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Wednesday, October 25, 2017

मन का मौसम


कल रात्रि वे सोने गये ही थे कि जून के एक सहकर्मी का फोन आया. कहा, माँ की तबियत ठीक नहीं है, एम्बुलेंस बुला दें. जून ने फोन किया अस्पताल में फिर उनके घर जाने के लिए कार निकाली. उसके कहने पर कि साथ ले चलें, उन्होंने मना किया, पर जाने के कुछ देर बाद ही उसे बुलाने के लिए फोन आया. बुजुर्ग आंटी ने दस-पन्द्रह मिनट के कष्ट के बाद ही प्राण त्याग दिए थे. वह पैदल ही चलकर पाँच-सात मिनट के बाद ही वहाँ पहुँच गयी. उनकी सेविका, एक परिचित डाक्टर तथा वे दंपति वहाँ थे. ग्यारह बजे तक वे दोनों भी रुके, उसी मध्य कुछ और लोग भी आये. कई फोन भी आये. गृहणी बहुत परेशान थी. वह मृतक के चेहरे को देखते हुए वहाँ बैठी रही. रात को स्वप्न देखा जो कितना अजीब था. एक कुंड में अनेक मृत वृद्ध व्यक्ति एक के ऊपर एक पड़े हैं, पास ही तीन बूढ़े जिनमें एक महिला है, कुछ काम कर रहे हैं. कितना वीभत्स था वह दृश्य, कितना विचित्र, उनके अंग बड़े-बड़े थे. फिर नींद खुली. पंछियों की आवाजें भी रात्रि को स्पष्ट सुनीं, वे वास्तविक थीं या .....कितना रहस्यमय है यह संसार.. और फिर तितलियों को उड़ते देखा. तितलियाँ आत्माएं हैं जो इधर-उधर उड़ रही हैं. इस समय शाम के सवा सात बजे हैं. वे अभी-अभी उस घर से आ रहे हैं. सुबह साढ़े छह बजे वहाँ गये थे. दस बजे के लगभग पंडित जी आये और मृत देह को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया. वह वहीं रुकी रही, घर आकर नहा-धोकर दुबारा गयी. जून श्मशान से एक बजे लौटे तब वे घर आये, भोजन नैनी ने बना दिया था. भिजवाया व खाया. जून दफ्तर चले गये, उसने आधा घंटा विश्राम किया, एक स्वप्न पुनः देखा. इस परिवार से उनका आत्मीय संबंध है. आंटी के साथ भी प्रेम का रिश्ता था. इसी से जुड़ा स्वप्न था. अहसास बहुत तीव्र था, देह में उसे महसूस किया और नींद खुल गयी. एक कर्म बंधन छूट गया.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. जून क्लब गये हैं, एक प्रेजेंटेशन है. अभी-अभी बड़े भाई से बात हुई, वह अपने लिए रोटी बना रहे थे, सब्जी सुबह की बनी हुई रखी थी. कितना कठिन होगा उनके लिए भाभी के बिना रहना. समय के साथ शायद सब ठीक हो जायेगा, ईश्वर उन्हें शक्ति देगा. मंझली भाभी से बात की, वह उनका ध्यान रखती है, अभी तो भाई भी है. छोटा भाई भी रात को उनके घर ही सोयेगा. सभी के सहयोग से वे जीने का सम्बल जुटा ही लेंगे, ख़ुशी-ख़ुशी जीने का, एक महीने बाद उनकी बिटिया भी आ जायेगी. आज सुबह बादल बने थे पर वर्षा उनके प्रातः भ्रमण से लौटकर आने के बाद ही आरम्भ हुई, जो बाद में दिन भर होती रही. आज सुबह भीतर से आवाज आई कि प्रतिपल सजग रहो, परमात्मा सजग है, हर पल सजग..उसकी सजगता शाम को खो गयी थी पल भर के लिए..जून उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उन्होंने उसे कितनी सहजता से लिया. व्यर्थ की बातचीत उनकी ऊर्जा को  नष्ट ही करती है. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को स्कूल की पत्रिका व दिल्ली स्थित क्लब की पत्रिका के लिए लेख व कविता भेजी. अभी लेडीज क्लब की वार्षिक प्रतियोगिता के लिए के लिए लेख व कहानी लिखने हैं. शाम को देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘पशु’ पढ़ी, उसके बाद उन्हीं मित्र के यहाँ गये. उनकी पुत्री भी आई है जिसके विवाह की प्रथम सालगिरह है आज.   

