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Tuesday, November 24, 2020

पका हुआ कटहल

 

आज इस मौसम की अधिकतम गर्मी है ऐसा लग रहा है. योग कक्ष में दो पंखे चलाए और एसी भी. कल से आधा घन्टा देर से आने को कह दिया है. तीन नई साधिकाओं ने आना आरंभ किया है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, पहले बच्चों को फिर टीचर्स वर्कशॉप में बड़ों को योग कराया. कल भी जाना है, कल वह उन्हें अस्तित्त्व के सात स्तरों के बारे में बता सकती है. देह, प्राण, मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार और आत्मा ! मानव को स्वयं के आत्मा होने की स्मृति नहीं रहती, कभी देह मानकर सुखी-दुखी होते हैं, कभी प्राण मानकर भूख-प्यास से पीड़ित होते हैं तो कभी मन के साथ एकात्म होकर शोक और मोह का शिकार होते हैं. अपनी मान्यताओं के कारण अन्यों को नीचा देखते हैं. अहंकार का शिकार होकर स्वयं को संसार से पृथक मानते हैं. आत्मा निर्विकार है, वह कभी बदलती नहीं है. यदि कोई व्यक्ति अपनी किसी समस्या से परेशान होता है तो वह उसका हल नहीं ढूंढ पाता, अन्य व्यक्ति झट उसका हल बता देता है, जबकि यदि वही समस्या उसके साथ  घटी हो तो वह परेशान हो जाता है, स्वयं को उसका हल नहीं बता पाता. इसका कारण है स्वयं से चिपकाव, उन्हें अपने तन, मन को एक साधन मानकर उसका उपयोग करना है, तब वे मित्र बनेंगे. वे स्वयं को जानें कि किस तत्व के बने हैं. प्रेम, उत्साह, आनंद, शक्ति व ज्ञान आत्मा का स्वभाव है. ध्यान और योग से वे एक अपने भीतर एक ऐसी स्थिति का अनुभव करते हैं जो सहज है. उसी सहज अवस्था में आकर वे जीवन के सहज आनंद का अनुभव कर सकते हैं और उनके माध्यम से चारों ओर भी आनंद का प्रसार होता है. एक परिचिता का फोन आया, उसकी सासु माँ अस्पताल में हैं, शाम को वे देखने गए, उसने उनके लिए प्रार्थना करने को कहा. कितनी सुंदर थी उसकी सास पर मृत्यु, रोग और जरा ने सब बदल दिया. परिवर्तन इस जगत का नियम है.   


रात्रि के आठ बजे हैं, तेनाली रामा में पिछले कुछ दिनों से रानियाँ केवल महिलाओं की सहायता से  राजकाज चला रही थीं, पर आज रामा अपनी सूझबूझ से पुरुषों को भी दरबार में जगह दिलाता है. सृष्टि का नियम यही है, यहां दो पहियों के बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ती. एक में ही जो दो को देख लेता है वह द्वंद्व से मुक्त हो जाता है, जगत में व्यवहार करते समय ही उसे दो का सहारा लेना पड़ता है. आज दोपहर नैनी से पका कटहल कटवाया, बहुत मीठा है, जून को इसकी गन्ध पसन्द नहीं है. सुबह भ्रमण से वापस आकर इस मौसम में पहली बार हरी घास पर गिरे हुए जामुन उठाये  ताजे और मीठे... नन्हे का फोन आया दोपहर को, उसे जन्मदिन की कविता के बारे में बताया, जो सुबह अनायास ही लिखी गयी. कभी कोई भाव इतना तीव्र होता है कि अपने आप ही शब्दों में पिरो लेता है स्वयं को. श्रद्धा सुमन में बाल्मीकि रामायण का अगला अंश लिखा, गुह भरत से कहते हैं, इस वन को तुम घर के बगीचे जैसा ही समझो, अर्थात कोई संकोच न करो. जबकि कुछ देर पूर्व ही वह उस पर सन्देह भी कर रहा था. मानव मन ऐसा ही है पल में टोला पल में माशा ! आज सुबह वर्षा का एक वीडियो भी बनाया.  


