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Wednesday, April 21, 2021

झींके का खेत

 

कल रात्रि वे वापस लौट आये. घर पहुंचे तो कुछ ही देर में नन्हा व सोनू भी आ गये, वे रात्रि भोजन बनवा कर लाये थे. सुबह नींद थोड़ा देर से खुली, नूना अकेले ही टहलने गयी. सोनू उठ गयी थी जब वह लौटी, नन्हे ने सुबह का नाश्ता ऑर्डर कर दिया था.  दोपहर को बड़े भैया अपनी बिटिया के साथ आये, जो यहीं रहकर जॉब करती है, सबने साथ में भोजन किया. नन्हा और सोनू  ग्वालियर से कुछ उपहार भी लाये हैं, साड़ी, सूट, बेड कवर, गजक और उबली हुई मूंगफली. बड़े भाई को उन्होंने शादी में मिला पर्स दिया, भाई उनके लिए गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां लाये हैं. जीवन इसी लेन-देन  का नाम है. दीदी छोटी बहन के पास विदेश जा रही हैं. वह अपने नए घर में शिफ्ट हो गयी है. उसने बताया अगले हफ्ते बड़ी बिटिया अपने पापा  के साथ भारत आ रही है, वे वैष्णव देवी की यात्रा पर भी जायेंगे.  छोटा भाई  अगले हफ्ते उनके पास आ रहा है, उसे पुट्टपर्थी में ड्यूटी मिली है, एक रात यहाँ रहकर जायेगा.  जीवन इसी तरह आने-जाने, मिलने-जुलने का भी नाम है. मौसम आज ठंडा है, पंखा चलाने की जरूरत नहीं है. दोनों नैनी समय पर आ गयीं, दूध वाला, पेपर वाला, फूलवाली भी, आज तो लॉन की सफाई व घास की कटिंग भी हुई, लॉन अच्छा लग रहा है. रात की रानी में फूल खिलने लगे हैं. शाम को वे टहलने गए तो देखा, क्रिसमस की ख़ुशी में लोगों ने यहां बिजली की झालरें लगा दी हैं. 


रात्रि के नौ बजे हैं, उसने दिन के अंतिम कार्य यानि लिखने के लिए कलम उठायी है. आज एक सप्ताह बाद योग कक्षा में बहुत अच्छा लगा. नए आसन किये शरीर को अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करने का अवसर मिला.  सुबह नाश्ते के वे बाद कुछ देर टहलने गए, शायद धूप के कारण सिर में थोड़ा सा दर्द हो गया. असम में स्थिति अब शांति की ओर बढ़ रही है. दिल्ली तथा देश के कुछ अन्य भागों से हिंसा की खबरें आयी हैं. यह सब कुछ अज्ञान का परिणाम है, नेता अपना लाभ देखते हैं और जनता को मोहरा बनाते हैं. हालात जिस तरह बिगड़ रहे हैं इसका परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं होगा. धर्म के नाम पर भेदभाव से कितने जीवन प्रभावित होते हैं, पर लोग जानते हुए भी यह बात समझना नहीं चाहते. तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के जीवन पर आधारित वेब सीरीज ‘क्वीन’ अच्छी  लग रही है, चार एपिसोड देख लिए हैं. आज पिता जी से बात की. उन्होंने बताया, जो किताब वे पढ़ रहे हैं, उसमें लिखा है, मनुष्य को शून्य में स्थित रहना चाहिए अर्थात पूर्ण शांति में. बाहरी शांति तो उन्हें सर्वथा उपलब्ध है पर भीतर की शांति भी चाहिए, मन की शांति, यानि विचारों से पूर्ण मुक्ति ! 


आज सुबह टहलते हुए वे गांव की तरफ गए एक खेत में झींका (तरोई) लगी थी, एक किसान फसल उतार  रहा था, बेचने को भी तैयार था, वे खरीद कर लाये. छत पर सोलर पैनल लग गए हैं. अब उनके घर इस्तेमाल होने वाली बिजली इन्हीं के द्वारा आएगी, जो बिजली बच जाएगी उसके बदले विद्युत विभाग से पैसे वापस मिल जायेंगे. आज असमिया सखी से बात हुई, वे लोग भी बंगलूरू में रहते हैं. उसने बुलाया है, पर उनका घर काफी दूर है, कार से जाने में दो घन्टे लगेंगे, असम में उनके घर जाने में दो मिनट लगते थे. उन्होंने सोचा है, शुक्रवार की सुबह  जायेंगे और एक रात रुककर शनि को नाश्ते के बाद लौट आएंगे. आज मौसम कल की अपेक्षा गर्म है, दिसम्बर में भी गर्मी हो सकती है, इसका अनुभव जीवन में पहली बार हो रहा है. दोपहर वाली नैनी आज अपने पुत्र को लेकर आयी, देखने में बुद्धिमान लग रहा था. आज कई दिनों बाद ब्लॉग पर लिखना आरम्भ किया, कुछ ब्लॉग्स पढ़े. जीवन को मुड़कर देखें तो अपनी ही बातों पर कितनी हँसी आती है, उन बातों पर भी जिनपर कभी हजार आँसू बहाये थे. शाम को नन्हे का फोन आया, ‘डिनर पर आ रहा है, उन्हें लगा, जैसे उसकी पसन्द का खाना ही बना था और उसे खबर लग गयी किसी तरह, साढ़े आठ बजे आया, दो घन्टे रहा. जीवन एक शांत धारा की तरह बहता जा रहा है, अब कोई दौड़ नहीं रही. ज्ञान, क्रिया और इच्छा शक्ति जो भीतर है, अपने आप में स्थिर हो गयी है. हजारों टन भोजन इस देह में जा चुका है, हजारों बोल यह जिव्हा बोल चुकी है, हजारों विचार यह मन सोच चुका है, हजारों गन्ध यह नासापुट ले चुके हैं. अब इस जगत में कुछ देखना, जानना, पाना शेष नहीं रह गया है. जीवन जैसा है वैसा ही श्रेष्ठ है. 


आज वे आश्रम गए थे, दोनों ननदों के लिए उपहार लिए। वैद्य से नाड़ी परीक्षण करवाया। आयुर्वैदिक दवा ली एक माह की। जून के ममेरे भाई की बिटिया का ब्याह है, उसके लिए भगवद्गीता का एक सुंदर प्रति ली और घर के लिए आटे के बिस्किट आदि। गुरुजी की उपनिषद पर टीका और आर्ट ऑफ लिविंग के हिंदी भजनों की एक किताब भी। एक घंटा वे ध्यान के लिए विशालाक्षी मंटप में बैठे। ध्यान करवाया गया पर रिकार्डिंग में गुरु जी की आवाज से अधिक लोगों के खाँसने की आवाजें आ रही थीं। भजन आरंभ हुए तो लोग नाचने और झूमने लगे। रात्रि भोजन भी वहीं कैफे में किया। रागी दोसा खाया। कल दोपहर फिर आना है, समूह में सुदर्शन क्रिया में भाग लेने के लिए। दीदी का फोन आया, दो मिनट से ज्यादा बात नहीं की। जीवन इतना सरल है जिसे लोग जटिल बना लेते हैं। 


आज मोबाइल पर गुरूजी का सत्संग देखा, सुना। वह बहुत दिनों के बाद आश्रम आए हैं। परमात्मा और उनमें जरा भी दूरी नहीं है, वह वहीं है फिर भी वे उससे विरह का अनुभव करते हैं ! कैसी अजब कहानी है यह .... । मौसम आज ठंडा है, शाम को स्वेटर पहनकर वे पड़ोसी के साथ सोसाइटी के पिछले गेट से बाहर निकल कर गाँव की तरफ गए. सँकरी सड़क से गुजरते समय सूर्यास्त के सुंदर दृश्य दिखे, खेतों से कुछ दूर आगे जाकर एक नयी कालोनी दिखी, जिसमें प्लॉट्स काट दिए गए हैं, सड़कें भी बन गयी हैं पर घर बनाने का काम अभी शुरू नहीं हुआ है.  शहर अपनी सीमाएं बढ़ा रहे हैं और खेत बिकते जा रहे हैं. कल वैद्य ने रात्रि भोजन हल्का लेने को कहा था सो आज खिचड़ी बनायी उसने.  और अब उस पुरानी डायरी के पन्नों से कुछ बात।



स्थूल जगत में सेवा कार्य का रूप धारण करती है, आंतरिक सृष्टि में सहानुभूति का स्वरूप लेती यही और मानसिक सृष्टि में बोध रूप में दर्शन देती है। 


तुम्हारा हृदय तुम्हारे सेवा कार्यों की जो कीमत आंकता है, उसके मुकाबले उन्हीं कार्यों की जगत द्वारा ठहराई कीमत कुछ नहीं के बराबर है. 


सच्चे मनन  के फलस्वरूप सेवा करने की शक्ति अधिकाधिक बढ़ती जाती है और फिर अपनी उन्नति के विचार बहुत कम सताते हैं. 


आतुरता से और स्नेह से कोई भी नन्हा सा सेवा का काम सबेरे उठकर करना उस दिन के तुम्हारे सुख के भंडार को खुला रखने का सर्वोत्तम उपाय है. 


मनुष्य जिस हद तक अपने स्वार्थ का कम चिंतन करता है, उस हद तक वह अवश्य ही अपनी आत्मोन्नति की ओर ध्यान लगा सकता है.सेवा के प्रत्येक छोटे से छोटे कार्य का बदला सेवा की बढ़ती हुई शक्ति के रूप में सेवक को मिलता है. 


उसे आश्चर्य होता है विद्यार्थी काल में उसका मन ऐसे विचारों के प्रति आकर्षित होता था, युवा मन कितना आदर्शवादी होता है. कई वर्षों बाद इन आदर्शों पर चलने का मौका भी मिला, जीवन में कोई जो चाहता है अवश्य ही पा लेता है , लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है. 


