Showing posts with label समाज. Show all posts
Showing posts with label समाज. Show all posts

Tuesday, September 24, 2019

भारत की बात सबके साथ



तीन बजने वाले हैं दोपहर के, आज महिलाओं के योगाभ्यास का दिन है. उन महिलाओं का जो घरों में काम करती हैं और अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग हैं. जिन्हें घर के कामों से समय निकालना मुश्किल लगता है पर योग करने में आनंद आता है. 'योग' कितना अनोखा शब्द है, इसके अनेक अर्थ हैं. हर साधक के लिए उसका अपना अर्थ ! परमात्मा से मिलन का नाम भी योग है और खुद को जानने के अभ्यास का नाम भी योग है. वह लिख ही रही थी कि एक महिला आयीं, उन्हें अकेले करने में झिझक हो रही थी, सो सभी बच्चों ने उनका साथ दिया और तभी और भी आ गयीं. एक घंटा साथ मिलकर व्यायाम, आसन, प्राणायाम तथा भजन किये. प्रेसिडेंट का फोन आया, तीन दिन बाद वार्षिक सभा है क्लब की. अभी तक मुख्य नये पदाधिकारीगण का चुनाव नहीं हो पाया है. आज सुबह समय पर उठे वे, पूरे दो सप्ताह बाद इस तेल नगरी की जानी-पहचानी डगर पर टहलने गये. जून के दफ्तर में आज समारोह था, कम्पनी को पहली बार एक पेटेंट मिला है, इसलिए दोपहर का भोजन वहीं था. रात को भी उन्हें बाहर जाना है. दोपहर को काफ़ी भोजन बच गया. बंगलूरू से एक नई तरह का राजमा लाये थे वही बनाया है. आज सुबह से ही बिजली आँख-मिचौनी खेल रही है, नया ट्रांसफार्मर लगा है या नया सबस्टेशन आरम्भ हुआ है इसलिए. जून को चश्मे का एक सुंदर केस मिला था बंगलूरू में, वह उसे दे दिया. घर काफी व्यवस्थित हो गया है. बहुत दिनों बाद स्वामी रामदेव पर आधारित धारावाहिक देखा, अब बालकृष्ण जी भी आ गये हैं इसमें. देश में महिलाओं और लडकियों पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे हैं, समाज में इतनी बेचैनी, इतनी असंवेदनशीलता कहाँ से आ रही है. लोगों के मन जैसे अपने नियन्त्रण में नहीं रह गये हैं.

आज का दिन मिला-जुला आरम्भ हुआ पर अंत सुखद है. कल रात्रि जून ग्यारह बजे लौटे. वह साहित्य अमृत पढ़ती रही. महीनों बाद उसका अप्रैल अंक आया था. उसके पूर्व कुछ देर टीवी देखा, उसके भी पूर्व अँधेरे में ध्यान किया, बिजली काफी देर तक गुल रही. योग कक्षा के बाद साधिकाओं को बंगलूरू से लाये सुगंधित द्रव्य के पैकेट उपहार में दिए. शाम को बगीचे में टहलते हुए आयुर्वेद पर एक पुस्तक पढ़ी. भारत की चिकित्सा व्यवस्था कितनी समृद्ध थी प्राचीन काल में. कल रात से नेट  नहीं चल रहा है. एक दिन यदि सुबह-सुबह फोन काम न करे तो..कितनी उलझन महसूस हो रही थी, ज्ञात हुआ कि फेसबुक और व्हाट्स एप किस तरह जीवन के अंग बन गये हैं. सवा नौ बजे मृणाल ज्योति गयी, बच्चों को योग-व्यायाम कराया. लौटकर कुछ देर पुस्तक पढ़ी, मन अपेक्षाकृत स्वीकार कर चुका था कि आज नेट नहीं चलेगा. दोपहर को जून ने कोई शिकायत भरा वाक्य कह दिया तो मन कुम्हला गया. परमात्मा ऐसी परिस्थति जानबूझ कर रचते हैं ताकि साधक को अपने अहंकार का बोध हो सके. मन यदि परेशान होता है तो इसका अर्थ ही है, अहंकार बना हुआ है. अहम् के रहते कोई सहज रह ही नहीं सकता. शाम को क्लब में टेक्निकल फोरम में एक भाषण सुनने जाना है.

