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Thursday, April 21, 2022

ध्रुव के प्रश्न


आज दोपहर पूरे दो महीने और तीन दिनों के बाद नन्हा और सोनू घर आए, अभी कुछ देर पहले  वापस गए हैं। शाम को वे उन्हें पार्क में ले गये पर वर्षा होने लगी, जल्दी ही लौटना पड़ा। नन्हे  ने एक बात कही कि उन्हें किसी के साथ घटी किसी भी घटना के लिए किसी के प्रति निर्णायक नहीं बनना चाहिए। उसे लगा, बच्चे उनसे कितने आगे होते हैं बौद्धिक रूप से, कार्य-कारण सिद्धांत के ऊपर उन्हें जाना है, चीजें अपने आप होती हैं, जब होनी होती हैं, हर घटना के पीछे क्यों ?ढूँढने जाने की ज़रूरत नहीं है। जीवन में जो भी घटता है उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है, पर कौन सा कारण किस घटना कि पीछे है, कौन बता सकता है ? वैसे भी उन्हें व्यक्तियों के बारे में कोई राय बनाने का क्या अधिकार है, जो जैसा है वैसा है ! आर्ट  ऑफ़ लिविंग का पहला ज्ञान सूत्र भी तो यही है, ‘लोगों को जैसे वे हैं वैसे ही स्वीकारें’ उन्हें किसी व्यक्ति के बारे में कुछ भी कहने से पूर्व दस बार सोचना चाहिए। किसी की निंदा करना तो ग़लत है ही किसी के निर्णायक बनना और भी ग़लत है। अनजाने में ही वे अपने संस्कार वश ऐसा करते हैं और अपनी ऊर्जा भी गँवाते हैं। बाहर तेज हवा के साथ वर्षा हो रही है, बच्चे अब तक घर पहुँच गए होंगे। 


एक विशिष्ट महिला ब्लॉगर ने अपने स्पष्ट और सरल शब्दों में कोरोना वायरस के ख़तरे को लेकर भारतवासियों द्वारा लापरवाही भरा रवैया अपनाने पर एक ध्वनि संदेश में खेद व्यक्त किया है। उनकी वाणी में शिकायत भी है और सलाह भी, ख़तरा बढ़ गया है पर लोग बड़े आराम से सड़कों पर निकल रहे हैं जैसे लॉक डाउन हटते ही सब सामान्य हो गया  हो। आज सुबह बाहर वर्षा का भ्रम  हुआ पर आवाज़ बिजली की तारों से आ रही थी। हवा ठंडी थी, कहीं कहीं सड़कें भीगी थीं। सूर्योदय या सूर्यास्त आज दोनों नहीं दिखे, भ्रमण के दोनों समय उन्हें देखना व चित्र लेना उसका प्रिय काम होता है। आज चक्रों के बार में व्याख्यान सुना। विशुद्धि चक्र से ऊपर अद्वैत की यात्रा आरम्भ हो जाती है। आज्ञा चक्र पर असीम स्वरूप का अनुभव होता है पर अंतिम चक्र पर जब ‘स्वयं’ भी मिट जाता है तब परमात्मा की प्राप्ति होती है। अहंकार मिट गया पर अस्मिता अभी शेष है, उसे भी जाना होगा। समाचारों में सुना उड़ीसा में एक तूफ़ान आने वाला है। 


रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं। सोने से पूर्व का अंतिम कार्य है दिन भर का लेखा-जोखा लिखना, बरसों पुरानी आदत है सो डायरी और कलम जैसे अपने आप ही हाथ में आ जाते हैं। कर्नाटक में लॉक डाउन हटा लिया गया है पर शाम सात बजे से सुबह सात बजे तक आवागमन रुका रहेगा। एक ही दिन में आज डेढ़ सौ संक्रमित व्यक्ति मिले हैं। आज विष्णु पुराण में दिखाया गया कि ध्रुव को भगवान के दर्शन हो गए। छह वर्ष की आयु में इतना बड़ा संकल्प ! वह विष्णु भगवान से पूछता है, जीवन क्या है ? संसार क्या है ? परिवार क्या है ? आदि आदि। भगवान कहते हैं, जीवन एक वरदान है, एक उपहार, एक सौभाग्य भी ! संसार परमात्मा का साकार रूप है ! परिवार में वे लोग आते हैं जिनके प्रति हमारा मन आत्मीयता महसूस करे।  इस तरह तो सारा संसार  ही  उनका परिवार है।कम से कम एक भक्त के लिए तो ऐसा ही होना चाहिए।  जून को एओएल से नया काम मिला है, कल उनकी मीटिंग है।    


