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Friday, January 17, 2025

काली सफ़ेद चिड़िया

काली सफ़ेद चिड़िया


आज शाम के बाद से ही तेज वर्षा हो रही है। रह-रह कर बिजली भी चमक रही है। ऐसे में घर से बाहर निकलना ठीक नहीं है, सुबह मौसम ठीक रहा तो वे भ्रमण के लिए जाएँगे। ‘मेरे साईं’ धारावाहिक में भी आज महामारी का चित्रण देखा, गाँव वालों में कितना भय फैल  जाता है महामारी के नाम से ही। कल गुरुजी का जन्मदिन है, शाम को वह ध्यान करायेंगे। अक्षय तृतीया पर लिखे एक लेख का अनुवाद किया। एक लेख का अनुवाद अभी शेष है, सेवा का यह छोटा सा कार्य उसके मन को आनंद से भर देता है। प्रातः भ्रमण से लौटते समय मुक्त गगन में उड़ते और कलरव करते सुंदर पक्षी देखे, चील, गिलहरी, लाली और छोटी सी काली सफ़ेद चिड़िया, जो फुदक फुदक कर चलती है। शाम को जमैका चेरी तोड़ीं और फूलों की तस्वीरें उतारीं। छोटी भांजी के लिए जन्मदिन पर एक छोटी सी कविता लिखी। परसों रात को रसोईघर में चूहे के आगमन के कुछ चिह्न मिले।प्लेटफ़ार्म पर काले दाग, डिश वॉशर के नीचे से खूबानी की गुठली मिली, पर उसके बाद से उसका कोई पता नहीं है। दोपहर को डेस्क टॉप चलना बंद हो गया, शायद कल कुछ हल निकले। संभवतः नया ख़रीदना होगा। बगीचे के लिए कार्पेट ग्रास और गमलों के लिए मिट्टी का भी ऑर्डर करना है। बड़े शहरों में घास और मिट्टी भी ख़रीदनी पड़ती है। 


आज सुबह शंख प्रक्षालन और धौति क्रिया की, दोपहर से सिर में हल्का दर्द है। कल शाम को वजन देखा था, और आज से मिशन ‘वजन घटाओ’ शुरू किया है, अब कुछ तो असर होना ही था। सुबह भांजी की कविता में कुछ पंक्तियाँ और जोड़ कर उसे भेजी तो उसका फ़ोन आ गया। बहुत सी बातें उसने बतायीं, बड़ा बेटा कराटे सीखता है और टेनिस भी खेलता है। बच्चे आपस में झगड़ते नहीं है, मिलजुल कर खेलते हैं। उसने जॉब छोड़ दी है और बच्चों की देखभाल में व्यस्त रहती है। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्होंने कहा, आत्मा-परमात्मा की बात अलग है और दुनियादारी अलग है, संभवतः वह कहना चाहते थे, व्यावहारिक सत्य और परमार्थक सत्य दो भिन्न बारे हैं। उनसे इज़राइल के बारे में भी बात की। चिर शत्रु इज़राइल और फ़िलस्तीन में युद्ध छिड़ गया है, हमास ने राकेट दागे और इज़राइल ने बम बरसाए।रात्रि भ्रमण के समय नापा के मंदिर में दीपम तेल रखा, शाम को कोई न कोई आकर वहाँ दिया जला देता है। 


आज सुबह से ही ठंडी हवा चल रही है जो ‘तौकते’ चक्रवाती तूफ़ान के कारण है। यह तूफ़ान अरब सागर की ओर बढ़ रहा है। चार दिन बाद गुजरात पहुँचेगा। कल भारी वर्षा होने की आशंका है। कल से महरी नहीं आएगी, उसके गाँव में कोरोना के कई केस हैं, न आना ही बेहतर है। कर्नाटक में स्थिति में सुधार नहीं आ रहा है। टाइम्स ग्रुप की प्रमुख  इन्दु जैन, जिनका देहांत दो दिन पहले कोरोना के कारण हो गया था, के बारे में गुरुजी का लेख आज अख़बार में पढ़ा, वह सन् ८० से उन्हें जानते हैं। अध्यात्म की राह पर चले बिना कोई सत्य को नहीं जान सकता और उसको अपनी उस क्षमता का आभास नहीं होता जो कर्म बंधन में नहीं बांधती। आज सब्ज़ी वाला गेट तक आकर फल आदि दे गया। 