और उस पुरानी डायरी की बात... उस दिन के पन्ने पर लिखी सूक्ति थी, बुढ़ापे की झुर्रियां आत्मा पर न पड़ने दो.  पिताजी ने कहा, बुढ़ापे की झुर्रियां शरीर पर भी मत पड़ने दो !  उन्होंने उस दिन उससे उसके स्वास्थ्य तथा आहार के बारे में बातचीत की. वह कह रहे थे कि वह नौकरी में गुलाम हो गये हैं, वह थक गए हैं, पर पापा, रिटायरमेंट के बाद आप काम की तलाश करेंगे, बिना कुछ किये आप रह ही नहीं सकते, इतवार काटना तो मुश्किल होता है आपके लिए. 

उसे पढ़कर आश्चर्य हुआ, क्या कभी ऐसी बात भी हुई थी !   


Monday, April 1, 2019

सफेद बैंगन



एक लंबा अन्तराल ! इतने दिनों में याद भी नहीं आया कि डायरी लेखन भी करने की वस्तु है. पौने ग्यारह बजे हैं. आज हवा बंद है. एक अजीब सी गंध भी है चारों तरफ, कटहल पक रहे हैं, जामुन पक चुके हैं, पिछले कई दिनों से वर्षा हो रही है, पत्ते सड़ गये हैं, सभी की मिली-जुली गंध है. कुछ देर पहले एक व्यक्ति आया, पूछ रहा था, क्या कटहल बेचने हैं ? उसके पूर्व तीन किशोर बालक आये थे, जामुन तोड़ने. कह रहे थे, बाजार में बेचेंगे. सौ रूपये प्रति किलो बिक रहे हैं. उसे याद आया पिछले वर्ष मृणाल ज्योति के एक अध्यापिका ने कहा था, वहाँ के बच्चों को पका कटहल खिलाने के लिए. उसे फोन करके कहा, वे लोग ले जा सकते हैं. आज भी सर्वेंट लाइन की महिलाओं को योग सिखाना है, पिछले मंगलवार को भी वे आयीं थीं. आज सुबह दांत के डाक्टर के पास गयी, फिलिंग कराने. अभी तक दांया गाल पूरी तरह से होश में नहीं आया है. अभी भी दांत में हल्का दर्द महसूस हो रहा है, शायद आरसीटी करनी पड़े भविष्य में. पित्त बढ़ गया है ऐसा लग रहा है. सबसे पहला लक्षण है आँख में जलन, शरीर में इरीटेशन जैसा कुछ. सिर में भारीपन और भी एकाध लक्षण. कल शाम को जामुन खाए, फिर मूंगफली. रात्रि भोजन में सरसों वाली अरबी. भोजन ही रोग का मुख्य कारण है. कल जून को भी जाना है डेंटिस्ट के पास.

नन्हे का जन्मदिन आने वाला है. जून ने उपहार तो पहले ही भेज दिया है उसे, उसके लिए कुछ लिखना है. दोपहर के भोजन के बाद जून को जल्दी जाना था, वह भी विश्राम करना टाल गयी, कम्प्यूटर पर लिखने के बाद सुस्ती भगाने के लिए एक कप चाय बनाकर पी है. आज ही जून ने कहा दफ्तर में अब वह ग्रीन टी ही लेते हैं. उसने उन्हें समर्थन दिया. कल शाम योग कक्षा में आने वाली महिलाओं ने कहा, उन्हें भी कटहल व जामुन चाहिए. माली से कह तुड़वाकर रखे हैं उसने. सुबह-सुबह नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियाँ लायी, सफेद बैंगन भी और एक बड़ा सा कद्दू भी, सिंड्रेला की कहानी के लिए सारा सामान !

कल फिर कुछ नहीं लिखा. अब से सुबह ही लिखेगी. दिन भर के कार्यों की सूची भी बन जाएगी. आज घी बनाना है. मृणाल ज्योति के स्टाफ की लिस्ट बनानी है. तीन बजे वहाँ मीटिंग में जाना है, उनके वार्षिक अधिवेशन के लिए भी कविता लिखनी है. शिक्षक दिवस पर दिए जाने वाले उपहारों की सूची बनानी है. टीचर्स वर्कशॉप के लिए रूपरेखा बनानी है. आकाश पर बादल बने हैं, लग रहा है वर्षा कभी भी हो सकती है. कल गुरु पूर्णिमा है, वे सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग केंद्र जायेंगे.