Monday, August 31, 2020

एओल आश्रम

 आज सुबह ही वे नए घर आ गए थे. जून को दफ्तर का कुछ काम था, वह देर तक फोन पर ही रहे. नन्हा अपना दफ्तर का काम करता रहा, मजदूर अपना काम और वह योग वशिष्ठ पढ़ती रही और मोदी जी के पुराने भाषण सुने. उनका अति मोहक व्यक्तित्व था और अब भी है. उनका जैसा प्रतिभावान व्यक्ति कोई लाखों में एक होता है. शाम को वे पड़ोसी के यहाँ गए, बहुत मिलनसार हैं. जून को चाय पिलाई, उनके पुत्र ने आश्रम तक लिफ्ट दी. इस समय रात्रि के दस बजे हैं, वे एओल आश्रम में हैं. उसका कमरा नम्बर तीन सौ दो है और जून का एक सौ चौदह, पहले उन्हें कोई और कमरा  मिला था, फिर बदला और अंत में अब यह खाली कमरा  मिला है, शायद अब तक कोई आ गया हो. उसके कमरे में अभी तक और कोई नहीं है. उन्होंने सामूहिक भोजनालय में रात्रि भोजन किया, टमाटर सूप, दाल-चावल, रोटी तथा सब्जी, प्रसाद रूप में हजारों लोगों के लिए बना यह भोजन स्वादिष्ट होता है. सैकड़ों लोग इसे बनाने में अपनी सेवा देते होंगे. आश्रम में गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष में कई कोर्स चल रहे हैं. बच्चों के लिए भी कोर्स है और सबके साथ वृद्धजनों के लिये भगवद गीता के प्रवचन का भी. प्लेट्स धोने का तरीका अच्छा नहीं लगा, लेकिन हजारों प्लेट्स को धोने का काम कितना कठिन होता होगा, अवश्य ही कोई साफ-सुथरा तरीका अपनाना होगा. पानी में हाथ डालकर प्लेट्स निकालते समय कैसा लगता होगा, सेवा भाव अपनी जगह है पर... जब वे अन्नपूर्णा जा रहे थे गुरूजी अपनी कार से रवाना हुए, लोगों ने उन्हें हाथ हिलाया, उन्होंने भी हाथ हिलाया. सत्संग के समय बड़े से स्क्रीन पर उनका निर्देशित ध्यान किया. कल सुबह दस बजे से कार्यक्रम है. अभी-अभी एक अन्य महिला इस कमरे में आ गयी हैं. हिंदी भाषी हैं. उनका नाम व हालचाल पूछा, उन्हें एसी उनतीस डिग्री  पर रखना है पर पंखा फुल पर, पसन्द अपनी-अपनी... नन्हे से बात की वह घर पहुँच गया है.  


रात्रि के सवा नौ बजे हैं, आश्रम के बसवा अतिथिगृह में उनका दूसरा दिन है. सुबह गुरूजी का प्रवचन सुना, गर्मी बहुत थी. टिन की छत वाला मण्टप काफी गर्म हो गया था. भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय का आधा भाग आज समाप्त हुआ, शेष भाग कल लिया जायेगा. कल प्रश्न भी पूछे जायेंगे. सुनकर कोई प्रश्न यदि सहज, स्वाभाविक रूप से उठता है मन में, तो उसका समाधान उसे भी पूछना चाहिए.  शाम के सत्संग में भी उन्होंने भाग लिया. गुरूजी ने कई प्रश्नों के उत्तर सरल शब्दों में  दिए. वे कुछ देर से पहुँचे सो बैठने के लिए कुर्सियां तब तक भर चुकी थीं. नीचे बैठना पड़ा, जून की पीठ में दर्द हो गया. उसे लगता है वह थोड़ी सी भी कठिनाई सहन करना नहीं चाहते, अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना नहीं चाहते. खैर.. सबकी अपनी-अपनी क्षमता होती है. सत्संग आरम्भ होने से पूर्व आश्रम की कैंटीन में हॉट चॉकलेट पी सीढ़ियों पर बैठकर, जैसे प्रातः भ्रमण व प्राणायाम के बाद कॉफी पी थी. अभी तीसरी महिला कमरे में नहीं आयी हैं, वह पंजाब से आयी हैं पूरे पन्द्रह दिनों के लिए. दोपहर तीन बजे वे नए घर गए, जो कार से यहाँ से दस मिनट की दूरी पर है. आज काफी काम हो गया. पूजा कक्ष में एक लकड़ी का एक सुंदर वृक्ष लगवाया, उसके पीछे प्रकाश भी है. डाइनिंग रूम में छोटी बहन की दी कुकू घड़ी लगायी, जिसमें हर घण्टे पर चिड़िया बाहर आकर बोलती है. धीरे-धीरे घर सामानों से भरता जा रहा है. 


उसने अतीत के पृष्ठ खंगाले, “ मिल गयी शांति  ! वह सोचती है उसने अच्छा किया पर उसने बुरा किया, बहुत बुरा ! जो जिसमें खुश रहे उसे वैसे ही रहने देना है. किसी के जाने से वह खुश रहेगी या उदास यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि उनके साथ वह कैसे रहती है. कोई कैसा भी हो उसके प्रति द्वेष भाव रखता हो या प्रेम का भाव, अपना ही तो है. फिर क्यों नहीं चुप रहती ! चुप रहना सबसे अच्छा है यदि उसके पास मधुर बोल नहीं हैं तो कड़वे बोल क्यों बिखेरती-फिरती है. ऐसे कड़वे बोल जो उसके होंठों से निकलते हैं जब उसका बदन काँप जाता है, उसके सिर में दर्द हो जाता है. 

वह सिर्फ अपने लिए जीते हैं ! दूसरों की जिंदगी में दखल देना उन्हें पसन्द नहीं, पर वे दूसरे कौन हैं ? उनका अपना परिवार ही तो. कितनी आसानी से उन्होंने कहा कि वे तो घर में मेहमान की तरह रहते हैं. ओह ! ईश्वर ! क्या फिर रिश्ते-नाते स्नेह आदि सब असत्य हैं ? 


नहीं ! नहीं ! नहीं ! यह यदि  असत्य है तो जीवन क्या है ? जीवन एक खोखली अनुभूति नहीं है फिर ! 

उस वक्त उम्र कच्ची थी, सो मेहमान की तरह रहने का अर्थ समझ में नहीं आया था. जीवन की समझ नहीं थी, आज पढ़कर हँसी आ रही है, अज्ञान के हाथों किस तरह छला जाता है मानव. 


Tuesday, August 18, 2020

साहित्य का उद्देश्य

 

पिछले आधे घण्टे से नूना ‘प्लैनेट अर्थ’ देख रही थी. वालरस की विचित्र दुनिया और रंगीन पक्षियों के अद्भुत नृत्य ! प्रकृति की विविधता और सौंदर्य अनूठा है पर माया की इस नगरी का कोई अंत नहीं है. कोई कितना भी देखे और कितना भी सराहे, इसमें न कोई सार है न कोई अंत. नेत्र थक जायेंगे और मन भी पर न तो जीवन में कोई ऐसा आनंद झलकेगा जिसका कोई अंत न हो और जो पूर्णता का अनुभव कराने वाला हो, वह तो मायापति से मिलकर ही पाया जा सकता है. आज भी सुबह कल की तरह थी, वापस लौटे तो रक्तजांच के लिए रक्त का नमूना लेने एक व्यक्ति आकर बैठा था. कैल्शियम की जाँच होगी और कुछ दूसरे टेस्ट भी. रिपोर्ट ईमेल में आ जाएगी. जून ने भी कल डॉक्टर को दिखाया, आज घर बैठे टेस्ट हो गए. बड़े शहर में रहने का यह बड़ा फायदा है. दोपहर को वे नए घर जायेंगे, पेंटिंग का कार्य सम्भवतः पूरा हो चूका होगा. नन्हा दफ्तर जा चुका है, उसका कालेज का  मित्र जो पास ही रहता है और जिसका भोजन यहीं बनता है, अभी तक आया नहीं है. उसकी चाय दो घण्टे से बनी हुई है, आकर गर्म करेगा और नाश्ता भी. 


सत्व, रज और तम की साम्यावस्था होने पर ही वे गुणातीत होते हैं. पहले तमस को रजस में बदलना होगा, फिर रजस को सत्व में. बढ़ा  हुआ  तमस मन को  क्रोधित और ईर्ष्यालु बनाता है. रजस  व्यर्थ के कामों लगाता है. जब यह ऊर्जा सत्व में परिवर्तित हो जाती है तो भीतर समता का वातावरण उत्पन्न हो जाता है. साम्यावस्था में दीर्घ काल तक टिके रहने के बाद ही साधक गुणातीत अवस्था का अनुभव करता है. आज सदगुरू को सुना, तमस की अवस्था में भी भीतर एक शांति का अनुभव होता है पर वह जड़ता का प्रतीक है. बाहर का जीवन गतिमय हो और भीतर शांति हो वही गुणातीत की निशानी है. आज दिन भर व्यस्तता बनी रही. 


रात्रि के आठ बजे हैं, आज भी कल की तरह वे दिन भर व्यस्त रहे. घर में काम काफी आगे बढ़ गया है. आज योग कक्ष में वॉल पेपर भी लग गया. ऊपर की बैठक  तथा मुख्य शयन कक्ष में भी. कमरे अच्छे लगने लगे हैं, अभी पर्दे नहीं लगे हैं  और न ही फर्नीचर आया है. कल सम्भवतः गहन सफाई होगी. आज यहाँ आये छठा दिन है, समय जैसे भाग रहा है. आजकल योग वशिष्ठ पढ़ रही है और सुन भी रही है. अनुभवानन्द जी कहते हैं, परमात्मा सद है इसका अर्थ है वह सत व असत दोनों से परे है, वह चिद है यानि चितिशक्ति उसके पास है जिसका विस्तार आनंद के रूप में होता  है. आनंद -  इच्छा, क्रिया व ज्ञान इन तीन शक्तियों के रूप में प्रकट होता है. ज्ञान यदि शुद्ध है तो इच्छा भी शुद्ध होगी और उसकी पूर्ति हेतु क्रिया भी श्रेष्ठ होगी. जैसा ज्ञान, वैसी इच्छा, वैसा कर्म ! यदि कोई सांख्य मार्ग का साधक है तो वह स्वयं को शुद्ध, बुद्ध, मुक्त आत्मा के रूप में अनुभव करता है. कर्म के मार्ग का साधक धीरे-धीरे अंतःकरण को शुद्ध करता है, इसी तरह उपासना मार्ग का साधक भी अपने भीतर परम का अनुभव करता है. ज्ञान प्राप्त करने का साधन अंत:चतुष्टय तथा ज्ञानेन्द्रियाँ हैं. इच्छा आत्मा का सहज स्वभाव है, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, प्रयत्न-ज्ञान आत्मा के गुण हैं.  


