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Friday, March 8, 2019

बनारसी साड़ियाँ




ग्यारह बजने को हैं. आज सुबह छह बजे वे उठे. स्वास्थ्य ठीक लग रहा था. कल दोपहर बाद से तबियत कुछ नासाज थी. सम्भवतः चुनार घूमते समय लू लग गयी थी. शाम को बाजार जाना था. विवाह के लिए तीन बनारसी साड़ियाँ व एक सूट खरीदा. दूकानदार ननद की सहेली की जान-पहचान का था और बनारसी साड़ियों का थोक विक्रेता था, बहुत धैर्य के साथ उसने वस्त्र दिखाये. वापसी में वे विश्वनाथ गली गये. कंगन, हार, चूड़ियाँ आदि कुछ सामान खरीदा. भीड़ भरी सड़कों से गुजरना यहाँ एक बड़े साहस का काम है. धूल, धुआं, भीड़ आदि की इंतिहा होती है. घर से वे कुछ दूरी पर ही थे कि उसकी तबियत बिगड़ने लगी. घर पहुंचने तक ठंड लगने लगी थी. चार-पांच कम्बल ओढ़ने के बावजूद भी ठंड लग रही थी. काफी देर बाद ठंड कम हुई और नींद आ गयी. सुबह उठी तो सब कुछ ठीक लग रहा था. शाम को जून के एक मित्र के यहाँ निमन्त्रण है.

संध्या के पांच बजे हैं. आज उन्हें वापस जाना है, यानि कुल पांच घंटे यहाँ और शेष हैं. दोपहर को भोजन के बाद विश्राम के लिए भीतर के कमरे में जा ही रहे थे कि एक बहुत पुराने परिचित वृद्ध मिलने आ गये, जिनकी बातें करने की आदत है. जून पहले उनसे मिलने गये थे पर जितनी देर बैठे रहे, वह पहुंच ही नहीं पाए. इसी बात पर अपने एक डाक्टर मित्र की समय की पाबन्दी के कितने किस्से उन्होंने सुना दिए. मकान की खरीद-फरोख्त का काम करते हैं, कई दुकानें आदि भी हैं, जहाँ भारतीय व विदेशी पर्यटक आते हैं. उनके तीन सुपुत्र हैं, अपने एक पोते के विवाह के चक्कर में जेल भी हो आये हैं. दहेज उत्पीड़न के केस में उनकी पतोहू व उसके पिता ने परिवार के पांच लोगों को बीस दिन तक जेल की हवा खिलवा दी थी. उनकी बातें किसी कहानी के पात्र के मुख से निकली हुई लग रही थीं. मौसम यहाँ गर्म है, तापमान इकतालीस डिग्री होगा. अज फेसबुक पर आश्रम के फोटो प्रकाशित किये, जो सक्तेश गढ़ में स्थित है, और तहसील चुनार व जिला मिर्जापुर में आता है.

पूरे ग्यारह दिनों के बाद डायरी उठायी है. कितना कुछ घटा पिछले दिनों. तेरह की रात वे ट्रेन में बैठे, पन्द्रह की सुबह घर पहुँचे. सोलह को इतवार था, बच्चों को योग भी सिखाया. अगले दिन जून को दिल्ली जाना था. वह बुध को लौटे, तब तक भी उसका स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था. अगले दिन वे अस्पताल ले गये, दवा शरू हुई. इस इतवार तक स्वास्थ्य पुनः प्राप्त हुआ. कल सोमवार को  जून के एक सहकर्मी ने अपने घर बुलाया था. उन्होंने योग का एक नया सीडी दिया है, आज उसमें से देखकर कुछ आसन किये. कल पहली बार ॐ ध्यान’ कराया, आज ‘राम ध्यान’ करना है, अवश्य ही साधिकाओं को अच्छा लगेगा. बंगाली सखी ने व्हाट्सएप पर प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया. वे आज वे लोग वापस आ रहे हैं. लोग वफा उतनी शिद्धत से नहीं निभाते जितनी शिद्धत से बेवफाई निभाते हैं. शनिवार को एक नयी यात्रा पर निकलना है. नन्हे ने अगले इतवार के लिए वह होटल बुक कर दिया है, जहाँ पर वे विवाह समारोह करने वाले हैं. कल स्कूल से लौटते समय क्लब की एक सदस्या के यहाँ गयी, जिसका विदाई समारोह होने वाला है. उसके लिए एक कविता लिखनी है.

