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Saturday, August 16, 2014

ट्रेन से टक्कर


शनिवार का आज का दिन बाकी दिनों से कुछ भिन्न है. सुबह बगीचे में कुछ देर कार्य किया फिर पड़ोसिन के यहाँ गयी. जब से उसने उन परिचिता की कक्षा में जाना शुरू किया है  वह ज्यादा समझदार लगने लगी है. नन्हे के स्कूल में आज radio programme recording है, आज देर से आने वाला है, जून को sample test के लिए एक घंटा पूर्व ऑफिस जाना पड़ा है. उसने सुबह की जगह अभी कुछ देर पूर्व ही रियाज किया. आज पहली बार उसने किसी को कहा (पड़ोसिन) कि वह आयेगी तो उसे अपनी कविताएँ दिखाएगी. कल दोपहर उसके मन में उन्हें छपवाने का विचार भी आया और कल्पना ही कल्पना में छपी हुई किताब हाथों में थी. जून वापस आ गये हैं और माली से अमरूद के पेड़ की कटाई-छंटाई करवा रहे हैं जो उससे देखी नहीं जाती सो वह अंदर आ गयी है. वैसे आज सुबह उसने भी कुछ पौधों, और झाड़ियों की कटिंग की थी पर इतने बड़े पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना अलग बात है.

‘’आखिर क्यों उसने अपने आप को इस सिचुएशन में पड़ने दिया’’, ये शब्द उसके होठों पर थे, उसकी जेब में एक पैसा भी नहीं था. रात का वक्त था, अनजान शहर में वह जून और नन्हे से बिछड़ गयी थी. वे किसी शहर में घूमने गये थे, एक होटल में पहले एक दिन रुके, जहाँ उनकी काफी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी पर दूसरे दिन कहीं से घूम कर वापस आये, जून पीछे थे वह और नन्हे आराम से अपने पुराने कमरे की ओर बढ़े पर केयरटेकर ने मना कर दिया, कोई भी कमरा खाली नहीं है. तब तक जून भी आ गये. नन्हा और जून सामान लेकर आगे-आगे चल पड़े. उसके हाथ में भी कुछ था पर कोई खिलौना ही था. वह पीछे-पीछे बाजार देखते हुए चल  रही थी कि कुछ छोटी-छोटी लडकियाँ दिखीं. एक को देखकर वह मुस्कुरायी फिर वे कुछ बात करने लगे. उसने उस बालिका से कहा कल ‘बीच’ पर मिलेंगे. उसने भी ‘हाँ’ कहा, तब तक वे एक दोराहे तक आ चुके थे, जून और नन्हा कहीं दिखाई नहीं दिए. वह एक तरफ मुड़ गयी, और आगे जाकर एक होटल दिखा, उसे लगा वे लोग यहीं गये होंगे पर अंदर जाकर निराशा ही हाथ लगी. वह बाहर आ गयी और सोचने लगी कि रात्रि के वक्त इस अन्जान शहर में अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए. उसके पास पैसे भी नहीं थे कि कहीं फोन भी कर सके, तभी यह विचार उसके मन में आया कि ऐसी परिस्थिति में खुद को क्यों डाला और साथ ही यह भी कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं, और नींद खुल गयी.

कल सुबह जून किसी काम से ऑफिस गये तो ड्राइवर ने एक एक्सीडेंट के बारे में उन्हें बताया जिसमें ‘आसाम मेल’ ट्रेन से टाटा सूमो की टक्कर में एक ड्रिलर की मृत्यु हो गयी. कल शाम नैनी ने, आज सुबह पड़ोसिन ने उसके बारे में बताया, फिर फोन पर एक सखी से भी उसी दुर्घटना के बारे में बात की. बार-बार उस वैधव्य को प्राप्त स्त्री का जो गर्भवती भी है तथा उसके ढाई वर्ष के पुत्र का ध्यान हो आता है. मृत्यु कब किस रूप में किसके सम्मुख आएगी, नहीं कहा जा सकता. हर दिन को जीवन का अंतिम दिन मानकर जीना चाहिए, मनुष्य वर्षों बाद की योजनायें बनता है पर अगले क्षण का उसे पता नहीं, आज सुबह बल्कि रोज सुबह ही वे ‘जागरण’ में जीवन की क्षण भंगुरता के बारे में सुनते हैं, सब कुछ नश्वर है प्रतिक्षण बदल रहा है, पल-पल वे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.

