझाना टेढ़ी खीर है और एक एक काम के लिए कई-कई बार कहना भी ) जैसे सारी ऊर्जा चुक गयी है. नन्हे का यह साल बहुत महत्वपूर्ण है. कल से जून का दफ्तर भी बंद हो रहा है, वे कहीं घूमने जायेंगे. कल दोपहर उसने “हिंदी साहित्य का इतिहास तथा हजार वर्ष की हिंदी कविता” की भूमिका दुबारा पढ़ी. कविता को लिखा नहीं जाता यह खुद को लिखवा लेती है ऐसा वह पहले भी कहीं पढ़ चुकी है. पर वह तभी हो सकता है जब कोई पूरी तरह से भावमय हो चुका हो, संवेदनशील हो और सत्य का अन्वेषक हो. सच्चा कवि समाज को नई दिशा देता है. सत्य के छोटे से छोटे क्षण को ही उद्घाटित कर पाए इसी में कविता की सार्थकता है. जो असत्य है ऊपर से ओढ़ा है वह कविता का विषय नहीं हो सकता यह तो अंदर से निकलती है, नितांत स्पष्ट, शुद्ध और सच्ची वाणी !    


Monday, July 28, 2014

अमलतास के फूल


आज नन्हे का जन्मदिन है, सुबह उठा तो खुश था, उसके दादाजी का फोन आया. जून उसके लिए एक किताब और एक पेन्सिल बॉक्स लाये हैं. मित्रों के लिए और क्लास टीचर के लिए चाकलेट्स ले गया है. कल शाम को उसने मित्रों को घर पर बुलाया है. कल उन्होंने गुलाबजामुन भी बनाये और आज बाकी खरीदारी की. कल उन्होंने ‘रिफ्यूजी’ फिल्म भी देखी, उसे अच्छी लगी. आज ‘जागरण’ में गोयनका जी ने बुद्ध के जीवन प्रसंग सुनाये. उनके अनुसार कोई स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु. जैसा बीज बोयेगा फल वैसा ही होगा. हर क्षण सचेत रहकर भीतर और बाहर जो घट रहा है उसे ध्यानपूर्वक देखने पर वास्तविक ज्ञान होता है. कल रात कुछ देर ध्यान करके सोयी, रात को आने वाले स्वप्न अन्य दिनों से भिन्न थे.

कल उन्होंने नन्हे के जन्मदिन की पार्टी का आयोजन किया, सुबह से व्यस्त थी सो लिख नहीं सकी, न ही रोज के कुछ कार्य भी. कल गर्मी भी बहुत थी और दोपहर भर गैस सप्लाई बंद थी. रात को साढ़े नौ बजे वे सोने गये तो बेहद थके थे. थकान शारीरिक से ज्यादा मानसिक थी नन्हे के सभी मित्र अब बड़े हो गये हैं, लगभग युवा, घर में इतनी भीड़-भाड़ हो गयी, बच्चे  इस कमरे से उस कमरे में शोर मचाते हुए दौड़ रहे थे, भटूरे तलते-तलते उसके चेहरे से पसीने की धाराएँ बह रही थीं, लेकिन उसे यकीन है नन्हे और उसके मित्रों के लिए अवश्य ही आनंददायक अनुभव रहा होगा. जून भी थोड़ा परेशान हो गये थे, सो उन्होंने सोचा है एक वर्ष छोड़कर अगली पार्टी का आयोजन करंगे. कल जून नन्हे के लिए एक सुंदर शर्ट लाये और भी कुछ उपहार जो उसके स्कूल में भी काम आ सकते हैं. आज भी गर्मी बहुत है, सुबह के उसके कार्य सम्पन्न हो गये हैं, दोपहर को पत्र लिखने हैं. Anne frank की पुस्तक दोबारा पढ़ रही है कितनी अपनी सी लगती है Anne.
जून आज शिवसागर गये हैं, बहुत दिनों से एक सखी के आने की बात थी, सो उसने पूछा पर आज उसके पास समय नहीं है. नन्हा आज बारिश में भीग कर (छाते के नीचे भी छींटे तो पड़ते हैं इसका आभास उसे सोमवार को म्यूजिक क्लास में जाकर हुआ) बस स्टैंड तक पैदल गया, बारिश के कारण बस देर से आई सो उसे मिल गयी. आज उसकी छात्रा भी पढ़ने नहीं आ सकी, कारण कल की गर्मी के बाद मौसम में अचानक आया बदलाव और रात से हो रही मूसलाधार वर्षा. बाबाजी के प्रवचन में आज रस नहीं आ रहा, कारण कई हो सकते हैं पर अहम् भाव की प्रधानता है. कल रात स्वप्न में ‘सीक्रेट एनेक्सी’ देखा, वे स्वयं भी उसमें रह रहे थे. यहाँ खिड़की के पास बैठकर हल्की ठंडक महसूस हो रही है. जून और नन्हा दोनों सफर में होंगे, ईश्वर उनकी व सभी की सहायता करेगा. ऐसे में ईश्वर खूब याद आता है वरना तो वे उसके अस्तित्व को भी नकारने में नहीं चूकते, मानव मन भी पूरा अहमक है.
She read the Yiddish proverb, written in the diary , “he who can’t endure the bad will not live to see the good”. Then wrote, so they should endure the bad willingly and with patience. At this moment of her life she has all the good and nothing bad, this beautiful house in a beautiful place on earth with her beloved jun and their darling son. Her heart is full of gratitude towards God, he has given so much. Wealth, prosperity and happiness. When she thinks of people of Kashmir or orrisa, those who are homeless, in pain and are starving and people of those countries where there is no freedom, like in their dear India. They are very lucky to be born in India, the country of gods and truth. Due to recent rain all is looking clean and fresh through her window. There house has a big lawn and a patch for kitchen garden, there is greenery all around and across the road there is a vast tea garden, of course it has a boundary wall but they can see the bigger trees. Just outside their gate on both sides are two trees , one summer tree Amaltas which is blooming these days and other is winter tree with white scented flowers  in February.




