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Tuesday, April 1, 2014

दिनकर की कविता


एक सखी ने कहा था कि बालिकाओं के लिए ‘प’ अक्षर से कुछ नाम सोच कर रखे, उसने शब्दकोश की सहायता से कुछ नाम लिखे पर बाद में उन्हें पंडित जी से पता चला नाम ‘प’ से नहीं रखना है. आज सुबह घर से फोन आया, वे लोग घर बदल रहे हैं, एक नये इलाके में दो कमरों का मकान लिया है. बाद में जून ने बहन से भी बात की, पिता की आवाज की गम्भीरता से वह परेशान हो गये थे, वहाँ जाने की बात कर रहे थे, अपने कर्त्तव्य का बोध उन्हें सदा ही रहता है पर बिना रिजर्वेशन के जाना आसान नहीं है. आज भी वर्षा हो रही है सुबह से ही, जबकि उत्तर भारत गर्मी से तप रहा है. उसने सोचा, वे अपने जीवन के बेहतर वर्ष यहाँ बिता रहे हैं बिना किसी तकलीफ के, इसके लिए उन्हें ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए. कल उसने वह लेख मीटिंग में पढ़ दिया, तारीफ भी सुनने को मिली पर सेक्रेटरी ने कुछ नहीं कहा, शायद उन्हें अपना जिक्र न किया जाना खल गया हो, हर वक्त कोई हर एक को तो खुश नहीं रख सकता, कुछ भी हो मीटिंग अच्छी रही, दो मेम्बर्स ने अच्छी कविताएँ पढ़ीं, एक की कविता स्तरीय अंग्रजी में थी.

कल वह रिपोर्ताज और यात्रा लेखन के बारे में पढ़ती रही, इस कोर्स से उसे कई बातों की जानकारी हो रही है, पत्र पत्रिकाएँ, अख़बार महत्वपूर्ण हैं यह तो शुरू से ही मालूम था पर किस तरह और कितने महत्वपूर्ण हैं इसकी जानकारी हुई, कैसे लेखक और पत्रकार अख़बारों के लिए लिखते हैं इसके साथ और भी कई बातें. जून अगले माह दस दिनों के लिए घर जा रहे हैं, नन्हे का स्कूल कल से ग्रीष्मावकाश के लिए बंद हो रहा है, उसे ढेर सारा गृहकार्य मिलेगा, सो दस दिन व्यस्तता में ही बीत जायेंगे.

आज सुबह-सुबह जून नन्हे पर बरस पड़े, उसे आधे घंटे तक प्यार से उठाने के बाद उनका धैर्य जवाब दे गया. नन्हे को सुबह गहरी नींद आती है, रात को जल्दी सोने के लिए कहें तो सुनता नहीं है, वह बड़ा हो रहा है और सोचता है कि अब उसे अपने मन के मुताबिक जीने की छूट होनी चाहिए. जून बाद में बहुत परेशान थे, नन्हा भी उदास होकर स्कूल गया है वापस आने तक शायद भूल चुका होगा. जब वह छोटा था आधे घंटे में ही डांट भूल जाता था और पहले की तरह हँसने-खेलने लगता था पर अब उसे सामान्य होने में वक्त लगता है, शायद यह भी उम्र का एक हिस्सा है. आज उसके स्कूल में आखिरी दिन है, कल से छुट्टियाँ हैं लेकिन समय पर उठाना, व्यायाम करना, पढ़ाई करना, खेलने जाना, कम्प्यूटर क्लास जाना सभी उसे समय पर करने होंगे. जिन्दगी में एक लय हो तभी सारे कार्य हो पाते हैं और सब कुछ बिखरा-बिखरा सा नहीं लगता. आज कई दिनों के बाद धूप निकली है. कल शाम वह कोरस की प्रैक्टिस के लिए गयी थी, असमिया गाना है, धुन ज्यादा कठिन नहीं है, लेकिन नन्हे और जून को कुछ दिन शाम को अकेले घर पर रहना होगा. आज सुबह घर से फोन आया, पिता खुश लग रहे थे, उन्होंने उसे एक महीने बाद जन्मदिन की बधाई दी. जून पिछले तीन-चार दिनों से उनके लिए परेशान थे.

जुलाई का पहला दिन, सुबह ही तेज वर्षा हुई, कालिदास की याद हो आयी. अब धूप निकली है जैसे कि इस अम्बर पर कभी बादल थे ही नहीं. आज सुबह उसने पढ़ने आयी छात्रा को जयशंकर प्रसाद की कविता का अर्थ बताया, वह दिनकर की कविता का अर्थ भी पूरी तरह नहीं समझ पायी थी, नूना स्वयं ही नहीं समझ पायी थी इस तरह कि उसे समझा सके, उसे लगा आधुनिक कवि थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना चाहते हैं, भावों को दुरूह बना देते हैं या फिर वे ही शब्दों के पीछे उन अर्थों को तलाशते हैं जो शायद वहाँ नहीं हैं. कल भी वह रिहर्सल के लिए गयी, पर दो घंटों में मात्र आधा घंटा ही गाने का अभ्यास हुआ. कोरस प्रतियोगिता की तैयारी उस तरह नहीं हो पा रही है जैसे होनी चाहिए, आकर्षक पोस्टर पर लोगों को आकर्षित करने के लिए इनामों का जिक्र होना चाहिए साथ ही एंकरिंग के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए पर यह सब करेगा कौन, सेक्रेटरी शायद यह सोचती नहीं. आज एक सखी का फोन आया उन्होंने अट्ठाईस हजार से ज्यादा का फ्रिज लिया है, उसे देखने जाना होगा.   



