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Tuesday, June 11, 2019

स्वप्न और जागृत



आज दीदी के विवाह की सालगिरह है. उनसे बात की तो पता चला पार्टी शाम को है, बड़ी बिटिया आएगी, जो उनके ही शहर में रहती है, बाकी बच्चे तो समुद्र पार विदेशों में हैं. कल छोटी ननद के विवाह की रजत जयंती थी, बधाई दी तो पता चला, वे लोग आगरा में थे. बड़ी ननद से भी भांजी के घर आने के बारे में हुई, शायद उसे अच्छा न लगा हो, बच्चों के जीवन की हलचल से माता-पिता अछूते कैसे रह सकते हैं. जीवन में कभी-कभी कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं. परमात्मा की इस सृष्टि में प्रतिपल विनाश भी घटता है. वे त्याग के महत्व को नहीं समझते तभी तो इतनी चिंता घेरे रहती है. उसके द्वार पर खाली होकर ही जाया जा सकता है. वह इतना अपार है कि उसे स्थान तो चाहिए. कल जो कविता ब्लॉग पर पोस्ट की थी, आज दो अन्य स्थानों पर प्रकाशित हुई है. कितनी कविताएँ अभी उसके भीतर हैं व्यक्त होने की प्रतीक्षा में...

आज सुबह कैसा स्वप्न देखा. एक बड़े से हॉल में लोग बैठे हैं. वह एक मंच पर है, उसके हाथ में माइक है. कोई साधु आते हैं. लोग उनके दर्शन करते हैं. बाद में उसे बोलने को कहते हैं. वह बोल रही है. शायद गुरूजी के यहाँ आने की स्मृति ही स्वप्न बनकर प्रकट हुई है. कल वे बंगलूरू की एक और यात्रा पर जा रहे हैं.

शाम के सवा चार बजे हैं. एक सप्ताह बाद वे घर लौट आये हैं. इतने दिनों बाद अपने घर में, कमरे में बैठकर टीवी पर 'वैदिक चैनल' में सुंदर वचनों को सुनने का अवसर मिला है. जून बाजार से सब्जियां व फल ले आये हैं.

आज मौसम ज्यादा गर्म नहीं है. सुबह तो हवा में हल्की ठंड भी थी. आज मृणाल ज्योति गयी, उसके पहले एक परिचिता के यहाँ, उसकी सासूजी का श्राद्ध था, जब वे नहीं थे. वहीं पता चला स्कूल की प्रिंसिपल अस्वस्थ हैं और वाइस प्रिंसिपल का पुत्र भी अस्पताल में है. स्कूल गयी तो दो अन्य वरिष्ठ टीचर भी किसी कारण वश नहीं थे. स्कूल के संस्थापक मिले, कहने लगे, एक दिन तो सब कोई चले ही जायेंगे, कोई सदा के लिए रहने वाला नहीं है. विशेष बच्चों का स्कूल चलाना इतना सरल कार्य नहीं है. क्लब की सेक्रेटरी का फोन आया, शाम को मीटिंग है. इसलिए आज दोपहर को ही उसने योग के लिए साधिकाओं को बुलाया है.

आज सुबह दस मिनट देर से उठी. रात को होश की साधना करते-करते सोयी थी. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में खोयी आत्मा अपने सच्चे स्वरूप को विस्मृत कर देती है और माया के जाल में फंस जाती है. साक्षी भाव टिक नहीं पाता देर तक. भीतर के अहंकार की गंध ही बाहर क्रोध के रूप में प्रकट होती है. जब तक भीतर अहंकार है तभी तक दुःख है. ईर्ष्या, द्वेष तथा अन्य विकार भी तभी तक हैं. जब भीतर और बाहर सम हो जाएँ तब ही वे सुरक्षित हैं. परमात्मा साक्षी है, वह अपने से भी निकट है. वही तो है भीतर. वह जैसे होकर भी नहीं है, पर सब कुछ है, वैसे ही आत्मा शून्य भी है और पूर्ण भी. पूर्णता का अनुभव तभी हो सकता है जब शून्यता का अनुभव हो जाता है. न होना जब स्वभाव का अंश हो जाता है, जब भीतर असंगता छा जाती है. बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर कुछ पोस्ट किया.