गुरू पूर्णिमा की स्मृतियाँ सुखद हैं. कल दोपहर भर गुरूजी के लिए लिखी गयी कविताएँ पढ़ीं और गीत गतिरूप की सहायता से उन्हें ठीक किया. शाम को सेंटर में गुरूपुजा में भाग लिया. ज्ञान के वचन सुने, ऐश्वर्य, बल, सुन्दरता, ज्ञान, कला तथा यश बढ़ाने की इच्छा जिनमें होती है, वे मन की क्षिप्त अवस्था वाले होते हैं. सत्व के साथ रज तथा तम भी उनमें समान मात्र में होते हैं, वे पुरुषार्थी होते हैं, पर उनका मन चंचल होता है. तमोगुण की अधिकता होने पर मन की मूढ़ अवस्था होती है. अधर्म, अज्ञान तथा अवैराग्य की तरफ व्यक्ति प्रवृत्त होगा. सत्व गुण की अधिकता होने पर मन एकाग्र अवस्था में होता है. जब साधक सत्व गुण के भी पार चला जाता है, तब समाधि अवस्था को प्राप्त होता है. उनके संचित कर्म बहुत ज्यादा हैं. उनमें से कुछ कर्मों का फल ही उन्हें इस जन्म में मिलता है. प्रारब्ध कर्म जब तक चलते हैं, तब तक जीवन है, जो नये कर्म वे करते हैं उन्हें क्रियमाण कर्म कहते हैं. उनके प्रति ही साधक को सदा सजग रहना है.

