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Thursday, November 5, 2015

कमल कुण्ड की शोभा



जितनी कोई उठा सके उतनी जिम्मेदारी उसे उठानी ही चाहिए, आज सद्गुरु ने कहा, जैसे-जैसे कोई किसी काम को करने का बीड़ा उठाता है वैसे-वैसे उसे करने की शक्ति भरती जाती है ! उसे लगा, वे स्वयं ही अपनी शक्ति पर संदेह करते हैं और फिर आत्मग्लानि से भर जाते हैं. उन्होंने यह भी कहा, सारे गुण भीतर हैं, यह मानकर चलना है. अवगुण तो एक आवरण की तरह ऊपर-ऊपर ही हैं. यदि वे शरण में जाते हैं तो ईश्वर की पवित्रता उनके दोषों को दूर करने में सहायक होती है, वह पावन है और उसकी निकटता में वे भी पावन हो जाते हैं. उनकी वह शक्ति तथा सामर्थ्य जो ईश्वर की कृपा से मिलती है, उनमें अभिमान नहीं जगने देती बल्कि नम्रता ही सिखाती है. वे विनम्र होकर अपनी शक्ति को उसी की सृष्टि में लगाना चाहते हैं क्योंकि वे स्वयं तो तृप्त हो जाते हैं. जो एक बार सच्चे हृदय से शरण में गया, वह तृप्त ही है ! आज वह जून के विभाग के मुख्य अधिकारी के घर गयी उनकी पत्नी से मिलने, बहू व पोते से भी मिलन हो गया जो कुछ दिनों के लिए यहाँ आए हैं, उसने उनकी कुछ तस्वीरें उतारीं. वापसी में पड़ोसिन के यहाँ गयी उनके छोटे से सुंदर तालाब में पांच कमल खिले हैं. कल बंगाली सखी के बेटे को संस्कृत पढ़ाई बहुत दिनों बाद, खुद भी पढ़ना होगा पहले, उसे हिंदी पढ़ने का भी कुछ कारगर तरीका सोचना होगा. आज दोपहर कार्ड्स बनाने का कार्य समाप्त कर  देना है, यदि कोई सहायक न भी मिले तो अकेले ही. मौसम आज अच्छा है, रात भर वर्षा हुई, ठंडी हवा बह रही है. सासुमाँ सो रही हैं, आज लंच में सब्जी उन्होंने बना दी है.

मन खाली है इस क्षण, कोई वस्तु नहीं मांगता, कुछ नहीं चाहता, यह जैसे है ही नहीं. सुबह मसालदान गिर गया पर भीतर एक कतरा भी नहीं हिला, कुछ हो तभी न हिले. कुछ भी नहीं है मन की गहराइयों में. सब कुछ ठोस है वहाँ, कोई हलचल नहीं. वहाँ से केवल एक पुकार आती है कि कैसे इस जगत को कुछ दे दें, देने की बात ही अब प्रमुख है. प्रभु भी तो हर पल दे ही रहा है, अपना प्रेम, करुणा और कृपा..सद्गुरु भी यही कर रहे हैं..वे उनके जैसे बनने का प्रयत्न तो कर ही सकते हैं ! वे दें और बस ! एक क्षण भी वहाँ रुके नहीं उस लेने वाले का आभार देखने के लिए, बल्कि वे उसके आभारी हों कि वह वहाँ है ताकि उनके भीतर प्रेम जगे.. न जाने कितने जन्मों से वे लेते आये हैं..अब और नहीं !