‘’विवेकी को पाने की इच्छा नहीं रहती, वह तो पूर्ण हो चका होता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता बल्कि छोड़ना ही शेष रहता है. संसार में आसक्ति को छोड़ना, सुख बुद्धि को छोड़ना, विकारों को छोड़ना और धीरे-धीरे सभी सांसारिक काल्पनिक वृत्तियों को छोड़ना. विवेकी अपने सुख-दुःख के लिए वह स्वयं को जिम्मेदार मानता है मानता ही नहीं, जानता है क्यों कि वह स्वयं के अनुभव के आधार पर ही निर्णय करता है’’. आज सुबह उसने यही सब सुना था, इस समय दोपहर के डेढ़ बजे हैं वह अपनी कविताओं वाली डायरी के साथ है. सुबह-सुबह जागरण सुनने के बाद सूक्ष्म और पवित्र भाव मन में जगते हैं उसी वक्त तो उन्हें लिख नहीं पाती पर बाद में उन्हीं के आधार पर कविताएँ गढ़ती है. उसकी आस्था और विश्वास का बोध कराती हैं, उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है कुछ रचकर कैसी संतुष्टि का आभास होता है. उसे एक पत्र भी लिखना है, माँ-पिता का पत्र पिछले हफ्ते आया था. परसों नन्हे का प्लास्टर खुलेगा, अब उसका हाथ काफी ठीक है, एक महीना अंततः बीत ही गया, वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहता है. परसों उनकी मीटिंग भी है. आज भारत-पौलैंड का हॉकी मैच है, यदि भारत यह मैच जीत गया तो सेमीफाइनल में प्रवेश पा सकता है. ओलम्पिक खेलों के समापन में मात्र चार दिन रह गये हैं, फिर चार वर्षों की प्रतीक्षा !



Thursday, July 31, 2014

खिलौनों की दुनिया


She read -Even if you are on right track, you’ll get run over if you just sit there, by  Will Rogers
 So man has but to move, move forward, towards great heights, great ideas, towards God !
मानव का सतत प्रयास यही होता है कि वह उन्नति करे, आगे ही आगे बढ़े अनंत की ओर. उसका प्रस्थान उसी ऊँचाई की तलाश है जहाँ वह पहुंचना चाहता है. अपने आस-पास के समाज को यदि वह गहराई से देखे तो उन्नति के स्पष्ट चिह्न दिखाई पड़ते हैं, भौतिक उन्नति के साथ साथ एक और क्षेत्र भी है जहाँ मानव ने अपने कदम बढाये हैं आत्मिक उन्नति, जहाँ आगे बढने के लिए उसे ईश्वरीय प्रेरणा सहायक होती है. ईश्वर को मानव ने अपने ही आदर्शों का मूर्त रूप बनाकर स्थापित किया है ऐसा कहते हुए वह मानवीय चेतना को चरम स्थिति पर पहुंचा रही है. वह ऐसी स्थिति है जहाँ मानव और ईश्वर के बीच कोई भेद ही नहीं रहता, सो किसने किसको बनाया यह प्रश्न स्वयं ही बेमानी हो जाता है, कोई वहाँ पहुंच चुका है यह बात अन्यों को प्रेरणा देती है. जितने भी मानवीय मूल्य समाज में विद्यमान हैं सभी को कभी न कभी तो प्रथम बार व्यवहार में लाया गया होगा, वक्त की कसौटी पर खरे उतरते हुए वे आज उनके सम्मुख हैं, यदि वे उनका आदर करते हैं तो अपने लक्ष्य की ओर शीघ्र पहुंचेंगे अन्यथा न जाने कितने-कितने रूप उन्हें और मिलेंगे. पानी का स्वभाव है सदा ऊपर से नीचे की ओर बहना लेकिन मानवता का स्वभाव है सदा ऊपर की ओर बढना ! 

She is sitting in their bedroom on a bedside chair, weather is cool due to rain which has stopped now. There is a double bed, two steel almiras and one wooden inbuilt almira. Television is kept on one show case, this show case has many books also some toys and games. Nanha has decorated them, these days he plays only computer games but GIGOE and other planes etc are still dear to him. There is one dressing table also and one small table for keeping two telephones. Yesterday they talked to mother, she has recovered soon, looking fresh on phone. She is very happy for her. Life is precious and one should respect it, live it justly and should follow the laws of nature. She was describing their bedroom, colour on walls is light green and on roof is white, curtains are old but in good condition and match with the room. One small table and a stool  are also part of this room which is used by Nanha as dining table. When her  parents  came three years back, father suggested to write about the house, its dimensions its location and other things, then she could not appreciate him even she was angry with him for suggesting this to her ie a poetess but now she thinks he was right. In this way she will remember always her dear house.

