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Monday, July 25, 2016

लाल चावल


तब उम्र भी कम थी टीनएजर के ख़िताब से अभी निकले भर थे I किसी तरह इतना ही कहा कि सोचना पड़ेगा I आगे बढ़े, गुरूजी से मिलने आये एक परिवार में एक छोटी लड़की परीक्षा के आनेवाले परिणाम के भय से रो रही थी, गुरूजी ने कहा, क्यों रोती है? तू तो हर सुबह ओम नमो शिवाय का जप करती है न? लड़की रोना भूल कर आश्चर्य से बोली आपको कैसे पता? मुस्कुराते हुए गुरूजी कहने लगे, मुझे सब पता है I फिर उनसे बोले, कल सुबह सात बजे फ्लाइट है तुम छह बजे तैयार रहना हनी ने फिर कहा, सोच के बताऊँगा आँखों के सामने पिताजी का चेहरा आ रहा था कितनी मुश्किल से कुछ दिनों के लिये आज्ञा मिली थी अब दो हफ्ते और घर से दूर रहने पर वे अवश्य ही बहुत नाराज होंगे I लौट कर मित्रों को बताया तो उनका चेहरा देखने लायक था, उन्हें ईर्ष्या भी हो रही थी और वे खुश भी थे I रात भर सोचते रहा जाऊँ या न जाऊँ, जानना चाहते थे कि गुरु क्या होते हैं? गुरु तत्व क्या है ? अंततः निर्णय लिया कि जाना चाहिए, सुबह साढ़े छह बजे निर्धारित जगह पर पहुँचे तो पता चला गुरूजी चले गए हैं, रात भर जगने के कारण आधा घंटा देर तो हो ही गयी थी I अपना सामान उठाये पीछे लौट ही रहे थे कि एक बार फिर एक वरिष्ठ शिक्षक आये और बोले तुम हमारे साथ ट्रेन से चल रहे हो, तुम्हारा टिकट बना हुआ है, वह एक बार फिर आश्चर्य से भर गये,  समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह शिक्षक बोले, गुरूजी जानते थे कि देर से आओगे इसीलिए ट्रेन का टिकट बनवाया है I
तमिलनाडु पहुँचे तो गुरूजी का व्यस्त कार्यक्रम आरम्भ हुआ, सत्संग, सभाएँ, उदघाटन समारोह, मीटिंग्स, आदि आदि में सारा समय निकल जाता था I वह गुरूजी का बैग और आसन लेकर उनकी कार में पीछे बैठता था I सब कुछ ठीक था पर एक तो दक्षिण भारतीय भोजन फिर उसमें वहाँ लाल चावल मिलते थे, ठीक से खा नहीं पाता था कई बार भूख मिटती नहीं थी संकोच के कारण किसी से कह भी नहीं पाता था I एक दिन गुरूजी ने बुलाया और पूछा, ठीक से खा नहीँ रहे हो? वह चौंके किसने कहा होगा वही प्रश्न उठाने वाला मन सामने आ गया और गुरु की क्षमता पर सहज ही विश्वास नहीं हुआ लेकिन उसके बाद हर दिन उनके लिये उत्तर भारतीय भोजन की व्यवस्था होने लगी I यात्रा के दौरान एक बार कई गाड़ियों का काफिला जा रहा था, गुरूजी ने अपनी गाड़ी एक कच्चे रस्ते पर मोड़ने को कहा, एक कुटीर के सामने कार रुकी, एक बुजुर्ग महिला आयी और बोली कबसे प्रतीक्षा कर रही थी I गुरूजी ने उसे कुछ फल व पैसे दिए, कुछ दिनों बाद पता चला कि उनकी देह शांत हो गयी I
वे यात्रा के दौरान किसी एक स्थान पर ज्यादा नहीं रुकते थे, सारे कपड़े मैले हो गए थे, धोने का समय ही नहीं मिला था I चिंतित थे कि कल गुरूजी के साथ क्या पहन कर जाएंगे, तभी दरवाजे पर किसी ने खटखटाया, गुरूजी बुला रहे हैं, वह फिर डरते डरते उनके पास गये, कहीं कोई भूल तो नहीं हो गयी, एक धोती और अंगवस्त्र देते हुए वे बोले, कल इसे पहन लेना आश्चर्य से वह कुछ देर मौन खड़े रहे, यह बात तो अभी तक किसी से कही भी नहीं थी, कहा, पर उन्हें तो यह पहनना नहीं आता, तो वे कहने लगे इस धोती को साड़ी की तरह पहन लेना और ऊपर से अंगवस्त्र डाल लेना I

Thursday, June 25, 2015

जस्सी की दुनिया


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, सुबह का वक्त नियमित कार्यों में बीत गया और सप्ताहांत होने के कारण दिन भर अलग तरह की व्यस्तता रही. आज ससुरजी वापस चले गये, नन्हा और जून उन्हें छोड़ने गये हैं तथा उनका पुराना फ्रिज ट्रेन में घर के लिए बुक करवाने भी, इसी महीने उन्होंने नया फ्रिज लिया है फ्रॉस्ट फ्री ! माँ उनके साथ रहेंगी. उनका प्रिय धारावाहिक टीवी पर आ रहा है, जैसे उसका प्रिय है जस्सी, जो अब रोचक मोड़ पर पहुंच चका है. नन्हा और दो हफ्ते साथ रहकर कॉलेज जाने वाला है. उसे एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया है, जो जिसका हकदार होता है उसे ही वह वस्तु मिलती है. वैसे वह आत्मनिर्भर है, जीवन में तरक्की करेगा. दुनिया जिसे तरक्की मानती है वैसी तरक्की न भी करे पर वह खुद की तलाश में लगा है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जून उससे बेहद प्यार करते हैं, इसे मोह ही कहा जायेगा. वे उसे कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. कल शाम को घर में कितनी चहल-पहल थी. सभी पिताजी से मिलने आये थे, आज चुप्पी छायी है. जीवन इसी उतार-चढ़ाव का नाम है, उन्हें इसका साक्षी बनना है !

इस क्षण को देखे तो सिर में हल्का भारीपन है, वर्षा हो रही है, नन्हा सो रहा है, जून कुछ देर पूर्व घर आकर ऑफिस गये हैं, आज से पांच दिनों तक उनकी ट्रेनिंग है, दोपहर के भोजन के लिए घर नहीं आयेंगे. टीवी पर शहनाई वादन हो रहा है. नैनी कपड़े धो रही है. उसके सिर के भारीपन का एक कारण है मानसिक द्वंद्व, उसे तो द्वन्द्वातीत होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है फिर यह क्या ? यह है असहिशुष्णता, किसी अन्य को सहन न कर सकने की प्रवृत्ति, ‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय’ उसका मन एकाकी रहना चाहता है, विरक्त, दीन-दुनिया से परे, उसे किसी भी वस्तु की न तो कामना है न ही परवाह, पर समाज ऐसे व्यवहार को अच्छा नहीं मानता. एकाकी व्यक्ति से समाज को डर लगता है. वह उसे भीड़ में वापस लाना चाहता है. उसके मन का दर्द तन में भी प्रकट होने लगा है. मन में जो भी घटता है उसका प्रतिबिम्ब तन पर पड़ता ही है. मन की थोड़ी सी नकारात्मकता भी शरीर के स्रावों पर काफी प्रभाव डालती है. भीतर जो कुछ भी घटता है उसका कारण भी भीतर होता है. वह जो भी सोचती है, कहती है अथवा करती है, उसका परिणाम भीतर पड़ता है. इधर-उधर के दर्द सब उसी का परिणाम हैं !


