Showing posts with label बगीचा. Show all posts
Showing posts with label बगीचा. Show all posts

Monday, July 6, 2020

ठंड से सिकुड़े फूल


शाम के सवा चार बजे हैं, बगीचे में झूले पर बैठकर मन्द हवा के झोंको और चिड़ियों की चहकार के मध्य लिखने का अवसर कभी-कभी ही मिलता है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका रात्रि भोजन भी बाहर ही होने वाला है सो किचन में भी कोई काम नहीं है. दोपहर को मोदी जी को सुना जब वह मजदूरों के लिए पेंशन स्कीम की योजना का वर्णन दे रहे थे. उनके दिल में वंचितों के लिए बहुत दर्द है. देश के हर व्यक्ति को वह अपने परिवार का एक अंग ही मानते हैं. वह उस राजा की तरह हैं जो अपनी प्रजा से बहुत प्रेम करता है. अगले चुनावों में बीजेपी ही जीतने वाली है. इसमें किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिए. जन औषधि के कारण देश में सस्ती दवाएं मिलने लगी हैं. नए एम्स भी बन रहे हैं. प्रधानमंत्री रोज ही नई-नई योजनाएं आरंभ कर रहे हैं. सस्ती स्वास्थ्य सुविधाएँ देश में मिल रही हैं. पुलवामा में हुए आतंकी हमले पर भी विपक्ष संदेह करने से बाज नहीं आ रहा है. पाकिस्तान में हुई एयर स्ट्राइक पर तो सवाल उठ ही रहे थे. पिछले दिनों काफी विचारकों को सुना. भारत-पाकिस्तान के बिगड़ते हुए संबंधों का कारण इस्लामिक कट्टरवाद ही है. यह किसी भी मुल्क को आगे बढ़ने से रोकता है. महीने के तीसरे सप्ताह में प्रेसिडेंट का फेयरवेल है, जिसमें  योग साधिकाओं को श्लोक पाठ प्रस्तुत करना है आज से वे रिहर्सल करेंगी. 

संध्या पूर्व का समय है, अभी अभी वे लॉन में टहलकर आये हैं. मौसम आज खुला है, लाल डूबता सूरज पेड़ों के पीछे से झाँक रहा था कुछ समय पूर्व. घास भीगी थी. एजेलिया का पौधा मेजेंटा फूलों से भर गया है जो अपनी ओर खींचता है. आज सुबह नैनी का पति अपने पिता को स्थानीय अस्पताल ले गया. पता चला, गले में कैंसर के कारण डिब्रूगढ़ मेडिकल कालेज ले जाना होगा. उसने ईश्वर से उनके लिए प्रार्थना की. दोपहर को मृणाल ज्योति गयी, एक अध्यापिका का विदाई भोज था, वह बहुत रो रही थी. इंसान का दिल बहुत कोमल होता है वह नफरत को सह लेगा पर प्रेम में पिघल जाता है. क्लब के एक सिलाई-कढ़ाई प्रोजेक्ट में एक सदस्या से मिली, वह बहुत ऊर्जावान है. उसने एक लकड़ी के शोकेस में प्रोजेक्ट का मोटिफ व अन्य नमूने लगाए हैं. आज सुबह उठने से पूर्व मन में एक मंथन चल रहा था, आत्मिक शक्ति को बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए. अपने सुख को किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति पर आश्रित नहीं रखना चाहिए, सबसे पहले तो यही संदेश मिला. साधक को हर पल सजग रहने की आवश्यकता है. परमात्मा सदा उसके साथ है, वह उसे स्वयं से दूर जाने नहीं देता. वह अकारण दयालु है, सखा है, सुहृद है. राजनीति के चक्करों से भी साधक को दूर ही रहना चाहिए. देश में चुनाव होने वाले हैं, बहुत तरह के संदेश दिए जा रहे हैं. जो भी होगा, भला होगा, इस विश्वास के साथ अपने सहज कर्मों को करते जाना है. परसों महिला दिवस है. महिलाएं आज किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं. सेना हो या सिविल दोनों में ही महिलाएं आगे बढ़ रही हैं. नए घर में पेटिंग का काम आरंभ हो गया है. 

उस पुरानी डायरी में पढ़ा, दादाजी ने अपनी बहन के बारे में बताया, अभी तक वह उनसे नाराज हैं. किस तरह उन्होंने अपने पति के मरने पर उन्होंने दूसरा विवाह किया तो लोगों ने इन्हें कहा, गोली चला दो; पर उनके पिता जी ने कहा कि नहीं, जान लेने से कोई फायदा नहीं, ऐसी घटनाएं और भी हो रही हैं. पिता समझदार निकले. सात भाइयों में से एक को फाँसी भी हो जाती तो भाइयों को दुःख न होता. दादाजी ने एक और मजेदार बात बताई, दादी जी को देखने के लिए नाइन को एक रुपया दिया था उस जमाने में. 

आगे लिखा था, तुम्हें जिसके प्रति आस्था हो उसके प्रति ईमानदार रहो, पर अपनी भूलों पर... उनके लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है, वे अतीत की वस्तुएं हैं, मृत हैं, वर्तमान में तुम क्या हो, महत्व इस बात का है और इस बात का भी कि भविष्य में तुम क्या होगी ! यदि कोई तुम्हें उन बातों का स्मरण भी दिलाये तो चुपचाप सुन लो... न प्रतिवाद न पश्चाताप, वे उन दिनों के फूल थे और ये आज के फूल हैं, फिर इससे क्या अंतर पड़ता है कि फूल किस रंग के हैं. सर्दी के कारण सारे गेंदे के फूल अपनी आकृति खो बैठे हैं तो क्या वे फूल नहीं हैं ? सो यह बिलकुल व्यर्थ की बात है कि पिछले वर्ष तुमने खिचड़ी खायी थी या पुलाव ! 

अवश्य कुछ हुआ होगा पर उसके बारे में कुछ नहीं लिखा है. 

Sunday, May 3, 2020

ओस की बूँदें



आज दिन भर व्यस्तता बनी रही, इस समय टीवी पर कोई हास्य धारावाहिक चल रहा है पर आवाज बन्द है, जून की फोन पर बात चलती रहती है. कल उन्हें एक हफ्ते के लिए अहमदाबाद व जयपुर जाना है. पैकिंग कल शाम को ही कर ली थी. आज शाम हेयर कट के लिये रखी थी, उनके छोटे या बड़े सभी काम योजना बद्ध होते हैं. उसके भी जाने की बात थी पहले पर इन दिनों उसके पास भी कई काम हैं. शाम को स्कूल में मीटिंग थी. उससे पूर्व क्लब की सेक्रेटरी के साथ गिफ्ट बांटने के लिए सूची बनाने का काम था. दोपहर को मृणाल ज्योति में हिंदी कक्षा लेने गयी.  पांच विद्यार्थी हैं दो छात्रायें और तीन छात्र, वे बोल नहीं सकते पर आपस में सब कुछ कह-सुन लेते हैं. उनके चेहरों की मुस्कान कुछ अलग ही होती है, वह जितना हो सके इशारों व चित्रों के माध्यम से से उन्हें हिंदी लिखना-पढ़ना सिखा रही है. सुबह ड्राइविंग का अभ्यास किया एक योग साधिका को देखने गयी जो कुछ दिन से अस्वस्थ है, वह बहुत कमजोर लग रही थी. इसी तरह दिन कुछ न कुछ करते बीत गया. जून लन्च पर नहीं आये, उनके दफ्तर में एक लैब अटेंडेंट का विदाई समारोह था. बड़े भाई का बुखार आखिर उतर गया, मंझले भाई का फोन आया, वह बहुत खुश था, भाभी ने बहुत सहायता की. छोटी बहन ने कहा वह डेंगू पर एक कविता लिखे. दोपहर को पुराना माली आया. कहने लगा, उसके पास फोन आया, आपका इनाम निकला है, अपना अकॉउंट नम्बर भेज दीजिये. वह पूछ रहा था, भेजे कि नहीं. वे लोग आधार नम्बर भी मांग रहे थे, उसे मना किया. कल ही उसके पास केबीसी की तरफ से एक फोन आया, कि उसका चुनाव हुआ है, यकीन नहीं हुआ उसे, क्योंकि कभी कोशिश ही नहीं की थी. सोनू ने बताया, वह फोन असली नहीं था. 

आज सुबह बेहद सुहानी थी, सितम्बर समाप्त होने को है, मौसम में हल्की ठंडक बढ़ गयी है. उसे पंछियों की आवाजों ने जगाया, लगा जैसे वे भोर होने का एलान कर रहे थे और कह रहे थे, मानव कुदरत की इस नेमत से खुद को वंचित क्यों रखता है, जब पेड़, पंछी, हवाएं और आसमान सभी सूरज का स्वागत कर रहे हैं तब वह घर में मुंह ढक के सोया रहता है. वह झट बगीचे में गयी, लॉन की ह्री शीतल घास का स्पर्श अनोखा था और हल्की धुंध ने जैसे वातावरण को तिलस्मी बना दिया था. देखते-ही देखते सूरज ऊपर आ गया और ओस की बूंदें विलीन होने लगीं. दोपहर पूर्व  लेखन कार्य को आगे बढ़ाया, फिर योग कक्षा में पेट की चर्बी कम करने के व्यायाम कराए, आजकल कमर जैसे कमरा होती जा रही है. शाम को भजन संध्या थी. आज उसे मिलाकर पूरी एक दर्जन साधिकाएं थीं. उसने खजूर का प्रसाद दिया, एक महिला मीठी इडली बनाकर लायी थी, चावल, दूध, नारियल, चीनी व इलाइची पाउडर से बनी, बहुत स्वादिष्ट थी. जून अहमदाबाद पहुँच गए हैं. 