कल शाम न्यूरोलोजिस्ट डाक्टर उपाध्याय का भाषण सुनने गये. लौटने में साढ़े नौ बज गये. लौटकर रात्रि भोजन किया, सोने से पूर्व प्रधानमन्त्री का कार्यक्रम देखा, 'भारत की बात सबके साथ'. उनका जोश, जज्बा और बातचीत बहुत प्रभावशाली है. देश को उन पर भरोसा है और देश के पास उनके सिवा कोई विकल्प भी तो नहीं है. साढ़े दस बजे टीवी बंद किया, सोने से पूर्व कुछ देर सद्वचन सुने. रात्रि को स्वप्न में डाक्टर साहब को पुनः बोलते देखा. वह कह रहे थे, दो तरह के लोग होते हैं एक सूर्य की तरह दूसरे चाँद की तरह. जून कह रहे हैं वह चाँद की तरह हैं. कल लौटते समय उपाध्याय जी ने कहा था, जो कुछ उन्होंने कहा है, कोई उसे ठीक से सुने, फिर पुनर्स्मरण करे तो वह धारण कर सकता है. कल भाषण सुना तो ध्यान से था, उसने सोचा अब रिकाल करती है फिर डायरी में रिटेन कर लेगी. उन्होंने वृद्धावस्था में होने वाली सामान्य बिमारियों का जिक्र किया था, जैसे रक्तचाप, शर्करा, भूलने की बीमारी, कंपवात, गठिया आदि. चालीस के बाद से ही व्यक्ति को अपना ध्यान रखना होगा, नियमित व्यायाम, टहलना आवश्यक है और फिर योग को पूरा अपनाना होगा. यम, नियम से समाधि तक, न कि केवल दो भाग-आसन व प्राणायाम ! वृद्धावस्था के लाभ गिनाते हुए कहा, उस समय व्यक्ति अपने समय का मालिक होता है. उसे समाज में सम्मान मिलता है, वह अपने पोते-पोती, नतिनी-नातियों के साथ अच्छा रिश्ता बना सकता है. यह भी बताया की वृद्धावस्था में देह में क्या-क्या परिवर्तन होते हैं. मस्तिष्क की कोशिकाएं अर्थात न्यूरोन कम होने लगते हैं. आँखों का लेंस धुधंला पड़ जाता है. उन्होंने बताया, वैज्ञानिक अनुसन्धान कर रहे हैं कि कोशिकाएं सदा जीवित रह सकें, कोशिकाओं के मृत होने पर ही देह वृद्ध होने लगती है. अंत में कहा, प्रार्थना और ध्यान का बहुत महत्व है शरीर व मन को स्वस्थ रखने में.

Wednesday, July 27, 2016

वृद्धावस्था के भय


कल शाम जो कविता लिखकर भेजी थी उसका जवाब आया है. उसके मन में जो यह उत्सुकता बनी रहती है यह भी तो अहंकार को पोषण करने का मार्ग है. कविता अच्छी लगी यह सुनकर भीतर जो तोष होता है वह क्या सात्विक है, यदि हो भी तो उसे उसके ऊपर उठना है. कविता लिखना ही उसका आनन्द है, उसके बाद उससे कुछ पाना प्रभु से दूर जाना है. जो आनंद परमात्मा से आया है और जो आत्मा का है वही साधक का हेतु है. मन को तृप्त करने का हर साधन अहंकार को बढ़ाता ही है. आज भी वर्षा की झड़ी लगी है, कल नन्हे ने बताया कि उसके ऑफिस बॉय की नाभि का आपरेशन हुआ. वे लोग उसे अपने घर पर रखने को भी तैयार थे. कितने भले हैं ये आज की नई पीढ़ी के बच्चे, वे सहज रूप से दयालु हैं. कोई विशेष आयोजन करके दूसरों का भला करने नहीं जाते. परिवार के बंधन से मुक्त होकर वे सारे समाज को अपना परिवार बना पाने में समर्थ हैं. भारत का हो या विश्व का भविष्य सुरक्षित है. लड़के-लड़कियाँ काम में जुटे हैं. उसकी पीढ़ी की महिलाएँ कितनी ऊर्जा व्यर्थ गंवाती हैं. दो बजने को हैं, अब दिन का तीसरा पहर शुरू होता है !  