कल सुबह से वर्षा हो रही है, जो अभी तक नहीं थमी. परसों दोपहर या रात को, अब कुछ याद नहीं. ओशो को देखा. उनकी श्वेत दाढ़ी है, एक तख्त पर लेटे हैं, कुछ जन सामने बैठे हैं, वह भी है और उनसे एक सवाल पूछती है. परिवार साधना में साधक है या बाधक है. वह क्या कहते हैं, ठीक से नहीं सुन पायी पर भाव था साधक है. उससे पहले वे बातें कर रहे थे, अनोखा स्वप्न था. कल लिख ही नहीं पायी, आजकल उसकी नींद गहरी हो गयी है. कल दोपहर को सोयी तो समय व स्थान का कोई ज्ञान ही नहीं रहा. गहरी नींद भी एक तरह की समाधि होती है. अभी बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी ने कल से जॉब पर जाना शुरू किया है. वह बैंक के लिए परीक्षा भी देना चाहती है. अब उसके भीतर कुछ करने का जज्बा जगा है. जून ने कहा उनके मन का मौसम भी सदा एक सा रहता है आजकल, उसे कभी लगता है सेवा का कोई विशेष काम वह नहीं करती, फिर भी संतोष होता है, लेखन का कार्य भी सेवा का ही माना जा सकता है. नेट पर कितना कुछ पढ़ने को, जानने को मिलता है. आज श्री श्री का भाषण सुना जो उन्होंने यूरोपियन पार्लियामेंट में दिया था, ‘द योगा वे’ अभी-अभी एक ज्योति बि९न्दु डायरी पर दिखाई दिया, परमात्मा जैसे आश्वस्त करने आया हो. अस्तित्त्व को उनकी फ़िक्र है, वे उसके ही भाग हैं. वे उससे जुड़े रहकर ही खुश हैं !   

Wednesday, September 14, 2016

बच्चों की पार्टी


अभी-अभी दो सखियों और वृद्धा आंटी से बात की. कल रात जो पंक्तियाँ लिखी थीं, उनके आधार पर एक कविता लिखी. ऊर्जा जो बहती रहे वही सफल है. एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना है. भोजन, जल, सूर्य, नींद तथा श्वास सभी तो ऊर्जा के स्रोत हैं, वे लेते ही लेते हैं, लेकिन जब तक देना शुरू नहीं कर देते तब तक उनके भीतर ऊर्जा दोष पैदा करना शुरू कर देती है. रचनात्मकता तभी तो उन्हें स्वस्थ बनाये रखती है. वे एक माध्यम बन जाएँ जिसमें से प्रकृति प्रवाहित हो और अपना काम करती जाये. वे कोई बाधा खड़ी न करें उसके मार्ग में, सारा खेल ऊर्जा का ही है ! मन भी ऊर्जा है और तन भी ! सब चेतना ही है, एक ही तत्व से यह सारा अस्तित्त्व बना है !

