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Wednesday, July 22, 2020

वसिष्ठ और राम



आज सुबह अप्पम बनाये नाश्ते में, जून के एक सहकर्मी आये थे दस बजे कुछ जानकारी लेने, उन्हें भी खिलाये. पसन्द आये उन्हें. उन्होंने अपने बाल्यकाल की बातें बतायीं, किस तरह उनके माता-पिता ने कृषि का काम करना सिखाया तथा भोजन बनाना भी. कक्षा पांच में थे तब दोसा बना लेते थे. अब भी वे घर पर खेती करते हैं, उनके लिए खुद की उगाई सब्जियां लाये थे. टीवी में रामदेव जी को देखकर नियमित योग अभ्यास भी करते हैं. जून ने भी उन्हें सहजन व नारियल तुड़वा कर दिए. कल माली ने बहुत सारे सहजन तोड़े थे, दो तीन अन्य परिवारों को भी बांटे। सुबह शिवानी को सुना, कितना ज्ञान उनके भीतर भर है सीधा परमात्मा से उतरता है ज्यों ! दोपहर को सब्जी-फल लेने वे तिनसुकिया गए. बीहू के कारण बहुत चहल-पहल थी. नन्हे-सोनू  से बात की कल वे लोग किसी मित्र के विवाह में राजस्थान जा रहे हैं. नए घर में रंगरोगन का काम शायद कल से शुरू होगा. दोनों के लिए उसने वस्त्र खरीदे, पहली बार एक साथ दोनों के लिए ! बड़े भांजे के विवाह की सालगिरह है आज, दीदी के यहां फोन किया, सभी आये हुए हैं, विदेश में रहने वाली भांजी भी आयी है. शनिवार को वे पुस्तकालय गए थे उसे याद करते हुए शाम को एक घन्टा पढ़ने में बिताया. पिताजी ने बताया वह आजकल योगवशिष्ठ व भागवद पढ़ रहे हैं, पर इन ग्रन्थों को नॉवल की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, नियमित एक या दो पृष्ठ का अध्ययन करना चाहिए. योग वसिष्ठ में राम ने हर अवस्था में मानव के दुखों का कैसा मार्मिक वर्णन किया है. कलात्मक भाषा में अहंकार, मोह व तृष्णा के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है. चित्त की अशुद्धि को दूर रखने के लिए मन को स्थिर रखना होगा. समता को भावना में टिके बिना आत्मपद में स्थित होना असंभव है. तेनाली रामा में मुल्ला नसरुद्दीन भी आ गए हैं आजकल, उन्हें त्रिदेव के दर्शन करने हैं !

मौसम आज सुहाना है. सुबह साढ़े तीन बजे ही उठ गयी, उससे पूर्व ही एक स्वप्न देखकर नींद खुल गयी थी. छोटे भाई को देखा और उसके पूर्व स्वर्गवासी सास-ससुर को भी, वे अस्पताल में हैं. मन पुरानी स्मृतियों को दोहराता है पर कुछ इशारे भी करते हैं ये स्वप्न. मन आकर्षक दृश्यों को दिखाता है ताकि अपनी उपस्थिति जताता रहे. अव्यक्त की अनुभूति अब कितनी स्पष्ट होती है, एक प्रकाश, एक शांति और एक चैन के रूप में ! सुबह प्रातः भ्रमण से लौटते समय पलाश के फूलों से लदे  लाल वृक्ष देखे, कल वे  मोबाईल लेकर जायेंगे  और उनकी तस्वीरें उतारेगें. पहली बार पूरे के पूरे वृक्ष फूलों के लद गए हैं.  दोपहर को अचानक तेज हवा चलने लगी और एक घण्टे  तक मूसलाधार वर्षा होती रही. योग सत्र में ध्यान किया व करवाया, गुरूजी का ज्ञान पत्र पढ़ा; यह देह भी एक युद्ध क्षेत्र है, ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें अपने भोजन पर ध्यान देना है, एक वृद्ध व्यक्ति से सुना था, ‘कम खाओ और अधिक खाओ’ भोजन  ऐसा हो कि देह में सुस्ती न आने पाए स्फूर्ति बनी रहे. टीवी पर प्रधानमंत्री की उड़ीसा में की गयी विशाल रैली दिखाई जा रही है. विपक्षी उनकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा  रहे हैं और बीजेपी कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र कह रहे हैं. गंधराज खिल गए हैं अभी उनकी तस्वीर उतारी ! 

