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Saturday, September 29, 2018

अंतर्दीप का प्रकाश



पिछले दो-तीन दिनों से कम्प्यूटर में कुछ दिक्कत आ रही थी. आज तो कोई भी फाइल खुल नहीं रही है. उसे यदि कम्प्यूटर पर काम करना है तो जून के आने की प्रतीक्षा करनी होगी. कुछ वर्ष पहले यदि ऐसा हुआ होता तो उसकी प्रतिक्रिया होती, भगवान ने ऐसा जानबूझ कर कराया है, ताकि वह अपने समय का और अच्छा उपयोग करने का तरीका सोच सके, किन्तु अब यह ज्ञात है कि भगवान कुछ नहीं कराते, वे ही प्रतिपल अपने भाग्य की रचना करते हैं. भगवान तो हर परिस्थिति का सामना करने की शक्ति देते हैं, ज्ञान देते हैं, वह प्रेम भी देते हैं. कभी आज हल्की बदली छायी है. स्कूल बंद है, अब पूजा के बाद खुलेगा. मृणाल ज्योति में टीचर्स ट्रेनिंग का कार्यक्रम होना वाला है. सम्भवतः तीसरे हफ्ते में होगा. आज एक सखी से इस बारे में बात की. उसे भी एक दिन की वर्कशॉप का आयोजन करना है. अच्छी तरह तैयारी करनी होगी. सबसे आवश्यक है उन सबके मध्य सहयोग की भावना को पैदा करना, वे अपनी कितनी ऊर्जा एक-दूसरे की कमियां बताने में ही खर्च कर देते हैं. अपने विचारों को बदलने से ही उनका जीवन बदल सकता है. सबके भीतर अंधकार व प्रकाश दोनों हैं, कभी-कभी गुणों का प्रकाश अहंकार के अंधकार से ढक जाता है, वे जिनसे भी मिलें उनके गुणों पर दृष्टि रहेगी तो उनका जीवन भी गुणों से भरता जायेगा ! उन्हें यह मानकर चलना होगा कि वे सभी एक ही धरती के वासी हैं, एक ही देश के, एक ही राज्य के, एक ही शहर के वासी हैं. उनकी एक ही पार्टी है, वे विरोधी पक्ष के नहीं हैं, जहाँ एक-दूसरे को बिना किसी कारण के ही गलत सिद्ध करना होता है. उनका एक ही लक्ष्य है, एक ही लक्ष्य के कारण एक-दूसरे के सहयोगी हैं. कल वे देवी दर्शन के लिए जायेंगे, आज शाम को प्राण प्रतिष्ठा होगी. आश्रम में भी नवरात्रि का कार्यक्रम हो रहा है, आज वह यू ट्यूब पर देख सकती है.

पूजा का उत्सव सोल्लास सम्पन्न हो गया. आज जून पुनः दिगबोई गये हैं. तीन दिन पूर्व वे एक रात्रि के लिए वहाँ गये थे, गेस्ट हॉउस में रुके. जिस दिन पहुंचे शाम को एक-एक कर सारे पूजा पंडाल देखे. अगले दिन नाश्ता करके वापस. मौसम आज भी बादलों भरा है. उसका गला परसों से थोड़ा सा खराब है, इतवार तक पूरी तरह ठीक हो जायेगा. अगले हफ्ते काजीरंगा जाना है. स्ट्रेस मैनेजमेंट पर किसी कार्यक्रम में जून को भाग लेना है. अगले माह होने वाली टीचर्स वर्कशॉप में उसे कुछ क्रियाएं करानी हैं, जिससे टीचर्स एक दूसरे को अच्छी तरह जानें, स्वयं को जानें. वे खुद को भी कहाँ जानते हैं. उनकी कमियां और खूबियाँ, दोनों से ही अपरिचित रह जाते हैं. उसने सोचा वह दो अध्यापकों को आमने–सामने बैठकर अपनी पांच-पांच कमियां और खूबियाँ बताने को कहेगी. सभी की पीठ पर एक पेपर पिन से लगा दिया जायेगा, सभी को उसकी खूबियाँ उस पर लिखनी हैं. कार्यक्रम आरम्भ होने पर सबसे पहले वह उन्हें एक कोरा कागज देगी जिस पर उन्हें कुछ भी अंकन करना है, एक चित्र कार्यक्रम की समाप्ति पर भी.  

दीवाली आने वाली है, साल भर वे इस उत्सव की प्रतीक्षा करते हैं. दशहरा आते ही दिन गिनने लगते हैं. घर की साफ-सफाई में जुट जाते हैं. पर्दे धुलवाए जाते हैं, पुराने सामान निकले जाते हैं. घर के कोने-कोने को चमकाया जाता है. दीवाली का उत्सव कितने संदेश अपने साथ लेकर आता है.  अहंकार रूपी रावण के मरने पर ही भक्ति रूपी सीता आत्मा रूपी राम को मिलती है, वैराग्य रूपी लक्ष्मण इसमें साथ देता है और प्राणायाम रूपी हनुमान परम सहायक होता है. भक्ति को लेकर आत्मा जब लौटती है तो भीतर प्रकाश ही प्रकाश भर जाता है.