Thursday, August 9, 2018

चींटियों का कहर



फिर कुछ दिनों का अन्तराल ! इस समय रात्रि के पौने आठ बजे हैं. मौसम आज भी बदली भरा है, दिन भर रिमझिम वर्षा होती रही. प्रातः भ्रमण भी वर्षा की भेंट चढ़ गया. इसके बदले देर तक सांध्य भ्रमण हुआ. पूसी अब उन सबको पहचान गयी है व अपना नाम पुकारे जाने पर दौड़ कर आती है. दोपहर को बच्चों को योग कराया, भजन गाये, तब भी वह दूर बैठी देखती रही. सुबह की योग कक्षा में सूर्य नमस्कार तथा सूर्य ध्यान किया. जून ने नाश्ते में उपमा बनायी तथा दोपहर को कर्ड राईस, उन्हें खाना बनाने का शौक है त्तथा यही शौक नन्हे को भी है, उसने भी आज केक बनाया होगा. आज ‘मन की बात’ भी सुनी. मोदी जी ने कितने ही विषयों पर जानकारी दी. इस समय प्रधान मंत्री ईरान के एक गुरुद्वारे में हैं तथा मत्था टेक रहे हैं. वर्षों के बाद भारत को एक धार्मिक प्रधानमन्त्री मिला है, जो देश को नई ऊचाइयों तलक ले जाना चाहता है. उसके पूर्व एक वार्ता सुनी, जो हास्य की उपयोगिता के बारे में थी. वक्ता के अनुसार जीवन को आनन्दपूर्वक जीना चाहिए, हर घटना में हास्य का पुट खोज लेना चाहिए.
आज वे जोरहाट जा रहे हैं, कल शाम को लौटेंगे. कल हिंदी सम्मेलन में भाग लेना है. पहला अवसर होगा यह उसके लिए, पर भीतर आश्वस्ति है. परमात्मा का हाथ सदा सिर पर है, उसी की बात सुनानी है, उसे ही सुनानी है, तो कैसी सोच और कैसा विचार ! पूसी अब उनसे बहुत घुलमिल गयी है, शायद कोई पहले का नाता हो. जून थोड़ी ही देर में आने वाले होंगे, एक दिन के लिए कहीं जाने पर भी सामान कुछ न कुछ हो ही जाता है. आज साप्ताहिक सफाई भी हुई और साप्ताहिक स्नान भी. कुछ करने की, करते रहने की जो प्यास भीतर थी, अब शांत हो गयी है, मन हमेशा फुर्सत में रहता है. सुबह ब्लॉग पर आज की पोस्ट प्रकाशित की. बड़े भाई से बात हुई, वह काफी हिम्मत वाले व्यक्ति हैं. आपरेशन करवाने के बाद बहुत हिम्मत से रह रहे हैं. अकेले व्यक्ति का सबसे बड़ा साथी उसका धैर्य होता है और परमात्मा ही वह धैर्य प्रदान करता है. छोटे भाई को सम्भवतः अब उनकी देखभाल के लिए न जाना पड़े. आज बंगाली सखी का फोन आया, वे लोग उसके जन्मदिन पर आयेंगे, उस दिन उसके तन को धारण किये भले ही कई दशक हो जाएँ उसकी मानसिक उम्र तो यानि आत्मिक उम्र अभी किशोरावस्था में ही है. सद्गुरु की कृपा से जब भीतर वह अनुभव हुआ था, उस दिन से ही दूसरा जन्म मानती है वह.
आज सुबह जून ने जगाया, कोई स्वप्न चल रहा था. परमात्मा की तरफ से उठाने के लिए अंतिम स्वप्न ! कितनी मजबूती से वह उन्हें थामे रहता है पर पता भी नहीं चलने देता, अपने होने की खबर भी दिए चले जाता है और खुद को पर्दों में छिपाए भी रहता है. स्कूल गयी, सहायक अध्यापिका नहीं थीं सो शोर मचा हुआ था. बच्चों ने ठीक से ध्यान नहीं किया. वापस आकर व उसके पूर्व ही फोन और संदेशों का सिलसिला शुरू हो गया था. इस बार जन्मदिन पर कितने ही लोगों के संदेश मिले हैं. फेसबुक और व्हाट्सएप पर भी..शाम को मेहमान आयेंगे उसके पूर्व योग कक्षा. दोपहर को जून की पसंद का भोजन बनाया. वह उसे जोरहाट ले गये, यही उनका विशेष उपहार था इस वर्ष !
जून महीने का पहला दिन ! आज गर्मी भरा दिन है, सुबह हल्की सी वर्षा हुई हो शायद उनके उठने से पूर्व. आज वे प्रातः भ्रमण के लिए नहीं गये, जून ने मेडिकल टेस्ट कराया था, कल रिपोर्ट आएगी. पिछले कुछ दिनों से उन्हें दर्द की शिकायत थी. कल क्लब में मीटिंग थी, हर्बल वेलनेस कम्पनी से कुछ लोग आये थे. स्वस्थ रहने के लिए कुछ काम की बातें बतायीं, और अपने उत्पादों का विज्ञापन किया. आज भी क्लब के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में मीटिंग थी, ठीकठाक हो गयी. पिछले कुछ दिनों से पूजाकक्ष में चीटियों ने कहर ढा रखा है. कल देखा प्रिंटर के अंदर उन्होंने अपना अड्डा जमा लिया है. प्रिंटर खराब हो गया, बनने गया है. उड़िया सखी के लिए विदाई कविता आज लिखी है. बच्चों के प्रति उसका प्रेम असीम है, उस बारे में चार पंक्तियाँ जोड़नी हैं. कल दीदी का जन्मदिन है, उन्हें भी कविता भेजनी है, कल सुबह ही लिखेगी, बिलकुल ताजा. कल वृक्ष से आधा दर्जन कटहल तुड़ाकर परिचितों को भेजे. जाने किसने यह वृक्ष लगाया होगा जो हर वर्ष फलों से लद जाता है, पक जाने खिड़की से उनकी गंध आती रहती है, और कभी-कभी कोई फल नीचे गिरता है, तो जोर की आवाज आती है. उसे वर्षा के भीगे मौसम में जमीन पर गिरे उसके बीज उठाने में आनन्द आता है, उन्हें उबाल कर स्वादिष्ट सब्जी भी बनती है, नेट पर पढ़कर उसके फायदों के बारे में बताया तो जून ने भी खायी, वरना उन्हें कटहल की गंध पसंद नहीं है,