शायद कोई संदेश मिला था उस दिन जो उसने बरसों पहले लिखा होगा - 

आ सकती नहीं वह 
आ सकता वह 
आएगा 
या बन जायेगा पत्थर पर खुदा
उसने उठाया उसे बाँहों में 
हवा उठाती ज्यों चिन्दी को 
ज्यों उठाते हैं जल चढ़ाने सूर्य को 
नसीब एक भारी पत्थर 
वे बच्चे 
करते हैं कोशिश हटाने की 
पत्तों के बीच थिरकती किरणों से खेल 
बनना नहीं चाहती वह नाव 
उसे ला दो समुन्दर 
वह घुल जाये बह जाये उसी में 
हवा आती है गुजर जाती है 
जैसे दूसरे देश का वासी 
जैसे परछाईयाँ तेज बादल की 
घाटी पर रुकती नहीं चली जाती हैं !

Tuesday, June 7, 2016

वसीयतनामा


कई बार मन में विचार आया है कि उसे अपनी वसीयत लिख देनी चाहिए. मन ही मन कई बार लिख भी चुकी है. सर्वप्रथम मृत्यु की बात. अंतिम श्वास अस्पताल में नहीं अपने घर पर ही ले. यदि कोई रोग हो जाये तो बिना कारण देर तक दवाओं के सहारे जिलाने का प्रयत्न नहीं किया जाये. उसकी सभी वस्तुएँ, आभूषण आदि दान कर दिए जाएँ. मृणाल ज्योति तथा आर्ट ऑफ़ लिविंग ये दो संस्थाएं इसे ग्रहण करें ! जहाँ तक सम्भव हो मानव को अपने हाथों से ही दान करके जाना चाहिए ! आज दशहरा है, सत्य की विजय असत्य पर. राम की विजय रावण पर. दुर्गा की शक्ति लेकर राम आत्मा ने रावण अहंकार पर विजय पाई और सीता भक्ति को प्राप्त किया लक्ष्मण वैराग्य की सहायता से...

शक्ति पूजन से हुए कृतार्थ
रामात्मा ने पाया संबल,
अहंकार रावण का कर वध
सीता का प्रेम मिला निर्मल
जय दुर्गा ! जय राम दिलाई
विजयादशमी की बधाई !

आज सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ. श्वासों के रूप में अनंत का अनुभव. सुना था कि प्राण परम हैं,  सच तो है श्वास है तभी तक तो आत्मा इस देह के साथ बंधी है. श्वासें कितनी हल्की हो गयी हैं तब से, कितनी मधुर और सुगंध से भरी श्वासें ! सद्गुरु कहते हैं कम्प रहित श्वास ही ध्यान है, सो एक बार पुनः ध्यान घटा है. श्वास स्थिर हुई है तो मन कितनी आसानी से ठहर गया है. प्राणायाम आज पूर्ण हुआ ऐसा लगता है. नासिका के अग्रभाग में सारा रहस्य छिपा है एक बार एडवांस कोर्स में सुना था. श्वासें कितना आनंद छिपाए हैं अपने भीतर, श्वास-श्वास में उसी का नाम छिपा है, सोहम्  छिपा है. ये सारी शास्त्रोक्त बातें सत्य प्रतीत हो रही हैं. कभी-कभी श्वास रुक जाती है, कभी अति सूक्ष्म हो जाती है, कितना अद्भुत अनुभव है यह !