Tuesday, January 24, 2017

मुम्बई की बाढ़


उसने विमल मित्र को पढ़ा और उसके बाद एक कविता लिखी, शब्द अपने थे पर प्रभाव तो यकीनन पढ़े हुए का था. यह भी तो चोरी हुई, विचारों की चोरी भी उतना ही बड़ा पाप है जितना वस्तुओं की चोरी का, यह बात अब समझ में आने लगी है. भीतर ज्ञान का अनंत स्रोत है, जहाँ से शब्दों की नदियाँ बह सकती हैं, फिर क्यों संस्कार वश दूसरों की ईंटों से अपना भवन तैयार करना. आज भी गर्मी बहुत है. उसने सिन्धी कढ़ी बनाई है. आज वे अपनी वसीयत लिखने वाले हैं.

परसों जो गतिरोध उत्पन्न हुआ था, वह कल टूट गया. अन्ना हजारे का अनशन कल समाप्त हो गया, अब वह अस्पताल में हैं. देश की हवा बदल रही है. अमेरिका में तूफान आया है. दिल्ली में लोग जश्न मना रहे हैं. लन्दन में भी सड़कों पर कार्निवाल है. समाचारों में सुना कई राज्यों में बाढ़ आयी है. मुम्बई में वर्षा का पानी सडकों व रेल पटरियों पर भर गया है. असम के धेमाजी में भी बाढ़ ने भीषण रूप ले लिया है. इटली में ज्वालामुखी फट गया है. एक बेटे ने अपनी बानवे वर्षीय माँ को घर से निकाल दिया, उसे वह मकान किराये पर चढ़ाना था. जीवन कितने विरोधाभासों से युक्त है. द्वंद्व ही जीवन का दूसरा नाम है, जो इसके पार हो गया, वही यहाँ मुक्त है और वही सुखी है. शेष तो एक भ्रम में जी रहे हैं. कल इतवार की योग कक्षा में बच्चों को पूरे दो घंटे व्यस्त रख सकी. वे ख़ुशी-ख़ुशी सब बात मानते हैं, अभी मासूम हैं. उस दिन उसने स्वप्न देखा, कार में एक परिचिता के साथ जा रही है पर जाना कहाँ हैं पता नहीं, स्वप्न का क्या अर्थ था कौन जानता है, लेकिन उसने यही लगाया कि कोई भेद नहीं रहा अब अर्थ युक्त और अर्थ हीन में, भीतर-बाहर में. सारे आवरण गिर गये हैं. जून ने भी आज अपना स्वप्न बताया. वह एक द्वीप पर पहुँच गये हैं. एक आदिवासी व्यक्ति उन्हें समुद्रतट पर ले जाता है. सुंदर तट है पर अचानक लहरें चढ़ आती हैं और वह किसी तरह रेलिंग को पकड़ कर बच जाते हैं.


आज एक नये तरह का ध्यान किया. देह ऊर्जा का एक केंद्र है. ऊर्जा का चक्र यदि पूर्णता को प्राप्त न हो तो जीवन में एक अधूरापन रहता है. प्रार्थना में भक्त भगवान से जुड़ जाता है और चक्र पूर्ण होता है, तभी पूर्णता का अहसास होता है. हर व्यक्ति अपने आप में अधूरा है जब तक वह किसी के प्रति समर्पित नहीं हुआ. यही पूर्णता की चाह अनगिनत कामनाओं को जन्म देती है. व्यर्थ ही इधर-उधर भटक के अंत में एक न एक दिन व्यक्ति ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है. इस मिलन में कभी आत्मा परमात्मा हो जाता है और कभी परमात्मा आत्मा. उसने भी आज प्रार्थना में तीनों गुणों से मुक्त होने की प्रार्थना की. तीनों एषनाओं से मुक्त होने की प्रार्थना. माँ होने का सुख, शिशु को बड़ा होता हुआ देखने का सुख तो वर्षों पहले मिल गया, अब कितना सुख चाहिए. व्यस्क होने के बाद व्यक्ति स्वयं अपने भले-बुरे का जिम्मेदार होता है. उसका मन जहाँ जहाँ अटका है, उसे वहाँ-वहाँ से खोलकर लाना है. इस जगत में या तो किसी के प्रति कोई जवाबदेही न रहे अथवा तो सबके प्रति रहे. एक साधक का इसके सिवा क्या कर्त्तव्य है कि भीतर एकरसता  बनी रहे, आत्मभाव में मन टिका रहे. जीवन जगत के लिए उपयोगी बने, किसी के काम आए. अहम का विसर्जन हो. वह परमात्मा ही उनका आदर्श है जो सब कुछ करता हुआ कुछ भी न करने का भ्रम बनाये रखता है..चुपचाप प्रकृति इतना कुछ करती है पर कभी उसका श्रेय नहीं लेती..फूल खिलने से पहले कितनी परिस्थितियों से दोचार नहीं होता है, बादल बरसने से पहले क्या-क्या नहीं झेलता.. और वे हैं कि हर कम करने के बाद औरों के अनुमोदन की प्रतीक्षा करते हैं. वे भी छोटे-मोटे परमात्मा तो हैं ही, मस्ती, ख़ुशी तो उनके घर की शै है, इन्हें कहीं मांगने थोड़े ही जाना है. ज्ञान का दीपक सद्गुरू के रूप में जल ही रहा है.  

