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Sunday, December 15, 2013

लाल डिब्बा सुनहरा कलम


उसने एक पुस्तक में ये सुंदर बातें पढ़ीं और नोट कर लीं.
some Sai Teachings-
1. The aspirant must realize the absolute triviality and unimportance of the things of the world and of the next.
2. He must have an intense aspiration to get free from the bondage to the lower world.
3. He must turn his gaze inwards and look to his inner world.
4. Unless a man has turned away from wrong doings and composed himself so that his mind is at rest he can not get self-realization.
5. The candidate to the spiritual life must lead a life of truth, penance, insight and right conduct.
6. The would be diciple has to think and choose between good and the pleasant.
7. The aspirant must watch his mind from a distance.
8. He must get rid of the great d illusion “I am the body” or “i am the mind”
9. The aspirant  must have a Guru, If necessary God himself will come down and be your Guru.
10. The most important is the Lord’s grace.

बहुत दिन पहले जून को किसी ने यह पेन दिया था, लाल डिब्बे में काला व सुनहरा पेन, उसने इसे संभाल कर रख लिया, परसों देखा तो स्याही रिस रही थी, सबक सीखा, चीजों को इस्तेमाल भी करना चाहिए सिर्फ संभाल कर रख देने से ही वे ठीक नहीं रहतीं. पर मन की तो बात ही निराली है, सुबह James Hariott की किताब पढ़नी शरू की, पहला अध्याय था, why to meditate, बहुत से कारण बताये थे, पांच मिनट ध्यान करने बैठी तो मन पचास जगह दौड़ गया, कल रात को ही एक बार नींद खुली, मन में विचार तेज ट्रैफिक की तरह दौड़ रहे थे, एक के बाद एक, कहीं कोई विश्राम नहीं, कोई शांति नहीं, एक पल को रुकी, तो फिर शोर सुनाई देने लगा, सपना था या सचमुच का शोर मन से दिमाग तक जा रहा था. विचार थमते ही नहीं, बेवजह, बेमतलब के विचार... आज सुबह नन्हे को स्कूल भेजने तथा रोजमर्रा के कामों में गुजर गयी. उसके बाद पुनः ध्यान की असफल कोशिश के बाद लिख रही है, शायद सभी के साथ आरम्भ में ऐसा ही होता होगा. नियमित अभ्यास तो उसने कब का छोड़ दिया था. आज नन्हे का स्कूल में अंतिम दिन है छुट्टियों से पूर्व का, फिर दो माह का ग्रीष्मावकाश. मौसम बहुत गर्म है आजकल, उन्होंने ए सी चलाकर सोना शुरू किया है.

कल उसने गर्मी की शिकायत की और आज ईश्वर ने वर्षा भेज दी., कितनी तरह से मेहरबानी करता है सबका रक्षक, वह उन्हें प्यार करता है क्योंकि वे उसकी रचना हैं. यह ब्रह्मांड, चाँद, तारे, सूरज और धरती के असंख्य निवासी सभी उसे प्रिय हैं, वह भी चाहता होगा वे भी उसे प्यार करें, यूं उसे..और अभी-अभी लिखने का क्रम छूट गया, यह नया स्वीपर ठीक से काम नहीं करता है, न चाहते हुए भी उसे बार-बार टोकना पड़ता है.. अभी सुबह के नौ भी नहीं बजे हैं, नन्हा नहा धोकर नाश्ता करके ‘डिजनी ऑवर’ देखने बैठ गया है. कल शाम नैनी ने अपने बेटे को देखकर कुछ रूपये मंगवाए टेप रिकार्डर खरीदने के लिए, उन्होंने नहीं दिए शायद इसी बात पर वह चुपचुप सी  है, या उसका वहम् होगा क्योंकि इन्सान को वही दीखता है जो वह देखना चाहता है. आज सुबह भी ध्यान की कोशिश नाकाम रही.