आज गर्मी बहुत ज्यादा है जैसे मई-जून का महीना हो, पसीना सूखता ही नहीं है, धूप से या किसी अन्य कारण से सिर में हल्का दर्द है. कल शाम वे जून के एक सहकर्मी के यहाँ गये, उनके ससुर का देहांत हो गया था, लगा ही नहीं कि किसी ऐसे परिवार से मिल रहे हैं जहाँ एक दिन पूर्व मृत्यु घटी है. सभी संयत थे और सामान्य व्यवहार कर रहे थे. बचपन में देखती थी कि मृत्यु होने पर लोग दहाड़ें मारकर रोते थे. अब मौत को भी सहजता से स्वीकारने लगे हैं लोग, परिपक्वता की निशानी है. कल उस परिचिता के यहाँ रात्रि भोज है, जिसके ससुर का देहांत पिछले दिनों हुआ था. तैयारियों में लगे होंगे सभी और कुछ दिनों में ही सामान्य हो जायेंगे. उनका जीवन यूँ ही चलता रहेगा, नये-नये शरीर धारण करते रहेंगे. आज ओशो की आत्मकथा का वह अंश पढ़ा जहाँ वह अपने भीतर गौतम बुद्ध की आत्मा का प्रवेश होना स्वीकार करते हैं. कितना विचित्र रहा होगा उनका अनुभव !

Thursday, October 8, 2015

राम का बोध


आज ‘योग वसिष्ठ’ को पढ़ना पूर्ण किया. इसके अनुसार आत्मा का अनुभव ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है. ज्ञान जब तक परिपक्व नहीं होगा तब तक अन्य साधनों द्वारा किया गया अनुभव टिकेगा नहीं. यह सारा जगत ब्रह्म ही है अथवा तो आत्मसत्ता ही जगत का आभास देती है. आदि में इस जगत के होने का कारण नहीं था, केवल चिन्मय तत्व था, उसमें संवेदन हुआ और धीरे-धीरे यह जगत संकल्प रूप से प्रकट हुआ. संकल्प ही सत्य होकर प्रकट होते हैं यह सबका अनुभव है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है. जीव वास्तव में शुद्ध आत्मा है जड़ का संयोग होने से स्वयं को जड़ जगत की तरह मानने लगा. जब मन पूरी तरह से खाली हो जाता है तो आत्मा का अनुभव होता है. भीतर से आकाश की तरह निर्लिप्त रहते हुए इस जगत में सहज प्राप्त परिस्थितियों में अपना कार्य मात्र करना है, न कुछ पाना है, न देना है, न कहीं आना है न जाना है. आत्मा अपने आप में पूर्ण है, उसे यह जगत स्वयं से अलग नहीं लगता. अद्वैत ज्ञान का अद्भुत ग्रन्थ है ‘योग वसिष्ठ’. भगवान राम का मोह नष्ट हुआ और परमपद को प्राप्त हुए, राम उसे भी परमपद प्रदान करेंगे !

शुक्रवार की रात से उल्फा ने आतंक का जो दौर शुरू किया है, वह थमने में नहीं आ रहा है. मारने वाले भी घोर अज्ञानी हैं और दया के पात्र हैं. वे नहीं जानते कि कितना बड़ा पाप कर्म अपने लिए बाँध रहे हैं. जो मर गये वे अपने पीछे परिवार जनों को दुखी छोड़ गये. इस सृष्टि में हर क्षण कितना कुछ घटता रहता है. अन्याय भी, अत्याचार भी, जन्म भी, मरण भी. इन सबको देखने वाला परमात्मा सब जानता है वह मरने और मारने वाले दोनों के ह्रदयों में रहता है. माया के कारण ही जीव एक-दूसरे को मित्र-शत्रु मानते हैं, कर्म करते हैं तथा उनके फल भोगते हैं. यहाँ सभी कुछ व्यवस्थित है, प्रकृति में अन्याय नहीं होता. अन्याय होता हुआ लगता है पर वास्तव में सभी कुछ एक क्रम में हो रहा है. ईश्वर की निकटता का अनुभव जिसे होता हो वह सभी के भीतर ईश्वर को देखता है, वह दानव जो बच्चों को मारता है उसके भीतर भी और वह संत जो समाज को ऊपर उठाता है उसके भीतर भी एक ही सत्ता है. परमात्मा हर घड़ी उसके साथ है. नींद खुले उसके पूर्व हर सुबह आत्मा का चमत्कार उसे दीख पड़ता है, संध्या काल का चमत्कार !

