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Monday, September 19, 2016

घर की सफाई


आज सुबह वह उठी तो सीधे आँख बंद करके बैठ गयी, अनोखा था वह अनुभव ! भीतर एक शांति भर गया है, फोन की घंटी बज गयी और बीच में ही छोड़ना पड़ा. भीतर कितनी अटूट संपदा है. परम पिता परमेश्वर स्वयं ही विराजमान है, एक दिव्य चेतना, एक प्रकाश और एक मुखर मौन...शब्द कहाँ कह पाएंगे उस अनुभव को..इसलिए कहते हैं कि जो जानता है वह कहता नहीं, कह सकता नहीं..उसकी बुद्धि तब बचती ही नहीं, मन खो जाता है. भीतर कोई है जो हर क्षण देख रहा है. उस देखने वाले को सारे कृत्यों को देखते हुए वह देख रही है. वह सदा जगा है और उसकी जागृति उसे भी जगा रही है. क्योंकि उसे देखने के लिए उसे भी सजग रहना पड़ रहा है. एक पल को ध्यान हटा तो भी भीतर यह बोध रहता है कि वह देख रहा है ! जागरण का यह अनुभव अनोखा है. कल देवी पर कुछ पंक्तियाँ लिखीं. मौसम आज भी बदली भरा है. एक सखी आज घर जा रही है, एक पहले ही जा चुकी है. इस बार पूजा पर वे दोनों नहीं रहेंगी. वे एक दिन तिनसुकिया जायेंगे, पत्रिकाएँ देनी हैं लाइब्रेरी में. पिछले कुछ दिनों से वे घर की सफाई कर रहे हैं. कितनी पत्रिकाएँ तथा किताबें जो वर्षों से इकट्ठी हो गयी हैं, वे लाइब्रेरी में भिजवा रहे हैं. वह खाली होना चाहती है, सारे पेपर्स भी धीरे-धीरे करके निकालने हैं. सारी डायरी भी धीरे-धीरे हटानी हैं, एक दिन केवल आत्मा ही रह जाने वाली है, नितांत अकेली, उस अकेलेपन का अनुभव इसी जीवन में कर लेना कितना अनूठा होगा. वे अपने मन में भी अतीत का बोझ तथा भविष्य की चिंताएं ढोये रहते हैं और वर्तमान को बोझिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, उन्हें जीवन का मोह इतना सताता है कि वर्षों पुराना भी कुछ त्यागते उन्हें पीड़ा होती है, जिसका उपयोग भी उन्होंने न किया ही, न करना हो..जून का फोन आया अभी-अभी, वह भावांजलि को प्रिंट करके ला रहे हैं. अभी तक किसी ने उसे पढ़ा नहीं है, लेकिन एक दिन लोग उसे पढ़ेंगे. मानव के भीतर यह कामना कितनी बलवती होती है कि वे जो भी करें लोग उसे सराहें, यह इतनी भीतरी है कि...

आज षष्ठी है. उन वृद्धा आंटी ने अपने पुत्र व पुत्रवधू के लिए भोजन बनवाया, खीर बनवाई, लेकिन उनकी फ्लाईट छूट जाने के कारण आज वे वापस नहीं आ पाए हैं. दोपहर को वह उनके घर गयी थी. मौसम में थोडा बदलाव आ गया है. शाम को जल्दी अँधेरा हो जाता है और सुबह जल्दी दिन नहीं निकलता. कल शाम दीदी से बात की, उन्होंने कहा वे उसकी सभी कविताएँ पढ़ती हैं, उन्हें भी अपने लिखे पर उसकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है. उस क्षण उसका हृदय भीग गया था.

