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Saturday, September 22, 2012

जश्न का माहौल



कल रात वे लोग साढ़े दस बजे वापस आए. कार्यक्रम अच्छा था, पर पार्टी का या शादी-ब्याह का भोजन गरिष्ठ तो होता ही है, पेट अभी भी इसकी खबर दे रहा है. समारोह में न सादगी ही थी, न कोई नियम, बस अपने आप चलता जा रहा था, नन्हा तो वहाँ की भीड़, रोशनियों और बच्चों में कैसा घुलमिल गया, उसे बड़ा आनंद आ रहा था था. माँ पहले तो वहाँ जाने के नाम से ही मना कर रही थीं, शुरू में वहाँ अपने को अनफिट भी समझती रहीं पर बाद में बहुत आनंद ले रही थीं. सब मिलाकर देखा जाये तो सब ठीकठाक ही था. आज उसने सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे, और एक छोटा सा पत्र जून को भी, उसे कैसा लगेगा इतना छोटा पत्र देख कर. वह उसे एक पेज पर लिख कर ले जायेगी, बाजार से पुस्तकें भी लाएगी और भी कुछ सामान यदि सम्भव हुआ. आज सुबह तीन बजे ही वह छत से नीचे आ गयी थी, ऊपर ठंड बढ़ गयी थी. नन्हे की नाक बंद हो गयी है, उसका बिस्तर पिताजी ने नीचे लगा दिया. वह भी कुछ देर सोयी एक स्वप्न देखा कि कॉलेज में या हॉस्टल में उसके कमरे का ताला बदमाशों ने तोड़ दिया है और उसकी किताब कॉपी चुरा ली है. रो ही पड़ी होती कि नींद खुल गयी. पर अब पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें बंद हो रही हैं, उसने सोचा पहले स्नान करना ही ठीक रहेगा.