आज पिताजी काफी ठीक हैं, पहला सुख निरोगी काया ! वे स्वस्थ रहें तो दुनिया भी सुंदर लगती है वरना सब व्यर्थ मालूम देता है. आज सुबह से ही मन ध्यानस्थ नहीं है. रात को अद्भुत स्वप्न देखा. बच्चों की एक पार्टी है उसमें बच्चों के चेहरे रंगे हैं. एक बच्ची कुछ मन्त्र पढ़ती हुई एक वस्तु उसकी तरफ लाती है और उसका ध्यान लग जाता है. समाधि की अवस्था का अनुभव किया, फिर जब होश आया तो वह अपने स्थान से दूर थी, उड़कर वह वहाँ पहुंची ? अजीब था यह स्वप्न, उनके भीतर अनेक सम्भावनाएं हैं, जिन्हें वे साकार कर सकते हैं, पर वे छोटी-छोटी बातों में लगे रहते हैं. दोपहर भर कम्प्यूटर पर थी, एक नई कविता लिखी, ‘हवा’. गति ही जीवन है, इसलिए बुढ़ापा कितना दुखमय हो जाता है. कुछ नया करने की चाह ही उन्हें सदा युवा बनाये रखती है. कितना कुछ करना शेष है, लेकिन इस करने में आनंद बिखरे, न कि आनंद की लालसा बनी रहे..आनंद की झलक मिले उनके कृत्यों से तभी तो वे अपने अंशी का प्रतिनिधित्व कर पाएंगे.

कल उसकी ‘हवा’ कविता पर तीन प्रतिक्रियाएं मिलीं. नन्हे को भी अच्छी लगी. आज भी सुबह से मन शांत है. उल्लास से चहक नहीं रहा है. सद्गुरू की कृपा सदा उसके साथ है. यह मन ही तो उपद्रव का कारण है, कौन है ‘वह’ जो अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है, कविता भेज दी अब प्रतिक्रिया पाना चाहता है, पहले तो ऐसा नहीं था, पहले कौन पढ़ता ही था उसकी कविताएँ, अब तो उसे पाठक मिले हैं, कौन है जो चाय या कॉफ़ी पीकर तृप्त होना चाहता है, जबकि पता है दोनों शरीर के लिए जरूरी नहीं हैं. कौन है जो कभी-कभी क्षण भर के लिए परेशान हो जाता है, इसका अर्थ हुआ कि जिसे नियंत्रित मानती थी वह मन उसके नियन्त्रण में नहीं है, अर्थात प्राण ऊर्जा शरीर में घट गयी है, अर्थात भीतर अशुद्धि है. विक्षेप, मल, आवरण है. गुरूजी कहते हैं भीतर शुद्धि नहीं है तो मन बेवजह उदास रहता है. उपाय है भोजन कम खाए, चबाकर खाए, और भूख लगने पर ही खाए !

आज जून पिताजी को लेकर डिब्रूगढ़ गये हैं. स्वयं के भी अस्वस्थ हो जाने की जो बात वह माँ को चिढ़ाने के लिए कहते थे, वह सत्य हो गयी है. उनके चले जाने पर माँ अपनी आदत के अनुसार उससे पूछने आयीं, अब वह तो नहीं चली जाएगी उन्हें अकेला छोड़कर, उन्हें लग रहा था पिताजी उन्हें जानबूझ कर छोड़ कर गये हैं. उनके स्वास्थ्य के प्रति कोई सरोकार नहीं दिखाया. उसने कहा, आप समय पर दवा नहीं खातीं, पिताजी इसलिए बीमार हो गये हैं और जून भी, पर बाद में लगा यह बात ठीक नहीं है, हर कोई अपने दुखों के लिए खुद ही जिम्मेदार है. कोई अन्य इसका जिम्मेदार नहीं हो सकता. माँ यह कहती हुईं लौट गयीं कि उन्हें और परेशान कर दिया उसने. उसे अच्छा नहीं लगा, उन्हें लेटने को कहा पर तब से बैठी ही हैं. वृद्धावस्था में व्यक्ति कितना बेबस हो जाता है, हरेक को इस अवस्था से गुजरना है, बच्चा बनने का शौक है तो बूढ़ा भी बनना ही होगा !