Saturday, August 16, 2014

ट्रेन से टक्कर


शनिवार का आज का दिन बाकी दिनों से कुछ भिन्न है. सुबह बगीचे में कुछ देर कार्य किया फिर पड़ोसिन के यहाँ गयी. जब से उसने उन परिचिता की कक्षा में जाना शुरू किया है  वह ज्यादा समझदार लगने लगी है. नन्हे के स्कूल में आज radio programme recording है, आज देर से आने वाला है, जून को sample test के लिए एक घंटा पूर्व ऑफिस जाना पड़ा है. उसने सुबह की जगह अभी कुछ देर पूर्व ही रियाज किया. आज पहली बार उसने किसी को कहा (पड़ोसिन) कि वह आयेगी तो उसे अपनी कविताएँ दिखाएगी. कल दोपहर उसके मन में उन्हें छपवाने का विचार भी आया और कल्पना ही कल्पना में छपी हुई किताब हाथों में थी. जून वापस आ गये हैं और माली से अमरूद के पेड़ की कटाई-छंटाई करवा रहे हैं जो उससे देखी नहीं जाती सो वह अंदर आ गयी है. वैसे आज सुबह उसने भी कुछ पौधों, और झाड़ियों की कटिंग की थी पर इतने बड़े पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना अलग बात है.

‘’आखिर क्यों उसने अपने आप को इस सिचुएशन में पड़ने दिया’’, ये शब्द उसके होठों पर थे, उसकी जेब में एक पैसा भी नहीं था. रात का वक्त था, अनजान शहर में वह जून और नन्हे से बिछड़ गयी थी. वे किसी शहर में घूमने गये थे, एक होटल में पहले एक दिन रुके, जहाँ उनकी काफी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी पर दूसरे दिन कहीं से घूम कर वापस आये, जून पीछे थे वह और नन्हे आराम से अपने पुराने कमरे की ओर बढ़े पर केयरटेकर ने मना कर दिया, कोई भी कमरा खाली नहीं है. तब तक जून भी आ गये. नन्हा और जून सामान लेकर आगे-आगे चल पड़े. उसके हाथ में भी कुछ था पर कोई खिलौना ही था. वह पीछे-पीछे बाजार देखते हुए चल  रही थी कि कुछ छोटी-छोटी लडकियाँ दिखीं. एक को देखकर वह मुस्कुरायी फिर वे कुछ बात करने लगे. उसने उस बालिका से कहा कल ‘बीच’ पर मिलेंगे. उसने भी ‘हाँ’ कहा, तब तक वे एक दोराहे तक आ चुके थे, जून और नन्हा कहीं दिखाई नहीं दिए. वह एक तरफ मुड़ गयी, और आगे जाकर एक होटल दिखा, उसे लगा वे लोग यहीं गये होंगे पर अंदर जाकर निराशा ही हाथ लगी. वह बाहर आ गयी और सोचने लगी कि रात्रि के वक्त इस अन्जान शहर में अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए. उसके पास पैसे भी नहीं थे कि कहीं फोन भी कर सके, तभी यह विचार उसके मन में आया कि ऐसी परिस्थिति में खुद को क्यों डाला और साथ ही यह भी कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं, और नींद खुल गयी.

कल सुबह जून किसी काम से ऑफिस गये तो ड्राइवर ने एक एक्सीडेंट के बारे में उन्हें बताया जिसमें ‘आसाम मेल’ ट्रेन से टाटा सूमो की टक्कर में एक ड्रिलर की मृत्यु हो गयी. कल शाम नैनी ने, आज सुबह पड़ोसिन ने उसके बारे में बताया, फिर फोन पर एक सखी से भी उसी दुर्घटना के बारे में बात की. बार-बार उस वैधव्य को प्राप्त स्त्री का जो गर्भवती भी है तथा उसके ढाई वर्ष के पुत्र का ध्यान हो आता है. मृत्यु कब किस रूप में किसके सम्मुख आएगी, नहीं कहा जा सकता. हर दिन को जीवन का अंतिम दिन मानकर जीना चाहिए, मनुष्य वर्षों बाद की योजनायें बनता है पर अगले क्षण का उसे पता नहीं, आज सुबह बल्कि रोज सुबह ही वे ‘जागरण’ में जीवन की क्षण भंगुरता के बारे में सुनते हैं, सब कुछ नश्वर है प्रतिक्षण बदल रहा है, पल-पल वे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.

‘’विवेकी को पाने की इच्छा नहीं रहती, वह तो पूर्ण हो चका होता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता बल्कि छोड़ना ही शेष रहता है. संसार में आसक्ति को छोड़ना, सुख बुद्धि को छोड़ना, विकारों को छोड़ना और धीरे-धीरे सभी सांसारिक काल्पनिक वृत्तियों को छोड़ना. विवेकी अपने सुख-दुःख के लिए वह स्वयं को जिम्मेदार मानता है मानता ही नहीं, जानता है क्यों कि वह स्वयं के अनुभव के आधार पर ही निर्णय करता है’’. आज सुबह उसने यही सब सुना था, इस समय दोपहर के डेढ़ बजे हैं वह अपनी कविताओं वाली डायरी के साथ है. सुबह-सुबह जागरण सुनने के बाद सूक्ष्म और पवित्र भाव मन में जगते हैं उसी वक्त तो उन्हें लिख नहीं पाती पर बाद में उन्हीं के आधार पर कविताएँ गढ़ती है. उसकी आस्था और विश्वास का बोध कराती हैं, उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है कुछ रचकर कैसी संतुष्टि का आभास होता है. उसे एक पत्र भी लिखना है, माँ-पिता का पत्र पिछले हफ्ते आया था. परसों नन्हे का प्लास्टर खुलेगा, अब उसका हाथ काफी ठीक है, एक महीना अंततः बीत ही गया, वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहता है. परसों उनकी मीटिंग भी है. आज भारत-पौलैंड का हॉकी मैच है, यदि भारत यह मैच जीत गया तो सेमीफाइनल में प्रवेश पा सकता है. ओलम्पिक खेलों के समापन में मात्र चार दिन रह गये हैं, फिर चार वर्षों की प्रतीक्षा !