मन की चादर मैली है लेकिन ईश्वर की कृपा से यह स्वच्छ भी हो सकती है, ईश्वर की कृपा पाने के लिए किन्तु मन को पवित्र करना होता है, तो तात्पर्य यह हुआ कि मन की चादर मैली ही न होने दो ! आज सुबह उसने जून को चिढ़ाया, पर इसी तरह वह छोटी-छोटी बातों पर झुंझलाना छोड़ेंगे. नन्हे ने कल रात गणित में मदद मांगी अच्छा लगा पर पहले जो सर में हल्का दर्द था पौन घंटा बैठने के बाद बढ़ गया, डिस्प्रीन लेकर ही सो पायी. कल माँ-पिता का पत्र भी आया, उनके घर से आने के बाद का पहला पत्र. आज सुबह पांच बजने से पूर्व ही उठ गयी थी, हवा ठंडी थी, नभ पर काले बादल अभी भी छाये हैं, कल उसने दुसरे सूट की कमीज भी सिली, थोड़ा सा हाथ का काम शेष है. अब बाबा जी टीवी पर आ गये हैं. कल उन्होंने कहा, ईश्वर दूर नहीं है, उसको खोजना भर है और वह इतना निकट है कि दिखाई नहीं देता.






Tuesday, November 6, 2012

खिलौनेवाला कमरा



कल शाम को उनकी ही लेन के एक बंगाली महोदय एक विद्यार्थी को लाए, बारहवीं का है, गणित पढ़ना चाहता है. आज से वह यहाँ घर पर पढ़ाने का कार्य आरम्भ कर रही है, अच्छा लग रहा है सोचकर कि वह भी कुछ ऐसा करने जा रही है जो किसी की सहायता के लिए है. उसने सोचा वह पूरे मन से पढ़ाएगी, आज मैट्रिक्स पढ़ाना है. नन्हा अपने मित्र के साथ गेस्ट रूम में खेल रहा है, वह कमरा उसके खिलौनों से भर गया है, चाहे जैसे खेले, रखे, सजाये उसे उस कमरे में पूरी छूट है. कल ननद का पत्र आया है, वे लोग नन्हे को बहुत याद करते हैं, यह तो ठीक है, लेकिन शाम को पांच बजे दोपहर का भोजन तो कुछ ठीक नहीं लगता न. आज लगतार चौथा दिन है गर्मी का, बादलों का नाम भी नहीं है. अभी सवा दस हुए हैं, उसने सोचा आधा घंटा वह पढ़ेगी फिर फुल्के बनाएगी.

कल व परसों उसने गणित पढाया, अनुभव ठीक ही रहा. आज शनिवार है, डिब्रूगढ़ से समाचार समीक्षा का कार्यक्रम आ रहा है. आज भी दिन गर्म है, परसों रात को भयानक गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई थी उसका कुछ असर बाकी है सो धूप तेज नहीं है. नन्हा लिख रहा है, एक से बीस तक लिखने में उसे आधा घंटा लगता है, कभी-कभी जानबूझ कर देर लगाता है. उसका मित्र खेलने आ गया है, अब वह जल्दी से लिख लेगा. आज पत्र भी लिखने हैं, दीदी का पत्र भी आया था, पता नहीं वह अभी यहीं हैं या आबूधाबी चली गयी हैं. आज वह अपनी अध्यापिका को भी पत्र लिखेगी. जून ने कहा था, घर में रंग-रोगन करवाने के लिए अर्जी देंगे.

साढ़े दस हो चुके हैं. आज फिर कुछ दिनों बाद डायरी खोली है, पर दायीं हथेली में बुरी तरह जलन हो रही है, आज एक हरी मिर्च काटी थोड़ा महीन, बस उसी का असर है, बाएं हाथ पर भी थोडा असर है मगर दायीं हथेली तो.. फिर ऐसे में क्या लिखा जायेगा. जून आकर कुछ तो उपाय करेंगे, पर अभी उनके आने में बहुत देर है. कल उन्हें गोहाटी जाना है उनकी पहली, नई, मारुति कार लाने,

आज शुक्रवार है, जून संभवतः कल आएंगे, कल रात या परसों सुबह. कल रात वह देर तक नहीं सो सकी फिर नींद भी आयी तो सपनों भरी. उसकी असमिया सखी ने खाने पर बुलाया है आज शाम को, कल तिनसुकिया जाने को भी कहा है. नन्हे के लिए सैंडिल लेना है, दलिया, चाय, फल, साड़ी पिन और एक कॉटन साड़ी. जून को कैसा लगेगा- शायद बहुत अच्छा या कुछ कम अच्छा. वैसे उसे साड़ी की जरूरत तो नहीं है फ़िलहाल- हाँ कॉटन सूट की है.

