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Friday, July 31, 2015

अनित्य- मृदुला गर्ग का उपन्यास


इस वर्ष उस यह नीले रंग की सुंदर डायरी मिली है. मन कई भावनाओं से भरा है. नये वर्ष के लिए कई संकल्प पिछले कई दिनों से उमड़ते-घुमड़ते रहे हैं. जीवन कितना अद्भुत है, कितना सुंदर तथा कितना भव्य ! कितना अनोखा है सृष्टि का यह चक्र ! मन कभी आश्चर्य से खिल जाता है कभी मुग्ध हो जाता है उस अनदेखे परमात्मा की याद आते ही उसके लिए श्रद्धा से भर जाता है. इसकी खुशबू को वे अपने भीतर समोते हैं, इसके रस को पीते हैं, इसकी नरमाई तथा गरमाई को महसूसते हैं. वे कितने भाग्यशाली हैं, भीतर एक संतोष का भाव जगता है. इस सुंदर प्रकृति को बिगाड़ने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. जीवन की कद्र करनी है, जीवन को खत्म करने का उन्हें क्या अधिकार है ? नये वर्ष के प्रारम्भ में मन क्यों आतंक का शिकार हुए लोगों की तरफ जा रहा है. मानव के भीतर देवत्व भी है और पशुत्व भी. उसने संकल्प लिया कि अपने भीतर के जीवन को सुन्दरतम करेगी !  
इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं, आशा पढ़ने आई है. उसने कुछ देर पूर्व सद्गुरु को पत्र लिखा, पिछले वर्ष फरवरी में उन्हें पत्र लिखने का जो क्रम आरम्भ किया था, उसमें आजकल व्यवधान पड़ने लगा है. समय कहाँ चला जाता है पता ही नहीं चलता. आजकल लगभग हर समय उसे अपने लिए कुछ करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती. देह को स्वस्थ रखने के लिए उसे समय पर भोजन, व्यायाम आदि देना तथा परमात्मा के प्रति कृतज्ञता जाहिर करने हेतु पूजा, शास्त्र अध्ययन, घर के आवश्यक कार्य के बाद जो भी समय बचता है वह भी पढ़ने-लिखने में ही जाता है. जिससे मन भी स्वस्थ रहे तथा बुद्धि को जंग न लगे.
आज वह बहुत खुश है. लगता है वह फरवरी में बंगलुरु जा सकती है. जून उसकी टिकट के लिए प्रयास कर रहे हैं. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह ट्रेन से जा रही हैं, वह चाहे तो उनके साथ जा सकती है. उसे लगा यह गुरू कृपा है, उसने प्रार्थना की कि जून मान जाएँ, उन्होंने फ़िलहाल तो मंजूरी दे दी है. भविष्य में क्या लिखा है कौन जानता है ? वह नन्हे से भी मिल सकती है एक दिन के लिए. आज क्लब में मीटिंग है, वह कुछ किताबें लेकर जाएगी. लॉन में प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर मन कैसा हल्का हो गया है. एकात्मकता का अनुभव यहीं होता है. ऊर्जा जैसे मुक्तता का अनुभव करती है.
आज बापू की पुण्य तिथि है. पिछले चार दिनों से मन पुस्तक के पन्नों में खोया था, मृदुला गर्ग का लिखा उपन्यास ‘अनित्य’ कल खत्म किया. इस उपन्यास में गांधीजी का जिक्र कई जगह हुआ है. उनको आदर्श मानने वाले कितने ही व्यक्ति स्वयं को छला हुआ मानने लगे जब उन्होंने ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ वापस ले लिया. कई उनके प्रयोगों के आलोचक भी थे. पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि साधारण मानव एक महामानव का मूल्यांकन कैसे कर सकता है, और ही मिट्टी के बने होते हैं वे लोग जो महान कहलाते हैं, साधारण लोगों से भिन्न होती है उनकी सोच और दृष्टि.

वसंत का आगमन हो चुका है. हवा में ठंडक कम है. अभी सुबह के दस भी नहीं बजे हैं धूप तेज हो गयी है. कल रात स्वप्न में वह सभी को बता रही थी कि मैं ‘आत्मा’ हूँ, यह बात कहने से प्रकट नहीं होगी, उसके आचरण से प्रकट होनी चाहिए. ध्यान की अवधि बढ़ानी चाहिए ऐसे प्रेरणा भीतर से उठी है.   

Thursday, August 29, 2013

बिजली चली गयी


आज उसने सुना, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से सुख-दुःख को भोगना ही सम्यक प्रज्ञा है. आरम्भ में बाधाएँ तो आएँगी ही, लेकिन होश सहित श्रद्धा के बल पर और ज्ञान के बल पर इस पथ पर बढ़ा जा सकत है. अनंत मैत्री, अनंत करुणा, अनंत मुदिता, अनंत उपेक्षा, ये चार गुण साथ में लेकर यदि श्रद्धा करें तो ही सच्ची श्रद्धा है, यानि विवेक युक्त श्रद्धा.