Monday, April 11, 2016

देवता का स्वभाव


आज ध्यान में कैसे सुंदर दृश्य दिखे, उनके भीतर भी एक सृष्टि है, जो बाहर है वही भीतर भी है. परमात्मा को प्रेम करना उस सृष्टि में प्रवेश करने का प्रवेश पत्र है. न जाने कितने जन्मों से वह परमात्मा उनकी राह देख रहा है, बाट जोह रहा है, पुकार रहा है. आत्मा को जीने की इच्छा है, वह सुख-दुःख का संसार खड़ा कर लेती है, तब भी भीतर का परम प्रेम ज्यों का त्यों रहता है, अछूता और निर्मल ! उस प्रेम को पाने की शर्त यही है कि आत्मा स्वयं ही वह प्रेम बन जाये, जैसे लोहा आग बन जाता है और बीज वृक्ष बन जाता है, वे पुनः अपने रूप को पाते हैं पर बदला हुआ रूप. उस क्षण तो उन्हें मिटना ही होता है. आत्मा यदि एक क्षण को स्वयं को असीम सत्ता में लीन कर दे तो वह क्षण उसके जीवन को बदल सकता है. ऐसे भी वह पल-पल मिट रही है, बदल रही है, यह परिवर्तन उसके न चाहने पर भी होते ही हैं. यदि वह इस सत्य को स्वीकार ले कि जीवन क्षण भंगुर है, इसमें कोई सार नहीं है. जन्म भर की कमाई मृत्यु के एक झटके में समाप्त हो जाती है, जबकि आत्मा का विकास कभी पतन में नहीं बदलता, वह उन्नति की ओर ही अग्रसर होता है. कैसा विरोधाभास है यहाँ लेकिन परमात्मा के क्षेत्र में संसार के सारे नियम टूट जाते हैं. यहाँ का गणित ही उल्टा है. प्रेम, शांति, आनन्द, ज्ञान, शक्ति और पवित्रता से बना परमात्मा ही उनकी असली पहचान है. न जाने वह कौन सा क्षण रहा होगा जब उसे भूलकर उन्होंने यह आवरण ओढ़ा होगा. धीरे-धीरे वे इसमें फंसते गये, फिर एक दिन याद आई और उसने उन्हें बुला लिया, कंकड़ छोड़ हीरे देने के लिए !
शब्दों के जाल में फंसे रहकर उन्हें कुछ मिलता नहीं, बल्कि उलझन और बढ़ जाती है. शब्दों के अर्थ तथा उनके पीछे छिपे भाव ही उन्हें मुक्त करते हैं. कितनी ही सूचनाएं वे भर लें अपने भीतर पर ज्ञान को उपलब्ध नहीं होते. जब तक भीतर की आवाज सुनने का अभ्यास नहीं होता तब तक ज्ञान का केवल बोझ ही होता है. वास्तविक ज्ञान तभी मिलता है जब सहज होकर जीना आ जाये, कोई आग्रह नहीं, कोई कामना नहीं, समय का सदुपयोग करते हुए हल्के होकर जीना !

आज सुबह उसने सुंदर वचन सुने थे, भगवान सिद्धांतों व श्रेष्ठताओं का समुच्चय है, आदर्शों का नाम है, आदर्शों के प्रति जो त्याग और बलिदान है, वही भगवान की भक्ति है. प्रमाणिकता जहाँ है वहाँ स्नेह, सामर्थ्य तथा सहयोग बरसता है.कोई प्रकाश की और चले तो छाया पीछे-पीछे चलती है. देवता के पास है देवत्व, अर्थात गुण, कर्म और स्वभाव, तीनों की अच्छाई को देकर देवता निवृत्त हो जाते हैं. साहसिकता भी दैवीय गुण है. देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है. देवता व्यक्ति के भीतर एक हूक, एक तड़प, एक उमंग, एक ऐसी ललक पैदा कर देते हैं जो उसे आदर्शों की ओर बढने को विवश कर देती है.
सद्गुरू हर पल उनकी रक्षा करते हैं, उनकी नजर उन पर है, हर घड़ी वह उनका ध्यान रखते हैं. कहते हैं कि साधक उनका काम करें, वह साधकों का काम कर देंगे. वह कहते हैं कि साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम ये चारों आत्मोकर्ष के लिए आवश्यक हैं. साधना कुसंस्कारी जीवन को संस्कारी जीवन में बदलती है. स्वाध्याय मन की मलिनता को धोने का उपाय है. सेवा से बड़ा तप और इससे बड़ा पुण्य कोई नहीं. इन्द्रिय, मन, समय तथा अर्थ का संयम साधकों को करना है. ऐसा करने पर उन्हें चार नियामतें भगवान प्रदान करते हैं. पहला-ऋत, दूसरा-शौर्य, तीसरा-साधन, चौथा है  श्रम. ऋत से सत्य तथा सत्य से तप की उत्पत्ति होती है.