आज सदगुरू ने मोक्ष तथा बोध के बारे में कहा. वे कठिन विषयों को कितना सरल बना देते हैं. मोक्ष तो हर कामना के बाद अनुभव में आता ही है तथा बोध आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब मुक्ति का अनुभव कोई करता है तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव कर लेता है जिसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता. आत्मा ज्ञान स्वरूप है, वह चेतन सत्ता बोध स्वरूप है जो कण-कण में व्याप्त है. वही चेतन में है वही जड़ में है. जड़ व चेतन के संयोग से जीवन का वह रूप बनता है जो चारों ओर दिखाई देता है. जड़-चेतन के संयोग से तीसरा तत्व बनता है वही अहंकार है. वह यदि स्वयं को जड़ मानकर प्रकृति का अंश मानता है तो वह कर्त्ता तथा भोक्ता है तथा यदि वह स्वयं को चेतन स्वरूप मानता है तो निर्लिप्त रहता है. वह सदा मुक्त है. जड़ के साथ तादात्म्य होने से अहंकार में जड़ता आ जाती है तब क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या तथा मद आदि का असर होता है वैसे ही चेतन के साथ तादात्म्य करने से आनंद, शांति व प्रेम अपना स्वभाव हो जाते हैं तो भलाई इसी में है कि वे स्वयं को चेतन से जोड़ें.      



Thursday, July 23, 2015

आंवले का वृक्ष


आज कई दिनों बाद डायरी खोली है. यह तो निश्चित है कि जो पन्ने खाली रह गये हैं, वे भी भर ही जायेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’... प्रभु के बारे में यदि लिखना हो तो शब्द अपने आप भीतर से झरते आते हैं. वह प्रभु, परमेश्वर, ईश्वर, ब्रह्म, कृष्ण, राम, शंकर या पारब्रह्म किसी भी नाम से उसे पुकारो वह जितना-जितना समझ में आता जाता है उतना ही उतना रहस्यमय भी होता जाता है. वही भीतर है वही बाहर है. टीवी पर राम कथा आ रही है. ईश्वर का रस जिसे भीतर से मिलने लगता है, उसके लिए यह जगत अपनी सत्ता ईश्वर रूप में रखता है. संत कह रहे हैं कि ‘तुलसी’ प्रभु को प्रिय है. तुलसी तथा निंब इन दोनों का औषधि रूप में भी महत्व होता है. बगीचे में आंवले के वृक्ष के नीचे एक क्यारी बनवाई है, उसमें फूल लगाने हैं. आज शेष फूलों के बीज भी डालने हैं. कल बालों में मेहँदी लगाई थी एक महीने बाद, अब लगता है दो हफ्तों के अन्तराल पर ही लगानी होगी.

पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, इसे प्रमाद भी कह सकते हैं और अति व्यस्तता भी. उपन्यास पढ़ने को एक साधक की दृष्टि में प्रमाद ही कहा जायेगा. john की जिंदगी के बारे में पढ़कर इतना ज्ञान हुआ कि यह जीवन क्षणिक है, इतना ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से भी होता है. मन को जहाँ साधक खत्म करता जाता है वहाँ उसकी आत्मा मुखर होती जाती है पर उसने आत्मा को दबाकर मन को सुख देने के लिए ही उपन्यास में इतना समय लगाया, खैर जो हो चुका है वह हो चुका. कल सत्संग भी ठीक-ठाक हो गया. उन्होंने aol के लिए कुछ योगदान भी दिया, इतने बड़े यज्ञ में उनकी छोटी सी आहूति. कल चने व सूजी का हलवा खाया सो आज पेट में कुछ हलचल है. आज सुबह से वक्त का पूरा उपयोग किया है, लेकिन सारे कार्य तो शरीर के स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए ही हुए. सेवा का तो कोई कार्य नहीं हुआ, अभी दिन शेष है, जो भी सम्मुख आएगा, सहर्ष उसे ग्रहण करना है. आज बड़ी ननद की छोटी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन करना सुबह वे भूल गये. परमेश्वर को सुबह याद किया उठते ही तो पवनपुत्र हनुमान का स्मरण हो आया. उनकी कृपा से सुबह-सुबह समुद्र तट पर बैठे श्रीराम के दर्शन हुए. कैसी अद्भुत घटना है यह, उनके भीतर ही सभी कुछ है, उस दिन नदी, पानी, रस्ते सब इतने स्पष्ट दिख रहे थे !