Tuesday, December 8, 2015

केक की ख़ुशबू


मन की शक्तियाँ जब बढ़ती हैं तो दैवीय सत्ता भीतर जगने लगती है. वे जब पहले बार इस धरा पर आये थे तो देवता स्वरूप थे. उस देवत्व को उन्होंने दबा दिया है पर वह रह-रह कर उन्हें अपनी सत्ता से परिचित कराता है. वे देवताओं के वशंज हैं, अमृत पुत्र हैं, सद्विवेक उनका स्वभाव है. आज उनका विवेक ढक गया है पर भीतर वह पूर्ण जागृत है. उन्हें उसे बाहर निकालना है. सृजन और मनन की शक्ति भीतर है. व्यर्थ के विचारों को यदि आवश्यक विचारों में बदल दें तो उनकी क्षमता पांच गुणी हो जाएगी. मन शांत हो तो सद् संकल्प उठते हैं, सहज ज्ञान भी तभी होता है जब मन अडोल होता है. परमात्मा के प्रति प्रेम भी तभी जगता है. जो उसका है वह उन का भी है यह यकीन होने लगता है. तब वे संसार के लिए भी उपयोगी बनने लगते हैं, परमात्मा उनके द्वारा काम करने लगता है. जीवन उत्सव बनने लगता है !

परमात्मा को मिलना कठिन नहीं है, जो वस्तु उनके पीछे है, उसे देखने के लिए कोई दूरबीन लगाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसके सम्मुख होने की आवश्यकता है. भगवान चुनौतियाँ परिवर्तन के लिए देते हैं, क्योंकि परिवर्तन के बिना कोई आगे नहीं बढ़ सकता, अपनी शक्तियों से परिचित नहीं हो पाता. आज गुरु पूर्णिमा है, उसने गुरूजी की आवाज में रिकार्ड किया स्पेस मेडिटेशन किया. शाम को सत्संग है तथा गुरू पूजा भी. जो आत्मज्ञान प्राप्त करता है, हृदय से अज्ञान अन्धकार मिटाता है, जो कण-कण में व्याप्त पर नजरों से छिपे तत्व को उजागर कर देता है, वह सद्गुरु उनके नमन का पात्र है. जो सिद्ध है, अरिहंत है, तीनों गुणों से परे है, जो आत्मा को हस्तामलकवत् देखता है, जो ईश्वर को जानता है ऐसा सद्गुरू जो उनके संशयों को दूर करने की क्षमता रखता है, उनके नमन का पात्र है. आज सुबह समय से उठी, साधना का क्रम भी ठीक चला. रात को सोने में देर हुई. तिलक, टीका, मन्दिर, मूर्तिपूजा पर आचार्य रजनीश के विचार अद्भुत हैं, सुनती रही, कितना विस्तृत ज्ञान है उनका, कितनी तक्ष्ण मेधा और कितनी तीव्र याददाश्त. उनकी तीसरी आंख खुल गयी है. जब कि वे  मस्तिष्क का आधा हिस्सा भी इस्तेमाल नहीं कर पाते, कोई कहता है कि दस प्रतिशत से भी कम उस क्षमता का प्रयोग मानव करता है जो प्रकृति ने उसे दी है. यह सृष्टि न जाने कितनी बार बनी और नष्ट हुई और कितनी बार मानव ऊंचाइयों पर पहुंचा है और कितनी बार गिरा है. वे आगे बढ़ें यही उनकी नियति है, उन्हें बढ़ना ही है !