Saturday, July 19, 2014

माँ का स्वास्थ्य



अंततः वह दिन आ गया, आज उन्हें यात्रा पर निकलना है, मन में उत्साह है और जोश भी, यात्रा अपने आप में सम्पूर्ण जीवन है, तरह-तरह की परिस्थितयों से गुजरना, लोगों से मिलना और यात्रा का आरम्भ व अंत, जैसे कि जीवन में होता है. सुबह वर्षा के कारण नींद जल्दी खुल गयी. बादल गरज भी रहे थे और बरस भी रहे थे, नन्हे ने आज सुबह से सभी कार्यों में सहयोग दिया है जिससे कि बाकी बचे समय में वह कम्प्यूटर गेम खेल सके. जैन मुनि ने आज बताया, जिस सुख को लोग बाहर खोजते हैं वह उन्हें अन्तर्मुखी होकर अपने भावों, संवेदनाओं और विचारों को समझ कर ही मिल सकता है. बाबाजी ने सहज स्वभाव की बात की तो नानक की यह बात उसे याद आई, ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप सुरंजन सोई’ ! जैसे फूल अपने आप खिलता है, अंतर से ख़ुशी स्वयंमेव निकलनी चाहिए, वह ख़ुशी जो अंतर्मन को तो प्रकाशित करे ही बल्कि अपने बाहर, इर्द-गिर्द भी खुशबू फैला दे. जैसे तुलसी दास ने कहा है, रामनाम का दीया अधरों पर रखने से अंतर्मन के साथ-साथ बाहर भी उजाला फैलता है. देहरी पर रखे दीपक की भांति. मौसम उनका पूरा साथ दे रहा है. अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर उनके साथ है. वह तो हमेशा ही उनके सिरों पर अपना हाथ रखे हुए है.

It is a pleasant morning. They reached  Guwahati at 4.15 am in the morning, she was dreaming then but got up around five fifteen due to continuous flow of passengers in and out both. They are in first coupe so every next moment some one comes or goes. Nanha is still in bed on upper berth. She went for a stroll with jun and they bought a newspaper, which he is reading now. Yesterday when they left home it was raining, reached station before time, waited for some time and train came on right time. Mrs singh their co passenger is a well educated soft spoken garwali lady, they talked about her favourite subject hills of Garwal for one hour in empty coupe,  drinking tea and viewing the greenery of Assam till they reached  first stop. Then she read the book, Meditation, till soup and dinner was served. It was nice, soup and dinner both but article in the book was superb, it gave inner peace, inspiration and insight to her mind and she came to know once again that all things, relationships and possessions are subject to change and  decay.

रात को वे सोये तो उनकी ट्रेन बरौनी में थी और सुबह उठे तो इलाहबाद आ गया था, रात भर वह आराम से सोयी जैसा कि सदा रेल यात्रा में उसके साथ होता है. नन्हा अभी भी सो रहा है, जून और वह चाय ले चुके हैं, उनके अन्य सहयात्री भी सुबह उठने वालों में से हैं, पर मिसेज सिंह अभी भी सो रही हैं, शायद उनकी तबियत ठीक नहीं है क्योंकि ज्यादातर समय वह सोती रही हैं. घर पर सभी को उनकी प्रतीक्षा होगी, शाम तक वे घर पहुंच जायेंगे और जैसा कि उसने सोचा है उनका हर दिन एक खास दिन हो इस तरह से रहेंगे. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है, सभी जाने-अनजाने उस परम सत्ता की ओर खिंचे चले जा रहे हैं पर उसने सचेत होकर उसका मार्ग चुना है, इस विशाल ब्रह्मांड में हर ओर उसी की सत्ता का प्रसार है, उनका अल्प जीवन, अल्प बुद्धि, अल्प समझ उसे मात्र प्रेम के द्वारा ही समझ सकती है, प्रेम का प्रतिदान प्रेम ही होता है.

कल शाम छह बजे उनकी ट्रेन गन्तव्य पर पहुँची, देहली से मंझली भाभी व भतीजी भी उनके साथ हो ली थीं, उन्हीं से पता चला कि माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, पिता के साथ जून अभी उन्हें heart checkup कैंप में ECG के लिए ले गये हैं, उसके पहले एक डाक्टर से मिलने उनके घर गये थे. यहाँ सभी बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं, बड़ों के पास उनके लिए वक्त नहीं है. गर्मी अभी उतनी नहीं है. कल शाम वर्षा हो गयी थी, रात को हवा काफी ठंडी थी. उसकी आँखों में धूप व धूल की वजह से हल्का सा दर्द है. छोटे भाई व दीदी से आध्यात्मिक विषय पर थोड़ी चर्चा हुई, उसके शब्दों में कहीं अहंकार झलका था ऐसा उसे बाद में लगा. नम्रता, जबकि पहली जरूरत है. आज सुबह छोटी बहन से भी बात हुई, आज शाम को उन्हें दीदी के साथ जाना है, कल शाम लौटेंगे, परसों छोटी बहन के पास हिमाचल प्रदेश जायेंगे. जैसे कहानी से कहानी का जन्म होता है, वैसे ही उनकी यात्रा से कई यात्राओं का होना था. यहाँ आस-पास कई मकान बन गये हैं, लोग बढ़ गये हैं, सो पहले की सी बात नहीं है लेकिन परिवर्तन तो जीवन का सबसे बड़ा सत्य है.


Monday, June 30, 2014

कन्याकुमारी का स्मारक


आज चेन्नई में उनका तीसरा और अंतिम दिन है. रात स्वप्न में उसे काले ग्रेनाइट की बनी एक इमारत, एक वृक्ष तथा एक विशाल छिपकली दिखे. होटल की खिड़की से बाहर सड़क पर लोग अपने-अपने काम से लौटते हुए दिख रहे हैं, उनमें से कुछ शायद अपने सम्बन्धियों से मिलने जा रहे हों. वे यहाँ घर से इतनी दूर भारत को खोजने निकले हैं, शायद खुद को भी. सुबह आठ बजे उन्होंने टाटा सूमो पर आज का सिटी टूर आरम्भ किया. तेरह किमी लम्बा मरीना बीच तथा उस पर स्थित एमजीआर व अन्ना के समाधि स्थल देखे. कुछ अन्य मन्दिरों में सुंदर प्रतिमाओं के दर्शन  किये. नल्ली तथा कुमारम् नाम की दो प्रसिद्ध वस्त्रों की दुकानों में भी गये. नल्ली इतनी विशाल है कि उसमें अनेकों प्रकार की लाखों साड़ियाँ होंगी. बच्चों को यहाँ की खरीदारी में कोई रूचि नहीं थी, उन्हें मनपसन्द आहार दिलाकर वे एक विशाल, आधुनिक शापिंग काम्प्लेक्स ‘स्पेंसर प्लाजा’ देखने गये. संध्या पौने छह बजे उन्हें चेन्नई से कन्याकुमारी के लिए प्रस्थान करना था.