आज सुबह चार बजे से पूर्व ही उठ गयी थी. मन था कि विचारों से मुक्त ही नहीं हो रहा था. नींद में भी उसे पता चलता रहता है कि मन खाली है या विचार चल रहे हैं. कुछ देर ध्यान का प्रयास किया पर कोई बेचैनी थी भीतर. जब तक मन सारी चेष्टाएँ त्याग नहीं देता तब तक निर्विचार नहीं हो सकता. हर चेष्टा एक न एक विचार को जन्म देती है. उन्हें तो सब छोड़कर मात्र साक्षी भाव में जीना है. एक बार यदि साक्षी भाव में आ गये तो सारी चेष्टाएँ होती भी रहें बाधक नहीं होंगी, बाधा तभी आती है जब मन स्वयं सभी कुछ करना चाहता है. ‘कीत्या न होई, थाप्या न जाई आपे आप सुरंजन सोई’ ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव ही करना है, कहीं से लाना नहीं है. वह करने से नहीं, न करने से प्रकट होता है. बाद में क्रिया के बाद मन खाली हो गया. क्रिया के दौरान भी कई बार भटका, पर बोध रहा. संगीत अभ्यास के समय मन एक पुलक से भरा हुआ था जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, वे चाहें तो तत्क्षण उन्हें पा सकते हैं. मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोया रहता है और जो निधि सहज ही पा सकता है जन्मभर उससे वंचित ही रह जाता है. सद्गुरु का आना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है, वे सुख स्वरूप परमात्मा को पहचानने लगते हैं !         

Friday, May 29, 2015

शिशु के नयन


कल शाम को बहुत दिनों के बाद पिताजी से बात की, अच्छा लगा, उन्हें भी अवश्य लगा होगा. कल  योग शिक्षक भी साप्ताहिक भजन में आये थे, उन्हें सर्दी लगी हुई थी पर भावपूर्ण माँ के भजन उन्होंने गाए. उसे माँ शारदा तथा संत श्री रामकृष्ण का स्मरण सत्संग में हो रहा था, सो रात को स्वप्न में उनके दर्शन किये, उनके चुप रहते हुए भी भीतर से जैसे कोई बोल रहा था, जैसे माँ बोल रही थी, अद्भुत था वह स्वप्न ! आज सुबह क्रिया में भी नवीन अनुभव हुआ, क्रिया के बाद ‘सोहम’ शब्द स्पष्ट सुनाई दे रहा था, नाद के बारे में पिछले दिनों पढ़ा भी है. उसे ऐसा लग रहा है अब पिछले कुछ दिनों से आध्यात्मिक यात्रा सुचारू रूपसे चल रही है. वह कान्हा तो अच्छा लगता ही था, रामचरितमानस पढ़ते-पढ़ते तुलसी के राम भी अब अच्छे लगते हैं. कितना प्रेम है राम के अंतर में और कितना प्रेम है तुलसी के हृदय में राम के लिए. भारतीय संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने के लिए अथवा विचारों के लिए ही नहीं है उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं, धार्मिक होने को एक संकीर्ण अर्थ में जब लोग लेते हैं तभी विवाद होता है, धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार..इसी जीवन में अपने इन्हीं नेत्रोंसे..उसको जानना और उससे बल पाना, परहित के लिए, यही सद्गुरु बताते हैं !