शरीर, श्वास, मन, प्राण, भाव ये पांच मिलकर जीवन है. सभी एक दूसरे को प्रभावित करते हैं. भाव वे सूक्ष्म स्पंदन हैं जो भीतर से आकर स्थूल देह को संचालित करते हैं. प्राण धारा यदि सबल हो तो देह स्वस्थ रहती है. श्वास भी नियमित रहती है. भाव ही मन को भी प्रभावित करते हैं. आज वर्षा थमे दूसरा दिन ही है और अभी सुबह के दस भी नहीं बजे हैं पर गर्मी तेज हो गयी है. घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है, सो आज ध्यान में नहीं बैठी. समय का सदुपयोग किया एक सखी के लिए केक बनाकर, केक की खुशबू आ रही है जैसे कल उसे आ रही थी, कल उसके यहाँ जन्मदिन की पार्टी थी. उनके भीतर जो चेतन शक्ति है, उसका ज्ञान हो जाने के बाद वे कालातीत हो जाते हैं, भूत तथा भविष्य से परे पूर्ण वर्तमान में रहना सीख जाते हैं, सखी को उसने बताया पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण शांति वर्तमान में ही है. उनके घर काम करने वाली नयी नैनी को उसने कहा दस बजे अपने अपाहिज पति को लेकर आए जिससे प्राणायाम सिखा सके पर वह नहीं आई है. किस्मत में हो तभी यह अमूल्य विद्या प्राप्त हो सकती है. वह नहीं आया तो क्या हुआ, वह स्वयं जाकर उसे सिखा सकती है, अभी-अभी पता चला कि वह चादर पहन कर बैठा है, सारे कपड़े धोने के लिए भिगा दिये हैं, कल आएगा ! कल जून दिल्ली जा रहे हैं एक हफ्ते के लिए, सो समय ध्यान-साधना में बीतेगा, घर की सफाई, सत्संग, संगीत तथा स्वाध्याय और सेवा में भी. सासुमाँ आज सुबह के भ्रमण के समय मिलने वाली अपनी एक परिचिता से किताब के पैसे उनके देने पर ले आयीं फिर नौ बजे वापस करने गयीं, लौटते में धूप लग गयी ऐसा कह रही हैं. शरीर को वे कितना सुकुमार बना लेते हैं. अभी ध्यान कर रही हैं.     

Monday, November 25, 2013

दूब घास पर दो कदम


उगती हुई सुबह और डूबती हुई शाम दोनों मन, प्राण को ऊर्जा से भर देती हैं. सुबह गुलाबी सूरज का मुखड़ा सलेटी बादलों से झांकता नजर आया जब जून सुबह बस स्टैंड गये थे और अभी शाम को बगीचे में काम करने के बाद नन्हे का इंतजार करते हुए झूले पर बैठकर वह नीले आकाश में चमकते पीले चाँद को देख रही थी. ठंडी मंद हवा सहला रही थी और आसमान में चमकता पहला तारा जैसे कोई संदेश दे रहा था. आज बहुत दिनों बाद मिट्टी में काम किया, अच्छा लगा, यह अलग बात है कि खुरपी से काम शुरू करते ही हाथ में चोट लगा ली. माली ने कल से आना शुरू किया है, पहली बार दूब घास को मशीन से काटा, सर्दियों में सूख गयी है, दो तीन महीने बाद एकदम हरी हो जाएगी. आज सुबह ही सुबह छोटी बहन और छोटे भाई से बात की, बहन के यहाँ नया मेहमान आने वाला है और भाई का मकान बनना शुरू हो गया है. माँ-पिता दिल्ली में हैं. कल शाम क्लब में एक बच्चे के साथ, जिसका नाम पारिजात था, बाहर घास पर बैडमिंटन खेला, कोर्ट खाली नहीं था.

कुदरत में सुंदर रंग बिछे
अनगिन गंधों के खिले फूल
धरती पर अनुपम चित्र खिंचे
ह्रदयों में कैसे बिंधे शूल

सुमनों उर से उल्लास उड़ा 
तितली पंखों से चुरा उमंग
भ्रमरों के गुंजन को भर के
थिरका मन ज्यों जल में तरंग

कल ‘बंद’ था और आज नन्हे की स्कूल बस नहीं आई, जून कार से ले गये हैं. कल दिन भर बादल और सूरज आँख मिचौनी खेलते रहे, एक बार तो मूसलाधार वर्षा भी शुरू हो गयी, बंद सुबह ४ बजे से शाम के ७ बजे तक था, सो कहीं जा भी नहीं सकते थे. कुछ देर नन्हे को पढ़ाया, पहली बार इस मौसम में मेथी पुलाव बनाया. सुबह फोन पर कुछ सम्बन्धियों से बात की, एक का लहजा वही पुराना था, इन्सान यदि बदलने की कोशिश करे तभी तो बदलेगा न जैसे वह ब्रिटिश ऑफिसर  MRA ज्वाइन करने के बाद बदल गया था Mr Jordine. MRA के चार सिद्धांत भी अनुकरणीय हैं – Absolute Honesty, Absolute Purity, Absolute Unselfishness, Absolute Love कई बार इन्हें याद करके अपने को संयत किया किया पिछले दिनों उसने.

