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Friday, June 16, 2017

सुबह की बेला


पिछले दो दिन व्यस्तता में बीते. कल विकलांग दिवस का कार्यक्रम ठीक से हो गया. शाम चार बजे से ही क्लब में थी, घर आते–आते नौ बज गये. देर से भोजन किया फिर सो गयी पर नींद देर तक नहीं आई. अभी लेडीज क्लब के कार्यक्रम में समय है. उसे जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए आलेख भेजना है. क्रिसमस और नये वर्ष के लिए भी कविता लिखनी है इस वर्ष की, नई और मौलिक सी कोई बात. बड़ी भतीजी व छोटी भांजी का जन्मदिन है, छोटे भाई-भाभी व एक सखी के विवाह की वर्षगांठ है. सभी को इ-कार्ड भेजने हैं. कुछ कार्ड नये वर्ष के लिए भी भेजने हैं. आज बहुत दिनों बाद साहित्य अमृत का दिसम्बर अंक मिला है. बुजुर्ग आंटी अस्पताल में हैं, उनका बांया पैर अकड़ गया है, घुटने से उठाना कठिन है, शरीर अब जवाब दे रहा है, शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे.

आज क्लब द्वारा रात को बच्चों को दिए गये भोजन के बिल के भुगतान का दिन था, उसने कहकर थोडा कम करवाया. सुबह एक महिला को फोन करके रंगोली के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने अपने ग्रुप के साथ मिलकर स्टेज से नीचे सुंदर रंगोली बनाई थी. सुबह जैसे किसी ने स्वयं जगाया, वे टहलने गये, पूरे वक्त वह मधुर स्मृति बनी रही. सुबह की बेला कितनी पावन होती है. सुंदर विचार झरते हैं. अब कुछ याद नहीं है. कल शाम वे एक मित्र परिवार से मिलने गये, वे इसकी-उसकी बात करने में बहुत उत्सुक लग रहे थे. लोग अपने भीतर देखना ही नहीं चाहते. एक-दूसरे पर अविश्वास और अपनेपन का अभाव ही नजर आता है, खैर उसे तो मस्त रहना है और कोई जानना चाहे चाहे तो उसे मार्ग बताना है.


आज मौसम बहुत अच्छा है, हवा में हल्की सी ठंडक है और धूप भी बहुत तेज नहीं है. एक बगुला अभी उड़ता हुआ गया और हवा का एक झोंका सहलाता हुआ..कल वह उन बुजुर्ग आंटी को देखने गयी तो वह सो रही थीं, दोपहर को भी और शाम को भी. आज सुबह जब वे टहलने गये तो एक दृष्टांत नूना के मन में उभर आया. मानो कोई घर हो उसमें बिजली के कई उपकरण लगे हों. एक बार घर के लोग कहीं जाएँ और सारे उपकरण बंद हो जाएँ तो जो बिजली पहले खर्च होती थी, बच जाएगी. कुछ करने को न पाकर हो सकता है वह वापस स्रोत्त में चली जाये और यदि वह चेतन हो तो अपने को जान ले. ऐसे ही उनका मन देह में रहता हुआ कितना कुछ करता है. रात्रि को जब वे नींद में चले जाते हैं तब मन भी अपने स्रोत में चला जाता है पर उस समय वह सचेत नहीं है सो स्वयं को जान नहीं पाता; यदि जागते हुए मन शांत हो जाये, अपनी हर जिम्मेदारी से मुक्त हो जाये तो उसे अपना पता चल जायेगा. वैसे भी मन करता क्या है, किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से कुछ चाह रहा होता है. उसकी मांग कभी खत्म नहीं होती. एक बार वह पूर्ण विश्राम की स्थिति में आ जाये तो खुद को जानना सम्भव है. उनकी ऊर्जा हजार छिद्रों से बाहर बह रही है. उसे भीतर ही सुरक्षित रखना होगा, तभी वह स्वयं को जान पायेगी. 

Wednesday, June 14, 2017

जूट का झूला


कल रात्रि विश्वकर्मा पूजा के लिए एक कविता लिखी थी. जून नहीं हैं वरना आज वे उनके विभाग में होने वाली पूजा में सम्मिलित होते. रात को शुरू हुई वर्षा सुबह तक हो रही थी. परसों बड़ी भांजी से स्काइप पर बात हुई, आज छोटी बहन से हुई. उस दिन जब भांजी से उसके यहाँ जाने की बात की, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे उसे कुछ समझ ही न आ रहा हो, उस दिन कुछ अजीब तो लगा था पर सोचा था शायद वह उसकी बात समझ न पायी हो अथवा तो उसे सुनाई ही न दी हो, पर आज छोटी बहन ने कहा, किसी कारण वश वे बच्चे को किसी से मिला नहीं रहे हैं. घर जाकर बच्चे को देखने की उत्सुकता दिखाना ठीक नहीं होगा, फोन पर ही बधाई देना ठीक रहेगा. कल शाम यात्रा की कुछ तैयारी भी कर ली है.

पूरा अक्तूबर और आधा नवम्बर भी बीत गया, आज जाकर कलम उठायी है. इसी बीच दो यात्रायें  भी कीं, पर लिखा कुछ नहीं. कल लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे कार्य सम्मुख आ गये और अब जून का इंतजार करते हुए, मलेशिया से लाये जूट के झूले पर बैठकर, जिसे उन्होंने बगीचे में लगा दिया है; पंछियों की आवाज सुनते हुए और शीतल पवन का स्पर्श अनुभूत करते हुए, जब धूप भी छनकर आ रही है और सामने हरियाली की एक चादर बिछी है, वह लिख रही है. इससे बढ़कर स्वर्ग में कौन सा सुख होता होगा जब मन में ‘उसकी’ याद बसी हो और कण-कण में वह स्वयं प्रकट होने को उत्सुक हो. जब प्रकृति का नृत्य अनवरत चलता हो. धूप-छांव का यह जो खेल सृष्टि नटी न जाने कब से खेल  रही है, उसका द्रष्टा होना कितना अनोखा अनुभव है ! नीला आकाश बिलकुल स्वच्छ है, बादल का हल्का सा टुकड़ा भी नहीं है वहाँ, बगीचा भी स्वच्छ है, अभी फूल खिलने में देर है. गमलों पर गेरुआ लगाना है, जून को याद दिलाना होगा, मंगवा लें. दोपहर को उसे दो अन्य सदस्याओं के साथ प्रेस जाना है, क्लब की पत्रिका के कम के लिए. पीछे कुछ मजदूर काम कर रहे हैं, पर वे इतना चुपचाप  हैं, पहले उसे अहसास ही नहीं हुआ उनके होने का. नन्हे का फोन आया, सुबह वह जल्दी-जल्दी उठकर केवल एक सेव खाकर ही दफ्तर जा रहा था, उसका दिन व्यस्त रहने वाला है आज, ऐसा कहकर वह दो दिन से फोन न कर पाने की बात कह रहा था.   

  फिर एक हफ्ता गुजर गया और कुछ नहीं लिखा. कुछ लिखने का मन नहीं होता, मन एक कोरा कागज बन गया है. भीतर भाव उठते हैं, कभी तो इतने अछूते होते हैं, इतने सूक्ष्म कि उन्हें शब्दों में बाँधना ऐसा है जैसे इन्द्रधनुष को रस्सी से नीचे उतारना, कितना स्थूल है शब्दों का संसार और कितना सूक्ष्म है परम का अनुभव..इसलिए आज तक इतना कुछ कहे जाने के बाद भी परमात्मा उतना ही अनछुआ है जैसा वैदिक काल में था.