कल वे अस्पताल गये, एक सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, उसको एक नाम नूना ने भी दिया है. उसकी आँखें बहुत स्वच्छ हैं, उनमें से जैसे आत्मा झलकती है. सद्गुरु ने कहा था छह महीने तक बच्चा पूर्णतया निर्दोष होता है, वह ब्रह्म स्वरूप ही होता है. इसी भावना से जब कोई बच्चे का पालन करे तो उसे आनंद का अनुभव होता है. उस आनंद को शब्दों में व्यक्त करना असम्भव है. कल रात को उसने माँ को स्वप्न में देखा, वह किसी स्टेशन पर बैठी है तब अचानक माँ आ जाती हैं. वह भी जानती हैं कि वह शरीर नहीं हैं, नूना भी जानती है कि वह सूक्ष्म शरीर में हैं, पर वह पहले की तरह ही लग रही हैं, पूर्णतया स्वस्थ भी, फिर वह बातें भी करती हैं. वे घर आते हैं, दीदी भी हैं, मेहमान भी हैं, वे सभी को खाने की वस्तुएं देते हैं, माँ को भी, फिर चम्मच गिरने की आवाज आती है तो वह दीदी को कहती है, उन्हें पीने के लिए पानी से भरा गिलास भी देती है. माँ सभी को देख रही हैं, सब उन्हें देख रहे हैं, पर वह ठोस नहीं हैं. उसी स्वप्न में एक कौआ आकर सोये हुए लोगों पर चोंच से आक्रमण करता है, माँ उसे निस्पृह भाव से देख रही हैं. ईश्वर कहते हैं वे स्वयं को गंवाए नहीं, बिखेरें नहीं, आत्मा मन की कल्पनाओं के नीचे सुप्त है, पर है वही जिसकी सबको तलाश है. मौसम अब गर्म होने लगा है. रात को नींद पहले सी नहीं आई. एसी में सोना उसे नहीं सुहाता, हर वर्ष शुरुआत में ऐसा होता है फिर धीरे-धीरे अभ्यास हो जाता है. पर तितिक्षा को तो धारण करना ही होगा. आज जून ने वेज सैंडविच बनाया, बहुत स्वादिष्ट था, नन्हे को भी पसंद आएगा. दीदी ने उस दिन बताया भांजी की बात लगभग तय हो गयी है, उसके लिए दो किताबें भी ली हैं उन्होंने !

पिछले दिनों बहुत कुछ घटा बाहर भी और भीतर भी, बाहर की प्रतिध्वनि भीतर तक सुनाई दी और भीतर की बाहर तक. अब वस्तुएं कुछ स्पष्ट आकार लेती प्रतीत हो रही हैं. जब कोई देहबुद्धि से मुक्त होना चाहता है तो ऐसी बातों का प्रभाव मन पर क्यों लेता है जो उसके विपरीत होती हैं. अहंकार ही इसका कारण है. आलोचना होने पर अहंकार को चोट लगती है और फौरन प्रतिक्रिया होती है, जाहिर है मन के स्तर पर ही होगी, आत्मा के स्तर पर हो ही नहीं सकती. आलोचना को स्वीकार करने का यह अर्थ भी है कि बात सही है और वह इससे मुक्त होना चाहता है. इतनी चेतना रहे तो अंत ठीक होगा, वह एक-एक करके अपनी त्रुटियों को दूर करता चलेगा. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि साधना में कोई व्यवधान न पड़ने पाए, चाहे कुछ भी हो वह स्वयं को कितनी भी आलोचना का शिकार होते पाये या प्रतिक्रिया करते, क्योंकि साधना के पथ पर हर कार्य ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही होता है, वह साधक को बेहतर बनाना चाहता है, उसे स्वयं भी यही करना है और ईश्वर इसमें मदद करता है.


Friday, May 1, 2015

पुस्तक मेला


आज दीपावली का अवकाश है. जून डिब्रूगढ़ गये हैं. एक मित्र की नई कार आ रही है सेंट्रो. नन्हा सुबह कोचिंग गया वापसी में ‘बुक फेयर’ भी गया, दो बजे लौटा, उसे किताबें बहुत पसंद हैं. उन्हें देखते-देखते वह भोजन भी भूल गया. नूना का आज अमावस के कारण फलाहार था, तन और मन दोनों हल्के-हल्के हैं. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले वे उठे. क्रिया के बाद ध्यान में आज कृष्ण की झलक दिखाई दी..नीला तन...और... जैसे कोई पर्दे के पीछे से झांककर लुप्त हो जाये. उसकी आत्मा पर पड़ा आवरण झीना होता जा रहा है. प्रकाश स्पष्ट दिखाई देता है, आँखें बंद करते ही और कभी तो आँखें खुली रखकर भी. वस्तुएं अपना ठोसपना खोने लगती हैं यदि उन्हें एकटक कुछ क्षण के लिए देखे. पहले जिस पर क्रोध आता था अब वैसी ही घटना होने पर मन शांत रहता है. तेजपुर से aol की साधिका का कार्ड आया है, वह भी उन्हें नये वर्ष पर भेजेगी. कल सभी से बात हुई सिवाय छोटी बहन के, आज रात वे उसे फोन करेंगे. इस वर्ष नन्हे ने बिजली की चार नई लड़ियाँ घर को जगमगाने के लिए दीवाली पर लगाई हैं. कल उन्होंने दीपकों व प्रकाश की कई तस्वीरें भी उतारीं.