पिछले चार दिन फिर डायरी नहीं खोली, शनि, इतवार को तो सुबह काफी व्यस्तता होती है, पर कल व परसों अपने कामों में इस माया ने उलझा कर रखा. आज गुरूजी ने कहा, जो कुछ भी वे व्यवहार जगत में देखते हैं वह सब अविद्या है, इसी को नीरूमा कहती हैं कि सभी रिलेटिव में है, रियल नहीं है. विद्या तो आत्मा में ही है. गोयनका जी ने कहा, श्वास का सहारा लेने से वे भीतर शरीर व मन दोनों को जान पाते हैं, तथा दोनों को बदल सकते हैं. श्वास दोनों के बीच की कड़ी है. वह अपने भीतर देखती है तो सर्वप्रथम वाणी का दोष दीखता है. चाहकर भी इसे दूर नहीं कर पाती, शायद यह चाह्ना पूर्ण नहीं है और यह एक साधक की भाषा नहीं है, साधक को अपने पर संदेह नहीं होता, न गुरू पर न आत्मा पर. आज से दृढ़ निश्चय करना है आज से, नहीं इसी क्षण से ही यह निश्चय करना है कि जो भी शब्द मुख से निकलेगा वह सारगर्भित होगा, मधुर होगा तथा स्पष्ट होगा. आज दोपहर को हिंदी कक्षा भी है, उसके लिए भी पूर्ण तैयार रहना होगा, भाषा शुद्ध व स्पष्ट हो. उसका हर कार्य ऐसा हो जिसमें आत्मा की झलक मिले. वह आत्मा है, पूर्ण शांति, पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण ज्ञान की अनंत राशि ! उसे इस जगत से कुछ भी प्राप्य नहीं है, बस देना है स्वयं को. लुटाना है, भीतर से खाली होना है !  


Thursday, July 23, 2015

आंवले का वृक्ष


आज कई दिनों बाद डायरी खोली है. यह तो निश्चित है कि जो पन्ने खाली रह गये हैं, वे भी भर ही जायेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’... प्रभु के बारे में यदि लिखना हो तो शब्द अपने आप भीतर से झरते आते हैं. वह प्रभु, परमेश्वर, ईश्वर, ब्रह्म, कृष्ण, राम, शंकर या पारब्रह्म किसी भी नाम से उसे पुकारो वह जितना-जितना समझ में आता जाता है उतना ही उतना रहस्यमय भी होता जाता है. वही भीतर है वही बाहर है. टीवी पर राम कथा आ रही है. ईश्वर का रस जिसे भीतर से मिलने लगता है, उसके लिए यह जगत अपनी सत्ता ईश्वर रूप में रखता है. संत कह रहे हैं कि ‘तुलसी’ प्रभु को प्रिय है. तुलसी तथा निंब इन दोनों का औषधि रूप में भी महत्व होता है. बगीचे में आंवले के वृक्ष के नीचे एक क्यारी बनवाई है, उसमें फूल लगाने हैं. आज शेष फूलों के बीज भी डालने हैं. कल बालों में मेहँदी लगाई थी एक महीने बाद, अब लगता है दो हफ्तों के अन्तराल पर ही लगानी होगी.

पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, इसे प्रमाद भी कह सकते हैं और अति व्यस्तता भी. उपन्यास पढ़ने को एक साधक की दृष्टि में प्रमाद ही कहा जायेगा. john की जिंदगी के बारे में पढ़कर इतना ज्ञान हुआ कि यह जीवन क्षणिक है, इतना ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से भी होता है. मन को जहाँ साधक खत्म करता जाता है वहाँ उसकी आत्मा मुखर होती जाती है पर उसने आत्मा को दबाकर मन को सुख देने के लिए ही उपन्यास में इतना समय लगाया, खैर जो हो चुका है वह हो चुका. कल सत्संग भी ठीक-ठाक हो गया. उन्होंने aol के लिए कुछ योगदान भी दिया, इतने बड़े यज्ञ में उनकी छोटी सी आहूति. कल चने व सूजी का हलवा खाया सो आज पेट में कुछ हलचल है. आज सुबह से वक्त का पूरा उपयोग किया है, लेकिन सारे कार्य तो शरीर के स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए ही हुए. सेवा का तो कोई कार्य नहीं हुआ, अभी दिन शेष है, जो भी सम्मुख आएगा, सहर्ष उसे ग्रहण करना है. आज बड़ी ननद की छोटी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन करना सुबह वे भूल गये. परमेश्वर को सुबह याद किया उठते ही तो पवनपुत्र हनुमान का स्मरण हो आया. उनकी कृपा से सुबह-सुबह समुद्र तट पर बैठे श्रीराम के दर्शन हुए. कैसी अद्भुत घटना है यह, उनके भीतर ही सभी कुछ है, उस दिन नदी, पानी, रस्ते सब इतने स्पष्ट दिख रहे थे !