Wednesday, August 3, 2016

अनजानी सी गंध


आज क्लब की एक पुरानी पत्रिका के कुछ लेख पढ़े. बहुत आनंद मिला. मन में कुछ भाव जगे. पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली, न जाने कहाँ गुम थी. आज पुनः सत्संग है घर पर, देखें आज कौन-कौन आता है. जून देहली गये हैं, इतवार को लौटेंगे यानि तीन दिन बाद. उसने उन्हें याद करके लिखा-

क्यों शंकित है, क्यों पीड़ित है, हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है
साथी हैं हम जनम-जनम के, सुख के दुःख के हर इक पल के
किसे ढूँढ़ते नयन तुम्हारे, कैसे दर्द छिपाए दिल में
कदम-कदम संग चलना हमको, हर मोड़ पे मिलना हमको
चलो भुला दें बीती बातें, चलो मिटा दें दुःख, फरियादें
हाथ लिए हाथों में अपने, पूर्ण करेंगे सारे सपने
साथ निभाने का था वादा, तुमने न माँगा कुछ ज्यादा
जो चाहो वह सदा तुम्हारा, साँझा है यह जीवन प्यारा
तुमसे ही अपना जीवन है, तुमसे ही यह तन मन धन है
तुम ही हो सर्वस्व हमारे, तुमसे न कोई भी प्यारे
तुमने ही जीना सिखलाया, तुमसे कितना सम्बल पाया
हर उलझन को तुम सुलझाते, अपना कर्त्तव्य निभाते
तुमसे ही यह घर चलता है, तुमसे ही जीवन सजता है
परिवार को तुमने चाहा, सुंदर सा इक नीड़ बनाया
तुमने कितने उपहारों से, सोने चाँदी के हारों से
भर दी है मेरी अलमारी, जीवन सुंदर त्योहारों से..
साथी तुम संग जीवन प्यारा, तुम न हो सूना जग सारा
कैसे तुमको भूल गये हम, खुद से ही हो दूर गये हम
तुम आओगे तकती आँखें, भर दोगे सपनों से पांखें !


उसने कुछ देर नेट पर समय बिताया. गुरूजी को सुना. सुबह ध्यान में कुछ देर तो निर्विचार हो पायी थी पर अभी तक ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सब कुछ खो जाये, स्वयं का पता तो रहता ही है, लेकिन भीतर गहरी शांति है. कल शाम एक सखी के यहाँ गयी, वह कितना परेशान रहती है, उसका स्वभाव ही ऐसा हो गया है. रात को एसी चलाया था तो कैसी महक भर गयी थी कमरे में, अजीब सी गंध से ढाई बजे आँख खुल गयी थी, फिर काफी देर बाद नींद आयी. उसी समय जून भी गेस्ट हाउस में उठे थे. दीदी से बात करनी है पर फोन कहीं भी नहीं मिल रहा है, लिखा है ‘लिमिटेड सर्विस’ जाने क्या मतलब है इसका. 

Thursday, June 26, 2014

स्कूल की पत्रिका



आज स्कूल में बहुत काम था, एक दो शिक्षिकाओं की अनुपस्थिति के कारण उसे पूरे आठों पीरियड लेने पड़े, इस समय थकान महसूस कर रही है. एक अध्यापिका ने उससे विज्ञान के प्रश्नोत्तर के बारे में पूछा तो वह टाल गयी, बाद में लगा बता देना चाहिए था, कल स्कूल जाकर सबसे पहला काम यही करेगी. आज भी कक्षा में बच्चे बहुत शोर कर रहे थे, एक सीनियर  अध्यापिका की कक्षा के सामने से गुजरी तो देखा बच्चे शांत बैठे थे, उसका भी यह स्वप्न है शायद कल ही ऐसा हो.

आज स्कूल गयी तो मन में शुभेच्छा थी और ढेर सारा कम्पैशन, एक अध्यापिका अनुपस्थित थी उसकी कक्षा में जाकर स्वयं ही उसने कविता प्रतियोगिता के बारे में बच्चों को बताया. स्टाफ रूम में सभी अभी से आने वाले वर्ष की बातें कर रहे थे. नई शताब्दी दस्तक दे रही है. उसके कदमों की आहट दिलों की धड़कन बढ़ा रही है. कैसी होगी नई शताब्दी की प्रथम सुबह, क्या उस दिन गगन ज्यादा नीला होगा, हवा कुछ अधिक शीतल, पक्षी का स्वर मधुरतर, लोगों के दिल मिले हुए. पर इतना तो तय है पवन में आशाओं की खुशबू मिली होगी, करोड़ों लोगों के दिलों की आशाओं की खुशबू ! 

आज दो किताबें वह असावधानी वश स्कूल में ही छोड़ आई है, ध्यान उधर जाता है. संस्कृत में एक अध्यापिका ने कुछ पूछा तो व्यस्ततता के कारण ठीक से बता नहीं पायी, खैर यह जरूरी तो नहीं कि सदा वह सही ही रहे. स्कूल में रोज नई-नई बातें पता चलती हैं, पहले पता चला प्रोबेशन पीरियड लम्बा चलेगा, दूसरी बात यह कि छुट्टियों की पे नहीं मिलेगी. इन सब बातों का असर उस पर तो पड़ता नहीं क्यों कि पैसे के लिए न उसने काम किया है न कभी करेगी. उसे ध्यान आया, आज जून ने जब कहा वे यात्रा में खरीदारी नहीं करंगे तो आग्रह क्यों कर बैठी, नहीं जी, वे कुछ न कुछ तो लेंगे ही. यह आग्रह करने की मनः स्थिति जब तक रहेगी तब तक चैन नहीं है. जो कुछ उसके पास अब है वही सारी उम्र के लिए काफी है फिर और की आशा क्यों ? आशा करनी ही हो तो मन को विशाल बनाने की करनी चाहिए. जिससे सारे बच्चों को इतने स्नेह दे सके कि उन्हें उस पर भरोसा हो. बुद्धि में सामर्थ्य हो और अपने आप से शर्मिंदा न होना पड़े. आदमी क्या है यह उसके कपड़ों से नहीं उसकी आत्मा से पता चलता है, आत्मा बेदाग हो कबीर की चदरिया की तरह, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील !

कल क्लब से फोन आया, वार्षिक पत्रिका के लिए उसे लिखना भी है और हिंदी के अन्य लेखों की एडिटिंग भी करनी है. स्कूल की पत्रिका के लिए भी एक अधपिका के साथ उसे प्रेस जाना है. यदि सबकुछ ठीक रहा तो अगले बीस-पचीस दिन उसे साहित्यिक गतिविधियों में सलंग्न रखेंगे. आज उन्हें नौ बजे स्कूल जाना है, पहले गुरुद्वारा समिति की ओर से चित्रकला प्रतियोगिता है फिर पेरेंट-टीचर मीटिंग.




Monday, February 17, 2014

पंजाबी ढाबा


अभी नई डायरी नहीं मिली है, पिछले साल की डायरी के एक खाली पन्ने में लिख रही है. सुबह से कुछ समय एक-दो फोन करने में और कुछ इधर-उधर का काम करते-करते ही ग्यारह बज गये. नैनी और उसके बेटे की सहायता से सामने के बरामदे के गमलों की साफ-सफाई भी करवाई. नन्हे की स्कूल बस नहीं आई, वह स्कूल नहीं जा पाया. बहुत देर से पढ़ाई कर रहा है, ऐसा वह इम्तहान के दिनों में ही करता है. आज क्लब में देर से जाना है, पिछले चार-पाच दिनों से रोज ही वे क्लब जा रहे हैं, आज ‘पंजाबी ढाबा’ है. कल सुबह भी उसे क्लब जाना है डेकोरेशन के सिलसिले में मदद करने, परसों अंतिम दिन है. उस दिन बहुत लोग आएंगे, साल भर लोगों को इस दिन का इंतजार रहता है. पर्दे सिलने का काम कल दोपहर शुरू कर दिया था, जो कल पूरा हो जायेगा.  