Thursday, November 16, 2017

कटहल का पेड़



ओशो ने कहा है, जीवन की तरह मृत्यु भी सीखने की बात है. मृत्यु जीवन के साथ जुड़ी है. उसका आगमन कभी भी हो सकता है. उसके लिए स्वयं को तैयार रखना होगा. शाम को वह पुनः गयी, लोगों की भीड़ लगी थी. महिला के माता-पिता व पुत्र सभी आ गये थे. सात बजे के लगभग मृतक की देह भी आ गयी, फिर कुछ कर्मकांड के बाद उन्हें ले गये. अगले दिन सुबह जब वहाँ गयी. दो-एक लोग ही थे, उसे नाश्ता खिलाया थोड़ा सा. उसका दुःख देखा नहीं जाता. उसने जिस बात की कल्पना भी नहीं की थी वैसा उसके साथ घट गया है. जून आज नुमालीगढ़ गये हैं, कल शाम तक लौटेंगे. कल सम्भवतः ‘असम बंद’ है. फ्रिज ने फिर काम करना बंद कर दिया है.

व्यर्थ हैं ये अश्रु जो गम में बहते हैं
बेबस है आदमी ये इतना ही कहते हैं
रुदन यह तुम्हारा किसी काम का नहीं
लौट के न आये जो परलोक में रहते हैं

क्या मौत नहीं होती रिश्ते का खात्मा
दो दिन का ही संग साथ था यही मानना
जो उड़ गया वह पंछी परदेसी ही तो था
संयोग से मिला था, बिछड़ना था मानना

आज सुबह से वर्षा हो रही है. जून आठ बजे तक आने वाले हैं. शाम को लॉन में सूखे पत्तों और फूलों को हटाया. बच्चों को खेलते देखा. बच्चे कितने खुश रहते हैं, मानो कोई खजाना हाथ लग गया हो, जैसे उसे मिल गया है भीतर एक खजाना ! शाम को टहलते समय छोटी बहन की भेजी तस्वीरें मिलीं, जो उसने उसी क्षण अपने बगीचे से भेजीं थीं, जवाब में उसने भी कटहल के वृक्ष की तस्वीर भेजी, कटहल अब बड़े हो गये हैं, उनमें से एक, एक दिन तोड़ेगी, कल ही वह दिन हो सकता है. फ्रिज तो ठीक नहीं हुआ है, सो सब्जी तो अभी लानी नहीं है. दोपहर को भोजन के बाद कुछ देर के विश्राम के लिए लेटी तो उसे जगाने के लिए एक स्वप्न आया, जिसमें वह मीठा आम खा रही है, नन्हा आम काट रहा  है, वह हँस भी रहा है. उसकी ख़ुशी से कैसे उनकी ख़ुशी जुड़ी है, शायद इसी तथ्य की ओर इशारा कर रहा था यह स्वप्न. मोह और ममता को स्पष्ट रूप से देखने की ताकीद भी कर रहा था. आनंददायक स्वप्न था पर सिखा रहा था कि जहाँ से ख़ुशी मिलती है, वहाँ से उतना ही दुःख मिल सकता है. उस महिला को इतना दुःख इसलिए ही तो हो रहा है कि उसने उतना ही आनन्द पाया था. हर सुख की कीमत चुकानी पड़ती है.


Monday, June 19, 2017

जामुनी बयार


दो दिन फिर निकल गये, आज नये सप्ताह का प्रथम दिन है. इस समय बगीचे की हल्की हवा में झूले पर बैठकर डायरी लिखना किसी स्वर्गिक सुख की याद दिला रहा है. आंवले और गुलमोहर के पेड़ों की छाया सामने पड़ रही है. पीछे से कटहल और जामुन के पेड़ों से छनकर आती हवा और धूप पीठ को सहला रही है. उसके आगे बगीचे में गेंदे के फूलों तक चमकदार धूप बिखरी हुई है. बोगेनविलिया के लाल फूलों के गुच्छे हवा में झूल रहे हैं. पीला बोगेनविलिया गुलमोहर के सिर पर ताज बना खिला हुआ है. दुनिया इतनी सुंदर है पर लोग थमकर देखते ही नहीं. कभी-कभी घूमने जाते हैं तब भी थककर लौट आते हैं. खैर...कल झाड़ू वाले जीत गये हैं, पर सरकार बना सकें इतनी सीटें नहीं जीत पाए. देखें अब कैसे बनती है सरकार. जून कुछ ही देर में आने वाले हैं. आज उसने बथुए का रायता व वेज बिरयानी बनाई है. उस दिन जो काम सोचे थे, लगभग सभी शेष हैं, पत्रिका के लिये लेख अलबत्ता भेज दिया है. कल शाम क्लब की मीटिंग है, आज शाम उनके यहाँ सत्संग. इसी तरह दिन हफ्तों में बदल जायेंगे और नया वर्ष आ जायेगा.

