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Saturday, August 16, 2014

ट्रेन से टक्कर


शनिवार का आज का दिन बाकी दिनों से कुछ भिन्न है. सुबह बगीचे में कुछ देर कार्य किया फिर पड़ोसिन के यहाँ गयी. जब से उसने उन परिचिता की कक्षा में जाना शुरू किया है  वह ज्यादा समझदार लगने लगी है. नन्हे के स्कूल में आज radio programme recording है, आज देर से आने वाला है, जून को sample test के लिए एक घंटा पूर्व ऑफिस जाना पड़ा है. उसने सुबह की जगह अभी कुछ देर पूर्व ही रियाज किया. आज पहली बार उसने किसी को कहा (पड़ोसिन) कि वह आयेगी तो उसे अपनी कविताएँ दिखाएगी. कल दोपहर उसके मन में उन्हें छपवाने का विचार भी आया और कल्पना ही कल्पना में छपी हुई किताब हाथों में थी. जून वापस आ गये हैं और माली से अमरूद के पेड़ की कटाई-छंटाई करवा रहे हैं जो उससे देखी नहीं जाती सो वह अंदर आ गयी है. वैसे आज सुबह उसने भी कुछ पौधों, और झाड़ियों की कटिंग की थी पर इतने बड़े पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाना अलग बात है.

‘’आखिर क्यों उसने अपने आप को इस सिचुएशन में पड़ने दिया’’, ये शब्द उसके होठों पर थे, उसकी जेब में एक पैसा भी नहीं था. रात का वक्त था, अनजान शहर में वह जून और नन्हे से बिछड़ गयी थी. वे किसी शहर में घूमने गये थे, एक होटल में पहले एक दिन रुके, जहाँ उनकी काफी अच्छी जान-पहचान हो गयी थी पर दूसरे दिन कहीं से घूम कर वापस आये, जून पीछे थे वह और नन्हे आराम से अपने पुराने कमरे की ओर बढ़े पर केयरटेकर ने मना कर दिया, कोई भी कमरा खाली नहीं है. तब तक जून भी आ गये. नन्हा और जून सामान लेकर आगे-आगे चल पड़े. उसके हाथ में भी कुछ था पर कोई खिलौना ही था. वह पीछे-पीछे बाजार देखते हुए चल  रही थी कि कुछ छोटी-छोटी लडकियाँ दिखीं. एक को देखकर वह मुस्कुरायी फिर वे कुछ बात करने लगे. उसने उस बालिका से कहा कल ‘बीच’ पर मिलेंगे. उसने भी ‘हाँ’ कहा, तब तक वे एक दोराहे तक आ चुके थे, जून और नन्हा कहीं दिखाई नहीं दिए. वह एक तरफ मुड़ गयी, और आगे जाकर एक होटल दिखा, उसे लगा वे लोग यहीं गये होंगे पर अंदर जाकर निराशा ही हाथ लगी. वह बाहर आ गयी और सोचने लगी कि रात्रि के वक्त इस अन्जान शहर में अब उसका अगला कदम क्या होना चाहिए. उसके पास पैसे भी नहीं थे कि कहीं फोन भी कर सके, तभी यह विचार उसके मन में आया कि ऐसी परिस्थिति में खुद को क्यों डाला और साथ ही यह भी कि कहीं यह स्वप्न तो नहीं, और नींद खुल गयी.

कल सुबह जून किसी काम से ऑफिस गये तो ड्राइवर ने एक एक्सीडेंट के बारे में उन्हें बताया जिसमें ‘आसाम मेल’ ट्रेन से टाटा सूमो की टक्कर में एक ड्रिलर की मृत्यु हो गयी. कल शाम नैनी ने, आज सुबह पड़ोसिन ने उसके बारे में बताया, फिर फोन पर एक सखी से भी उसी दुर्घटना के बारे में बात की. बार-बार उस वैधव्य को प्राप्त स्त्री का जो गर्भवती भी है तथा उसके ढाई वर्ष के पुत्र का ध्यान हो आता है. मृत्यु कब किस रूप में किसके सम्मुख आएगी, नहीं कहा जा सकता. हर दिन को जीवन का अंतिम दिन मानकर जीना चाहिए, मनुष्य वर्षों बाद की योजनायें बनता है पर अगले क्षण का उसे पता नहीं, आज सुबह बल्कि रोज सुबह ही वे ‘जागरण’ में जीवन की क्षण भंगुरता के बारे में सुनते हैं, सब कुछ नश्वर है प्रतिक्षण बदल रहा है, पल-पल वे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं.