एक सुंदर पन्ने पर उसने लिखा- मिसेज एस ने बैठक के दरवाजे पर खड़े होकर कमरे पर आखिरी नजर डाली, हाँ, अब ठीक है. कल ही उन्होंने सारे पर्दे, कुशन, चादरें आदि धुले-धुलाए प्रेस किए हुए बिछाये थे. कमरे की एक-एक वस्तु को पोंछ कर नए सिरे से रखा गया था. कमरा निखरा-निखरा सा लग रहा था. दूसरे कमरों में भी कुछ न कुछ बदलाव तो आए थे और रसोईघर में भी. हों भी क्यों न मिस्टर एस अगले हफ्ते सेवा निवृत्त हो रहे थे. उस अवसर पर उनके सभी बच्चे अपने-अपने परिवारों के साथ आ रहे थे. घर में जश्न का सा माहौल रहेगा. पति-पत्नी दोनों अपने-अपने विचारों में खोये रहते थे. एक-दूसरे से कहे या पूछे बिना ही उनके चेहरे देखकर जाना जा सकता था की वे अपने भविष्य के बारे में सोच रहे हैं. पत्नी प्रसन्न थी कि सेवा निवृत्ति के बाद दोनों साथ-साथ समय बिताएंगे. कम बोलने वाले उनके पति यह सोचा करते थे की अपना समय संगीत, पुस्तकों और बागवानी को देंगे. जाहिर है इसमें पत्नी का साथ तो रहेगा ही. दोनों को साथ-साथ बिताए वर्षों की खट्टी-मीठी स्मृतियाँ बार-बार आकर घेर लेती थीं. मिसेज एस की आँखों में कई बार एक शिकायत झलक जाती थी जो कड़वी स्मृतियों का परिणाम थी और कभी-कभी एक स्निग्ध आभा जो सार्थक क्षणों की देन होती थी. वह  कब चाहती थीं कि उन सब बीती बातों को याद करें पर स्मृतियों पर किसी का वश तो नहीं. यही हाल कमोबेश श्री एस का था, यह अलग बात थी कि उनकी यादों का दायरा कभी घर-परिवार में सिमट जाता था और कभी कार्यालय व सहयोगियों में. अपने विभाग में एक उच्च अधिकारी रहे थे पिछले कई वर्षों से, जिम्मेदारियां काफी थी, जिन्हें वह अच्छी तरह से निभा रहे थे. स्वभाव से मितभाषी, उदार, कोमल हृदयी वह कभी अपने परिवार के प्रति कठोर हो सके थे अब सोचकर जैसे उन्हें विश्वास नहीं होता था. हो सकता है ऐसे किन्हीं दुर्बल क्षणों में उनका हृदय अपनी जीवन संगिनी के प्रति किये गए जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा मांग चुका हो. बड़ा पुत्र उनके कठोर अनुशासन में पला जिसका असर उसके मन-मस्तिष्क पर कितना पड़ा यह तो नहीं कहा जा सकता पर यह जरूर है कि वह अंतर्मुखी है मंझले और छोटे बेटे के आते-आते यह अनुशासन काफी ढीला पढ़ गया और सबसे छोटी बेटी तक तो समाप्त प्रायः ही हो गया. अब सभी आ रहे हैं. कभी-कभी किसी विवाह अथवा त्यौहार के अवसर पर ही ऐसा हो पाता है.
आज वह दिन आ ही गया. पिछली रात देर तक बातें होती रहीं. वे दोनों तो मुश्किल से दो-तीन घंटे ही सो पाये होंगे. और सुबह पाँच बजे ही आदत के अनुसार उठ गए हैं. प्रातः भ्रमण उनका पुराना शौक है. पिछले कुछ वर्षों से श्रीमती एस का भी, पहले उन्हें कहाँ वक्त मिल पाता था. जब सब बच्चे छोटे थे. सुबह उठते ही घर के कामों में लग जाना पड़ता था. बच्चे जब तक जगें वह कितना कम निपटा चुकी होती थीं. तब खर्च अधिक था सभी काम उन्हें अपने हाथों से करने होते थे. घर में गैस का चूल्हा भी नहीं था तब. वे दिन क्या वह कभी भूल सकती हैं, सर्दी हो या गर्मी उनके दिन की शुरुआत पाँच बजे ही हो जाती थी. अपनी पूरी मेहनत और आंतरिक शक्ति के बल पर उन्होंने सभी बच्चों को अच्छे संस्कार दिए, आधुनिक माता-पिता की तरह उन्होंने बच्चों के पालन-पोषण पर पुस्तकें तो नहीं पढ़ी थीं बस जो कुछ अपने आस-पास देखा था और जो उनके मन को अच्छा लगा वही शिक्षा उन्हें दी. पर जब परिवार बड़ा हो तो कोई न कोई पक्ष छूट ही जाता है बच्चों को बाहर की दुनिया के जिस कुप्रभाव से बचाकर रखा वहीं घर में उन पर होता अन्याय शायद वे देख नहीं पाए. रोजी-रोटी की फ़िक्र ने तथा परिवार पर विश्वास ने जो कि सामान्यतः हर घर मे होता ही है. बड़ा पुत्र और उसकी पत्नी परसों ही आ गए थे. बेटा अच्छे पद पर है, पत्नी भी मिलनसार और शौक़ीन मिजाज की पाई है. पर ईश्वर जहां फूल खिलाता है कांटे भी उगाता है. बेटे की शादी को दस-ग्यारह साल हो गए हैं पर आंगन अभी तक सूना है. मंझले बेटे की नौकरी भी अच्छी है, वह पत्नी के साथ दो हफ्ते पहले आ गया है. और तीसरे बेटे की शादी अभी हाल में ही हुई है. छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही है, उसकी शादी को छोडकर सभी बच्चे अपने अपने परिवार में व्यवस्थित हैं. सांसारिक दृष्टि से देखें तो सभी खुश हैं.
वह जो शब्द-चित्र लिख रही थी लगता है, पूरा हो गया है क्योंकि अब कलम रुक-रुक जाती है.