दोपहर के ढाई बजे हैं. बादल बरस-बरस कर थक चुके हैं सो अब आराम कर रहे हैं अथवा तो जितना जल लाये थे, सब लुटा चुके हैं. अब थोड़ी देर में उनके साथी आते होंगे फिर से आकाश धरा का मिलन होगा.  कितनी ठंड हो गयी है. मार्च महीने का आज अंतिम दिन है, जून आज फील्ड गये थे, अभी कुछ देर पहले ही आये हैं. माँ सो रही हैं, सुबह पांच बजे उठी थीं, उसके बाद सीधे साढ़े बारह बजे ही लेटीं. उन्हें डर लगता है शायद आजकल जब-तब लेटने से, कहीं सब उन्हें छोड़कर  चले जाएँ. बुढ़ापा एक रोग है, कैसी-कैसी वृद्धावस्थाएं देखने-सुनने को मिल रही हैं. उसकी भी उम्र बढ़ रही है, पर खुशवंतसिंह हैं जो चौरानवे वर्ष के होकर सक्रिय हैं, राजनेता भी काम करते हैं उम्र के अंतिम पड़ाव पर. आज सुबह फुर्सत थी सो फोन पर कई लोगों से बात की. दोनों पिताजी, फुफेरी बहन, चचेरा भाई, चाची जी, बड़ी बुआ के नाती और नतिनी, बड़े भाई, दीदी, मंझली भाभी..कुल दस लोगों से बात की. ओशो को सुना कुछ देर, बुद्ध वायवीय नहीं थे. उनके पैर धरा पर टिके थे पर मस्तिष्क आकाश को छूता था. उन्हें जड़ को नकारना नहीं है पर स्वयं को चेतन जानना जरूर है. वे चेतन हैं जो जड़ को चला रहे हैं, न कि जड़ जो चेतन का उपयोग अपने सुख के लिए कर रहे हैं. कितना सरल है अध्यात्म का ज्ञान, चेतन व जड़ के संयोग से जो तीसरा तत्व निकला वह है अहंकार. अब अहंकार यदि दुःख पाना चाहता है तो स्वयं को जड़ माने, सुख पाना चाहता है तो चेतन माने. हो रहा है उल्टा पाना है सुख मानते हैं जड़, मिटाना है दुःख पर मानते नहीं चेतन..यही तो मोह है माया है, मिथ्याभास है. सद्गुरु उसे वक्त-वक्त पर संदेश भेजते रहते हैं. आज उनकी तस्वीर देखी, बर्फ की दरार में कितने प्रसन्न होकर बैठे हैं, जैसे अपने घर में हों, सारी दुनिया ही तो उनका घर है !

अप्रैल आ चुका है, आज दूसरा दिन है. धूप निकली है. कई दिनों के बाद मौसम खुला है पर कह नहीं सकते कब तक, शाम होते न होते फिर बदली छा जाएगी और वर्षा रानी अपने ताम-झाम के साथ पुनः पधारेंगी. माँ से आज थोड़ी देर बात की. वह कहती हैं, उन्हें कई आवाजें सुनाई पडती हैं. रात को डरावने सपने आते हैं और अकेले रहने में डर लगता है. पिताजी के जाने के बाद से ऐसा हो यह बात नहीं है, उनके होने पर भी वह घबरा जाती थीं. इस समय धूप में बाहर बैठकर बाल संवार रही हैं. आज मेडिकल गाइड में dementia के बारे में पढ़ा, लक्षण मिलते हैं लेकिन इलाज कुछ नहीं है. बूढ़े होकर मृत्यु के मुख में जाने से पूर्व यह कैसा दुःख किसी-किसी को झेलना पड़ता है, सारे वृद्धों को तो ऐसा नहीं होता. मानसिक रूप से जो आशावादी रहा हो, जो सजग, जागरूक तथा सदा कुछ न कुछ सीखने को तैयार रहता हो ऐसे व्यक्ति को बुढ़ापे में दिमाग की ऐसी हालत से शायद नहीं गुजरना पड़ता होगा. उनका मन क्या है, कैसे काम करता है, वे उस पर कैसे नियन्त्रण रख सकते हैं, यह सब सीखना हर एक का कर्त्तव्य है. आज उसने लेडीज क्लब को दिए जाने वाले सुझावों की एक लम्बी फेहरिस्त मन ही मन बनायी. प्रौढ़ शिक्षा उसमें से एक थी. बच्चों व बड़ों के लिए योग शिविर लगाना दूसरी थी. मृणाल ज्योति के लिए नये-नये सहायक ढूँढना भी उसमें शामिल है. वैसे उसने कुछ लोगों को फोन किया था, पर किसी ने भी ‘हाँ’ नहीं कहा है. यहाँ सभी अपने-अपने जीवन में मस्त हैं. किसी के बारे में सोचने की फुर्सत ही किसके पास है. एक उसका मन है कि सदा यही सोचता है कैसे सबके पास पहुँच जाये, सबको स्नेह से भिगो दे, सबकी झकझोर कर जगा दे, देखो, दुनिया तुम्हारी अपनी है !