सच कहे तो इस वक्त न मन को चैन है न तन को, अभी-अभी बाएं पैर के अंगूठे के नाखून को ठोकर लगा ली, ख्याल ही नहीं रहा कि ...बेख्याली की भी हद होती है पर यहाँ तो.. किचन में भिंडी अभी बनी ही नहीं थी कि कड़ाही उतार कर रख दी. नैनी ने बताया पर उसे शक है कहीं उसी ने.. कुछ देर पहले नन्हे पर झुंझलाई, शायद मौसम का असर है या अभी व्यायाम नहीं किया है. स्वीपर जल्दी आ गया, आजकल रोज ही जल्दी आ जाता है. कल रात बल्कि शाम से ही जून भी अपने ठीक मूड में नहीं थे, दो-तीन बार घर फोन किया पर छोटे भाई ने उनके पिता की वापसी की रिजर्वेशन नहीं करवाई, वे यात्रा पर जाने वाले हैं. मन है कि बस ही में नहीं आता chatter box की तरह हर वक्त कुछ न कुछ चलता ही रहता है. कल दिन में टीवी देखा, सुबह काफी काम भी था, पूरा दिन पलक झपकते बीत गया, आज उसे पढ़ाने भी जाना है, उससे पूर्व नन्हे को पढ़ाना है, उसकी छुटियाँ होने से सुबह का काम कुछ कम हुआ है पर उसको व्यस्त रखने में ज्यादा वक्त देना होता है. कल शाम उसकी एक सखी ने आज शाम आने की बात कही, पर शंकालु मन ने तुरंत कहा, देखना कुछ न कुछ दूसरा काम उसे आ जायेगा. भगवद गीता में पढ़ा था शंका ग्रस्त का विनाश होता है, उसका तोड़ है विश्वास, पर किसी के विश्वास को एक बार नहीं कई बार ठेस लग चुकी हो तो... तो भी करना होगा विश्वास, सात के गुने सत्तर बार विश्वास. ईश्वर यदि कोई है तो उस विश्वास को बल देगा.     




Friday, April 26, 2013

रामायण की कहानी-अशोक बैंकर



अचानक घर के सारे के सारे बॉल पेन्स की स्याही जैसे एक साथ ही खत्म हो गयी है, उसे हरी स्याही वाले इस जैल पेन से लिखना पड़ रहा है, जो इतना अच्छा नहीं लिख रहा. मौसम आज भी सुहावना है, शायद यही कारण तो नहीं कि आजकल वह वे सभी कार्य सुबह कर  पाती है, जो ज्यादा गर्मी होने के कारण पहले टाल दिया करती थी, लिखना भी उनमें से एक है. सुबह जल्दी उठने से नन्हे को भी कुछ वक्त दे पाती है, आज से उसके टेस्ट शुरू हैं. कल से नई नैनी सीमा ने काम सम्भाला है, उसने सोचा, देखें, यह कितने दिन टिकती है, पिछले आठ महीनों में यह पांचवीं नैनी है. जून के आने का वक्त हो रहा है, हो सकता है वह आज भी थोड़ा लेट आयें, शनिवार को पूरा एक घंटा देर से आये, उसके पूछने पर नाराज होने लगे.. जल्दी ही मान भी गए, वाकई वह भाग्यशाली है जो इतना अच्छा साथ मिला है उनका...माँ-पिता से मिलने यदि किसी वर्ष न भी जा सके वे लोग तो उसे कोई दुःख नहीं होगा, उसने सोचा अचानक ये बातें उसके मन में क्यों आने लगीं. रक्षाबंधन की स्मृति अभी ताजी है, शायद इसीलिए..

फूलों के कितने गाँव राह में मिले
आते रहेंगे याद सावन के वे झूले

  कल शाम एक परिचित परिवार आया था, यूँ ही उलझ गयी उनसे बातों में, खत्री और क्षत्रिय की बहस को लेकर, उसका कहना था कि खत्री क्षत्रिय का ही अपभ्रंश है, पर वे मानने को तैयार नहीं थे. उनके अनुसार खत्री वे जो लड़ने से घबराते थे, क्षत्रिय वे जो वीर थे. रात भर स्वप्नों के बीच गुजरी, कल ही जून उससे कह रहे थे कि वह व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों पर चिंता करती है. इस तरह के मन को लेकर जीने से तो अच्छा है कि अपने को बहस की स्थिति में डाला ही न जाये. मन भी शांत रहेगा और रिश्ते भी मधुर बने रहेंगे, चाहे ऊपर-ऊपर से ही क्यों न सही. सर्वेंट रूम की बिजली ठीक करने आए इलेक्ट्रीशियन ने घंटी बजाई. लौट कर आई तो उसकी कलम रुक गयी, खाली रहे या कोई काम भी करती रहे तो मन में ढेरों विचार आते ही चले जाते हैं मगर जब कलम उठाओ तो सबके सब गायब. यूँ पिछले आधे घंटे में दो-तीन बार उठना पड़ा है लिखने के दौरान, यूँ लेखन भला क्या होगा, लिखने के लिए एकाग्रता चाहिए और चाहिए विचारों का ठहराव, जो जून की प्रतीक्षा करते समय सम्भव होगा. कल बड़ी ननद का पत्र बिहार से आया, लिखा है वे लोग अब पटना छोड़ देंगे, और पश्चिम में रहेंगे या सुदूर दक्षिण में. दीदी का पत्र कई दिनों से नहीं आया, कल जून ने भी याद दिलाया, कितने साल हो गए उन्हें देखे. उसने सोचा उस सखी के लिए एक अच्छी सी गज़ल या नज्म लिख दे, वह भी कहीं रात भर सोचती न रही हो, उसकी हम राशि है न आखिर.