‘’विवेकी को पाने की इच्छा नहीं रहती, वह तो पूर्ण हो चका होता है, उसे कुछ पाना शेष नहीं रहता बल्कि छोड़ना ही शेष रहता है. संसार में आसक्ति को छोड़ना, सुख बुद्धि को छोड़ना, विकारों को छोड़ना और धीरे-धीरे सभी सांसारिक काल्पनिक वृत्तियों को छोड़ना. विवेकी अपने सुख-दुःख के लिए वह स्वयं को जिम्मेदार मानता है मानता ही नहीं, जानता है क्यों कि वह स्वयं के अनुभव के आधार पर ही निर्णय करता है’’. आज सुबह उसने यही सब सुना था, इस समय दोपहर के डेढ़ बजे हैं वह अपनी कविताओं वाली डायरी के साथ है. सुबह-सुबह जागरण सुनने के बाद सूक्ष्म और पवित्र भाव मन में जगते हैं उसी वक्त तो उन्हें लिख नहीं पाती पर बाद में उन्हीं के आधार पर कविताएँ गढ़ती है. उसकी आस्था और विश्वास का बोध कराती हैं, उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है कुछ रचकर कैसी संतुष्टि का आभास होता है. उसे एक पत्र भी लिखना है, माँ-पिता का पत्र पिछले हफ्ते आया था. परसों नन्हे का प्लास्टर खुलेगा, अब उसका हाथ काफी ठीक है, एक महीना अंततः बीत ही गया, वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहता है. परसों उनकी मीटिंग भी है. आज भारत-पौलैंड का हॉकी मैच है, यदि भारत यह मैच जीत गया तो सेमीफाइनल में प्रवेश पा सकता है. ओलम्पिक खेलों के समापन में मात्र चार दिन रह गये हैं, फिर चार वर्षों की प्रतीक्षा !



Monday, March 18, 2013

गर्म पानी का पाइप



  पिछले दो दिन यूँ हीं गुजर गए जैसे हर बार गुजरते हैं. शनिवार को नन्हा स्कूल नहीं गया था, ऐसे में सुबहें थोड़ा व्यस्त हो जाती हैं, उसकी मार्कशीट मिल गयी है, सोशल में दो नम्बर कम हैं बाकि सभी विषयों में शत-प्रतिशत अंक मिले हैं. अभी-अभी एक पत्र लिखा है, घर जाना है पर जाने क्यों यात्रा का उत्साह नहीं है. पत्र में क्या असत्य लिखा था ? क्या वह अपनों से भी अर्थात अपने से भी झूठ बोल सकती है...रात को फिर अजीब स्वप्न देखे..सर्वोत्तम में एक लेख पढ़ा था, उसमें लिखा था नींद गहरी न हो तो स्वस्थ नहीं रहा जा सकता, या फिर...पर जब ‘वह’ उसके पास है तब इतनी माथापच्ची करने की उसे क्या जरूरत है.

  कल मंझले भाई की चिट्ठी आयी, उससे एक सवाल पूछा था उसने, जब वह ‘योगी कथामृत’ पढ़ रही थी. उसने बहुत अच्छा जवाब दिया है. विनोबा जी ने अध्यात्मवादी होने के लिए तीन निष्ठाएं बतायी हैं-
निरपेक्ष नैतिक मूल्यों पर आस्था,
जीवमात्र की एकता और पवित्रता में विश्वास तथा
मृत्यु के बाद भी जीवन की अखंडता में विश्वास

भाई ने तो स्वीकार किया कि पहली निष्ठा में वह खरा नहीं उतरता और अगर वह अपने मन में झांक कर देखे तो... वह भी अभी बहुत पीछे है, प्रयास करती है, मगर कई बार असफल रहती है. विश्वास उसे तीनों में है. अच्छाई में विश्वास हो..यह तो सभी के साथ होता है लेकिन उसका पालन कौन कितना करता है.