Monday, August 17, 2015

प्रकृति के नियम


उसने प्रभु से जो माँगा है, वह उसने उसे प्रदान किया है. उसने उससे ‘सदगुरू’ मांगे थे जो सहज ही उसे मिले, स्वयं ही उसके जीवन में आये. उसने उससे भक्ति मांगी जो प्रेम के रूप में उसके रग-रग में समाई है. उसके भीतर अनंत प्रेम उस परमात्मा ने भर दिया है कि उसके लिए उसका अंतर छोटा पड़ता है, तो उसने उससे सेवा का अवसर माँगा और अब उन्हें एक दिन गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष में सेवा का कार्य करना है. अवश्य ही उनका प्रयास सफल होगा. वे अपने साधनों के द्वारा तथा अपने प्रेम के द्वारा उन लोगों तक पहुंचेंगे जो एक तरह से उनके समाज का अंग होते हुए भी  उनसे कटे हुए हैं. उनके घरों में काम करने वाली महिलाओं के घरों की वास्तविक स्थिति से वे अनभिज्ञ ही हैं. उनके दिलों में झांककर कभी देखा ही नहीं. उन्हें भी उनका प्रेम व ज्ञान मिले तो वे अपने परिवारों को अच्छा पोषण दे पाएंगी. उसका इरादा नेक है और सद्गुरु की कृपा है. सेवा करने का भाव भीतर प्रकट हो तभी से सफलता का आरम्भ हो जाता है. वे अपना आप देना चाहते हैं, सामुदायिक चेतना का विकास करना चाहते हैं. जो भी धर्म के मार्ग पर चलता है उसकी मंजिल लोक संग्रह ही होती है, सभी के भीतर उसे परमात्मा की छवि दिखाई पड़ती है. परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ ही है उसके बन्दों के काम आना.

आज सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी, वर्षा होने में कर्ता तो कोई भी नहीं, फिर भी कार्य तो हुआ, कृष्ण कहते हैं जो कर्म में अकर्म को देखता है अर्थात कर्तापन से मुक्त है और जो अकर्म में कर्म को देखता है अर्थात कुछ न करते हुए भी करता है, उसके द्वारा सहज ही कृत्य हो रहे हैं. वे कर्म तो करें पर फल की इच्छा न हो तो कितनी परेशानियों से बचे रहते हैं, जब कुछ भी न करें तो न करने के अपराध बोध से भी ग्रसित न हों, क्योंकि सहज रूप से जो सामने आये वही करना तथा विशेष कर्म का आग्रह न रखना भी साधक के लिए आवश्यक है. उसने सोचा नहाना-धोना, भोजन आदि कर्म तो सहज ही होते हैं, लिखना-पढ़ना भी होता रहे, सामने कोई पत्थर आ जाये तो हाथ उसे उठाते रहें, कोई दुखी आये तो हाथ उसके आँसूं पोछते रहें, पर करने का अभिमान न आये, तभी वह कर्मों के बंधन से मुक्त रहेगी. मन खाली रहेगा और खाली मन में प्रभु आकर बसते हैं. पता नहीं कौन सा पल होगा जब उसे ऐसा अनुभव होगा.