आज सुबह चार बजे से पूर्व ही उठ गयी थी. मन था कि विचारों से मुक्त ही नहीं हो रहा था. नींद में भी उसे पता चलता रहता है कि मन खाली है या विचार चल रहे हैं. कुछ देर ध्यान का प्रयास किया पर कोई बेचैनी थी भीतर. जब तक मन सारी चेष्टाएँ त्याग नहीं देता तब तक निर्विचार नहीं हो सकता. हर चेष्टा एक न एक विचार को जन्म देती है. उन्हें तो सब छोड़कर मात्र साक्षी भाव में जीना है. एक बार यदि साक्षी भाव में आ गये तो सारी चेष्टाएँ होती भी रहें बाधक नहीं होंगी, बाधा तभी आती है जब मन स्वयं सभी कुछ करना चाहता है. ‘कीत्या न होई, थाप्या न जाई आपे आप सुरंजन सोई’ ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव ही करना है, कहीं से लाना नहीं है. वह करने से नहीं, न करने से प्रकट होता है. बाद में क्रिया के बाद मन खाली हो गया. क्रिया के दौरान भी कई बार भटका, पर बोध रहा. संगीत अभ्यास के समय मन एक पुलक से भरा हुआ था जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, वे चाहें तो तत्क्षण उन्हें पा सकते हैं. मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोया रहता है और जो निधि सहज ही पा सकता है जन्मभर उससे वंचित ही रह जाता है. सद्गुरु का आना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है, वे सुख स्वरूप परमात्मा को पहचानने लगते हैं !         

Sunday, July 19, 2015

मौन और सेवा



ध्यान में प्रभु की निकटता का आनंद पाने वाला मन क्या इतना भी पावन नहीं हो पाता कि ध्यान के बाद अपने भीतर से प्रेम को बाहर भेजे. यदि ऐसा नहीं है तो कहीं कुछ गड़बड़ है जरूर. भीतर यदि प्रेम है ही नहीं तो बाहर व्यक्त कैसे होगा, तो जो भीतर ईश्वर के प्रति महसूस होती है, वह अनुभूति जो इतनी पावन लगती है वह संसार के बीच आकर कितनी बदल जाती है.

आज उसने सेवा के बारे में कितने सुंदर वचन सुने कथा में- क्रियात्मक सेवा, भावात्मक सेवा तथा विचारात्मक सेवा अथवा ज्ञानात्मक सेवा...ये सभी परमात्मा व सद्गुरु स्वयं करते हैं तथा करने के लिए प्रेरित करते हैं. सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ कुछ चाहिए नहीं, चाहिए तो केवल सेव्य की प्रसन्नता. यदि कोई अपनी रूचि सेव्य पर लादता है तो वह अपनी सेवा कर रहा है. सेवा किये बिना अंतर्मन की शुद्धि नहीं होती !