Wednesday, October 19, 2016

बीहू में हूसरी

आज जून अहमदाबाद जा रहे हैं. उसे सफाई के शेष कार्य पूरे करने हैं. आज सुना, काठवाडी़ गाँव में एक अद्भुत दुकान है, बिना दुकानदार की दुकान, ग्राहक अपने आप ही सामान लेते हैं तथा पैसे रखकर चले जाते हैं. सुबह जून से उसकी किसी बात पर बहस हो गयी, बाद में उसने सोचा तो लगा की अति उत्साह में आकर वह भला करने के बजे उल्टा ही काम कर बैठी. उसे अपनी वाणी के दोषों पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है. उसे लगता है जिस प्रकार वह स्वयं को शुद्ध, बुद्ध आत्मा मानती हैं, उसी प्रकार सभी पूर्ण शुद्ध तथा ज्ञानस्वरूप हैं, यह भी अकाट्य सत्य है तो जो भी विकार उसमें दीख रहे हैं, वे ऊपर-ऊपर ही हैं. जैसे गंगा जल की धारा में कभी कोई कचरा बहता चला जाये तो कभी फूल या दीपक..धरा तो शुद्ध ही रहती है. इस तरह तो किसी के दोष देखने ही नहीं चाहिए, आत्मा को ही देखना चाहिए, जैसे वह स्वयं को देखता है ! दूसरी बात कि यदि कोई स्वयं पूर्ण हो तभी उसे दूसरों को कुछ कहने का हक है. वह केवल गुरू ही हो सकता है. उसे अपने अंदर लाखों कमियां दीख पड़ती हैं तो फिर उसे कोई अधिकार ही नहीं है. उसने प्रार्थना की, कि जून अपने हृदय को उसके प्रति स्वच्छ करके सदा की तरह क्षमा कर दें. जैसे आज तक अनगिनत बार बिना कहे ही उसकी सभी गलतियों को माफ़ किया है. उसकी यात्रा शुभ हो.  


यदि कोई कार्य सेवा भाव से किया जाये तो ईश्वरीय सहायता अपने आप मिलने लगती है. जब लेडीज क्लब द्वारा मृणाल ज्योति जाने के लिए गाड़ी नहीं मिल पायी तो एक एक सखी ने भेज दी. बच्चे खुश हुए और वह क्लब की ओर से डोनेशन चेक भी दे पायी. बीहू के दिन घर में ‘हूसरी’ करने की बात भी कह पायी. कल कुछ अन्य लोगों से भी कहेगी. आज भी वर्षा हो रही है. हिन्दयुग्म पर उसकी कविता आई है. वर्षों पहले लिखी यह कविता उसके भीतर के बीज का प्रतीक है, जो अंततः सर्वोच्च मुक्ति के रूप में प्रकट होने को है. एक धार्मिक या कहे अध्यात्मिक व्यक्ति ही परिवर्तन कर सकता है. वह कोई आवरण नहीं चाहता, वह अंतिम सत्य को चाहता है, उससे कम कुछ नहीं. चाहना ही है तो उसे चाहो जो वास्तव में चाहने योग्य हो और मांगना भी हो तो उससे मांगो जो ख़ुशी से दे दे. तन पर लगे पहरों से ज्यादा कठिन है मन पर लगे पहरों को खोलना..और सच्ची क्रांति भी तभी घटती है जब मन के पहरे तोड़ दिए जाएँ और भीतर से एक ऐसी ज्वाला को प्रकट किया जाये जिसे दुनिया का कोई जल बुझा ही नहीं सकता..क्रांति फलित हुई है उसके भीतर ! भीतर जाने के उपाय और साधन बहुत हैं, समय भी है. भगवद् गीता पर लिखना शुरू किया है कल, आज उसे आगे बढ़ाना है ! जून से बात हुई आज वह दूसरी फील्ड में जायेंगे. 