आज सुबह भीतर स्पष्ट आवाज सुनाई दी, आजतक जो भी कहीं से पढ़ा या सुना हुआ बिना कृतज्ञता जताए लिख दिया, वह धोखा है. आज से पूर्व उसे इस बात का जरा भी अहसास नहीं था, पर आज कितना स्पष्ट है कि वह गलत था. इसी तरह जो व्यक्ति गलती कर रहा होता है, उसे पता नहीं होता..वरना वह ऐसा कभी करे ही न. उन्हें किसी को दोषी देखने का अधिकार नहीं है, उनके हाथ भी तो खून से रंगे हुए हैं. कितने जन्मों में कितने अपराध उनके हाथों हुए हैं. वे धीरे-धीरे परमात्मा के मार्ग पर आये हैं किन्हीं  पुण्यकर्मों के कारण सद्गुरू मिले हैं और अब उनका जीवन सही अर्थों में जीवन कहलाने के योग्य हुआ है. साक्षी की तरह कोई सदा साथ रहता है. हरेक के साथ रहता है, भय का कोई कारण ही नहीं, वे सुरक्षित हाथों में हैं.    


Monday, February 17, 2014

पंजाबी ढाबा


अभी नई डायरी नहीं मिली है, पिछले साल की डायरी के एक खाली पन्ने में लिख रही है. सुबह से कुछ समय एक-दो फोन करने में और कुछ इधर-उधर का काम करते-करते ही ग्यारह बज गये. नैनी और उसके बेटे की सहायता से सामने के बरामदे के गमलों की साफ-सफाई भी करवाई. नन्हे की स्कूल बस नहीं आई, वह स्कूल नहीं जा पाया. बहुत देर से पढ़ाई कर रहा है, ऐसा वह इम्तहान के दिनों में ही करता है. आज क्लब में देर से जाना है, पिछले चार-पाच दिनों से रोज ही वे क्लब जा रहे हैं, आज ‘पंजाबी ढाबा’ है. कल सुबह भी उसे क्लब जाना है डेकोरेशन के सिलसिले में मदद करने, परसों अंतिम दिन है. उस दिन बहुत लोग आएंगे, साल भर लोगों को इस दिन का इंतजार रहता है. पर्दे सिलने का काम कल दोपहर शुरू कर दिया था, जो कल पूरा हो जायेगा.  

जून आज नीले रंग की नई डायरी ले आये हैं, हर पन्ने पर एक सुंदर वाक्य भी लिखा है. आज भी उसका काफी समय क्लब में गुजरा, एक सीनियर मेम्बर के साथ फूलों की सज्जा करने में और कुछ उनकी मिनट-मिनट पर बदलने वाले ideas सुनने में, वह परफेक्शन चाहती हैं और बाकी के लोग उनके साथ चल नहीं पाते, लेकिन कुल मिलाकर परिणाम अच्छा रहा सभी ने तारीफ की, वापसी में उन्होंने उसे घर भी छोड़ा. दोपहर को जब आई तो जून का चेहरा उतरा हुआ था, नन्हे को भी स्कूल से आकर उसका घर में न रहना अखरा और उसने कह दिया, आजकल आपका ज्यादा वक्त क्लब में ही गुजरता है. कल शाम अचानक पंजाबी दीदी के पतिदेव आ गये, उनका वही पुराना तरीका है बातें करने का, पर वह अपने साथ कोलकाता की छेने व खोये की मिठाई लाये हैं. उन्हें परसों रात्रि भोजन पर बुलाया है, उसे अपनी पाक कला को संवारने का मौका मिलने वाला है.

आज धूप उजली थी और हवा हल्की सी. वे दोपहर को ड़ेढ़ बजे क्लब गये और चार बजे लौटे, शाम को पुनः गये, पत्रिका मिली, सुंदर चित्रों से सजी वार्षिक पत्रिका. नन्हा गृहकार्य कर रहा है जून सोने की तैयारी कर रहे हैं, वह उस skit के बारे में सोच रही है जो वह हसबैंड नाईट के कार्यक्रम के लिए लिख रही है. पात्रों का चरित्र अभी तक निर्धारित नहीं हो पाया है. विभिन्न भाषा-भाषी महिलाये हैं, तो उनकी कुछ चारित्रिक विशेषताएं भी होनी चाहिए. नन्हे को सुनकर हँसी आई इसका अर्थ है कि हास्य मौजूद है नाटिका में.