‘’वह विज्ञान की छात्रा रही है किन्तु उसका रुझान साहित्य की ओर है यदि वह साहित्य की छात्रा रही होती तो सम्भवतः इसका विपरीत हुआ होता अथवा नहीं भी. शब्दों से उसे प्यार है, शब्दों का जादू उस पर चलता है. कभी रुलाते कभी हँसाते शब्द ! मानव ने जब प्रथम बार शब्दों का प्रयोग किया होगा तो वह क्षण कितना महान होगा ! फ़िराक गोरखपुरी साहित्य को उद्देश्यपूर्ण होना आवश्यक नहीं समझते. वह समझती है चाहे साहित्य हो या अन्य कोई कला विकास तो वह करती ही है, चाहे मानसिक विकास ही, लेकिन लक्ष्य तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व वह नहीं ले सकती. चरैवेति-चरैवेति का संदेश वह अवश्य देती है. परन्तु साहित्य बिना किसी उद्देश्य के लिखा जाता है यह बात कभी भी मान्य नहीं हो सकती.  रचनाकार यदि स्वयं का उत्थान चाहता है तो यह भी एक उद्देश्य हुआ, या सन्तुष्टि अथवा प्रसन्नता ही. उसकी इच्छा है कि वह भी कुछ लिखे. लिखना और पढ़ना ये दो कार्य ही उसे पसन्द हैं और वह आसानी से इन्हें कर सकती है पर वह कितनी-कितनी देर यूँही बैठी रह जाती है. कितना समय नष्ट करती है, कल से नियमित रहेगी हर कार्य वक्त पर’’. कालेज के अंतिम वर्ष में उसने यह सब लिखा था, उसे स्वयं ही पढ़कर आश्चर्य हुआ ! 



Thursday, September 27, 2018

महालया अमावस्या


आज महालया है. नवरात्रि का समय संधिकाल है, संधि बेला है. ग्रीष्म खत्म होने को है सर्दियां शुरू होने को हैं. गुरूजी कह रहे हैं, इन दिनों में यदि कोई श्रद्धा से उपासना करेगा, तो गहन तृप्ति के रूप में उसका लाभ उसे अवश्य मिलेगा. इष्ट के प्रति एकनिष्ठ होकर यदि कोई नवरात्रि का अनुष्ठान करता है, भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करता है, तब सहज आनंद के रूप में उसे पूजन का लाभ मिलेगा. मानव की देह मिली है तो उसका पूर्णलाभ लेना होगा. भावना और श्रद्धापूर्वक किया गया नवरात्रि पूजन उन्हें तृप्त कर देता है. साधक को ज्ञान प्राप्त करना है फिर सब कुछ छोड़कर शरण में आ जाना है.
आज प्रथम नवरात्र है. मन में एक विचित्र शांति का अनुभव हो रहा है. मन जैसे पिघलना चाहता है. अस्तित्त्व के चरणों में बह जाना चाहता है. परमात्मा इतना उदार है और अपार है उसकी कृपा..उसके प्रति प्रेम की हल्की सी किरण भी सूरज की खबर ले आती है एक न एक दिन.
आज मौसम गर्म है. नैनी घर की सफाई में लगी है, अभी यह हफ्ता लगेगा पूरा घर साफ होने में. आज तीसरा नवरात्र है. दोपहर को अयोध्या काण्ड में आगे लिखना आरम्भ किया पर पूरा नहीं किया. कुछ देर पतंजलि योग सूत्र पर एक सखी से कल लाई किताब पढ़ी. जून की यूरोप से लायी काफी पी.
जीवन को सुंदर बनाने के लिए दो वस्तुओं की आवश्यकता होती है. ज्ञान तथा ऊर्जा, इसीलिए वे शिव और शक्ति दोनों की आराधना करते हैं. दुर्गापूजा के नौ दिनों में प्रथम तीन दिनों में काली की पूजा होती है, जो तमोगुण का प्रतीक है, फिर अगले तीन दिन लक्ष्मी की तथा अंत में सरस्वती की, जो रज तथा सत गुण की प्रतीक हैं. उनके भीतर की ऊर्जा तीनों गुणों से प्रभावित होती है ! कभी वे तमोगुण के शिकार हो जाते हैं, तो कभी सतो या रजोगुण से. ज्ञान की देवी सरस्वती की कृपा तभी होगी जब तमोगुण से मुक्त होकर वे क्रियाशील बनते हैं, सौन्दर्य का सृजन करते हैं. अस्तित्त्व प्रतिपल अपना सौन्दर्य लुटा रहा है, वही सृजन उसका ज्ञान है, ज्ञान से ही प्रकटा है और ज्ञान इसके बाद भी अक्ष्क्षुण है. जड़ता को हटाकर क्रियाशील होने के बाद जो विश्रांति का अनुभव होता है, वही तृप्त करने वाला है !
आज स्कूल जाना है. ग्रैंड पेरेंट्स डे पर कुछ बातें जो उस दिन लिखी थीं, उनके साथ बांटने के लिए. बातें जो वे सब जानते हैं पर समय आने पर याद नहीं रहतीं. दादा-दादी के महत्व को कौन नकार सकता है एक बच्चे के जीवन में, पर यह बात माता-पिता को समझ में नहीं आती. उन्हें लगता है बच्चे पर पूर्ण रूप से उनका ही अधिकार है और उसकी परवरिश से जुड़ा हर फैसला केवल वे ही ले सकते हैं. जब समझ आती है तब बहुत देर हो चुकी होती है. जिसकी बुद्धि खुल गयी है, जो सभी को अपना अंश मानता है, वह तो प्रेम के किसी भी रूप का सम्मान करेगा. प्रेम बाँटने और और प्रेम स्वीकारने में कंजूसी करते हैं जो, वे उस महान प्रेम को महसूस नहीं कर पाएंगे. माता-पिता के प्रति कृतज्ञता जब तक भीतर महसूस नहीं होगी, तब तक उनके स्नेह की धारा में वे भीग नहीं सकते. जीवन उन्हें चारों और से पोषित करना चाहता है. उनके पूर्वजों का रक्त उनके भीतर बह रहा है. वे बहुत संकुचित दृष्टिकोण रखते हैं और तात्कालिक हानि-लाभ को देखते हैं, अपने अतीत और भविष्य की तरफ जिसकी नजर होगी, वह पूर्वजों का सम्मान करेगा. आज की उसकी वक्तृता यकीनन दिल से ही बोली जाएगी. कागज पर लिखा वहीं का वहीं रह जायेगा.

Thursday, September 6, 2018

मुरली की धुन



अगस्त आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये और डायरी खोले पांच दिन. पिछले दिनों ऐसी व्यस्तता रही कि कलम कहाँ पड़ी है, इसका भी ख्याल नहीं आया. उस दिन कमेटी मीटिंग में जो भोजन परोसा गया उसे किसी भी तरह स्वास्थ्यवर्धक नहीं कह सकते. घर आकर रस्क, दूध व आम खाए जो जून ने शीघ्रता से लाकर  दिये. अगले दिन विशेष बच्चों के स्कूल गयी, बारह बजे लौटी, तीन बजे से कुछ पहले वे तिनसुकिया गये, लौटे तो शाम को जून के एक मित्र सहकर्मी के जन्मदिन की पार्टी में चले गये. अगला दिन रविवार का था. उसी रात को आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर का फोन आया. रूद्र पूजा के लिए एक स्वामी जी तिनसुकिया आ गये हैं तथा सोमवार की रात्रि उनके यहाँ आयेंगे. सोम की सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को मेहमान कक्ष साफ करवाया. एक घंटा राखियाँ बनाने में लगाया. मंगल व बुध स्वामी जी रहे. पूजा में शामिल होने सेंटर भी गयी. आज सुबह वह चले गये सो इस तरह आज समय मिला है डायरी खोलने का. शाम को योग सत्र में आठ-दस महिलाएं आ रही हैं, अच्छा लगता है समूह में साधना करना. कल दोपहर महिला क्लब में सिलाई कला से जुड़े एक प्रोजेक्ट का कार्यक्रम भी है. ‘एक जीवन एक कहानी’ में आजकल जून की पिछली अस्वस्थता का जिक्र आ रहा है, आजकल उनके घुटने का दर्द कम हुआ है.

आज टीवी पर मुरली सुनी, कृष्ण की मुरली नहीं, वह तो तब सुनी थी जब एओएल के कोर्स में वह अनुभव हुआ था और नियमित ध्यान करना आरम्भ किया था. यह मुरली तो एक ब्रह्मकुमारी द्वारा पढ़ी गयी थी. उसके अनुसार वह आत्मा है, जो परमधाम से अवतरित हुई है और विश्व के लिए कल्याणकारी है. यह स्मृति उन्हें सदा सजग बनाये रखेगी और सर्व शक्तियों का स्फुरण स्वतः ही होता रहेगा. उन्हें चलते-फिरते प्रकाश स्रोत बनकर सेवा करनी है, कितना उच्च भाव है यह. गुरूजी भी कहते हैं, वे सब ऊर्जा का केंद्र हैं, अग्नि स्वरूप हैं. परमात्मा के ज्ञान और प्रेम के वे अधिकारी हैं. वे उस राजा के बच्चे हैं, उसके दिल के तख्त पर आसीन रहते हैं. उस तख्त से नीचे नहीं उतरना है उन्हें. स्वयं को चुम्बक जैसा बनाना है ताकि शांति और प्रेम की तरंगे फैलने लगें. जैसे जल से तृषा बुझती है, वैसे आत्मा के लिए शांति और प्रेम ही जल है जिससे उसकी तृषा बुझ सकती है. वे यदि शांति और प्रेम में टिक जाएँ तो किरणें अपने आप ही प्रसरित होने लगेंगी. स्वयं यदि कोई तृप्त है तो सम्पर्क में आने वाले भी तृप्ति का अनुभव करेंगे. याद की यात्रा में निरंतर रहना है उन्हें. निरन्तरता ही चाहिए. शक्तिशाली संकल्प द्वारा भी उन्हें सेवा का कार्य करना है. परमात्मा चाहते हैं आत्मा उनके जैसी हो जाये. दोनों का लक्ष्य एकत्व ही है.