आज उन्हें जाना था था पर मौसम ऐसा बिगड़ा है कि... सुबह से मूसलाधार वर्षा हो रही है, घटाटोप बादल छाये हैं, ऐसे में उन्हें जून की याद ज्यादा आने लगी, नन्हा बार-बार पापा के बारे में पूछने लगा. घर में बंद रहो तो कितना खाली-खाली लगता है, वैसे चाहे दिन भर घर में रहें, पर जब मजबूरी हो तो खलता है. उसने सोचा, एक तरह से ठीक ही हुआ, जून के बिना तिनसुकिया में वे करते भी क्या..?

नन्हा आज एक वर्ष बाद फिर से स्कूल गया है. पता नहीं वह क्या कर रहा होगा, आज जब उसे छोड़कर आयी तो वह थोड़ा उदास था, जून उसे लेकर आएंगे. उनके आने से पहले वह  भोजन पूरी तरह तैयार रखेगी, उसे लगा कि अब उन्हें भोजन डाइनिंग टेबिल पर बैठकर खाना चाहिए. नन्हे को सीखना भी तो है अपने आप खाना. उसने बड़े जतन से टेबिल सजाई.




Wednesday, September 12, 2012

खिलौने की दुकान



खत आया है, ठीक से पहुंच गए थे, एक दिन लेट होने से कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि जीएम नहीं थे. मार्च का अंतिम दिन, फागुन का अवसान, अप्रैल का महीना यानि गर्मियों की शुरुआत ! आज सुबह पांच बजे उठी, नन्हा भी साथ ही उठ गया पर आधे घंटे बाद फिर सो गया. इस वक्त खेल रहा है ऊपर मकान मालिक की छोटी बेटी के साथ. कल अप्रैल फूल है, बचपन याद आ जाता है इस दिन, पडोस की एक लड़की एक बार साबुन को बर्फी की तरह काट कर लायी थी पहचानना मुश्किल था, रेडियो पर अनाउंसर भी सुबह से अजीब-अजीब बातें शुरू कर देते थे. बहुत दिनों बाद उसने रीठा-आंवला-शिकाकाई से बाल धोए. कितना अपनापन लगता है यहाँ कभी-कभी, जून वहाँ अकेले हैं, यही बात खलती है. बाबूजी, मकानमालिक के बूढ़े पिता को गुस्सा आ रहा है कि पड़ोसी उनकी दीवार पर (जो दोनों की साझी दीवार है) टाइल्स क्यों लगा रहा है, पिता भी उनका साथ दे रहे हैं इस क्रोध में.

कल रात एक अजीब हादसा हुआ, बाबूजी के बेटे ने अपनी किशोरी कन्या को टीवी खराब हो जाने के कारण बेतहाशा मारना शुरू कर दिया, वह जरूर नशे रहे होंगे. ननद ने बताया, यह कोई नई बात नहीं है, कितनी ही बार ऐसा लड़ाई-झगड़ा करते हैं. नशे में इंसान, इंसान नहीं रह जाता, हैवान ही बन जाता है. कल रात उसका मन बहुत परेशान हो गया था घर की याद आ रही थी. उसे नहीं लगता कि एक साल वह यहाँ रह पायेगी. उसे याद आया, बाजार से अंतर्देशीय पत्र लाने हैं, सभी को जवाब देने हैं.

अभी उसे दशाश्वमेधघाट जाना है, माँ के साथ टहलने व कुछ सब्जी लेने. कल नन्हें को लेकर पहली बार गयी खिलौने की दुकान में, हर बार वे तीनों साथ होते थे. घर लाते ही एक पंख खराब भी कर दिया पर उसकी खुशी, उसकी आँखों की चमक, खिलौने की दुकान पर जाने का उसका अनुभव भी तो बहुत है, उसे जैसी कार चाहिए थी वैसी नहीं मिली. कल जून, बड़ी भाभी व बड़ी ननद के पत्र आए. जून को उसकी याद उतनी नहीं आती जितनी उसे या वह लिखता नहीं है. उसका पर्स खाली होता जा रहा है, उसे लिखे या पहले वह.