आज उसे लग रहा है, जीवन प्रभु का दिया अमूल्य उपहार है, आनंद से इसका एक-एक क्षण भरा है. हर श्वास एक आनंद की धारा से भीतर को स्वच्छ कर रही है तथा भीतर के विकारों को बाहर ला रही है. उसका अंतर्मन एक ऐसी अद्भुत शांति से भरा हुआ है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. इसी तन में और इसी मन में कभी पीड़ा भी हुई थी सोचकर ही विश्वास नहीं होता. सद्गुरु ठीक कहते हैं जीवन एक सागर है, जो डूबता है इसमें वही उबरता है, इसमें छिपे खजाने को पा लेता है. वही जीवन के रहस्य को जान पाता है. इतना सुखमय जीवन क्यों किसी के लिए दुःख का कारण बना रहता है ? परमात्मा से जुड़े बिना जो जीवन बीतता है वह अधूरेपन का शिकार रहता ही है. भीतर की आँख यदि खुल जाए तो जगत पहले जैसा नहीं रह जाता, उसका क्रीड़ा स्थल बन जाता है. जब कोई खुद पर कृपा करे तभी ऐसा होता है. जो इस सच्चाई को समझ गया है कि कर्म करते समय जो आनंद मिला बस उतने पर ही उसका अधिकार है तो वह मुक्त है. आशापूर्ति के लिए अथवा प्रतिक्रिया स्वरूप किये गये कर्म ही बांधते हैं और दुःख का कारण बनते हैं. वैसे देखा जाये तो हर व्यक्ति अपनी जगह ठीक है, वह किसी कारणवश ही वहाँ तक पहुंचा है, मूल में सभी निर्दोष हैं. अंतत सभी को एक ही लक्ष्य पर पहुँचना है.

उसे मौन सुहाता है, पर उसके भीतर ‘वह’ क्या है जिसे मौन सुहाता है, शुद्ध चेतना अथवा अशुद्ध मन, मन में रहकर यदि कोई कर्म किया, चाहे वह साधना ही क्यों न हो अभिमान को जन्म मिलेगा. जगत में रहते हुए वह जगत से पूर्णतया अलग है यह मानना भी तो अज्ञान ही है. प्रेम को यदि स्वयं तक सीमित रखा तो वह सड़ने लगेगा. प्रेम को बहने देना है, चारों ओर बिखरने देना है, अपने शब्दों से, हाव-भाव से, कृत्यों से, वाणी से उसी परमात्मा की खुशबू आनी चाहिए जिसे भीतर खोजा जा रहा है. ऐसे कर्म संस्कार गढ़ने हैं जो बाद में दुःख न दें तथा जो उस क्षण भी चित्त को शुद्ध ही बनाये रखें. जैसे निर्मल आकाश अपने आप में टिका हुआ मुक्त है.



Wednesday, April 8, 2015

कच्चे धागे पक्के रंग


आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद ध्यान अपने आप लग गया, फिर भ्रामरी करते समय अद्भुत  दृश्य दिखे, कितनी सुन्दरता भीतर छिपी है. ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौन्दर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की उसकी आकांक्षा को इन चिह्नों से बल मिलता है. सुबह सुना था, साधना को कभी त्यागना नहीं है, बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भीतर की यात्रा पर जाने से वे रोके नहीं. एक वर्ष होने को आया है उसे प्रथम अनुभव हुए. अगले वर्ष में और प्रगति होगी और उसे पूर्ण विश्वास है कि इसी जन्म में उसे आत्म साक्षात्कार होगा. उसे संगदोष का विशेष ध्यान रखना होगा, जल में कमल के समान रहने की कला सीखनी होगी ताकि संसार प्रभाव न डाल सके. वाणी का संयम सबसे अधिक आवश्यक है. मन को भीतर की ओर मोड़ना है. मधुमय, रसमय और आनंद मय उस प्रभु को पाना किना सरल है. अंतर्मुख होना है. चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्पष्ट करना है, वह अटल तो शाश्वत है ही.