  आज फिर लिखना रह ही जाता, भला हो पौराणिक कथाओं के लेखक "अशोक बैंकर" का जिनके कारण कुछ न कुछ लिखते रहने की कोशिश जारी रखने का संदेश मिला. आज सुबह समय बिलकुल नहीं था, जून लंच के बाद गए तो कुछ देर सोयी, अखबार पढ़ा और सोसाईटी पत्रिका के पन्ने पलटे जो जून बुक क्लब से लाए थे. सुबह उसने उस सखी को एक क्षणिक उत्साह में फोन किया, इतवार को अपने वहाँ जाने कई बात कही, कुछ विशेष होना चाहिए, सामान्य सामाजिक मुलाकात से हटकर, विशेष स्नैक्स पार्टी, कैरम या कोई फिल्म देखें, फिर सोचा देखें, ईश्वर कितना साथ देता है उसकी योजना सफल होने में.  आज सुबह ‘योगानंद जी’ कि पुस्तक में क्रिया योग नाम का अध्याय पढ़ा, लेकिन पूरी तरह समझ में नहीं आया, यूँ भी पढते समय मन एकाग्र नहीं रह पाता आजकल. पहले जितनी सहजता से ईश्वर आराधना कर पाती थी अब प्रयास करना पड़ता है, शायद लोग जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं..ज्यादा जटिल होते जाते हैं. कभी-कभी कोई पुरानी बात याद आने पर जो उसे आज भी झेंप दिला जाती है या हाल ही की कोई बात जिसे याद करके उसे अच्छा नहीं लगता, वह मस्तिष्क को भुलावा देने के लिए वही पुराना तरीका अपनाती है, नाम-स्मरण, जो उसकी सारी उलझनों को दूर करने का साधन बन सकता था. शायद सभी के साथ या बहुतों के साथ ऐसा होता हो. आज नन्हे का गणित का टेस्ट है, बस दो दिन और फिर छुट्टियाँ यानि मस्ती, मेले में घूमना, शुक्र व शनि को वीडियो गेम खेलने अपने मित्र के यहाँ जायेगा, इतवार को तो उसके मनपसंद टीवी कार्यक्रम हैं ही. उसने मन ही मन उसे स्नेह भेजा और उसके पिता को भी. 

Thursday, August 9, 2012

बात बन जाये



कल दोपहर ‘कादम्बिनी’ पढ़ती रही, अच्छी पत्रिका  है और इसका रूप जरा भी नहीं बदला है, वही पहले वाला है, जब वह कॉलेज में थी तब हमेशा पढ़ती थी. कल वे फिर बाजार गए थे, पैसे तो इस तरह भागते हैं जैसे कैद से निकला चूहा, आज पांच तारीख है और आधा वेतन खर्च हो चुका है. शुक्रवार को क्लब में फिल्म थी ‘प्यार झुकता नहीं’ वे एक घंटा किसी तरह बैठकर लौट आये, नन्हा एक मिनट और नहीं बैठना चाहता था हॉल में, गर्मी भी बहुत थी.

उसका पेन आज ठीक से लिख नहीं रहा है, नन्हे ने गिरा दिया था शायद उसकी निब मुड़ गयी है. कल उसकी तबियत ठीक नहीं थी, ऐसे में वह छोटी-छोटी बातों को भी गम्भीरता से लेने लगती है. हल्का सा मजाक भी सहन नहीं कर पाती. तन के साथ मन भी कैसे टूटा टूटा सा रहता है और आँखें हैं कि हर वक्त भरी-भरी सी. जून ने उसे कुछ भी करने नहीं दिया, आज वह ठीक महसूस कर रही है, कल इतवार था, शाम को टीवी पर ‘बात बन जाये’ आयी थी, मजेदार थी और दोपहर की मलयालम फिल्म भी.