आज का दिन भी व्यस्तता से भरा था. सुबह के सारे कार्य, भृमण, साधना, नाश्ता आदि करते करते नौ बज गए. उसके बाद कार का अभ्यास. दोपहर को स्कूल व लेखन कार्य कर ही रही थी कि एक सखी का फोन आया, बंगाली सखी की माँ का देहांत हो गया, कई दिनों से बीमार थीं, अस्पताल में थीं. उससे मिलने गयी, कई लोग थे वहाँ, सखी बहुत उदास थी, जो स्वाभाविक ही था. कहने लगी, भाई ने अभी फौरन आने को मना किया है वह चौथ तक घर पहुँच जाएगी.  कुछ देर बैठकर वह वापस आ गयी. शाम को क्लब में मासिक कार्यक्रम था, पूजा का माहौल बन गया था. नृत्य, भजन, गीत सभी कुछ देवी को समर्पित थे फिर स्किट भी हुआ. पड़ोसिन के साथ पैदल चलकर घर आ गयी. हील की चप्पल  और साड़ी पहनकर आना थोड़ा कठिन तो है पर दूरी ज्यादा नहीं है, दस-बारह मिनट ही लगते हैं. वापस आकर पड़ोसिन ने अपने मन की बात कही, उन्हें दुःख था कि पिछले महीने क्लब का एक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रेसीडेंट ने उन्हें धन्यवाद नहीं दिया, वह बहुत उदास थीं. उसने कहा, सम्भवतः ज्यादा व्यस्त रहने के कारण वह भूल गयी हों, जानबूझ कर वह कभी ऐसा नहीं करेंगी . ‘सम्मान पाने की आशा ही दुःख का कारण है’, उसने यह सूक्ति लिखी व्हाट्सएप सन्देश में. शायद वह समझ जाएँगी, उन्हें ज्यादा दुःख भी हो सकता है, पर यदि वह इस पर विचार करेंगी तो इस बात का सत्य समझ में आएगा. 

Saturday, February 9, 2019

गार्डन अम्ब्रेला



आज नेता जी का जन्मदिन है. बंगाली सखी की बिटिया का जन्मदिन भी है, सुबह उससे बात हुई. कल शाम को एक भोज में गयी थी. कुछ परिचित महिलाओं से बात हुई, यूँ ही इधर-उधर की बातें. एक पुरानी परिचिता जो अब यहाँ नहीं रहतीं, उनका फोन नम्बर भी लिया. सामने बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले हैं व पंछियों की आवाजें आ रही हैं. अगले महीने पिताजी से मिलने घर जाना है दिल्ली होते हुए.

शाम हो गयी है, यानि एक और दिन बीतने में कुछ ही घंटे शेष हैं. आज सुबह कितनी देर से उठे वे, कारण, रात को देर तक नींद का न आना.. उसका कारण कल शाम को तीन-साढ़े तीन घंटे व्यर्थ ही बातों में बिता देना. जीवन को इतना भी हल्के में नहीं लेना चाहिए कि जीवन से रस ही चला जाए. मन को भी विश्राम चाहिए और जैसे कोई गायक रोज रियाज करता है, वैसे ही साधक को रोज ही साधना करनी होती है. थोड़ी सी भी लापरवाही मन को मूल से दूर ले जाती है और वह बिन जल की मछली की तरह तड़पता है. परमात्मा से एक क्षण की भी विलगता अब सहन नहीं होती. जब दरिया भीतर बहता ही है तो क्यों कोई प्यासा रहे. कल शाम को मंझली भाभी ने भतीजी के रिश्ते की बात बतायी. पंजाब का परिवार है, लड़का विदेश में रहकर नौकरी करता है. ईश्वर चाहेगा तो इसी वर्ष उसका भी विवाह हो जायेगा. नैनी की सास ने चार संतरे लाकर दिए हैं जो उसका बड़ा बेटा अरुणाचल प्रदेश के संतरे के बगीचे से लाया है. आज बड़े भाई से बात की, वह खुश लग रहे थे.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग में गयी, एक सदस्या के लिए कविता पढ़ी. एक सखी की माँ अस्वस्थ है, अस्पताल में है, वह उससे मिलने गयी है. जून अभी तक आये नहीं है. ऑडिट चल रहा है उनके दफ्तर में. शाम को योग कक्षा हुई, अगले हफ्ते दो दिनों के लिए एक साधिका को कहा है, अपने घर में करवा लें. कल शाम से पहले ही नन्हा अपने मित्रों के साथ आ जायेगा. घर में चहल-पहल हो जाएगी. शाम को बगीचे की सफाई करवाई. दोपहर को कुर्सियां और बगीचे के छाते भी आ गये हैं. जून घर का सामान भी ले आये हैं, यानि तैयारी पूरी है और उसने नन्हे और उसकी भावी पत्नी के लिए कविता भी लिख दी है जिसे जून ने प्रिंट कर दिया है. आज चारों ब्लॉग्स पर पोस्ट प्रकाशित भी कीं. दोपहर को दूध गैस पर रखकर सो गयी, उबल कर गिर गया, विश्राम की कीमत !

साढ़े दस बजने को हैं, मौसम आज बादलों भरा है. नन्हा और उसके मित्र कोलकाता पहुँच चुके हैं. दो घंटे बाद अगली फ्लाईट है. भोजन बन चुका है, जून आज देर से आने वाले हैं, उनका मन लेकिन इधर ही लगा हुआ है. वर्षा होने से पूर्व ही फोन करके कहा, सूखी लकड़ियाँ गैराज में रखवा दे, जो मेहमानों के आने पर एक रात्रि उन्हें जलानी हैं. सुबह-सुबह एक सखी आई थी, खुश थी, चाहती है नन्हे को स्वयं जाकर बंगाली सखी को बुलाना चाहिए, पर उसे लगता है इसकी कोई जरूरत नहीं है. उसने जो ठान लिया वह करके ही रहेगी, इसलिए जो होता है सब ठीक है. वर्षा होकर रुक गयी है, पूरे लॉन में पत्ते बिखर गए हैं. उन्होंने कल ही अच्छी तरह सफाई करवाई थी. Really God Loves Fun!

Friday, March 2, 2018

शक्ति और शक्तिमान



पांच दिनों का अन्तराल ! पिछले दिनों घर में रंग-रोगन का कार्य होता रहा. सारा घर अस्त-व्यस्त सा हो गया था. किचन का सामान बैठक में, इस कमरे का सामान उस कमरे में. पेंट का कार्य पूरा गया है. आज बरामदे के फर्श पर पॉलिश का अंतिम कार्य हो रहा है. नैनी किताबों वाली रैक साफ कर रही है. आज भी दिन भर ही व्यस्तता बनी रही. शाम को योग कक्षा में कुछ नये आसन सिखाने हैं, कुछ पुराने दोहराने हैं. क्लब में पूजा का उत्सव भी है. अब अगले दस दिन सात्विक भोजन ही बनेगा, फिर अष्टमी की पूजा है. उसके पहले व्रत. स्कूल भी बंद है सो सुबह का वक्त उसे लेखन के लिए अधिक मिलेगा. कल तिनसुकिया जाना है. सर्दियों की सब्जियों के लिए बीज लाने हैं. कपड़े सिलने दिए थे वे भी. कल शाम क्लब में ‘तलवार’ दिखाई जाएगी, उसे नहीं देखनी है यह उदास करने वाली फिल्म. दो दिन से पेट कुछ नासाज है, शायद दूध वाली चाय पीने से, आज ग्रीन टी पी है, कहते हैं उसके बड़े फायदे हैं. आज बड़ी भांजी का जन्मदिन है. छोटी ने उसके मेल का अच्छा सा जवाब दिया था कल. तीन दिसम्बर को वह एक और पुत्र की माँ बनने वाली है. विदेश में पहले से ही सब पता चल जाता है, लिंग भी. जून ने कहा वह भी अब क्रोध करने वाले पर करुणा करते हैं. वह अपने विभाग में अनुशासन लाना चाहते हैं. वह एक दृढ़ लीडर की भूमिका निभा रहे हैं. कम्पनी की उन्नति ही उनका एकमात्र लक्ष्य है.

आज साप्ताहिक सफाई का दिन था. जून के दफ्तर में आज प्रधानमन्त्री की ‘स्वच्छ भारत’ योजना के अंतर्गत सफाई अभियान का आयोजन किया गया है. वे लोग डेली बाजार में एक क्षेत्र की सफाई करेंगे और कुछ कूड़े दान लगवाएंगे.