Sunday, October 25, 2015

शिव के सर्प


 चिंता करना घोर अज्ञान है तथा घोर अहंकार की निशानी है, आज यह वचन सुन कर उसे लगा तब तो जो भी परिस्थिति जीवन में आती है उसे स्वीकार करना ही ज्ञान है. भूत में जो घट गया है वह बदलने वाला नहीं, भविष्य अभी अज्ञात है, कोई इस ज्ञान में प्रतिपल रहे तो मुक्त ही है. आत्मज्ञान के बाद चिंता हमेशा के लिए दूर हो जाती है, भीतर इतना आनंद रहता है कि भीतर ही सारे समाधान मिलने लगते हैं. साधक को तो बस पुरुषार्थ करते हुए अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करना है, व्यर्थ के विवादों से स्वयं को बचाना है. हरेक की मांग है सच्चा सुख, तृष्णा है झूठे सुख की लालसा.. तृष्णा जब तक नहीं मिटती तब तक विकार खत्म नहीं होते, ब्रह्म का सुख तब तक नहीं मिलता. जिस समय कोई अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करता बल्कि भूल का बचाव करता है तो भूल और भी दृढ़ होती है. प्रकाश की उपस्थति में ही जैसे कोई जगत का कार्य करता है, प्रज्ञा के प्रकाश में ही सही-गलत का भास होता है. वस्तु के त्याग को त्याग नहीं कहते बल्कि वस्तु के प्रति मूर्छा, मोह के त्याग को ही त्याग कहते हैं, इच्छा का त्याग नहीं इच्छा के प्रति ज्वर के त्याग को ही त्याग कहते हैं. बाहर का त्याग अहंकारी बनाता है, अहंकार से जो भी कोई करता है वह दुगने जोर से वापस आता है. बाह्य क्रिया कर्म के उदय से होती है, क्रिया करके कोई लक्ष्य को नहीं पा सकता.   
आज शिवरात्रि है, सद्गुरु को बोलते हुए सुना. शिव ही आत्मा है, शिव का नंदी मानो देह है, शिव मन्दिर में प्रवेश करना हो तो पहले नंदी का दर्शन होता है, जिसका मुँह शिव की तरफ है पर मध्य में कछुआ है अर्थात इन्द्रियों को अंतर्मुख करके ही कोई आत्मा तक पहुंच सकता है. मन्दिर का द्वार छोटा है सो झुक कर जाना होगा. शिव तत्व पाँचों भूतों में ओत-प्रोत है, जो तीनों अवस्थाओं में व्याप्त है, पर तीनों से परे भी है. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति का व साक्षी है, उसी तत्व में स्थित होकर सद्गुरु उपदेश करते हैं. वह हृदय से बोलते हैं, उसी में मस्त रहते हैं. सौम्य भाव में रहते हैं. सभी को उस तत्व को अपने भीतर पाना है. उसने प्रार्थना की, शिवरात्रि का पावन दिन सभी के लिए शुभ हो, भीतर का संगीत सभी को सुनाई दे, भीतर का प्रकश सभी को दिखाई दे. कल रात्रि स्वप्न में उसने बड़े-बड़े सर्प देखे पर वे जरा भी डरे नहीं. पानी में, पत्थरों पर, चट्टानों पर वे आराम से लेटे थे, एक की सिर्फ पूँछ दिख रही थी. उन्हें रास्ते में कई अन्य बाधाएं भी आयीं पर वे उन्हें पार करते आगे बढ़ते रहे, सर्प तो शिव भी धारण करते हैं, उसे लगता है यह उन्हीं की कृपा थी, सद्गुरु की कृपा का अनुभव कल सत्संग में हुआ था ! आजकल उसके भीतर का आनन्द जैसे कई गुणा बढ़ गया है, कई बार सहज ही नृत्य होने लगता है और कई बार हास्य फूट पड़ता है, भीतर कुछ घट रहा है, जीवन एक उत्सव बन गया है. जीना अर्थात अंतहीन ख़ुशी..भीतर की ख़ुशी. इसका बाहर की स्थिति से कुछ भी लेना-देना नहीं है, इसका स्रोत भीतर है, छिपा हुआ जो अब प्रकट हो रहा है !

स्वप्नों की कड़ी में जब कोई स्वप्न नींद खोल दे, जाग्रत कर दे, वह नींद का अंतिम स्वप्न होता है, इसी प्रकार साधना जन्मों-जन्मों के स्वप्न का अंतिम स्वप्न है. जिसने साधना के पथ पर भी कदम नहीं बढ़ाया उसकी नींद अभी बहुत गहरी है. सद्गुरु जीवन को कितना सुखमय बना देते हैं, उनसे मिलने के बाद दृष्टि ही बदल जाती है. भाव शुद्ध हो जाते हैं, भावनाएं बदलने लगती हैं, सूक्ष्म मोह भी हटने लगता है भीतर न जाने कितनी गाठें हैं पर उसे लगता है वह मुक्त हो रही है. पिछले कई महीनों से उसकी लोभ की ग्रन्थि टूटती जा रही है. उसका हर व्यय किसी और के लिए होता है. अपने लिए जब कुछ चाहिए भी नहीं तो व्यय हो भी कैसे ? भीतर कैसा आनंद रहता है, मन नृत्य करता है और अधरों से कैसी हँसी फूटती है. उसे सब कुछ अच्छा..बहुत अच्छा लगता है, सभी अपने लगते हैं, सभी निर्दोष दीखते हैं. यह कैसा बदलाव आ गया है भीतर. चेतना का कोई भार नहीं होता, वह चेतना है यह भाव जैसे-जैसे दृढ़ हो रहा है, हल्कापन लगता है !     