आज सुबह स्वप्न में माँ-पापा व छोटे भाई को देखा, माँ आधुनिका लग रही थीं और दो छोटे-छोटे बच्चों को खिला रही थीं शायद नन्हे और उसकी ममेरी बहन को. एक छोटी सी बिल्ली को भी देखा. सुबह जल्दी उठना था सो सपना टूट गया. हिंदी व्याकरण इतना विस्तार से तो उसने पहले कभी नहीं पढ़ा, पढ़ाते-पढ़ाते स्वयं भी काफी सीख रही है. कुछ देर पूर्व वह पड़ोस में किसी काम से गयी थी, लौटते समय पूसी उछलती-कूदती सी उसके पीछे लग गयी. घर आकर भी उसके पैरों से लिपट कर कुछ मांग रही है. इस नन्हे और मूक प्राणी को वह कैसे समझाये कि मानवों की कठोर दुनिया में उसके प्यार का कोई मोल नहीं है.

जून ने बताया, राजधानी अब डिब्रूगढ़ तक आती है, उन्हें सम्भवतः माँ-पापा को लेने गोहाटी न जाना पड़े, छोटे भाई को टिकट बढ़ाने के लिए कह दिया है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगे. आज उनके विवाह की सालगिरह है. बहुत सारे फोन आ चुके हैं, माँ ने कहा, यात्रा में कष्ट तो होगा फिर भी वे आएंगे, सचमुच इतने सारे एक्सीडेंट की खबरें सुनकर तो यात्रा एक यातना ही लगती है, फिर उसी ईश्वर की ओर दृष्टि उठती है, वही रक्षा करेगा. सुबह ड्राइंग रूम की सफाई की, दोपहर को डाइनिंग रूम की, शाम को मित्रों के साथ विशेष चाय पी, जून ने सुबह सवेरे एक कार्ड दिया बेहद खूबसूरत और डेयरी मिल्क चाकलेट भी ढेर सारे प्यार के साथ. सुबह सभी कमेटी मेम्बर्स को फोन किये कल शाम को उनके यहाँ मीटिंग है.

 


Saturday, December 21, 2013

द अवेकनिंग ऑफ़ इंटेलिजेंस- जिद्धू कृष्णामूर्ति


The Nicholas Effect रीडर्स डाइजेस्ट में यह लेख पढकर आँखें भर आई हैं, एक सात साल के बच्चे ने मरकर सात मरते हुए लोगों को अपने अंगदान करके जीवन दिया. अमेरिकन लोग बहुत बहादुर होते हैं, बड़े दिल वाले ! RD सचमुच अनोखी पत्रिका है, दिल को हिलाकर रख देने वाली, मन के कोमल भावों को छूकर मधुर संगीत भर देने वाली. Dear Sunny नामक लेख भी बहुत अच्छा लगा. आज वर्षा थमी है पर बादल अब भी हैं. नन्हा रोज की तरह कम्प्यूटर क्लास गया है, जून के आने में थोड़ा वक्त है. आज सुबह उसने स्वीपर को नाराज कर दिया, नैनी भी कपड़े धोकर फैलाये बिना कहीं चली गयी है, पर इन लोगों को नाराज करना अच्छा नहीं, अपना मन ही परेशान हो जाता है. कल रात को उसे सिर दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी, जून की नींद खुली तो डिस्प्रीन दी, उसके बाद ही नींद आयी. और वह व्यर्थ ही खुश थी कि इस महीने सिर दर्द नहीं हुआ. क्लब में कल अन्ताक्षरी का आयोजन किया गया, नन्हा देखने गया साढ़े नौ बजे लौटा.