Thursday, August 30, 2012

ममता के बंधन



कल जून के दो पत्र मिले, एक उसके मायके के शहर से लौट कर आया हुआ और एक वहीं से लिखा हुआ, वह बाद में उससे मिलने वहाँ गए थे. कल रात बहुत वर्षों बाद उसने अपनी एक पुरानी मित्र को स्वप्न में देखा, अभी उस दिन शादी में किसी से उसके बारे में बात की थी, सचमुच वैसी ही थी जरा भी नहीं बदली. सभी से बातें कर रही थी. फिर मैंने एक दो सवाल पूछे अद्भुत स्वप्न था. जून को भी देखा था शायद याद नहीं. उसके आने में दस-बारह दिन ही तो रह गए हैं. अब यहाँ मन नहीं लगता, कल रात नन्हें के रोने पर, मन पहले से ही भरा होने के कारण उसकी भी आँखें क्या भर आयीं सब उसे दोषी समझने लगे हैं. रात को पिता कितना रो रहे थे. पता नहीं यह सच है या उसका भ्रम कि वे  सब लोग उससे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं. मन इतना उदास है कि जून अगर होते तो ऐसा नहीं होता.
माँ और पिता का दुःख अब देखा नहीं जाता. सुबह से ही दोनों रो रहे हैं. संतान का दुःख सबसे अधिक पीड़ात्मक होता है. पापा यह कहकर रोते हैं कि आज उस दुर्घटना को पूरे पचास दिन हो गए और माँ को किसी बहाने की जरूरत नहीं है. सुबह उनके कहने पर ही उसने उसके बैग से कपड़े निकल कर धो दिए, वह जैसे उन्हें देख नहीं पा रही थीं. मानव मन कितना भावुक होता है और स्नेह, ममता का पाश कितना मजबूत. बेटे के लिये किस तरह तडप रहे हैं दोनों. समझ नहीं आता किस दिन वे अपने आपको समझा पाएंगे, संतोष दे पाएंगे. मन इतना बोझिल हो गया है और आँखें जल रही हैं पर इस दुःख का कोई अंत नहीं, अंतहीन है यह पीड़ा, अंतहीन हैं ये आँसू. अपने छोटे से जीवन में कितनी आशाएं, कितने सपने जगाए थे उसने. अब जाने किस लोक में होगा, क्या वह महसूस कर पाता होगा कि उसके जनक उसके पिता कितना सोचते हैं उसको, उसको याद करके घंटों आँसू बहाते हैं.

कल रात उसे फिर स्वप्न में देखा, मन कितना बोझिल है सुबह से. देखा कि माँ और कविता पलंग पर सोयी हैं वह दरवाजे के बीचोंबीच रॉकिंग चेयर पर बाहर की ओर मुँह किये बैठा है, वह अपना सूटकेस खोलती है एक के बाद एक कई वस्तुएं निकलती है एक मिठाई का डिब्बा है उसमें से सबसे बड़ी अच्छी वाली मिठाई निकलकर उसके पास ले जाती है, कहती है, भाई की शादी की मिठाई तुमने खायी ही नहीं, तुम इतने दिन कहाँ चले गए थे. वह सिर्फ हँसता है, वह अपने हाथ से उसे खिलाती है थोड़ा सा रस उसके सफेद कोट पर गिर जाता है वह कहती है क्या पानी से साफ कर दूँ, वह मना कर देता है. उसके बाद देखा कि वे लोग घूमने जा रहे हैं जून वह और नूना, रास्ते में उसके दोस्त मिलते हैं जो आश्चर्य से उसे देखते रह जाते हैं. वह उनसे बात नहीं करता, थोड़ी दूर जाकर वह मुड़कर देखती है वे हाथ हिला रहे हैं. जब उसके किसी मित्र ने कोई सवाल किया तो जाने किस डर से उसका हाथ पकड़ लिया या उसने ही उसे छुपाने बचाने के लिये. उसके बाद एक दृश्य में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है. वीडियो पर कोई फिल्म दिखाई जा रही है, वह बैठा है, उससे पूछता है, बच्चा कहाँ है, वह नन्हे को लाकर उसे दिखाती है, जो लाल पैंट और गुलाबी स्वेटर पहने है, वह फोटोग्राफर से नन्हें का एक फोटो खींचने को कहता है, पर वह अकेले खींचने को मना कर देता है. उसके बाद की बात उसे याद नहीं. जब इस स्वप्न की बात उसने माँ को बताई तो वह और पापा फिर रोने लगे, पर बिना बताए जैसे मन पर एक बोझ सा था.