जून आज नीले रंग की नई डायरी ले आये हैं, हर पन्ने पर एक सुंदर वाक्य भी लिखा है. आज भी उसका काफी समय क्लब में गुजरा, एक सीनियर मेम्बर के साथ फूलों की सज्जा करने में और कुछ उनकी मिनट-मिनट पर बदलने वाले ideas सुनने में, वह परफेक्शन चाहती हैं और बाकी के लोग उनके साथ चल नहीं पाते, लेकिन कुल मिलाकर परिणाम अच्छा रहा सभी ने तारीफ की, वापसी में उन्होंने उसे घर भी छोड़ा. दोपहर को जब आई तो जून का चेहरा उतरा हुआ था, नन्हे को भी स्कूल से आकर उसका घर में न रहना अखरा और उसने कह दिया, आजकल आपका ज्यादा वक्त क्लब में ही गुजरता है. कल शाम अचानक पंजाबी दीदी के पतिदेव आ गये, उनका वही पुराना तरीका है बातें करने का, पर वह अपने साथ कोलकाता की छेने व खोये की मिठाई लाये हैं. उन्हें परसों रात्रि भोजन पर बुलाया है, उसे अपनी पाक कला को संवारने का मौका मिलने वाला है.

आज धूप उजली थी और हवा हल्की सी. वे दोपहर को ड़ेढ़ बजे क्लब गये और चार बजे लौटे, शाम को पुनः गये, पत्रिका मिली, सुंदर चित्रों से सजी वार्षिक पत्रिका. नन्हा गृहकार्य कर रहा है जून सोने की तैयारी कर रहे हैं, वह उस skit के बारे में सोच रही है जो वह हसबैंड नाईट के कार्यक्रम के लिए लिख रही है. पात्रों का चरित्र अभी तक निर्धारित नहीं हो पाया है. विभिन्न भाषा-भाषी महिलाये हैं, तो उनकी कुछ चारित्रिक विशेषताएं भी होनी चाहिए. नन्हे को सुनकर हँसी आई इसका अर्थ है कि हास्य मौजूद है नाटिका में.

आज सुबह स्वप्न में माँ-पापा व छोटे भाई को देखा, माँ आधुनिका लग रही थीं और दो छोटे-छोटे बच्चों को खिला रही थीं शायद नन्हे और उसकी ममेरी बहन को. एक छोटी सी बिल्ली को भी देखा. सुबह जल्दी उठना था सो सपना टूट गया. हिंदी व्याकरण इतना विस्तार से तो उसने पहले कभी नहीं पढ़ा, पढ़ाते-पढ़ाते स्वयं भी काफी सीख रही है. कुछ देर पूर्व वह पड़ोस में किसी काम से गयी थी, लौटते समय पूसी उछलती-कूदती सी उसके पीछे लग गयी. घर आकर भी उसके पैरों से लिपट कर कुछ मांग रही है. इस नन्हे और मूक प्राणी को वह कैसे समझाये कि मानवों की कठोर दुनिया में उसके प्यार का कोई मोल नहीं है.

जून ने बताया, राजधानी अब डिब्रूगढ़ तक आती है, उन्हें सम्भवतः माँ-पापा को लेने गोहाटी न जाना पड़े, छोटे भाई को टिकट बढ़ाने के लिए कह दिया है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगे. आज उनके विवाह की सालगिरह है. बहुत सारे फोन आ चुके हैं, माँ ने कहा, यात्रा में कष्ट तो होगा फिर भी वे आएंगे, सचमुच इतने सारे एक्सीडेंट की खबरें सुनकर तो यात्रा एक यातना ही लगती है, फिर उसी ईश्वर की ओर दृष्टि उठती है, वही रक्षा करेगा. सुबह ड्राइंग रूम की सफाई की, दोपहर को डाइनिंग रूम की, शाम को मित्रों के साथ विशेष चाय पी, जून ने सुबह सवेरे एक कार्ड दिया बेहद खूबसूरत और डेयरी मिल्क चाकलेट भी ढेर सारे प्यार के साथ. सुबह सभी कमेटी मेम्बर्स को फोन किये कल शाम को उनके यहाँ मीटिंग है.

 


Wednesday, February 5, 2014

पूसी की आवाजाही


कल शाम वह क्लब की वार्षिक पत्रिका के लिए बुलाई गयी मीटिंग में गयी थी. उसे हिंदी सेक्शन का काम देखना है. जून उसे समय पर छोड़ आए और बाद में लेने भी आये, उसके मन में एक ख्याल आया यदि वह स्वयं कार चलाना जानती तो उन्हें परेशान न होना पड़ता. आज पुराने वर्षों की पत्रिकाएँ खोल-खोल कर देखीं, ताकि उन लोगों के नाम देख सके जो हिंदी में लिखते हैं, उन्हें इस वर्ष भी लिखने के लिए प्रेरित करने हेतु फोन किये, कुछ ने सकारात्मक जवाब दिए. सुबह उठते ही जून ने ट्रांजिस्टर चला दिया समाचार सुनने के लिए. कल रात्रि एक स्कूल बस की दुर्घटना की हृदय विदारक खबर सुनी. बाद में बस पानी में गिर गयी. उनके दिल लेकिन पत्थर के हो चुके हैं, इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी जिन्दगी वैसे ही चलती रहेगी, उन माँ-बाप के आँसू सूख जायेंगे और...यहाँ अपेक्षाकृत वे सुरक्षित हैं, ज्यादा ट्रैफिक नहीं है. अभी जून का फोन आया, उन्हें अख़बार लेने बाजार जाना ही होता है, पूछ रहे थे कुछ लाना है, इतना ख्याल घर का कम लोग ही रखते होंगे. आज वह लंच में केवल फल और सलाद ही ले रही है, हफ्ते में एक दिन ऐसा करना अच्छा है. पर मन है कि...वैसे भूख पर कंट्रोल किया जा सकता है पर जब मनाही हो तो ध्यान खानों की तरफ ही जाता है.

आज सुबह ‘जागरण’ देखा, और अभी-अभी योगानन्द जी का एक भाषण पढ़ा, ईश्वर स्वयं ही संयोग उत्पन्न कर देते हैं. रात भर लगातार हुई वर्षा के कारण मौसम आज ठंडा है, कंपा देने वाली ठंड. बादल अब भी बने हैं और वैसे ही बादल उसके अंतर में भी घुमड़ रहे हैं. कल से नन्हे के इम्तहान हैं. पहला पेपर गणित का है, वह तैयारी कर रहा था फिर पढ़ाई खत्म करके टीवी देखने लगा, .बच्चे भी बस बच्चे होते हैं, पल भर में परीक्षा को भूलकर टीवी में व्यस्त हो गया. कल भी TN Seshan का इंटरव्यू बड़े मजे ले कर देख रहा था, बड़े ही होते हैं जो परीक्षा से पहले ही घबराए-घबराए से रहते हैं. अब टीवी पर चाट बनाने की विधि  बताई जा रही है, अभी-अभी नन्हा कहकर गया है. कल संगीत कक्षा में वह ठीक से गा नहीं पायी, गाने में सुर की देन तो ईश्वर ही दे सकता है, आज ईश्वर से प्रार्थना की है और स्वामी योगानन्द जी के अनुसार यदि प्रार्थना सच्ची हो तो उत्तर अवश्य मिलेगा. अभ्यास तो उसे करना ही होगा पहले की तरह ही प्रतिदिन.

आज ठंड कल से भी जयादा है. बंद कमरे में स्वेटर पहनकर भी ठंड का अहसास हो रहा है, आज ही हीटर निकलना पड़ेगा किन्तु उनका क्या जिनके पास न तो कमरा है, न स्वेटर, और हीटर की तो बात ही जिन्हें पता नहीं, उन्हें भी हीटर के बिना रहने का अभ्यास होना चाहिए जब तक कि जनवरी की कड़कती ठंड न आ जाये. नन्हे की आज हिंदी की परीक्षा है, उसे पढ़ाते हुए पिछले कुछ दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला, उसका रिजल्ट जरुर अच्छा आयेगा, वह मेहनत करता है पर नूना को लगता है वह इससे भी अच्छा कर सकता है. कल शाम वे एक डिनर पार्टी में गये, एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ की पार्टी में. उनकी शादी की फोटो देखकर लगा कि सारी पंजाबी शादियाँ एक सी होती हैं.