इस समय उसके मन की हालत कुछ अजीब सी है, परेशान है, हैरान है और समझ नहीं पा रही है, ऐसा क्यों है ? सुबह से दिन अच्छा खासा ही बीत रहा था. तीन बजे ‘बुनियाद’ देखा, बाद में भुट्टा खाते वक्त भी ठीक थी पर उसके बाद एक के बाद एक ऐसा कुछ न कुछ घटता गया कि...शायद जून की अस्वस्थता की कारण या बोरियत के कारण अथवा बगीचे की बिगड़ती हालत के कारण...हो सकता है हार्मोनल गड़बड़ी के कारण ही ऐसा हो या फिर शारीरिक श्रम न हो पाने के कारण. आज मौसम भी अच्छा है और बहुत दिनों से cycling भी नहीं की है..

पिछले दो दिन लिख नहीं सकी, नन्हे को कविता और फिर स्पीच की तयारी करने में कुछ वक्त गया और कुछ यूँ ही. कल सुबह J Krishnamurti की किताब The Awakening of Intelligence पढने में बीती, पढ़ते-पढ़ते दिमाग इतना ज्यादा confuse/ active हो जाता है , शायद इसे ही awakening of Intelligence कहते हैं. नन्हे को कल दो पुरस्कार मिले, पहले चित्रकला में भी मिला था. उसका नाम पुकारा गया तो उन्हें उस पर बहुत गर्व का अनुभव हो रहा था. कल कविता पाठ में उसने निर्णायिका की भूमिका निभाई. वापस आने में काफी देर हो गयी थी, देर से भोजन करके सोने गये तो नींद भी जल्दी कैसे आती.

“Order is love and order is virtue. Disorder is evil. Conflict brings disorder. Thought is memory and that is past. To live in present is true living.”- J Krishnamurti

Today at 10 am she is trying to live in present. Since morning she made two mistakes- one in not answering the phone other in speaking rudely(unnecessary making conflict) to plumber. Once she scolded Nanha but was not angry. She is observing herself and it makes some sense in routine work. Talked to friends. One friend’s family will come for lunch and yet she has not prepared the sweet dish, but still there is time.

पिछले दो दिन she was totally physical घर की सफाई में लगी रही, घूमना, लोगों से मिलना -जुलना और आज कुछ देर ध्यान किया, मन की ओर झाँका तो खुद-बखुद पेन और डायरी हाथ में आ गये. उस दिन क्लब में किसी ‘मैरी’ की डायरी पढ़ी कई बार लगा अरे, यह तो वह भी सोचती है. पिछले दो दिनों में तीन पत्र भी मिले, एक छोटी बहन का बड़ा सा खत, जिसमें उसने अपने कोर्ट जाने के अनुभव के बारे में लिखा है, दूसरा बड़ी भांजी का खत जो उसने वापस जाकर लिखा है, और एक पत्र माँ-पिता का. आज फिर दो जन लंच पर आएंगे, सुबह उसने निमन्त्रण देने के लिए फोन किया तो उससे पहले दिल की धडकन बढ़ गयी...लेकिन बाद में सामान्य हो गयी, शायद उसका भ्रम ही हो. कल उसका जन्मदिन है, जून इस बार कार्ड और चाकलेट पहले से ही ले आए हैं, ‘सपने’ का कैसेट भी. he is in love with her again ! पिछले दिनों उन्होंने काफी वक्त साथ-साथ गुजरा and they both enjoyed it ! नन्हा अभी-अभी पूछ कर गया है, आज उसे क्या-क्या काम करने हैं, उस दिन पहली बार उसने ‘मैगी’ खुद बनाई और दो बार mango shake भी बना चुका है. उसे अभी कस्टर्ड बनाना है. 