उसने अपने मन को स्वच्छ करने के लिये सारी स्मृतियों से एक साथ दूर होने के लिये एक पत्र लिखा - जैसे कोई इन्द्रधनुष देखते-देखते आकाश में घुलता जाता है, जैसे कोई सुंदर सपना खत्म हो जाता है, जैसे मुट्ठी में बंद मणि कहीं खो जाये ऐसे ही तुम कहीं खो गये हो, अनंत आकाश में, जाने किस लोक में विलीन हो गए हो. मेरा तुमसे परिचय ही कितना था. कुल चार बरस ही तो हुए हैं मुझे इस घर में ब्याह कर आये हुए. विवाह से एक दिन पहले तुम आये थे मुझसे मिलने, शरमायी, सकुचायी सी मैं तुमसे ठीक से बात भी कहाँ कर पायी थी. पर देखा था पहले तुम्हें फोटो में, सो पहचान तो देखते ही गयी थी. मन में कहीं गहरे संतोष हुआ था कि सलोना, सुंदर देवर है. तुम्हारे भाई ने मुझे एक दिन तुम्हारे बारे में कई बातें बतायीं थीं कि तुम उसे बहुत प्रिय थे, तुम दोनों भाई माँ-पिता को बहुत सुख देना चाहते थे, कि तुम अपने भाई की कोई बात टाल नहीं सकते थे, कि तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो. विवाह के बाद जब तुमसे मिलना हुआ तुम्हें जीवंत आशाओं से भरा, उत्साह से लबरेज पाया. जैसे कोई शक्ति तुम्हारे मन में कूट-कूट कर भरी थी. हर वक्त नयी उमंग, नयेपन की खोज. जाने क्या ढूँढने तुम शहर-शहर प्रदेश-प्रदेश घूमा करते थे. कौन जाने वही तलाश तुम्हें इस दुनिया से कहीं दूर ले गयी, शायद जो तुम चाहते थे वह इस दुनिया में नहीं है. तुम जैसे लोगों के लिये यह दुनिया नहीं हैं. पर कभी सोचा नहीं होगा कि तुम्हारे जाने के बाद हम सबका क्या होगा, कि तुम्हारी माँ, तुम्हारे पिता शून्य में तकते-तकते अपनी ज्योति न गंवा बैठेंगे. तुम्हारे भाई सूनी-सूनी दृष्टि लिये जब मुझे देखते हैं, मैं अंदर तक कांप जाती हूँ. उन आँखों में उठते सवाल को सहने की शक्ति नहीं है मेरे पास. सभी तो जैसे एक दूसरे से अपने से यही पूछते लगते हैं कि तुम कहाँ खो गए. पर ऐसे सवालों के भी क्या जवाब होते हैं. अनुत्तरित प्रश्न हथौड़े की तरह दिमाग से टकराते हैं ऐसा क्यों हुआ, ऐसा हमारे ही साथ क्यों हुआ. और जब कहीं कोई जवाब नहीं मिलता आँखें झुक जाती हैं आँसुओं के बोझ से भारी हो जाती हैं बरस पड़ती हैं. कोई इस दुनिया को छोड़ चुका हो चला गया हो ऊपर अनुपम लोक में तो क्या उसका खत आता है, तुम नहीं थे पर तुम्हारी चिट्ठी आयी, वही जानी पहचानी लिखावट और.. भाभी, शब्द जैसे जला रहे थे, आज तुम नहीं हो मैं तुम्हारे कमरे में देख रही हूँ तुम्हारी किताबों को, सजाये गए सामान को. इन सबमें तुम्हारा स्पर्श है अनगिनत यादें हैं. यह सब लिखकर उसका मन जैसे खाली हो गया वह नन्हें के साथ खेलने लगी.




