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Monday, February 3, 2014

शेफाली का दरख्त


कल-परसों वह कुछ लिख नहीं पायी, आज जून देर से आने वाले हैं, सो समय का सदुपयोग करते हुए डायरी उठा ली है. पर मन में कार्यों की एक सूची बनने लगी है, घर जाने से पहले गाउन ठीक करना है, भाई दूज पर टीका भेजना है. वह तो अपना कर्तव्य पूरा करेगी ही, मन में कई विचार आये और ऊपरी तौर पर हलचल मचाकर चले गये, क्या स्नेह की कोई परीक्षा हो सकती है, या कीमत या बदला, नहीं स्नेह तो बस स्नेह ही है. उसके गले में खराश अभी तक शेष है, पाचन भी पूरी तरह ठीक नहीं है, नन्हे को भी सर्दी लग गयी है, फिर ईश्वर के सिवाय कोई सहाय नजर नहीं आता, वही मदद करेगा जैसे अब तक करता आया है. सुबह दो-तीन फोन करने थे सो व्यायाम भी नहीं कर पायी.

कल दोपहर जून से वह कुछ बात करना चाहती थी, पर वह इसके लिए तैयार नहीं थे. उसने कहीं पढ़ा था, कुछ लोग किसी कीमत पर भी बहस में पड़ना नहीं चाहते सो ऐसी बात कह देते हैं जिन्हें सुनकर सामने वाला घबरा ही जाये. उनका स्वभाव ही ऐसा होता है, खुलकर बात करने से झिझकते हैं, पता नहीं क्यों, सब ठीक-ठाक रहे, दबा छिपा सा, ऊपर से सब सही लगे बस ऐसा ही वे चाहते हैं. सम्बन्धों में खुलापन सहन नहीं कर पाते. किसी विषय पर बात को गहराई तक ले जाना उन्हें नहीं भाता. उथला-उथला ही रहता है सब, ताकि कुछ बिगड़े भी तो ऊपर से संवार दें. यह उनकी परवरिश का हिस्सा है और इसमें यदि वे कुछ चाहें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा नहीं, वह उनके अनुरूप स्वयं को ढाल सके कोशिश तो यही रहती है पर जब कभी अपनी विवशता का अहसास होता है तो..उसके ख्याल से हर स्त्री को अपनी मर्जी से आर्थिक निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जहां उसकी रूचि-अरुचि की परवाह वह स्वयं करे, अपने लिए अपने परिवार के लिए और..यह स्वप्न कभी पूरा होगा...या ?

पिछले दिनों मन कुछ खिंचा-खिंचा सा था, वह कहते हैं न sound body has sound mind सो गले की खराश का असर मन पर हुआ और मन का दायीं कोहनी के ऊपर तथा कान पर. पर अब हालात सुधर रहे हैं और साथ ही मन भी. नन्हा भी कल से बेहतर है.

नन्हे के यूनिट टेस्ट खत्म हो गये, परसों उन्हें जाना है. जून उन दोनों को लेकर होमियोपैथी डॉ के पास गये थे, यात्रा के लिए कुछ दवाएं दी हैं. कल दोपहर उसने तीनों आल्मरियाँ साफ कीं, सलीके से लगे हुए कपड़े अच्छे लग रहे हैं. शाम को वे टहलने भी गये, शेफाली का पेड़ श्वेत फूलों से भर गया है और सुगंध बरबस अपनी ओर खींच लेती है. उसने सोचा उसकी उस बातूनी सखी को यह सुगंध और पेड़ अच्छा लगेगा. माँ का पत्र आया है, उन लोगों ने अभी तक नये घर में शिफ्ट नहीं किया है, वह घर जो उनके घर के सामने है, भविष्य में कई वर्षों के वाद जब वे उस घर में रहने जायेंगे तो पड़ोसी अपने ही लोग होंगे. आज सुबह साढ़े चार बजे उठी, अलार्म सुनने के बाद और सायरन बजने के बीच मन सपनों की दुनिया में उठा, गेट खोला, बाहर फूल थे और धुंधली सी सुबह !

उसकी संगीत अध्यापिका के ससुर की मृत्यु हो गयी कल रात आठ बजे यहीं अस्पताल में. अभी अभी पता चला, पिछले कई दिनों से वह अस्वस्थ थे. पिछले कई दिनों से वह उनके घर जा रही थी पर एक दिन भी बात नहीं की. उन्हें उसके जाने से असुविधा भी होती होगी पर अब वह यह कभी जान नहीं पायेगी. मानव जीवन नश्वर है और जितना समय हमें मिला है शांति और सद्भाव के साथ गुजर सकें तो ही उचित है. पर ऐसा हो हो नहीं पाता है. कभी किसी और कभी किसी कारण लोग संतुष्ट नहीं रह पाते. ईश्वर भी तब अपरिचित लगता है. शायद यह असंतोष उसी का नतीजा है. पूर्णतया स्वयं पर निर्भर रहना इतना आसान नहीं है, अपने हर एक क्षण की, हर मूड की जिम्मेदारी स्वयं लेनी पडती है, तो कभी अपराध भाव, कभी उदासी, कभी असंतोष, कभी आत्मविश्वास की कमी यानि सभी के सभी नकारात्मक भावों का सामना करना पड़ता है. जीवन एक कड़वी दवा लगने लगता है और आसपास की शांति भी असहनीय लगने लगती है.