आजकल वह एक नई पुस्तक पढ़ रही है. अच्छी है, प्रकृति के नियमों की जानकारी यदि उन्हें हों और वे उसके अनुसार जीना शुरू कर दें तो जीवन एक उत्सव बन जाता है, उनका हर क्षण एक अमूल्य अनुभव ! वे इस धरा पर मानव देह पाकर एक अनोखी यात्रा पर निकले हैं, वह यात्रा है उनके भीतर की यात्रा, अनंत सम्भावनाएं उनके भीतर छुपी हैं. अनंत ऊर्जा, आनंद तथा शांति का खजाना उनके भीतर है. वे जब इस धरा पर आये थे तो निर्दोष थे. जगत के प्रभाव में आकर दिन-प्रतिदिन अपने मूल स्वरूप पर आवरण चढ़ाते गये, वे असहज होकर जीने लगे और परिणाम हुआ कि वे अपने भीतर एक दर्द और तथा डर को जगह देते गये. जब-जब वे अपने मूल स्वरूप से खिलाफ कार्य करते हैं, तब-तब एक दर्द भीतर उत्पन्न होता है. उनके भीतर जो परमात्मा है वह साक्षी है उनके कृत्यों का. वे ऊपर-ऊपर से अपनी गलतियों पर भले पर्दा डाल दें या उन्हें उचित सिद्ध कर दें, भीतर जो सही है वही सही है, जो गलत है वह गलत है. उनके भीतर जो डर हैं, वे भी उन्हें सच बोलने से रोकते हैं. वे डरते हैं कि यदि लोगों से ज्यादा प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे तो फंस जायेंगे, डर के कारण ही वे अपने भीतर के प्रेम को घुट-घुट कर खत्म हो जाने पर विवश कर देते हैं. प्रेम करना उनका स्वभाव है, सत्य बोलना भी उनका स्वभाव है, दया, करुणा तथा अपनत्व.. ये भी उनका मूल स्वभाव है इसके विपरीत जो भी है, वह झूठ है, ओढ़ा हुआ है और वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है !  

Thursday, June 25, 2015

जस्सी की दुनिया


पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, सुबह का वक्त नियमित कार्यों में बीत गया और सप्ताहांत होने के कारण दिन भर अलग तरह की व्यस्तता रही. आज ससुरजी वापस चले गये, नन्हा और जून उन्हें छोड़ने गये हैं तथा उनका पुराना फ्रिज ट्रेन में घर के लिए बुक करवाने भी, इसी महीने उन्होंने नया फ्रिज लिया है फ्रॉस्ट फ्री ! माँ उनके साथ रहेंगी. उनका प्रिय धारावाहिक टीवी पर आ रहा है, जैसे उसका प्रिय है जस्सी, जो अब रोचक मोड़ पर पहुंच चका है. नन्हा और दो हफ्ते साथ रहकर कॉलेज जाने वाला है. उसे एक अच्छे इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिल गया है, जो जिसका हकदार होता है उसे ही वह वस्तु मिलती है. वैसे वह आत्मनिर्भर है, जीवन में तरक्की करेगा. दुनिया जिसे तरक्की मानती है वैसी तरक्की न भी करे पर वह खुद की तलाश में लगा है. इन्सान का जीवन खुदा ने इसलिए बनाया है कि वह खुद को ढूँढे, खुदी के पीछे ही खुदा है जो खुद से मिल गया वह खुदा को भी पा ही लेता है. जून उससे बेहद प्यार करते हैं, इसे मोह ही कहा जायेगा. वे उसे कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकते, लेकिन तकलीफ पाए बिना कोई नेमत भी नहीं मिलती है. कल शाम को घर में कितनी चहल-पहल थी. सभी पिताजी से मिलने आये थे, आज चुप्पी छायी है. जीवन इसी उतार-चढ़ाव का नाम है, उन्हें इसका साक्षी बनना है !