यह समय सुनने का समय है. प्रकृति पुकार रही है, आये दिन की प्राकृतिक आपदाएं यही तो बता रही हैं. व्यक्ति पुकार रहे हैं. यह पुकार सुनने में नहीं आती क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों में लगे हैं. आत्म स्मृति में रहकर ही उनकी उन्नति हो सकती है, इससे उनकी ऊर्जा का सदुपयोग होने लगता है. परमात्मा से कैसे मिलें इस प्रतीक्षा काल को भूलकर अब तो उसे अपने सम्मुख पाना है. जैसे गुलाब के साथ कांटा होता है वैसे ही ये तकलीफें परमात्मा के और निकट जाने का साधन ही बनती हैं.

Tuesday, August 28, 2018

दफ्ती का घर



शाम होने को है. टीवी पर केन्द्रीय मंत्री बता रहे हैं कि उत्तर-पूर्व भारत के विकास और सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार क्या काम कर रही है, इसको बताने के लिए एक पुस्तिका का प्रकाशन भी हुआ है. पिछले दिनों यहाँ काफी ‘बंद’ हुए और तेल कम्पनी को भी इसके कारण काफी खामियाजा भुगतना पड़ा है. जून अभी आने वाले हैं, शाम को उन्हें बंगाली सखी के यहाँ जाना है, चाय पर बुलाया है. कल शाम को एक अन्य सखी ने रात्रि भोज पर बुलाया है. ‘नजर बदली तो नजारे बदले’, कितनी सही कहावत है यह. किसी के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलते ही सामने वाला भी बदला सा नजर आने लगता है. यदि पहले कभी मित्रता रही हो तो वही पहले वाला प्रेम भरा. किसी के प्रति कभी भी कोई विपरीत भाव न जगे, क्योंकि एक का ही विस्तार है सब. एक के प्रति भीतर प्रेम जगे तो सबके प्रति उसकी खुशबू फ़ैल ही जाती है और उसमें प्रेम देने वाला स्वयं भी शामिल होता है. जगत के साथ उनका व्यवहार खुद के साथ के व्यवहार को ही झलकाता है. जब भी जगत के प्रति उनके मन में कोई भी निंदा का भाव जगता है, वे हर बार स्वयं को ही पीड़ित कर रहे होते हैं. भीतर की शाश्वतता का अनुभव जिसे हो जाये फिर वह बदलने वाले इस जगत को नहीं देखता, उसके पीछे छिपे अबदल ही देखता है, जो बदल ही रहा है, उसकी चिंता कब तक और क्यों ? जो अबदल है उससे ध्यान हटते ही पीड़ा व दुःख का संसार आरम्भ हो जाता है. उनके भीतर ही है शांति का वह परमधाम जहाँ अनंत सुख का साम्राज्य है !

नन्हे ने आज अपनी कम्पनी व कार्य के विषय में बहुत कुछ बताया. अगले कुछ वर्षों में वे अधिक लाभ प्राप्त करेंगे, अभी तो वे पैसा लगा रहे हैं, जो इन्वेस्टर ने लगाया है. वह अपने काम से संतुष्ट लगता है. सुबह उसकी मित्र से फोन पर बात हुई, वह इसी माह नन्हे को अपने पिता से मिलाएगी. वह कह रही थी कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी, उसे जरा भी अंदाजा नहीं है. चार बजने को हैं शाम के. अभी कुछ देर पूर्व अस्पताल से लौटी. आँख का दबाव सामान्य है. दस दिन बाद फिर जाना है. आंख के आगे एक काला घेरा सा दिखाई देता है. उसकी वजह से और कोई समस्या तो नहीं है फ़िलहाल. नन्हे ने पूसी के लिए दफ्ती का एक घर बना दिया है, पर वह उसमें कम ही टिकती है. कल ही वह वापस जा रहा है.

सुबह से लगातर वर्षा हो रही है. अभी-अभी धोबी आकर धुले सूखे कपड़े दे गया, ऐसे मौसम में भी वह अपना कर्त्तव्य पूरी तरह निभाता है, पुत्र की पढ़ाई को लेकर चिंतित है. उसे बीए के बाद एमए कराना है, क्या उसके बाद सरकारी नौकरी मिल जाएगी, क्या पढ़ाई कर लेने मात्र से ही मिल जाएगी ? ये उसके प्रश्न थे. नन्हे ने कहा, प्राइवेट नौकरी ही ढूँढनी पड़ेगी. आज लाओत्से पर ओशो के वचन सुने. अद्भुत वचन हैं उसके, ज्ञान जितना-जितना बढ़ेगा, पाखंड भी बढ़ेगा, होशियारी बढ़ेगी तो चालाकी भी बढ़ेगी. जब तक कोई द्वन्द्वों के पार नहीं चला जाता, उनसे मुक्त नहीं हो सकता. अच्छे बने रहने का आग्रह बुरे से पीछा छुड़ाने नहीं देता. आत्मा में रहकर मन के सारे द्वंद्व स्पष्ट दिखने लगते हैं. शिवानी भी कहती है, सतयुग में ज्ञान की, पूजा की कोई आवश्यकता ही नहीं रहेगी क्योंकि अज्ञान ही नहीं होगा. स्वभाव में टिकना आ जाये किसी को तो वह सुख-दुःख दोनों के पार निकल जाता है.    

Monday, May 21, 2018

मोटो जी का अलार्म



परसों रात साढ़े दस बजे वे यहाँ पहुँचे थे. कल शाम को टहलने गये. धूप तेज निकलती है यहाँ आजकल. एक कबूतर बाहर सूख रहे गमले से एक सूखी पत्ती का टुकड़ा अपनी चोंच में दबाकर ले गया है, शायद घर बनाएगा. जून नेत्रालय गये हैं. नैनी काम कर रही है. नन्हा व उसके मित्र, जो उसके साथ ही रहते हैं, पहले ही काम पर चले गये हैं, अब सभी देर शाम को वापस आयेंगे. नन्हा अभी तक अपने भविष्य के बारे में तय नहीं कर पाया है. वह अकेला ही रहना चाहता है, दो होकर भी अकेला, पता नहीं ऐसा कब तक चलेगा. समय कितना बदल गया है, अस्तित्त्व तो दूर स्वयं की भी खबर नहीं है. एक नींद में जैसे जी रहे हैं लोग, उसकी खुमारी को आनंद समझते हैं. जीवन की भव्यता और दिव्यता से सर्वथा अपरिचित ! उसे सभी के प्रति सहानुभूति होती है और यह भाव भी होता है, इसी तरह की या इससे भी गयी अवस्था में वह भी थी. ये भी एक दिन नींद से जगेंगे और तब धर्म के मार्ग पर कदम रखेंगे, खुद को जानने का प्रयत्न करेंगे. कल मकान की रजिस्ट्री हो जाएगी, परसों से सफाई का काम शुरू हो जायेगा. शनिवार को गृह प्रवेश के पूजन का कार्यक्रम होगा, इतवार को उन्हें वापस जाना है. नन्हा अगले महीने शिफ्ट करेगा, हो सकता है पहले ही कर ले.
आज से इस सोसाइटी में एक घर उनका अपना भी है. दस बजे से पहले ही वे रजिस्ट्रार के दफ्तर पहुँच गये थे. रजिस्ट्री हो गयी है. नन्हे और उसके नाम पर. अगली बार जब वे बंगलूरू आयेंगे तो नये घर में ही रहेंगे. शाम को जायेंगे वे उस घर में, कल से रंग-रोगन का काम आरम्भ हो जायेगा. छोटी बहन ने गाकर बधाई दी है नये मकान की, वह ऊर्जा से भरी है, सकारात्मक ऊर्जा ! ईश्वर उसे हर ख़ुशी दे !  उन्होंने ‘१९४७’ में दोपहर का भोजन खाया. रेस्तरां के नाम भी लोग बहुत चुन कर रखते हैं यहाँ. सुबह प्राणायाम के बाद आज अनोखे अनुभव हुए, कोई जैसे भीतर गा रहा था, पढ़ रहा था, सिखा रहा था. जैसे कोई सृष्टि के आरम्भ की बात समझा रहा था. सतयुग की बात और जीव के इस जगत में आने की बात. आरम्भ में सब कुछ नया होता है तो विकार रहित होता है फिर धीरे-धीरे परिवर्तन आता है. सद्गुरू की बताई साधना के बाद भीतर एक गहन शांति का अनुभव होता है. तभी वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग इस ज्ञान से जुड़ें. वह पांचवीं मंजिल पर है, नीचे से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं. जून दूसरे कमरे में फोन पर बात कर रहे हैं, छुट्टी पर भी उनका दफ्तर चलता रहता है.

आज सुबह उसके पुराने मोटो जी के अलार्म से नींद खुली. वह जो एक बार गाड़ी में छूट गया था और जिसे वापस लाने के लिए ड्राइवर को एक हजार देने पड़े थे. बाद में एक दिन गिरकर जिसकी स्क्रीन टूट गयी थी, जिसे जून ने नोएडा में बदलवा दिया था, पर दो-तीन दिन ही चली नई स्क्रीन. इतने दिनों से बैग में बंद पड़ा था, आज अचानक उसकी घंटी पूर्व निर्धारित समय पर बजने लगी. शायद रोज बजती हो और उसने सुनी ही न हो...नींद खुलने के बाद कुछ देर ध्यान किया. किसी भी विधि से ध्यान करे, सभी अंत में एक हो जाते हैं, जिसके बाद मन खाली हो जाता है और तन हल्का. फेसबुक पर एक प्रसिद्ध तथा वरिष्ठ लेखक ने कहा है, मई में होगा हिंदी सम्मेलन. जोरहाट का माजुली भी उसका एक केंद्र है. वे अवश्य जायेंगे. माजुली देखने की उनकी इच्छा भी ऐसे पूर्ण हो जाएगी.

Tuesday, April 18, 2017

सुबह की सैर


आज सुबह टहलने गयी तो पैरों में अचानक ताकत भर गयी थी. कुछ देर दौड़ कर बाकी वक्त तेज चाल से भ्रमण पूर्ण किया. घर आकर विश्राम किया, मन खाली था. जहाँ कुछ भी नहीं रहता, सारे अनुभव चुक जाते हैं, वहीं कैवल्य है, वहीं निर्वाण है. सारे अनुभव मन को ही होते हैं. मन एक मदारी है, वह ढेर से खेल दिखाए चले जाता है, लुभाए चले जाता है. लेकिन जहाँ कुछ भी नहीं रहता, दूसरा कोई रहता ही नहीं, मुक्ति है. गुरूजी कहते हैं, अच्छे से अच्छा अनुभव भी बाहर ही है. वहाँ द्वैत है, अब कुछ देखना नहीं, कुछ पाना नहीं, कुछ जानना नहीं, बस होना है..सहज अपने आप में पूर्ण..मौन ! इस मौन के बाद जो शब्द उठेंगे वह जीवन को उत्सव बना देगें..अर्थात जीवन को उत्सव बना देखने की कामना तो भीतर है ही..कैसा चतुर है मन..एक ही कामना में सब कुछ मांग लेता है और फिर अलग हो जाता है..