Wednesday, July 16, 2014

नुक्ते का फेर


नुक्ते की फेर में जुदा हुआ, नुक्ता ऊपर रखा तो खुदा हुआ” उसने जब यह सुना तो जोर से हँसे बिना न रह सकी, उर्दू भाषा भी कमाल की है, एक नुक्ते से कितना फर्क पड़ जाता है. वह भी अपने मन रूपी नुक्ते को सही जगह नहीं लगाती और ईश्वर से विमुख हो जाती है. ‘जागरण’ में आज फिर सुना, सुख-दुःख आदि अवस्थाओं से परे जो ‘आत्मा’ रूपी चैतन्य सभी में है, यदि उसका भान नहीं हुआ तो मस्तिष्क को ज्ञान की हजारों बातों से भर लेने से भी कोई लाभ नहीं, विवेकानन्द ने भी कहा है, कि मात्र धार्मिक पुस्तकें पढने और प्रवचन सुनने भर से वह बौद्धिक विकास बन कर रह जाता है, यदि वास्तव में उसे अनुभव की वस्तु न बनाया तो धर्म भी नशे की तरह है. किन्तु उसे अपने भीतर आये बदलाव की भनक है, धीरे-धीरे ही सही किन्तु यात्रा जारी है. अब इस संसार को स्वप्न की भांति देखने की समझ आई है. दूसरों की दृष्टिकोण को समझने की समझ, हरेक में उसी अन्तर्यामी के प्रकाश को देखने की समझ, अपनी गलतियों का अहसास फौरन हो जाता है. और उसे स्वीकारने की हिम्मत भी वः अपने भीतर पा रही है. इससे मानसिक ऊर्जा का व्यय नहीं होता सो मन हमेशा शांत रहता है, कमल के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की भांति. जून भी आजकल खुश हैं, नन्हा भी एकाग्रता से पढ़ाई में व्यस्त है. वह अभी से धीर-गम्भीर है, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सन्मार्ग पर ले जाये. इसी महीने उन्हें घर जाना है, जून ने सुबह कहा, उपहार खरीदने भी शुरू करने चाहिए. उसे याद आया, दो सखियों के माता-पिता आए हुए हैं, उन सभी को भोजन पर बुलाना है. वर्षा फिर हो रही है.