Tuesday, October 20, 2015

इन्द्रधनुष के रंग


मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वैसा ही आकार ग्रहण कर लेता है, मन वही सोचता है वही करता है जो इसे कहा गया है. जैसे संस्कार मन को दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र भी कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक मन में आनंद की कोंपले नहीं खिलीं तब तक यह कृतज्ञता के गीत नहीं गता और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा मिलने से आनंद स्थायी होता है. इस समय उसका मन अद्भुत शांति का अनुभव कर रहा है, निस्तब्ध, निस्पंदन ! पिछले दिनों उन्होंने एडवांस कोर्स किया उसके दौरान भी शायद इतनी शांति महसूस नहीं की थी. इस शांति के सापेक्ष जून के व्यवहार की हल्की सी नकारात्मकता भी कैसी चुभती है. उन्हें अपना व्यवहार सामान्य लगता है पर जिसने एक बार प्रेम का अमृत चख लिया हो वह क्यों तीखा पसंद करेगा पर उतना ही सही यह भी है जिसने अमृत चखा ही नहीं वह तो बस तीखा ही स्वाद जानता है. उनका क्या दोष, उनकी दृष्टि में वही एकमात्र स्वाद है. कल उन्होंने उपहार दिए, जो दे दिया बस वही तो अपना है, जो उनके पास है वह तो छिन जायेगा मृत्यु की उस घड़ी में !

कल सुबह जब पाठ करने बैठी तो बायं आँख के नीचे इन्द्रधनुष दिखाई दिया, कितना सुंदर और कितना विस्मयकारी ! आज सुबह उठी तो सदा की तरह मन में विचार चल रहे थे पर जैसे ही जाग्रत अवस्था हुई जैसा सारा शोर शांत हो गया. ऐसा लगा जैसे कोई भीड़ भरे कमरे से एकाएक एकांत में आ गया हो, पूर्ण शांति में, कैसा अद्भुत था वह पूर्ण मौन, उसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है. साधना करते समय जून को थोडा सा रोष हुआ पर उसे जरा भी नहीं और अब तो वह पिछले जन्म की बात लगती है. सुबह ध्यान किया, इस समय संगीत सुन रही है सद्गुरु ने खुद से जुड़े रहने के कितने सारे तरीके बताये हैं. जो अपने से जितना दूर होता है वह उतना ही शीघ्र दुखी हो जाता है. साधना में अब ज्यादा रस आने लगा है, इसलिए ही गुरूजी हर छह महीने पर कोर्स करने को कहते हैं.

कोई उनके कार्यों की प्रशंसा करे अथवा निंदा करे या उपेक्षा करे, उन्हें हर हाल में निर्लेप रहना है. अज्ञान के कारण ही लोग दुर्व्यवहार करते हैं उनके भीतर भी परमात्मा उतना ही है. परमात्मा ने इस जगत को मात्र संकल्प से रचा है, जैसे कोई स्वप्न में रचता है. स्वप्न में यदि कोई हानि हो तो क्या उसका दोष देखा जाता है ? यह जगत तो एक नाटक है, लीला है, खेल है, इसमें इतना गंभीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है, यहाँ वे बार-बार सीखते हैं, बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में लोग और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस कर लेते हैं ! कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र और वे यहाँ क्या कर रहे हैं ? उन्हें यहाँ भेजा क्यों गया है ताकि वे इस सुंदर जगत का आनंद ले सकें और उस आनंद को जो भीतर है बाहर लुटाएं. जो अभी उस आनंद को नहीं पा सके हैं उन्हें भी उसकी ओर ले जाएँ !