आज का भ्रमणकाल कल से अलग था. हरियाली, फूलों की लाली, मनहर मनभावन सुख वाली. नवम्बर की सुबह कितनी सुहानी होती है. आकाश पर रंगों की अनोखी चित्रकारी, वातावरण में हल्की सी ठंडक..पंछियों का कलरव और हवा इतनी हल्की सी..भीतर कोई प्रेरणादायक वचन बोलने लगा. बहुत सारे संशय दूर हो गये. उन्हें साक्षी भाव रहना है, पूर्व संस्कार वश यदि कोई विकार जगता है तो साक्षी भाव में रहने के कारण उसका कोई असर नहीं होता. कैसी अनोखी शांति है इस ज्ञान में. शाम को मीटिंग है, कल एक सखी का जन्मदिन है. सभी कुछ कितना सरल है. वे अपनी पूर्व धारणाओं और पूर्वाग्रहों के कारण जटिल बना लेते हैं. जीवन एक गुलाब की तरह जीना चाहिए या एक संत की तरह..निर्लिप्त..सदा मुक्त !

आज बदली है, ठंडी हवा भी बह रही है. कल आखिर कसाब को फांसी हो गयी. उसकी कहानी इस जन्म की तो खत्म हो गयी, लेकिन अगले जन्म में उसे जाना ही होगा. सुबह साढ़े तीन बजे ही नींद खुल गयी, उठी नहीं, एक स्वप्न चलने लगा. नन्हे को देखा, कल रात माँ, पुत्र के मिलन के जो डायलाग सुने थे, वे भी कहे, सुने, तभी भीतर विचार आया God loves fun वह परमात्मा उन्हें नाटक करते देखकर कितना हँसता न होगा ! सुबह वे साथ ही घूमने गये, बातचीत हुई ज्यादा, घूमना हुआ कम, वापस आये तो माली आ गया था.





Monday, February 27, 2017

तेज पत्ते का पेड़


मन के भीतर उपजा एक छोटा सा शब्द या विचार मन की शांति को भंग करने में समर्थ है, यह तो अच्छा है कि यह उनके हाथ में है उसे उपजाएँ या नहीं, लेकिन तभी तक जब तक वे सजग रहते हैं. एक बार बेहोशी में कोई विचार उपजाया तो बात हाथ से निकल सकती है और ऊपर से तुर्रा यह कि वह शब्द एक बीज बनकर भीतर जम जायेगा और भविष्य में आलंबन मिलने पर पुनः पनप सकता है. लेकिन शब्द का जन्म किसी न किसी कामना के कारण होता है, कामना ही हर दुःख के जड़ में है, कोई उसे प्रेम का नाम दे यह उसकी स्वतन्त्रता है पर भीतर कहीं भय है जो कामना को जन्म देता है और यह भय अकेले रह जाने का है, इसका मूल भी तो मृत्यु के भय में है. वे मरना नहीं चाहते किन्तु आत्मा में स्थित रहें तो मृत्यु का भय नहीं और आत्मा में रहें तो अकेलेपन का भी भय नहीं और कामना का तो वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता. हर कामना अभाव से उपजती है, आत्मा पूर्ण है वहाँ कोई अभाव नहीं. जीवन कितना सुंदर है और वे इसे कुरूप बनाने में लगे रहते हैं. वे उन दुखों को पैदा कर लेते हैं जिनका वास्तव में कोई अस्तित्त्व ही नहीं है, वे संशय के जाल में स्वयं को फंसा लेते हैं, जहाँ विश्वास के फूल खिले हैं. उनका दुःख के प्रति लगाव तो देखते ही बनता है. वे उगते हुए सूर्य में अंगारे खोज लेते हैं और बहते हुए धारे में तलवारें खोज लेते हैं. जो उनके पास है उसकी कद्र करने की बजाय  उसके खो जाने के अज्ञात भय में रातों की नींद गंवा देते हैं !

‘जो तू है सो मैं हूँ’ इस उक्ति को जाने कितनी बार कहा, सुना था. आज पूरी तरह से अनुभव भी कर लिया. कल रात्रि सोने से पूर्व अस्तित्त्व जैसे उस पर बरसा. ऐसा अनुभव पहली बार हुआ, अज्ञात ने जैसे उसे चारों और से घेरे में ले लिया थे. अचिंतनीय भावों की वर्षा हो रही थी. शांति इतनी सघन थी कि..और तब प्रतीत हुआ कि जैसे वह है इस देह में अपनी यात्रा पूर्ण करती हुई वैसे ही अन्य आत्माएं हैं सबके साथ प्रेम का ही नाता है. जो वह है वही वे हैं, कोई भेद है ही नहीं, तभी उनके द्वारा किसी को कहा गया कटु वचन उन्हें भी दुःख दे जाता है और उनके द्वारा किसी को कहा गया प्रेमपूर्ण वचन उन्हें ही तृप्त कर जाता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को ही कहा होता है. मन और आत्मा दोनों ही परमात्मा की सन्तान हैं, आत्मा सुर है मन असुर, आत्मा कृष्ण है और मन कंस है, मन जब तक अर्जुन नहीं बन जाता उसे मरना होगा. भक्त होकर ही मन आत्मा से एक हो जाता है, रावण होकर वह आत्मा का विरोध करता है, विभीषण होकर उसकी शरण में जाता है. जून का फोन आया था सुबह, वह उसका सच्चा मीत है, उसकी आत्मा है, उसे उसने कुछ मूर्खतापूर्ण शब्द कहे जो स्वयं को ही चुभने लगे, उससे क्षमा मांगी, मन हल्का हो गया. सुबह ध्यान के वक्त भीतर कविताएँ जन्म ले रही थीं. असीम है सद्गुरू की कृपा..उनकी कृपा ही उसे यहाँ तक लायी है, परमात्मा की चौखट पर लाने वाले उसके प्यारे सद्गुरू को कोटि कोटि प्रणाम उसने भेजे.

सरदारनी आंटी को कार्ड, फूल व छोटा सा उपहार देकर आयी है. अब उनके दिल्ली जाने से पहले सम्भवतः एकाध बार और उनसे मिलना हो. आज दायीं तरफ की पड़ोसिन का फोन आया, वे लोग भी तबादले के कारण दिल्ली जा रहे हैं. जून के एक और सहकर्मी भी जा रहे हैं, एक दिन तो सबको छोड़ना ही था, अच्छा है एक-एक कर सब बिछड़ रहे हैं. मन मुक्त रहेगा जितना उतना परमात्मा में टिकेगा. आज सुबह ध्यान में एक आकृति दिखी पहले भी कई बार दिखती है, कौन है वह ? क्या है ? कौन जानता है, कोई दिव्य आत्मा या उसका कान्हा स्वयं ही ! जून आजकल बहुत शांत हो गये हैं, वे भी अध्यात्म के पथ के यात्री हैं. परमात्मा कभी भी किसीकी पुकार अनसुनी नहीं करता, वह अनंत है, वे उसकी एक बूंद कृपा के भी आकांक्षी नहीं हो पाते अहंकार के कारण.
कल उन्हें यात्रा पर निकलना है, तैयारी अभी शेष है. मन एक भिन्न उल्लास का अनुभव कर रहा है. अभी कुछ देर पूर्व धोबी आया था, पुराना कम्प्यूटर जो उसे दिया था, चला ही नहीं, कह रहा था लौटा जायेगा. आज कढ़ी बनाई है. पिताजी को ताजा तेजपत्ता व कढ़ी पत्ता घर ले जाने का मन है. जून के मना करने के बावजूद ढेर सारे हरे पत्ते वह अपने सूटकेस में रख रहे हैं. यदि कपड़ों में कोई दाग लग जाये या गंध भर जाये इसकी परवाह किये बिना. 

Friday, February 24, 2017

रूद्र पलाश के फूल


आज गुरूवार है, जून अभी भी बनारस में हैं. इतवार को आएंगे. नैनी ने बिना उससे पूछे मिक्सी इस्तेमाल की, उसे डांटा पर खुद को ही अच्छा नहीं लगा. उसे कुछ देकर प्रसन्न किया. जून ने कहा, एक सखी ने उसे फोन करके ज्योतिष की किताब लाने को कहा है, सुनकर संस्कारवश अच्छा नहीं लगा, कितने गहरे संस्कार हैं, अवचेतन काम करता है तो चेतन कुछ भी नहीं कर पाता, पर अगले ही पल सजग होकर देखा तो वह सामान्य हो गयी. पिताजी को बताया, उन्हें भी ज्योतिष पर विश्वास नहीं है.

आज भी एक बार देह में अप्रिय संवेदना का अनुभव होने पर साक्षी भाव बनाये रखने पर तत्क्षण मन की समता प्राप्त की उसने. विपश्यना कितना अद्भुत ज्ञान है. सत्य ही एकमात्र उनका अपना है, ऋत कहें, नियम कहें, हुकुम कहें, धर्म कहें या आत्मा कहें, ब्रह्म कहें, प्रेम, आनन्द, शांति या जो भी नाम दें, स्वयं के बन्धु तो यही हैं, एक हैं पर अनेक हुए हैं. जीव ईश्वर का अंश है, वह उसी का है, उस जैसा है. जून परसों आ जायेंगे, आज दोपहर उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं था.