अभी-अभी वे रात्रि भ्रमण के समय चन्द्र दर्शन करके आये हैं। कोरोना के केस सोसाइटी में कुछ घट गये हैं।शाम को पड़ोसिन मिलीं, उनकी बहू के परिवार में सभी इससे ग्रस्त हैं। दो व्यक्तियों (पति-पत्नी) की मृत्यु का समाचार भी उन्होंने बताया। न जाने कितने लोगों ने अपने प्राण गँवा दिये हैं इस महामारी में। कितने बच्चे अनाथ हो गये हैं और कितने माता-पिताओं ने अपनी संतानें खो दी हैं। शाम को पापाजी से बात हुई,  उन्होंने अध्यात्म को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है। जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत सुलझा हुआ है। वह इज़राइल के बारे में बता रहे थे, छोटा सा देश है और उसने स्वयं को कोरोना मुक्त कर लिया है।भारत को ऐसा करने में कई साल लग जाएँगे।नन्हे से बात हुई, वे लोग अगले रविवार सुबह जल्दी आ सकते हैं, दस बजे से पहले घर वापस जाना होगा। ‘देवों के देव’ में आज महादेव ने भक्त और भगवान के संबंध के बारे में बताया। भक्त जिस क्षण भगवान का स्मरण करता है, भगवान उस वक्त तो उसके साथ होते ही हैं, पर जिस क्षण वह अपने मन में उनका अनुभव नहीं कर रहा होता, उस वक्त भी उनका हाथ उसके सिर पर होता है।उनके अनुसार भक्त और भगवान कहने को ही दो होते हैं, वास्तव में उनमें कोई भिन्नता नहीं होती।    



Monday, July 10, 2017

देवों के देव


अप्रैल का अंतिम दिन ! आज शाम को घर पर मेहमान आ रहे हैं, एक नन्हा होशियार बच्चा नानू, उसकी माँ और नानी-नाना, एक पुरानी सखी और उसके पतिदेव. भोजन तैयार है, रोटी और चावल तभी बनेंगे. लोभिया, आलू-मुँगौड़ी, सॉस पनीर, भिन्डी, आम की चटनी, रायता, सलाद व मीठे में फिरनी व संदेश. आज की शाम सचमुच बहुत अच्छी रहेगी. कल मई दिवस का अवकाश है या कहें अम्बेडकर जयंती का अवकाश जो बीहू के अवकाश के कारण तब नहीं मिला था. वे तिनसुकिया जाने वाले हैं. उसे जूता खरीदना है और जून को टीशर्ट.

सुबह कोयल की मधुर आवाज से नींद खुली, कमरे के पीछे बाहर आम पेड़ पर रहती है शायद. गुरूजी को भी सुना, बहुत भावपूर्ण संबोधन था उनका. आत्मा को जानने की प्रेरणा दे रहे थे. ज्ञान-प्रवाह में सुना, तन्मात्रा भी समुदाय है, परमात्मा सूक्ष्मतम है, उसका कोई समुदाय नहीं है, वह अकेला है. मई दिवस के कारण नन्हे की भी आज छुट्टी है. छोटी बहन ने आज से फिर जॉब आरम्भ की है. दीदी नार्वे में हैं. छोटी, व मंझली भाभियाँ व्हाट्सएप पर सम्पर्क में हैं. मोबाइल ने सबको करीब ला दिया है. दोपहर को क्लब की एक सदस्य के घर गयी, साहित्यिक प्रतियोगिता के लिए आये लेखों, कविताओं आदि को फ़ाइल में लगाया, नाम हटाये तथा उन्हें क्रमांक दिए. शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर के घर गये, उनकी माँ का कुछ दिन पहले देहांत हुआ था. नर्सरी से पाँच पौधे भी लायी.

सुबह उठी तो लगा भीतर कोई कुछ कह रहा है, बहुत धीमी थी उसकी आवाज पर बहुत स्पष्ट...मन आजकल कितना ठहरा रहता है. कोई उपस्थिति ख़ुशबू बनकर फैली रहती है. टहलने गये तो मध्य से ही आना पड़ा, वर्षा शुरू हो गयी जो अब जाकर थमी है. दिन भर फुहार पड़ती रही. अभी-अभी आकाश में चाँद व एक तारा दिखा. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को बच्चों को सूर्य नमस्कार कराया. ओशो को सुना, आर्ट ऑफ़ लिविंग रेडियो पर भजन सुने. इस तरह एक और दिन, मिल गया था जो उपहार में, बीत गया. परमात्मा की कृपा का अनुभव अब अलग से नहीं होता. हर श्वास उसी की दी हुई है, हर कोई उसी की वजह से है. उसी की लीला खेली जा रही है. पिताजी से बात हुई, नन्हे से भी.