नये वर्ष का दूसरा महीना आरम्भ हो चुका है, मौसम में बदलाव भी नजर आने लगा है. पहले की तरह ठंड अब नहीं रह गयी है. सुबह नींद साढ़े चार पर खुली, सुबह के सभी कार्य सुचारू रूप से हुए. आज भी गुरूजी को सुना, “ध्यान अति उत्तम प्रार्थना है. भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह जो आते हैं और चले जाते हैं. सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं उनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं, भय का विचार कैसे जड़ कर देता है जबकि वह है एक कल्पना ही तो ! वे खाली हैं उनका शरीर तथा मन दोनों खाली हैं, ठोस तो उसमें केवल अस्त्तित्व है, जो स्थायी है, सदा रहने वाला है एक समान..जो वास्तव में वे हैं जिसमें से रिसता है प्रेम, कृतज्ञता और शांति, जिसमें से झरता है आनंद. ऐसे हैं वे. पहले कितनी बार विचारों ने उसे आंदोलित किया है पर अब वे बेजान हो गये हैं, वह उन्हें देखती भर है, उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं. अब से उसके जीवन में जो भी होगा वह श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण उसके साथ है, सारा अस्त्तित्व उसके साथ है तो कुछ भी कम या हल्का नहीं चलेगा. उसकी वाणी, कर्म विचार सभी श्रेष्ठतम होंगे !  

Monday, February 3, 2014

शेफाली का दरख्त


कल-परसों वह कुछ लिख नहीं पायी, आज जून देर से आने वाले हैं, सो समय का सदुपयोग करते हुए डायरी उठा ली है. पर मन में कार्यों की एक सूची बनने लगी है, घर जाने से पहले गाउन ठीक करना है, भाई दूज पर टीका भेजना है. वह तो अपना कर्तव्य पूरा करेगी ही, मन में कई विचार आये और ऊपरी तौर पर हलचल मचाकर चले गये, क्या स्नेह की कोई परीक्षा हो सकती है, या कीमत या बदला, नहीं स्नेह तो बस स्नेह ही है. उसके गले में खराश अभी तक शेष है, पाचन भी पूरी तरह ठीक नहीं है, नन्हे को भी सर्दी लग गयी है, फिर ईश्वर के सिवाय कोई सहाय नजर नहीं आता, वही मदद करेगा जैसे अब तक करता आया है. सुबह दो-तीन फोन करने थे सो व्यायाम भी नहीं कर पायी.

कल दोपहर जून से वह कुछ बात करना चाहती थी, पर वह इसके लिए तैयार नहीं थे. उसने कहीं पढ़ा था, कुछ लोग किसी कीमत पर भी बहस में पड़ना नहीं चाहते सो ऐसी बात कह देते हैं जिन्हें सुनकर सामने वाला घबरा ही जाये. उनका स्वभाव ही ऐसा होता है, खुलकर बात करने से झिझकते हैं, पता नहीं क्यों, सब ठीक-ठाक रहे, दबा छिपा सा, ऊपर से सब सही लगे बस ऐसा ही वे चाहते हैं. सम्बन्धों में खुलापन सहन नहीं कर पाते. किसी विषय पर बात को गहराई तक ले जाना उन्हें नहीं भाता. उथला-उथला ही रहता है सब, ताकि कुछ बिगड़े भी तो ऊपर से संवार दें. यह उनकी परवरिश का हिस्सा है और इसमें यदि वे कुछ चाहें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा नहीं, वह उनके अनुरूप स्वयं को ढाल सके कोशिश तो यही रहती है पर जब कभी अपनी विवशता का अहसास होता है तो..उसके ख्याल से हर स्त्री को अपनी मर्जी से आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जहां उसकी रूचि-अरुचि की परवाह वह स्वयं करे, अपने लिए अपने परिवार के लिए और..यह स्वप्न कभी पूरा होगा...या ?

पिछले दिनों मन कुछ खिंचा-खिंचा सा था, वह कहते हैं न sound body has sound mind सो गले की खराश का असर मन पर हुआ और मन का दायीं कोहनी के ऊपर तथा कान पर. पर अब हालात सुधर रहे हैं और साथ ही मन भी. नन्हा भी कल से बेहतर है.