इस क्षण को देखे तो सिर में हल्का भारीपन है, वर्षा हो रही है, नन्हा सो रहा है, जून कुछ देर पूर्व घर आकर ऑफिस गये हैं, आज से पांच दिनों तक उनकी ट्रेनिंग है, दोपहर के भोजन के लिए घर नहीं आयेंगे. टीवी पर शहनाई वादन हो रहा है. नैनी कपड़े धो रही है. उसके सिर के भारीपन का एक कारण है मानसिक द्वंद्व, उसे तो द्वन्द्वातीत होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है फिर यह क्या ? यह है असहिशुष्णता, किसी अन्य को सहन न कर सकने की प्रवृत्ति, ‘प्रेम गली अति सांकरी जामे दो न समाय’ उसका मन एकाकी रहना चाहता है, विरक्त, दीन-दुनिया से परे, उसे किसी भी वस्तु की न तो कामना है न ही परवाह, पर समाज ऐसे व्यवहार को अच्छा नहीं मानता. एकाकी व्यक्ति से समाज को डर लगता है. वह उसे भीड़ में वापस लाना चाहता है. उसके मन का दर्द तन में भी प्रकट होने लगा है. मन में जो भी घटता है उसका प्रतिबिम्ब तन पर पड़ता ही है. मन की थोड़ी सी नकारात्मकता भी शरीर के स्रावों पर काफी प्रभाव डालती है. भीतर जो कुछ भी घटता है उसका कारण भी भीतर होता है. वह जो भी सोचती है, कहती है अथवा करती है, उसका परिणाम भीतर पड़ता है. इधर-उधर के दर्द सब उसी का परिणाम हैं !


Wednesday, April 1, 2015

तहरी का स्वाद


उसे लगता है क्रोध व्यक्तित्व को मिटा देता है, इच्छा अपने इशारों पर नचाती है और मोह विवेकहीन कर देता है. अपना आपा भूल जाएँ तो ऐसे शब्द निकल आते हैं जिनपर बाद में पछताना पड़ता है. एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है और मोह भय का कारण बनता है. जीवन की धारा तभी बदल सकती है जब यह ज्ञान हो कि देह साधन रूप में मिला है. मुस्कुराते, गुनगुनाते तथा सबके भीतर तरंग पैदा करते हुए जीना होगा. मन का स्नेह, बुद्धि का विचार और आत्मा का आनंद सभी तो परमात्मा का दिया हुआ है. जो मिला है वह कभी भी छूट सकता है. जब तक देह में बल है तब तक इसकी कद्र करनी है. मन की सौम्यता को बनाये रखना है. ईश्वर हर क्षण साक्षी रूप से साथ है, अल्प बुद्धि से वे अल्प ही तो सोचेंगे. उसके साथ योग लगा रहेगा तो बुद्धि मार्ग पर रहेगी. मन एकदम हल्का हो जाये, पारदर्शी.. तो उसकी झलक अपने आप ही दिखायी देगी.

आज अमावस्या है, यानि उसके उपवास का दिन. सही मायनों में उपवास तो तभी होगा जब मन दिन भर भगवद् भाव से परिपूर्ण रहे. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में वे उठे. ‘क्रिया’ की और सत्संग सुना. संतों की वाणी सुनकर मन भाव विभोर हो गया है. भगवद् प्रेम की एक बूंद भी मन को भरने के लिए पर्याप्त है, वही मन जो संसार भर की वस्तुएं पाकर भी अतृप्त ही रहता है, ईश प्रेम के रस में पूर्ण हो जाता है. वह जो इस सृष्टि का स्रोत है, उसे प्रिय है. उसका स्मरण ही उसे सारे दुखों से दूर ले जाता है.