   

चूहे की खिटपिट



जून का और पत्र नहीं आया. आज दोपहर छोटे भाई की शादी का कार्ड मिला, जो खुशी सामान्य हालातों में होती वह महसूस नहीं हुई, फिर भी कार्ड हिंदी में है, उन सभी का नाम है, देखकर अच्छा लगा, शादी में जायेगी. सोनू के लिये यह एक अवसर होगा, उसके जीवन की दूसरी शादी, पहली बार बुआ की शादी में वह मात्र चार महीने का था. वह भी सबसे मिल पायेगी, मामा, मामी, बुआजी और सारे रिश्तेदारों से. आज एक पत्र और आया है, गुजरात से मौसा जी का. पढ़कर सभी को अत्यधिक क्षोभ हुआ. सगे रिश्तेदार होकर लोग इस तरह का व्यवहार करते हैं. किसी की मृत्यु हो जाने के बाद उसके माता-पिता से ऐसा व्यवहार, सचमुच यह दुनिया पैसे से ही चलती है. भावनाओं से ज्यादा कीमत पैसे की ही है.

आज इतवार है, कल वह कुछ नहीं लिख सकी. आज का दिन अच्छा बीता. माँ-पिता आज शांत रहे. सुबह नन्हें ने कहा चाचा आसाम में हैं. बड़ा होकर समझ जायेगा कि चाचा कहाँ हैं. जून का पत्र कल आयेगा और चार दिन बाद तो वह आ भी रहे हैं. मौसम ठंडा हो गया है, कल रात एक के ऊपर एक दो चादर ओढ़ी तो ही सो पायी.

रात भर स्वप्न देखती रही जून आ गए हैं और पिछली  कई रातों को उसने स्वप्न में उसे देखा है. अगर वह ना आये तो? यह सोचकर अच्छा नहीं लगता, उसका पत्र भी नहीं आया..सोचा होगा जब स्वयं ही जा रहा है तो पत्र की क्या जरूरत है. कल उसने स्वप्न में एक सफेद कमीज, काली पैंट पहने लडके को दूर से आते देखा, सोचा शायद उसका भाई है पर पास आकर पता चला वह नहीं था, वह बिना उन्हें देखे आगे निकल गया. जाने वह कहाँ होगा, होगा भी या नहीं.

वह भाई की शादी में गयी और लौट भी आयी. जून आ गए थे और उसके अगले दिन वे गए. नन्हा और वह शादी में, वह स्वयं दिल्ली चले गए. वहाँ सभी से मिलना हुआ, शादी का कार्यक्रम भी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. वापसी में वह भाभी के भाई-भाभी के साथ आयी. आज ही उसने माँ को पत्र लिखा है जून को भी. यहाँ दो महीने रहने के बाद वह वापस जायेगी  अपने घर. वैसे यह भी तो अपना ही घर है बचपन के अपने घर से ज्यादा अपना घर.