रात्रि के आठ बजने को हैं. टीवी पर भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच आ रहा है. जून भी आज बहुत दिनों बाद लिख रहे हैं. आज शाम उन्होंने सिंधी तरीके से दाल माखनी बनाई, बहुत स्वादिष्ट थी. उसके सिर में हल्का दर्द है, बीच-बीच में बिलकुल गायब हो जाता है, शायद उन क्षणों में उसका साक्षी भाव प्रमुख हो जाता होगा. आज दिन में बगीचे में कुछ देर काम किया. सर्दियों के लिए बगीचा आकार ले रहा है. इस बार वे हैंगिंग गमले भी लाये हैं. उनमें लटकते हुए पिटूनिया के फूल बहुत सुंदर लगेंगे.

शाम के चार बजे हैं. सुबह सामान्य थी. दोपहर को बगीचे में साग के बीज डलवाए. पालक, मेथी, चौलाई, मूली आदि के. दोपहर को कुछ देर सोयी तो स्वप्न में मिट्टी से बनी एक देह को देखा. श्वेत मिटटी की बनी है वह और उसमें चेतना भी है. उठकर ब्लॉग पर बाल्मीकि रामायण की एक छोटी सी पोस्ट लिखी. आज षष्ठी है. दुर्गा माँ की कृपा तो हर पल बनी ही हुई है. प्रकृति ही माँ है. आत्मा की शक्ति ही माँ है. शक्ति और शक्तिमान दो होकर भी एक हैं. भीतर के मौन में जाकर जो शक्ति चेतना में भर जाती है वह माँ की ही शक्ति है. कल दिगबोई जाते समय कम्पनी की एक महिला अधिकारी की मृत्यु हो गयी, दो अन्य घटनाओं में नौ अन्य लोगों की. एक पूरा परिवार तथा उनका एक संबंधी तथा चार एडवोकेट, सभी की मृत्यु सड़क दुर्घटना में हुई. भाग्य कब किस मोड़ पर क्या दिखायेगा, कोई नहीं जानता. कौन सा कर्म कब उदय होगा और कब किस सुख-दुःख का अनुभव होगा, कोई नहीं कह सकता. शुद्ध चेतना सदा सबकी साक्षी रहती है, उसे कुछ भी स्पर्श नहीं करता.  



Friday, August 11, 2017

नीमराना का किला


रात्रि के नौ बजने को हैं. आज का इतवार अच्छा रहा. सुबह ध्यान में मन टिका. सुबह-शाम दोनों वक्त टहलने गयी, हवा में हल्की सुवास थी और शीतलता, एक कान पर हेडफोन लगा था, पर दूसरा इर्द-गिर्द की आवाजें भी सुन रहा था. इन्सान चाहे तो एक साथ सभी इन्द्रियों से काम ले सकता है, भीतर सभी को जोड़ने वाला एक तत्व जो मौजूद है. जैसे कम्प्यूटर पर एक साथ कई विंडो खोल लेती है वह. एक असावधानी अवश्य हुई, नाश्ता बनाने का काम उसने नैनी पर छोड़ दिया, जिसने सब्जी का मसाला जला दिया था, भोजन स्वयं ही बनाना चाहिए, भोजन बनाने वाले की तरंगें भी उसमें चली जाती हैं. आज शिवानी को सुना, पता चला, प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाना चाहिए. दोपहर को संडे क्लास में चालीस से ऊपर बच्चे आये थे. जिन्हें वह और एक सखी सहज ही सिखा पाए. उसने देखा है जिस दिन वह गहन विश्रांति का अनुभव करती है बच्चे शांत रहते हैं. जून ने फोन पर बताया, उनकी कांफ्रेस एक पहाड़ी पर स्थित किले में हो रही है. बहुत सुंदर जगह है पर इधर-उधर जाने के लिए काफी चलना पड़ता है और चढ़ाई भी करनी पड़ती है. सब्जी बाड़ी थोड़े से श्रम से साफ-सुथरी हो गयी है. गुलमोहर के पेड़ के नीचे छोटी सी पहाड़ीनुमा क्यारी बनाई है, माली ने उसमें धनिया लगाया है गोलाई में ! बगीचे में शंख ओढ़े कुछ जीव छोटी-छोटी पौध खा लेते हैं, उन्हें उठवाकर बाहर फिंकवाना है. फूलों की क्यारियों में कितने ही पौधे पिछले वर्ष गिर गये बीजों से अपने आप निकल रहे हैं, साल भर वे चुपचाप पड़े रहे, हर मौसम को सहते हुए और अब समय आने पर तैयार हैं खिलने के लिए, जैसे उनके कर्म के बीज समय आने पर फल देने लगते हैं. इस बार फरवरी में बगीचा फूलों से भर जायेगा !

वर्ष के अंतिम माह का प्रथम दिवस ! आज सुबह बड़े भाई को फोन किया, जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. सेवानिवृत्ति के बाद दूसरा काम ले लिया है उन्होंने, पहले की तरह ही व्यस्त रहने लगे हैं. अभी-अभी भाभीजी को फोन किया पर उन्होंने उठाया नहीं, शायद सोयी हों. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं. आज जून का प्रेजेंटेशन है, शाम को साढ़े पाँच बजे. अवश्य अच्छा होगा, दो दिन बाद वे आ जायेंगे और दिनचर्या पहले की सी हो जाएगी. आज तो नाश्ता साढ़े नौ बजे व दोपहर का भोजन दो बजे हुआ. शाम को वैसे ही देर होने वाली है, अन्नप्राशन भोज में जो जाना है. आज ब्लॉग पर दो पोस्ट डालीं. अब भी भीतर कुछ शब्द घुमड़ रहे हैं, कल से कितने-कितने अनुभव हो रहे हैं, उन्हें शब्दों में कह पाना कितना कठिन है, फिर भी प्रयास तो किया जा सकता है !  

‘विश्व विकलांग दिवस का आयोजन भी हो गया. कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. आज विश्राम है. कई हफ्तों बाद बाल्मीकि रामायण की पोस्ट भी प्रकाशित की. इस बार अभी तक क्लब की पत्रिका के लिए कुछ नहीं भेजा है, कल ही भेजेगी, कम से कम दो कविताएँ तो अवश्य. आज जून आ गये हैं, पर अभी तक घर नहीं आये, आते ही पहले हिंदी भाषा के पुरस्कार समारोह में चले गये, उनके विभाग को प्रथम पुरस्कार मिला है, उसके बाद दफ्तर. शाम ढलने को है, हवा में हल्की ठंडक है भाती हुई सी, झूले पर बैठकर लिखने की अपनी ही मस्ती है. झूला अपने आप ही झूल रहा है, कोई अदृश्य हाथ उसे झुला रहे हैं, जिसने उन्हें थामा हुआ है. वह परम अब भीतर-बाहर मूर्तिमान हो गया है, उसको पल भर के लिए भुलाना भी भारी पड़ता है, उसे भुलाने का अर्थ है स्वयं को भुलाना, यानि मूर्छा या प्रमाद, और प्रमाद ही तो मृत्यु है. जीवन अनमोल है, अनमोल हैं ये चंद श्वासें..और अनमोल है इनसे आती उस अनाम की सुवास !   



Friday, August 4, 2017

धनतेरस और नर्क चतुर्दशी


परसों वे लौटे. उसने यात्रा विवरण लिखना शुरू कर दिया है. पिछले वर्ष वे गोवा गये थे, आस्ट्रेलिया भी, तब भी लिखा था, और अब वह सब एक स्वप्न ही तो लगता है, यह जीवन एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं है. आज का स्वप्न कल से बेहतर है और यकीनन कल आज से भी बेहतर होगा. सुबह भविष्य में हरे-भरे बगीचे का स्वप्न देखा, जो एक दिन साकार होगा. माली के पीछे लगना होगा और नर्सरी भी जाना होगा. एक सखी से भी सहायता मांगी है, उसने पिछले वर्ष बहुत सुंदर बगीचा बनाया था. सुबह दीदी-जीजाजी के लिए एक कविता लिखी, ननद-ननदोई को विवाह दिवस की बधाई दी और एक सखी को पिछले हफ्ते पड़ने वाले जन्मदिन की बधाई आज जाकर दी, खैर, देर आयद दुरस्त आयद ! ‘कावेरी के सान्निध्य में’ लेख पूरा हो गया है, अब तस्वीरें डालनी शेष हैं जो जून की सहायता से ही होगा. जीवन एक इस सुन्दर अवसर को सुंदर कार्यों में में ही लगाना होगा. यहाँ हर पल अनमोल है. मृत्यु का देवता द्वार पर खड़ा ही है, प्रतीक्षा रत है, बल्कि पल-पल मृत्यु के द्वार की ओर वे बढ़ ही रहे हैं. जीना है तो इसी पल में जीना होगा.