आज सुबह अलार्म की आवाज सुनकर नींद वक्त पर खुल गयी, दरवाजा खोलते ही जानी पहचानी सी वही बिल्ली दिखाई दी, पर कल रात उसने भोजन नहीं बनाया था सो उसे रोटी नहीं दे सकी, बिस्किट दिए, उसका पेट पिचका-पिचका सा लग रहा था, शायद वह अपने लिए खाना नहीं जुटा पाती है. वे सुबह शाम ही तो दे सकते हैं, एक छोटे से जीव को पालना भी कितना प्रयास लेता है, उस दिन बरामदे में जो गंदगी उसने की, उसके बाद वे उसे बाहर ही खाना देते हैं. जो लोग पशुओं से दिल से प्यार करते हैं वे उनके द्वारा की गयी गंदगी को ख़ुशी-ख़ुशी साफ कर देते होंगे, पर ऐसा करना जून व उसके बस की बात तो बिलकुल नहीं है, नन्हा लेकिन उसका ध्यान रखता है, बच्चे स्वभाव से ही कोमल होते हैं. उसे खाना खिलाने का काम उसे ही सौंपना चाहिए. उनकी निष्ठुरता कहीं उसके हृदय को भी कठोर न बना दे.  




Saturday, December 21, 2013

द अवेकनिंग ऑफ़ इंटेलिजेंस- जिद्धू कृष्णामूर्ति


The Nicholas Effect रीडर्स डाइजेस्ट में यह लेख पढकर आँखें भर आई हैं, एक सात साल के बच्चे ने मरकर सात मरते हुए लोगों को अपने अंगदान करके जीवन दिया. अमेरिकन लोग बहुत बहादुर होते हैं, बड़े दिल वाले ! RD सचमुच अनोखी पत्रिका है, दिल को हिलाकर रख देने वाली, मन के कोमल भावों को छूकर मधुर संगीत भर देने वाली. Dear Sunny नामक लेख भी बहुत अच्छा लगा. आज वर्षा थमी है पर बादल अब भी हैं. नन्हा रोज की तरह कम्प्यूटर क्लास गया है, जून के आने में थोड़ा वक्त है. आज सुबह उसने स्वीपर को नाराज कर दिया, नैनी भी कपड़े धोकर फैलाये बिना कहीं चली गयी है, पर इन लोगों को नाराज करना अच्छा नहीं, अपना मन ही परेशान हो जाता है. कल रात को उसे सिर दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी, जून की नींद खुली तो डिस्प्रीन दी, उसके बाद ही नींद आयी. और वह व्यर्थ ही खुश थी कि इस महीने सिर दर्द नहीं हुआ. क्लब में कल अन्ताक्षरी का आयोजन किया गया, नन्हा देखने गया साढ़े नौ बजे लौटा.

इस समय उसके मन की हालत कुछ अजीब सी है, परेशान है, हैरान है और समझ नहीं पा रही है, ऐसा क्यों है ? सुबह से दिन अच्छा खासा ही बीत रहा था. तीन बजे ‘बुनियाद’ देखा, बाद में भुट्टा खाते वक्त भी ठीक थी पर उसके बाद एक के बाद एक ऐसा कुछ न कुछ घटता गया कि...शायद जून की अस्वस्थता की कारण या बोरियत के कारण अथवा बगीचे की बिगड़ती हालत के कारण...हो सकता है हार्मोनल गड़बड़ी के कारण ही ऐसा हो या फिर शारीरिक श्रम न हो पाने के कारण. आज मौसम भी अच्छा है और बहुत दिनों से cycling भी नहीं की है..

पिछले दो दिन लिख नहीं सकी, नन्हे को कविता और फिर स्पीच की तयारी करने में कुछ वक्त गया और कुछ यूँ ही. कल सुबह J Krishnamurti की किताब The Awakening of Intelligence पढने में बीती, पढ़ते-पढ़ते दिमाग इतना ज्यादा confuse/ active हो जाता है , शायद इसे ही awakening of Intelligence कहते हैं. नन्हे को कल दो पुरस्कार मिले, पहले चित्रकला में भी मिला था. उसका नाम पुकारा गया तो उन्हें उस पर बहुत गर्व का अनुभव हो रहा था. कल कविता पाठ में उसने निर्णायिका की भूमिका निभाई. वापस आने में काफी देर हो गयी थी, देर से भोजन करके सोने गये तो नींद भी जल्दी कैसे आती.

“Order is love and order is virtue. Disorder is evil. Conflict brings disorder. Thought is memory and that is past. To live in present is true living.”- J Krishnamurti

Today at 10 am she is trying to live in present. Since morning she made two mistakes- one in not answering the phone other in speaking rudely(unnecessary making conflict) to plumber. Once she scolded Nanha but was not angry. She is observing herself and it makes some sense in routine work. Talked to friends. One friend’s family will come for lunch and yet she has not prepared the sweet dish, but still there is time.

पिछले दो दिन she was totally physical घर की सफाई में लगी रही, घूमना, लोगों से मिलना -जुलना और आज कुछ देर ध्यान किया, मन की ओर झाँका तो खुद-बखुद पेन और डायरी हाथ में आ गये. उस दिन क्लब में किसी ‘मैरी’ की डायरी पढ़ी कई बार लगा अरे, यह तो वह भी सोचती है. पिछले दो दिनों में तीन पत्र भी मिले, एक छोटी बहन का बड़ा सा खत, जिसमें उसने अपने कोर्ट जाने के अनुभव के बारे में लिखा है, दूसरा बड़ी भांजी का खत जो उसने वापस जाकर लिखा है, और एक पत्र माँ-पिता का. आज फिर दो जन लंच पर आएंगे, सुबह उसने निमन्त्रण देने के लिए फोन किया तो उससे पहले दिल की धडकन बढ़ गयी...लेकिन बाद में सामान्य हो गयी, शायद उसका भ्रम ही हो. कल उसका जन्मदिन है, जून इस बार कार्ड और चाकलेट पहले से ही ले आए हैं, ‘सपने’ का कैसेट भी. he is in love with her again ! पिछले दिनों उन्होंने काफी वक्त साथ-साथ गुजरा and they both enjoyed it ! नन्हा अभी-अभी पूछ कर गया है, आज उसे क्या-क्या काम करने हैं, उस दिन पहली बार उसने ‘मैगी’ खुद बनाई और दो बार mango shake भी बना चुका है. उसे अभी कस्टर्ड बनाना है. 


Wednesday, December 18, 2013

कैंसर का साया


आज का दिन वाकई मनहूस निकला, जून ने दोपहर को दफ्तर जाकर फोन किया कि एक हिला देने वाली खबर है, एक युवा अधिकारी, जो उनके परिचित थे, की मृत्यु हो गयी. सुनकर कैसा अजीब सा लगा और तब से मन में बार-बार वही ख्याल आ रहा है, एक हँसता-खेलता घर उजड़ गया...उनकी पत्नी और छोटा सा पुत्र अकेले हो गये. जीवन का संगीत ही जैसे उनके लिए रूठ गया होगा. उस लड़की का चेहरा याद आते ही मन में एक कचोट सी उठती है, ईश्वर उसे हिम्मत दे..इतनी कम उम्र में इतने लम्बे सफर पर निकल गये हैं जिसके पति जहां से वापस आना कठिन ही नहीं असम्भव है, कैंसर मृत्यु का दूसरा नाम ही है, उस दिन पिछले शनिवार को ही तो किसी मित्र ने कहा कि बीस-पच्चीस दिन पहले मुँह से रक्त आया था, चिकित्सकों ने मद्रास(चेन्नई) जाने के लिए कहा है, इतवार को वे चले गये. तब किसी ने मामले को इतनी गम्भीरता से नहीं लिया अभी शुक्रवार को ही पता चला आपरेशन भी हो गया है, कल शाम ही उन्होंने क्लब में उनके किसी मित्र से पूछा था, वे लोग कब वापस आ रहे हैं..  

कल बहुत दिनों के बाद एक सखी के साथ गेस्ट हाउस तक टहलने गयी, विधवा पत्नी की बातें करके वे दोनों ही उदास थे, वह आगे क्या करेगी, बच्चे पर कितना असर होगा, वापसी में उसने उसे घर आने के लिए कहा पर हमेशा की तरह उसका जवाब था, मन होगा तो आएंगे..और मन कहाँ कभी होता है. खैर.. ईश्वर उनकी भी रक्षा करे जिनका मन अपने वश में है और उनका भी जो मन के वश में हैं.