थोड़ी देर पूर्व ही वह पढ़ने बैठी है, पर ऑंखें हैं कि साथ नहीं दे रही हैं. आधा घंटा और बैठकर वह खाना बनाने ऊपर किचन में जायेगी. नन्हें को जो जहाज ले दिया था, खराब कर दिया है उसने, क्या यह धन की अपव्ययता है, शायद नहीं, थोड़ी देर के लिये उसकी खुशी से कीमत वसूल हो गयी. पर ऐसी थोड़ी देर की खुशी कम कीमत के खिलौने से भी मिल सकती थी. खैर जो हुआ सो हुआ. अब उसके पापा ही खरीद देंगे उसे. कल एक पत्र और लिखा, कुल छह पत्र लिख चुकी है पर जवाब एक का ही, कहाँ जाते हैं उसके खत. माँ आज फिर बहुत उदास हैं, उनके मन की क्या अवस्था है वह नहीं जान सकती, पर कब तक, आखिर कब तक वह यूँ निष्क्रियता का आवरण ओढ़े रहेंगी, उदासीन होकर कितने दिन जिया जा सकता है, मन को खुश रखना पड़ता है, उसके लिए कोशिश करनी पडती है, मगर कोई चाहे तब तो.

Tuesday, September 4, 2012

उड़द डाल की बड़ियां



नन्हें को सुलाने में उसे एक घंटा लग गया, गोदी में लेकर सुलाने से उसका सूट कितना क्रश हो गया है, कभी-कभी इतनी कहानियाँ सुनने पर भी उसका मन नहीं भरता. जून के सहकर्मी जिनका पुत्र उनके साथ रह रहा था, वापस लौट आये हैं, एक रबर प्लांट लाए हैं उनके लिये, अच्छा लगेगा जब बड़ा हो जायेगा. सोनू के लिये भी खिलौना लाए थे, प्लास्टिक का एक हवाई जहाज और मोम के रंग..पाकर बहुत खुश था, बातें बहुत करता है प्यार और गुस्सा दोनों को खूब समझता है. आज सुबह ठंड जरा भी नहीं थी, इस समय भी रोज से कम है. कल शाम उसने पोस्तदाना डालकर पपीते का हलवा बनाया. वे मार्च में फिर बनारस जा रहे हैं और यदि उसका एडमिशन हो जाता है तो वह और नन्हा वहीं रहेंगे, जून पुनः जुलाई में आएँगे. उसका पेट भारीपन की शिकायत कर रहा है, शायद गरिष्ठ भोजन करते हैं वे लोग आजकल, सर्दियों में वैसे भी पराठों पर ज्यादा जोर रहता है. कल से दोपहर को भी टीवी के कार्यक्रम दिखाए जायेंगे. कल गणतन्त्र दिवस है, परेड देखेंगे वे लोग, यदि रंगीन में देख सकें तो कितना अच्छा हो, उसने सोचा अपनी उड़िया मित्र से बात करेगी.

छब्बीस जनवरी की सुबह जो वह अस्वस्थ हुई तो लिख नहीं सकी. ज्वर था, गला भी खराब हुआ. फिर शनि व इतवार को वक्त ही नहीं मिला. आज पहली बार उसने दोपहर का कार्यक्रम देखा, लैम्प शेड बनाने का तरीका कितना अच्छा है. कल सभी को पत्र लिखे, जून लिखते-लिखते भावुक हो गए और अपने को रोक नहीं सके. आँसू बहाना भी तो कमजोरी की निशानी है. यहाँ आकर भी उसने दो-तीन बार उसे स्वप्न में देखा है, स्वप्न में ही वे उसे देख सकते हैं, वास्तव में तो कभी देख नहीं पाएंगे. उस दिन माँ का लम्बा सा पत्र पढ़ मन भर आया. अगर वह उनके पास रहकर आगे पढ़ाई कर सके तो ज्यादा अच्छा रहेगा, वैसे कहीं भी रही ज्यादा अंतर नहीं पड़ेगा. उसे गणित की पढ़ाई भी शुरू करनी है, उसने सोचा, लिखने के बाद किताब निकलेगी या जून की सहायता लेनी होगी, पता नहीं किताबें कहाँ रखी हैं. इतवार को जून तिनसुकिया गए थे उसने सुबह के टीवी कार्यक्रम देखे, ‘भारत एक खोज’ सबसे अच्छा लगा. लिखना शुरू करने से पूर्व वह अखबार पढ़ रही थी, यह सोचकर  पुनः वही उठा लिया, कि पढ़ने के वक्त कोई लिख कैसे सकता है.