अभी-अभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि शीघ्रता पूर्वक लिखने से उसका लेख बिगड़ गया है. ईश्वर को चाहने वाले का तो सभी कार्य सुंदर होना चाहिए, क्योंकि वह इतना सुंदर है ! कृष्ण के बारे में कल विवेकानन्द के विचार पढ़े, वह उन्हें महापुरुष मानते थे, बहुत सम्मान करते थे और मन ही मन उन्हें प्यार भी करते रहे होंगे, ईश्वर भी मानते रहे होंगे. कृष्ण ऐसे मनमोहक हैं कि उनके बारे में पढ़कर, जानकर उन्हें कोई भी चाहे बिना नहीं रह सकता है. आज धूप सुबह से ही नजर आ रही है. सुबह वे आधा  घंटा देर से उठे, नन्हे को स्कूल नहीं जाना था, पर साढ़े छह तक सभी कार्य कर योगासन के लिए तैयार थी . सुबह संत मुख से तुकाराम के जीवन पर आधारित घटनाएँ सुनी. सभी संतों ने काफी कष्ट झेले हैं, उसके बाद ही उन्हें मान्यता मिली है. आग में तपकर ही सोना निखरता है. गुरुमाँ ने अंगुलिमाल की कथा सुनाई. अतीत कैसा भी यदि कोई सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भविष्य में ज्ञान का मार्ग पकड़े तो ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि वे इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल उठाने का सामर्थ्य ईश्वर देते हैं फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. उसने अपना मार्ग तय कर लिया है, मन में जो भी थोड़ी बहुत आशंका थी उसे गुरू की कृपा ने मिटा दिया है और अब ईश्वर ही एकमात्र उसके जीवन का केंद्र है, जिसका हाथ पकड़ा है और ईश्वर ने उसका !


आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उससे फोन पर बात की पर बधाई देना भूल गयी, राखी की शुभकामनायें जरुर दे दिन. पिताजी आज घर पर अकेले रहेंगे, उनका समय टीवी, अख़बार, किताबें और संगीत में अच्छा गुजरता है. बड़े भैया-भाभी का फोन भी आया, छोटी बहन को उन्होंने किया. छोटी ननद का आया, बड़ी को उन्होंने किया. अब बाबाजी आ गये हैं, कह रहे हैं, रक्षाबन्धन आवेश और आवेग को नियंत्रित रखने का दिन है. सारे भयों से मुक्त होने का दिन है, ईश्वर के निकट जाने का तथा सभी के लिए मंगल कामनाएं करने का दिन है. कच्चे धागों का लेकिन सच्चे प्रेम का दिन है. अपने चित्त को अवसाद से बचना है, चित्त की सौम्यता की रक्षा हर हाल में करनी है. अभी प्रभात की सुमधुर बेला है, मन स्वतः ही शांत है, दिन भर सप्रयास इसे इसी भाव में रखने का पर्ण है ताकि रात्रि को सोते समय भी ईश का ध्यान शांत भाव में दृढ़ रखे ! अभी पड़ोसिन का फोन आया वह भी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जाएगी. आज पूर्णिमा है, उपवास का दिन, होता अक्सर यह है कि इसी दिन उसे व्यस्तता ज्यादा होती है, उपवास के दिन भर मौन रहने का विचार मन में है एक दिन तो ऐसा होगा ही. 