कल नन्हे से उसने उन विषयों पर बात की, जिनसे मन परेशान था. उसे अपने बारे में कोई संदेह नहीं है. वह उन बीस प्रतिशत लोगों में से है जो किसी भी पूर्वाग्रह से ग्रसित नहीं होते. उसको भी परमात्मा राह दिखायेंगे. यहाँ हर एक को अपना मार्ग स्वयं ही चुनना होता है. अपने कर्मों का फल हरेक को स्वयं ही भोगना होता है. प्रियजनों को दुःख होता है पर वह आसक्ति के कारण, जहाँ राग है, वहाँ दुःख है, जहाँ अहंकार है, वहाँ दुःख है, जहाँ ईर्ष्या है, वहाँ दुःख है. वह कुछ भी नहीं है, इस बात का अनुभव उस दिन किसी अन्य के द्वारा हुआ तो वह क्रोध से भर गयी. ध्यान में यह कहना कि वह कुछ भी नहीं है, शांति से भर जाता है. यह दोहरापन क्यों ? उसे अपने होने के लिए भी दूसरों से सर्टिफिकेट लेना पड़े यह तो निर्धनता हुई, अभाव हुआ और यही तो दुःख है. कोई कह दे, वह अच्छा है, इसकी फ़िक्र में ही लोग क्या-क्या किये जाते हैं, साधारण होना कोई नहीं चाहता, सब असाधारण होना चाहते हैं. वह एकांत में इसलिए प्रसन्न रहती है क्योंकि वहाँ कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं है. लोगों के बीच जाकर उनसे व्यवहार में आकर ही किसी को पता चलता है कि वह कितना पक गया है. अभी बहुत दूर जाना है, अनुभव को निजी बनाना है, बुद्धि के स्तर पर, आत्मा के स्तर पर उस परमात्मा से एक होना है.

अगले माह उन्हें यात्रा पर जाना है. इक्कीस मार्च से सात अप्रैल तक, जाने से पूर्व एकाध दिन तैयारी में और आने के बाद एकाध दिन घर ठीकठाक करने में, यानि कुल बीस दिन. कल रात को कविता नहीं लिखी, भाव भीतर उमड़ रहे हैं. फागुन आ गया है, आम के बौर की मदहोश कर देने वाली खुशबू नासापुट में भर रही है, रूद्र पलाश खिल गया है, पलाश अभी तैयारी में जुटा है. परमात्मा चारों ओर बिखरा है, उसकी छुवन भी मोहक है. माँ की सरदारनी सखी के लिए भी एक कविता लिखनी है. दोनों भाभियों का फोन आया है, दोनों उनके आने को लेकर उत्सुक हैं. टीवी पर सिन्धी साईं ईश्वर की महानता की चर्चा कर रहे हैं, वही तो है, वही है..बस वही है...कल से उसका गले में खराश है, पर स्वयं वह देह नहीं है, यह भाव दृढ़ होने से कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा है ! हवाएं उसका क्या बिगाड़ सकती हैं, यह माया उसका क्या बिगाड़ सकती है. वह निस्पृह, निसंग, निष्क्रिय, अनादि, अनंत चेतना है ! वह निरंजन है, अलख है, कोई वस्तु कोई विचार, कोई परिस्थिति उसे छू नहीं सकती !

वर्धा में बापू की रामकथा का तीसरा दिन है, विनोबाजी को केंद्र में रखकर वह यह कथा कह रहे हैं. उनकी चेतना को प्रणाम करते हुए वह कथा का आरम्भ कर रहे हैं. दादा धर्माधिकारी का भी भाषण हुआ, बनारस में वर्षों पहले वह उनसे मिली थी, उसकी डायरी में एक वाक्य उन्होंने लिखा था, “बने बनाये राजपथ छोड़ो, नव राहों का सृजन करो” बहुत बाद में उसने इसी पर एक कविता भी लिखी.


उस दिन मोरान में जो भाव उसके मन में उठा था गुरू पूजा का, वह कल फलीभूत होने वाला है. सभी को निमंत्रण दे दिया है. कल शाम जून ने सूची बना ली थी, आज भोज का सामान भी ले आएंगे व पूजा का सामान भी. साढ़े दस बजने को हैं, बापू मानस का पाठ कर रहे हैं. मार्च आ गया है, पर दिसम्बर जैसा माहौल है.

Tuesday, February 21, 2017

शांति का साम्राज्य


फिर तीन दिनों का अन्तराल ! कल एक पुरानी डायरी पढ़ी, नन्हा तब छह महीने का था, तब से अब तक कितना वक्त गुजर गया है लेकिन भीतर भीतर कुछ ऐसा है जो जरा भी नहीं बदला. कल से माँ का इलाज पुनः शुरू हुआ है, डिब्रूगढ़ से एक आर्थोपेडिक्स आए थे, उन्होंने ही कई सुझाव दिए. सुबह से मन स्थिर नहीं है, साक्षी भाव से देख तो रही है पर भीतर विचार हैं. कल शाम को एक सखी की जन्मदिन की पार्टी में गरिष्ठ भोजन किया फिर घर आकर टीवी देखा, ऊलजलूल डायलॉग सुने, शिवानी को नहीं सुना, फिर छोटी बहन के लिए कविता लिखने का प्रयास किया.

कल शाम जून बहुत दिनों बाद उदास हुए और उसके भीतर भी हलचल मच गयी. अब एक बूंद भर भी असहजता नहीं सही जाती, भीतर शांति का एक साम्राज्य बनता जा रहा है जिसपर अशांति का एक कण भी ठहर नहीं सकता. आत्मवत् सबको देखने का यह परिणाम होता है, समानुभूति का यह परिणाम होता है, उनके कारण इस ब्रह्मांड में किसी को भी दुःख न पहुंचे, पहुँचेगा तो पहले उन्हें भी कष्ट देगा. अपने ही बचाव के लिए उन्हें सदा मधुर वचन बोलने चाहिए. मानव स्वयं ही अपनी आत्मा पर दाग लगाता है, शरीर को रुग्ण करता है.

आज केवल ‘वही’ है, ‘उसका’ कहीं पता नहीं है, व्यर्थ ही इतना बोझ सिर पर डाला हुआ था. अभी-अभी जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए कुछ लिखने का अनुरोध आया है. वह अपनी कुछ कविताएँ ही देगी, जो किसी भावपूर्ण क्षण में लिखी गयी थीं. यह देखो, ‘वह’ तो पुनः जिन्दा हो गया, पुराने संस्कार जाते-जाते ही जायेंगे. सफाई का कार्य चल रहा है. ड्राइंग व डाइनिंग रूम में आज पेंटिंग होगी, कल तक सभी काम पूरा हो जायेगा. जीवन की पहेली आज सुलझती हुई नजर आ रही है. जब तक वे हैं तब तक परमात्मा दूर खड़ा रहता है, वे सीट खाली करते हैं तो वह आ विराजता है. अति साधारण होता है वह, सामान्य जन से भी भी सामान्य, अति सामान्य !

नया सप्ताह आरम्भ हुआ और नया महीना भी, उसे खबर ही नहीं हुई. शनिवार से जो अस्वस्थता आभास दे रही थी, कल शाम तक खिंचती चली गयी, अभी भी आँखों में दर्द है, परमात्मा उसके साथ है सो छोटी-मोटी या बड़ी भी बीमारी का कोई भय नहीं है. भीतर समता बनी रहती है, विशेष कुछ हो या न हो, कर पाए या न कर पाए, एक समरसता सहज ही रहती है. जून कल देहली चले गये हैं, वहीं से बनारस भी जायेंगे. एक बहुत प्रिय बचपन के मित्र की बिटिया के विवाह में सम्मिलित होने. मंगल को लौटेंगे. माँ अस्पताल में ही हैं, पिताजी भी उनके साथ. पता नहीं और कितने दिन रहना होगा. वह रोज ही वहाँ जाती है कभी-कभी नैनी को साथ लेकर, जो उन्हें तेल आदि लगाती है और बाल बना देती है. कल विश्व विकलांग दिवस है, उसे जाना है. मौसम आज बदली भरा है.

अभी भीतर भय शेष है, आज सुबह एक विचार आया कि इतने दिनों अकेले रही कोई और होता तो सोचता, तभी लगा जैसे कोई है, पल भर को भय हुआ पर फिर समझ में आया स्वप्न है, उनके स्वप्न भी वे स्वयं ही गढ़ते हैं. इस समय उसका मन उदास है. आज वर्षों बाद यह बात उसने लिखी है, कारण है उसकी मूर्खता, मूर्खता के अलावा कोई कारण आज तक किसी की उदासी का न हुआ है और न होगा कभी, उसकी लापरवाही भी कह सकते हैं, अकर्मण्यता भी, फोन कभी नहीं उठाती समय पर और फोन खराब है इसकी खबर भी नहीं रखी. दो दिन से इंटरनेट डाउन है, ध्यान नहीं दिया. जून को बताया तक नहीं. आज वह वापस आ रहे हैं. इतने दिनों तक ढीले कपड़े पहनने के कारण उसे पता ही नहीं चला कि कब पेट का घेरा इतना बढ़ गया.

कल जो भावदशा थी वह भी गुजर गयी और जो आज है वह भी गुजर जाएगी. भीतर देखने वाला साक्षी ज्यों का त्यों रहेगा पर वह द्रष्टा कोई अलग नहीं है, शांत हुआ मन ही वही साक्षी है. वह कोई अलग हो भी कैसे सकता है. अहंकार ही उसे अलग मानता है, वासना है तो अहंकार बचा ही हुआ है, अहंकार बचा है तो उदास होना स्वाभाविक है. देह ऐसी हो, मन ऐसा हो, घर ऐसा हो, रिश्तेदार ऐसे हों, ये सभी कामनाएं ही उन्हें बांधती हैं. चाह ही बांधती है और चाह पूर्ति में कोई बाधक हो तो क्रोध आता है. उनकी इमेज खराब होती है तो क्रोध आता है. देह बेडौल होने लगती है तो क्रोध आता है. बुढ़ापा नजदीक आता है तो क्रोध आता है. सबके पीछे है अहंकार व कामना और कुछ भी नहीं ! प्रमाद व आलस्य इसकी जड़ में है, मोह, राग, द्वेष इसके मूल में हैं. मोह से प्रमाद होता है, आलस्य उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता. नींद मृत्यु की निशानी है, जागना ही मुक्ति है !    