आज एक सप्ताह बाद पुनः कलम हाथ में पकड़ी है. उस दिन दीदी के लिए एक कविता लिखी थी, आज दीवाली पर कुछ पंक्तियाँ उतरी हैं. सचमुच दीवाली एक नहीं कई उत्सवों का मेला है. सफाई लगभग पूरी हो चुकी है, अभी विशेष सजावट करनी शेष है. कल धनतेरस है अथवा तो‘धन्वंतरी जयंती, शाम को बिजली की झालरें लगवानी हैं. अभी-अभी नैनी ने पूछा, आपने धनतेरस पर कुछ खरीदा है ? शाम को बाजार भी जाना है. आज से मौसम में हल्की ठंडक समा गयी है. बचपन में दादी जी कहती थीं दीवाली के बाद सर्दियां शुरू हो जाती हैं और होली के बाद गर्मियां आरंभ हो जाती हैं. सुबह स्कूल गयी, बच्चों को व्यायाम करने में जितना आनंद आता है उतना ही भजन गाने में भी. परमात्मा का नाम किसी भी तरह लिया जाये, शुभ ही करता है. पिछले दिनी बगीचे में काफी काम हुआ, नर्सरी से नये पौधे लाये गये. जून भी कोलकाता से फूलों व सब्जियों के बीज लाये हैं. ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिए कुछ सामान बनाना है, पुराने शादी कार्ड्स उपयोग करके नये छोटे लिफाफे बना सकती है. विभिन्न स्कूलों में जाकर उस दिन के लिए विशेष रूप से बनाये बैज भी देने हैं.

आज ‘नर्क चतुर्दशी’ है. क्लब में आज ही दीवाली उत्सव मनाया जायेगा. आज नेट नहीं चल रहा, सो ब्लॉग पर कुछ पोस्ट नहीं किया. परसों के विशेष भोज की तैयारी चल रही है. जून धीरे-धीरे सामान खरीद कर ला रहे हैं. वह सूरन के कोफ्ते की सब्जी बना रही है. इसके अलावा आलू-गोभी-मटर, बैंगन का भुर्ता, दाल माखनी, रायता, चटनी, पुलाव व पूरी बनाने की सोच रही है. कल अवकाश है, मिठाई बनाने का कुछ काम कल ही हो जायेगा. जून कोलकाता से स्नैक्स ले आये थे, कई तरह की चिक्की तथा नमकीन. बच्चों के लिए अनार व फुलझड़ी भी वे ले आये हैं, उसे शोर करने वाले पटाखे जरा भी पसंद नहीं आते. जून के दफ्तर से दीवाली के उपहार आने भी शुरू हो गए हैं. कल नन्हे से बात हुई, उसके यहाँ चार दिन का अवकाश है, पर उसे तो काम करना ही है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे, उन सभी को सद्बुद्धि दे ! इससे बढ़कर कोई प्रार्थना नहीं हो सकती.


Monday, June 19, 2017

जामुनी बयार


दो दिन फिर निकल गये, आज नये सप्ताह का प्रथम दिन है. इस समय बगीचे की हल्की हवा में झूले पर बैठकर डायरी लिखना किसी स्वर्गिक सुख की याद दिला रहा है. आंवले और गुलमोहर के पेड़ों की छाया सामने पड़ रही है. पीछे से कटहल और जामुन के पेड़ों से छनकर आती हवा और धूप पीठ को सहला रही है. उसके आगे बगीचे में गेंदे के फूलों तक चमकदार धूप बिखरी हुई है. बोगेनविलिया के लाल फूलों के गुच्छे हवा में झूल रहे हैं. पीला बोगेनविलिया गुलमोहर के सिर पर ताज बना खिला हुआ है. दुनिया इतनी सुंदर है पर लोग थमकर देखते ही नहीं. कभी-कभी घूमने जाते हैं तब भी थककर लौट आते हैं. खैर...कल झाड़ू वाले जीत गये हैं, पर सरकार बना सकें इतनी सीटें नहीं जीत पाए. देखें अब कैसे बनती है सरकार. जून कुछ ही देर में आने वाले हैं. आज उसने बथुए का रायता व वेज बिरयानी बनाई है. उस दिन जो काम सोचे थे, लगभग सभी शेष हैं, पत्रिका के लिये लेख अलबत्ता भेज दिया है. कल शाम क्लब की मीटिंग है, आज शाम उनके यहाँ सत्संग. इसी तरह दिन हफ्तों में बदल जायेंगे और नया वर्ष आ जायेगा.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल..आज लिखने के सुयोग हुआ है. जून आज दिगबोई गये हैं. अभी कुछ देर में बच्चे पढने आ जायेंगे, यह उनका अंतिम वर्ष है. उसके पास दोपहर को ज्यादा समय होगा. बाल्मीकि रामायण की पोस्ट ज्यादा नियमित होगी तब. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके फोटो देखकर सहज ही एक कविता बन गयी, शाम को उसे भेजेगी. आज आखिर दरवाजे पेंट करने वाला कारीगर आ ही गया है. गर्म पानी का बर्नर भी ठीक हुआ. कम से कम इस घर में जो भी समस्या होती है, उसका इलाज हो जाता है. परसों क्लब की मीटिंग है, एक सदस्या का विदाई समारोह भी, जिनके लिए भी उसने कविता लिखी है. दिसम्बर आधा बीत गया है, नये वर्ष के लिए कार्ड भेजने का यह सही समय है. उसे एक लिस्ट बना लेनी होगी.


आज इस मौसम का सबसे ठंडा दिन है. सुबह बादल थे. दोपहर को कुछ देर धूप निकली और इस समय फिर बदली छा गयी है. सुबह सामान्य थी, लॉन में हेज के पीछे ढेर सारे सूखे पत्ते जमा हो गये हैं, उन्हें साफ करवाना है. दोपहर को लंच में सोयाबीन बनाया था, अब बढ़ती हुई उम्र के साथ भोजन हल्का हो तभी ठीक है. बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है. यहाँ दिन भर किसी न किसी की आवाज अति रहती है, नैनी का संयुक्त परिवार है. पूर्ण शांति का अनुभव इस कमरे में नहीं हो पाटा. बादलों के कारण यहाँ प्रकाश भी थोड़ा कम है, कमरा इतना बड़ा है कि तीन दीवारों पर तीन बल्ब भी आधे कमरे को पूरी तरह प्रकाशित नहीं कर पाते. शाम को एक परिचित के यहाँ जाना है, जिनके साथ वे अरुणाचल प्रदेश की छोटी सी यात्रा पर जाने वाले हैं.