Thursday, August 14, 2014

मन के मंजीरे -शुभा मुद्गल


कुछ देर पूर्व छोटी बहन का फोन आया, जब वे बच्चों और पिताजी के साथ पहाड़ों पर सुबह की सैर से वापस लौटी. भांजी से बात नहीं हो पाई है अभी तक. आज शाम को जून अपने एक विभाग में आये अतिथि को चाय पर बुला रहे हैं. उसने सोचा है वह पाव-भाजी बनाएगी, वे बंगाली हैं तो बाजार से जून रसगुल्ले भी लेते आएंगे. नन्हे के लिए वे कोलकाता से अभी से ISC physics books लाये हैं दसवीं व बारहवीं की. जून लंच पर आये तो उसने उन्हें उड़िया सखी के फोन की बात बताई, वह उससे पूछ रही थी कि क्या वह English classes में जाएगी जो एक परिचिता अपने घर पर लेने वाली हैं. जून का जवाब ‘न’ होगा यह सोचकर उसने मना कर दिया था, पर अब वह कहते हैं कि वह जा सकती है सो उसने सोचा है इस हफ्ते वह तीन दिन घर पर ही दूसरे कमरे में बैठकर पढ़ेगी, यदि जून और नन्हे को कोई असुविधा नहीं हुई तो अगले हफ्ते से ज्वाइन कर लेगी. उस दिन जो किताब लाइब्रेरी से लायी थी उसमें से एक कहानी पढ़ी, कुछ ऐसा ही उसके साथ हुआ था जब वह स्कूल जाती थी. इसलिए उनकी राय जाने बिना ही मना कर बैठी. लेकिन इसका कोई अफ़सोस नहीं है उसे, न ही यह समझौता है बल्कि इससे त्याग के महत्व का पता चला है. अपनी आवश्यकताएं सीमित रखना, तन की ही नहीं मन की भी. अपनी ख़ुशी अपने अंदर तलाशना, हर हाल में संतुष्ट रहना और परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्य को समझना. नन्हे और जून की जगह पर खुद को रखकर उनकी अपेक्षाओं को जानने का प्रयत्न, सबसे बड़ी बात उनके इस छोटे से घर का वातावरण सदा प्रफ्फुलित रखना !

“तप जीवन में आवश्यक है, अन्तर्मुखी होकर, राग-द्वेष मुक्त होकर, आसक्ति को मिटाकर तप किया जा सकता है. मन को संस्कारों से मुक्त करना ही तप है. मन के दर्पण को ऊपर की ओर स्थित करने से उसमें पड़ने वाली छाया ऊपर ही चली जाएगी”. आज भी बाबा जी ने ज्ञान की शिक्षा दी. सुबह वे जल्दी उठे, आज भी भाई के यहाँ फोन किया पर लाइन नहीं मिली, सम्भवतः टेलीफोन कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से. कल जो मेहमान आये थे उन्हें भी घर फोन करना था, पर नहीं मिला. जून को पाव-भाजी अच्छी लगी. उड़िया सखी को सुबह-सुबह फोन करके पपीते के पौधों की जानकारी दी. जब ध्यान में थी, फोन बजा पर उठने का प्रयास नहीं किया. मन को केन्द्रित करना वैसे ही कितना कठिन है, शीशे पर धूप पडती है और उसे हिलाते हैं तो चमक भी हिलती है. ऐसे ही मन रूपी दर्पण पर बाहरी आघात पड़ता है तो मन चंचल हो उठता है. नन्हे ने क्लब की पत्रिका के लिए एक लेख लिखा है, आज शाम वे उसे देने जायेंगे. उसके स्कूल में ड्रामा रिहर्सल भी शुरू हो गयी है, कुछ ही दिनों में उसका प्लास्टर भी खुल जायेगा और वह पहले की तरह रिटेन टेस्ट दे सकेगा.