Friday, October 16, 2015

योगः कर्मसु कौशलम्


जिसके सिर ऊपर तू साईं सो दुःख कैसा पावे ! ज्ञानी के ऊपर परमात्मा की कृपा होती है. उनके भीतर सहज करुणा होती है, वे किसी को दोषी देखते ही नहीं, वह सम्पूर्ण निराग्रही होते हैं. ज्ञानी के पास सबसे बड़ा शस्त्र प्रेम होता है. वे वाक् चातुर्य नहीं दिखाते, प्रेम स्वयं उनके व्यक्त्तित्व से टपकता है. उनके भीतर राग-द्वेष नहीं रहते, वह अपेक्षा नहीं रखते. अपेक्षा वाला प्रेम घटता-बढ़ता रहता है, सच्चा प्रेम केवल ज्ञानी के पास ही मिलता है. उसके सद्गुरु ऐसे ही सच्चे ज्ञानी हैं, वह उसके आदर्श हैं. उसे अभी बहुत दूर जाना है. अभी लक्ष्य को पाना है, आग्रह छोड़ने हैं, मुक्त होकर जीना है, आकाश की तरह मुक्त..और निर्मल !

आज उसके मन-प्राण में कैसी अद्भुत शांति छाई है, भीतर एक निस्तब्धता है, गहरा मौन और सन्नाटा..जैसे कोई ठंडक बसी हो, उस मौन में कुछ आवाजें हैं जो निरंतर सुनाई पड़ती हैं..हर पल..हर क्षण..और आज भीतर से कैसा हास्य फूटा, कदम अपने आप थिरके और फिर अश्रु ! पूर्णमदः वाला श्लोक भी जाने कहाँ से भीतर याद आ गया, ऐसे ही सम्भवतः ऋषिगण द्रष्टा होते होंगे मन्त्रों के. परमात्मा की उपस्थिति पूरी तरह से महसूस की, ध्यान में सुंदर फूल दिखे. सद्गुरु को सुबह सुना, वह कितना सरल बना देते हैं कठिन विषय को भी. सारे शास्त्र भी तो पुकार-पुकार कर वही कहते हैं, ईश्वर भीतर है, वह सुह्रद है. भक्त व भगवान एक खेल रचते हैं, जब दो होते हैं, दोनों एक ही शै से बने हैं. भक्ति अग्नि के समान है जो सदा की ऊपर ही ले जाती है. ईश्वर उन्हें बुला रहा है, वह शांति और सुख देना चाहता है, वह योग करना चाहता है.  

जब भीतर विस्मय जगे या कर्मों में कुशलता की चाह हो, मन को समता में रखने की कला सीखनी हो तो कोई योग मार्ग की ओर कदम रखने की योग्यता रखता है. जब कोई सारे दुखों से छूटना चाहता है तो योग की शरण में जाने के योग्य है. योग में बाधक है जड़ता और मन की वृत्तियाँ..जिनके निरोध का नाम भी योग है. विस्मय में जाने से ज्ञान रोकता है. जहाँ निश्चय होता है  वहाँ विस्मय नहीं होता. जो ज्ञान अन्यों से पृथक करे, जगत से भेद कराए वह अधूरा है. उसे अद्वैत तक पहुँचना है, जहाँ दो हैं ही नहीं. मन एक होने से रोकता है, बुद्धि भेद करना सिखाती है और अहंकार हर क्षण अन्यों से श्रेष्ठ होने का आभास दिलाता है. ये सभी मन की वृत्तियाँ है जिनसे उसे मुक्त होना है. तब भीतर कोई भेद नहीं रहेगा, आत्मा के साथ मन एक हो जायेगा. उस एकता के कारण जगत के साथ विरोध भी नहीं रह जायेगा. समाहित मन अपने मूल को पा लेगा, बंटा हुआ मन हर पल स्वयं ही घायल होता है और दूसरों को भी दुखी बनाता है. योग ऐसे मन से मुक्त करता है.  
 जब भीतर सत्संग की चाह जगे, निर्मोहता बढ़े, प्रेम जगे तो मानना चाहिए कि गुरू की कृपा बरस रही है. कृष्ण कहते हैं जो चैतन्य के साथ स्वयं को जोड़ता है वह अपना मित्र है जो जड़ के साथ जोड़ता है वह अपना शत्रु है. आज टीवी पर सुना, मन ही भवसागर है और यह तन कुम्भ है, अच्छी-बुरी वृत्तियाँ ही देव व असुर हैं, मान पाने की आशा ही वह हलाहल विष है तथा समाधि ही अमृत है ! नश्वर को पाने से कोई स्वयं को बड़ा माने तो यह छोटापन है, नश्वर के खोने से कोई दुखी हो जाता है था स्वयं को छोटा मानता है तो यह भी छोटापन है. कोई दोष अपने में है यह मानने से दोष दृढ़ होता है, तो दोष कि सत्ता बढती है, उसे स्वयं में ण मानकर प्रकृति में मानना है जो परिवर्तनशील है. वह दोष भी बदलने वाला है, जो उत्पन्न हुआ है वह नष्ट होने ही वाला है. दोषों को देखना भर है, उनको स्वयं में मानना ही भूल है !  