आज इस वक्त सुबह से पहला मौका है जब वह स्थिर महसूस कर रही है, कल दोपहर बाद से ही सिर भारी था, शायद यह किसी हारमोन की करामत है कि पता नहीं क्या है दिल खोया-खोया सा ही रहता है, किसी जगह टिक कर बैठता नहीं, रात को कुछ देर ध्यान में बैठी तो अच्छा लगा. कुछ देर पहले बाहर गयी तो देखा उनकी नैनी अपनी रजाई को बाहर धूप में रख रही थी, उसे देखकर बहुत आश्चर्य हुआ, रजाई के नाम पर कुछ थिगड़ों को जोड़ा हुआ था, उसने सोचा कि उन्हें नई रजाई बनवा कर देगी, कल बाजार जाकर धुनिया को कहकर आएगी. कल सोमवार है, उसका व्यस्ततम दिन.. पूरे हफ्ते का, उम्मीद है कल से सब ठीक हो जायेगा, जिसकी शुरुआत अभी से हो गयी है.

अभी तक स्वीपर नहीं आया है, घर गंदा पड़ा है... अब इस बात पर इतना परेशान होने की क्या जरूरत है, आदत सी बना ली है उसने परेशान होने की और रहने की भी, हर वक्त एक अह्सासे कमतरी का शिकार खुद को बनाये रखना कहाँ तक ठीक है, हर पल यह अहसास कि समय का, अपने दिमाग का सदुपयोग नहीं कर रही है, चाहिए तो यह कि जिस वक्त जो काम करे खुशी के अहसास के साथ, शायद हारमोनों का असर कम हो रहा है. खुदबखुद दिल हैरान परेशान हो जाता है और फिर खुदबखुद ही खुश होने के उपाय सुझाता है, मन का भी यह कैसा रंगीन अजीब करिश्मा है.  आचार्य गोयनका जी कहते हैं इसी मन को तो साधना है तभी धर्म जीवन में उतरेगा. धर्म को धारण करना है न कि उसकी पूजा करनी है. मन को विचारों से मुक्त करना है...किसी भी तरह के तुच्छ विचार को दिल में जगह नहीं देनी है. बीज यदि शुद्ध होगा तो फल स्वयंमेव अच्छा होगा. 

Wednesday, January 23, 2013

सत्यजीत रे की गण शत्रु



पंजाबी दीदी अगले हफ्ते बुधवार को यहाँ से सदा के लिए जा रही हैं, मंगल को वे लोग उनके यहाँ आएंगे और एक रात रहेंगे, अगले दिने वे उन्हें छोड़ने भी जायेंगे. कल रात यह सुनकर वह उदास हो गयी, जून के प्रश्न का उत्तर भी ठीक से नहीं दिया, पर उसने कितने धैर्य का परिचय दिया. पता नहीं उसे क्या हो गया है, क्यों झुंझलाहट होती है, वह किससे नाराज है ? उसे खुद भी समझ नहीं आता. नन्हा फिर उसे कैसे समझाता है. पर वह इतना जानती है बादलों के पीछे से सूरज फिर से निकलेगा..फिर से वह मुस्कुराएगी और अपने आप से शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा.

कल शाम को कोलकाता के नर्सिंगहोम में महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे का देहांत हो गया. टीवी पर उनकी फिल्म “गणशत्रु” दिखाई जा रही है.

गीत वह जो प्राण भर दे
सदियों से सुप्त उर में
भीषण हुंकार भर दे !

दस दिशाएं गूंज उठें
भीरु कातर इस नगर में
शक्ति का संचार कर दे !

