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Tuesday, December 3, 2019

हरसिंगार के फूल


दोपहर के तीन बजे हैं. आज का दिन भी वर्षा से आरम्भ हुआ, प्रातः भ्रमण के बाद जैसे ही घर पहुँची, बूँदें पड़ने लगीं, पर दिन चढ़ते-चढ़ते धूप निकल आयी. आज धारावाहिक का अंतिम भाग भी देख लिया. बुद्ध के अनोखे जीवन की गाथा पढ़ -सुनकर कौन प्रभावित नहीं होगा. वे अपार आशावादी थे जबकि कुछ लोग उन्हें दुखवादी कहते हैं. वह मानव को उसके मूल स्वरूप का अनुभव करना चाहते थे. वह उन्हें मानसिक रोगों के चक्र से बाहर निकलना चाहते थे. बुद्ध कहते हैं हर दिन को कृतज्ञ होकर जिन चाहिए. कोई न कोई सत्कर्म करना चाहिए. परमात्मा ने जो ज्ञान, प्रेम और शक्ति मानव को दी है, उसका वितरण करना चाहिए. भीतर के आनंद को जो स्वयं में पा लेता है, वह अन्यों को भी उसे पाने का मार्ग बता सकता है. बुद्ध होने की क्षमता हरेक के भीतर है. सदमार्ग पर चलना ही धर्म का पालन करना है, जिसके द्वारा वह बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है. मन की बिखरी हुई शक्तियों को एक्टर करना ही संघ की शरण में जाना है. वे जब अपने केंद्र में स्थित होते हैं तो सारी शक्ति एक पुंज के रूप में प्राप्त होती है, जो किसी कार्य को सजगता पूर्वक करने के लिए अनिवार्य है. आज भी सदगुरू को सुना, कर्म व पुनर्जन्म पर उनकी व्याख्या अत्यंत मनोरम व सरल है. जग की प्रत्येक वस्तु में चार बातें होती हैं, धर्म, प्रेम, कर्म तथा ज्ञान. उनमें भी ये चार बातें हैं, प्रेम से वे घिरे हैं, वह उन्हें चारों ओर से स्पर्श कर रहा है, इसी प्रकार ज्ञान वह अविनाशी सत्ता है जो जानने की क्षमता है. जानना है. हर वस्तु अपने नियत धर्म के अनुसार कर्म करती है, जैसे अग्नि का धर्म है जलाना  और प्रकाश देना. उनके पूर्व कर्मों का फल उन्हें अब मिल रहा है और वर्तमान के कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा. जून कल शाम को अपने गन्तव्य पर पहुँच गए. सोनू का फोन आया, बैंगलोर में एक स्टार्टअप कम्पनी छोटे-छोटे प्लॉट लोगों को सब्जी उगने के लिए दे रहे हैं, जिसमें हर महीने दो हजार रूपये देकर ऑर्गैनिक सब्ज़ियाँ उगाई जा सकती हैं. उनके माली ही काम करेंगे, बस अपनी पसंद बतानी है और यदि मन हो तो बीच-बीच में जाकर देख सकते हैं कुछ काम भी कर सकते हैं.  महिला क्लब की साहित्यिक प्रतियोगिता होने वाली है, पर सलाहकार होने के नाते क्या उसे उसमें भाग लेना चाहिए, शायद नहीं, शेष लोगों को भी मौका मिलना चाहिए. हिंदी में बेहद कम प्रतियोगी होते हैं, इसलिए हर बार उसे कहा ही जाता है.