“जो टिकता नहीं वह अवस्था है जो मिटता नहीं वह परम सत्य है”. बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो जीवन सहज हो जायेगा. आज ‘जागरण’ पर प्रवचन दिल को छूने वाला था, कितनी सरलता से सन्त कितनी गूढ़ बातें कह जाते हैं, लोगों की भाषा बोलते हैं, उनके हित के लिए उनकी अपनी ही शब्दावली से शब्द लेते हैं, उसे उनमें श्रद्धा होती है, पर कुछ बातों के प्रति अविश्वास भी होता है, शायद उसकी रूचि नहीं उन बातों में सो उनके प्रति उदासीनता बनी रहती है. आज ध्यान में बैठी ही थी कि फोन की घंटी बजी सो पूरा नहीं सका. इस वक्त साढ़े नौ हुए हैं, सुबह से अब तक का वक्त ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के कारण अच्छा रहा है, किन्तु यह भी एक अवस्था है. सुखद स्थिति में प्रीति होने से वह सुखकर लगती है, दुखद स्थिति में प्रीति न होने से वह दुखकर लगती है, उसे इन दोनों से ही परे जाना है. यह जग कई पाठ पढ़ाता है, ठोंक पीटकर इस काबिल बनता है कि सत्य को समझने लायक हो सकें. जग में विभिन्न लोगों से व्यवहार करते समय, तरह-तरह की परिस्थितियों में मन का संतुलन बनाये रखते समय, अनुकूल हो या प्रतिकूल दोनों वक्तों में, ईश्वर का स्मरण करते समय वह कितना कुछ सीखती है अथवा तो उस सीख का उपयोग करती है जो सदा से उसके अंतर्मन में सुप्तावस्था में थी. मानव मन असीम सम्भावनाओं का भंडार है, इसमें कई खजाने छुपे पड़े हैं आवश्यकता है तो मंथन की, अमृत भी यहीं है और विष भी यही हैं !

कल पिता का पत्र मिला, पढकर अच्छा लगा, उन्हें उसका घर-परिवार, समाज तथा राष्ट्र के बारे में सोचना, लिखना अच्छा लगा. यदि मन जागरूक हो कोई हर पल सचेत हो तभी ऐसा हो सकता है, बहुत पहले पिता ने एक बार कहा था जब वह घर पर थी, “अपने मन पर नजर रखो, कहीं वही तम्हारे खिलाफ न हो जाये” और अब टीवी पर जागरण शुरू हो गया है. मन के स्वभाव को बदलना होगा जो सदा बाहर की ओर जाता है, ऊर्जा नष्ट होती है. अपने दोष दबाने के लिए दूसरों के दोष देखता है. यदि दूसरों के गुण देखने की आदत आ जाये तो साधक जल्दी सफल हो जाता है. किन्तु अपने दोष देखकर दुःख या पीड़ा न हो बल्कि यह बाहर से आया हुआ है इसे निकालना है, ऐसा संकल्प जगे. तभी कोई निर्दोष जीवन जी सकेगा और ऐसा निर्दोष जीवन ही ईश्वर के प्रेम का अधिकारी है. वक्ता अपने दोषों को दूर करने की बात कहते-कहते भावुक हो गये और श्रोताओं पर भी असर हुआ, कइयों की आँखें भीग गयीं और कई तो रोने भी लगे, लेकिन उसका मन शांत है, ईश्वर कभी नहीं चाहता कि वे दुखी हों अशांत हों या निराश हों ! वह जानती है हृदय में संकल्प के साथ प्रार्थना भी हो तो लक्ष्य मिल सकता है, प्रयत्न केवल अपने बलबूते पर किया तो अहंकार या विषाद दोनों में से एक होगा, और यदि प्रयत्न नहीं केवल प्रार्थना ही की तो निष्क्रियता घेर लेगी.   




Thursday, July 10, 2014

चेन्नई की साड़ी


आज ‘जागरण’ में निस्वार्थ सेवा के महत्व के बारे में सुना. उसके सम्मुख भी सेवा एक सुयोग आने वाला है. यह उसकी परीक्षा का समय भी होगा. उस अखंड स्रोत से मन जुड़ा रहे, किसी भी परिस्थिति में झुंझलाहट के चिह्न चेहरे पर न आयें, यही होगी परीक्षा ! कल मीटिंग में वह कविताएँ नहीं पढ़ पायी तो यह बात निराशा का कारण नहीं होनी चाहिए. किन्तु इस क्षण जो उसके हृदय में अकुलाहट हो रही है, इसका कारण क्या है. अन्यों को जज करने की प्रवृत्ति, शासन करने की प्रवृत्ति भी ताप का कारण बनती है. अज्ञान भी ताप को जन्म देता है. देह और मन के साथ सुखी-दुखी होना अज्ञान ही तो है. देह की व्याधि या मन का सुख-दुःख उस शुद्ध स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकते. यदि इसका ज्ञान है तो छोटी-छोटी बातों से स्वयं को तनाव ग्रस्त होने से रोक सकते हैं. कल छोटी बहन का पत्र आया, वह खुश है लेकिन पति की परेशानी को लेकर चिंतित भी. वे लोग मई में उसके पास जायेंगे.