आज दीदी का फोन आया. उन्हें व बुआजी को पत्र मिल गये हैं यानि दो के जवाब उसे मिल गये. आज सुबह वे देर से उठे. कल सत्संग से आयी तो जून ने खाना ( तहरी)  बना लिया था. खाते-खाते थोड़ी देर हुई. कल योग अध्यापक भी आये थे. उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित बहुत अच्छे कुछ नये भजन गाए. इसी माह एक दिन विश्व शांति दिवस है, गुरूजी ने उस दिन शाम को साढ़े चार बजे सभी को अपने अपने सेंटर पर सत्संग करने को कहा है. इससे सब ओर शांति का संदेश फैलेगा, उनका भी योगदान उसमें रहेगा. आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोकसंग्रह, यानि सेवा, दूसरों के जीवन में यदि कोई ख़ुशी का संचार कर सके, तो समाज के ऋण से कुछ तो मुक्त हो सकता है. एक व्यक्ति अपने लिए समाज से कितना कुछ लेता है यदि उसका शतांश भी लौटा सके तो समाज का कितना भला होगा. आज सुबह उसने सुना साधना के लिए पहला गुण है पवित्रता, अर्थात मन कभी कपट का आश्रय न ले, प्रमादी न हो. भक्ति मार्ग सरल कर देती है. कल शाम उन्होंने कृष्ण के कई भजन गाए, अच्छा लगता है उसके नाम का उच्चारण ! वह अति निकट है, इतना निकट,...इतना निकट कि दरम्यान से गुजर सके न हवा !


आज सुबह ध्यान में कृष्ण की अनुभूति हुई, जैसे वह उसके प्रश्नों को सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. ऐसा होता है कि कुछ दिन उसका हृदय, मन, बुद्धि पूरी तरह उसे अपनी धारणा का विषय बना लेते हैं और फिर अपने आप ही कभी-कभी वह दूर चला  जाता है. करने से कुछ नहीं होता. ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई’ वह अपने आप ही हृदय में आकर दस्तक देता है. लेकिन इतना तो निश्चित है कि एक बार उसे चाहने की कला आ जाये वह उन्हें कभी छोड़कर नहीं जा सकता. वह भी उतना ही अपना लेता है. आज शनिवार है उसकी संगीत कक्षा का दिन, वर्षा कल रात से ही हो रही है. नन्हा स्कूल गया है, आज वह अपना प्रोजेक्ट ले गया है. उसे आराम-आराम से अपना काम करना पसंद है. जून की तरह जल्दबाजी उसके स्वभाव में नहीं है और यह भी कि जितना जरूरी हो उतना ही काम किया जाये, व्यर्थ ही अपने ऊपर बोझा लादना भी उसे पसंद नहीं, यह मानसिक स्थिरता की निशानी है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि भी दे और वह सफलता प्राप्त करे. 

Wednesday, July 16, 2014

नुक्ते का फेर


नुक्ते की फेर में जुदा हुआ, नुक्ता ऊपर रखा तो खुदा हुआ” उसने जब यह सुना तो जोर से हँसे बिना न रह सकी, उर्दू भाषा भी कमाल की है, एक नुक्ते से कितना फर्क पड़ जाता है. वह भी अपने मन रूपी नुक्ते को सही जगह नहीं लगाती और ईश्वर से विमुख हो जाती है. ‘जागरण’ में आज फिर सुना, सुख-दुःख आदि अवस्थाओं से परे जो ‘आत्मा’ रूपी चैतन्य सभी में है, यदि उसका भान नहीं हुआ तो मस्तिष्क को ज्ञान की हजारों बातों से भर लेने से भी कोई लाभ नहीं, विवेकानन्द ने भी कहा है, कि मात्र धार्मिक पुस्तकें पढने और प्रवचन सुनने भर से वह बौद्धिक विकास बन कर रह जाता है, यदि वास्तव में उसे अनुभव की वस्तु न बनाया तो धर्म भी नशे की तरह है. किन्तु उसे अपने भीतर आये बदलाव की भनक है, धीरे-धीरे ही सही किन्तु यात्रा जारी है. अब इस संसार को स्वप्न की भांति देखने की समझ आई है. दूसरों की दृष्टिकोण को समझने की समझ, हरेक में उसी अन्तर्यामी के प्रकाश को देखने की समझ, अपनी गलतियों का अहसास फौरन हो जाता है. और उसे स्वीकारने की हिम्मत भी वः अपने भीतर पा रही है. इससे मानसिक ऊर्जा का व्यय नहीं होता सो मन हमेशा शांत रहता है, कमल के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की भांति. जून भी आजकल खुश हैं, नन्हा भी एकाग्रता से पढ़ाई में व्यस्त है. वह अभी से धीर-गम्भीर है, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सन्मार्ग पर ले जाये. इसी महीने उन्हें घर जाना है, जून ने सुबह कहा, उपहार खरीदने भी शुरू करने चाहिए. उसे याद आया, दो सखियों के माता-पिता आए हुए हैं, उन सभी को भोजन पर बुलाना है. वर्षा फिर हो रही है.