Friday, December 13, 2013

सेवेन इयर्स इन तिबत-Heinrich Harrer


अपनी पुरानी जगह पर (बगीचे में खुलने वाली बैठक की खिड़की के पास वाली कुर्सी पर) बैठकर आज हफ्तों बाद डायरी खोली है, पिछले तीन-चार दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. शनिवार को वे तिनसुकिया गये थे, शुक्र को भी छुट्टी थी, नन्ही मेहमान को यहाँ के मार्केट ले गये थे. इतवार को उसे OCS दिखाया, नाहरकटिया भी ले गये. चारों तरफ सड़कों की हालत बहुत बुरी हो गयी है, पहले सी खूबसूरती दिखाई नहीं देती. कल क्लब गये, छत से सारा क्लब दिखाई देता है, उसने भी पहली बार देखा. भांजी ने दो-तीन उपन्यास खत्म कर दिए हैं और अब रुमाल बना रही है, उसे अकेले बैठकर चुपचाप काम करना पसंद हैं. इस मामले में वह उसकी तरह है. seven years in Tibet by Heinrich Harrer उसने ट्रेन में खत्म की थी, रोचक किताब है, कल लाइब्रेरी से चार किताबें और लायी है.
आज घर पूरी तरह साफ लग रहा है. अभी आलमारियां सहेजनी शेष हैं, पर वह बाद में ही करेगी. कल उसकी पड़ोसिन ने पुनः पूछा, लेडीज क्लब के कार्यक्रम में भाग लेने का विचार है या नहीं, सच बात तो यह है कि जो गाना उन्होंने कोरस के लिए चुना है, उसे जरा भी पसंद नहीं है, पर लोकतंत्र में बहुमत की विजय होती है, अब सबने मिलकर पसंद किया है तो साथ खड़ा होना ही पड़ेगा. नन्हे का सभी विषयों का गृहकार्य अभी तक पूरा नहीं हुआ है, कल से उसने नई कक्षा में जाना शुरू किया है. कल वह भी हिंदी कक्षा के लिए गयी थी.

क्यों बेजार होने पर कलम का सहारा लेता है उसका मन, मन की पीड़ा हो या तन का दर्द, जैसे की सिर का दर्द तब भी लगता है ऐसा कुछ पन्नों पर उकरेगा कि...सारा दर्द भी बह जायेगा पर...ऐसा होता कहां है, कुछ पल के लिए ध्यान जरुर बंट जाता है और तब लगता है मुक्ति का क्षण करीब ही है. नन्हे का गृहकार्य कल रात साढ़े दस बजे तक चला. आज उसे ‘हिंदी समाचार’ पढ़ने हैं और कल English में एक स्पीच, उसे सबके सामने बोलने में ज्यादा झिझक नहीं होती.

कल नन्ही मेहमान को वापस जाना है, इतने दिन कितनी जल्दी बीत गये, परसों से दोपहर को उसकी कमी खलेगी, जब वे दोनों टीवी देखते हुए ‘पारले जी’ बिस्किटस् के साथ चाय पीते थे.  कल शाम को वही सहयात्री मित्र परिवार मिलने आया, इतने दिनों बाद मिलकर बहुत खुशी हुई, कल उन्होंने अपनी कुछ घरेलू बातें भी बतायीं, राजस्थान की यात्रा में उनसे दिन-रात का साथ था, निकटता स्वाभाविक है. उनकी एल्बम से कुछ फोटो जो जून ने नहीं खींचें थे, बनवाने हैं. उसने आखिर एक साड़ी में फाल लगाने का कार्य भी खत्म कर लिया है, यह सोचकर कि अपने हाथ से जो काम कर सकें उसे दूसरों पर नहीं डालना चाहिए. पिछले दिनों वापस आकर एक बार छोटे भाई से बात हुई थी, काफी अरसे से बीमार चल रहे छोटे फूफा जी का देहांत हो गया है, बुआ से मिले कई वर्ष हो गये हैं, इतना बड़ा आघात वह कैसे सह पाएंगी, ईश्वर ही उनकी सहायता करेगा. आज भी एक मृत्यु का समाचार मिला है, एक डॉक्टर जिनको ब्रेन कैंसर था, जिनसे पिछले वर्ष इसी महीने फोन पर बात हुई थी, जो अपनी नैनी के लिए चिंतित थे, उनकी कल स्थानीय अस्पताल में मृत्यु हो गयी. उनकी तकलीफों का अंत इसी में था. वे खुशनसीब हैं कि उन्हें ऐसी कोई तकलीफ नहीं है जिससे मुक्ति मृत्यु में ही नसीब होती हो.

फिर कुछ दिन का अन्तराल, रोज शाम को उसे कोरस के रिहर्सल के लिए जाना होता था, कल उनकी मीटिंग हो गयी, लेडीज क्लब की मासिक सभा जो इस बार उनके एरिया की तरफ से थी, पहली बार उसने कुछ कविताएँ पढ़ीं, कइयों ने तारीफ की, अच्छा लगा अपने पाठकों को स्वयं सुनाने का मौका मिला, पर उसे ज्यादा वक्त देना चाहिए, कल ढूँढने बैठी तो कोई अच्छी कविता मिल ही नहीं रही थी. परसों दो मित्रों के यहाँ जाना था, एक के यहाँ नॉनवेज खाने की गंध आ रही थी, दूसरे के यहाँ शेष मेहमान इतनी देर से आये कि तब तक भूख लग कर समाप्त ही हो गयी थी, बचपन में सुनी दादी के एक बात याद आई, घर से खाकर जाओ तभी बाहर मिलता है.