सूर्योदय हो गया है और स्वर्णिम किरणें उसकी डायरी को छू रही हैं. वे ‘कन्याकुमारी’ पहुंचने वाले हैं. उसने भारत के इस सुंदर स्थान के बारे में कितना कुछ पढ़ व सुन रखा है जहाँ तीन सागर मिलते हैं, जहाँ वह चट्टान है जिस पर बैठ स्वामी विवेकानन्द ने उस  सत्य को प्राप्त किया था जिसे हर एक अपने अपने ढंग से खोज रहा है. यह ट्रेन कितनी साफ-सुथरी है. लोग विनम्र हैं. कल रात रेल कर्मचारी ने भोजन के लिए कूपन दिए. श्वेत प्लास्टिक की ट्रे में करीने से ढका भोजन परोसा गया. समूह के कुछ लोगों ने भोजन नहीं लिया, सम्भवतः दोपहर को उडुपी रेस्तरां में खाए गोभी कोरमा-चपाती, बिरयानी व दही-चावल का स्वाद वे अभी तक भूले नहीं थे. बहुत खोजने के बाद उन्हें शाकाहारी भोजनालय मिला था. कल ट्रेन में बच्चों ने कुछ देर शतरंज खेला. वे रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों के नाम उच्चारित कर बहुत प्रसन्न हो रहे थे, चेंगलपट्टू, मेलमारूवट्टूर तथा डिंडीगुल आदि दक्षिण भारतीय नाम उनके लिए अनोखे थे. अभी वे सो रहे हैं. जून सामने की बर्थ पर बैठे पत्रिका पढ़ रहे हैं. सहयात्री शांत व सुशिक्षित दक्षण भारतीय हैं.

कल सुबह दस बजे उनकी ट्रेन कन्याकुमारी स्टेशन पहुँची, स्टेशन खाली था और स्वच्छ  भी, उन्हें अपना अपना सामान स्वयं उठाकर ऑटो रिक्शा तक ले जाना पड़ा. उन्हें स्टेशन से मात्र डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित विवेकानन्द आश्रम जाना था, जहाँ एक  रात्रि उन्हें ठहरना था. यहाँ का हरा-भरा शांत वातावरण, अनवरत बहती शीतल हवा के झोंके महसूस कर सभी यह एक से अधिक दिन रुकना चाहते हैं पर आज ही उन्हें प्रस्थान करना है. उन्होंने आश्रम के भोजनालय में दोपहर का सात्विक भोजन लिया फिर इसी केंद्र की निशुल्क बस द्वारा ‘विवेकानन्द स्मारक’ देखने गये. एक लांच में बैठकर अन्य कई यात्रियों के साथ वे उस चट्टान तक गये जहाँ लगभग एक शताब्दी पूर्व स्वामी जी ने बैठकर सत्य का साक्षात्कार किया था. वहीं निकट की चट्टान पर तमिल कवि थिरुवल्लुवर की एक सौ तेतीस फीट ऊंची प्रतिमा दर्शनीय है. उन्होंने ‘कुमारी अम्मन मन्दिर’ देखा, जहाँ पार्वती ने शिव के साथ विवाह की इच्छा की पूर्ति के लिए प्रार्थना की थी. संध्या को वे ‘गाँधी मंडपम’ भी देखने गये, जहाँ मरणोपरांत गाँधी जी के अवशेष जनता के दर्शनार्थ रखे थे. वापस आकर वे इसी आश्रम में एक प्रदर्शनी को देखने गये जिसमें भारत के इतिहास तथा स्वामी के जीवन चरित को चित्रों के माध्यम से दिखाया गया है.





Thursday, May 15, 2014

राजधानी में लंच


वे बिहार में प्रवेश कर चुके हैं, राजधानी एक्सप्रेस किसी अज्ञात कारण से अत्यंत धीमी गति से चल रही है. कल रात पांच घंटे देर से ही देहली से चली थी और अब तो ग्यारह घंटे लेट हो चुकी है. कल शाम को वे तिनसुकिया पहुंचेंगे और वहाँ से अपने घर. उन तीनों के जीवन में कई सुखद परिवर्तन लेकर आई, अभी तक संतोष जनक रही इस यात्रा की स्मृतियां उनके साथ रहेंगी. कितने नये स्थान देखे, कितने लोगों से मिले. छोटी बहन की बिटिया को पहली बार देखा वह बहुत सुंदर है. दादी के पास थी, बहन अपनी पढ़ाई के कारण दूसरे शहर में थी. वे बड़े भाई के यहाँ भी गये, उनके छोटे से घर की तुलना में सामान बहुत ज्यादा था, दिल्ली में प्रदूषण भी बहुत है और उसे लगा वे लोग भोजन भी अपेक्षाकृत गरिष्ठ लेते हैं. उसे माँ-पापा की याद हो आई आज वे अकेले बैठे होंगे. उनके सामने वाली सीट पर एक परिवार नवजात शिशु (शायद दो महीने का)  के साथ व्यस्त है. अब लंच का समय हो गया है. कम से कम राजधानी में समय पर गर्मागर्म भोजन मिल जाता है. उन्होंने आइसक्रीम भी खायी, इस यात्रा में पहली बार. इस समय जून खिड़की से बाहर के नजारे देख रहे हैं और नन्हा कोई पत्रिका पढ़ रहा है शायद ‘चिप’, उसने एक कम्प्यूटर गेम भी दिल्ली में खरीदा है. उसके मन में उड़ीसा के हरे-भरे रास्ते, नारियल के वृक्ष, पोखर और समुद्र की छवियाँ आ आकर लौट जाती हैं.

परसों रात वे अपने घर लौट आये, सौभाग्य से मंद गति से चलती ट्रेन उनके शहर में बिना स्टॉप के रुक गयी और वे उतर गये, वरना एक घंटा और लग जाता. एक मित्र के यहाँ भोजन किया. कल जून दफ्तर गये, उन्हें अगले माह होने वाले सेमिनार में जाने के लिए तैयारी करनी है. नन्हे के साथ उसने घर व्यवस्थित किया, पूरा दिन व्यस्तता में बीता. बगीचे में फूल खिल आये हैं किचन गार्डन भी हरा-भरा और साफ-सुथरा लगा, उनकी अनुपस्थिति में भी नैनी और माली ने अपना काम जारी रखा.

आज वर्ष का अंतिम दिन है, मौसम साफ है, धूप भी निकली है, ठंड ज्यादा नहीं है यानि नये साल का स्वागत करने के लिए बिलकुल सही वातावरण ! सुबह उठी तो एक स्वप्न की याद थी जिसमें बाजार जाते समय वह पैसे ले जाना भूल जाती है, वापसी का रास्ता बहुत कठिन है. जून उससे पहले उठ गये थे, कल शाम भर वे अपने काम में व्यस्त थे, नन्हा अपनी छुट्टियों का बचा हुआ गृह कार्य पूरा करने में. कल रात्रि उसने चायनीज भोजन बनाया था, उन दोनों को पसंद आया. आज एक सखी ने नये वर्ष के स्वागत भोज के लिए बुलाया है यानि new year party, कल से नया साल शुरू हो रहा है, यकीनन खुशियों से भरा होगा, न सिर्फ उनके लिए, असम के लिए और पूरे देश के लिए !