फिर कुछ दिनों का अन्तराल..आज लिखने के सुयोग हुआ है. जून आज दिगबोई गये हैं. अभी कुछ देर में बच्चे पढने आ जायेंगे, यह उनका अंतिम वर्ष है. उसके पास दोपहर को ज्यादा समय होगा. बाल्मीकि रामायण की पोस्ट ज्यादा नियमित होगी तब. कल बड़ी भतीजी का जन्मदिन है, उसके फोटो देखकर सहज ही एक कविता बन गयी, शाम को उसे भेजेगी. आज आखिर दरवाजे पेंट करने वाला कारीगर आ ही गया है. गर्म पानी का बर्नर भी ठीक हुआ. कम से कम इस घर में जो भी समस्या होती है, उसका इलाज हो जाता है. परसों क्लब की मीटिंग है, एक सदस्या का विदाई समारोह भी, जिनके लिए भी उसने कविता लिखी है. दिसम्बर आधा बीत गया है, नये वर्ष के लिए कार्ड भेजने का यह सही समय है. उसे एक लिस्ट बना लेनी होगी.


आज इस मौसम का सबसे ठंडा दिन है. सुबह बादल थे. दोपहर को कुछ देर धूप निकली और इस समय फिर बदली छा गयी है. सुबह सामान्य थी, लॉन में हेज के पीछे ढेर सारे सूखे पत्ते जमा हो गये हैं, उन्हें साफ करवाना है. दोपहर को लंच में सोयाबीन बनाया था, अब बढ़ती हुई उम्र के साथ भोजन हल्का हो तभी ठीक है. बाहर से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है. यहाँ दिन भर किसी न किसी की आवाज अति रहती है, नैनी का संयुक्त परिवार है. पूर्ण शांति का अनुभव इस कमरे में नहीं हो पाटा. बादलों के कारण यहाँ प्रकाश भी थोड़ा कम है, कमरा इतना बड़ा है कि तीन दीवारों पर तीन बल्ब भी आधे कमरे को पूरी तरह प्रकाशित नहीं कर पाते. शाम को एक परिचित के यहाँ जाना है, जिनके साथ वे अरुणाचल प्रदेश की छोटी सी यात्रा पर जाने वाले हैं.

Wednesday, June 4, 2014

बन्दर वाला बैग


जून आज बहुत दिनों बाद फील्ड ड्यूटी पर गये हैं, ‘कतलानी’ नामक एक जगह पर. आज मौसम खुला है, चारों ओर उजले सोने सी बिखरी धूप अच्छी लग रही है. पूसी आजकल आलसी हो गयी है या कमजोर, मुँह से धीरे से आवाज निकलती है जो सुनाई नहीं बस दिखाई देती है. आज नन्हे के स्कूल और जून के दफ्तर जाने के बाद ‘जागरण’ सुना. कल शाम नन्हे को क्विज में प्यारा सा बन्दर वाला बैग पुरस्कार में मिला है, पर उसे पसंद नहीं आया, जबकि नूना को बहुत सुंदर लग रहा है, पर पुरस्कार की बात उन्हें आनंद देती है, क्यों कि इसके पीछे उनका प्रयास छिपा है. इस समय उसका संगीत अभ्यास का वक्त हो चला है.