  कल उन्हें घर जाना है, जून अवश्य ही मना करेंगे यह डायरी ले जाने के लिए..वह भी सबके साथ कहाँ लिख पायेगी बल्कि एक पतली कॉपी या कुछ पन्ने ले जाने से ठीक रहेगा...अपने विचारों या भावनाओं को उकेरने के लिए.

 लगभग एक महीने बाद वह लिख रही है. यात्रा के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए, जिन्हें मन के पृष्ठों पर तो आज भी स्पष्ट देख रही है. माँ-पिता का जीवन के प्रति अनूठा उत्साह देखकर मन गहरे तक प्रेरित होता है. घर में सभी से मिलकर अच्छा तो लगा पर एक-दो बार ऐसा भी लगा कि एक औपचारिकता है जो सभी निभाए चले जा रहे हैं.. पर इस पर अफ़सोस नहीं होता..यह तो परम सत्य है कि इंसान हर काम अपनी खुशी पहले देखकर करता है, यह बात सभी के लिए सत्य है. उन्हें यहाँ आए चौथा दिन है, पहले दिन उसकी उड़िया सखी मिलने आई, खाना खिलाया. यानि उम्मीद के दिए जल रहे हैं और कयामत तक जलते रहेंगे. दूसरों के लिए सोचना यदि हम शुरू कर दें तो दूसरे खुदबखुद..आज इस वक्त साढ़े दस बजे हैं, सिर भारी है, शरीर की हल्की सी पीड़ा भी मन को कैसे प्रभावित कर लेती है, तभी जो वास्तव में लिखना चाहिए था वह न लिखकर सिर की बात लिख गयी. नन्हे की ऑंखें यात्रा के दौरान शहर के प्रदूषण से लाल हो गयी थीं, बहुत संवेदनशील हैं वे धूल व धुएं के प्रति.

दिसम्बर का महीना शुरू हो चका है कल से, और उसे खबर भी न हुई, बड़े भैया का जन्मदिन था कल, उन्हें खत या कार्ड कुछ भी तो नहीं भेजा. इस बार उनसे कुछ ही घंटों के लिए मिल सकी, भाभीजी भी काफी बदली हुई लगीं, वह बड़ी बुआ जी की तरह लगीं रुआब वाली और कुछ मूडी..आज सुबह से सोच रही थी कि लिखना है पर अब दो बजे वक्त मिला है, डेढ़ घंटा अखबार व संडे पत्रिका पढ़ रही थी, पर इतना पढ़ने का कुछ फायदा भी हुआ, सतही जानकारी से कोई लाभ होता है, अखबार सरसरी निगाह से ही पढ़ा और संडे भी कुछ पन्नों को छोड़कर. यूँ कहे कि आजकल कोई बात उसे प्रभावित नहीं कर पाती है तो ठीक होगा. ‘गीता’ पढ़ते-पढ़ते ही मन शायद अब किसी भी घटना में बंध नहीं पाता, तटस्थ हो गया है. कल सुबह बाएं तरफ आयी नई तेलुगु पड़ोसिन के यहाँ गयी, उसकी दो जुड़वां बेटियां हैं, अच्छा लगा उनसे मिलकर. दोपहर को दायीं ओर वाली उड़िया पड़ोसिन के पास. कल मन था कि घर में लग ही नहीं रहा था.
कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गए उनके विवाह की वर्षगाँठ थी, उनका बगीचा भी देखा. आज खत लिखने का दिन है, दोपहर को लिखेगी. नन्हे की ऑंखों की लालिमा तिनसुकिया के डॉ की दवा से ठीक हो गयी है, उसे फोन करके धन्यवाद कहना चाहिए. कल रात वे देर तक बातें करते रहे, पर सुबह स्कूल जाने से पहले वह उसकी आँखों में दवा डालना भूल गयी, जून आते ही पूछेंगे. गर्म पानी का पाइप खराब हो जाने के कारण आने के बाद से उन्हें बाथरूम में गर्म पानी नहीं मिल पा रहा है, नहाने के लिए पानी गर्म करना पड़ता है. आज भी प्लंबर नहीं आया है अभी तक.