Wednesday, May 24, 2017

बड़ा सा घर


नये घर में उनका तीसरा दिन है. परसों दोपहर बाद वे सभी सामान लेकर यहाँ आ गये थे. पिछले दस दिनों से यानि बुद्ध पूर्णिमा के दिन से उन्होंने शिफ्टिंग का काम शुरू किया. उसी दिन से डायरी के पन्ने कोरे हैं. पहले दिन पूजा का कमरा यानि योग का कमरा ठीक किया. दूसरे दिन किताबें लाये, तीसरे दिन पिताजी के कमरे का सामान. एक दिन छुट्टी की, फिर पांचवें, छठे, सातवें दिन अन्य सामान और अंत में आठवें दिन शेष सारा सामान. अभी तक घर में कुछ न कुछ काम निकल ही आ रहा है, कोई बाथरूम लीक हो रहा था, कोई ट्यूब लाइट काम नहीं कर रही थी. धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. आश्चर्य है कि उन्हें एक बार भी वह घर याद नहीं आया, ऐसा लग रहा है जैसे वे इसी घर की प्रतीक्षा कर रहे थे. यह उनके स्वप्नों का घर था, बाहर का लॉन इतना बड़ा है कि आराम से एक विवाह की पार्टी हो सकती है. उनके गमले जो वहाँ सिमटे सकुचाये से थे, यहाँ खिल के अपना वैभव दिखा पा रहे हैं, उनके साज-सज्जा के सामान यहाँ कितनी मुखरता से अपना सौन्दर्य प्रदर्शित कर रहे हैं. इतना बड़ा और इतना सुंदर घर उसे ईश्वर की कृपा का अनुभव करा रहा है. इस घर में यह बाहर का बरामदा बैठने के लिए अच्छी जगह है, ऊपर पंखा भी है, सामने ‘नाइन ओ क्लॉक’ के फूल खिले हैं. कुछ ही दिनों में सामने की लंबी क्यारी में लगे जीनिया के फूल खिल जायेंगे. पिताजी अभी तक अस्पताल में ही हैं, उनका स्वास्थ्य सुधर नहीं रहा है, अब दोनों ननदों के आने की प्रतीक्षा है. लगभग दो हफ्तों बाद वे दोनों आ रही हैं, सम्भवतः उन्हें देखकर उनकी तबियत में कुछ सुधार आये.
कल शाम एक मित्र परिवार आया पहली बार इस घर में. नयी नैनी ने पहले दो गिलास शरबत बनाया फिर दो कप लाल चाय. रोज सुबह भी वह नींबू वाली ग्रीन चाय का एक कप लाती है उसके लिए. आज मौसम अच्छा है भीगा-भीगा सा, महादेव का अंतिम भाग आने वाला है. आज बहुत दिनों बाद वह विद्यार्थी आया अपनी नई साईकिल पर, आखिर वह समर्थ हुआ अपने आप कहीं जाने में. सुबह कितनी ठंडी थी, रात भर वर्षा होती रही. सुबह हरी घास पर टहलते हुए कई सारे स्नेल जीव बाहर किये, नन्हे पौधों को खा लेते हैं ये, आज बगीचे में मिट्टी डाली जा रही है. हेज के किनारे जमीन काफी नीची हो गयी थी. सद्गुरू कहते है, जीवन के अंत में यही पूछा जायेगा कितना ज्ञान प्राप्त किया और कितना प्रेम बांटा...उसके भीतर प्रेम का जो सहज स्रोत था वह आजकल शांत पड़ा है. प्रेम का स्वरूप बदल गया है, वह मौन में ही प्रवाहित होता है. दो महीने हो गये हैं उसे मृणाल ज्योति गये हुए, पिछले दिनों सेवा की भावना जैसे भीतर सिकुड़ गयी थी. पिताजी को इस हालत में देखकर भी कुछ न कर सकने का भाव अजीब सा है. विचित्र है मानव मन, अहंकार भी कितने-कितने रूपों में सम्मुख आता है. उसे कार की आवाज आयी, लगता है जून आ गये.
कल रात तेज वर्षा हुई, बगीचे में हेज के किनारे पानी भर गया है. इस समय धूप निकली है. जून अस्पताल गये हैं पिताजी के लिए दही और दाल के पानी का भोजन लेकर. आजकल उनका यही आहार है. मानव अपने अंतिम काल में कितना बेबस व निरीह हो जाता है, वे पूरी तरह से सोच और समझ तो रहे हैं पर बोल नहीं पाते. डाक्टरों की सहायता से उनके अंतिम समय को कुछ आरामदेह बनाया जा  सकता है, पर कष्ट से उन्हें मुक्ति नहीं दिला सकते. कल शाम जून ने नन्हे से होने वाली दुल्हन के लिए चेन खरीदने के लिए कहा, उसे थोड़ा नहीं काफी अजीब लगा. उसे अपने मन पर कभी-कभी बड़ा आश्चर्य होता है, कब कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा, उसे खुद भी पता नहीं चलता. यह मन नामकी वस्तु दुनिया में सबसे अजूबी है. आज सुबह की साधना में काफी देर मन टिक गया, कितना कुछ दिख रहा था, मन ही रूप धरकर आ रहा था, पर वह साक्षी बनकर देख रही थी. पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है, भविष्य नामकी कोई वस्तु होती भी है या सिर्फ कल्पना ही है, हर क्षण जो उनसे मिलता है, वह तो वर्तमान ही बनकर मिलता है. कल जो बीत गया वह भी और कल जो आएगा वह भी.   


Friday, August 12, 2016

वर्षा की फुहार


दीदी को फोन किया, कार्ड भेजा तथा फेसबुक पर शुभकामना दी, उनके फोटो देखे तथा उन पर कमेन्ट भी किया यानि उनके जन्मदिन में वह भी शामिल रही क्योंकि उसके सिवा कुछ है ही नहीं, वह ही है इस सृष्टि के कण-कण में..उसकी आँखों के सामने एक हल्की सी परत देखी दे रही है शायद यह बढ़ती हुई उम्र के कारणआँखों का कोई रोग हो..इसके कारण कोई परेशानी देखने में नहीं हो रही है. आज माली ने घास काटी है, हरा-भरा बगीचा बहुत सुंदर लग रहा है. उस दिन संध्या को शीतल पवन में बैठकर जो कविता लिखी थी उसे एक पाठक ने सराहा है ! आज भी आकाश में बादल हैं पर हवा में हल्की तपन भी है. भीनी-भीनी फुहार भी पड़ रही है. पंछी भी चहचहा रहे हैं, यानि की कविता लिखने के लिए सारे उद्दीपन मौजूद हैं ! आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ. भीतर एक उस बिंदु पर जाकर यह लगा कि वही है.. जिसको बाहर तलाशा था वही खोजने वाला है..और उसका असर हुआ कि एक मुक्तता, एक निश्चिंतता सी छा गयी है..उसके सिवा कुछ भी तो नहीं है ! फिर कैसी कामना..कैसा राग और कैसा द्वेष ? जब दो हैं ही नहीं तो कैसा खोजना और कैसा पाना..कैसी मुक्ति और कैसा बंधन ? जून का स्वास्थ्य ठीक हो रहा है, नन्हा भी अपने काम से संतुष्ट है, परमात्मा है तो सब कुछ जैसा है वैसा ही होना चाहिए था या जैसा होना चाहिए था वैसा ही है !

फिर वही झूला, वही बगीचे की हरी घास और खिले हुए गुलाब ! फिर वही बरसात का मौसम ! भीनी-भीनी सी फुहार ! फिर वही भरी दोपहरी और ये डायरी के पन्ने ! फिर वही माँ की बेवजह परेशानी और बातें..जैसे कि रात हो गयी है मच्छरदानी लगी हो तो वे सो जाएँ. फिर वही हवा की आवाज पीपल के पत्तों का झूमना..शीतल पवन के झोंको से भीतर तक एक सिहरन का अनुभव करना..फिर वही दिन में रात होने का मंजर..पूरब दिशा से काले बादलों का उमड़ते-घुमड़ते आना..हल्की-हल्की बूंदा-बांदी और फिर वही दूर से कोयल की कूक...कितनी हसीन है यह दुनिया और कितना सुंदर है ब्रह्म का यह मूर्त रूप...यह धरा यह गगन और आकाश से उतरती वर्षा परी..यह बारिश की टप-टप करती बूंदें..  


आज सुबह रोज की तरह उगी, जून और वह प्रातः भ्रमण के लिए गये. लौटते समय उन्होंने कहा कि वर्षा होती रही तो क्या तब भी वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दोपहर को तिनसुकिया जायेंगे. निर्दोष सा प्रश्न था जिसका उत्तर होना चाहिए था कि देखेंगे, पर उसके संस्कार ( वाणी दोष के ) इतने प्रबल हैं (उपदेश देने के भी) कि कह दिया, उनके भीतर एडवेंचर स्पिरिट कम होती जा रही है, बल्कि खत्म होती जा रही है, उत्साह नहीं है, उत्साह नहीं रहा तो जीवन मृत्यु के समान है, इतने बड़े-बड़े शब्दों की बमबारी कर दी व्यर्थ ही और तत्क्षण ही समझ में आ भी गया कि कुछ गलत हो गया है. मन उदास था गोयनकाजी बोलते हैं कि ऐसे में शरीर में संवेदना होने लगती है दुखद संवेदना, उसी को लिए-लिए ध्यान कक्ष में आयी तो खिड़की बंद थी जो जून ने मैना पक्षी से बचने के लिए की थी, जो कई दिनों से भीतर घोंसला बनाने के लिए आ जाती थी. फिर मन ने झट प्रतिक्रिया की, बंद कमरे में प्राणायाम करना उचित नहीं है कहकर वह बरामदे में आ गयी. संवेदना को देखना तब सहज हो गया और धीरे-धीरे सब कुछ भीतर स्पष्ट हो गया. उसके क्रोध और अहंकार ने ही उसे सताया, जून का इसमें जरा सा भी दोष नहीं था और तब भीतर यह बोध जगा कि नीरू माँ ठीक कहती हैं असजग रहे तो जो भीतर रिकार्ड है वही तो बाहर निकलेगा.

Thursday, September 18, 2014

सद्भावना यात्रा


आज की सुबह बहुत व्यस्त रही, सुबह वे रोज की तरह उठे, नन्हा और जून स्कूल और ऑफिस गये, इसी बीच उसने कुछ देर बगीचे में काम किया. सूखे फूलों को काटा फिर बड़े भाई से फोन पर बात की. उन्हें दिल्ली में किसी प्रकाशक का पता मालूम करने को कहा जो हिंदी कविताओं की पुस्तक छापता हो. उसकी पुस्तक आकार लेती प्रतीत हो रही है. जून ने कल रिपोर्ट लिखवाई थी, प्लम्बर आया उसके पहले गैरेज में स्थित जंक्शन बॉक्स देखने व सीमेंट से उसे ठीक करने दो अलग-अलग समूह आये. उनमें से एक व्यक्ति ने आंवले मांगे, उसने अपने लिए भी आंवले तुड़वाये. सुबह दो सखियों से बात की, तीन कवितायें टाइप कीं, यही सब करते कराते जून के आने का वक्त हो रहा है. प्रवचन में मन नहीं लगा न पाठ में, जब आस-पास इतना कुछ चल रहा हो तो मन जिसे एक मौका चाहिए, फुर्र से उड़ जाता है. कल दोपहर को भी भाई का फोन आया था, माँ के जाने के बाद उनमें थोड़ा बदलाव तो आया लगता है, शायद उन सभी पर किसी न किसी रूप में असर डाला है इस होनी ने, वह जो इतने दिनों से पुस्तक छपवाने का स्वप्न भर देखा करती थी, रोज इस पर काम कर रही है. समय बहुत कम है, कौन जाने कोई कब इस जहां से चला जाये वक्त रहते यदि नहीं चेते तो सिवा पछतावे के और कुछ हाथ नहीं आएगा.