सामने हरा-भरा बगीचा है. बोगेनविलिया के फूल शाखाओं पर शीतल हवा में झूम रहे हैं. कुछ देर पहले हवा चलने लगी थी जैसे आंधी आने वाली हो. उत्तर भारत में पिछले दिनों अंधी-तूफान में कारण कितनी हानि हुई. बुद्ध ऐसी आंधी-तूफान में छह वर्षों तक तप करते रहे. अद्भुत थी उनकी आत्मशक्ति ! राजा के पुत्र होकर सन्यासी की भांति बेघर होकर रहना और भिक्षा मांगकर गुजारा करना कितना कठिन रहा होगा. उनके आकर्षण से खिंचे कितने ही युवा उस कल में सन्यासी बन गए. हिंसा का जीवन त्याग दिया. भारत में सैनिकों के प्रति श्रद्धा घट गयी और कालांतर में इसका परिणाम हुआ विदेशी राजाओं का आक्रमण, लेकिन बुद्ध के काल में जो हिंसा व्यर्थ ही होती थी, वह रुक गयी. आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर पोस्ट प्रकाशित की. बुद्ध पूर्णिमा के दिन अंतिम पोस्ट की थी. उनके प्रति श्रद्धा तो थी पर वे इतने महान हैं, इसका अनुभव नहीं किया था. अद्भुत थी उनकी करुणा, उसका हजारवां अंश भी यदि उसमें आ जाये तो जीवन सफल हो जायेगा. ऐसा लगता है जैसे वह कुछ भी नहीं जानती. जीवन और यह सृष्टि अनंत रहस्यों से भरी है, इसे जाना नहीं जा सकता, कोई बुद्ध होकर ही, इसके साथ एक होकर ही इसको थोड़ा-बहुत जान सकता है. सामने गमले में लाल सुर्ख एक गुलाब खिला है, जिस पर उसका ध्यान बरबस चला जाता है. बुद्ध के निर्वाण के समय उन पर फूलों की वर्षा आरम्भ हो गयी थी, जिस वृक्ष के नीचे वे लेटे थे, उसके फूलों का मौसम भी नहीं था तब. वनस्पति में भी जीवन है, चेतना है, ज्ञान है. जिस वर्ष वे इस घर में रहने आये थे, उस पुराने घर में हरसिंगार ने असमय फूल उगाये थे. प्रातःकाल भ्रमण के लिए जाते समय निकलते ही एक काली तितली सम्मुख आ गयी थी. कल सुबह उसे आर्ट ऑफ़ लिविंग सेंटर जाना है, वहां से किसी स्कूल में, गुरूजी के जन्मदिन पर सेवा कार्य के लिए. आज उनके लिए एक कविता लिखी. एक कविता आस्ट्रेलिया निवासी छोटी भांजी के लिए भी जिसका जन्मदिन भी इसी दिन पड़ता है. उसने बताया वहाँ ठंड पड़नी शुरू हो गयी है, जब भारत में ठिठुरती सर्दियां होती हैं, वहां तेज गर्मी होती है. जून ने उस स्थान की तस्वीरें भेजी हैं, जहाँ वह ठहरे हैं, बहुत सुंदर स्थान है. उन्होंने सुंदर फूलों के चित्र और एक मोर का चित्र भी भेजा है. अगली बार वह अवश्य जाना चाहेगी, पता नहीं भविष्य में क्या लिखा है ! पिताजी से बात करे ऐसा मन हो रहा है, इस वर्ष उनसे मिलना होगा या नहीं, पता नहीं !

आज सुबह हल्की फुहार पड़ रही थी, वातावरण शांत था. सदगुरू को सुना,  चेतना में अपार शक्ति है. देह को स्वस्थ करने का सामर्थ्य भी है. यदि मन टिक हो तो चेतना अपना काम कर सकती है, वरना विचारों का विक्षेप उसे अभिव्यक्त होने से रोकता है. ध्यान मन को स्थिर रखने का, निर्मल रखने का उपाय ही तो है. सुबह वह आर्ट ऑफ़ लिविंग के अन्य सदस्यों के साथ एक स्कूल में गयी, बच्चों से बातें किन, उन्हें योग कराया, कुछ सामान वितरित किया, दो घण्टे वहां बिताकर वे वापस लौटे. जैन धर्म के बारे में कुछ जानकारी हासिल करने के लिए महावीर स्वामी पर एक फिल्म देखी. इस समय रात्रि के सवा नौ बजे हैं मन आज किसी अनोखे लोक में भ्रमण कर रहा है. अस्तित्त्व की उपस्थिति का अहसास इतना सघन है कि लगता है उसे हाथ बढ़ाकर छुआ जा सकता है. भीतर एक मधुर सी झंकार जैसी आवाज सुनाई दे रही है, किसी पंछी की आवाज या चिड़िया की, जाने कहाँ से. शाम को एक घंटा ध्यान किया शायद उसी का परिणाम है, वैसे परम् कार्य-कारण से परे है, अकारण दयालु है ! शाम को नन्हे और जून से बात हुई, वे लोग इस स्थान पर गए थे, जहाँ नन्हे ने बारह क्यारियां किराए पर ली हैं, जहाँ से उन्हें ताज़ी सब्जियां मिला करेंगी. 