कल फोन आया था पड़ोस में, उन्होंने बुलाकर बात करवायी, बहुत अच्छा लगा इतने दिनों बाद जून से बात करके. अब केवल बारह दिन ही रह गए हैं, जब वह आएंगे. किसी चूहे की आवाज आ रही है जहाँ सोनू सोया है, उसके पीछे की अलमारी के पास से. आज संभवतः उन्होंने पहली बार खाना समय पर खा लिया है, तीन बजने में दस मिनट हैं, उसने सोचा कुछ लिख ले या सूची ही बना ले कि उन्हें यहाँ से क्या-क्या लेकर जाना है. कल रात स्वप्न में फिर उसे देखा, उसे लगा वह मोटरसाइकिल पर बैठाकर घुमा रहा है, और इतनी धीमे अच्छी तरह चला रहा है जैसे हवा में उड़ रही हो. कभी वह बड़ा भाई बन जाता था कभी जून कभी खुद, कुछ समझ नहीं आया कैसा स्वप्न था.
क्रमशः

Saturday, August 25, 2012

बात फूलों की रात फूलों की



आज बड़ी भाभी के परिवार में एक शादी है, उसने सोचा सभी वहाँ गए होंगे. कुछ महीने पूर्व जहाँ एक मृत्यु के कारण गमी का माहौल था अब रौनक होगी, फिर भी उस दुःख की छाया कहीं न कहीं अवश्य पड़ रही होगी. उन्हें भी कार्ड मिला है, उसने सोचा जवाब लिखेगी. बड़ी ननद का खत आया है तथा सदा की तरह उसे नहीं भाई को लिखा है, अब उसका जवाब तो उन्हीं को देने दो.

मन में कैसी अनजानी अनदेखी हिलोरें सी उठ रही हैं. पोर-पोर प्यार में डूबा हुआ, मौसम भी मन को भाने वाला है, ठंडा ठंडा...मन-प्राण को शांत करने वाला. वर्षा की बूंदें एक संगीत उत्पन्न कर रही हैं, कल द्विजेंद्रनाथ निर्गुण की एक अनूठी सी कहानी पढ़ी, ‘सरस्वती’ पढ़ते-पढ़ते विजयलक्ष्मी याद आती रही, ऐसी ही तो थी वह वाचाल, लगातार कुछ न कुछ बोलते रहने वाली. शायद उसने भी पढ़ी हो यह कहानी. उसकी भी शादी अब तक हो गयी होगी, उसका पता शायद किसी पुरानी डायरी में हो. कल क्लब में एक फिल्म थी, हिंसा की पराकाष्ठा थी जिसमें, वे जल्दी ही लौट आये.

कल शाम से ही मन उद्वगिन था, रात को नींद नहीं आ रही यही. साढ़े ग्यारह तक पढ़ती रही उसके बाद सोयी, जून भी उसे देखकर परेशान हो गए थे, पर वह खुद ही अपनी उदासी का कारण नहीं समझ पाती. उसी का परिणाम है आज सुबह एक घंटा बगीची में काम किया, डहेलिया की कटिंग्स लगायी हैं, देखें कितनी बचती हैं. गुलदाउदी के पौधों को भी ठीक किया, माली ने क्यारी ठीक कर दी है, शाम को फ्लॉक्स के बीजों का छिड़काव भी कर देगी. पौधों की प्यार से देखभाल करने से मन प्रसन्न है. उसने सोचा आज से नियमित कुछ देर बगीचे में काम करेगी. आज दोपहर उसे दोनों साड़ियों पर फाल भी लगानी है.

पूजा की छुट्टियाँ भी गुजर गयीं, आज तीन दिन बाद जून ऑफिस गए हैं और धूप भी निकली है आज बहुत दिनों के बाद. सोनू पूरे एक घंटे से दूध का गिलास लेकर बैठा है, बीच बीच में खेलने लगता है, चम्मच से पिलाऊं तो फटाफट पी लेगा पर उसे खुद पीना कभी तो सीखना पड़ेगा. आज सुबह माली आया, पैंजी के बीज भी लगा दिए हैं अब सिर्फ स्वीटपी के बाकी हैं. पूजा के दौरान एक दिन वे दिगबोई गए था, वहाँ गोल्फ फील्ड का खुला मैदान बहुत अच्छा लगा. कल दशहरा देखने गए, बारिश के कारण रावण ठीक से जल नहीं पाया.