सुबह के साढ़े आठ बजे हैं, आज धूप तेज है, नया स्वीपर सफाई तो कर रहा है पर इसे ढंग से झाड़ू लगाना भी नहीं आता है, क्या किया जा सकता है सिवाय इसके कि खुद ही थोड़ी बहुत सफाई कर ली जाये, यह इतनी निराशा भरी बातें क्यों कर रही है वह आज, जबकि सुबह जल्दी उठी थी, जून की पसंद का नाश्ता बनाया, ध्यान नहीं हुआ क्यों की एकांत नहीं है अभी. कल रात्रि रसोईघर की खिड़की खुली रह गयी, बिल्ली मौसी दही जूठा कर गयी, अब जून को फिर से जा मन के लिए दही लानी होगी, दही पुल्लिंग है या स्त्रीलिंग ? कल शाम नैनी की बड़ी बेटी को देखा, जिसे भगा कर पिछले साल ही तो विवाह किया था एक व्यक्ति ने, उसकी गोद में स्वस्थ व सुंदर बच्ची थी, कुछ देने का मन हुआ पर..उसकी सखी की छोटी बहन की शादी में भी कुछ देना चाहिए लेकिन...यह पर और लेकिन ही तो....

एक बार किसी पत्रिका में पढ़ा था कि आपके इर्द-गिर्द कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका असर आपके मूड आपके विचारों पर पड़ता है और वह किसी हद तक खतरनाक होता है, वे लोग आपको सम्मोहित कर देते हैं और ज्यादा वक्त आपका उनके बारे में सोचते या उनके कामों में ही गुजरता है, शायद उसके साथ ऐसा ही होता है, दिल पर एक शख्सियत इतनी हावी हो जाती है कि... लिखना शुरू करते ही पहला ख्याल उसी का होता है. it is not a good sign. आज मौसम कल की तुलना में काफी अच्छा है, बदली है, नन्हा कम्प्यूटर क्लास गया है, आज भी ध्यान में मन के उस स्तर तक नहीं पहुंच पाई जहां सब कुछ शांत हो जाता हैं उन पहले दिनों में सहज ही कर  पाती थी और उसका अच्छा असर भी पड़ता था दिन भर के कामों पर. लेकिन पुस्तक में स्पष्ट कहा है किसी अपेक्षा को लेकर ध्यान करने से लाभ नहीं होगा. आज ज्ञान योग पर अध्याय पढ़ा, ‘मैं कौन हूँ’ इस की मीमांसा करने को कहा है, वह क्या मात्र एक शरीर है, या एक मन, या बुद्धि, या उससे भी परे कुछ... उसका व्यक्त्तित्व बचपन से आजतक कितनी सच्ची-झूठी परतों से ढका हुआ है, बचपन में अपने को शेली की नजरों में ऊंचा उठाने के लिए बोला झूठ, लेकिन मासूमियत इतनी की घर में आकर सबको बता दिया पर वे हँसे और मन ने मान लिया कि दूसरों की नजरों में खुद को उठाने के लिये झूठ बोलना गलत नहीं है.






Tuesday, October 15, 2013

स्वप्नों का संसार



आज सुबह वह उठी तो रात देखे सपनों की बातें दिमाग में स्पष्ट थीं, अजीबोगरीब सपने, सोने से पहले टीवी सीरियल देखकर सोयी थी, जिसमें murder, kidnapping, war सभी कुछ था, इसी वजह से और उनकी यात्रा के प्रति आशंका लिए मन रात भर कल्पनाएँ बुनता रहा. एक नृत्यांगना भी देखी जो अख़बारों में English column भी लिखती है और भी कई बेसिर पैर की बातें... कल शाम क्लब में उसने जून से कहा, वह उसके बैडमिंटन खेल को प्रोत्साहित नहीं करते हैं, तो उन्होंने पता नहीं इसका क्या अर्थ लिया, उसे लगा, इन्सान अपने अलावा और किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह सकता. बाद में एक बालिका से टीटी में हार गयी, खैर.. उसका अफ़सोस नहीं हुआ बल्कि आनन्द आया. लाइब्रेरियन ने पिछले हफ्ते ली एक साप्ताहिक पत्रिका north-east वापस करने के लिए कहा था, रद्दी में चली गयी है शायद, उसके बदले में कोई और पत्रिका देने से शायद काम चल जाये. सुबह-सुबह नन्हे को भी उपदेश सुनने पड़े...उसे लगता है कि उनका कोई असर होने वाला नहीं है सो चुप रहना ही बेहतर है, वह अपनी प्रक्रति के अनुसार एक ढर्रे में ढलता जा रहा है जिसे बदलना सम्भव तो है पर मुश्किल भी है.

इस वक्त उसका मन एक ऐसे दुःख को अनुभव कर रहा है जिसका अहसास पहले कभी नहीं हुआ, यदि हुआ होगा तो बरसों पहले जब किसी सखी ने स्कूल या कालेज में उसका दिल तोडा होगा. आज ऑंखें भरी हैं और दिल भारी, एक सखी के कुछ शब्द कानों में अब भी ताजा हैं, एक मित्रता की मौत कैसे होती है यह तो पता नहीं पर कहीं गहरे कुछ चटक जरुर गया है.

डायरी उठाई तो एक दर्द भरी कविता अंगड़ाई ले रही थी. सच ही है दुःख मानव को सृजनशील बनाता है. कल रात भी सपने देखती रही और एक पहेली का हल जो पहले नहीं मिल रहा था, काफी देर बाद मिल ही गया. सपने में ही पायी वह ख़ुशी अब भी याद है, कैसा सुकून मिला था, पर सपने आखिर सपने ही होते हैं. पहले-पहल जब आँख खुली तो शायद उसी स्वप्न की वजह से मन हल्का लगा कि शायद सब कुछ भुला दिया है पर कहाँ, जरा सा होश आया नहीं कि वही दंश भरे शब्द कानो को बेंध कर दिल को चीरते चले गये, शायद वह overreact कर रही है. उसे इस वाकये को इतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए, पर उसका मन, उसका पागल मन किस कदर जुड़ा था, उसे ऐसी ठेस लगने पर प्रतिक्रिया स्वाभाविक नहीं क्या ? समय धीरे-धीरे सारे घाव भर देता है पर एक मित्र का दिया घाव ऐसा गहरा होता है कि समय के पास भी उसकी कोई दवा नहीं होती.. क्यों नहीं होती होगी अगर कोई लेना चाहे और न मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता, अचानक उसके मन के भावों में जोश भरने का श्रेय एक अन्य परिचिता को है, जो क्लब की पत्रिका के लिए कुछ लिखने का वायदा कर चुकी हैं, पहले भी वादे तो बहुतों ने किये पर निभाएं ऐसे लोग कम ही होते हैं. कल शाम जून ने जब उसका चेहरा देखा तो समझ गये, कुछ हुआ है. उस वक्त की उनकी परेशानी और उसके दुःख को अपना दुःख समझने की वह कोशिश ...उस पल वे दोनों कितना करीब आ गये थे, एक ही सोच में बंधे हुए, सुख की चरम सीमा में भी शायद इन्सान ऐसे ही बंध जाते हैं. ख़ुशी की याद आ रही है.. उसने सोचा, लक्षण तो अच्छे हैं, लगता है जल्दी ही इस सदमे से उबर जाएगी. पर पिकनिक के लिए जिस जोश और मूड की जरूरत होती है वह कहीं मर गया है.