    

Tuesday, August 9, 2016

कविता का ब्लॉग


बुध की शाम को नैनी अस्पताल गयी और रात डेढ़ बजे एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया, शुक्र को वापस आ गयी. उसकी देखभाल उसका पति व बुआ दोनों कर रहे हैं. बुआ घर का काम निपटा कर यहाँ भी आ गयी है. धीरे-धीरे काम करती है. पंछियों की आवाजें आजकल सुबह से ही सुनायी देने लगती हैं. एक कौवा पीछे आंगन में ही कांव-कांव कर रहा है. वह यदि ध्यान न दे तो पता ही न चले, सुनने लगे तो आवाजों का एक हुजूम है. आजकल वे सुबह थोड़ा देर से उठने लगे हैं. जून का दर्द पहले से काफी ठीक है. नींद पूरी हो रही है, कोई तनाव नहीं. समय की किसी पाबंदी का वह पालन नहीं करते आजकल. नन्हे की तरह मुक्त भाव से जीने लगे हैं, अभी बाह्य मुक्ति का अनुभव हो रहा है एक दिन यही भीतरी मुक्ति का भी दर्शन कराएगी. आज ध्यान में उसने अनंतानंत ब्रहांड का अनुभव किया. कितनी शांति थी वहाँ, एक सन्नाटा था, प्रकाश था और सदगुरुओं की झलक थी..वे व्यर्थ ही स्वयं को सीमाओं में कैद रखते हैं ! सभी के भीतर एक अनंत आकाश है जो चेतन है, आनन्दमय है और सनातन है..उसका पता लगते ही भीतर अपूर्व शांति का अनुभव होता है. गुरूजी ठीक कहते हैं ध्यान में जो ताकत है जो करते हैं वह जानते हैं...दांयी तरफ की पड़ोसिन सखी का फोन आया है, वह भी ‘मृणाल ज्योति’ की डोनर मेम्बर बनना चाहती है. उसकी माँ को कोई रोग है जिसमें रक्त की लाल कोशिकाएं कम हो जाती हैं. शरीर कमजोर होता जाता है. बुढ़ापे में कोई न कोई रोग शरीर को घेर ही लेता है.

जून अब काफी स्वस्थ हैं. आज सुबह वे टहलने गये. रास्ते में नन्हे के मित्र की माँ से भेंट हुई. उन्हें फोन किया सत्संग में आने के लिए, किसी दिन आएँगी. आज क्लब की एक वरिष्ठ सदस्या का फोन आया, उनके लिए उसने कविता लिखी थी, उसी के लिए धन्यवाद दे रही थीं. आज My Poetry Collection में कुछ और कविताएँ डालीं, नन्हे ने उसका look बदल दिया है, कभी हिंदी कविता में उसका लिंक भेजेगी. मौसम आज अच्छा है, न सर्दी न वर्षा न धूप न गर्मी..मधुर-मधुर सा. जून आज देर से आने वाले हैं, वह कुछ देर पढ़ सकती है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की. आज छोटे भाई को गुरूजी के जन्मदिवस के लिए लिखी कविता भेजी है. जीवन का रथ आगे बढ़ रहा है. एक सखी को फोन किया, नहीं उठाया तो संदेश भेजा, कल वे लोग आ रहे हैं.

जून को पुनः दर्द हुआ. आज वे नेहरु मैदान की हरी-हरी घास पर नंगे पैरों चले. एक सखी ने शादी का कार्ड भिजवाया है, उसकी ननद के बेटे की शादी है, नूना ने उसके लिए चंद दोहे लिखे हैं कल टाइप करेगी. नेट पर उसके ब्लॉग के छह फालोअर जाने कहाँ से आ गये हैं ! अच्छा है ! श्री श्री कहते हैं जब आपके पास ज्यादा समय है तभी आपको व्यर्थ के ख्याल दिमाग में आते हैं, व्यस्त रहो मस्त रहो !

कल शाम को उसने जून को ध्यान कराया, कितना आश्चर्य है न, कुछ समय ( कुछ महीने पहले) पूर्व वह ध्यान को इतना महत्वपूर्ण नहीं समझते थे, फिर वह उन्हें इस तरह करा सकती है, यह तो उसकी कल्पना में भी नहीं था. सद्गुरू की कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है. कल शाम को छोटे भाई ने उसकी कविता की तारीफ़ की. तारीफ तो उसकी है जिसने वह कविता लिखने की प्रेरणा दी, जो स्वयं उस कविता का विषय है. कुछ ही देर में तो लिखी गयी थी वह, आज ध्यान में सद्गुरु अनंत रूप में उस अणु पर बरस गये. अनंत ऊर्जा का अनुभव किया उसने अपने सिर की चोटी पर. अभी साधना के इस पथ पर चलते ही जाना है, विश्राम नहीं लेना है. जो रास्ते को ही मंजिल मानकर रुक जाते हैं, वे योगभ्रष्ट हो जाते हैं. परमात्मा की अकारण कृपा दिन-रात उस पर बरसती रहती है. वह कृपा का सागर है, उसकी स्मृति भी आ जाये तो मन भीग जाता है जैसे सागर के पास खड़ा यात्री अप्रयास ही भीग जाता है !


Wednesday, August 3, 2016

अनजानी सी गंध


आज क्लब की एक पुरानी पत्रिका के कुछ लेख पढ़े. बहुत आनंद मिला. मन में कुछ भाव जगे. पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली, न जाने कहाँ गुम थी. आज पुनः सत्संग है घर पर, देखें आज कौन-कौन आता है. जून देहली गये हैं, इतवार को लौटेंगे यानि तीन दिन बाद. उसने उन्हें याद करके लिखा-

क्यों शंकित है, क्यों पीड़ित है, हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है
साथी हैं हम जनम-जनम के, सुख के दुःख के हर इक पल के
किसे ढूँढ़ते नयन तुम्हारे, कैसे दर्द छिपाए दिल में
कदम-कदम संग चलना हमको, हर मोड़ पे मिलना हमको
चलो भुला दें बीती बातें, चलो मिटा दें दुःख, फरियादें
हाथ लिए हाथों में अपने, पूर्ण करेंगे सारे सपने
साथ निभाने का था वादा, तुमने न माँगा कुछ ज्यादा
जो चाहो वह सदा तुम्हारा, साँझा है यह जीवन प्यारा
तुमसे ही अपना जीवन है, तुमसे ही यह तन मन धन है
तुम ही हो सर्वस्व हमारे, तुमसे न कोई भी प्यारे
तुमने ही जीना सिखलाया, तुमसे कितना सम्बल पाया
हर उलझन को तुम सुलझाते, अपना कर्त्तव्य निभाते
तुमसे ही यह घर चलता है, तुमसे ही जीवन सजता है
परिवार को तुमने चाहा, सुंदर सा इक नीड़ बनाया
तुमने कितने उपहारों से, सोने चाँदी के हारों से
भर दी है मेरी अलमारी, जीवन सुंदर त्योहारों से..
साथी तुम संग जीवन प्यारा, तुम न हो सूना जग सारा
कैसे तुमको भूल गये हम, खुद से ही हो दूर गये हम
तुम आओगे तकती आँखें, भर दोगे सपनों से पांखें !


उसने कुछ देर नेट पर समय बिताया. गुरूजी को सुना. सुबह ध्यान में कुछ देर तो निर्विचार हो पायी थी पर अभी तक ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सब कुछ खो जाये, स्वयं का पता तो रहता ही है, लेकिन भीतर गहरी शांति है. कल शाम एक सखी के यहाँ गयी, वह कितना परेशान रहती है, उसका स्वभाव ही ऐसा हो गया है. रात को एसी चलाया था तो कैसी महक भर गयी थी कमरे में, अजीब सी गंध से ढाई बजे आँख खुल गयी थी, फिर काफी देर बाद नींद आयी. उसी समय जून भी गेस्ट हाउस में उठे थे. दीदी से बात करनी है पर फोन कहीं भी नहीं मिल रहा है, लिखा है ‘लिमिटेड सर्विस’ जाने क्या मतलब है इसका. 

Saturday, June 18, 2016

हरियाली और हवा की गुपचुप


अभी दो नहीं बजे हैं, आकाश बादलों से घिरा है, ठंड भी बढ़ गयी है. उसने लंच के बाद जून के जाने पर कम्प्यूटर ऑन किया. छोटी व बड़ी बहन के मेल थे. सद्गुरु का विस्डम संदेश भी था. दिनोंदिन जिसकी भाषा परिष्कृत होती जा रही है या वह ज्यादा गहराई से समझने लगी है, कितने कम शब्दों में कितना सटीक उत्तर वे देते हैं, अद्भुत है उनका ज्ञान, अद्भुत हैं वे ! परसों एक बुजुर्ग परिचिता का जन्मदिन है, उनके लिए कविता लिखी है. परसों ही सत्संग भी है, जून को उसका वहाँ जाना पसंद नहीं है और उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने का अर्थ है घर में अशांति का पदार्पण ! उसका मन (आश्चर्य है कि अभी तक वह बचा है) विद्रोह कर रहा है. आज सुबह सुना था इच्छा शक्ति उमा कुमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती, यही तो विडम्बना है. इच्छा से मुक्त होना हो तो उसे समर्पित कर देना चाहिए ! जहाँ कामना है वहाँ सुख नहीं, वहाँ आनंद नहीं, वह भी अपनी सत्संग में जाने की कामना ईश्वर को समर्पित करती है, आगे वही जानें !

दोपहर के दो बजे हैं. बगीचे में झूले पर वह बैठी है, धूप और छाँव दोनों ने जिस पर इस समय अपना अधिकार जमा रखा है. उसके पैर धूप में है शेष भाग छाया में है पर सिर की चोटी पर धूप की तपन का अनुभव हो रहा है, हल्की हवा भी बह रही है. सामने मैजंटा रंग के फूल खिले हैं बायीं ओर एक बड़े प्लास्टिक के गमले में साइकस जाति का एक पादप अपने पूरे गौरव के साथ उगा है. उसका सिर  थोडा भारी है और पेट भी, सम्भवतः वस्त्रों के कारण या सर्दियों की शुरुआत में पौष्टिक भोजन के कारण ! कल शाम को सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, वे संध्या भ्रमण के लिए निकले तो उसने सत्संग में जाने की बात कही, जून ने चुप्पी ओढ़ ली, उसने कहा, उन्हें उसकी जरा भी परवाह नहीं है. पर बाद में लगा यह ठीक नहीं था. उसके भीतर दो व्यक्तित्त्व हैं, एक पूर्ण तृप्त है, वह रहस्यमय है, वह होते हुए भी नहीं के बराबर है, एक दूसरा है जो जग में सबके साथ हिलमिल कर रहना चाहता है. वहाँ जाने अथवा न जाने से उसे कोई हानि या लाभ होगा ऐसा भी नहीं है. हानि-लाभ की अब कोई बात ही शेष नहीं रह गयी है. भजन गाते-गाते भाव में डूबना उसका सहज स्वभाव है, बस इतना ही. सो वह इस नीले आकाश के नीचे चमकते हुए प्रकाश में हरियाली और हवा की इस गुपचुप को सुनते हुए पंछियों के सुर में सुर मिलाकर अपने आप को जीवन की धारा में निर्विरोध बहने के लिए छोड़ देती है ! जो हो सो हो...एक तितली उसके वस्त्रों पर आकर बैठ गयी है, उस पर फूल बने हैं, वह शायद फूल की खोज में ही आई है और रस न मिलने पर भी कैसे आराम से बैठी है.