आज नन्हे का हिंदी का इम्तहान है, उसने कल शाम को आधे दोहे के अर्थ के अलावा कुछ नहीं पूछा, अब वह आत्मनिर्भर हो गया है. कल जून ने भी पिता से बात की. सभी अपनी तरह से उसे समझाना चाहते हैं. पिता के अनुसार जिस तरह कोई गिरे हुए दूध का अफ़सोस नहीं करता वैसे ही किसी के जाने का भी दुःख नहीं करना चाहिए. भाभी के अनुसार उसे अपना दुःख सभी के साथ बांटना चाहिए. भाई ने कहा, वक्त लगेगा पर धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. इस क्षण उसके मन में लेशमात्र भी दुःख नहीं है, लेकिन वे कारण धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं जिनके कारण इतने दिनों तक वे परेशान थे. सर्वप्रथम तो अपराध भावना कि तेहरवीं पर वे जा नहीं पाए, दूसरे घरवालों को अपनी बात ठीक से समझा न पाना और तीसरा और सबसे बड़ा कारण तो उस स्रोत का न रहना जिससे वह जुड़ी थी और वे सारे दृश्य तथा वेदना, जो अंदर तक महसूस की.

आज नन्हे का आखिरी इम्तहान है. धूप निकली है, परसों रात की आँधी-वर्षा के बाद मौसम कुछ ठंडा अवश्य हो गया है. कल दोपहर भर वह कवितायें टाइप करती रही अब पूरी सौ हो चुकी हैं. शाम को जून ने कुछेक को प्रिंट भी कर दिया है. इसी हफ्ते उन्हें जाना भी है. उसका मन सभी के प्रति स्नेह से भरा हुआ है, माँ के प्रति जो उसका प्रेम था वह कई धाराओं में बंट गया लगता है. एकाएक ही सभी भाभियाँ बहुत प्रिय लगने लगी हैं और उनके परिवारों के प्रति सदा शुभकामनायें प्रस्फुटित होती रहती हैं, इस बार की अपनी यात्रा को ‘सद्भावना यात्रा’ का नाम देना उचित रहेगा. कल रात भी उसने सपने में सभी को देखा. माँ को भी देखा, पर सुखद अनुभूति थी. वे सभी यहाँ आए हुए हैं और वे उन्हें क्लब ले गये हैं. कल नन्हे का गणित का पेपर बहुत अच्छा नहीं हुआ लेकिन वह जल्दी ही सामान्य हो गया, उसका देर तक परेशान रहना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता.  


कल सुबह व्यस्तता के कारण डायरी नहीं खोल पाई, लेकिन पिछले एक महीने की व्यस्तता रंग लायी है और आज सुबह ही उसकी किताब की दो पांडुलिपियाँ पूरी तरह से तैयार हो गयी हैं, और जब इतना कार्य जून और नन्हे की मदद से व ईश्वरीय प्रेरणा से सम्पन्न हो गया है तो भविष्य भी उज्ज्वल होगा. परसों उन्हें जाना है, अभी पैकिंग नहीं हुई है. इस बार का जाना हर बार से थोड़ा अलग है, कल छोटे भाई का भावपूर्ण पत्र आया जिसे पढ़कर आँखें बरस पड़ीं, जून ने उसे संभाला, यह ऐसा दुःख है जिसको दूर होने में शायद सारी उम्र लग जाएगी. उस दिन जब वह माँ कविता पर काम कर रही थी, कैसे गैस पर रखे चावलों को जलने से एक आवाज ने बचा लिया था. उसे यह एक चमत्कार ही लगा था, वह किचन में चावल रखकर भूल गयी थी, अचानक बर्तन गिरने की आवाज हुई, दौड़ कर गयी तो वहाँ कोई नहीं था, खिड़की भी बंद थी, किसी पक्षी या बिल्ली के आने की कोई जगह नहीं थी, यहाँ तक कि कोई बर्तन भी गिरा हुआ नहीं था, फिर वह आवाज...उस क्षण उसने माँ को अपने पास ही महसूस किया था. इसी तरह वे सब किसी न किसी रूप में उनकी स्मृति को उनकी उपस्थिति को हमेशा अपने आस-पास पाते हैं, पाते रहेंगे. पिछली रात तेज गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई, इस वक्त थमी है. नन्हा अपने मित्र के यहाँ गया है. आज सुबह ‘जागरण’ में प्रेरणादायक वचन सुने, कुछ देर ध्यान भी किया. संगीत का अभ्यास पिछले कई हफ्तों से छूट गया है. उसने सोचा है, वापस आने पर पुनः शुरू करेगी, 

Saturday, August 16, 2014

ट्रेन से टक्कर


शनिवार का आज का दिन बाकी दिनों से कुछ भिन्न है. सुबह बगीचे में कुछ देर कार्य किया फिर पड़ोसिन के यहाँ गयी. जब से उसने उन परिचिता की कक्षा में जाना शुरू किया है  वह ज्यादा समझदार लगने लगी है. नन्हे के स्कूल में आज radio programme recording है, आज देर से आने वाला है, जून को sample test के लिए एक घंटा पूर्व ऑफिस जाना पड़ा है. उसने सुबह की जगह अभी कुछ देर पूर्व ही रियाज किया. आज पहली बार उसने किसी को कहा (पड़ोसिन) कि वह आयेगी तो उसे अपनी कविताएँ दिखाएगी. कल दोपहर उसके मन में उन्हें छपवाने का विचार भी आया और कल्पना ही कल्पना में छपी हुई किताब हाथों में थी. जून वापस आ गये हैं और माली से अमरूद के पेड़ की कटाई-छंटाई करवा रहे हैं जो उससे देखी नहीं जाती सो वह अंदर आ गयी है. वैसे आज सुबह उसने भी कुछ पौधों, और झाड़ियों की कटिंग की थी पर इतने बड़े पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना अलग बात है.

‘’आखिर क्यों उसने अपने आप को इस सिचुएशन में पड़ने दिया’’, ये शब्द उसके होठों पर थे, उसकी जेब में एक पैसा भी नहीं था. रात का वक्त था, अनजान शहर में वह जून और नन्हे से बिछड़ गयी थी. वे किसी शहर में घूमने गये थे, एक होटल में पहले एक दिन रुके, जहाँ उनकी काफी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी पर दूसरे दिन कहीं से घूम कर वापस आये, जून पीछे थे वह और नन्हे आराम से अपने पुराने कमरे की ओर बढ़े पर केयरटेकर ने मना कर दिया, कोई भी कमरा खाली नहीं है. तब तक जून भी आ गये. नन्हा और जून सामान लेकर आगे-आगे चल पड़े. उसके हाथ में भी कुछ था पर कोई खिलौना ही था. वह पीछे-पीछे बाजार देखते हुए चल  रही थी कि कुछ छोटी-छोटी लडकियाँ दिखीं. एक को देखकर वह मुस्कुरायी फिर वे कुछ बात करने लगे. उसने उस बालिका से कहा कल ‘बीच’ पर मिलेंगे. उसने भी ‘हाँ’ कहा, तब तक वे एक दोराहे तक आ चुके थे, जून और नन्हा कहीं दिखाई नहीं दिए. वह एक तरफ मुड़ गयी, और आगे जाकर एक होटल दिखा, उसे लगा वे लोग यहीं गये होंगे पर अंदर जाकर निराशा ही हाथ लगी. वह बाहर आ गयी और सोचने लगी कि रात्रि के वक्त इस अन्जान शहर में अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए. उसके पास पैसे भी नहीं थे कि कहीं फोन भी कर सके, तभी यह विचार उसके मन में आया कि ऐसी परिस्थिति में खुद को क्यों डाला और साथ ही यह भी कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं, और नींद खुल गयी.

कल सुबह जून किसी काम से ऑफिस गये तो ड्राइवर ने एक एक्सीडेंट के बारे में उन्हें बताया जिसमें ‘आसाम मेल’ ट्रेन से टाटा सूमो की टक्कर में एक ड्रिलर की मृत्यु हो गयी. कल शाम नैनी ने, आज सुबह पड़ोसिन ने उसके बारे में बताया, फिर फोन पर एक सखी से भी उसी दुर्घटना के बारे में बात की. बार-बार उस वैधव्य को प्राप्त स्त्री का जो गर्भवती भी है तथा उसके ढाई वर्ष के पुत्र का ध्यान हो आता है. मृत्यु कब किस रूप में किसके सम्मुख आएगी, नहीं कहा जा सकता. हर दिन को जीवन का अंतिम दिन मानकर जीना चाहिए, मनुष्य वर्षों बाद की योजनायें बनता है पर अगले क्षण का उसे पता नहीं, आज सुबह बल्कि रोज सुबह ही वे ‘जागरण’ में जीवन की क्षण भंगुरता के बारे में सुनते हैं, सब कुछ नश्वर है प्रतिक्षण बदल रहा है, पल-पल वे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.