Thursday, July 10, 2014

चेन्नई की साड़ी


आज ‘जागरण’ में निस्वार्थ सेवा के महत्व के बारे में सुना. उसके सम्मुख भी सेवा एक सुयोग आने वाला है. यह उसकी परीक्षा का समय भी होगा. उस अखंड स्रोत से मन जुड़ा रहे, किसी भी परिस्थिति में झुंझलाहट के चिह्न चेहरे पर न आयें, यही होगी परीक्षा ! कल मीटिंग में वह कविताएँ नहीं पढ़ पायी तो यह बात निराशा का कारण नहीं होनी चाहिए. किन्तु इस क्षण जो उसके हृदय में अकुलाहट हो रही है, इसका कारण क्या है. अन्यों को जज करने की प्रवृत्ति, शासन करने की प्रवृत्ति भी ताप का कारण बनती है. अज्ञान भी ताप को जन्म देता है. देह और मन के साथ सुखी-दुखी होना अज्ञान ही तो है. देह की व्याधि या मन का सुख-दुःख उस शुद्ध स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकते. यदि इसका ज्ञान है तो छोटी-छोटी बातों से स्वयं को तनाव ग्रस्त होने से रोक सकते हैं. कल छोटी बहन का पत्र आया, वह खुश है लेकिन पति की परेशानी को लेकर चिंतित भी. वे लोग मई में उसके पास जायेंगे.

उसने याद किया, ध्यान के लिए कई बातें जरूरी हैं. सबसे पहले तो आध्यात्मिक ज्ञान की पिपासा, फिर सांसारिक बातों से उदासीनता, लक्ष्य का निर्धारण, स्वाध्याय और नियमितता. नियत समय पर नियत विधि से ध्यान किया जाये तो ही परिणाम मिलेगा, लेकिन परिणाम की आकांक्षा न रखते हुए ध्यान करना है. आज सुबह गाइडेड मैडिटेशन में भी वह मन को एकाग्र नहीं रख सकी. सम्भवतः उसकी श्रद्धा दृढ नहीं है, अभी रास्ता बहुत लम्बा है, जिस मार्ग पर बुद्ध, नानक, कबीर, महावीर चले थे इसी रास्ते पर चलना होगा, जाहिर है रास्ता बहुत कठिन है लेकिन असम्भव नहीं. मन को संयत करना अभ्यास और वैराग्य से सम्भव है, ऐसा कृष्ण ने कहा है, कृष्ण ही उसकी सहायता करेंगे. अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए सांसारिक लोभ व आकर्षणों से मुक्त रहने का प्रयास करना होगा. मध्यम मार्ग अपनाते हुए मानसिक विकारों (क्रोध, लोभ, मोह तथा इच्छाएं ) एक-एक कर दूर करते जाना है. मन जितना मुक्त होगा ध्यान उतना ही सम्भव होगा. किसी प्रकार की कोई अपेक्षा न रहे, सचेत रहना है. ईश्वर का ध्यान-भजन करते करते ध्यान स्वयंमेव सिद्ध होने लगेगा.

टीवी पर जागरण आ रहा है, जिसमें मातृ देवो भव ...आदि प्राचीन परंपरा का महत्व बता रहे हैं. आजकल सब अपने कार्यों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वृद्ध माता-पिता को भूल जाते है, जिनके कारण वे इस दुनिया में हैं. कल से उसका मन फिर नीचे के स्तरों में चला गया है. कल सुबह से शाम की मीटिंग की बात ध्यान में थी. स्वास्थ्य भी पूर्ण नहीं है, पन्द्रह आने है, शायद यही दो कारण रहे हों. आज सुबह भी मन ध्यान में भटका पर सचेत थी सो वापस लायी. लेकिन बिना किसी व्यवधान के ध्यान कब सधेगा कहना मुश्किल है. मन दुनियावी प्रपंचों में कब खो जाता है पता ही नहीं चलता. सतत् प्रयत्न जारी रखना है मंजिल एक न एक दिन अवश्य मिलेगी. नन्हे की पढ़ाई पूरे जोरों पर है. उसे गणित पढ़ाते वक्त अच्छा लगता है, वह बहुत जल्दी सीख भी जाता है. जून आजकल ठीक हैं, कल उसे लेने आये तो खुश थे, वरना पहले तो हमेशा उदास हो जाते थे. कल उसने चेन्नई से खरीदी नई साड़ी पहली बार पहनी. सोमवार को मेहमान आ रहे हैं, घर की सफाई हो गयी है, सामान भी सब मंगा लिया है. उस समय सारा प्रयास यही रहना चाहिए कि एक क्षण के लिए भी मन उद्व्गिन न हो, ऐसा नहीं कि जबरदस्ती की जाये सहज, स्वाभाविक स्थिति में यदि मन रहे तो स्वतः शांत रहेगा. आतुरता तो वह ऊपर से ओढ़ लेती है. उसे लगा यदि वे भारतीय जीवन शैली अपनायें, संयम, सहन शीलता, सदाचार और प्रेम से ओत-प्रोत हो तो जीवन सहज रह सकता है.