Monday, August 31, 2015

कृष्ण का जादू


आज पूरा एक महीना हो जायेगा बच्चों को आये हुए, कल ननद-ननदोई जी यानि उनके माँ-पापा आ रहे हैं, घर में गहमा-गहमी और बढ़ जाएगी. एक हफ्ता वे रहेंगे. दोपहर को किचन साफ करवाना है. कल व परसों जून ने भी घर की सफाई पर विशेष ध्यान दिया. मौसम अपेक्षाकृत गर्म है, नये कमरे की छत परसों डाल दी गयी, वर्ष के अंत तक सम्भवतः कमरा तैयार हो जायेगा. टीवी पर गुरूजी बता रहे हैं, ज्ञान, भक्ति और कर्म तीनों साथ-साथ चलते हैं. वह यह भी कह रहे हैं कि think globally and buy locally.
फिर एक अन्तराल.. आज सभी वापस चले गये, सासु माँ यहीं हैं. उसे लगा था कि उन सबके जाने पर एक क्षण के लिए भी उसे कोई दुःख नहीं होगा, पर एक पल को मन भारी हो गया, बस एक पल को ही. पिछले एक-सवा महीने से घर में चहल-पहल थी, अब फिर पहले की सी शांति है. वह साक्षी है मन की इस दुर्बलता की, इसका अर्थ हुआ कि वह उनके होने से सुख पा रही थी, तो भीतर का अनंत सुख कहाँ चला गया ? लेकिन विरह का दुःख तो कृष्ण को भी सताता था. प्रेम में विरह स्वाभाविक है ही, सम्भवतः यह विशुद्ध प्रेम है जो हल्की सी कसक बन कर उसे सता रहा है, पर उसे पता है यह क्षणिक है. अभी कुछ देर में वह टहलने जाएगी तथा लौटकर अलमीरा सहेजनी है. टीवी पर एक वक्ता ओजस्वी प्रवचन दे रही है.. ओज और तेज के पुंज बनकर उन्हें समाज में क्रांति लानी है, संबंधों में गर्मी को पैदा करना है. पिछले महीने वह सेवा कार्य में जा सकी, एक दिन ईर्ष्या ने ग्रसित किया तथा एक दिन क्रोध की हल्की अग्नि ने भी, पर इस वक्त जो भीतर घट रहा है वह इस सबसे अलग है, वह है हल्की सी पीड़ा..उसके भीतर यह भी एक दोष है कि दूसरों की गलतियाँ बहुत देखती है. छोटों की तो दूर, बड़ों की भी. मुस्कान पर भी पहरे लगा दिए हैं. गुरूजी कहते हैं, ‘हँसों और हँसाओ’ उनकी बात पर चलना तो उसका फर्ज है, तब जीवन कितना सरल हो जायेगा. चार दिनों का यह जीवन उन्हें इसलिए तो नहीं मिला है कि दूसरों की पुलिस बनें तथा अपने सिर पर कर्जा चढ़ाएं, बल्कि मुस्कुराते-मुस्कुराते जीवन के पथ पर आगे बढ़ने के लिए मिला है. गाना, नाचना, मुस्काना और कविता करना..ध्यान तो इन सबकी परिणति होगा तब ! कल शाम नन्हा भी दो-तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा है. 
टीवी पर भजन आ रहा है. तिरछी चितवन, बांकी मुस्कन मेरे नन्द गोपाल, संग में राधा रानी सोहें शोभा बड़ी कमाल ! कान्हा को याद न करना पड़े वह अपने आप ही याद आता रहे तब जो रस आता है..उसकी कोई तुलना नहीं..पर कृष्ण को याद करना पड़े या वह याद आए लाभ तो दोनों ही स्थितियों में है. फिर उसे याद करे, यह प्रेरणा भी तो भीतर से वही देता है न..भगवान भी भक्त से दूर नहीं रह सकता, जब उसे याद न करो तो उसे भी ही उतना ही खलता है. दरअसल वह एक बार जिसे अपना बना लेता है या मान लेता है तो वह अनंत जीवन तक उसका साथ नहीं छोड़ता. तभी तो जब उसका मन संसार में उलझ जाता है तो वह मनमोहन भीतर से कोहनी मारता है, चुटकी काटता है. परमात्मा से प्रेम करो तो वह सौ गुना लौटाता है. वह होगा अनंत ब्रह्मांडों का नियंता..पर भक्त के लिए तो वह उसका अपना है, जिसके गीत गाते-गाते वह थकता नहीं है. जो प्रीत की साकार प्रतिमा है, ऐसा कान्हा उसका मीत है..