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लहरों के पार


Today in the morning they went to golden beach, Nanha went directly to water and after some hesitation she also joined him. Tides came with great force and took them back to the sea shore. She remembered their journey from Calcutta to puri by jagnnnath express, that day in Kolkata the had visited Niko park and science city with one of jun’s friend’s family. In fact they came to see  them off also. Due to train accident some where  their train reached ten hours late. Train journey was boring, it was  sleeper class and their co-passenger one Bengali family was unclean and uncultured, so when train reached puri they were so happy, and guest house is very clean and comfortable. Here sea is very violent,it was amazing to see the waves, which came with great force and then became calm within seconds. Market on the shore is very big and colorful. They strolled for some time and saw typical oriya handicrafts. There are so many hotels. Raj bhavn, All India Radio, Circuit house were also on the way. Puri seems to be a clean and pleasant resort.

समुद्र का ऐसा विकराल रूप, लहरों का शोर और उनमें उठती हुई सफेद झाग, सभी कुछ बेहद मोहक लग रहा था, समुद्र कितना विशाल होता है और कितना आकर्षक. उसके पास जाओ तो लहरें फिर किनारे पर ले आती हैं. वे काफी देर तक नमकीन पानी में भीगते रहे, जून भी आये पर ज्यादा देर नहीं रुके. एक मछुआरे ने (लाइफ गार्ड) उन्हें ट्यूबस दे दी और उनमें बैठकर पानी पर तिरते हुए वे काफी दूर तक निकल गये. उसे वे स्वप्न याद आने वाले लगे जिनमें पूरी दक्षता से वह तैरा करती थी. जीवन में पहली बार इस तरह लहरों पर तिरने का अनुभव किया है जो सदा उसके साथ रहेगा. वहाँ से लौटकर वे चिल्का झील देखने गये, जो उड़ीसा की एक विशाल  झील है, जहां डाल्फिन रहती हैं. डाल्फिन तो ज्यादा नहीं दिखीं पर एक घंटे की नौका यात्रा अच्छी लगी. अचानक मिल गया एक पूर्व परिचित परिवार भी उनके साथ गया था. कल वे भुवनेश्वर जायेंगे, सुबह जल्दी उठना है. इस समय जून और नन्हा नीचे टीवी पर समाचार देखने गये हैं, वह यहाँ कमरे में है, लहरों का शोर इस कमरे तक आ रहा है.

उड़ीसा एक सुंदर प्रदेश है, नारियल के पेड़ों के झुंड, जगह-जगह कमल के श्वेत, नीले और गुलाबी फूलों से भरे कुंड और सीधे-सादे लोग ! आज उनकी यात्रा का अंतिम दिन है. वे भुवनेश्वर आ गये हैं, जो उड़ीसा की राजधानी है. साफ-सुथरा यह शहर योजना बद्ध तरीके से बसाया गया है. वे शहीद नगर में रह रहे हैं. फोटो बनने को दिए थे, जो सुबह मिल भी गये, दोपहर को ‘महाराजा’ पिक्चर हाल में एक फिल्म देखी. थोड़ी बहुत खरीदारी की. कल उन्हें राजधानी से दिल्ली जाना है. जहाँ से घर.

आज उन्हें यहाँ आए तीसरा दिन है, परसों रात वे यहाँ पहुंचे, उनकी ट्रेन कई कारणों से लेट होती हुई साढ़े पांच घंटे देर से पहुँची थी, अगली ट्रेन स्टेशन पर लग चुकी थी, उनके पास टिकट खरीदने का समय भी नहीं था, टीटी से बात करके वे ट्रेन में बैठ गये यात्रा मात्र कुछ घंटो की थी.  टीटी ने रूपये तो लिये पर टिकट नहीं बनाई, शायद उन रुपयों से वह अपने परिवार के लिए कोई सामान ले जायेगा. मंझला भाई स्टेशन पर लेने आया था. ट्रेन में एक चार साल की बच्ची मिली जो बेहद शरारती थी बल्कि बिगड़ी हुई थी, पर बहुत सुंदर थी और उसकी आवाज भी बहुत मीठी थी. यहाँ ठंड काफी है पर बहुत ज्यदा भी नहीं. माँ-पापा तथा सभी लोग अपने-अपने तरीके से जिन्दगी को पूरी तरह जी रहे हैं. घर में सभी को मिलजुल कर रहते देखकर बहुत अच्छा लगता है, कहीं तनाव नहीं, कहीं कोई उलझन नहीं. सभी माँ-पिता का बहुत ख्याल रखते हैं. मंझला भाई मकान बनाने में व्यस्त है. छोटे को अक्सर घूमना पड़ता है, अलग-अलग शहरों में. बच्चे पढ़ाई और खेलकूद में व्यस्त हैं. कल उन्हें यहाँ निकट के गाँव में पिकनिक पर जाना है, खाना घर से बनाकर ले जायेंगे.

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Tuesday, February 25, 2014

काला कोट गुलाबी गुंचा


बाहर धूप तेज है पर कमरे में बैठने पर अभी भी ठंड लगती है, वह बरामदे की धूप में चटाई बिछा कर  बैठी है, पिता बाहर आंगन में फोल्डिंग कॉट पर लेटे हैं. माँ अंदर सोयी हैं, दोपहर की आधे एक घंटे की झपकी लेने के लिए. सुबह बड़े भाई का फोन आया, वे वहाँ स्टेशन पर आयेंगे, कल जून भी उन्हें फोन करेंगे जब ट्रेन यहाँ स्टेशन से छूट जाएगी. कल उसकी संगीत अध्यापिका ने फिर उसे टोका, उसे और अभ्यास करना होगा. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये उनकी नई डाइनिंग टेबल देखी, बहुत सुंदर है, हल्के लकड़ी के रंग की, सनमाइका का डिजाइन भी टीक का है, एक सुंदर कलात्मक वस्तु है जिसकी कीमत वक्त के साथ बढ़ती ही जाएगी.

जून अभी तक नहीं आए हैं, उसने मन ही मन हिसाब लगाया, दोपहर को क्लब के लिए गिफ्ट पैक करने हैं, पड़ोसिन सहायता करने आएगी, सेक्रेटरी के कहने एक जगह फोन करना है, एक रेडियो सिंगर महिला जो क्लब की मेम्बर हैं उनकी कव्वाली में कुछ शब्द ठीक करवाने के लिए, वैसे बहुत जोरदार कव्वाली है, पर सोचती है तो लगता है, फोन उन्हें करना चाहिए, एक दिन उनका गाना सुना था, वैसे उनका नाम पहले कई बार सुना है पर आमने सामने बात नहीं हुई, चाहने पर भी वह मन की बात कह नहीं पाती, उन्होंने जब कहा गिफ्ट उनके यहाँ रखवाने हैं, तो बजाय यह कहने के कि आप ड्राइवर को भेज कर मंगवा लीजियेगा, उसके मुंह से यही निकला कि क्लब जाते समय वे उनके यहाँ छोड़ जायेंगे. माँ-पापा के कल वापस चले जाने के बाद आज काफी अकेलापन महसूस हो रहा है. कुछ देर पूर्व एक सखी ने फोन पर सुझाव दिया कि उसे अपनी थकावट, उलझन और अनुत्साह को लिखकर दूर करना चाहिए. आज सुबह छह बजे उठे, पिछले एक महीने से उठते ही चाय पीने का जो नियम बन गया था आज छूट गया.  