आज फिर संयोग हुआ है अपने करीब आने का, कल एक मित्र के यहाँ गयी थी, अच्छा लगा उससे बातें करके. यह क्या..अपने करीब आने का मौका भी दूसरों के पास जाने में गंवा देना चाहती है...इंसानी मन ही ऐसा है, यह नहीं सोचता कि वह स्वयं क्या है ? क्या सोचता है ? बल्कि ज्यादा यह कि दूसरे क्या सोचते हैं ? जबकि इन दूसरों का जरा भी दखल नहीं होता उनकी जिंदगी में. उस दिन पंजाबी दीदी की प्यारी सी चिट्ठी मिली, आज वह भी उन्हें लिखेगी. एक किताब पढ़ रही है, रोमांचक तो है थोड़ी खतरनाक भी है, क्या लेखिका हैं! उसने पिछले कई दिनों से एक पंक्ति भी नहीं लिखी, समय न मालूम कैसे गुजर जाता है, कुछ हाथ का काम भी नहीं किया. सेंट्रल स्कूल में कक्षा एक में पढ़ने के लिए कल नन्हे का एडमिशन टेस्ट हो गया, तीन दिन बाद रिजल्ट आएगा. इस समय वह भी डायरी लिख रहा है. बचपन में कितनी तुकबन्दियाँ की थीं उसने, कभी किसी ने पढ़ी नहीं, वक्त ही कहाँ था, माँ-पिता के लिए इतने बड़े परिवार को चलाना क्या आसान था ? लेकिन नन्हे को वह पूरा वक्त दे सकती है, उसे पढ़ा सकती है.

आज मौसम बहुत अच्छा है, ठंडा-ठंडा शांत सा..रोजमर्रा का काम तो हो गया है पर सोचा था फ्रिज साफ करना है, वह नहीं हो पाया, घर-गृहस्थी के कामों का कोई अंत ही नहीं है, स्टोर  की सफाई फिर ड्यू हो गयी है और किताबों वाला रैक भी आवाज दे रहा है, पर थोड़े से पल शांत बैठकर अपने आप से बातें करना भी शायद उतना ही जरूरी है, पर बीच में यह ‘शायद’ क्यों? कल जून तिनसुकिया गए थे उनकी कार में कुछ खराबी आ गयी थी, लौटे तो बहुत थके थे, झुंझला गए. पर रात को जब उन्होंने अपने-अपने मन को टटोल कर देखा तो वहाँ एक दूसरे के सिवा कुछ था ही नहीं.

आज जून किसी मेहमान को लंच पर साथ लाने वाले हैं, उसकी सुबह किचन में ही बीती, साढ़े दस बज गए हैं अभी मेज सजाना शेष है और सलाद आदि भी. लेकिन ऐसी व्यस्तता उसे भली लगती है. लगता है कि वह है, जीवित है, स्पंदन है. उसे ही फोन करना पड़ा अपनी मित्र को जब पता चला कि उसकी तबियत ठीक नहीं है तो रहा नहीं गया, पर जिस स्तर पर वह चाहती है उस स्तर पर सम्बन्ध बन नहीं पाते, निस्वार्थ..अपनेपन से भरे..यह मृगमरीचिका ही रहेगी उसके लिए.

नन्हा साईकिल चलाना चाहता है, उसकी पढ़ाई आजकल बिलकुल नहीं हो पाती है. नए स्कूल में उसका दाखिला हो गया है. वे लोग घूमने गए, जून ने उसे जन्मदिन का उपहार ले दिया, दो सूट के कपड़े - नीले कपड़े पर सफेद फूल और काले कपड़े पर सफेद फूल.. नन्हे को भी उसकी पसंद का एक गिफ्ट, उसके अच्छे रिजल्ट के लिए. उस दिन मंदिर में उसने भगवान से शांति की प्रार्थना की थी, वह सुन ली गयी है...ईश्वर अब भी उसकी बात सुनते हैं. बहुत दिनों बाद ढेरों फूल खिले हैं मन में और एक सफेद व बैंगनी रंग का एक नया फूल उनके बगीचे में भी खिला है पहली बार..