Tuesday, August 25, 2015

पॉवर ऑफ़ नाउ


परसों वह दोपहर बारह बजे एयरपोर्ट गयी, चार बजे लौटी, नन्हा खुश था, सामान काफी लाया है, ढेर सारे कपड़े कल धोये, प्रेस किये. उस दिन शाम को पौने छह बजे ही उत्सव स्थल पर पहुंच गयी, बच्चे पहले ही आ चुके थे. कार्यक्रम ठीकठाक हो गया, एक सखी ने रंगोली बनाई थी, सभी का सहयोग रहा, साढ़े नौ बज गये वापस आते. कल दिन भर कपड़े ठीक करने तथा मेहमानों( जो नन्हे से मिलने आये थे ) की देख-रेख में ही लग गया आज सुबह जल्दी उठ गयी, नन्हा दस बजे उठा, रात को तीन बजे वह सोया, उसे समझाना व्यर्थ है, भगवान भी शायद उसे नहीं समझा सकते. भगवान ने बन्दों को पूरी आजादी है, जैसे चाहें वे निर्णय लें, लेकिन उसका फल भुगतने को भी तैयार रहें. इस समय दो बजे हैं, अभी दो छात्राएं पढ़ने आएँगी, दोपहर के भोजन के बाद कुछ देर सो गयी, अभी भी तमस छाया है, पर काम में जुट जाओ तो सब चला जाता है. जीवन में एक लक्ष्य हो, ज्ञान हो तो ऊर्जा भीतर से मिलने लगती है.

जून कल आ रहे हैं, कल सुबह ही फोन करेंगे, कल ‘पटाया’ से उन्होंने बताया. नन्हे ने कम्प्यूटर में कुछ फेरबदल कर दी है, सुबह से ही उसे ठीक करने में लगा है. उसकी सुबह ग्यारह बजे शुरू होती है जैसे उसकी रात दो बजे शुरू होती है. पता नहीं आज की पीढ़ी को क्या हो गया है. वे निरे व्यक्तिवादी होते जा रहे हैं, अकेले पड़ जायेंगे वे इस तरह. वह कहता है कि कोई अच्छा दोस्त नहीं है, शायद लगाता है एकाध नाम के आगे, शायद यह उम्र ही ऐसी है, इस साल वह बीस का हो जायेगा. वह भी जब बीस की थी अब से कितनी अलग थी. जीवन उन्हें कई पाठ पढ़ाता है और उम्र के साथ वे परिपक्व होते जाते हैं. कल शाम लाइब्रेरी से दो किताबें लायी है, पॉवर ऑफ़ नाओ तथा टिप्स फॉर 366 डेज, दोनों अच्छी हैं. किताबें सच्ची मित्र हैं, कितना साथ देती हैं वे हर परिस्थिति में. सुबह गुरूजी को सुना, एक ने पूछा कि क्या वे सूक्ष्म शरीर से साधक के साथ रहते हैं और उनका id भी माँगा. दोनों ही सवालों के जवाब उन्होंने गोल-मोल दिए, पहले में कहा कि आप क्या मानते हैं, यदि संशय है तो भ्रम है, यदि विश्वास है तो सत्य है अर्थात यह साधक के मानने पर निर्भर करता है कि गुरू उसके साथ हैं, और दूसरे में कहा कि उनकी आईज डिवाइन हैं, यह उनका id है, अर्थात वे ईमेल का जवाब नहीं देते. उनके पास जो रहते हैं, शायद वही उनसे अपने सवालों के जवाब पा सकते हैं, शेष तो सत्संग में सबके सम्मुख ही रहकर उनसे प्रश्न पूछ सकते हैं. उसे तो लगता है कि संतजनों के दर्शन मात्र से वे जितना पा सकते हैं उतना उनसे सवाल पूछकर भी नहीं, वे अपने जीवन के माध्यम से ही संदेश दे रहे हैं. गुरूजी ने कहा, मन तथा इन्द्रियां फ्रीक्वेंसी एनालाइजर हैं.   

आज एक सेल्समैन से घर बैठे मेजपोश अदि खरीदे. सभी का एक सा रवैया होता है कि किस तरह ग्राहक को अधिक से अधिक बुद्धू बनाया जाये. अब वह पहले कई बार बन चुकी है बुद्धू सो आज थोड़ा मोलभाव किया, पर आज भी कुछ तो कमाया ही होगा, घर-घर धूप में जाकर सामान बेचते हैं, शहर-शहर घूमते हैं, उन्हें भी कई तरीके आते हैं..खैर जो भी हो..वे भी तो उसी परमात्मा का एक रूप हैं, तो कौन किसे ठगेगा.? जून की फ्लाइट ढेढ़ घंटा लेट है. रात को एक बार नींद खुली, ढाई बजे थे, नन्हे को सोने के लिए कहा और स्वयं की नींद गायब, उसके पूर्व एक स्वप्न देखकर नींद खुली थी. कितना अजीब सा स्वप्न था, अचेतन मन में क्या-क्या छिपा रहता है, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होता. न जाने कितने जन्मों के संस्कार दबे हुए हैं. पॉवर ऑफ़ नाउ अब ज्यादा समझ में आ रही है. शुद्ध वर्तमान में केवल ईश्वर है और कुछ नहीं, आदमी जो होता है या तो भूत के कारण या भविष्य की कल्पनाओं के कारण. शुद्ध वर्तमान में मन रहता ही नहीं. जिस क्षण मन की आवश्यकता हो उसे ले आयें और शेष समय स्वयं में रहें.   