Tuesday, July 10, 2012

नदी तट पर पिकनिक



उसने बहुत दिनों बाद एक पत्र लिखा, उनकी शादी की सालगिरह थी, जून रोज की तरह ऑफिस गए थे. सोचा कुछ तो अलग होना चाहिए, मन में उथल-पुथल मची थी कि ऐसा कुछ लिखे जिससे उसके दिल का हाल वह जान ले. समय कितना जल्दी बीत जाता है, अभी उस दिन की ही तो बात है जब अपने कमरे में बैठकर वह उसका पत्र पढ़ रही थी. और अब तो वह सदा के लिये यहाँ आ गयी है, और उसके बाद आया नन्हा, उनका छोटा सा परिवार बना. उसे लगता है बचपन में वह भी इतना ही प्यारा लगता होगा, गोलमटोल, गोरा-गोरा और गुदगुदा. उसे हँसी आयी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है मन, उसे याद आये शुरू के दिन उनकी बातें ही खत्म नहीं होती थीं. फिर कुछ दिनों के लिये वे अलग हुए थे वह कितना याद करती थी उसे. उसने सोचा कि वह रोज उसे जल्दी उठने के लिये  कहती है, व्यायाम करने के लिये कहती है, इतवार की सुबह नाश्ते के बाद जब वह फिर से सो जाता है तो टोकती है, साहित्य में रूचि जगाने के लिए कहती है, किताब पढ़ने को कहती है, यह सब पत्र में अच्छी तरह समझा कर लिखा.
आज जून कुछ देर से गया है सांध्य भ्रमण पर, पर माहौल वही है. शाम घिर आयी है, नन्हा सो रहा है, किसी किसी दिन वह खूब सोता है जैसे आज सुबह उठने का नाम ही नहीं ले रहा था, उसे
उठाना पड़ा. पेड़ों की पत्तियाँ देखकर कितना खुश होता है वह. आज सुबह वह कुछ लिखने का प्रयास कर रही थी कुछ लाइनें ही लिख पाई. पंजाब के बारे में रोज वही समाचार सुनते हैं, पढ़ते हैं, हत्या, आतंकवाद ने किस तरह अपने शिकंजे में जकड़ लिया है पंजाब प्रान्त को. क्या सोचते होंगे वहाँ के वासी. उसे अलका की याद हो आयी, उसकी मित्र तथा दीदी की भतीजी जिसकी शादी पंजाब में हुई है. उसने सोचा दीदी से कहकर उसका पता मंगवाएगी पंजाब के कुछ दूसरे समाचार तो जानने को मिलेंगे.
आज नेता जी की ९०वीं जयंती है, कुछ माह पूर्व उसने दो खंडों में एक पुस्तक पढ़ी थी, ‘मैं सुभाष बोल रहा हूँ’, पहली बार मालूम हुआ था कि नेता जी ने वास्तव में कितने साहस के साथ एक महान कार्य का बीड़ा उठाया था. जून आज तिनसुकिया गया है, वह नन्हें के साथ एक सखी के यहाँ गयी थी, वह पूरा एक घंटा चुपचाप खेलता रहा जरा भी परेशान नहीं हुआ. जून ने बताया है कि अगले महीने उसके विभाग के सभी लोग परिवार सहित पिकनिक पर जायेंगे, वे भी जायेंगे किसी नदी तट पर.

Friday, January 13, 2012

बिजली का जाना


सुबह के साढ़े नौ बजे हैं, अभी-अभी रेडियो श्रीलंका से 'हफ्ते के श्रोता' कार्यक्रम समाप्त हुआ है. परमार जी अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं, यूँ तो सभी एनाउंसर अच्छे हैं. कितनी गर्मी हो गयी है. नूना कपड़े प्रेस कर रही थी कि बिजली चली गयी, ऐसा यहाँ कभी कभार ही होता है, शायद दूसरी या तीसरी बार ही हुआ है. कल शाम एक दक्षिण भारतीय जोड़ा आया, कुछ सप्ताह पूर्व ही उनकी शादी हुई है. उनके साथ नाश्ता किया सो रात को सिर्फ दलिया ही बनाया. पिछले दो तीन दिन से रोज रात को स्वप्न में सभी परिवार जनों को देखती है नूना. 