Wednesday, September 25, 2013

कबीर के दोहे


केवल चार दिन रह गये हैं, माँ-पापा को यहाँ आने में, उसे अभी सफाई का बहुत सा काम करना है. लिखना शुरू करते ही मन में आया कि यही सही होता इस वक्त वह कोई काम कर रही होती क्यों कि इन सामान्य बातों को लिखने से कोई फायदा नहीं, पर कुछ देर थककर/ थमकर आराम से बैठकर दिल को टटोलना भी तो आवश्यक है. दिल में क्या उमड़ रहा है, कहीं कोई रोष तो नहीं या शिकायत किसी के प्रति, कोई उलझन या परेशानी.. और अगर यह सब नहीं तो क्या दिल खुश है ? पर दिल की ख़ुशी को इतनी महत्ता ही क्यों दी जाये ? अपना कर्त्तव्य निभाते हुए यानि रोज के नियत काम करते हुए जो समझ आये जैसे स्थिति आये उसे वैसे ही लिया जाये. सुबह  बापू को सुना अब उनकी बातें समझ में आने लगी हैं, कहते हैं सत्संग मनुष्य को मालामाल कर देता है, पर सत्संग से हटते ही मनुष्य फिर कंगाल हो जाता है. कंगाल मनुष्य दुनिया को क्या दे सकता है, ईश्वर में विश्वास हमें अच्छाई में विश्वास सिखाता है. आध्यात्मिकता की पहली सीढ़ी नैतिकता है, सो चाहे उसे अपने मन के भावों को परखना हो और प्रतिदिन एक पन्ने को भरना हो, सच्ची निष्ठा के साथ करना है.

दस बजे हैं, उसका सिर भारी है, कल रात वर्षा हुई, आवाज से उसकी नींद खुल गयी और फिर आई भी तो एक लम्बा स्वप्न लिए, सुबह उठी तो मन ताजा नहीं लग रहा था. आज बहुत दिनों बाद नन्हे का स्कूल खुला है, कल जून गोहाटी जा रहे हैं, माँ-पापा को लाने. मन में एक के बाद विचार आ रहे हैं, पर पकड़ में नहीं आते. उसने जब से आँख के लिए होमियोपथिक दवा लेना शुरू किया है पानी आना कम हो गया है. जिन्दगी तो हर हाल में गुजर जाएगी, देखना है, खुद अपनी ही नजर में शर्मिंदा तो नहीं !

जून का फोन आखिर पौने आठ बजे आ ही गया, कल रात ग्यारह बजे उनका फोन आया था, पर दिन भर उन्हें समय नहीं मिल पाया होगा. आज उनकी पुरानी डाइनिंग टेबल चली गयी, जाते समय मन भर आया, किते वर्ष वह मेज उनके जीवन का अंग रही थी, अब किसी और परिवार की बातें सुनेगी. नन्हे के जाने के बाद उसने रजाई का कवर सिला. दोपहर को फिर ‘स्वामी रामतीर्थ’ की किताब से एक अध्याय पढ़ा, पत्रों के जवाब दिए, शाम को नन्हे को पढ़ाना और फिर टीवी...

And she has decided to write a beautiful prose piece describing a cold rainy day. It is raining continuously day and night since last three days. It stops for a while and then again starts. Nanha and herself had to wear woolen and she took out for jun, from the big trunk.

 सुबह एक बार नींद खुली, फिर सो गयी और सवा छह बजे आँख खुली, कल से सबको जल्दी उठना होगा, अगले एक महीने तक उनका घर भरा-भरा रहेगा. पिछले दिनों उसने कोई अच्छी पुस्तक नहीं पढ़ी, शायद यही कारण है कि शब्दों की कमी महसूस होती है, यूँही रोजमर्रा काम में आने वाले शब्दों से काम चलाना पड़ता है. कबीर के दोहे भी कई दिनों से नहीं दोहराए, सो मन ऐसे रहता है जैसे जल्दी में हो. नन्हे को सुबह तैयार होने में यूँही झुझलाहट का सामना करना पड़ता है और तना-तना सा मन लिए वह खुद भी अपराध भाव से ग्रसित रहती है. उसे लगता है वह समय का सही उपयोग नहीं कर पा रही है, समय के सही उपयोग की उसकी परिभाषा भी स्वयं को स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाती. खैर आज शाम से इन सारी बातों का समाधान होने वाला है. वह व्यस्त रहेगी तो समय व्यर्थ जा रहा है यह भाव मन में आयेगा ही नहीं. लेकिन अभी मात्र साढ़े ग्यारह बजे हैं और शाम साढ़े छह बजे तक सात घंटे हैं जिन्हें उसे अच्छी तरह गुजारना है. हर पल का आनन्द उठाते हुए, क्योंकि ये साथ घंटे तो लौटकर आने वाले नहीं न !