अभी तक गला ठीक नहीं हुआ है न उसका और न ही नन्हे का. शायद आने वाले सफर और आने वाले दिनों के बारे में सोचकर ही मन परेशान है, या फिर शरीर की अस्वस्थता के कारण सदा उत्साहित रहने वाला मन मुरझा सा गया है, हो सकता है इसका कोई और कारण भी हो, जिसके बारे में वह सोचना नहीं चाहती, जिसने जिन्दगी की गाड़ी में पिछली सीट ले ली है. सुबह उसकी असमिया सखी का फोन आया था, उसने एक ऐसी बात बताई जो उसके परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, उसके परिवार में एक नया मेहमान आने वाला है और उसने यह बात किसी और को बताने से मना किया है.




Saturday, September 14, 2013

मेले में झूला


अभी कुछ देर पहले वे टहलने के लिए निकले ही थे कि गले में कुछ चुभता सा महसूस हुआ, कुछ अजीब सा जैसे कोई लम्प हो और अभी-अभी मेडिकल गाइड में lump in throat पर पढ़ा, लिखा है, कभी-कभी यह सिर्फ तनाव की वजह से भी होता है. पर उसे लगता है यह केवल फिजिकल कारण से है, कल सलाइवा ग्लैंड में pain था उसी से जुड़ा कोई मर्ज है. आज १५ अगस्त है, आजादी के ढेर सारे तराने सुने, देवेगौड़ा जी का भाषण भी सुना. दोपहर को मित्रों के साथ सहभोज भी अच्छा रहा. इस समय टीवी पर ‘फौजी’ आया रहा है, जिससे थोड़ी देर के लिए वह lump के बारे में सोचना भी भूल गयी थी, पर अब सीरियल खत्म हो गया है और लम्प फिर याद आ गया है.

जून क्लब गये हैं, Treasure Hunt में भाग लेने, अभी दो भी नहीं बजे हैं और उसे अकेलापन (शनिवार के दिन) खटक रहा है. नन्हे के आने में अभी पूरा एक घंटा है. कुछ देर एक पत्रिका से कटिंग्स करती रही, कुछ देर पढ़ी भी और अब टीवी, पर मन कहीं  स्थिर नहीं हो रहा है. उस दिन गीता में पढ़ा ही था, राजसिक वृत्ति वाले थोड़ी देर स्थिर नहीं बैठ सकते. उनका चित्त इधर-उधर दौड़ता रहता है. सात्विक गुणों से वह दूर है और तामसिक भी ज्यादातर समय तो नहीं है फिर राजसिक प्रवृत्ति ही है जो एक कार्य में मन लगाने नहीं देती. मन को शांत, स्थिर करना ही तो अध्यात्मिक, धार्मिक व नैतिक कर्त्तव्य है. मन को साधै सब सधे.. ठीक ही कहा है किसी कवि ने. इस हफ्ते छोटे व मंझले भाई के पत्र आए हैं, सोमवार को जवाब लिखेगी जो उसका खतों के उत्तर लिखने का दिन है.

आज मौसम सुहाना है, न सर्दी न गर्मी..और वह भी ऐसी ही होना चाहती है. सुबह नन्हे को डांट कर उठाया तो, पर बाद में सुना, खुश रहने का उपाय है दूसरों को ख़ुशी देना. कल वे मेला देखने गये, ऊँचे झूले पर बैठे वह आँखें नहीं खोल पायी डर से कुछ पल के लिए, जबकि नन्हा आराम से मजे ले रहा था. उसे देखकर वह भी सामान्य हो गयी. उस दिन किसी भी टीम को खजाना नहीं मिला, इतने कठिन क्लू थे कि समय सीमा समाप्त हो गयी थी. उनके आने में अभी एक घंटा है, वह आज पहली बार coconut rice बना रही है, इस उम्मीद पर की उन्हें पसंद आयेगा.


अभी-अभी एक सखी से फोन पर बात की और दिल जैसे सुकून से भर गया. बंगाली सखी ने खत में लिखा है, मैत्री बहुमूल्य है उसे वह खोना नहीं चाहती, वह भी मित्रता खोना नहीं चाहती, किसी हद तक यह नितांत आवश्यक है. आज टीवी पर खाना खजाना में मसाला दोसा व साम्भर बनाने की विधि सीखी और उस सीखे हुए का उपयोग कर  साम्भर बना रही है. जून और नन्हे दोनों को ही पसंद है. अभी-अभी एक सखी से बात की वह मेंहदी लगाना सीखने के बाद अब पेंटिंग सीख रही है. और इसके बाद सिलाई सीखेगी. उसे भी कुछ सीखना चाहिए जैसे कि मीठा बोलना, अच्छी सी कविता लिखना, ऐसी जो उत्साह से भर दे या फिर मित्रता निभाना और पत्र लिखना. खुद को व जून और नन्हे को स्वस्थ रखना, घर का माहौल शांत व साफ-सुथरा बनाना और सुबह सवेरे जल्दी उठना. जून ने भी कहा आज, वह उठ जल्दी उठेगी तो सारा घर उठ जायेगा. और भी कुछ सीखना है पर पहले घड़ी की तरफ नजर डाल ली जाये उसने सोचा, ग्यारह बजे से पहले-पहले ही खाना तैयार हो जाना चाहिए.