उसने याद किया, ध्यान के लिए कई बातें जरूरी हैं. सबसे पहले तो आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा, फिर सांसारिक बातों से उदासीनता, लक्ष्य का निर्धारण, स्वाध्याय और नियमितता. नियत समय पर नियत विधि से ध्यान किया जाये तो ही परिणाम मिलेगा, लेकिन परिणाम की आकांक्षा न रखते हुए ध्यान करना है. आज सुबह गाइडेड मैडिटेशन में भी वह मन को एकाग्र नहीं रख सकी. सम्भवतः उसकी श्रद्धा दृढ नहीं है, अभी रास्ता बहुत लम्बा है, जिस मार्ग पर बुद्ध, नानक, कबीर, महावीर चले थे इसी रास्ते पर चलना होगा, जाहिर है रास्ता बहुत कठिन है लेकिन असम्भव नहीं. मन को संयत करना अभ्यास और वैराग्य से सम्भव है, ऐसा कृष्ण ने कहा है, कृष्ण ही उसकी सहायता करेंगे. अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए सांसारिक लोभ व आकर्षणों से मुक्त रहने का प्रयास करना होगा. मध्यम मार्ग अपनाते हुए मानसिक विकारों (क्रोध, लोभ, मोह तथा इच्छाएं ) एक-एक कर दूर करते जाना है. मन जितना मुक्त होगा ध्यान उतना ही सम्भव होगा. किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रहे, सचेत रहना है. ईश्वर का ध्यान-भजन करते करते ध्यान स्वयंमेव सिद्ध होने लगेगा.

टीवी पर जागरण आ रहा है, जिसमें मातृ देवो भव ...आदि प्राचीन परंपरा का महत्व बता रहे हैं. आजकल सब अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वृद्ध माता-पिता को भूल जाते है, जिनके कारण वे इस दुनिया में हैं. कल से उसका मन फिर नीचे के स्तरों में चला गया है. कल सुबह से शाम की मीटिंग की बात ध्यान में थी. स्वास्थ्य भी पूर्ण नहीं है, पन्द्रह आने है, शायद यही दो कारण रहे हों. आज सुबह भी मन ध्यान में भटका पर सचेत थी सो वापस लायी. लेकिन बिना किसी व्यवधान के ध्यान कब सधेगा कहना मुश्किल है. मन दुनियावी प्रपंचों में कब खो जाता है पता ही नहीं चलता. सतत् प्रयत्न जारी रखना है मंजिल एक न एक दिन अवश्य मिलेगी. नन्हे की पढ़ाई पूरे जोरों पर है. उसे गणित पढ़ाते वक्त अच्छा लगता है, वह बहुत जल्दी सीख भी जाता है. जून आजकल ठीक हैं, कल उसे लेने आये तो खुश थे, वरना पहले तो हमेशा उदास हो जाते थे. कल उसने चेन्नई से खरीदी नई साड़ी पहली बार पहनी. सोमवार को मेहमान आ रहे हैं, घर की सफाई हो गयी है, सामान भी सब मंगा लिया है. उस समय सारा प्रयास यही रहना चाहिए कि एक क्षण के लिए भी मन उद्व्गिन न हो, ऐसा नहीं कि जबरदस्ती की जाये सहज, स्वाभाविक स्थिति में यदि मन रहे तो स्वतः शांत रहेगा. आतुरता तो वह ऊपर से ओढ़ लेती है. उसे लगा यदि वे भारतीय जीवन शैली अपनायें, संयम, सहन शीलता, सदाचार और प्रेम से ओत-प्रोत हो तो जीवन सहज रह सकता है.