नन्हे के यूनिट टेस्ट खत्म हो गये, परसों उन्हें जाना है. जून उन दोनों को लेकर होमियोपैथी डॉ के पास गये थे, यात्रा के लिए कुछ दवाएं दी हैं. कल दोपहर उसने तीनों आल्मरियाँ साफ कीं, सलीके से लगे हुए कपड़े अच्छे लग रहे हैं. शाम को वे टहलने भी गये, शेफाली का पेड़ श्वेत फूलों से भर गया है और सुगंध बरबस अपनी ओर खींच लेती है. उसने सोचा उसकी उस बातूनी सखी को यह सुगंध और पेड़ अच्छा लगेगा. माँ का पत्र आया है, उन लोगों ने अभी तक नये घर में शिफ्ट नहीं किया है, वह घर जो उनके घर के सामने है, भविष्य में कई वर्षों के वाद जब वे उस घर में रहने जायेंगे तो पड़ोसी अपने ही लोग होंगे. आज सुबह साढ़े चार बजे उठी, अलार्म सुनने के बाद और सायरन बजने के बीच मन सपनों की दुनिया में उठा, गेट खोला, बाहर फूल थे और धुंधली सी सुबह !

उसकी संगीत अध्यापिका के ससुर की मृत्यु हो गयी कल रात आठ बजे यहीं अस्पताल में. अभी अभी पता चला, पिछले कई दिनों से वह अस्वस्थ थे. पिछले कई दिनों से वह उनके घर जा रही थी पर एक दिन भी बात नहीं की. उन्हें उसके जाने से असुविधा भी होती होगी पर अब वह यह कभी जान नहीं पायेगी. मानव जीवन नश्वर है और जितना समय हमें मिला है शांति और सद्भाव के साथ गुजर सकें तो ही उचित है. पर ऐसा हो हो नहीं पाता है. कभी किसी और कभी किसी कारण लोग संतुष्ट नहीं रह पाते. ईश्वर भी तब अपरिचित लगता है. शायद यह असंतोष उसी का नतीजा है. पूर्णतया स्वयं पर निर्भर रहना इतना आसान नहीं है, अपने हर एक क्षण की, हर मूड की जिम्मेदारी स्वयं लेनी पडती है, तो कभी अपराध भाव, कभी उदासी, कभी असंतोष, कभी आत्मविश्वास की कमी यानि सभी के सभी नकारात्मक भावों का सामना करना पड़ता है. जीवन एक कड़वी दवा लगने लगता है और आसपास की शांति भी असहनीय लगने लगती है.

अभी तक गला ठीक नहीं हुआ है न उसका और न ही नन्हे का. शायद आने वाले सफर और आने वाले दिनों के बारे में सोचकर ही मन परेशान है, या फिर शरीर की अस्वस्थता के कारण सदा उत्साहित रहने वाला मन मुरझा सा गया है, हो सकता है इसका कोई और कारण भी हो, जिसके बारे में वह सोचना नहीं चाहती, जिसने जिन्दगी की गाड़ी में पिछली सीट ले ली है. सुबह उसकी असमिया सखी का फोन आया था, उसने एक ऐसी बात बताई जो उसके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, उसके परिवार में एक नया मेहमान आने वाला है और उसने यह बात किसी और को बताने से मना किया है.




Monday, September 2, 2013

पड़ोस की बिल्ली


आज नन्हा पानी की बोतल ले जाना भूल गया, जबकि वह उसके बैग के निकट ही रख देती है. बस में चढ़ने के बाद उसने इशारा  किया, पर जब तक वह घर जाकर बोतल लेकर आती बस को चले ही जाना था, उसने सोचा यही ठीक है कि आज वह पानी के बिना ही रहे, तभी भविष्य में ऐसी भूल नहीं करेगा. परसों शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, फोन करके सबको बताना है, कल तैयारी भी करनी होगी. आज सुबह से पड़ोस के बच्चे की सूसी नाम की एक बिल्ली उनके स्टोर में आकर सोयी है, शायद उसे यह घर भी अपना घर लग रहा है. उसे आवाज सुनाई दी, धोबी आ गया था, वैसे भी आज इधर-उधर की बातें लिख कर वह पेज भर रही थी, सही मायनों में जिसे आत्मशोध कहते हैं या आत्मज्ञान उसके करीब जाने का प्रयास नहीं था. आज ध्यान में अपेक्षाकृत सफलता मिली. मन को जब चाहे तब संयमित कर पाने की विद्या कुछ-कुछ सध रही है. पर कल दोपहर को उसे नैनी पर क्रोध करना पड़ा, क्या वह असंयम नहीं था, शायद नहीं, क्योंकि वह सोच-समझ कर उठाया गया कदम था. क्या इसका अर्थ यह नहीं कि यदि कोई गलत कार्य करे और उसे उचित ठहरने के लिए तर्क का सहारा ले तो कार्य सही हो जाता है. उसे तो लगता है क्रोध एक प्रभाव में आकर किया जाता है सम्मोहन की अवस्था में और वह मन का ही एक रूप है.