आज सुबह से लगातार वर्ष हो रही है. न सुबह का भ्रमण हुआ न ही शाम को बाहर जा सके, हाँ आधा घंटा जरूर ड्राइव वे पर छाता लगाये टहले. यू ट्यूब पर ‘भारत एक खोज’ में स्वामी विवेकानन्द पर एक एपिसोड देखा. नया फोन तो कमाल का है. इसमें बहुत कुछ कर सकते हैं, देख सकते हैं. सुबह टीवी पर महादेव में इतना डूब गयी थी कि स्वीपर ने आकर कहा, कोई आया है तो समझ ही नहीं पायी. उसने कहा भी कुछ धीरे से, सांकेतिक भाषा में था, पर सजग रहना चाहिए था. दोपहर लिखने में बीती. ‘ध्यान’ का विचार सुबह आया था पर अब जब मन हर समय एक सुमिरन में रहता ही है, अलग से ध्यान करने का मन नहीं होता, इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है, गुरू की कितनी आवश्यकता है साधक को. मनमानी साधना उन्हें मंजिल तक कैसे पहुंचा सकती है, कभी लगता है मंजिल पर ही हैं वे, परमात्मा तो यहीं है, अभी है फिर गुरू की चेतावनी याद आती है कि जिसने सोचा वह पहुंच गया वह भटक गया, यहाँ जो एक बार चल देता है, वह चलता ही रहता है. परमात्मा का कोई अंत नहीं, उसे कोई जान नहीं सकता, उसकी कृपा का अनुभव भर कर सकता है. उसका प्रेम अनुभव कर सकता है, उसके प्रति कृतज्ञता के भाव से भर सकता है ! वह परमात्मा उनका अपना है !    


Monday, May 15, 2017

महर्षि दधीचि की कथा


आज पिताजी उठकर बैठे व व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर घूमने गये, वह घर आने को भी कह रहे हैं. जब जून ने उनसे यात्रा पर जाने के बारे में पूछा तो कहने लगे, जायेंगे. उनके मन में आशा जगी है, ठीक होकर पुनः जीवन को गले लगाने की. मानव में जिजीविषा कितनी प्रबल होती है, यही भावना मृत्यु को सामने देखकर भी उससे पार जाने की चाह जगाती है. प्रकृति द्वारा प्रदत्त है यह जीने की आकांक्षा ! हृदय जोड़ने वाला तत्व है भावना, मानव भावना से ही जीता है लेकिन उसकी भावना एक सीमित दायरे में ही घूमती है.

आज भी मेघ महाराज पूरे ताम-झाम के साथ आये हैं. सद्गुरू स्वप्नों के बारे में बता रहे हैं. कल रात स्वप्न में बहुत सुंदर पीले व लाल रंग के फूल देखे, इतने चमकदार रंग थे उन फूलों के ! गुरूजी कह रहे हैं साधक को जब यह आभास हो जाये, उसे कुछ भी ज्ञान नहीं है, तब जानना चाहिए कि कुछ ज्ञान है. ज्ञान का अभिमान बताता है कि ज्ञान हुआ ही नहीं. मानव जीवन की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अपने अनुभव से कुछ सीखता नहीं, एक ही भूल को बार-बार दोहराए चला जाता है. अभी कुछ देर में महादेव आने वाले हैं, शिव पार्वती को अष्टांग योग सिखा रहे हैं. जागरण, स्वप्न व सुषुप्ति के अतिरिक्त एक चौथी अवस्था भी है. जो स्वयं को उस अवस्था में रखना जान लेता है, वह ऊर्जा से भर जाता है. आभा युक्त, प्रकाश युक्त, दिव्य ऊर्जा से जो भर जाता है उसे कैसा अहंकार. स्वयं को तुच्छ के साथ जोड़कर देखे कोई तो तुच्छ ही रहेगा, स्वयं को नीचे गिराना क्या ठीक है ? आज अस्पताल में पिताजी थोड़ी देर चले, उन्हें घर जाने के लिए ठीक होना है. वह एक बार उनसे मिलने सुबह गयी थी फिर शाम को वे दोनों गये.