Friday, April 11, 2014

अंकल चिप्स कहाँ हैं


कल नन्हा स्कूल से आया तो प्रसन्न था. वे बहुत दिनों बाद शाम को घर से निकले. एक मित्र के यहाँ भी जाना था, उनके बेटे की जीभ घर में खेलते वक्त गिर जाने से कट गयी थी. रात की तेज वर्षा के कारण मौसम आज ठंडा है, उसने खिड़की से देखा, माली सिल्विया और गुलदाउदी के पौधों के लिए क्यारी बना रहा है. कल्पना में उसने खिलते हुए फूलों को देखा और एक मुस्कान अंतर को भर गयी. कल दोपहर उसकी पड़ोसिन आई थी, आज सम्भवतः फिर आयेगी, उसका मिठाई तोड़ना, गिलास में हाथ डालकर धोना, बिना बात ही हँसना और...उसकी ग्रामीण बैक ग्राउंड का परिचायक लगा, खैर...अपना-अपना स्वभाव है. कल रात जून ने अपनी बचत का रिकार्ड उससे डायरी में लिखवाया, उसके पूर्व शाम को बाहर जाते समय साड़ी पहनने पर (एक पुरानी सिंथेटिक साड़ी) जून और नन्हे ने उसे जब टोका तो उसने व्यक्ति की आजादी पर छोटा सा भाषण सुना दिया फिर रात को जब नन्हे को जून ने अपने कमरे में जाने को कहा तो वह चुप हो गया और सोने जाने तक कोई बात नहीं की, नूना को अच्छा नहीं लगा और फिर बाल मनोविज्ञान पर कुछ बातें उसने जून को बतायीं, वह चुपचाप सुनते रहे, नन्हे का उदास हो जाना उन्हें भी खलता है सुबह उसके स्कूल जाने तक वह बहुत प्यार से उससे बातें करते रहे, प्यार करना ज्यादा आसन है बजाय गुस्सा करने के क्योंकि गुस्सा करने वाला खुद ज्यादा परेशान होता है.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिख सकी, शनि की सुबह कपड़ों की सिलाई (पुराने कपड़ों की) में व्यस्त रही, इतवार का दिन तो कई और कामों में कैसे गुजर जाता है पता ही नहीं चलता. कल रात बेहद गर्मी थी, उसके सर में हल्का दर्द हुआ अभी भी हल्का-हल्का सा भारी है सर. ptv की एंकर ने अपना ख्याल रखने व मुस्कुराते रहने की हिदायत के साथ अपना कार्यक्रम समाप्त किया है. वहाँ शरीयत का कानून लागू होने से ptv के कार्यक्रमों पर अभी तक तो कोई असर नहीं पड़ा है. उसने शाम को मीटिंग में साथ जाने के लिए पड़ोसिन से बात की, मोज़े बन गये हैं यह भी उस सखी को बताया. कल वे बाजार गये, नैनी के लिए साड़ी खरीदी वायलेट रंग की फिर कादम्बिनी ली, प्रवेश में अपनी कुछ कविताएँ भेजना चाहती है.

Today is first day of Sept ! Jun went to Moran this morning to come back at 6 in the evening. She is feeling a sense of freedom to do any thing at any time till Nanha comes from school. There are so many things to do- music, letter writing, TV, stitching,  exercise and cooking, also she can do some new things like painting if time permits. she  learned two beautiful lessons from the two books which she reads these days after bath. One is – Don’t expect gratitude, it is rare like rose and ingratitude is like weed, it is everywhere. Second is – Do whatever you like with whole heart otherwise not do it. Yesterday’s meeting was successful . Dance drama cultivated by DR Sharma  was very good and she liked the tea also. Today she talked to ma-papa, they are going to sister’s place this month. She will be meeting them in year end.