पिछले तीन दिन नहीं लिख सकी, पहले दिन बंद था आसू द्वारा, वोटर लिस्ट में सुधार करने हेतु बन्द का आह्वान किया गया था. उसके अगले दिन सुबह नन्हे को पढ़ाने में बीती, शाम को क्लब गयी, रिहर्सल कर रही महिलाओं के लिए चाय का इंतजाम करना था. कल शाम को क्लब में ‘फ्लावर शो’ था, उसके बाद एक असमिया विवाह में जाने का मौका मिला, जहाँ दुल्हन स्वयं तैयार होकर सौंफ-सुपारी से भरा होराई लिए मेहमानों का स्वागत करती मिली. भोज में था गर्मागर्म भात, दाल और सब्जी. आज चुनाव का दिन है, पर कोई भी वोट डालते जाता नजर नहीं आ रहा है. देश में स्थायी सरकार बने यह सब चाहते हैं पर इसके लिए प्रयास करना कोई नहीं चाहता, सब एक-दूसरे पर अपनी जिम्मेदारी थोपकर स्वयं दूर खड़े रहकर तमाशा देखना चाहते हैं. पिछले लोकसभा चुनावों में हालात इतने बुरे नहीं थे. लोग उत्साहपूर्वक वोट डालने गये थे, पर इस बार भय व आतंक का ऐसा माहौल बन गया है, डरे हुए लोग और डर गये हैं, लोगों का खून पानी बन गया है. 

वर्षा रात से हो रही थी, अब भी हो रही है, ठंड वापस लौट आयी है.  सुबह भजन सुनने का समय नहीं था, ‘जागरण’ भी नहीं सुना, माँ-पापा थे तो सब सुनते थे. नन्हा समय पर तैयार हो गया था, वह बहुत समझदारी की बातें करता है, यूँ तो हर माता-पिता को अपनी सन्तान प्रिय होती है पर वह सचमुच गर्व करने लायक है. सुबह ‘शांति’ पांच मिनट के लिए देखा, लगा कि अंतिम एपिसोड है, सब कुछ ठीक-ठाक हो गया है, इसी तरह जिन्दगी में भी उलझनें और परेशानियाँ आती है, फिर सब कुछ ठीक हो जाता है. आज उसने अपने और पड़ोसिन के घर से कुल मिलाकर तीस गुलाब की कलियाँ इकठ्ठी कर ली हैं अब प्रतीक्षा है तो एक कमेटी मेम्बर की जो इन्हें ले जाकर कोट में लगाने के लिए फ्लावर स्टिक के रूप में तैयार करेंगी. कल ‘हसबैंड नाइट’ है, अभी तक लेडीज ज्वाइन कर रही हैं, अब पौने दो सौ से ऊपर सदस्याएं हो गयी हैं. तैयारी ठीक चल रही है, उसके जिम्मे ज्यादा काम नहीं था, सारे गिफ्ट पैक कर दिए हैं. कल सुबह डोंगे आदि रिसीव करने हैं. जून उसे सुबह क्लब ले गये थे, दोपहर को फिर जाना था, अब वह पहले से ज्यादा समझने लगे हैं कि उसे हर हल में अब क्लब का काम भी करना है.  
                                                                                                                             





Saturday, February 22, 2014

बैटरी की चोरी


और आज उनकी बैटरी चोरी हो गयी, अर्थात उनकी मारुति कार की. चोर रात को दो बजे से थोड़ा पहले आया होगा, बड़ी सफाई से उसने कार का दरवाजा खोला और फिर बोनट. ‘आराम से किया काम है, सूझ-बुझ से निकाली गयी है’, ये दोनों वाक्य थे उस सिक्योरिटी ऑफिसर के जो देखने आया था कि बैटरी कैसे चोरी हुई. जून को आज सुबह-सवेरे ही मोरान जाना था, वह वहाँ से दो बार फोन कर चुके हैं. वह भी कितने ही फोन कर चुकी है. पहले सेक्रेटरी को फोन किया कि शाम को मीटिंग में नहीं आ पायेगी पर प्रेसिडेंट ने इसरार किया, उसे जाना ही चाहिए. इस महीने एक मीटिंग और है CMD आ रहे हैं, उसके बाद सम्भवतः तीन दिन का बंद है, चुनावों के बहिष्कार के लिए इस बंद का आयोजन किया गया होगा. उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं लगता, कल सुबह से ही उस बच्चे के पैर से बहता खून देखकर मन जैसे क्षत-विक्षत हो गया है, उसका असर तन पर भी पड़ा ही है. सुबह साढ़े चार बजे उठी, छात्रा पढ़कर गयी तब तक सब ठीक था, जून बाहर निकले और जब अंदर आये तो चेहरा फक था, वे सभी बाहर गये. चोर के निशान कहीं नहीं थे पर बोनट के अंदर की खाली जगह मुंह चिढ़ा रही थी. नन्हे ने कहा, गनीमत है गाड़ी नहीं गयी. वह सकारात्मक सोच सकता है, उसके लिए अच्छा ही है.

कल के घाव का दर्द अब कम हो गया है, वक्त के साथ इन्सान का मन बड़े से बड़ा दुःख भी सह सकता है. कल शाम आखिर उसे जाना ही पड़ा, लौटी तो जून बेहद थके हुए थे, दिन भर की यात्रा के कारण थकान हुई सो अलग, शाम को दो परिवार आ गये चोरी की बात सुनकर. मेहमान नवाजी की भी एक थकान होती है. उनका skit होगा या नहीं समय ही बतायेगा, लेकिन उसके लिए उसे घर की शांति भंग नहीं करनी चाहिए, इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बना लेना चाहिए. ईश्वर जो करेगा अच्छा ही करेगा. माँ-पापा के जाने में मात्र एक हफ्ता रह गया है, फिर वे तीनों रह जायेगे, अपनी छोटी सी दुनिया में. इन्सान के मन में कभी-कभी ऐसे विचार भी आते हैं जिन्हें वह खुद से भी छिपाना चाहता है. अपनी आजादी की कीमत पर वह कुछ भी नहीं चाहता. आज के भौतिकतावादी युग ने भीड़ में भी अकेले रहने की आदत डाल दी है, अथवा सवाल यह है कि उसे जो है वह नहीं जो नहीं है वह चाहिये.

आज सुबह की चाय पी ही थी, वह कुछ देर बैठकर उन लोगों से बातें कर रही थी, वे लोग चार-पांच दिन बाद जाने वाले हैं, हर वक्त यह बात मन में बनी रहती है कि अचानक पिता को कुछ घबराहट सी महसूस हुई, चक्कर आ रहा है कुछ ऐसे ही. वह तो बहुत डर गयी, दौड़कर पानी लेने गयी और जून को बताया, वह भी फौरन शेव छोड़कर आये और पिता को लेटने को कहा. तब तक वह थोड़ा ठीक महसूस कर रहे थे. जब से वे लोग आये हैं पहली बार ऐसा हुआ है बल्कि उन्होंने बताया कई साल पहले एकाध बार हुआ था.