Monday, January 21, 2013

वसंत की विदाई



शनिवार और इतवार गुजर गए, अच्छे दिनों की तरह. शनि की शाम को वह थोड़ा सा  घबरा गयी थी, जून डिब्रूगढ़ गए थे, आने में काफी देर कर दी, कार खराब हो गयी थी, पर फिर सब ठीक हो गया. इतवार शाम वे पड़ोस में एक बच्चे के जन्मदिन पार्टी में गए. आज सुबह ही पंजाबी दीदी ने फोन किया, वह उस समय खिड़कियों के लिए नेट के पर्दे सिल रही थी. उनके पास पंजाबी गीतों का एक कैसेट है, वह चाहती हैं वे उसे टेप कर दें. उसने कहीं पढ़ा कि डायरी लिखना चरित्र विकास में अत्यंत सहायक है. अपनी गलतियों तथा अपने सद्विचारों को परखने का माध्यम है. वह गलतियाँ तो हर पल न जाने कितनी करती है पर डायरी में लिखती नहीं. कल शाम को जून को कितना कुछ कह गयी, यह सबसे बुरी आदत है ज्यादा बोलना, किसी बात को कम से कम शब्दों में कहने से उसका असर बढ़ता ही है कम नहीं होता. जून कितने धैर्यवान हैं जरा भी बुरा नहीं मानते मगर वह जानती है यदि वह उसे ऐसे ही कुछ कह दें तो उसे कितना खराब लगेगा....नन्हे को प्यार वह भी उससे कम तो नहीं करते. और दूसरी कमजोरी है उसकी, कोई कार्य करके पछताना, पहले उत्साह में या कहें जल्दबाजी में कुछ करना और फिर सोचते रहना कि ऐसा न करके वैसा किया होता. तीसरी गलती है अपेक्षाएं रखना, इस दुनिया में अगर सही अर्थों में सुखी रहना है तो किसी से भी कोई भी अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योकि ज्यादातर मामलों में लोग निराश करते हैं और जहां नहीं करते हैं वहाँ उनकी और ध्यान नहीं जाता अर्थात हम खुश कम होते हैं और उदासी ज्यादा ओढते हैं.

मार्च का अंतिम दिन यानि वसंत को विदा और गर्मी का आगमन. आज भी कैसी उमस है इस कमरे में, अभी साढ़े नौ ही हुए हैं, बिना पंखा चलाए यहाँ बैठना मुश्किल है. अब सुबह अपने आप ही नींद खुल जाती है और सर्दियों की तरह उठने में देर भी नहीं लगती. नन्हे का आज पहला पेपर है, अंग्रेजी का, अच्छा होगा क्योंकि उसे सब याद है, कितना खुश था सुबह, बच्चे हर वक्त खुश, खिले-खिले पता नहीं कैसे रह लेते हैं...तभी तो वे बच्चे हैं ! उसकी एक परिचित का कई दिनों से फोन नहीं आया, उसे लगता है कि सम्बन्ध थोपे नहीं जा सकते, यदि सम्बन्ध जरूरत पर ही टिके हैं तो ठीक है जरूरत होने पर ही वह भी बात करेगी.

यह उसकी नितांत व्यक्तिगत पूंजी है
उसका ईश्वर सदा उसके पास है

आज बहुत दिनों बाद गीता पढ़ी, और अब अपने निकट आने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ है. अप्रैल के महीने में दूसरी बार. इतने दिनों जैसे किसी स्वप्नलोक में जी रही थी. नन्हे के इम्तहान हुए, वे तिनसुकिया गए, मित्र परिवार को खाने पर बुलाया. छोटी बहन का पत्र आया. बड़ी बुआ के बेटे की शादी का कार्ड आया. छोटी भांजी कविता लिखती है, मालूम हुआ, और न जाने कितनी बातें.. कुछ लोगों से पहली बार मुलाकात हुई, चादर के तीन हिस्से पूरे हो गये. लेकिन बार-बार मन आहत होता है क्योकि अपेक्षाएं लगा बैठता है जो पूरी नहीं होती सकतीं..क्योकि वे दूसरों पर आश्रित होती हैं. अपना काम स्वयं करो संतुष्ट रहो, यही पाठ तो गीता में पढ़ती है फिर...आमतौर पर लोग निस्वार्थ नहीं होते..और पहले अपनी सुविधा फिर दूसरे का काम, यही रवैया अपनाते हैं...और जितनी जल्दी यह बात समझ में आ जाये..उतना ही अच्छा है.