आज सुबह नन्हे को उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी, उसकी एक आँख तो चिपकी होने के कारण खुल ही नहीं रही थी. आज न तो जागरण पर ही ध्यान टिका पायी और न ही बाद में ध्यान के लिए बैठी. मीटिंग के लिए फोन करते-करते ही सारी सुबह निकल गयी. दोपहर पढ़ने-पढ़ाने में, शाम भ्रमण व बागवानी में. कल रात सैलाब में शिवानी को इतना बेबस देखा की उसके दुःख में शामिल हो गयी.

जून के आने में अभी काफी वक्त है और उसका सुबह का काम लगभग समाप्त हो गया है. जागरण में आज दादा का संदेश सुना- what is silence is turning to God बाहर का शोर यदि न भी हो तो हमारे भीतर जो आवाजों का शोर है उसे खत्म करके ही सच्चा मौन पाया जा सकता है. There are voices of desires, of anger, of so many feelings, so many useless thoughts then one can not turn to God even for a single minute. ईश्वर को पाना इतना कठिन क्यों है ? दूरदर्शन पर ‘मजहब नहीं सिखाता’ में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर एक भाव प्रवण दृश्य देखा, बच्चों का जन्मदिन मनाने जो नाराज मुसलमान पड़ोसी हिन्दू के घर नहीं आते वे रात को उसकी चीख सुनकर आ जाते हैं. जब तक लोगों में एक-दूसरे के मजहब के प्रति नफरत है तब तक लोग मजहब का असली रूप पहचान ही नहीं सकते. दादा कहते हैं, Make a relationship with God ! पर यह उसके लिए पहले कभी सम्भव था जब वह बरबस यह वाक्य बोला करती थी, God is with her always because he is her friend. लेकिन अब इतनी निकटता अनुभव नहीं कर पाती, भावना पर बुद्धि हावी हो जाती है और कभी-कभी लगता है कि ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं है. पर वह जानती है, किसी भी विपत्ति के आने पर उतनी ही श्रद्धा से फिर उसे पुकारेगी. ईश्वर उसका मददगार है क्योंकि उसमें यह चाह है.




  

Wednesday, June 13, 2012

ऑरेंज कैंडी


कल संध्या जब जून ऑफिस से घर आया, उसके हाथ में एक पार्सल था जो माँ ने भेजा था. वह देखते ही समझ गयी थी कि उसमें वही बेबी एल्बम होगा जो वे लोग भी लाए थे. आज ही वह उन्हें पत्र लिखेगी, उसने सोचा. जून का दफ्तर स्थानांतरित हो रहा है अगले हफ्ते से उसे भी नयी इमारत में जाना होगा.
आज इतवार है, जून सुबह से लॉन में काम में लग गया था, जीनिया के पौधों व गुलाब की क्यारी में से घास निकाली. कल वह दो क्रोटन के पौधे व हैंगिंग पॉट में लगाने के लिये  भी पौधे लाया है, लगा भी दिए हैं और बहुत सुंदर लग रहे हैं. कल धर्मयुग में मन को छूने वाली एक कहानी पढ़ी, जून उस दिन जो किताबें लाया था उसमें भागवत् पुराण भी था.
आज के दिन के साथ कितनी मधुर स्मृतियाँ संयुक्त हैं, दो वर्ष पूर्व जून जब उनके घर आया था उसे अंगूठी पहनाई थी, और वे सोच रहे थे कि आज ही उस नवांगतुक का जन्मदिन भी होगा. पर अभी तक तो कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा है. कल से वह सभी सामान्य कार्य आराम से कर पा रही है. डॉक्टर ने तीन दिन बाद बुलाया है.  
कल बाबू जगजीवन राम जी का स्वर्गवास हो गया. पिछले कई दिनों से यह आशंका थी कई अब वे बचेंगे या नहीं, रेडियो पर तो एक बार गलती से उनकी मृत्यु का समाचार भी दे दिए था. कल चार बजे से टीवी पर कोई मनोरंजक कार्यक्रम नहीं दिखाया गया. ऑफिस भी बंद हो गया है. दोपहर को बिजली चली गयी, गर्मी बहुत थी, बाहर आइसक्रीम वाले ने आवाज दी तो वह ले आया, ऑरेंज कैंडी, पर कड़वी थी. शायद ज्यादा मीठे के कारण कड़वी हो गयी थी.