Sunday, October 13, 2013

सिक्किम की सैर


फिर एक अन्तराल.. आजकल सुबह रजाई से निकलने का मन नहीं होता, ठंड बढ़ गयी है. नन्हा भी आजकल उठने में आनाकानी करता है, यूँ तो वह हर मौसम में करता है. ‘जागरण’ भी नहीं देख पाती और कोई अच्छी किताब भी नहीं पढ़ी है. कविता भी नहीं लिखी. पढ़ना-लिखना आजकल  बस अख़बार या इक्का-दुक्का पत्रिकाएँ पढ़ने तक ही सीमित रह गया है. क्लब मीट आने वाली है, पत्रिका के लिए मांगें तो प्रेरित होकर वह झट लिख सकती है, उसने सोचा ही था कि एक फोन आया क्लब की कमेटी के एक सदस्य का. इसी महीने वे लोग दार्जिलिंग जाने की बात सोच रहे हैं. साल का अंतिम महीना शुरू हुए पांच दिन बीत गये हैं, कुछ हफ्तों बाद नया साल आ जायेगा और इसी तरह साल दर साल गुजरते जायेंगे, नन्हा बड़ा हो जायेगा और...

छोटी बहन और मंझले भाई के पत्र आए हैं, जिनमें जवाब देने लायक बाते भी हैं. बहन ने अपनी जिस समस्या का जिक्र किया है वह उसके साथ भी है हूबहू वही. भाई ने अपने तबादले का जिक्र किया है. श्रीनगर में हुए बम विस्फोट में फारुख अब्दुल्ला बाल-बाल बचे, शांति और विश्वास (जो लोगों की शक्ति पर निर्भर है) की जीत होगी और हिंसा चाहे कितना भयानक रूप धारण कर ले एक दिन उसे मरना होगा क्योंकि अमन पसंद आदमी की जिन्दगी में उसकी कोई जगह नहीं. जून और नन्हा British comedy देखने के लिए तैयार हैं और वह भी कुछ देर पहले शुरू हुए सिर के दर्द को भूलकर बस हँसना चाहती है.

जून ने फोन पर बताया, २२ तारीख को उनकी सीट रिजर्व हो गयी है यानि वे दार्जिलिंग और सिक्किम जा ही रहे हैं. एक सहयात्री परिवार भी उनके साथ जा रहा है. बहुत दिनों बाद डीडी पर कवि सम्मेलन का एक अंश सुना ‘अंगड़ाई न लो चैत का आलस्य बिखर जायेगा’. अच्छी कविता थी. किसी सखी से एक किताब लायी थी, अभी शुरू भी नहीं की है, उसमें रूचि ही खत्म हो गयी है. वह बातें व्यवहारिक नहीं लगतीं या कहें कि उन पर चलना बहुत मुश्किल है. आजकल उसका अध्यात्मिक ग्राफ निचली तरफ जा रहा है फिर एक दिन कोई झटका लगेगा और ऊपर की ओर चढ़ना शुरू होगा. कभी रुककर, थम कर आराम से बैठकर अंतर में झांके तो पता चले कि वहाँ कितना सूनापन भर गया है. लेकिन दुनियादारी के प्रलोभनों में पड़ा मन कहीं विश्राम लेना ही नहीं चाहता, हर वक्त किसी न किसी उधेड़बुन में लगा ही रहता है तो भला जरूरत ही कहाँ महसूस होगी उसे तारनहार की. एक तरह से यह भी ठीक है, हर वक्त काम में लगे रहना, खाली न बैठना भी राजयोग का एक लक्ष्ण है, और उसे काम करना, करते-करते थक जाना अच्छा लगता है. जैसे कल टीटी की wall प्रैक्टिस करते समय महसूस हो रहा था.

पीटीवी पर एक आर्टिस्ट नजीर के बनाये खूबसूरत लैंडस्केप देखे, जिनसे नजरें हटाना मुश्किल था, इतने सुंदर चित्र भी बनाये जा सकते हैं, इन्सान भी एक जादूगर से कम नहीं. आज सुबह समाचर सुनते वक्त ख्याल आया कि कहीं अचानक वह मर जाये तो इन डायरियों का क्या होगा, जून इन्हें संभाल कर तो रखेंगे या फिर यूँ ही किसी के हाथ लग जाएँ और...कल दोपहर जून एक बड़ा सा पार्सल लाये, सलाद काटने के लिए SUZI CHEF नाम की एक hand operated मशीन भी थी  उसमें, सलाद अच्छा कटता है उसमें, अभी और कुछ तो काटकर देखा नहीं है. इस बार पिकनिक पर जाने का विशेष उत्साह है, सर्दियां ज्यादा खुशनुमा हैं इस बार, धूप खिली रहती है. इस समय भी लॉन में धूप पीछे पीठ को छूती हुई निकल रही है. कल शाम गुलाब के पौधों से मिलकर झड़ चुके गुलाबों की टहनियों को काटा, गुलदाउदी के पौधों को बांधा, पानी दिया. नन्हे के लिए नाईट ड्रेस सिली, जून और नन्हे दोनों ने ही तारीफ करके उसका हौसला बढ़ाया है.





Monday, March 4, 2013

कक्षा दो का टाइम टेबिल



आज अभी सुबह ही है, शनिवार है, दोपहर को जून घर पर होंगे. कल शाम को उनसे नोक-झोंक हो गयी, वही पुरानी खाने-खिलाने की बात पर. रात को कहने लगे दोपहर को यह सब क्यों बनाती हो, मैगज़ीनस् क्यों नहीं पढ़ती ? अब उन्हें कैसे समझ में आयेगा कि आजकल पत्रिकाओं से उसका मोहभंग हो गया है, उसे कहानियों में भी अब उतना रस नहीं आता, और राजनितिक दांवपेंच में तो बिल्कुल नहीं. आजकल उसे वह हर चीज पढ़नी अच्छी लगती है जो मन को कहीं गहरे छू जाये, कुछ सिखाए या फिर...बस. आज भी मौसम ने बादलों की पोशाक पहनी है. नन्हा स्कूल गया है, डेविस कप के मैच के कारण शायद आज व कल टीवी फिल्म जल्दी दिखाई जायेगी, कल क्लब में ‘जीने दो’ फिल्म थी यूँ ही सी थी, हाँ, जीने का हक सबको है, आजादी से जीने का. वहीं नन्हे की क्लास टीचर मिलीं, उन्हें बता दिया उसने स्कूल न जाने का कारण, मगर रात देर तक सोचती रही, क्यों कहा, कुछ और कह देती. कभी-कभी सच बोलकर भी बेचैनी होती है, झूठ बोलकर भी, ऐसे में चुप रहना भी सम्भव न हो तो ? आज वर्षों बाद बेसन की सब्जी बनायी.

आज फिर चार दिनों बाद डायरी खोली है, इतवार को नन्हे को हल्का जुकाम था, स्कूल नहीं भेजा, उसका भी स्वास्थ्य उन दिनों की वजह से कुछ ठीक नहीं था, स्कूल के दिनों में एक बार कापी में ऐसा ही कुछ लिखा था, उसकी सहेलियों ने पढ़ा तो बहुत हँसीं थीं. कल सभी भाइयों को राखी भेज भी दी. कल दोपहर टीवी पर कछुए पर टाइम टेबिल बनाना देखा, नन्हे के लिए बना रही है. जून कल ज्यादा चुप नही थे, उसके पहले के दो दिनों की तरह, जीवन को पल-पल जीया जाये तो इसमें उदासी के लिए कोई जगह ही नहीं है. स्वामी विवेकानंद की पुस्तक पढ़े काफी दिन हो गए हैं, एक फितरत होती है हर काम को करने की, अभी उसका मन उसे स्वीकारने को तैयार नहीं है, तो वह वह कार्य नहीं कर सकती, लेकिन यह तो मन की गुलामी हुई, वही प्रेरणा का इंतजार करने वाली बात, जो उसे नहीं करना है.