Monday, July 29, 2013

अनुभव-एक यादगार फिल्म


आज मन शांत है, कल की उदासी के बादल छंट गये हैं, हर रात के बाद सबेरा आता है. लेकिन जब कोई परेशान या दुखी हो तो यह बात भूल जाता है. कल शाम उसने माँ-पापा से बात की, बहुत अच्छा लगा, वाकई उन्होंने बहुत असर नहीं लिया है चोरी की इस घटना का, अब वह भी सुख-दुःख, हानि-लाभ में समभाव रखने का प्रयत्न करेगी. जून कल कोलकाता जा रहे हैं, वहाँ से मद्रास जायेंगे. मौसम इस नये साल में अच्छा रहा है अब तक, खिली हुई धूप, चिड़ियों और दूसरे कई पंछियों की अलग-अलग आवाजों के बीच-बीच में गाय के रम्भाने की आवाज और लॉन के खिले हुए फूलों के बीच बैठकर लिखना उसे अच्छा  लग रहा है. दोपहर को दो लडकियाँ हिंदी पढने आ गयीं, अच्छा लगा, उन्हें ‘प्रबोध’ से पढ़ा रही है. शाम को जून और वह टहलने गये तो मार्च में की जाने वाली यात्रा के बारे में बात करते रहे. इस बार उनका जाना ज्यादा खल रहा है, यह उनके प्रति प्रेम की वजह से है या उनके बिना अकेले रहने के भय के कारण, पता नहीं. शायद दोनों के कारण, भय सिर्फ अकेलेपन का है और किसी बात से उसे डर नहीं लगता. उसने सोचा, अकेलेपन का इलाज है टीवी और उसकी परिचित महिलाएं, किसी के भी पास जा सकती है, नन्हे के स्कूल से आ जाने के बाद तो पढ़ते-पढाते, खेलते ही समय गुजर जायेगा.
जून के जाने के बाद वह कुछ देर एक पत्रिका पढ़ती रही, स्वेटर बनाया, शाम को बगीचे में कुछ देर काम किया. देर शाम को एक मित्र परिवार आ गया. कल क्लब मीट का अंतिम दिन है, वे लोग दोपहर लंच के लिए जायेंगे.
आज जून से फोन पर बात हो गयी, उसकी बैक डोर पड़ोसिन ने जब उसे बुलाया तो मन ख़ुशी से भर गया, पूरी लेन में सिर्फ उनके यहाँ ‘पी एंड टी’ फोन है, और फिर उनकी आवाज आयी, वह ठीक से मद्रास पहुंच गये. उसने सोचा है इन दिनों का उपयोग घर की अच्छी तरह सफाई करने में करेगी, मच्छरदानी धुलवाई और रजाइयों के कवर भी, तीनो अलमारियां व सारी दराजें कल से साफ करेगी. फ़िलहाल तो खतों के जवाब देने हैं.
आज जून को गये चौथा दिन है, दोपहर को पीटीवी पर उसने एक नया धारावाहिक देखा, ज्यादा अच्छा नहीं था पर पता नहीं क्यों शायद पिछले जन्म की कोई याद है जो उसे इन किरदारों से जोडती है. नन्हा आज देर से आया, उसकी असमिया क्लास थी. कल रात उसका गृह कार्य खत्म होने में नौ बज गये, तब उन्होंने खाना खाया, जून होते तो सब काम समय पर हुआ होता.