आज फिर वही कल का सा समय है, झूले पर धूप-छाँव का खेल चल रहा है, जैसे जीवन में प्यार और तकरार का खेल साथ-साथ चला करता है. जून के साथ उसका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. शाम को चार बजे मृणाल ज्योति जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए मीटिंग है. उसके बाद वे उन बुजुर्ग महिला से मिलने जायेंगे जिनका जन्मदिन है.


Thursday, February 25, 2016

शांति का पाठ


आज सुबह-सुबह ही उसके मुख से अपशब्द निकले, ऐसे शब्द जो नहीं निकलने चाहिए थे, व्यर्थ थे, जो जून को चुभे. उसके भीतर इतनी कठोरता, इतनी रुक्षता, इतनी हृदयहीनता छिपी हुई है इसका उसे भी भान नहीं था. नीरू माँ कहती हैं जो वे रिकार्ड करके लाये हैं वही तो निकलेगा, विडम्बना यह थी कि उसने क्रोध इसलिए किया कि उसे शांति का पाठ सीखने जाना था, सत्संग में जाने के लिए उसने क्रोध किया. उसका आज तक का सीखा हुआ ज्ञान जैसे उस पल तिरोहित हो गया था, इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि घर में सभी लोग थे, जिनमे काम करने वाले दो व्यक्ति भी थे. अगले ही क्षण उसे लगा कि कुछ गलत हो गया है, भीतर तो शांति हो गयी पर जून को जो पीड़ा उसने दी उसका क्या, वह चुपचाप सब सह गये, उनका कोई दोष नहीं था, उसका पूर्वाग्रह ही उसे भ्रमित कर रहा था, इसका प्रायश्चित यही होगा कि वह सत्संग में न जाये पर इससे आत्मा की उन्नति का एक अवसर वह गंवा देगी. उसे जाना तो है पर समय से लौट आना है. पिछले दिनों तथा आज भी, अन्य कई अवसरों पर भी उसने दूसरों के दोष देखे, यह आदत उसकी बहुत हानि क रही है. अहंकार भीतर कूट-कूट कर भरा है, वही क्रोध बनकर तो कभी परदोष देखने वाला बनकर सामने आता है. उसकी साधना में इससे बड़ी बाधा क्या हो सकती है ? कई दिनों से लिखने का अभ्यास भी नहीं किया, डायरी लिखने से अपने भीतर झाँकने का अवसर मिलता है. आज बहुत दिनों बाद दो सखियों से बात की, तीसरी को उस दिन फोन किया पर उसने उठाया नहीं, आज पुनः करेगी.

आज सुना, मन एक मिनट में पच्चीस से तीस संकल्प उठाता है, एक दिन में चालीस से पचास हजार विचार मन में उठते हैं. जैसे विचार मन उठाता है वैसी ही भावना भीतर जगती है. जैसी भावना होगी वैसा ही दृष्टिकोण उनका बनता है, फिर वही कर्म में बदलता है. बार-बार वह कर्म करने से वही आदत बन जाती है. विचार-भावना-दृष्टिकोण-कर्म-आदत-व्यक्तित्त्व, तो आज वे जो भी हैं वह अपने ही विचारों का ही प्रतिफल हैं, और वे जो भी काम करते हैं वही उनका भाग्य बनाते हैं.

नन्हा आज पंजाब में है, वह पहली बार किसी कम्पनी में काम करने गया है. शाम को वे उससे बात करेंगे. जून फिर से नाराज हैं, पता नहीं क्यों, आज सुबह पिताजी ने कहा कि स्त्रियों को जप-तप करने की जरूरत नहीं है, वह सेवा करके ही पुण्य लाभ कर सकती हैं. सास-ससुर की सेवा करने में ही स्त्री का मोक्ष है. समाज अभी भी उसी पुरानी सोच को लेकर बैठा हुआ है. कल शाम वह एक घंटे के लिए घर से बाहर गयी तो घर में किसी को पसंद नहीं आया, खैर इसमें उनका कोई दोष नहीं है, यहाँ किसी का कुछ भी दोष नहीं है, सब न्याय है. जो कुछ भी उसे मिल रहा है, वही उसका प्राप्य है बाहर. पर भीतर का क्षेत्र उसका अपना है जहाँ वह जो चाहे पा सकती है. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है. वह कल्पतरु है, जो मांगो उससे मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है, शक्ति है, भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है, जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, जहाँ जाकर लौटने की इच्छा नहीं होती, वह उसका अंतर्जगत ही तो उसका आश्रयस्थल है. वही उसका घर है, बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए वे घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ अथवा तो दूसरे देश या दूसरे शहर जाएँ !


Wednesday, December 23, 2015

सर्दी में वर्षा


इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं, वर्षा अभी भी हो रही है. जब से वे यात्रा से वापस आये हैं, उसके अगले दिन से धूप के दर्शन नहीं हुए हैं, नवम्बर के दूसरे सप्ताह में ठंड बढ़ गयी है. अगले हफ्ते दिल्ली जाना है और वहाँ से विदेश यात्रा पर. अभी वीसा नहीं आया है पर उम्मीद है चार-पांच दिनों में मिल जायेगा. उसे आज बाजार जाना है, बच्चों के लिए कुछ मीठा लाना है, दीपावली के बाद यह पहली योगकक्षा होगी. बनारस पहुंचने के दूसरे दिन ही उसका गला खराब हुआ, अभी भी पूर्णरूप से ठीक नहीं हुआ है ऊपर से यह ठंडा-गीला मौसम. यात्रा के दौरान व्यायाम आदि भी ठीक से नहीं हो पाता, खान-पान भी अनियमित हो जाता है. खैर, शरीर है तो कुछ न कुछ व्याधि तो कर्मफल के अनुसार होगी ही, इसे इतना महत्व देना ठीक नहीं. उन्हें इस बात का अभिमान होने लगा था कि योग के कारण वे अपने शरीर को स्वस्थ रखने में सक्षम हैं. कोई भी गर्व हो उसका टूटना ही ठीक है. जब तक वे असहाय नहीं हो जाते, अहम् पूरी तरह से नष्ट नहीं हो जाता, ईश्वर के द्वार खुलते नहीं ! मन की अवस्था तो शांत है, स्थिर है, समाहित है. मन किसी वस्तु की आकांक्षा नहीं करता. आवश्यकता की वस्तुएं पहले से ही उपलब्ध हैं, मन जानता है, यह जगत चार दिन का मेला है, बस इससे अधिक कुछ भी नहीं, यहाँ की हर शै बस धोखा ही है, वासतविकता नहीं है, पोलमपोल है, सो मन अपने में ही मगन है !  

नजर बेजुबां है, जुबा बेनजीर है ! संतों की वाणी ऐसी ही होती है, जिसे सुनकर भीतर सारे सवाल शान्त हो जाते हैं. आज भी सद्गुरू को सुना, शांत सागर की तरह, अनंत आकाश की तरह, पावन चन्दन की तरह उनकी वाणी अमृत के समान थी. वे कितने-कितने उपाय बताते हैं, जिस शांति तथा आनन्द का अनुभव वे कर रहे हैं, वह चाहते हैं कि सभी सदा के लिए सारे दुखों से मुक्त होकर, व्याधियों से मुक्त होकर ईश्वरीय आनन्द का अनुभव करें. वे सभी अपने भीतर स्थित उस अनंत खजाने को पा लें, उन्हें उसकी झलक तो कई बार मिली है पर अपनी नासमझी में वे उसे खो देते हैं, खो देते कहना भी ठीक नहीं है. क्योंकि जो है, जहाँ है, जैसा है, सदा है, सदा से है, वैसा ही है, उसे वे भुला देते हैं, यही कहना ठीक हगा. किन्तु वह कभी नहीं भुलाता, भीतर से सदा याद दिलाता रहता है. आजकल उसका ज्यादा समय आत्मचिंतन में लगता है, पिछले दिनों जब वे यात्रा पर थे, तो कितना समय परचिन्तन में लगा, उसकी भरपाई तो करनी ही होगी. अस्तित्त्व संतुलन बनाना जानता है. जब बहुत दिनों तक ध्यान नहीं कर पाया तो अब मन ध्यान में ही टिका रहना चाहता है. शांत  एकांत में अपने आप में ऐसे गुम कि खुद को भी खुद का अहसास न हो, इस तरह कि जैसे वह है ही नहीं, अहंकार शून्य स्थिति..सद्गुरू कहते हैं जिसने जीवित रहते मरने का गुर सीख लिया वह सदा के लिए अमर हो जाता है. वह चाहे किसी भी क्षण इस जगत से विदा ले, अब क्या अंतर पड़ता है. वह जैसे अब है, वैसे ही तब भी तो रहेगी. भीतर जो चेतना है, परम शांति है, उसे छूने के बाद बाहर का सब कुछ उसी के प्रकाश में दिखता है !


आज बादल छंट गये हैं, तेज धूप खिली है, भली लग रही है. आज सुबह नींद खुली पर मन तंद्रा में खो गया, दस मिनट के लिए ही सही पर पुनः सोना यही दिखाता है कि प्रमाद हुआ. उसे लगा जीवन कितना विचित्र है, मन अपनी ही बनाई वीथियों में घूमता रहता है. चाहे कितना भी उत्थान हो जाये पतन की गुंजाइश रहती है. सद्गुरु कहते हैं, शरण में आ जाओ इसके सिवा कोई चारा नहीं. मन का नियन्त्रण बहुत कठिन है, उसे तो शरण में ही जाना होगा. जो हो सब स्वीकार..क्योंकि उसे जब एक बार पता चल गया है कि मन तो चेतना को जगत व्यवहार के लिए मिला एक उपकरण है, इसका उपयोग करना है और अपने आप में रहना है.