मौसम आज बुद्ध के मध्यम मार्ग का अनुसरण कर रहा है. कल रात भी अच्छी नींद आई, पिछले तीन-चार दिनों से बहुत गहरी नींद आती है, पहले की तरह भेड़ें नहीं गिननी पड़तीं. जून भी कल स्वस्थ लग रहे थे, खुश थे, उनके साथ कभी-कभी बेवजह वह तल्ख लहजे में बात कर देती है, वह ध्यान नहीं देते, शायद समझ गए हैं कि यह उसकी आदत है. लेकिन उन दिनों जब राजयोग पढ़ रही थी ऐसा बहुत कम होता था. उसे लगता है कि दिनोदिन वह  अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल करना कम करती जा रही है. उसे नन्हे के लिए छुट्टी का प्रार्थना पत्र लिखने में दो पेज लगे, पहला ठीक नहीं लगा, जब भी उसे कुछ नया लिखना होता है, कलम रुक जाती है, नन्हे से उसने वायदा किया है कि जब वह स्कूल में होगा, उसके लिए एक कहानी लिखेगी.

फिर तीन दिन यूँ ही गुजर गए, शनि को असम बंद था, नन्हा घर पर ही था पर जून ऑफिस गए थे, किसी ने भी रास्ते में नहीं रोका, कितने सच्चे-झूठे डर इंसान ने पाल लिये हैं, आजतक जितने भी बंद होते थे, लोग घरों से नहीं निकलते थे, पर अब कार लेकर जाते हैं. रविवार को वह असमिया सखी के यहाँ गयी, उसने फ्लोरा मशीन खरीद ली है, उसे सिलाई-कढ़ाई का शौक भी है, उस दिन एक तेलगु परिवार में गयी थी, वहाँ भी आजकल बहुत सी चीजें बना रही हैं गृहणी, वाल हैंगिंग, टीवी कवर, पेंटिंग और भी बहुत कुछ, बंगाली सखी को बागवानी का बहुत शौक है, एक उसे ही कोई खास शौक नहीं है किसी एक चीज का, हाँ, थोडा बहुत सभी का है. कल फोन पर पुरानी पड़ोसिन से बात की, बाद में लगा कि वह थोडा और विनम्र हो सकती थी, लेकिन यह रूखापन आया कहाँ से...उसकी कोई बात उसे चुभी और...इसका अर्थ हुआ कि अब भी वह वहीं की वहीं है, आदिम आदतों से पीछा छुड़ाना इतना आसान तो नहीं. कल दोपहर खतों के नाम थी. कल क्लब में मीटिंग है उसे इंतजार है, लगता है इतने वर्षों तक क्यों नहीं गयी, खैर, हर चीज का एक वक्त होता है. कल व परसों रात को दो कहानियाँ बुनीं थीं, देखेगी, कहाँ तक उतरती हैं पन्नों पर. जून ‘कक्षा दो’ के लिए, एक सुंदर सा टाइम टेबिल बना कर लाए हैं, नन्हे की क्लास टीचर बहुत खुश होंगी.







Friday, August 10, 2012

स्वीमिंगपूल में पहला दिन




पिछले तीन दिन वह फिर नहीं लिख सकी, सुबह न लिखे तो दिन भर व्यस्तता में याद ही नही रहता. कल रात जून के सो जाने के बाद वह कुछ देर पढ़ती रही, कल पांच पत्रिकाएँ एक साथ जो आ गयी थीं. परिणाम यह हुआ कि सुबह उसे बेहद नींद आ रही थी, वह तैयार हो रहे हैं यह नींद में कोई खबर तो कर रहा था, पर उठ नहीं पायी. बाद में उसे अच्छा नहीं लगा, खुद से वादा किया कि आगे ऐसा नहीं करेगी. जाने क्यों मन जिसे इतना चाहता है कभी उदासीन भी हो जाता है उसके प्रति, शायद ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, ऐसा कहीं पढ़ा था. उसने माँ को लिखा है कि वहाँ रहकर बी. एड करना चाहती है. उनका जवाब शायद महीने के अंत तक आ जाये.

आज उसका काम जल्दी हो गया, नन्हा अभी उठा नहीं है, कल वे उसे इस वर्ष पहली बार स्वीमिंग पूल ले गए थे. उसे बड़ा आनंद आ रहा था, एक बार तो वह पूरा पानी में ही चला गया था, कितना डर गयी थी वह, और नन्हा भी पानी में तैरने-उतराने लगा था ऊपर आने के लिये. अब वे कभी उसे पानी में अकेले नहीं छोड़ेंगे. कल दोपहर भर भी वह पढ़ती रही, इसी कारण आँख में हल्की पीड़ा थी रात को. टीवी पर ‘जिंदगी’ का अंतिम एपिसोड था, अंत सुखद था पर अप्रत्याशित. शायद इसके सिवा औए कुछ सोच ही नहीं सकते थे वे लोग. दोनों घर से पत्र आये हैं, एक शुभ समाचार मिला मंझले भाई-भाभी माता-पिता बनने वाले हैं, पर अब वे लोग यहाँ नहीं आ पाएंगे.

कल उनके नेपाली पड़ोसी अपना कलर टीवी उनके घर रख गए, घर गए हैं अपने परिवार को लाने. उन्होंने The old fox देखा, कुछ समझ में आया, कुछ नहीं, पर रंगीन टीवी की बात ही और है फिर ओनिडा हो तो और भी अच्छा है, सोने पे सुहागा. कल शाम बहुत दिनों बाद दो परिवार उनसे मिलने आये, अच्छा लगा. आज ईद है, जून के दफ्तर में अवकाश है, सोचा था आराम से उठेंगे, पर सुबह-सुबह बिजली चली गयी, गर्मी से नींद खुल गयी. उन्होंने शाक-वाटिका से भिन्डी व भुट्टे तोड़े, अंगारों की तरह गैस पर ठीक से भुन नही पाते, भीतर से कुछ कच्चे ही रह जाते हैं.

पिछले हफ्ते डायरी नहीं खोली, कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है कोई कविता आदि. आलस्य की पराकाष्ठा पर पहुँच गयी है वह, माना कि सुबह जब नन्हा साथ ही उठ जाता है तो संभव नहीं होता पर दोपहर को लिखा जा सकता है, मन भी बस कितना सुविधा-आराम सहित पसंद है. सारे किये-कराये पर इतने दिनों के नियम पर पानी फेर देता है. आज भी उसका मन हुआ वही किताब पढ़ने का, Jean pludiy की Queen Caroline अच्छी किताब है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि दिनभर उसे ही लेकर बैठो. कल वह हॉस्पिटल गयी थी, दो परिचित महिलाओं को देखने, एक ने पांच किलो की बेटी को जन्म दिया है, गोल-गोल प्यारी सी. कल छोटे भाई और बड़ी बहन के पत्र भी आये, भाई अभी घर से दूर है, अगले माह घर जायेगा तभी वह उसे जवाब लिखेगी, बहन ने एक और सवाल पूछा है, जवाब के लिये मन में कितने विचार आ रहे हैं.

Thursday, August 9, 2012

बात बन जाये



कल दोपहर ‘कादम्बिनी’ पढ़ती रही, अच्छी पत्रिका  है और इसका रूप जरा भी नहीं बदला है, वही पहले वाला है, जब वह कॉलेज में थी तब हमेशा पढ़ती थी. कल वे फिर बाजार गए थे, पैसे तो इस तरह भागते हैं जैसे कैद से निकला चूहा, आज पांच तारीख है और आधा वेतन खर्च हो चुका है. शुक्रवार को क्लब में फिल्म थी ‘प्यार झुकता नहीं’ वे एक घंटा किसी तरह बैठकर लौट आये, नन्हा एक मिनट और नहीं बैठना चाहता था हॉल में, गर्मी भी बहुत थी.

उसका पेन आज ठीक से लिख नहीं रहा है, नन्हे ने गिरा दिया था शायद उसकी निब मुड़ गयी है. कल उसकी तबियत ठीक नहीं थी, ऐसे में वह छोटी-छोटी बातों को भी गम्भीरता से लेने लगती है. हल्का सा मजाक भी सहन नहीं कर पाती. तन के साथ मन भी कैसे टूटा टूटा सा रहता है और आँखें हैं कि हर वक्त भरी-भरी सी. जून ने उसे कुछ भी करने नहीं दिया, आज वह ठीक महसूस कर रही है, कल इतवार था, शाम को टीवी पर ‘बात बन जाये’ आयी थी, मजेदार थी और दोपहर की मलयालम फिल्म भी.