सुबह से बारिश हो रही है, उसने सोचा, मद्रास में तो धूप निकली होगी, शाम को वे क्लब गये लाइब्रेरी, वहाँ बीहू के त्यौहार की तयारी शुरू हो गयी है. लाइब्रेरी में उसने धर्मयुग पढ़ा, उसे पढना हमेशा ही अच्छा लगता है. आदर्शोन्मुख लेख, मार्मिक कहानियाँ और सीधी सारी कविताएँ, चिन्तन या दर्शन पर लेख सभी कुछ प्रेरणास्पद है, लेकिन कुछ देर पढ़कर महसूस कर लेने से क्या कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती है. दुनिया में करने को कितना कुछ है पर इसके लिए चाहिए दृढ इच्छा शक्ति, लगन और सेवा की भावना. वे लोग किसी और ही मिट्टी के बने होते हैं, जो कुछ करके इस दुनिया से जाते हैं. वह इन विचारों में खोयी थी कि नन्हे ने कहा असमिया आंटी ने कहा है की ‘एल’ देखे, यानि टीवी का एल चैनल और विचारों का तारतम्य टूट सा गया है.

‘फिर कहीं कोई फूल खिला चाहत न कहो इसको
फिर कहीं कोई दीप जला मंजिल न कहो इसको’

आज वर्षों बाद अनुभव देखी, ‘पराग’ में एक बार अनुभव, सारा आकाश, भुवन शोम जैसी फिल्मों के नाम पढ़े थे, तभी से मन में एक छोटी सी इच्छा थी इसे देखने की. संजीव कुमार और तनुजा की यह फिल्म उसे गहरे तक छू गयी है. जून होते तो साथ-साथ वे इसे देखते. उसने डायरी उठा ली मन के उन भावों को उतारने के लिए जो इस फिल्म ने उभार दिए हैं, ढेर सा प्यार और बहुत गहरा विश्वास, किसी के इतने करीब आने का अहसास कि गुजर सके न दरम्यां से हवा  !

जब दिल के नजदीक किसी कली के चटकने की आवाज आयी
और दरख्त से कोई पत्ता हवा में लहराता हुआ घास से टकराया
 ओस की बूंद किरन से ले गर्माहट बादल बन गयी
 मन्दिर में जलता दिया बुझने से पहले फड़फड़ाया  
 शाम से रात होने में जब एक पल बाकी था
हर उस घड़ी एक याद उसके साथ थी
गहरी धड़कन जो विश्वास में सम रहती है
शांत बहती नदी की धारा की तरह
है आँखों में चमक दोस्ती की
जो सम्भालती है हर ऊँचे नीचे रस्ते और ऊबड़ खाबड़ जमीन पर कदमों को
तुम जीवन की आस ही नहीं, उसका सत्व हो ! जीवन का तत्व !