Wednesday, July 15, 2015

कर्नाटक की ओर


पिछले तीन दिन डायरी नहीं खोली. पहले की तरह लिखना अब नियमित नहीं रह गया है. जून के आने के बाद सम्भवतः नियमित हो सके. सुबह के काम के बाद सीधे ही ध्यान के लिए बैठ जाती है. टीवी पर योग कार्यक्रम देखकर आसन करने में भी थोड़ा अधिक समय जाता है, पर उसका प्रभाव भी साफ़ देखने में  आ रहा है. आजकल वह काफी स्वस्थ अनुभव कर रही है. नन्हा और जून इस समय कर्नाटक जाने वाली गाड़ी में बैठे हैं. वे काफी दिनों से सफर में हैं. नन्हे का सफर तो कल समाप्त हो जायेगा जब उसका दाखिला हो जायेगा. पर जून अभी एक हफ्ते बाद घर आएंगे. माँ को सर्दी लगी है, जुकाम हो गया है एसी में सोने के कारण. उस दिन नैनी ने कहा था कि बूढ़े लोग बच्चे की तरह हो जाते हैं, उन्हें अपने भले-बुरे का भी ज्ञान नहीं रहता. वे कभी-कभी ऐसी ही बातें भी करती हैं, बिलकुल बच्चों की तरह. लेकिन आमतौर पर वे स्वस्थ रहती हैं, उनकी दिनचर्या भी यहाँ रहके नियमित रहती है. उनके कारण किसी को कोई असुविधा नहीं होती, इस जगत में सभी को यदि ऐसे जीना आ जाये तो कोई शिकायत कभी भी न हो साथ-साथ रहते हुए भी अलग-अलग रहना ! नूना के लिए तो सारी स्थितियां समान हैं. वह अपने साथ रहती है अपने मन के साथ सो जगत के परिवर्तन का उस पर कोई असर नहीं पड़ता. उनके प्रति उसका व्यवहार और कोमल होना चाहिए कभी-कभी ऐसा उसे लगता है, शायद उन्हें भी लगता हो. वह उन्हें आत्मननिर्भर बनते हुए देखना चाहती है. हर समय दूसरों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. वैसे वह खुश रहती हैं पर थोड़ी सी अस्वस्थ होते ही घबरा जाती हैं. उसकी डायरी पुनः कुछ वर्षों जैसे होती जा रही है, क्या यह पतन की निशानी है ? जिन पन्नों पर ईश्वर चर्चा के अतिरिक्त और कुछ लिख ही नहीं पाती थी, वह अब सांसारिक बातों से भरे जाने लगे हैं. सम्भवतः इसका कारण यह हो कि अब उसे सभी के भीतर उसी आत्मा के दर्शन होते हैं. सभी उसे भगवान के मेहमान लगते हैं, जो भीतर है वही बाहर है. वही इस सृष्टि का कारण है, वह स्वयं ही सृष्टि हो गया है तो भौतिक और आध्यात्मिक के बीच का भेद भी अब समाप्त हो गया है. ईश्वर करे यही कारण हो क्योंकि पुनः गड्ढे में गिरने का तो उसका इरादा है नहीं !


आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ. सभी के भीतर एक ही चेतना है यह बुद्धि के स्तर पर तो जानते हैं वे पर जब तक यह अनुभूति के स्तर पर न जाना जाये तब तक इसका फल नहीं मिलता. ध्यान में उसे जड़-चेतन सभी के भीतर एक चेतना का अनुभव हुआ. वह ही पानी की लहर बन गयी वह ही हवा का झोंका ! वह ही नाव बन गयी और वह ही नाविक..जिस वस्तु या व्यक्ति की कल्पना वह करती उसके भीतर स्वयं को ही पाती. उनकी चेतना कितनी असीम है, दूर गगन के पार अनंत ब्रह्मांडों में भी व्याप्त है उनकी चेतना. वे सदा थे सदा हैं सदा रहेंगे, यह चेतना अजर है, अमर है,  नित्य है, शाश्वत है, यह असीम है ! सद्गुरु की कृपा उस पर बरस रही है. मन ध्यानस्थ रहता है. ईश्वर से जुड़ने के बाद जगत से थोड़ा ही प्रयोजन रहता है. इससे शरीर चलता है. शरीर के बिना आत्मा कैसे स्वयं को व्यक्त कर सकती है ?  

Monday, March 11, 2013

भोज के वृक्ष



भारत छोडो आन्दोलन की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में आज अवकाश है, वे तिनसुकिया गए, एक और परिचिता व उसके छोटे से बेटे के साथ. शाम को एक परिवार मिलने आया, दिन भरा-भरा सा रहा. शाम को जून को थकावट हो गई, धूप में ड्राइविंग करने के कारण ही शायद.
अभी-अभी कल्याण में उसने पढ़ा, जिसके हृदय में भगवान रहते हैं वहाँ भय, विषाद, शोक, व्याकुलता, उद्वेग, निराशा, क्षोभ, संदेह, अश्रद्धा, ईर्ष्या, कायरता, द्वेष आदि का स्थान कहाँ है ? वहाँ तो निर्भयता, शक्ति, तेज, प्रकाश, प्रेम, निष्कामता, संतोष और परम आनंद का निवास होता है. जब ईश्वर अपना लेते हैं, तब वही जो कुछ विधान करेंगे, कल्याण के लिए करेंगे. दुःख हम अपनी ही भूल से अनुभव करते हैं, उस भूल को मिटाने की देर है कि चित्त स्थिर रह सकता है. जैसे स्वप्न में वह तरह-तरह की आपदाओं को झेलती है मगर यह भान होते ही कि यह तो स्वप्न है, मन शांत हो जाता है उसी तरह जीवन में कोई परेशानी हो तो उसे स्वप्न वत मानकर झेल लेना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सुदिन आएंगे ही.