आज सुबह अलार्म बजते ही जून रोज की तरह फौरन उठ गये और बहुत पहले जैसे वह करते थे फिर पांच मिनट लेटे रहकर उठे. वह खुद भी उठकर बिस्तर के पैताने पर बैठ गयी यूँ ही, रात को देखे सपनों का जायजा लेने, फिर उठी तो ब्रश करने के बजाय बाथरूम में ही दिमाग में आई इधर-उधर की बातों को सोचती रही. सुबह सोकर उठो तो दिमाग एकदम खाली होना चाहिए, साफ-स्वच्छ, पर नहीं, बीती रात की कोई बात पता नहीं क्यों किसी छेद से घुसकर कुरेदती रहेगी फिर एक बार जो ब्रश किया तो सुबह के कामों में व्यस्त हो गयी, बस सुबह के वे ५-७ मिनट यूँ ही गंवा दिए. कल से इस बात का ध्यान रखेगी, फिर जून ने जब कहा कि कल वह ऑफिस की चाबी ले जाना भूल गये तो बजाय उस बात को सुन लेने के उन्हें नसीहत देने लगी जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी, नन्हे के स्कूल चले जाने के बाद जून जब तक कार की प्रतीक्षा कर रहे थे वह वहीं बैठी रही अपना कर्त्तव्य समझकर, तभी उसमें स्नेह नहीं था, सो उन्हें कह भी दिया कि उसका काम छूट रहा है. togetherness की फीलिंग नहीं थी जिसमें मात्र साथ रहना ही भला लगता है, ड्यूटी समझ के कोई किसी का ख्याल रखे तो उसे विवशता ही कहा जायेगा न, सो अभी सुबह के मात्र पौने नौ ही हुए हैं और दिल है कि इतनी सारी खताएं कर चुका है या वह करवा चुकी है. आज शाम को एक सखी आ रही है उसकी माँ भी, जो उसी की तरह दुबली-पतली ही होंगी गोरी और नाजुक या...? नन्हा आजकल स्वस्थ व खुश है इतवार की शाम वह फिर रूठ गया था क्योंकि अंकल चिप्स नहीं लाकर दिए थे ! 

Wednesday, February 5, 2014

बाल दिवस पर मस्ती


आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बहुत दिनों से न लिखने के कारण अभ्यास छूट गया सा लगता है. इस दौरान वे घर जाकर वापस आ भी गये. उसने वापसी में गोहाटी से असम सिल्क की एक साड़ी ली. एक दिन वह तिनसुकिया गयी, बालदिवस पर बच्चों को देने के लिए लेडीज क्लब की तरफ से ढेर सारे गिफ्ट्स खरीदे, जिन्हें कल एक सखी के साथ मिलकर पैक किया. सेक्रेटरी के कहने पर आज सुबह छह सदस्याओं को फोन किये, तेरह को मीटिंग है. जिन्दगी लहरों पर शांत भाव से बहती नाव की तरह आगे बढ़ी जा रही है. आज सवा नौ बजे के लगभग भूकम्प के दो झटके महसूस हुए. पिछले तीन दिनों से मौसम काफी ठंडा हो गया है, वर्षा भी हो रही है, चारों तरफ हरियाली और ठंडक है, ऐसा मौसम उसे भाता है. सुबह वक्त पर उठे वे, नन्हा आज पहली बार यात्रा के दौरान खरीदा ब्लेजर पहन कर स्कूल गया है.