“जो टिकता नहीं वह अवस्था है जो मिटता नहीं वह परम सत्य है”. बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो जीवन सहज हो जायेगा. आज ‘जागरण’ पर प्रवचन दिल को छूने वाला था, कितनी सरलता से सन्त कितनी गूढ़ बातें कह जाते हैं, लोगों की भाषा बोलते हैं, उनके हित के लिए उनकी अपनी ही शब्दावली से शब्द लेते हैं, उसे उनमें श्रद्धा होती है, पर कुछ बातों के प्रति अविश्वास भी होता है, शायद उसकी रूचि नहीं उन बातों में सो उनके प्रति उदासीनता बनी रहती है. आज ध्यान में बैठी ही थी कि फोन की घंटी बजी सो पूरा नहीं सका. इस वक्त साढ़े नौ हुए हैं, सुबह से अब तक का वक्त ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के कारण अच्छा रहा है, किन्तु यह भी एक अवस्था है. सुखद स्थिति में प्रीति होने से वह सुखकर लगती है, दुखद स्थिति में प्रीति न होने से वह दुखकर लगती है, उसे इन दोनों से ही परे जाना है. यह जग कई पाठ पढ़ाता है, ठोंक पीटकर इस काबिल बनता है कि सत्य को समझने लायक हो सकें. जग में विभिन्न लोगों से व्यवहार करते समय, तरह-तरह की परिस्थितियों में मन का संतुलन बनाये रखते समय, अनुकूल हो या प्रतिकूल दोनों वक्तों में, ईश्वर का स्मरण करते समय वह कितना कुछ सीखती है अथवा तो उस सीख का उपयोग करती है जो सदा से उसके अंतर्मन में सुप्तावस्था में थी. मानव मन असीम सम्भावनाओं का भंडार है, इसमें कई खजाने छुपे पड़े हैं आवश्यकता है तो मंथन की, अमृत भी यहीं है और विष भी यही हैं !

कल पिता का पत्र मिला, पढकर अच्छा लगा, उन्हें उसका घर-परिवार, समाज तथा राष्ट्र के बारे में सोचना, लिखना अच्छा लगा. यदि मन जागरूक हो कोई हर पल सचेत हो तभी ऐसा हो सकता है, बहुत पहले पिता ने एक बार कहा था जब वह घर पर थी, “अपने मन पर नजर रखो, कहीं वही तम्हारे खिलाफ न हो जाये” और अब टीवी पर जागरण शुरू हो गया है. मन के स्वभाव को बदलना होगा जो सदा बाहर की ओर जाता है, ऊर्जा नष्ट होती है. अपने दोष दबाने के लिए दूसरों के दोष देखता है. यदि दूसरों के गुण देखने की आदत आ जाये तो साधक जल्दी सफल हो जाता है. किन्तु अपने दोष देखकर दुःख या पीड़ा न हो बल्कि यह बाहर से आया हुआ है इसे निकालना है, ऐसा संकल्प जगे. तभी कोई निर्दोष जीवन जी सकेगा और ऐसा निर्दोष जीवन ही ईश्वर के प्रेम का अधिकारी है. वक्ता अपने दोषों को दूर करने की बात कहते-कहते भावुक हो गये और श्रोताओं पर भी असर हुआ, कइयों की आँखें भीग गयीं और कई तो रोने भी लगे, लेकिन उसका मन शांत है, ईश्वर कभी नहीं चाहता कि वे दुखी हों अशांत हों या निराश हों ! वह जानती है हृदय में संकल्प के साथ प्रार्थना भी हो तो लक्ष्य मिल सकता है, प्रयत्न केवल अपने बलबूते पर किया तो अहंकार या विषाद दोनों में से एक होगा, और यदि प्रयत्न नहीं केवल प्रार्थना ही की तो निष्क्रियता घेर लेगी.