फिर तीन दिन का अंतराल, आज जून को विभाग से नयी डायरी मिल गयी, जिसका इंतजार करने को वह उसे कह रहे थे, बहुत अच्छी है इससे तो कहीं ज्यादा जिस पर वह लिख रही है, पर अब वही उसमें लिखेंगे. कल वह दिल्ली जा रहे हैं, पूरे एक हफ्ते के लिये. यहाँ ज्वाइन करने के बाद पहली बार कहीं और इंटरव्यू देने. उसकी आँखें पता नहीं क्यों दुःख रही हैं, चश्मा लगाना ही पड़ेगा क्या ? यह जिंदगी भी बस इसी हिसाब-किताब में बीतती जाती है. सोचती है जब पूरी तरह स्वस्थ रहेगी तब कितना अच्छा रहेगा खूब काम करेगी, पर तब आराम ही तो करती है. नन्हा आज फिर खूब जिद करके सोया है, किस तरह सो रहा है अब, मासूम चेहरा लिये, जैसे कभी तंग करना जानता ही न हो. उसकी एक मित्र बड़ी देकर गयी है उड़द डाल की बड़ियाँ. मौसम आज डल है, धूप खिली हुई नहीं निकली. कल शायद जून उसकी रिपोर्ट ले आयें, वैसे अब उसकी आँखों में उतना दर्द नहीं है. ननद की चिट्ठी आयी है, पच्चीस को वे लोग बहुत उदास थे, छब्बीस को वह भी तो दिन भर बेड पर थी, जून बहुत ख्याल रखते हैं ऐसे में, इस समय सीएमडी का भाषण सुनने क्लब गए हैं.


Friday, July 6, 2012

खेल-खिलौने


कल जून के साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गयी, उसकी बाइक मोड़ते समय फिसल गयी. जल्दी आ गए थे वे, नूना उस समय बाहर वाले कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी. नन्हा पास ही खेल रहा था कि देखा उसके दायें बाजू में पट्टी बंधी है, पर उसने कहा मामूली खरोंच है और उसके बाद आज सुबह तक रोज की तरह सभी कार्य किये. कल तक तो वे बिल्कुल ठीक हो जायेंगे. कल घर से चिट्ठी आयी, सबसे मीठी चिट्ठी माँ का होती है, अब उनकी यात्रा में केवल पांच दिन रह गए हैं.

लगभग एक माह पश्चात उसने पुनः डायरी खोली है. कुछ दिन यात्रा में निकल गए कुछ उसकी तैयारी में फिर वापस आकर पुनः घर सहेजने में. नन्हा आज पांच माह का हो गया उसे ट्रिपल एंटीजन व पोलियो की तीसरी खुराक देने आज अस्पताल ले गए थे. सुबह जब वापस आया तो ठीक था पर दोपहर से ही बेहद परेशान है. पहली बार इतना रोया है. जून उसे इस हालत में छोड़कर ऑफिस भी नहीं जाना चाहते थे. इस समय सोया है. जो भी घर में आता है उसे देखकर बहुत खुश होता है. सभी के बुलाने पर हंस देता है, अपनी प्यारी सी हँसी. उसे कुछ होता है तो वे दोनों कितने परेशान हो जाते हैं. लगता है उसका पेट भी ठीक नहीं है. कल परसों उसे आलू खिलाया था व बिस्किट भी, शायद इसी का असर होगा, अभी तक तो वह सिर्फ दूध व सेरेलक पर था.

आज नन्हा ठीक है, कल रात वह कई बार उठा पर जल्दी ही सो जाता था. इस समय पेट के बल लेट कर सामने पड़े खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, इस तरह लेटने से वह जल्दी ही थक जाता है. अब वह सीधा होकर सर्वोत्तम से छीना-झपटी कर रहा है, पढ़ने का या कुछ भी करने का उसका एक ही तरीका है, वस्तु को सीधे मुँह में ले जाना ऐसा न कर पाने पर शोर मचा कर गुस्सा दिखाता है. सोया रहे तो उठते ही खिलौना उठा लेता है. वे यदि दूसरे कमरे में हुए तो उसके खिलौने की आवाज से ही समझ जाते हैं कि वह उठ गया है.
क्रमशः