आज फिर उसका मन चिन्तन में लगा है. अक्सर न जाने कहाँ से (ऐसा वह सोचती है) जो उसके अंतर में कुछ खोया-खोया सा लगता है, खालीपन जैसा वह कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि अंदर गहरे तक भरा हुआ है जो जरा मौका मिलते ही सतह पर आ जाता है. जब सतह पर सात्विक विचार कमजोर हो जाते हैं तब ही. आध्यात्मिकता उन नकारात्मक विचारों से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग है. सद्विचारों का वेग इतना तीव्र हो कि सारी कमियां ऊपर आकर बह जाएँ और मन का घट अमृतमय हो जाये. तब जीवन सरल, कोमल, शांत व रसमय बनेगा, अंतर में कविता स्वयंमेव जन्मेगी. विकार मुक्त, तृप्त मन जिसने सारे नकार पर विजय पा ली हो, जिसका कोई भी शत्रु न रह गया हो, जिसने स्वयं को साध लिया हो, ऐसा स्वच्छ दर्पण सा मन जिसके पास हो दुनिया का कोई संकट उसे छू भी नहीं सकता. ऐसा ही मन उसका हो, यही उसके जीवन का लक्ष्य है.

Today is a hot and humid day of mid day. It is early morning but not very cool and pleasant like many mornings in Assam. When they will leave this place to go somewhere else most probably in UP or Uttaranchal, they will miss the calm and serene atmosphere of Assam. But that is many years away today at this moment she has to live in the present.

आज सुबह जून ने रोज की तरह उठाया, नन्हे और उनके जाने के बाद उसने घर संभाला, कितनी अच्छी-अच्छी बातें रोज ही सुनती है, पढ़ती है. कभी-कभी वे एकदूसरे का विरोध करती हुई भी प्रतीत होती हैं, कभी कोई कहता है कि अंतर में डूबकर साधना की जा सकती है, दुनियादारी से जितना दूर रहकर निर्मुक्त होकर जीयें उतना अच्छा है फिर दूसरा विचार कहता है, स्वयं को गुनना छोड़कर दूसरों के काम आना सीखो, दोनों में से कौन रास्ता ठीक है ?

Jonathan can learn flying so can she, he has no limitations of body, time and space. He is free  like true self. Jonathan taught her the same lesson she is trying to learn from Buddha and all other wise men. But now when she knows and has faith in the highest bliss, she has to find her self. She is no longer a helpless, weak, poor soul but she is the soul which can not be crushed. Which can fly higher and higher without any limit.

मानव के लिए असीम सम्भावनाएं हैं वह चाहे तो स्वर्ग तक पहुंच सकता है, स्वयं अपना स्वर्ग बना सकता है. उसे रोकती हैं तो उसकी स्वयं की कमियां, हृदय की क्षुद्रता, संकीर्णता और अपनी शक्ति पर भरोसा न होना. यह दुनिया वैसी ही दिखती है जैसा कोई देखना चाहता है, खुद के विचारों को ही जैसे आईने में प्रतिबिम्बित किया जा रहा हो, इसलिए जहाँ कहीं भी दुविधा, दुःख, क्षोभ की अनुभूति हो समझना चाहिए अंतर में कहीं मेल जमा है. वरना तो प्यार का प्रतिदान प्यार में ही मिलता है. यही दुनिया की रीत है और यही उस परवरदिगार की तदबीर है. उसने हम सबको बहुत छूट दी है और बहुत शक्ति भी दी है. चाहें तो स्वर्ग बना लें और चाहे तो अपना व अपनों का जीवन दुखमय कर लें. कल छोटे भाई का कार्ड व पत्र मिला उसके स्नेह ने नूना के हृदय में स्नेह को उत्पन्न किया. पड़ोसिन को उसने कटहल दिया तो उसने आम दिए, उन्होंने बातें कीं और लगा कि वे किसी बंधन में बंधे हैं. एक और सखी को उसने बगीचे के आम भिजवाने का वायदा किया है, उसे भी स्नेह रूप में ही वे मिलेंगे और यह सिलसिला जारी रहेगा. जीवन एक यात्रा भी है और एक पड़ाव भी जहाँ वे अन्य यात्रियों से मिलते हैं किन्तु असली मंजिल का पता भी नहीं भूलते, वहाँ अटक नहीं जाते, असली मंजिल तो रब ही है वही सृजनहार जिसने सबको बनाया तो अपने जैसा ही है पर वे खुद को कुछ और समझ बैठे, भूल ही गये..कि वे कौन थे.