आज ‘बाल दिवस’ है, चाचा नेहरु का जन्मदिन, आज ही ‘गुरुनानक जयंती’ भी है और नूना के पिता का जन्मदिन भी, दादी को अंग्रेजी महीनों का ज्ञान नहीं था उन्हें इतना याद था कि टुबड़ी के दिन पुत्र जन्म हुआ था. पड़ोस के बच्चे का जन्मदिन भी आज है और उड़िया सखी के बेटे का जन्मदिन भी. और इस वर्ष आज ही ‘गुड फ्राइडे’ भी है. कल उनकी मीटिंग अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी, ‘रेकी’ पर एक भाषण दिया गया, किन्ही श्री और श्रीमती दास के गजल व भजन ने तो समां ही बाँध दिया. वह सात बजे वापस आ गयी, भोजन बनाया, जून ने सूप बनाकर रखा था, आज उन्होंने फलाहार लेने का व्रत लिया है शाम तक, रात जन्मदिन की पार्टी में जाना है. जून एक पेपर लिख रहे हैं उसी सिलसिले में दफ्तर गये हैं, नन्हा ‘बाल दिवस’ पर दिखाई जाने वाली फिल्म का इंतजार कर रहा है और उसने आज सुबह ‘परमहंस योगानन्द जी’ की पुस्तक पढ़कर पुनः ध्यान किया, मन स्थिर हो पाया मगर कुछ देर के लिए ही. मानव मन को न ही भौतिक सुखों में शांति मिलती है, न ही वह पूरी तरह अध्यात्मिक क्षेत्र में समर्पित हो जाता है, वह त्रिशंकु की तरह बीच में ही रहने को विवश है. लेकिन जो पूर्ण विश्वासी होते हैं उनके साथ ऐसा नहीं होता होगा. उसका शंकालु मन एक ओर टिकता ही नहीं. पिछले कई दिनों की स्वयं के आगे अनुपस्थिति इसी का परिणाम थी.

आज कई हफ्तों बाद संगीत कक्षा में जाना है. सोमवार है हफ्ते का प्रारम्भ. मौसम ठंडा है पर धूप भी पुरजोर है, सो ठंडक भली लग रही है. कल बच्चों के खेल आदि भी हो गये, सुबह जल्दी जाने वालों में वह प्रथम थी, शेष सभी धीरे-धीरे आराम से आ रहे थे. कार्यक्रम ठीक ही रहा जैसे इस तरह के कार्यक्रम होते हैं, कुछ शिकायतें, कुछ गिले. छोटे-छोटे बच्चों ने उत्साह से दौड़ में भाग लिया, उन्हें देखकर विशेषतया एक बच्चे को, जिसका नाम पंछी था, देखकर अच्छा लगा. उसे घर आने में दोपहर के दो बज गये, थकान भी हो गयी थी. भोजन बनाने के साथ ही जून ने सारे कार्य अकेले ही किये जो वे इतवार को मिलजुल कर करते हैं, शाम को वे बाजार होते हुए एक मित्र के यहाँ से गये, जिनके पिता इन दिनों आए हुए हैं, अंकल से मिलकर कई बातों का ज्ञान हुआ. वह अपने पुराने दिनों को बहुत मुग्धता से याद करते हैं, क्या सभी ऐसा करते हैं? युवा भविष्य की ओर देखते हैं और वृद्ध अतीत की ओर. उसने सोचा, अभी व्यायाम करना है, संगीत अभ्यास भी, आधा घंटा टीवी पर सैलाब देखना है, सो लिखना यहीं बंद करेगी, वैसे भी अभ्यास न रहने के कारण लिखने का मूड नहीं बन पा रहा है, किसी दिन देवी सरस्वती की कृपा होगी तो स्वयंमेव ही लेखनी से धरा फूटेगी, वह दिन जल्द ही आये ! आमीन !



Thursday, December 12, 2013

साबरमती आश्रम-बापू की यादें



आज वे साबरमती आश्रम देखने गये, बापू की आवाज भी सुनी और अहमदाबाद में उनके जीवन की घटनाओं पर आधारित एक चित्र प्रदर्शनी भी देखी. बापू के तीन बन्दर दरवाजे पर ही स्वागत करते दिखाई दिए. उनका कमरा, खडाऊं, छड़ी, चश्मा व अन्य सामान भी रखे हुए हैं पर राष्ट्रपिता का स्मारक जैसा होना चाहिए वैसी हालत में नहीं रखा है. इससे पूर्व वे एक अन्य आश्रम में भी गये, वहाँ विशाल मंडप में कुछ लोग ध्यान कर रहे थे, प्रवचन एक बजे शुरू होना था. बाद में वे G-C. रोड गये. विशाल शो रूम और बड़ी बड़ी दुकानें थीं. यहाँ ट्रैफिक बहुत है, आँखों में प्रदूषण से जलन होने लगी थी. यहाँ मिलें भी बहुत हैं, स्थान-स्थान पर चिमनियाँ नजर आ रही थीं. नन्हे के लिए एक जींस खरीदी और वे वापस आ गये.