  आज जन्माष्टमी है, सुबह से जो मन शांत था अभी कुछ देर पूर्व नन्हे पर झुंझला ही गया, बच्चे तो आखिर बच्चे ही हैं, काम धीरे-धीरे ही करेंगे न. आज उसने व्रत रखा है, नन्हे और उसने मिलकर मंदिर सजाया है, अच्छा लगता है ईश्वर के करीब रहना लेकिन मन फिर कहीं  और चला जाता है. कल दीदी का छब्बीस का लिखा पत्र आया और कैसा संयोग है उसी दिन उसने भी उन्हें लिखा था. कल छोटे भाई के लिए जन्मदिन का कार्ड लायी थी. नन्हे का स्कूल खुला है, जून आज किसी से लिफ्ट लेकर ऑफिस गए हैं, ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ ने चौबीस घंटे का बंद घोषित किया है, कार ले जाना ठीक नहीं था. कल शाम एक सखी के बुलाने पर वे लोग उसके यहाँ गए. लेकिन आज उसे इन दुनियादारी की बातों से मन हटाकर पूर्णता की ओर ले जाना है, जहाँ कोई उलझन नहीं..अद्भुत प्रकाश है, जिसके आगे कुछ पाना शेष नहीं रहता न ही कुछ जानना. दीदी ने लिखा है, “कहीं कुछ ऐसा पढ़ो जिसके आगे लगे कि अब और कुछ नहीं, फ़िलहाल कुछ भी नहीं, तो लिखना”. उसने सोचा अभी पढ़ेगी विवेकानंद की दूसरी पुस्तक उसमें अवश्य ही ऐसा कुछ मिलेगा.

  कल का उपवास अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया. जून को कल दोपहर दांत में दर्द था, आज तिनसुकिया गए हैं डेंटिस्ट के पास. आज उसने लंच अकेले ही खाया, जून अभी एक घंटे बाद आएंगे. शायद उन्हें रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा. कई बार जाना होगा. सुबह अलमारी की सफाई के काम में लगी रही. पढ़ने की कोशिश की पर मन नहीं लगा, रात को फिर स्वप्न देखे, इधर-उधर के, अभी उस दिन ही मरते-मरते बची थी एक स्वप्न में. शाम को उन्हें एक परिवार के साथ बैठकर “हम हैं राही प्यार के” देखनी है, कल जून का जन्म दिन है, उसने अभी-अभी एक कार्ड बनाया है. कुछ देर पहले जून को विवाह से पूर्व लिखे कुछ खत पढ़े, कितन प्रगाढ़ था उनका रिश्ता, प्यार के रिश्ते सचमुच कितने मजबूत होते हैं.

  जून का जन्मदिन अच्छा रहा, उसने केक बनाया था. घर पर ही भुजिया भी बनाई थी. पन्द्रह अगस्त पर वे तीनों नेहरु मैदान गए, झंडा आरोहण में सम्मिलित होने. कल रात को एक मधुर स्वप्न देखा, वर्षों बाद भी वह सब उसके अवचेतन में उतना ही सजीव है जितना उस क्षण था, सोलह-सत्रह वर्ष पहले की बात है जब वे पहाड़ों में रहे थे, लेकिन अब भी स्मृति पटल पर सब कुछ कितना स्पष्ट है. वर्षों से स्वप्नों में ही मिलती रही है, लगता है हर साल एक बार मिलना हो जाता है उन वादियों से. यूँ फूट-फूट कर रोना...एक अनजानी तृषा..एक अधूरा वादा लिए ही लगता है इस जग से जाना होगा...वे झरने.. वे रास्ते..वे पहाड़ कभी मिलेंगे उसे? अभी तक जैसे पोर-पोर महसूस कर रहा है वह सब कुछ..स्वप्न इतने मधुर भी हो सकते हैं ? अभी तक उसके मन का एक कोना सुरक्षित है उन यादों के लिए यह उसे स्वयं भी मालूम नहीं था, इतनी शिद्धत से महसूस कर सकती है उस छुअन को इस पल जो वर्षों पहले भी अनजानी थी और आज भी है पर स्वप्न सारे बांध तोड़ देते हैं..नदियाँ मिल जाती हैं..तट तोड़कर...और स्वप्न क्या सिर्फ उसके हिस्से में ही हैं ? और यह भी कि प्रेम सिर्फ बचपना नहीं है..प्रेम उम्र की सीमाओं से परे है. जैसे उसका मन इस समय एक अनोखे प्रेम से लबरेज है..कसक भरा प्यार उन भोज वृक्षों के लिए और फूलों की घाटी में बहती उस चांदी के समान जल धार के लिए..