‘’विवेकी को पाने की इच्छा नहीं रहती, वह तो पूर्ण हो चका होता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता बल्कि छोड़ना ही शेष रहता है. संसार में आसक्ति को छोड़ना, सुख बुद्धि को छोड़ना, विकारों को छोड़ना और धीरे-धीरे सभी सांसारिक काल्पनिक वृत्तियों को छोड़ना. विवेकी अपने सुख-दुःख के लिए वह स्वयं को जिम्मेदार मानता है मानता ही नहीं, जानता है क्यों कि वह स्वयं के अनुभव के आधार पर ही निर्णय करता है’’. आज सुबह उसने यही सब सुना था, इस समय दोपहर के डेढ़ बजे हैं वह अपनी कविताओं वाली डायरी के साथ है. सुबह-सुबह जागरण सुनने के बाद सूक्ष्म और पवित्र भाव मन में जगते हैं उसी वक्त तो उन्हें लिख नहीं पाती पर बाद में उन्हीं के आधार पर कविताएँ गढ़ती है. उसकी आस्था और विश्वास का बोध कराती हैं, उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है कुछ रचकर कैसी संतुष्टि का आभास होता है. उसे एक पत्र भी लिखना है, माँ-पिता का पत्र पिछले हफ्ते आया था. परसों नन्हे का प्लास्टर खुलेगा, अब उसका हाथ काफी ठीक है, एक महीना अंततः बीत ही गया, वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहता है. परसों उनकी मीटिंग भी है. आज भारत-पौलैंड का हॉकी मैच है, यदि भारत यह मैच जीत गया तो सेमीफाइनल में प्रवेश पा सकता है. ओलम्पिक खेलों के समापन में मात्र चार दिन रह गये हैं, फिर चार वर्षों की प्रतीक्षा !



Friday, July 25, 2014

सेवेन हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपुल- स्टीफन रिचड्र्स कोवे



Today again she has to go for second sitting of rct but now she is prepared to ask the doctor for putting less medicine. Today again it is raining like yesterday and  day before yesterday. Nanha is reading a novel “Frankenstein” these days and she is reading “seven habits” they are accounts of the turmoil and struggle of ordinary people against themselves, society and illness. They give an insight to hearts of those persons. She thinks , she should also  write her mission statement and should live more meaningfully on this earth, in their small family.

Today is the fourth sitting of rct now she does not mind that horrible taste of medicine which dentist puts in her tooth cavity. It is dry today so weather is somewhat hot and humid. Talked to father in the morning, mother is doing well. Babaji said,  “each one of us can get the ultimate truth if we  do sadhna, but ultimate truth can be understood by self not by body or mind, self is the seer, if we pay our whole attention to body and mental whims and not to our self, we can not reach there” didi called in the morning, she liked her letter. All others also must have received them also. Nanha went to school today after summer vacations.

जून ने अभी तक फोन नहीं किया, शायद वह अब तक नाराज हैं. उसने फोन किया तो मिले नहीं. इस वक्त सुबह की घटना पर विचार करें तो आश्चर्य होता है, कितनी छोटी सी बात कितना बड़ा रूप ले लेती है. उन्होंने guided meditation किया सात बजने ही वाले थे पर जून ने पिता को फोन करने को कहा, उसने उन्हें मना भी किया पर उसे फोन पकड़ा कर वह पीछे कमरे में ही टहलने लगे उसकी हर एक बात व हरकत पर नजर रखते हुए, अब जैसा कि उसके साथ होता है फोन पर बात करते वक्त उसका सारा ध्यान उधर ही होता है अपने आस-पास तक की खबर नहीं रहती, जब उसने माँ से कहा अच्छा रखते हैं तो उनके फोन रखने का इंतजार करने लगी जब उन्होंने रखा, ऐसा उसे लगा तो उसने भी फोन रख दिया लेकिन तब तक भी उसका सारा ध्यान उनके साथ हुई बातचीत पर ही केन्द्रित था तभी बीच में जून की क्रोध से भरी छि सुनाई दी तो वह वास्तविकता में आयी, सचेत हुई उन्होंने पूछने पर बताया कि ‘फोन रखते हैं’ कहने और रखने के मध्य आधा मिनट लगा, सो पहले ही फोन काट देना चाहिए था, पर उस वक्त जो वह महसूस कर रही थी, जो सोच रही थी उसमें इन दुनियावी छोटी-छोटी बातों के लिए जगह ही कहाँ थी. हाथ अपना काम कर रहे थे पर मन अब भी वहीं था. कई बातें आँखों से देखने की नहीं होतीं मन से महसूस करने की होती हैं.

आजकल उसकी मनोस्थिति उतनी शांत नहीं है जैसे घर जाने से पूर्व थी. शायद अस्पताल के चक्कर लगाने के कारण, आज सुबह उठी तो neck भी stiff थी. मन में कई संकल्प-विकल्प उठ रहे हैं. बगीचे में भी काम पेंडिंग हो गया है, माली रेगुलर नहीं आ रहा है और नैनी से कार्य करवाने में उसने ही आलस्य दिखाया, घर की सफाई भी जो आने के बाद ८० प्रतिशत हुई थी उतनी ही है. गुलदाउदी के गमले तैयार करने हैं. कल जून लंच पर आये तो सामान्य थे जैसे कुछ हुआ ही न हो, वह व्यर्थ ही सोचती रही. कल life में कई अच्छे लेख पढ़े मन की डगमगाती नाव को कुछ ठौर मिला. सुबह दायें तरफ की पड़ोसिन को बाएं तरफ की पड़ोसिन से किसी दिन मिलने जाने के लिए बात की.  

Wednesday, December 25, 2013

हरी घास पर पक्षी


गर्मी की लम्बी छुट्टियों के बाद आज नन्हे का स्कूल खुला है. सुबह उसे जल्दी उठा दिया था, हमेशा की तरह थोड़ा सा परेशान था, स्कूल का पहला दिन...क्या होगा ? तरह-तरह के डर उसे सता रहे थे, बेबुनियाद हैं वे डर यह भी उसे पता था, कल से स्वाभाविक हो जायेगा. पड़ोस के बच्चे के साथ भी यही समस्या थी, पहली बस छोड़ दी उसने...ये बच्चे भी उन बड़ों की तरह तनाव का शिकार होते हैं. एक सखी से बात हुई, वह बच्चा भी चिड़चिड़ा हो गया है, पिता की कमी उसे जरुर खलती होगी. कल सुबह उसकी माँ सब कुछ समेट कर दिल्ली जा रही है, वहाँ उसे काम मिल गया है, नया जीवन शुरू करेगी. आज सुबह साढ़े चार बजे अलार्म सुनकर उठ गयी, पांच बजे वह छात्रा पढ़ने आई, हफ्ते में तीन दिन उसी वक्त आया करेगी. छह बजे उसके जाने के बाद जोर से भूख का अहसास हुआ, पर ज्यादा खा नहीं पाई, फिर जून को दफ्तर व नन्हे को स्कूल भेजना और उसके बाद ही फोन पर बात करते करते ही इतना वक्त हो गया है. मौसम बेहद गर्म है, धूप में तेजी है और हवा बंद है. इसी तरह गर्मी के ये उमस भरे दिन बीत जायेंगे और मौसम सुधरेगा..फूलों का मौसम यानि शरद ऋतु आयेगी.

कल दोपहर नन्हा जल्दी आ गया था, आज कल की तरह परेशान नहीं था, पर बहुत खुश भी नहीं था, एक मित्र के आने पर ही उसके चेहरे पर मुस्कान दिखी. कल शाम जून ने भी उसके साथ बगीचे में काम किया. अब पिछला हिस्सा काफी साफ हो गया है. वह जो किताब पढ़ रही है, उसकी तरह उनके बगीचे में भी कई पक्षी आये थे जो शायद कीट खा रहे थे या घास के कोमल पत्ते. विक्रम सेठ की इस पुस्तक में बगीचे का वर्णन इतना रोचक है कि.. काश ! उनके जैसा माली उनके पास भी होता, उनका माली भी अपने आप में एक अनोखा चरित्र है, पूर्वी ऊत्तर प्रदेश की भाषा बोलता, है बूढ़ा, जबकि अपने काम में दक्ष है पर ज्यादा वक्त नहीं है उसके पास, और स्वीपर तो..बुद्धू सा है, इतना बड़ा हो गया है पर बच्चों की तरह बहती नाक लिए घूमता है.

कल क्लब में किसी संगीता ने अपनी मधुर आवाज से सभी को मुग्ध कर दिया, उसके गले से आवाज बिना किसी प्रयास के सहज रूप से निकल रही थी, वह एक ऊंची कलाकार है, वह उससे कहना चाहती थी पर कह नहीं सकी. वह उसी बातूनी सखी के साथ गयी थी, जिसके भीतर कुछ करने का जज्बा है, वह भी गाती है, उसने भी शायद प्रतिद्वंद्वी समझ कर कुछ कहना ठीक न समझा. कल पिता का पत्र आया है, लिखा है वे लोग दिसम्बर में आने का कार्यक्रम बना रहे हैं, पर उसे नहीं लगता यह सम्भव हो पायेगा, पहले भी कई बार उन्होंने कहा है, वह जानती है पिछली बातों को याद करना बुद्धिमानी नहीं है और जिन्दगी का दरिया अगर बहता न रहा तो दूषित हो जायेगा. जो जब जैसा हो उसे स्वीकारना होगा. कल दोपहर उसकी तेलगु पड़ोसिन आई थी, कोलकाता एयर पोर्ट पर मिले किन्हीं तेलगु बैंक मैनेजर से हुई मित्रता की बातें बता रही थी, उन्होंने इसकी थोड़ी तारीफ़ कर दी और यह उन्हें घर आने का निमन्त्रण दे बैठी.