सुबह के साढ़े सात ही बजे हैं पर लग रहा है दिन चढ़ आया है. कल ननद व देवर के पत्र मिले, जवाब देना है, मंझले भाई का पत्र भी आया है. कल शाम वे काफ़ी दिनों के बाद घूमने गए. उसने सोचा कि नन्हे को दूध सोते में ही पिला दे तो क्या अच्छा हो ! उठने के बाद एक गिलास दूध पीने में कितना समय लगाता है. कल के संडे रिव्यू में पढ़ा कि दूध पीना ही अच्छा नहीं है, आश्चर्य है हजारों सालों से लोग दूध पीते आ रहे हैं. एक दिन कोई लिख देगा कि अनाज खाना व सब्जियां खाना ही अच्छा नहीं है, फिर तो आदमी हवा खाकर( वह भी तो प्रदूषित है) ही जिन्दा रहेगा.

कल जून ने कहा कि ऐसा भी क्या काम होता है उसे जो ग्यारह बज जाते हैं, तो आज सुबह के दस बजकर पांच मिनट ही हुए हैं और वह अपने सारे काम कर चुकी है. वह लिखने बैठी तो नन्हा क्यों पीछे रहता, उसे भी कापी पेन दिया है, लिख रहा है कुछ अपनी भाषा में. पर उसे वही पेन चाहिए जिससे वह लिख रही है, अपने हाथ पर कुछ लिख लिया है उसने और अब हाथ धोने गया है. बच्चे भी बस...आज सुबह गिलास से दूध न पीने के लिये कितनी जिद कर रहा था पर आखिर में पी ही गया, आज से उसकी बोतल बंद. कल वे पत्रिकाएँ लेने गए, बहुत भीड़ थी, पर उनकी पसंद की एक भी पत्रिका नहीं मिली, आज फिर जायेंगे, लाइब्रेरी भी जाना है, jean plaidy की एक और किताब लाने, Barbara cartland की भी.




Friday, February 24, 2012

तेल बचाओ, देश बढ़ाओ


आज मुहर्रम की छुट्टी है, सुबह से ही वे घर पर थे. घर में कई जगह से धूल व जाले साफ किये, कोने बहुत जल्दी गंदे हो जाते हैं यहाँ , छिपकलियाँ बहुत हैं और मकड़ियाँ मच्छर भी. दोपहर को पैदल घूमने बाहर निकले भी तो वर्षा हो रही थी. शाम को एक और असमिया परिवार से मिलने गए उनका भी नन्हा बेटा बहुत प्यारा था, रेशमी बाल पूरे माथे को ढके हुए थे. उसके जन्मदिन के फोटो देखे. घर आकर उन्होंने दिसम्बर में होने वाली यात्रा का हिसाब लगाया और तय किया कई अगले दो तीन महीने बहुत सम्भल कर खर्च करना होगा. जून अब स्वस्थ है, आज वह उसे हॉस्टल ले गया था दूर से वह कमरा भी दिखया जहाँ वह डेढ़ वर्ष रहा था और जहाँ बैठ कर उसने वे सारे पत्र लिखे थे. उसने तीन फाउंटेनपेन में स्याही भर दी है इतने दिनों से वे बॉल पेन से ही लिखते आ रहे थे.
आज शाम को क्लब में पेट्रोलियम कंसर्वेशन रिसर्च असोसिएशन (पी सी आर ए ) की तरफ से एक भाषण था. एक सरदार जी तेल बचाने के बारे में बोल रहे थे, फिर किन्हीं मिश्रा जी ने खाने की गैस बचाने के बारे में बताया पर यहाँ तो गैस दिन रात जलती रहती है, यहाँ के लिये उनकी बात का कोई महत्व नहीं था, फिर तीन-चार फिल्म दिखाई गयीं. जून की एक छोटी सी बात पर नूना को गुस्सा आ गया पर वह हँस कर टाल गया, दूसरा चेयर बैक भी कल पूरा हो जायेगा उसने लिखते समय सोचा. सोने गए तो छत के पंखे से तीन तरह की आवाजें आ रही थीं, बिजली विभाग में रिपोर्ट लिखा दी है शायद कल वहाँ के कर्मचारी ठीक करने आयें.