Tuesday, July 10, 2012

कहाँ से आये शक्कर पारे


पिछले तीन दिन वह व्यस्त रही, जून का दफ्तर बंद था, परसों शनिवार था फिर इतवार और सोमवार को गणतन्त्र दिवस. शनि की शाम वे किन्हीं परिचित के यहाँ गए, बहुत सुंदर लगा उनका घर, सजा-सजाया घर था, एक-दो माह बाद वह भी अपने घर के लिये कुछ कलात्मक वस्तुएं खरीदेगी उसने सोचा. इस समय वही पहले की सी शाम है, नन्हा सोया है और जून घूमते हुए लाइब्रेरी गया है. उसी दिन उन्होंने आलू चिप्स बनाये थे, अब तो पूरी तरह सूख गए हैं. सोनू उठकर नीचे कालीन पर बैठ गया है, ठंड कुछ बढ़ गयी सी लगती है, उसको मोज़े पहनाने हैं, टोपी वह पसंद नहीं करता. मुँह से कैसी-कैसी आवाजें निकलता है, बहुत तरह की आवाजें, बच्चे जाने किस मस्ती में रहते हैं. जून ने आज उसे चार बेर लाकर दिए, पहले खट्टे फिर कसैले लगते हैं.

संध्या के सवा पांच बजे हैं, जून रोज की तरह टहलने गए हैं और नन्हा भी किसी स्वप्नलोक में विचरण कर रहा होगा. वह लिखने बैठी है दिन भर की कुछ घटनाएँ. सुबह सामान्य थी, उनके किचन गार्डन में गाजर की फसल बहुत अच्छी हुई है इस बार, पड़ोसन को देने गयी, वह कुकिंग प्रतियोगिता में भाग लेने वाली थी पर देर से पहुंचने के कारण भाग नहीं ले पायी. दोपहर को जून के जाने के बाद उसने कुछ देर स्वेटर बनाया नन्हें के साथ खेला, फिर वह अपना भोजन करके सो गया तो किचन साफ किया, फिर कुछ देर को सो गयी. दोनों उठे तो सवा दो बजे थे, तैयार होकर बाहर घूमने निकले, सोचा टैटिंग का कोई नया डिजाइन लेगी अपनी मित्र से, पर धागा खत्म हो गया था. असमिया मित्र के यहाँ गयी जिसका बेटा नन्हें से मात्र एक माह बड़ा है. वापस आयी तो देखा एक पैकेट पड़ा है, सोचा कोई सब्जी रख गया होगा शायद उनका ही माली. पर आये हैं शक्करपारे और नमकीन, पता नहीं कौन रख गया है. जून और वह अपने सभी परिचितों के नाम गिन चुके हैं. किसी के भी इस तरह का पैकेट रख जाने की सम्भावना नहीं दिखती. 
क्रमशः

Wednesday, February 29, 2012

अकेलापन


कल शनिवार था वे शाम को एक जन्मदिन पार्टी में गए. सितम्बर का आखिरी दिन. आज जून को उम्मीद थी कि पे स्लिप मिल जायेगी, पर नहीं मिली, ज्यादातर एक दो दिन पहले ही आ जाती है, उन्हें बहुत इंतजार था. एक शादी में गिफ्ट देना था, फिर उसके मित्रों ने किसी तरह प्रबंध किया और सबने मिलकर एक उपहार दिया. उन्होंने सोचा कि भविष्य में इस तरह खर्च करना है कि वक्त जरूरत पड़ने पर कोई कमी न महसूस हो.
जून आज बाहर गया है. दोपहर नूना ने क्रोशिये का काम आगे बढ़ाया. कुछ देर किताब पढ़ी. उस का मन नहीं लग रहा. उनके घर के सामने एक नौकरीपेशा उड़िया लड़की रहती है. बहुत खुशमिजाज है. साथ में एक असमिया लड़की भी है जो इलेक्ट्रिकल इंजीनियर है. कुछ देर के लिये उनके घर गयी. घर में फोन भी नहीं है, पास में ही किसी के घर पर जून फोन करके उससे बात करता है. सुबह का खाना बच गया है, उसने सोचा कुछ बनाये या उसी से काम चला ले, यूँ बासी भोजन उसे जरा नहीं भाता, दस-बारह घंटे ही हुए हैं अकेले रहते और उसे लग रहा है जून को कई दिनों से नहीं देखा.