आज रामनवमी है. सुबह वर्षा हो रही थी. आज नैनी ने अपने पति से झगड़ा कर लिया अभी तक काम पर नहीं आई है. यह उसे जिव्हा से सताती है तो वह इसे शारीरिक कष्ट देता है. दोनों एक से बढ़कर एक हैं. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, इसी हफ्ते वे घर आ जायेंगे. आज सुबह अकर्ता भाव का कितना अनूठा अनुभव हुआ, सब कुछ अपने आप हो रहा है, ‘वे’ कुछ भी नहीं करते, ‘वे’ जो वास्तव में हैं. सुबह चार बजे नींद खुली, उससे पूर्व एक स्वप्न देख रही थी. एक अंग्रेज परिवार है. उसकी किशोरी कन्या चुप रहती है, पिता को इस बात का दुःख है, फिर अचानक एक दिन वह बात करती है तो प्रेरणादायक विचार उसके मुख से निकलते हैं !

पिताजी आज घर लौट आये हैं, नहा-धोकर अपने कमरे में लेटे हैं, बारह दिन वे अस्पताल में रहे, ईश्वर उन्हें स्वास्थ्य प्रदान करे ! आज सुबह ‘महादेव’ में महर्षि दधीचि की कथा देखी, बचपन में ‘हमारे पूर्वज’ में उनके बारे में पढ़ा था. आजकल बच्चों को वे कथाएं नहीं पढ़ाई जातीं. कितने युगों के साक्षी थे वह महर्षि. वे भी न जाने कितनी बार आये हैं इस दुनिया में. कल रात स्वप्न में फिर गुरूमाँ को देखा, कई बार पहले भी देख चुकी है. वे तीन नन्हे बच्चों की देखभाल कर रही थीं, बच्चे उनके नहीं थे. छोटी ननद का फोन आया, छोटा भतीजा गिरकर अपन घुटनों पर चोट लगा बैठा है.
परमात्मा अभी है, यहीं है, कितनी बार संतों के मुख से यह बात सुनी है. आज इसका अनुभव हुआ, होता ही आ रहा है कई बार, अब पक्का होता जा रहा है, जीवन एक खेल ही तो लगता है, इस अनुभव के बाद. अभी न जाने इस खेल में कितने मोड़ आने शेष हैं. कल जून ने कन्या के पिता को अपने आने की सूचना दी. जीवन की यात्रा में कोई साथ हो तो यात्रा कितनी सुखद हो जाती है, दो होकर भी एक और एक होकर भी दो..अद्वैत का अनुभव पहले इसी तरह होता है, फिर धीरे-धीरे वह प्रेम सारे अस्तित्त्व को घेर लेता है. पिताजी बाहर बैठे हैं. वह चुप ही रहते हैं ज्यादातर, शायद बोलने में ऊर्जा को व्यर्थ करना नहीं चाहते. कल स्टोर की सफाई की, गर्मियों के वस्त्र निकले, अब छह महीनों के बाद पुनः सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलेंगे, मौसम का यह चक्र इसी तरह चलता रहता है.

   