Monday, July 7, 2014

टैगोर की सहजता



At this moment she is feeling as light as wind. It seems that she has found the way to know herself. Since morning most of the time she was conscious of the thoughts of her mind ie she was aware of every feeling and reaction. This is first step towards her goal.

उसने जागरण में सुना, “मन को विकारों से मुक्त रखना ही धर्म है. जैसे ही कोई विकार जगता है, कुदरत की ओर से फल मिलता है. अहंकार होते ही व्याकुलता छा जाती है, द्वेष की भावना जगते ही दुःख मन को घेर लेता है. जब मन सद्भावना व मैत्री से भर जाये तो उसका फल शांति और आनन्द के रूप में तत्काल मिल जाता है”.
उसने सोचा जो धर्म को जानता, मानता और उसका पालन करता होगा वह मन को शुद्ध करने का प्रयास ही नहीं करेगा सदा इसी चेष्टा में लगा रहेगा कि मन की चादर पर कोई दाग न लगे वह कोरी की कोरी रहे जैसे उन्हें कुदरत से सौंपी गयी थी. धर्म कोई बौद्धिक विलासिता नहीं है, यह तो अनुभव की चीज है. कदम-कदम चलना होता है इस पथ पर ! धर्म की बातें कहते बहुत हैं, सुनते बहुत हैं पर करता कोई-कोई है, उसे तो अन्तर्मुखी होकर विकारों को जड़ से निकलना होगा, कोरी बात नही रहे उसके लिए धर्म. इसके लिए जीवन में एक अनुशासन भी लाना होगा.

परीक्षा के बाद की छुट्टियों के समाप्त होने पर आज नन्हे का स्कूल खुला है, नई कक्षा में उसका पहला दिन है. वर्षा का मौसम पूरे जोर-शोर से आरम्भ हो गया है. जून आजकल खुश हैं, स्वस्थ भी दीखते हैं, उनकी सारी परेशानी दोपहर को दफ्तर से अकेले आकर ताला खोलने, स्वयं लेने व अकेले भोजन करने और इसी तरह की बातों के कारण रही होगी. उसके घर पर न रहने के कारण सफाई भी ठीक से नहीं हो पाती थी, उन्हें चमकता हुआ सलीके से सजा घर भाता है. घर-परिवार का उनके लिए बहुत महत्व है. उसे भी यह आजादी भा रही है, अभी स्कूल का काम शेष है, कुछ दिनों में जब पूर्ण हो जायेगा तब पूर्ण स्वतन्त्रता होगी.

उसने पढ़ा तो बहुत है पर केवल पठन ही नहीं मनन भी आवश्यक है, मनन के बाद जीवन में उसको व्यवहारिक कसौटी पर कसना होगा, और फिर उसके द्वारा जो अनुभूति प्राप्त होगी वास्तव में ज्ञान तो वही होगा. किताबों की बातें जब जीवन में उतरने लगें तभी पूर्ण ज्ञान मिलता है. विपरीत वातावरण में रहकर भी मानसिक संतुलन बनाये रहना ही तप है जो उसे करना है. इस तरह संतुष्ट रहने से आत्मिक बल बढ़ता है. यदि बाधाओं को पार करना तपस्या मान लें तो बाधाएँ भी सुखकर प्रतीत होंगी, क्योंकि जो भी सुख-दुःख किसी को प्राप्त होता है उसके ही पूर्व कर्मों का परिणाम है. मन यदि शांत नहीं रहा तो देखना होगा कहीं अभिमान तो नहीं जला रहा, जब हृदय में कुछ चुभता हो, मन कसमसाता हो तो पहले अपने भीतर झंकना होगा बाद में बाहर ! क्योंकि मन की भावनाओं को ही मन प्रतिबिम्बित करता है, मन की विशालता जहाँ सहजता लाती है, क्षुद्रता अशांति का कारण बनती है. उसने कहीं पढ़ा था, टैगोर ने कहा है, उनके भीतर की सहजता, सरलता और सहनशीलता ही उन्हें इस ऊँचाई तक लायी है. जून और नन्हा अपने आफिस और स्कूल गये हैं और वह यहाँ है जिसे घर को संवारने व जीवन को संवारने का मौका मिला है. ईश्वर ने उसे यह मार्ग दिया है.