आज धूप फिर भली लग रही है, हवा में ठंडक है इसलिए धूप का रेशमी स्पर्श भा रहा है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, प्रोजेक्टर से इंग्लैण्ड व हालैंड में खिंची स्लाइड्स देखीं, बहुत सुंदर फोटो आये हैं, रगीन फूलों के चित्र, बिगबेन और बंकिघम पैलेस के चित्र, हालैंड के ट्यूलिप और अन्य फूल बेहद सुंदर थे, टेम्स पर बने पुल, जहाज से यात्रा, उन्नत देश ऐसे ही होते हैं. तभी तो जो भारतीय एक बार विदेश जाते हैं, वापस भारत की धूल भरी टूटी-फूटी सडकों पर लौटना नहीं चाहते. आज सुबह से सभी कुछ सामान्य रहा है, लेकिन कल रात कोकराझार में हुई बम विस्फोट की घटना से कुछ सोच सबके मनों में है. अगले हफ्ते तक ट्रेनस् सामान्य रूप से चलने लगेंगी या नहीं इसे लेकर.







Friday, August 2, 2013

नेता जी का सौवाँ जन्मदिन


जून इस समय ट्रेन में होंगे, और उसे यकीन है इस क्षण उनके बारे में ही सोच रहे होंगे. उसने अनजाने में ही आज वह पेन उठा लिया है जो इस बार वे लाये थे, उनके रहते एक बार भी नहीं  लिखा इससे, अच्छा लिखता है उसने मन ही मन उन्हें इसके लिए धन्यवाद दिया. नन्हे के मित्रगण आये हैं आज, क्रिकेट खेलने, वह व्यस्त है, आज उसे पुरस्कार भी मिला है स्कूल में. दोपहर को उसकी एक सखी आ गयी थी, उसे छोड़कर आयी तो नन्हा आ गया, कुछ देर उनके यहाँ रहने वाली बिल्ली से खेलता रहा.

आज एक बेहद ठंडा इतवार था, उन्होंने ज्यादा समय घर में ही चंदामामा पढ़ते, वीडियो गेम खेलते और टीवी देखते हुए बिताया, सुबह वर्षा भी हो रही थी. शाम को फिर वही शरारती बच्चा अपने माँ-पिता के साथ आया, नन्हा उस उम्र में कितना शांत था. उन्होंने २६ जनवरी को लंच पर बुलाया है, अच्छा रहेगा, उसने सोचा गणतन्त्र दिवस की भावना के साथ वे उस दिन को और भी अच्छी तरह बिता सकेंगे. जून अपने एक मित्र की छोटी बहन की शादी में सम्मिलित होने के बाद ही लौटेंगे.

और कोई दिन होता यानि जून घर पर होते तो इस वक्त वे दोपहर का भोजन कर चुके होते, पर आज उसे भूख ही नहीं लग रही है. सुबह सामान्य रही, ठंड बहुत है, खिड़की के शीशे से छन कर  आती रौशनी से पता चल रहा है, बाहर धूप निकल आई है, लंच के बाद कुछ देर धूप में ही विश्राम करेगी. कल नन्हा नहा-धोकर अच्छी तरह तैयार होकर अपने एक मित्र के यहाँ जाने के मूड में था, कॉमिक्स बदलने के लिए, पर उसने अपनी माँ से पूछ कर बताया, वे लोग कहीं जा रहे हैं, वह कुछ देर तो परेशान रहा जैसे उस दिन स्कूल से आकर था जब मैडम का कहा काम करना भूल गया था, फिर अपने आप ही ठीक हो गया. बच्चों जैसा स्वभाव यदि बड़ों का भी हो जाये तो कहीं कोई कड़वाहट न रहे.

आज नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का सौवाँ जन्मदिन है. बचपन में जोशोखरोश के साथ वे इस दिन देशभक्ति के गीत गाते थे. कल शाम पड़ोसिन के साथ वह नन्हे को लेकर पुस्तक मेले में गयी, बहुत खुश था वह, किताबों के प्रति उसका स्वाभाविक प्रेम देखकर अच्छा लगता है, उसका मित्र और वह एक स्टाल से दूसरे स्टाल तक घूम घूम कर किताबें देख रहे थे, जून होते तो वे दोनों भी साथ साथ देखते. उसने सोचा एक बार और आयेगी वह यहाँ. उसन असमिया-अंग्रेजी शब्दकोश लिया और एक पतली सी पुस्तक असमिया में ली जिसे पढ़ना अभी शुरू नहीं किया है. कल छोटे भाई का पत्र आया है, उसके पत्र के जवाब में, उसे ख़ुशी हुई कि वह उनकी भावनाओं को अच्छी तरह समझ गया है. देर रात तक वह घर के बारे में ही सोचती रही, माँ-पापा के बारे में, जीवन के प्रति उनके दार्शनिक रुख के बारे में और उनकी खुशियों के बारे में जो वे किसी भी स्थिति में खो नहीं सकते क्योंकि वे किसी बाहरी वस्तु पर आश्रित नहीं हैं, वे पूर्णतया आंतरिक हैं, नितांत उनकी अपनी, जिनपर कोई बाहरी वस्तु असर नहीं डाल सकती, उसे भी अपने अंदर ऐसी ही शांति की तलाश है जो किसी भी तरह के बाहरी प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो, नितांत व्यक्तिगत. लेकिन उस शक्ति भरी शांति का दर्शन सभी को हो... और कभी नन्हा भी कह सके कि उसके माँ-पापा कभी मुसीबत में घबराते नहीं हैं वे नाना-नानी की तरह बहादुर हैं.





Tuesday, July 16, 2013

रसभरे गुलाबजामुन


चुप-चुप रहना कुछ नहीं कहना  
अपनी धुन में खोये रहना...

पीटीवी पर यह सुंदर गीत अभी-अभी सुना, जाने क्यों पाकिस्तानी संगीत उसे अंदर तक छू जाता है, राहत देता है. Soothing to nerves

देखो हरसूं फूल खिले हैं
साजन बरसों बाद मिले हैं
उनको हमसे बहुत गिले हैं
कितनी कलियाँ महक रही हैं
जब से उनके होंठ हिले हैं...

आज सुबह फोन की घंटी सुनकर बेड से उठी, आँख पहले ही खुल गयी थी. जून का संदेश था उनके सहकर्मी के द्वारा, वे लोग आज शाम की जगह कल सुबह  आ रहे हैं. माँपापा की ट्रेन २० घंटे लेट है. कल रात को देर तक नींद नहीं आ रही थी, बाद में स्वप्न में असमिया सखी से मिली, और दीदी से भी, वह भी डॉक्टर है, वह अपनी स्वास्थ्य समस्या के बारे में उन्हें बता रही है. रात से ही कभी-कभी हल्का दर्द होता है, उसने सोचा, क्या एक बार फिर उसे उस सब से गुजरना होगा. ईश्वर उसकी परीक्षा ले रहे हैं ! लेकिन इस बार दर्द सहना आसान होगा. पर हो सकता है दवा लेने से ही ठीक हो जाये, उसे कल या परसों डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए, उसे विटामिन सी, जिंक और प्रोटीन की जरूरत है, क्योंकि उसका जख्म देर से भर रहा है. आज से नियम से चार आंवले खाने शुरू करेगी, हर रोज दो सुबह, दो शाम को.