It is I o’clock and she is with her diary. Few minutes ago she heard again that song, “meri chuunar ur ur jaye… it is a sweet melodious song, every time when she listens it, it attracts, another songs which she likes on Zee music are “piya basnti aa..and “man ke manjire …sung by Shubha Mudgal. All these songs are melodious and soft., they touch one’s heart. Today she talked to two friends, one was worried due to early/voluntary retirement scheme and other due to her son’s exams but she is not worried at all. Last evening they went to jun’s office and did net surfing. They have copied some wall papers from life positive site, while coming back jun purchased one copy of same magazine for her. This magazine touches one in every way. She liked it from its first issue when they saw it in library. Today weather is changing its mood frequently, earlier it was drizzling but now sun has come again. Nanha was smiling in the morning when jun and she helped him like they used to do when he was a small kid. He is slow these days, cause can use only his left hand. But during all these weeks he complained only once. They all three are one strong unit as a family and have many things common, ie why they love so much.





Monday, June 23, 2014

भीग गये कपड़े


नये महीने का पहला दिन ! आज उसने कक्षा दो के बच्चों को एक कहानी सुनाई, बड़े ध्यान से सुन रहे थे वे. सुबह जून ने उसे उठाया, यूँ वह पहले उठ चुकी थी, आँख बंद करके स्वप्नों को याद कर रही थी. मौसम स्वच्छ था, पर स्कूल में एक वक्त ऐसा आया जब पानी बहुत तेज बरसा. जून जब घर आये तो कपड़े आँगन में भीग रहे थे, उन्हें अकेले रहना व भोजन करना पसंद नहीं है, पर इतना तो त्याग करना ही होगा उन दोनों को, यदि वह चाहते हैं कि नूना अपनी योग्यता का उपयोग कर सके. उसके भी कई प्रिय कार्य छूट जाते  हैं पर बच्चों का साथ और पढ़ाना उसे पसंद है. छोटे बच्चों को पढ़ाना लेकिन टेढ़ी खीर है. कल उसे एक ही कक्षा में दो पीरियड एक साथ लेने हैं, वे बहुत शोर करते हैं, खैर.. नन्हे की फरमाइश पर आज वह नूडल्स बना रही है. कई दिनों से कोई कविता नहीं लिखी, शायद कल ही कोई ख्याल मन को भा जाये. एक सखी से बात हुई उसके पिता के नाम पर उसके शहर की अदालत में एक चेम्बर बनने वाला है.

फिर एक अन्तराल, ऐसी लापरवाही अच्छी तो नहीं कि इन्सान खुद से दूर चला जाये, उस ऊपर वाले से जो नीचे भी है और अपने दिल में ही है मिलने की फुर्सत भी नहीं थी. कल शाम को ‘बॉम्बे’ देखी, मनीषा कोइराला ने अच्छा अभिनय किया है. इस समय पौने नौ बजे हैं, आज उसे स्कूल देर से जाना है पेरेंट-टीचर मीटिंग है. घर पर रहो तो इतने सारे काम निकल आते हैं, कभी कोई आ रहा है कभी फोन की घंटी. मौसम आज भी अच्छा है, ठंडा-ठंडा सा.. मौसम हमेशा उसके बचाव के लिए आ ही जाता है जब कुछ सूझ न रहा हो. 

बच्चों के माता-पिता से मिलकर अच्छा लगा, उनकी शिकायतें बिलकुल सही थीं. They were right that she should see it, each and every child writes all the classwork from black board. In future she will be more cautious and also more careful in copy checking. This parent-teacher meeting is an eyeopener for her. Head mistress did not say a single word to her, perhaps she was hesitating.  But she will not mind if she says something. She has to learn many things. She has to concentrate more on children than on presentation. Now onward she will give them class one children only two or three sentences to write from the black board.

Today is holiday in their school. It is quarter to eight in the morning, full day ahead of them and so many jobs to do. Today Nanha is having  his science examination and tomorrow will be last ie Hindi. One teacher of their school is going to join college. She will give her a farewell card,  even though theirs was a brief encounter. First day when she heard her talking against Gandhi and Nehru, she thought not much of her but once she talked about absolute and Vedanta then she took notice of her. She is an intelligent girl, gold medalist in BA and MA, her subject is education.

It is 10 minutes to 7, she is feeling good, they went to library, took evening walk, cooked dinner and now she is here with love in her heart and warm feelings in thoughts. So are the ways of life, yesterday that teacher left the school, and all forgot her, they even did not give her a proper farewell.  she felt her absence today, she was very lively and talkative of course. She wished her all the best. Today school was good, she learned that  children should not use colors in bio or science diagrams.