Saturday, August 17, 2013

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय


कल वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ‘जोरहाट’ गये थे, सुबह सात बजे घर से निकले और रात साढ़े आठ बजे वापस लौटे. दोपहर लगभग पौने एक बजे वे जोरहट में ONGC के गेस्ट हाउस पहुंचे. पहले BHU की प्रार्थना पढ़ी गयी, फिर एक-एक करके सभी सदस्यों ने अपने BHU प्रवास के संस्मरण सुनाये, जून ने भी अपना अनुभव बताया. फिर भोज हुआ, सभी लोग एक दूसरे के लिए कुछ हद तक नये थे. सदा की तरह वह भीड़ में खुद को अकेला महसूस कर रही थी. पौने तीन बजे वापसी की यात्रा शुरू हुई, कुल मिलाकर यात्रा अच्छी रही. रात को सोते वक्त अहसास हुआ नौ-दस घंटे बस में बैठे रहने से हो गयी थकान का, स्वप्न भी वहीं के आते रहे. इस समय नन्हा हिंदी का अभ्यास कर रहा है और उसने छोटी भांजी के लिए जन्मदिन का कार्ड पोस्ट करने के लिए जून को दिया है. वह दुबली-पतली, शर्मीली सी लेकिन अपने इरादों की पक्की बालिका है. आज सुबह देर से उठी तो जागरण नहीं सुन पायी, पर नहा-धोकर जब गीता पाठ करने बैठी तो कुछ श्लोक पढकर यह महसूस हुआ, जब वह इन बातों का पालन ही नहीं कर सकती तो मात्र पढ़ने से क्या लाभ है, गीता के उपदेश बहुत महान हैं और उन पर चलना उसके लिए मुश्किल है, फिर यही संतोष दिया मन को कि बार-बार पढने से स्मरण रहेगा, भीतर चलने वाले द्वंद्व को जीतने के लिए इन्द्रियों से परे मन और मन से परे बुद्धि, बुद्धि से परे आत्मा की शरण में जाना होगा.

Today she got two letters, one from home and other from manjhla bhai, both are written in good spirit and mood. Father advises us to be healthy and smart and brother says that he is happy to see our small family living together happily. Yesterday some lady called her for maths tuition for her daughter. They also went for dinner to a friend’s place, as usal she made so many things and in large quantity but…anyway it was good after a long time to eat together.

आज ‘जागरण’ में सन्त ने भक्तियोग पर प्रकाश डाला पर यह उसके क्षेत्र की बात नहीं है. कल लाइब्रेरी में health mag में मानसिक स्थिरता व शांति पाने पर पर एक अच्छा लेख पढ़ा, वही बातें जो गीता या अन्य धार्मिक पुस्तकों में उसने पढ़ीं हैं उन्हीं को आधार मानकर उसमें सुझाव बताये गये हैं, बार-बार पढ़ते रहने पर वे उसे याद हो गये हैं, फिर भी कभी कोई बात होने पर उनका उपयोग नहीं कर पाती है उतनी शीघ्रता से. यूँ अपने आपको नकारने और दोषी बनाने की प्रवृत्ति भी ठीक नहीं है उस लेख के अनुसार. अपने उन कार्यों को याद करके जिन्हें कर सकत है स्वयं की सराहना तो कोई करता नहीं. सराहना करने लायक कोई बात नजर न आये तो ? तो अपने अंदर ऐसा कुछ  जागृत करना होगा कि  सराहना की जा सके.

आज दोपहर उसे गणित में ‘सेट थ्योरी’ पढ़ानी है. मौसम अच्छा है. आज सुबह  गीता पाठ करने के बाद ध्यान लगाने का प्रयत्न किया पर मन है कि कहीं से कहीं पहुंच जाता है और जो बातें उस क्षण से पूर्व उसके ख्याल में भी नहीं थीं वह सोचने लगता है. हजारों वर्षों से ऋषि-मुनि मन को नियन्त्रण में रखने के उपाय खोजते आए हैं. सभी धर्मों में संयम पर बल दिया है. कल उसने टीवी पर ‘सैलाब’ देखा, शिवानी और रोहित की प्रेम कहानी. कल उसकी एक मित्र ने जगजीत सिंह का कैसेट insight दिया, अभी सुना नहीं है उसने, जगजीत सिंह की आवाज में बहुत गहराई है. गम की गजल हो या ख़ुशी का नगमा, उनकी आवाज दोनों से इंसाफ करती है. कल उसने पंकज उद्हास के एक कैसेट ‘कभी खुशबू कभी नगमा’ के बारे में भी सुना, कभी तिनसुकिया गये तो लायेंगे, उसने सोचा, शायद यहाँ भी मिल जाये पर यहाँ वह बाजार कम ही जा पाती है. जून आजकल समय से घर लौट आते हैं, इसका अर्थ हुआ कि उनका मन घर में बहुत लगता है,



Sunday, August 4, 2013

कितने आदमी थे ?