परसों माँ पापा आये और घर जैसे फिर से स्पंदन युक्त हो गया है. इतने सालों तक अकेले-अकेले रहने के बाद उन तीनों को सभी के साथ रहना अच्छा लग रहा है. इस वक्त वे दोनों आँख टेस्ट करने अस्पताल गये हैं. उसका मन शांत है और आँखों में मुस्कुराहट की कलियाँ चटख रही हैं. जून भी बहुत खुश हैं और नन्हा भी, पर कभी-कभी वह शांत हो जाता है. दीवाली को मात्र चार दिन रह गये हैं. कल पटाखे और दीए भी आ गये हैं. गुलाब जामुन के लिए गिट्स का पैकेट भी. जून उसके लिए एक बहुत सुंदर ड्रेस लाये हैं, अभी तक पहन कर नहीं देखी है, इतनी सुंदर है कि पहनने से डर लगता है. उसने अपनी एक सखी को फोन पर बताया, उसे अच्छा लगा होगा पर कुछ लोग ख़ुशी जाहिर करने में भी कंजूसी करते हैं. माँपापा भी उन तीनों के लिए कपड़े लाये हैं. उन दोनों को पसंद आए पर नन्हे के कपड़े खरीदना उन्हें उतनी अच्छी तरह से नहीं आता. कल लेडीज क्लब की एक महिला सदस्या ने अपना लेख भेज दिया एक ने आज शाम तक भेजने को कहा है. कल तक टाईप भी हो जायेंगे और शाम तक वह भिजवा देगी. आज दोपहर को हिंदी कक्षा के लिए भी जाना है.

जान कहके जो बुलाया तो बुरा मान गये
और न जो उनको बिठाया तो बुरा मान गये
आईना उनको दिखाया तो बुरा मान गये
वह थे बेहोश मुझे होश में लाने के लिए
और जब होश में आया तो बुरा मान गये  


पनीर टिक्का और बिरयानी



कई वर्ष पहले उसने पढ़ा था, हर व्यक्ति अंततः अकेला होता है, एक ही घर में बरसों तक साथ रहने वाले लोग भी एक दूसरे को पूरी तरह नहीं जान पाते, इन्सान खुद को तो जानता नहीं तो भी अन्यों को जानने का दम भरता है. लेकिन वह यह मानती थी कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा, वे एक दूसरे  को भली-भांति जानते हैं. लेकिन इस क्षण उसे लग रहा है, ऊपर की बात ही सही है. उसे लगा उनका रिश्ता भय पर टिका  है न कि प्रेम पर, या तुलसी दास की बात ठीक है, ‘भय बिन होत न प्रीति गुसाईं’.....या मीरा की भी, ‘जो मैं ऐसा जानती प्रीत करे दुःख होए’...हो सकता है वह ओवर रिएक्ट कर रही हो, शायद उसका मन अभी ठीक नहीं है, पर कल शाम को जो हुआ उसकी उसने कल्पना नहीं की थी, कल शाम एक मित्र परिवार मिलने आया, वह कमरे में लेटी थी, उठने का जरा भी मन नहीं था सो बाहर नहीं गयी, वे कुछ देर रुके फिर चले गये, उसे लगा कि जून कारण पूछेंगे और उसकी बात समझेंगे, पर उसे झेलना पड़ा उनका क्रोध. उसने सोचा, समझदार होने का, शांत रहने का, मन की बात मन में ही रखने का अधिकार तो स्त्रियों को जन्म से ही मिला हुआ है, यह तथाकथित समानता की बातें बस यूँ ही हैं.

कल वह उदास थी, आज नहीं है. जून और वह एक दूसरे के उतने ही करीब आ गये हैं, जितने तब थे जब उन्होंने एक-दूसरे को पहले-पहल जाना था.
आज हफ्तों बाद डायरी लिखने बैठी है, छोटी बहन आने वाली थी उसके पहले  ही सफाई आदि में फिर अपनी उसी स्वास्थ्य समस्या के कारण और उनके आने के बाद तो समय मिला ही नहीं. मिला भी तो एक दिन उसके शेफ पति से कुछ रेसिपीज नोट कीं. पनीर टिक्का, अरहर दाल, भरवां शिमला मिर्च और बिरयानी की रेसिपीज. उनका आना उन्हें उत्साह से भर गया. अभी सोचती है तो लगता है कितने खुश थे वे, सुबह से शाम तक बिना थके कभी यह काम कभी वह. और उसकी बिटिया की भोली शरारतें.... समय कितनी जल्दी बीत गया. आज शाम को जून भी जाने वाले हैं, परसों शाम को अपने माँ-पिता को लेकर आ जायेंगे. फिर कुछ दिन हँसी-ख़ुशी बीत जायेंगे.  आज सुबह कितने दिनों बाद उसने व्यायाम भी किया और पाठ भी. उसने मन ही मन नोट किया, उसकी पुरानी पड़ोसिन की दोनों ‘सेल्फ हेल्प’ की किताबें नियमित पढ़कर उसे वापस भी करनी हैं. कल शाम उसने कहा वह उदास लग रही है, शायद वह वाकई उदास थी पर उसे खुद इस बात का पता तक नहीं था. वह अंदर की बातें कैसे जान लेती है. कल दोपहर को प्राज्ञ की कक्षा लेने गयी थी, कोई नहीं आया, लगता है सभी के सभी भूल गये या उन्हें सूचना ही नहीं दी गयी थी.
जून इस समय गोहाटी में अपने मित्र के यहाँ होंगे, नॉर्थ-ईस्ट ट्रेन अभी आई नहीं होगी. वह उसके फोन का इंतजार करेगी, यह और बात है कि उसे तो केवल संदेश ही मिलेगा, सीधी बात नहीं हो सकेगी. आज धूप बहुत तेज है, सुबह से सोच रही है, शाम को बगीचे में काम करना है, देखें क्या होता है. शाम को उसकी पुरानी पड़ोसिन ने भी आने को कहा है. अभी नन्हे का प्रोजेक्ट वर्क भी बाकी है. उसका घाव अभी तक सूखा नहीं है, जून को बताना ही होगा कहीं ऐसा न हो कि फिर से... और क्या लिखे, मन है की इतनी सारी बातें एक साथ सोचने लगता है उन्हें सिलसिलेवार बैठाने का वक्त भी नहीं देता. मसलन कल जून ‘बनाना’ लाये थे कहा था, भूल नहीं जाना और वाकई वह अब तक भूली हुई थी, फिर यह कि प्याज और टमाटर खत्म हो गये हैं, मंगवाए या ऐसे ही काम चला ले. और अब नन्हे ने स्नान कर लिया है, उसका काम शुरू करवाना है. कल शाम वह उसकी बहुत फ़िक्र कर रहा था. उसे पापड़ सेंक कर ला दिया और.... अब वक्त नहीं है आगे कुछ लिखने का.