आज इतवार है, घर पर पाव भाजी का नाश्ता बना है, सभी ने स्नान कर लिया है, गर्मी यहाँ बहुत है, अभी उन्हें तीन दिन और यहाँ रहना है, शाम को छत पर टहलने जाते हैं तो चारों ओर रोशनियों की लम्बी कतारें दिखाई देती हैं. पास ही हवाई अड्डे से उड़ान भरते व उतरते हवाई जहाजों की रोशनियाँ भी उनमें शामिल होती हैं.

आज उसने एक गुजराती साड़ी ली, शाम को वे इण्डिया कालोनी के बाजार में उनकी नैनी के लिए साड़ी लेने गये थे, वहाँ एक पारंपरिक चित्रों से सजी सुंदर सूती साड़ी बहुत अच्छी लगी, जून ने तुरंत हामी भर दी, सामान ज्यादा होते जाने की शिकायत भी नहीं की, साड़ी का प्रिंट वाकई बहुत सुंदर है. राजस्थान के बाद गुजरात की साड़ी और उससे पहले उसने लखनऊ से एक साड़ी मंगवाई थी, इस बार गर्मियों के स्वागत के लिए वह तैयार है. कल शाम को जून बच्चों को पास में घुमाने भी ले गये रेत में स्कूटर फंस गया और बच्चे रेत में गिर गये, बड़ी बिटिया को घटना का विवरण देते हुए बड़ा मजा आ रहा था. बाद में छत पर जाकर पुच्छल तारा देखा, और भोजन के बाद बाहर टहलने गये, सडक पर रोशनियाँ ही रोशनियाँ थीं, मगर उनके पीछे छिपा है प्रदूषण का कड़वा सच. कल उन्हें अक्षर धाम जाना है, जो यहाँ से २० किमी की दूरी पर है. दिन भर इधर-उधर की बातों के बीच ब्रह्मकुमारी आश्रम से लायी वह किताब पना अच्छा लगता है, सरल शब्दों में मन में उठने वाले प्रश्नों का समाधान इस पुस्तक में मिल जाता है. जिन्दगी का सार मूल्यों का निर्वाह करने में है न कि नकली चकाचौन्ध के पीछे भागने में.

जून आधे घंटे में उन्हें कार से अक्षर धाम ले गये. मन्दिर एक विशाल प्रांगण में स्थित है वहाँ चारों ओर सुंदर बाग़-बगीचे, बच्चों के झूले आदि हैं. मन्दिर में श्री स्वामी नरायन जी भगवान की, जो गुजरात के एक सन्त थे, अनेक मूर्तियाँ हैं. मुख्य मूर्ति स्वर्ण के समान चमक रही थी. एक प्रदर्शनी भी थी. वहाँ से वे एक पार्क में गये, लौट कर भोजन किया. शाम को वह पास ही सब्जी लेने गयी, देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ सभी महिलाएं ही सब्जी खरीद रही थीं, गुजरात में महिलाओं की स्थिति बहुत सशक्त है. कल उन्हें दिल्ली की ट्रेन पकडनी है.

आज बहुत दिनों बाद कुछ लिख रही है. पिछले हफ्ते वे अहमदाबाद में थे, उसके बाद दिल्ली की वापसी यात्रा, फिर देहरादून, घर, वापस गोहाटी, पहली बार उन्होंने इतनी सारी जगहें एक साथ देखीं. कल सुबह ही वे घर लौटे हैं, पड़ोसिन ने नाश्ते पर बुलाया, और एक सखी ने दोपहर को खाने पर, दूसरी सखी ने रात्रि के भोजन पर आमंत्रित किया तो इस बार साथ आयी भांजी को भी सुखद आश्चर्य हुआ. अच्छा ल्ग्यता है यह सोचकर कि वे अकेले नहीं हैं. इस वक्त दोपहर के तीन बजे हैं, बच्चे टीवी देख रहे हैं. उसने सोचा, भांजी को यहाँ उदासी तो महसूस नहीं हो रही है, पहली बार घर से दूर रहने पर भी वह सामान्य है, एक तरह से अच्छा ही है, सबसे जुड़े रहकर भी सबसे अलग, विरक्त ! घर में सफाई का बहुत काम शेष है, जो धीरे-धीरे ही पूरा होगा. आज सुबह अपनी पुरानी दिनचर्या पर लौटने का प्रयास किया, हफ्तों बाद आसन ठीक से नहीं कर पायी. यात्रा की थोड़ी सी थकान शायद अभी तक शेष है.