रस के बिना हृदय की तृष्णा नहीं मिटती, भक्ति स्वाभाविक गुण है, उससे च्युत होकर वे निस्सार संसार में आसक्त होते हैं. जैसे धरती में सभी फल-फूल व वनस्पतियों का रस, गंध व रूप छिपा है, वैसे ही उस परमात्मा में सभी सद्गुण ! महापुरुषों की महानता, माधुरी, ओज और ज्ञान सब उसी में है. संसार में जो कुछ भी शुभ है वह उसमें है, तो यदि कोई उससे अपना संबंध जोड़े तो वह उसे मालामाल कर देता है. विकार स्वयं ही दूर भागते हैं, मन स्थिर होता है. धीरे-धीरे हृदय समाधिस्थ होता है. उसके रहते संसार का कोई दुःख उन्हें छू भी नहीं सकता. जब इस जगत से कुछ लेना ही नहीं हो, जो भी चाहिए भीतर मिलता हो तो व्यवहार रखने हेतु ही जगत के साथ संबंध रहता है. उसमें फंसने का भय नहीं होता..वहाँ तो बच के निकल जाने की कला आ जाती है. एक बार उसकी ओर यात्रा शुरू कर दी हो तो पीछे लौटना नहीं होता..दिव्य आनंद साथ होता है और तब यह जीवन एक सुखद अनुभव बन जाता है.

टीवी पर ‘रामायण धारावाहिक’ में हनुमान ने जब राम से कहा कि आपके हाथ से पानी में छोड़े गये पत्थर डूब गये तो क्या हुआ, आप जिसे त्याग देंगे वह तो डूबने ही वाला है न ! ..और उसका मन भर आया, ईश्वर को वे भुला दें या ईश्वर उन्हें भुला दें दोनों ही स्थितियों में उनका कोई आश्रय नहीं. कल वह बहुत देर तक निराकार का ध्यान करने का असफल प्रयास करती रही पर मन कहीं का कहीं पहुंच जाता था, फिर कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान किया तो जैसे सब स्थिर हो गया. उसकी स्मृति ही मन को उल्लास से भर देती है, सिर्फ एक शांति बच रहती है या फिर एक पुलक, जो नृत्य करने के जैसी है, ‘नारद भक्ति सूत्र’ पढ़ते समय भी अच्छा अनुभव होता है. संतों, महात्माओं का अनुभव कितना सच्चा लगता है तब...मानव प्रेम किये बिना नहीं रह सकता और भौतिक जगत में ऐसा कुछ भी नहीं जो उसके प्रेम का प्रतिदान दे सके. उसका प्रेम अनंत है. उन्हें सीमित नहीं अपरिमित प्रेम चाहिए और उन्हें ऐसा प्रतिदान ईश्वर के सिवाय और कोई नहीं दे सकता. वह कितना स्पष्ट हो उठता है कभी-कभी कि विश्वास ही नहीं होता. लगता है जैसे कोई स्वप्न है...पर वह सदा उसके साथ है...सद्गुरु का ज्ञान रंग ला रहा है ! जय गुरुदेव !