आज धूप बहुत तेज है, और अभी-अभी बादल के एक टुकड़े ने सूरज को ढक लिया है, शीतलता यहाँ तक महसूस हो रही है. इस हफ्ते सात पत्र मिले हैं, जवाब देने के लिए कम से कम एक घंटा तो लगेगा.

नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण वह इतनी सुंदर सुबह का आनन्द उठा पा रही है. आज सुबह साढ़े चार बजे ही उठ गया और आधे घंटे में तैयार होकर नन्हा चला गया है. बादल जो कल शाम से बनने शुरू हुए थे, अभी भी है, रात भर बरस चुके हैं सो मौसम में ठंडक है. आज उसकी एक मित्र का जन्मदिन है, कल रात नींद आने तक कुछ पंक्तियाँ उसके लिए मन में गढ़ रही थी-

आँखें हंसती रहें लब मचलते रहें
गीत अधरों से यूँ ही झरते रहें

दुःख की छाया न ही गम अँधेरा कभी
कदम दर कदम फूल खिलते रहें

सुख में शामिल सदा दुःख में भी साथ हों
सिलसिले दोस्ती के यूँ चलते रहें

खुशनुमा ही रहे हर दिवस इस तरह
बरस दर बरस वह चहकते रहें

जिन्दगी का हर इक रुख हो रोशन सदा
दिल में चाहत के दीपक जलते रहें

हमसफर साया बन के सदा साथ हो
चाहे मौसम फिजां के बदलते रहें

आज सुना, “अनित्य के प्रति जो आकर्षण है उसे तोड़ने के लिए उसका दर्शन करते करते ही नित्य तक पहुंचा जा सकता है. देखना जानने की क्षमता पैदा करता है. नित्य अवस्था में न तो उत्पाद होता है न क्षय होता है. स्थूल से सूक्ष्म तक आने के बाद उसका भी अतिक्रमण हो जाये”.

कल आखिर विश्वास मत पारित हो गया और देवेगौडा सरकार ने संसद में पूर्णमत हासिल कर लिया यानि अब हमारी एक अदद सरकार है. आज फिर मौसम बेदर्द होकर तपन बरसा रहा है, वे लोग जो बंद कमरों में पंखों और कूलरों के सामने रहते हैं उन्हें शिकायत करने का क्या हक है, जब हजारों लाखों लोग खुले आसमान के नीचे अपनी रोज़ी कमाने को विवश हैं.

आज उसने सुना, ‘अनुभूतियों से सच्चाई जानना ही धर्म ध्यान है. अपने भीतर उठने वाले विकारों पर तुरंत रोक लगाना और उन्हें जड़ से उखाड़ कर फेंकने को ही उपशमन कहते हैं. दमन नहीं चाहिए. जो क्षण अविद्या में बीतता है, विकारों का संवर्धन होता ही जाता है. मानस में एक विकार जागा तो उसके फल के साथ उस विकार का बीज भी आता है, और अज्ञान के कारण हम उसे सींचते रहते हैं. हमारे विकारों के दो सेनापति हैं, राग और द्वेष जिन्हें खत्म करना है ताकि हम अपने शिव को मंगल को न कुचल डालें. ध्यान जब जागता है तो हमारे पुराने कर्मों का बल समाप्त होता जायेगा और मन करुणा से भर जाता है. पुराने समाप्त हो गये नये बनते नहीं यही तो मुक्त अवस्था है. लेकिन बुद्धि के बल पर इसे समझने से कोई लाभ नहीं, होश में रहकर ही आग का मुकाबला पानी से करते हैं. अंदर तक स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास करना होगा, अपने भीतर होने वाली संवेदनाओं के प्रति सजग रहने का अभ्यास नहीं किया तो स्वभाव वैसे का वैसा रहेगा. प्रज्ञ प्रत्यक्ष ज्ञान है”.

पिछले कई दिनों से मौसम बहुत गर्म है, पसीने से तर हैं वे लोग. कल रात बिजली चली गयी थी और इस समय भी वही हाल है, इस खिड़की के पास बैठकर कभी-कभी हवा का एक झोंका आकर गर्दन को छू जाता है. अभी जून को फोन किया तो वह कहने लगे आज दिन में करेंट जायेगा यह तो पता था पर कब आयेगा यह पता नहीं. देखें तब तक उनका क्या हाल होता है, ये नन्हे के शब्द हैं. कल रात वे एक मित्र के यहाँ सोये वहाँ बिजली थी, उनके घर की चाबी उनके पास थी. आज दोपहर को वे “एक बन्दर होटल के अंदर” देखने वाले थे और पीटीवी पर दायरे भी देखना  था पर अब बिजली के बिना सारे कार्यक्रम धरे रह गये हैं. पर उन्हें बिजली पर इतना निर्भर नहीं होना चाहिए, उन लोगों की तरफ देखना चाहिए जिन्हें ये सब सुविधाएँ नहीं मिलती हैं, या फिर बड़े शहरों में जहाँ बिजली अक्सर जाती ही रहती है.