Monday, May 8, 2017

धर्मयुग का विशेषांक


कल रात अनोखा स्वप्न देखा. एक बिल्ली और उसका बच्चा..उसके पहले नन्हे को बचपन में देखा, उसे किसी बात पर डांट लगायी थी उसने. मन ग्लानि से भर गया, किस कदर मूर्खता से भरा कृत्य था यह. बहुत देर तक अपने इसी प्रकार के कृत्यों के लिए क्षमा मांगी. भीतर जैसे कुछ धुल-पुंछ गया हो. उनके जीवन की जड़ें न जाने कहाँ तक फैली हुई हैं..शायद पिछले जन्मों तक..वे अपने इर्द-गिर्द कितने ही कर्मों का जाल बना लेते हैं. उसने सोचा, आज सुबह से ऐसा कोई कृत्य तो नहीं किया जिसका परिणाम बाद में भोगना पड़े..जो भी किया सब समर्पण कर देना है. पल-पल उसी को समर्पित करते जाना है, तब कोई भी कर्म नहीं बंधेगा. परमात्मा सत रूप में जड़ में भी है, चित रूप में चेतन में है और आनंद रूप में सद्गुरु में है.  
कल जून आ गये, घर जैसे भर गया है. उनके न रहने पर मन कैसा शांत हो गया है, ऐसा प्रतीत होता था. शायद वह विरह ही था, परमात्मा ही तो उनके स्वजनों के रूप में उनके पास रहता है. पहले माता-पिता सन्तान के लिए देव स्वरूप होते हैं फिर आत्मीयजन, लेकिन इसकी खबर ही नहीं हो पाती अक्सर तो.. उसका गला पूर्ण रूप से ठीक नहीं है, लेकिन भीतर उत्साह का निर्झर फूट रहा है. आज महीनों बाद संगीत का भी अभ्यास किया. गान, ज्ञान और ध्यान तीनों जीवन को सुंदर बनाते हैं. सद्गुरु की प्रिय बहन की आवाज में मधुर देवी स्तुति सुनी. आज ‘महादेव’ में देखा लक्ष्मी भी नारायण से कहती हैं, उनके सिवा नारायण के हृदय में किसी अन्य का चिन्तन तो नहीं होता न ! हृदय तो आखिर एक ही है न.. महादेव का पुनर्विवाह भी दिखाया जायेगा, वे सनातन प्रेमी हैं, पुरुष और प्रकृति दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं, आत्मा व परमात्मा की तरह ! पति-पत्नी कितने पवित्र बंधन में बंधे होते हैं, एकदूसरे के लिए ही मानो उनका जीवन होता है, जीवन को सरस बनाते हैं ये रिश्ते, लेकिन आत्मबोध हो जाने के बाद ही कोई इन रिश्तों की अहमियत समझ सकता है. पिताजी का स्वास्थ्य बेहतर है. कल उन्हें पहला इंजेक्शन भी लग गया. वे सौ वर्ष जियें, उनके साथ बैंगलोर चलें, ऐसी वह शुभेच्छा करती है, उनमें जीवन के प्रति असीम उत्साह है, ऐसे व्यक्ति से मृत्यु भी दूर भाग जाएगी.
पिछले तीन दिन फिर नहीं लिख सकी. शुक्रवार को ‘बंद’ था, जून घर पर ही थे, उसके बाद सप्ताह का अंत ! दोपहर के पौने तीन बजे हैं, वह लॉन में फूलों के पास पोखरी के निकट बैठी है. नन्हे-नन्हे गुलाबी फूल भी खिले हैं जो तीन पत्ते वाली खट्टी घास में अपने आप ही उग आये हैं. चिड़ियों की मधुर आवाजें वातावरण को सरस बना रही हैं. न जाने कौन से पंछी अपना कलरव गुंजा कर जाने क्या कह रहे हैं. प्रकृति में हर क्षण कुछ घट रहा है पर एक गहन रहस्य का आवरण ओढ़े हुए है यह. अभी-अभी नासापुटों में एक मदमस्त करने वाली सुगंध भर गयी है, हवा का कोई झोंका उसे अपने साथ लिए आया है. उसने एक गीत लिखा. सुबह चार बजे नींद खिली पर कुछ पल नहीं उठी तो एक स्वप्न देखा, एक छोटा बच्चा रो रहा है, शायद वह नन्हा था, उसे चुप कराने का प्रयास करती है तो नींद खुल जाती है, उनकी आत्मा कितनी सजग है, वह हर पल उन्हें जगाये रखना चाहती है.

पिताजी का स्वास्थ्य लगता है आज ठीक नहीं है, आज उन्होंने अपना पसंदीदा कार्य, दूध लेना व गर्म करना नहीं किया. वह बगीचे से पालक तोड़कर लाये हैं. आज नेट नहीं चला, सो उसने पढ़ने के लिए बाईस वर्ष पुराना धर्मयुग का एक विशेषांक निकाला है. दीदी व छोटी बहन से बात हुई, छोटी बहन के यहाँ आज रात्रि भोज है, देर रात तक चलने वाला. वे लोग नया बिजनेस भी शुरू कर रहे हैं. एक कम्पनी का को-ओपरेटिव स्टोर चलाएंगे, तीन परिवार मिलकर. शाम को अस्पताल जाना है, वृद्धा आंटी कुछ दिनों से अस्पताल में हैं, कल रात बेड से गिर गयीं, शायद सिर में चोट लगी है. बुढ़ापे में कितने कष्ट झेलने पड़ते हैं, इन्सान विवश हो जाता है.