Monday, September 1, 2014

योग वशिष्ठ - महारामायण


कल शाम से ठंड एकाएक बढ़ गयी है, अभी तक कोहरे ने सूरज को ढक रखा है. ऐसी शीतलता पहाड़ों पर लोग रोज ही महसूस करते होंगे. कल दुबारा डायरी नहीं खोल सकी. दोपहर को चार पत्र लिखे, शाम को वे टहलने गये, क्लब जाने का उत्साह नहीं हुआ. अभी-अभी पड़ोसिन का फोन आया, उसे लगा था सम्भवतः अस्वस्थता के कारण वे क्लब नहीं जा रहे हैं, फिर उस बातूनी सखी का फोन आया, उसे अपने बेटे के लिए एक ऐसी ट्यूटर चाहिए जो होमवर्क करा सके. दोपहर को वह कुछ समय निकाल सकती है और क्लास वन के बच्चे का साथ यकीनन अच्छा रहेगा, सो उसने हाँ कर दी है. जून को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी. कल वह जा रहे हैं, उन्हें इतवार को किये जाने वाले कार्य आज ही कर लेने हैं जिसमें बालों में मेंहदी लगाना भी शामिल है. कल रात उसने जून से पूछा कि विवाह की वर्षगाँठ मनाने का उनकी नजर में क्या औचित्य है, उन दोनों के सोचने का ढंग एक ही निकला. उसे भी हर दिन उतना ही खास लगता है जितना वह दिन !

कल शाम अंततः वे क्लब गये और वहाँ का माहौल बेहद खुशनुमा लगा. हर तरफ फूलों की बहार ही बहार थी. सामने के बरामदे को बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया था. पीछे स्टेज था तथा शामियाना लगाया गया था. आग तपने के लिए भी इंतजाम था. लोग आकर्षक पोशाकों में थे.

सुबह जून से बात हुई, कल शाम गन्तव्य पर पहुंच कर भी उन्होंने समाचार दे दिया था. कल रात कई बार उसकी नींद खुली, स्वप्न भी देखे जो परेशानी को बढ़ाने वाले थे. उनके जाने पर पहली रात ! सुबह सवा छह बजे उठी, नैनी कल बिना कहे दिन भर नहीं आयी, इस समय काम कर रही है, उसने अपनी गलती मान ली और उसकी फटकार का कोई विरोध नहीं किया जैसा कि वह पहले करती है. इधर कुछ दिनों से उसमें बदलाव आया है. कल क्लब गये थे वे, नीली साड़ी सुंदर लग रही थी, जून होते तो फोटो खींचते. नन्हा लिख रहा है, सुबह उसे नॉवेल पढने पर कुछ दिनों के लिए रोक लगाने को कहा तो बुरा मान गया. ‘नसीहत’ पचाना आसन काम नहीं है. आज ‘योग वशिष्ठ’ की कथा प्रारम्भ हुई है, कहानी में कहानी कहने की संस्कृत साहित्य में अनोखी प्रथा है. आज गोयनका जी भी आये थे, विपासना के बारे में आरम्भिक व्याख्यान दिया. मन को ऊपरी सतह पर शांत कर लेना तो सहज है पर भीतर का पता तो वक्त पड़ने पर ही चलता है. उस दिन ट्रेन में यात्रियों की भीड़ देखकर वे विचलित हो गये थे. आज सभी के फोन आये सभी ने एनिवर्सरी की मुबारकबाद दी.

आज सुबह सवा छह बजे चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर नींद खुली. उठते ही जून के होटल का नम्बर लगाया, वे भी उठ चुके थे. रात को दस बजे सो गयी थी, पर कुछ देर बाद बड़ी भाभी का फोन आया, वे परसों शुभकामना देना भूल गयी थीं, भाई से भी बात हुई. जून दिल्ली में उनसे मिलने जायेंगे. कल एक परिवार को लंच पर बुलाया था, वे लोग सुबह ही तिनसुकिया मेल से आये थे. एक और सखी तभी घर की चाबी देने आई, वे मुम्बई जाने के लिए एयरपोर्ट जा रहे थे. उन्हें इतनी जल्दी थी कि एक मिनट भी नहीं बैठे. जून की समय की पाबंदी की आदत के कारण वे लोग यात्रा पर निकलने से आधा घंटा पहले ही पूरी तरह से तैयार होकर बैठ जाते हैं.