Tuesday, January 9, 2018

रिमझिम गिरे सावन


दोपहर का वक्त है, आसमान बादलों से ढका है. ढाई बजने वाले हैं. आज सुबह की प्रार्थना में कुछ ऐसा घटा है कि भीतर का मौन घना हो गया है, जैसे कोई मिट गया है भीतर जो बहुत शोर मचाता था. अब कोई नहीं है जो खोज रहा था, जिसे तलाश थी. क्योंकि वहाँ कुछ भी नहीं है जिसे पाया जा सके. न संसार में कुछ है न परमात्मा में कुछ है. एक परम मौन के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं है वहाँ, कुछ पाने को नहीं है. सत्य इस क्षण सम्पूर्ण है, न कुछ जोड़ना है उसमें न कुछ घटाना है. वहाँ कुछ है ही नहीं, जिसमें जोड़-तोड़ हो सके. पाने वाला ही झूठ है तो पायेगा कौन ? और पायेगा क्या ? जब वहाँ शून्य के सिवा कुछ है ही नहीं. जब कोई चाह नहीं बचती तो कुछ करने को भी नहीं रहता और न ही जानने को, क्योंकि जानने वाला ही नहीं बचता. जून आज गोहाटी गये हैं. अगले दो दिन पूर्ण मौन में बीतेंगे, कितने सही समय पर यह अनुभव घटा है. बाहर घास काटने वाली मशीन शोर कर रही है. नैनी मशीन पर सिलाई कर रही है पर भीतर का सन्नाटा उससे भी मुखर है. शाम को एक उच्च अधिकारी की पत्नी से बात करनी है, उनके लिए विदाई कविता लिखेगी. परसों पिताजी की बरसी है. बच्चों को बुलाकर खिलाना है. लेह जाने की तैयारी शुरू कर दी है.

आज सुबह से वर्षा नहीं हुई, हवा चल रही है. शाम के चार बजने को हैं. सुबह एक सखी के यहाँ गयी, वह अपने बगीचे के लिए कुछ और पौधे लायी है. बगीचे की हरियाली जून में देखते ही बनती है. दोपहर को जून का फोन आया था. उन्हें अपने यहाँ एक प्रोजेक्ट के लिए दो वर्षों हेतु एक रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए इन्टरव्यू लेने थे. कुल साठ अभ्यार्थी आये थे, चालीस का साक्षात्कार लंच से पहले हो गया था, शेष का होना था.

रिमझिम के तराने लेके आयी बरसात.! अभी-अभी बादल बरसने लगे हैं, धरती तृप्त हुई है, पंछी, पादप सभी झूम रहे हैं. जैसे परम बरसता है भीतर तो मन की धरती अंकुआने लगती है, मन भीग-भीग जाता है. आज पिताजी की दूसरी बरसी है. दोनों ननदों में से किसी का फोन नहीं आया है, न जून यहाँ हैं न ही नन्हा. जीवन ऐसा ही है, जो चला गया उसे जगत भूल जाता है. इन्सान जब तक है तब तक ही है, और भक्त तो तब भी, होकर भी नहीं ही है, केवल परमात्मा ही है, वह मिटकर ही तृप्ति पाता है. उसका होना भी क्या जो परमात्मा के बिना हो और सबसे बड़ी बात ऐसा करने में ही उसका हित है. वह अपने लिए ही ऐसा करता है, परमात्मा को भला किसी से क्या लेना. अहंकार का भोजन दुःख है और समर्पण का अर्थ है परम शांति, और इस शांति का अनुभव तो भक्त को ही होने वाला है, परमात्मा तो पहले से ही शांत है. वर्षा तेज हो गयी है.


जून वापस तो आये पर सीधे ऑफिस चले गये. उनके भीतर कार्य के प्रति समर्पण बढ़ा है, वैसे भी जिम्मेदारी बढ़ी है तो व्यक्तिगत सुख त्यागना ही होगा. शाम को मीटिंग है उसे जाना है. सुबह बाजार से लौट रही थी तो भीतर गायन स्वयं से उतर आया. धुन सहित गीत बजने लगा जैसे कोई भीतर से गा रहा हो. परमात्मा कितना सृजनात्मक है ! 