वर्षा की झड़ी लगी हुई है, रिमझिम बरसता पानी नूना को बहुत बाता है और जून को भी. आज शनिवार है. अगर दिन भर यूँ ही पानी बरसता रहा तो कितना अच्छा होगा. कल वे एक हिंदी फिल्म देखने गए तब भी वर्षा हो रही थी, नूना थोड़ा सा भीग भी गयी, फिल्म उदासी भरी थी, शोषण का घृणित रूप दिखाया गया था फिल्म में. कल घर से पत्र भी आया, कितना सुख देते हैं पत्र पढ़ने वाले को. जून की बांह में पिछले दो-तीन दिनों से दर्द था, वह आज भी डॉक्टर के पास नहीं जा पाया होगा. नूना ने सोचा वह उसका ज्यादा ख्याल रखेगी. उसे सूप पीना पसंद है, सो वह आलू-परवल-टमाटर  का सूप बनाएगी.  

Thursday, June 30, 2011

तीन महीने


ल उनकी शादी को तीन महीने हो गए, इस खुशी में एक फिल्म देखी ‘प्रेम रोग’. Guide पूरी पढ़ ली वही जिस पर देवानंद की फिल्म भी बनी थी, पर उपन्यास व फिल्म में बहुत अंतर है, और अब यहाँ लॉन में है, हवा का शीतल स्पर्श भला लगता है. कितने दिनों बाद इस तरह प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर कलम हाथ में ली है. आज वह देर से आने वाला है. कल कुछ नहीं लिख सकी, इस ओर ध्यान ही नहीं गया. कल रात खाना उसने बनाया, नूना ने थोड़ी सी सहायता की. वह सब कुछ बहुत अच्छी तरह कर लेता है, और उसके न होने पर घर कितना सूना-सूना लगता है. कल घर में रंग-रोगन होगा, घर कितना साफ-सुथरा लगेगा तब, काश यह बगीचा भी ठीक हो जाये !    

Saturday, May 28, 2011

पहला महीना



पिछले माह यह सुंदर डायरी जून ने नूना को दी थी कि वह अपने अनुभवों को लिपिबद्ध कर सके, पर यह हो न सका, वह नहीं जानता कि शब्द नहीं मिलेंगे उन भावों को व्यक्त करने के लिये जो पिछले दिनों उसके साथ रहकर नूना के मन में उमड़ते रहे हैं. आज भी कितनी जल्दी उनकी नींद खुल गयी थी, लगभग रोज ही ऐसा होता है और एक के जगने पर दूसरा अपने आप उठ जाता है, जीना इतना सरल है यह आज के पहले वह नहीं जानती थी. अपने घर की जैसी कल्पना उसने की थी यह वैसा ही सुंदर है.
अभी दस भी नहीं बजे हैं सुबह के, आज बारिश हो रही है. उसने सब काम जल्दी-जल्दी कर लिये हैं जिससे कुछ पढ़ने का या चिट्ठी लिखने का समय मिल जाये. उसके घर पर होने पर तो यह संभव ही नहीं हो पाता, बस मन होता है ढेर सारी बातें करते रहें या यूँ ही बैठे रहें पास-पास. कल रात को उस ने जून से कहा कि घूमने चलते हैं, पहले ही दिन कहा था, नियमित जायेंगे रात के खाने के बाद पर जनाब को तो ठंड लगने लगी, दिन पंख लगाकर उड़ रहे हैं. कल उनकी शादी को एक महीना हो जायेगा.
क्रमशः