Monday, March 16, 2015

मूंग का हलुआ


आज पूर्णिमा है. उसके हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन होगा ऐसी सूचना मिल रही है. मन शांत है, ध्यानस्थ है, सद्गुरु की छवि हटती नहीं. सुमिरन अपने आप चलता है. ईश्वर को छोड़कर कोई विचार मन में नहीं टिकता. एक उसी की याद हर वक्त बनी हुई है और कैसी अद्भुत गहराई का अनुभव हो रहा है. जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं, विक्षेप नहीं, अद्भुत है यह क्षण ! कल दोपहर स्वामी योगानन्द जी की आत्मकथा पढ़ी. साधना के अनगिनत सूत्र उनकी इस पुस्तक से हाथ लगते हैं. पढ़ते-पढ़ते मन ध्यान में टिक जाता है. परसों ध्यान में आवाज सुनी थी “निरभिमानी बन” उसके और प्रभु के मध्य अहंकार का पर्दा ही तो है, इसे चूर-चूर करना होगा. मन के सूक्ष्म अहंकार को निर्दयता से उखाड़ फेंकना होगा. कठोर बनना पड़ेगा मन के प्रति, कड़ी नजर रखनी होगी कि कहीं कोई भाव ऐसा तो नहीं आ रहा जो अहंकार को पोषित करे. पूर्ण समर्पण तभी सम्भव है. सद्गुरु इतनी दूर रहकर भी उसे सचेत कर रहे हैं. सुबह स्वप्न देखा जो उसकी एक और कमजोरी की ओर ध्यान दिला रहा था. मिथ्याभाषण अथवा तो आवश्यकता से अधिक भाषण, एक बात को बार-बार कहने की बुरी आदत, नन्हे और जून को कई बार इसका शिकार होना पड़ा है. ज्यादा बोलने से बातें अतिरंजित भी हो जाती हैं और निर्दोष असत्य भी मुख से निकल जाता है. कल शाम को सत्य का सामना वह ठीक से नहीं कर पायी. हर क्षण सजग रहना होगा तभी पाषाण हृदय चमक उठेगा और उसमें परमात्मा की छवि प्रकट होगी. कृष्ण की गीता पढ़े या सद्गुरु के वचन सुने सभी मन की शुद्धि चाहते हैं !   

उसका हृदय परमात्म सुख से परिपूर्ण है, कोई होश में रहे तो विकार पास नहीं फटकते और यदि कोई भाव ऐसा उठा भी तो होश में उसे देखा जा सकता है. सुबह उठी तो एक स्वप्न देख रही थी. उसके हाथ में स्वादिष्ट हलुआ है, शायद मूंग की दाल का, शुद्ध घी और मेवों से युक्त, मीठा और स्वादपूर्ण पर दो छोटी बच्चियों के कारण बहुत सा व्यर्थ जमीन पर गिर जाता है. सपना सचेत करता है कि परमात्मा का जो आनंद उसे मिला है उसे छोटे-छोटे सुखों के पीछे कहीं व्यर्थ न गंवा दे. सुबह क्रिया के बाद किसी के होने का, किसी अशरीरी के होने का अहसास हुआ, एक लय में जैसे किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी. बहुत पहले भी उसे ऐसा अनुभव हुआ था. सद्गुरु की स्मृति भी हर क्षण रहती है, ऐसा लगता है जैसे उनसे मानसिक सम्पर्क बन रहा है. वह उसकी प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचा देते हैं क्योंकि वह हर क्षण उनसे जुड़े रहते हैं. ऐसा लगता है सारे संशय मिट गये हैं और अंततः एक ऐसा प्रकाश मिला है जो उसे कभी छोड़ नहीं सकता. कृष्ण की अनुकम्पा है. यह सारा विश्व उसी का विस्तार है. उस एक की शक्ति ही हर ओर बिखरी है. जिसके मूल में प्रेम है अहैतुक प्रेम ! यह संसार प्रेम से ही बना है, प्रेम पर ही टिका है और प्रेम में ही स्थित है ! 

कल शाम वे एक विवाह भोज में गये. कल रात स्वप्न में माँ को देखा, वह ठीक नहीं लग रही थीं, अस्त-व्यस्त सी कहीं जा रही थीं. दीदी की सास को भी कल बहुत सालों के बाद स्वप्न में देखा, कहीं ऐसा तो नहीं उनकी आत्माएं ही उसे दिख रही हों. आत्मा का अस्तित्त्व शरीर छूटने के बाद भी रहता है. वह इतनी सूक्ष्म होती है कि दिखती नहीं, तरंग का सा रूप होता है, एक ऊर्जा ! वास्तव में प्राणी सारा जीवन उस मृत्यु की ओर पल-पल बढ़ते रहते हैं जो अवश्यम्भावी है, फिर भी वे उसके लिए कोई तैयारी नहीं करता. मृत्यु से पूर्व ही उन्हें यह जानने का प्रयास करना है कि वे कहाँ से आये हैं, क्योंकि वहीं लौटना होगा..