Friday, August 11, 2017

नीमराना का किला


रात्रि के नौ बजने को हैं. आज का इतवार अच्छा रहा. सुबह ध्यान में मन टिका. सुबह-शाम दोनों वक्त टहलने गयी, हवा में हल्की सुवास थी और शीतलता, एक कान पर हेडफोन लगा था, पर दूसरा इर्द-गिर्द की आवाजें भी सुन रहा था. इन्सान चाहे तो एक साथ सभी इन्द्रियों से काम ले सकता है, भीतर सभी को जोड़ने वाला एक तत्व जो मौजूद है. जैसे कम्प्यूटर पर एक साथ कई विंडो खोल लेती है वह. एक असावधानी अवश्य हुई, नाश्ता बनाने का काम उसने नैनी पर छोड़ दिया, जिसने सब्जी का मसाला जला दिया था, भोजन स्वयं ही बनाना चाहिए, भोजन बनाने वाले की तरंगें भी उसमें चली जाती हैं. आज शिवानी को सुना, पता चला, प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाना चाहिए. दोपहर को संडे क्लास में चालीस से ऊपर बच्चे आये थे. जिन्हें वह और एक सखी सहज ही सिखा पाए. उसने देखा है जिस दिन वह गहन विश्रांति का अनुभव करती है बच्चे शांत रहते हैं. जून ने फोन पर बताया, उनकी कांफ्रेस एक पहाड़ी पर स्थित किले में हो रही है. बहुत सुंदर जगह है पर इधर-उधर जाने के लिए काफी चलना पड़ता है और चढ़ाई भी करनी पड़ती है. सब्जी बाड़ी थोड़े से श्रम से साफ-सुथरी हो गयी है. गुलमोहर के पेड़ के नीचे छोटी सी पहाड़ीनुमा क्यारी बनाई है, माली ने उसमें धनिया लगाया है गोलाई में ! बगीचे में शंख ओढ़े कुछ जीव छोटी-छोटी पौध खा लेते हैं, उन्हें उठवाकर बाहर फिंकवाना है. फूलों की क्यारियों में कितने ही पौधे पिछले वर्ष गिर गये बीजों से अपने आप निकल रहे हैं, साल भर वे चुपचाप पड़े रहे, हर मौसम को सहते हुए और अब समय आने पर तैयार हैं खिलने के लिए, जैसे उनके कर्म के बीज समय आने पर फल देने लगते हैं. इस बार फरवरी में बगीचा फूलों से भर जायेगा !

वर्ष के अंतिम माह का प्रथम दिवस ! आज सुबह बड़े भाई को फोन किया, जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. वह दफ्तर जाने के लिए तैयार हो रहे थे. सेवानिवृत्ति के बाद दूसरा काम ले लिया है उन्होंने, पहले की तरह ही व्यस्त रहने लगे हैं. अभी-अभी भाभीजी को फोन किया पर उन्होंने उठाया नहीं, शायद सोयी हों. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं. आज जून का प्रेजेंटेशन है, शाम को साढ़े पाँच बजे. अवश्य अच्छा होगा, दो दिन बाद वे आ जायेंगे और दिनचर्या पहले की सी हो जाएगी. आज तो नाश्ता साढ़े नौ बजे व दोपहर का भोजन दो बजे हुआ. शाम को वैसे ही देर होने वाली है, अन्नप्राशन भोज में जो जाना है. आज ब्लॉग पर दो पोस्ट डालीं. अब भी भीतर कुछ शब्द घुमड़ रहे हैं, कल से कितने-कितने अनुभव हो रहे हैं, उन्हें शब्दों में कह पाना कितना कठिन है, फिर भी प्रयास तो किया जा सकता है !  

‘विश्व विकलांग दिवस का आयोजन भी हो गया. कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. आज विश्राम है. कई हफ्तों बाद बाल्मीकि रामायण की पोस्ट भी प्रकाशित की. इस बार अभी तक क्लब की पत्रिका के लिए कुछ नहीं भेजा है, कल ही भेजेगी, कम से कम दो कविताएँ तो अवश्य. आज जून आ गये हैं, पर अभी तक घर नहीं आये, आते ही पहले हिंदी भाषा के पुरस्कार समारोह में चले गये, उनके विभाग को प्रथम पुरस्कार मिला है, उसके बाद दफ्तर. शाम ढलने को है, हवा में हल्की ठंडक है भाती हुई सी, झूले पर बैठकर लिखने की अपनी ही मस्ती है. झूला अपने आप ही झूल रहा है, कोई अदृश्य हाथ उसे झुला रहे हैं, जिसने उन्हें थामा हुआ है. वह परम अब भीतर-बाहर मूर्तिमान हो गया है, उसको पल भर के लिए भुलाना भी भारी पड़ता है, उसे भुलाने का अर्थ है स्वयं को भुलाना, यानि मूर्छा या प्रमाद, और प्रमाद ही तो मृत्यु है. जीवन अनमोल है, अनमोल हैं ये चंद श्वासें..और अनमोल है इनसे आती उस अनाम की सुवास !