Monday, April 9, 2012

गुलदान में फूल


वह बहुत खुश है, फोन पर जून ने कहा है कि वह आ रहा है. पर जिस कार्य के लिये वे लोग गए थे वह तो अधूरा ही रह गया है, फिर भी वह खुश है क्यों कि इतने दिन बाद वे साथ होंगे. उसने सोचा, कोई अच्छा सा नाश्ता बनाये अगले ही पल विचार आया अभी पांच भी नहीं बजे हैं और उसे आने में दो घंटे से भी ज्यादा लगेंगे सो खाना ही बनाएगी. पुलक भरे मन से उसने फटाफट काम करना शुरू किया और दो सब्जियां बना डालीं. आज कई पत्र भी आये हैं पर उसने एक भी नहीं पढ़ा है अब दोनों साथ-साथ पढेंगे. खाना बन गया तो समय काटना कठिन हो गया तो उसने गुलदान में फूल सजाये, फिर स्वेटर बुनने बैठ गयी.
 



Sunday, January 15, 2012

कुकर का वाल्व


कल शाम उन्होंने एक फिल्म देखी सारांश, कुछ दृश्य तो इतने भावपूर्ण थे कि महीनों तक याद रहेंगे. हेड मास्टर का रोल करने वाला अभिनेता, लड़की, और पार्वती सभी तो इतने सशक्त थे. उसके पहले वे मोटरसाइकिल पर घूमने गए, जून बहुत अच्छी तरह चलाना सीख गया है. लाइब्रेरी में साप्ताहिक धर्मयुग में राजीव-सोनिया के इंटरव्यू पढ़े, बहुत रोचक थे. नूना के छोटे भाई की शादी तय हो गयी है, उन्हें पूजा की छुट्टियों का कार्यक्रम बदलना होगा, दिसम्बर में विवाह है, पूरे दस महीनों के बाद वह घर जायेगी सबसे मिलकर बहुत खुशी होगी. बाहर लॉन में एक छोटे कद का सरदार लड़का घास काट रहा है, अभी उन्हें पूर्णकालिक माली नहीं मिला है. आज दूधवाला ज्यादा दूध दे गया है आइसक्रीम बनानी है.
आज सुबह भी पिछले दिनों की तरह नूना ने रोजमर्रा के कार्य किये, आँख में हल्का दर्द हुआ तो लेट गयी और फिर नींद खुली पौने ग्यारह बजे, ग्यारह बजे भोजन का समय है जब वह घर आता है, कल शाम कुकर का वाल्व भी उड़ गया था, दाल पतीले में बनानी थी, पूरे चालीस मिनट लगे, जून आते समय वाल्व ले आया था. उसने कुकर में लगा दिया है. कल वह भीग कर आया था तब पूर्णिमा, पड़ोस में रहने वाली लड़की यहीं बैठी थी, उसने दो पौधे लाकर दिये व अपने पेड़ के जामुन भी. उसने बताया कि कैसे वह अपने भाई को बिना बताए फिल्म देखने जाती है चुपके-चुपके अपनी सहेलियों के साथ.