सुबह के साढ़े सात ही बजे हैं पर लग रहा है दिन चढ़ आया है. कल ननद व देवर के पत्र मिले, जवाब देना है, मंझले भाई का पत्र भी आया है. कल शाम वे काफ़ी दिनों के बाद घूमने गए. उसने सोचा कि नन्हे को दूध सोते में ही पिला दे तो क्या अच्छा हो ! उठने के बाद एक गिलास दूध पीने में कितना समय लगाता है. कल के संडे रिव्यू में पढ़ा कि दूध पीना ही अच्छा नहीं है, आश्चर्य है हजारों सालों से लोग दूध पीते आ रहे हैं. एक दिन कोई लिख देगा कि अनाज खाना व सब्जियां खाना ही अच्छा नहीं है, फिर तो आदमी हवा खाकर( वह भी तो प्रदूषित है) ही जिन्दा रहेगा.

कल जून ने कहा कि ऐसा भी क्या काम होता है उसे जो ग्यारह बज जाते हैं, तो आज सुबह के दस बजकर पांच मिनट ही हुए हैं और वह अपने सारे काम कर चुकी है. वह लिखने बैठी तो नन्हा क्यों पीछे रहता, उसे भी कापी पेन दिया है, लिख रहा है कुछ अपनी भाषा में. पर उसे वही पेन चाहिए जिससे वह लिख रही है, अपने हाथ पर कुछ लिख लिया है उसने और अब हाथ धोने गया है. बच्चे भी बस...आज सुबह गिलास से दूध न पीने के लिये कितनी जिद कर रहा था पर आखिर में पी ही गया, आज से उसकी बोतल बंद. कल वे पत्रिकाएँ लेने गए, बहुत भीड़ थी, पर उनकी पसंद की एक भी पत्रिका नहीं मिली, आज फिर जायेंगे, लाइब्रेरी भी जाना है, jean plaidy की एक और किताब लाने, Barbara cartland की भी.




Friday, August 3, 2012

चाइनीज ब्यूटीशियन


उनका पत्रिका-क्लब आरम्भ हो गया है. सा. हिंदुस्तान और सारिका आयी हैं, अभी तो कितनी पत्रिकाएँ आयेंगी, ठीक से पढ़ सके इसके लिये दोपहर को सोने का मोह छोड़ने होगा. क्लब से दो पुस्तकें भी लायी है एक बागवानी पर और दूसरी हाउस कीपिंग पर है. जीनिया के पौधे निकल आये हैं. क्यारी में लगाने हैं, गुलदाउदी की कटिंग्स भी लगायी हैं, देखें जड़ पकड़ते हैं या नहीं अगले साल के लिये. उसे अपनी बंगाली मित्र का स्मरण हो आया, जिससे बहुत दिनों से नहीं मिली और जो बागवानी में बहुत रूचि रखती है, उसे जानने की उत्सुकता हुई कि उसने अपने लॉन में क्या लगाया है. नन्हे के स्वेटर का गला खोल कर फिर से बनाया पर बात बनी नहीं, रहीम दास ने कहा है न, टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये. आज से वह फ्रिज के लिये क्रोशिये का कवर बनाना शुरू कर रही है. नन्हे को कल शाम जून ने डांटा, गुस्से में वह यह भी भूल गए कि वह उनकी बात समझ भी रहा है या नहीं, काश, वह आगे कभी ऐसा न करे.

कल रात बड़े जोरों की वर्षा हुई आंधी और तूफान के गर्जन-तर्जन के साथ, बिजली चली गयी, और अब पानी नदारद है. सुबह-सुबह पानी न हो काम कैसे चलेगा, गनीमत है थोड़ा बहुत पानी तो घर में रहता है फिल्टर में और गर्म पानी तो आता ही है. परसों वे तिनसुकिया गए, मौसम बिल्कुल ही साथ न दे तो बात दूसरी है वरना तिनसुकिया में शिव मंदिर तक जाना एक अच्छा अनुभव है. वह एक चाइनीज ब्यूटीशियन के पास भी गयी, वे लोग कई पीढ़ियों से भारत में बसे हुए हैं, आराम से स्थानीय भाषा बोल रही थी, जबकि आपस में वे चीनी में ही बोल रहे थे. जून ने एक नई मिठाई खरीदी, बहुत स्वादिष्ट थी. कल उसकी पड़ोसिन घर जा रही है एक महीने के लिये, शाम को वे उनसे मिलने जायेंगे.

कल सुबह वह जून से परसों रात की बात पर नाराज क्या हुई कि सभी काम बिगड़ने शुरू हो गए, नन्हें ने अपने कपड़े गंदे कर लिये और वह स्नानघर में थी, जल्दी-जल्दी बिना पोंछे उल्टा गाउन पहन कर बाहर आयी, धुले हुए कपड़े तौलिए सहित नीचे गिर गए, गनीमत है सूखे फर्श पर ही गिरे थे. जब तक वह नन्हे के कपड़े बदले महरी ने सभी नीचे गिरे कपड़ों को मैले कपड़े समझ कर पानी की तरफ खिसका दिया और तभी नन्हें ने पानी अलग गिरा दिया गैलरी में जल-थल हो गया, झटपट झाड़ू से सफाई की कि कहीं वह गिर न जाये...ऐसे में लिखने का समय ही नहीं मिला.

Tuesday, July 31, 2012

तेरी गठरी में लागा चोर



पहले कामना, फिर पूरी न होने पर क्रोध अथवा पूरी हो जाने पर मोह, यही कारण है जो मानव को बुराई की ओर अग्रसर करता है. उसने मन ही मन गीता में पढ़ा यह वचन दोहराया. आज सुबह से बल्कि कल शाम से ही बादल बने हुए हैं पर बरस नहीं रहे. कल शाम वे घर पर बिना ताला लगाये लगभग एक घंटा घर से बाहर रहे, ईश्वर की कृपा से कुछ हुआ नहीं पर मन में एक डर अवश्य था, पिछले दिनों दूसरी नयी कालोनी में हुई चोरी की बात सुनकर, जिसमें कपड़े, गहने, बिस्तर सहित चोर खाने-पीनेकी वस्तुएं तक ले गए. क्या इन चोरों के पास हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती, दूसरे को इतना नुकसान पहुँचा कर स्वयं धनवान बनने की सोचना ! चोरी से बढ़कर कोई दुष्कर्म नहीं.
उन्होने फिरसे पत्रिका क्लब खोलने का निर्णय लिया है. कल लाइब्रेरी से दो पुस्तकें और लायी है और दो पत्रिकाएँ भी. कल भाई-भाभी व माँ-पापा के पत्र मिले. नन्हा अब काफी बातें करने लगा है, बहुत से नए शब्द सीखे हैं उसने, अभी मुस्कुराते हुए उठेगा और उसके गले में बाहें डाल देगा फिर तुतलाते हुए कुछ बोलेगा आटो, या स्कूटर या फिर पापा.

टीवी का एंटीना तो लग गया पर दो घंटे काम करने के बाद फिर से तस्वीर गायब है. कल शाम की फिल्म शायद ही देख पाएँ. जून, पीछे वाले पड़ोसी और अन्य तीन-चार लोग थे कितनी मुश्किलों के बाद इतनी भारी रॉड को उठाकर वे सीधा खड़ा कर पाए और फिर जून छत से ही नहीं उतर पा रहा था. उसके बाद सबने एक और घर में लगाया अब तीसरी जगह लगाने गए हैं. नन्हा गली के उस ओर दाईं ओर के घर में गया है, वहाँ एक छोटी लड़की है आठ-दस साल की जो उसके साथ खूब खेलती है, तभी वह कुछ लिखने बैठी है. कल शाम से ही बिजली नदारद थी, अँधेरे में खेलते-खेलते नन्हा परेशान हो गया था बहुत झुंझला उठा था, ऐसे में जून भी उसे सम्भाल नहीं पाते. आज उसने पत्रों के जवाब दिए. वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही, लगता है महरी आज भी काम करने नहीं आयेगी.