एक आग गमे इश्क की...
वह इश्क जो हमसे रूठ गया अब उसका हाल सुनाएँ क्या
कोई महर नहीं कोई लहर नहीं अब सच्चा शेर सुनाएँ क्या

पीटीवी पर आज बहुत दिनों बाद गजल सुनी. उसके दायें गाल में छाले हो गये हैं, कारण शायद विटामिन बी की कमी या पेट की खराबी ! एक दो दिन में अपने आप ही ठीक हो जायेंगे, जून आज ग्लिसरीन भी लायेंगे जिसे लगाने से आराम मिलता है. नन्हे को कल बाएं हाथ पर चोट लग गयी, sprain हो गया, एक लड़के का घुटना उस पर आ गया, पता नहीं कौन सा खेल खेल रहे होंगे. उसकी सोशल और विज्ञान की टीचर ने अभी तक क्लास में जाना शुरू नहीं किया है. उसका संस्कृत टेस्ट है आज, मगर वह कापी रखना जरूर भूल गया होगा...अगर नहीं भूला हो तो वाकई कुछ बात है ! जून अपना पर्स आज घर पर ही भूल गये हैं. कल शाम वे क्लब में डॉ गांगुली की टॉक सुनने गये थे, अच्छा लगा, जाने की तयारी, वहाँ बैठना और कुछ हद तक सुनना भी. सुबह एक सखी का फोन आया आखिर में कहा आज की present लग गयी न, उसे पसंद नहीं आता उसका यह कहना पर दूसरों को अपनी पसंद, नापसंद बताने का ढंग उसने सीखा ही कहाँ है.



Tuesday, July 2, 2013

डिश एंटीना- स्वप्नों का संसार


सोमवार के बाद आज शनिवार को डायरी खोलने का समय मिला है, यूँ दोपहर को समय होता है पर उस वक्त मन नहीं होता, सुबह ही लिखने का अभ्यास हो गया है और वह है कुछ नियम-कायदों पर चलने वाली, हाँ, यह बात और है कि सारे नियम-कायदे अपनी सुविधा के अनुसार बनाये हैं, और हो भी क्यों न, आखिर वही तो उन्हें बना रही है और उनका उपयोग कर रही है ! तो पिछला पूरा हफ्ता इतनी व्यस्तता में गुजरा कि कल आखिर उसने जून से बात कर ही डाली कि साधू माली को हटाकर जो आजकल उनके आया रूम में रह रहा है, एक नैनी ही रख लेते हैं, बाहर से आकर काम करने वाली नैनी के साथ खुद भी लगना ही पड़ता है. उसने अपनी पड़ोसिन से बात की है, उसकी नौकरानी यदि आने को तैयार हो जाती है तो अच्छा रहेगा तब वह साफ-सफाई और सब्जी काटने के कामों के अलावा कुछ रोचक काम कर सकती है.
 बुधवार की शाम को बिजली चली गयी तो वे अपने एक मित्र के यहाँ चले गये, कल भी बिजली सुबह चार बजे से ही गायब थी, जो शाम को तीन बजे आई, दोपहर को जून भी नहीं आये, उसका मन कुछ अस्त-व्यस्त सा था, पहले दो घंटे एक किताब पढ़ती रही फिर साइकिल चला कर बिना फोन किये असमिया सखी के यहाँ गयी, उसे शायद उम्मीद नहीं थी, खैर, उसे साइकिल चलाना अच्छा लगा. नन्हे को उसकी कक्षा का कैप्टन बनाया गया है, उसने ध्यान दिया कि वह भी उसकी तरह एक ही बात को बार-बार पूछने पर नाराज हो जाता है. उसकी बैक डोर पड़ोसिन गढ़वाली है, उसकी तबियत का हाल पूछने वह उसके घर गयी थी बातों-बातों में उसने बताया कि उसके पति भी उसी वर्ष गढ़वाल के उसी शहर में थे जब वे लोग वहाँ थे.

आज भी अभी तक जून नहीं आए हैं, उसने मेज पर खाना लगा दिया और इंतजार के क्षणों को काटने के लिए पत्र लिखने लगी, तीन पत्र पूरे भी हो गये और उनका पता नहीं था तो उसने डायरी उठा ली है. कल रात लगभग ग्यारह बजे उन्हें कमरे में कुछ आवाज सुनाई दी, पर जगकर देखने के बाद कहीं उसका स्रोत नजर नहीं आया, वह कुछ देर सो नहीं सकी, रात को मन कितनी जल्दी  आशंकित हो जाता है. अचानक उसे याद आया एक खत और लिखना है, जो वह लंच के बाद लिखेगी. बीते हुए कल उसने डिश एंटीना के बारे में जून से बात की और आने वाले कल उनके बगीचे के पिछवाड़े में वह लग भी जायेगा, उसने सोचा कितना अच्छा होगा जब वे जी टीवी के सभी कार्यक्रम देख पाएंगे.

आज फिर जून लंच पर नहीं आएंगे, वे अपने साथ टिफिन ले गये हैं और उसके पास हैं किताबें और ढेर सारा समय, जो चाहे करने के लिए या कहीं जाने के लिए, लेकिन वह तय नहीं कर पाई, कहाँ जाना चाहिए, फिर उसने सोचा, वह स्वयं को कुछ नये कामों में व्यस्त रखेगी, पर वह जानती है ज्यादा समय तो पढ़ने में ही बीतेगा. वह कुछ लिखने का प्रयास भी कर सकती है जैसे कोई भूली हुई कविता या कोई अच्छी सी बात उस किताब से नोट कर सकती है बाद में पढ़ने के लिए. उसे अभी अखबार भी पढ़ना है इतवार का स्पेशल एडिशन भी और नन्हे का लाया बच्चों का जासूसी उपन्यास भी है ‘हार्डी बॉयज’, जो उसे अच्छा लग रहा है, अपने बचपन में उसने ऐसी कोई किताब कभी नहीं पढ़ी. कल जून ने माली की सहायता से डिश के लिए पोल लगवा दिया, नन्हा बहुत खुश है और वे दोनों भी,किसी ने सही कहा है, हर चीज का एक वक्त होता है, कुछ दिन पहले तक वे सोचते थे कि डिश एंटीना लगवाना व्यर्थ है और किसी हद तक हानिकारक भी, पर आज लग रहा है, घर में डिश एंटीना होना तो बिलकुल सामान्य सी बात है. नन्हे को पिछले कुछ दिन से हल्की खांसी है उसे होमियोपैथी दवा दिलवाने शाम को ले जायेंगे.

जून आज दोपहर को खाने पर आएंगे, अभी अभी फोन पर कहा है और वह उत्साह से भर गयी है, सुबह वह ‘लंच पैक’ अपने साथ ले गये थे पर शायद उन्हें फील्ड से जल्दी आना पड़ा है. Nanha made her cry in the morning, she told him to gargle and he became irritated, she doesn't know why did she feel pain, pain of losing him, he is grownup and and doesn't listens as before. She cried that one day he will go so far from her that her presence will make no difference for him, but after 10-11 minutes he saw her red eyes and asked the reason, when she told him, he himself brought tear in eyes, He is so sensitive too and she thinks she is not going to lose him ever. All morning chores is done and after writing few more lines she will read that book of positive thinking and health. Yesterday they got one cute letter from her cousin brother. He seems much mature through his letters. They all will reply him. Raksha bandhan is also in next month, she has to bring rakhis for all of them, sending them is must for her, Rakhies  at least binds them together.  

   



Thursday, June 30, 2011

तीन महीने


ल उनकी शादी को तीन महीने हो गए, इस खुशी में एक फिल्म देखी ‘प्रेम रोग’. Guide पूरी पढ़ ली वही जिस पर देवानंद की फिल्म भी बनी थी, पर उपन्यास व फिल्म में बहुत अंतर है, और अब यहाँ लॉन में है, हवा का शीतल स्पर्श भला लगता है. कितने दिनों बाद इस तरह प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर कलम हाथ में ली है. आज वह देर से आने वाला है. कल कुछ नहीं लिख सकी, इस ओर ध्यान ही नहीं गया. कल रात खाना उसने बनाया, नूना ने थोड़ी सी सहायता की. वह सब कुछ बहुत अच्छी तरह कर लेता है, और उसके न होने पर घर कितना सूना-सूना लगता है. कल घर में रंग-रोगन होगा, घर कितना साफ-सुथरा लगेगा तब, काश यह बगीचा भी ठीक हो जाये !