आज सरस्वती पूजा है, नन्हे का स्कूल बंद है, कल शाम जब वह स्कूल से लौटा तो उसका एक जूता जो पहले से क्रैक था ज्यादा फट गया था, उसने अपनी सखी से कहा है वे लोग उन्हें भी बाजार ले जायेंगे. कल शाम जून का फोन आया, वे खुश थे, अपने मित्र के यहाँ से किया था फोन , जरुर उन्हें भी उसकी आवाज ख़ुशी भरी लगी होगी, कभी-कभी उसे स्वयं पर आश्चर्य होता है कब वह धीरे से मोह से बाहर निकल कर स्वयं पर आश्रित होना सीख गयी, उसे स्वयं ही पता नहीं चला. जून का साथ अब मात्र उसके आश्रय के लिए नहीं चाहिए बल्कि इसलिए कि उसका साथ जिन्दगी को और कई अर्थ देता है, और उसे सामान्य देखकर नन्हा भी पहले की तरह पापा को याद नहीं करता है, पहले अक्सर उदास हो जाया करता था. कल उसे हिंदी प्रतियोगिताओं में मिले पुरस्कार, हाथ में मिले और हिंदी पढ़ाने के लिए मानदेय भी. जून के एक मित्र आकर दे गये.

४७वां गणतन्त्र दिवस ! सुबह टीवी पर परेड देखी, दोपहर को वे साइकिल से एक मित्र के यहाँ गये, चार बजे लौटे. उनके साथ टीवी पर शोले फिल्म देखी, उसने सोचा शायद जून ने भी देखी हो. पहले उसे लग रहा था शायद इस बार वह इस फिल्म को इतना पसंद नहीं करेगी पर नहीं, हर बार देखने पर भी उतनी ही अच्छी लगती है., फिर छब्बीस जनवरी का मूड और उसकी सखी ने खाना भी बहुत अच्छा बनाया था, टमाटर आलू की सब्जी, पूरी, मटर-पुलाव और बेक्ड मिक्स्ड वेज ! नन्हे ने भी शौक से देखी, उसे एक सीन न देख पाने का अफ़सोस था, कितने आदमी थे ? उस वक्त वे घर के रास्ते में थे.  घर आकर उसने बाकी की फिल्म देखी. और अब रात हो गयी है, कल नन्हे के दो टेस्ट हैं, जिनकी तैयारी वह कर चुका है, समाचारों में जयपुर और मणिपुर में हुए बम विस्फोटों के बारे में सुना, जैसे किसी ने फूले हुए गुब्बारे में पिन चुभा दिया हो. सुबह परेड देखते वक्त और देश भक्ति के तराने सुनते वक्त धमाकों और विस्फोटों की बात कैसे भुला दी, सच्चाई यह भी है और सच्चाई वह भी थी.

आज यहाँ धूप में बैठे हुए उसे सन्नाटे से उपजी अनोखी शांति का अनुभव हो रहा है, ‘इंडिया२४ऑवर’ में सुना था, जब मन शांत हो तो जिसका चित्रण करें या देखें उसमें सच्चाई होती है, जब वस्तुओं के देखने का अर्थ मात्र उन्हें देखना नहीं बल्कि महसूस करना हो. आजकल एक बूढ़ा व्यक्ति उनके यहाँ आकर पेड़ से आंवले ले जाता है, परसों वह बोरी भर के आंवले ले गया था और आज फिर आ गया, उसने कहा पहले थोड़ा सा काम करो बगीचे में तब आंवले ले जाओ. वह मान गया है. आज सुबह उसने ‘जागरण’ में सुना, ‘सुख लेने की वस्तु नहीं है देने की है. और दुःख भोगने की वस्तु नहीं बल्कि विवेक का उपयोग करते हुए पार निकलने की चीज है’. उसने सोचा जून इस समय बस में होंगे. घर तथा उनके बारे में सोचते हुए..