Saturday, July 27, 2013

चोर चोर


आज सुबह सफाई करने-कराने में बीती, कल ही उसने स्वीपर से कह दिया था, आज जाला साफ करना है, फौरन मान गया, नये साल में शायद उसने भी पक्का इरादा किया होगा कि... नूना ने तो अभी तक एक भी पक्का इरादा नहीं किया, जानती है सारे टूट ही जाते हैं चाहे कितने भी पक्के हों. दोपहर को  उसकी पुरानी पड़ोसिन आ गयी, सारा वक्त वे बातें करते रहे, थोड़ी थकान तो स्वाभाविक थी. नन्हे को आज सोशल के नम्बर भी मिल गये, उसने मैडम से कहकर अपने छह नम्बर कम करवाए, उसकी टीचर भी क्या सोचती होंगी. शेष सभी विषयों में मार्क्स कल ही मिल गये थे. नन्हे खेलने गया तो वह जून की लायी चिट्ठियां और कार्ड्स देखने लगी, इस वर्ष सोलह कार्ड्स आ चुके हैं अभी तक. छोटे भाई की चिट्ठी पढ़ी तो जैसे विश्वास ही नहीं हुआ या कहें खबर की गम्भीरता को उस वक्त महसूस नहीं किया, पर शाम होते-होते मन ने पूरी तरह उस खबर को जो दुखद थी आत्मसात कर लिया और बाद में ‘नमक हराम’ फिल्म देखते समय भी या क्लब में मैच देखते वक्त भी वही बात याद आती रही. क्लब में साढ़े आठ बजे चाय मिली जिसमें दक्षिण भारतीय व्यंजन थे, ठंड कल से भी ज्यादा थी. उसके सिर में शाम से होता दर्द बढ़ गया, जो घर आकर दवा लेकर सोने पर ही गया. जून और नन्हा भी बिना कुछ खाए सो गये. रात को सपने में उसने दीदी और बच्चों को भी देखा, वही छोटे-छोटे बच्चे.
जिस डायरी में वह इस वर्ष लिख रही है, जून ने दी है उसकी ‘आयल’ से मिली अपनी डायरी, वह उसे बेहद चाहते हैं इसका छोटा सा सबूत है यह, और उसके लिए वह क्या हैं इसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है. उनके बिना जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है. परसों शाम दफ्तर से आकर जब उन्होंने बताया मद्रास की उनकी ट्रेनिंग पक्की हो गयी है तो मन कैसे घायल हो गया था, उनके बिना इस महीने उसे और नन्हे को दो बार रहना होगा, पहले आठ दिन और बाद में दस दिन, पर आज उसकी आँखें किसी और वजह से ही नम हैं. छोटे भाई ने लिखा है, माँ-पापा की अनुपस्थिति में घर में चोरी हो गई. हजारों का सामान गया, बात हजारों की नहीं है चोरी हुई यही सबसे दुखद बात है. आज भी सुबह से मन उदास है, माँ पापा के दुःख में शामिल, उन्हें मिलने का उन्हें खुश देखने का मन होता है. भाई ने लिखा है वे लोग स्वस्थ व प्रसन्न हैं, उसे उन पर गर्व है. उन्हें कुछ उपहार भेजने का मन है, नये वर्ष में उसकी, जून व नन्हे की तरफ से स्नेह सहित एक उपहार. भाई ने लिखे है, कपड़े, गहने, साइकिल, बिस्तर, ट्रांजिस्टर सभी कुछ चला गया. वे चोर जो भी हों कभी खुश नहीं रहेगें, ईश्वर उन्हें उनके किये की सजा जरुर देगा. एक खत व एक चेक भाई के नाम भेजा है, पता नहीं वे लोग इस बात को किस रूप में लें पर उसे थोड़ा संतोष जरुर हुआ है. शाम को वे फोन करने भी जायेंगे. आज उसे शिद्दत से इस बात का अहसास हो रहा है कि वह उनसे अलग नहीं है.


Wednesday, July 3, 2013

क्लोज़अप अन्ताक्षरी



ऐसा लगता है अब से उसे लिखने का वक्त दोपहर को ही मिलेगा, सुबहें स्टार टीवी, जी टीवी और पी टीवी के कारण कितनी व्यस्त हो गयी हैं. समय का पता ही नहीं चलता कहाँ उड़ जाता है. इस समय उसका दिल टीवी में है पर वह जानती है, यह ठीक नहीं है, कोई अपने काम काज ही भुला बैठे किसी टीवी कार्यक्रम के कारण, यहाँ तक कि  नन्हा भी इस छोटी सी मगर बेहद जरूरी बात को समझता है, जून भी कुछ ज्यादा उत्सुक नहीं दीखते, बस वही है जिसके पास कुछ ज्यादा समय है.

आज शनिवार है, ग्यारह बज गये हैं, जून अभी तक नहीं आए हैं. उसने घर की साप्ताहिक सफाई करवाई, अभी कुछ देर पहले स्नान किया, कुछ देर प्रार्थना की और अब कल का अख़बार व डायरी लेकर बैठी है. कल शाम टीवी के साथ थी सो वे अख़बार नहीं पढ़ सके, शाम को एक मित्र परिवार आया और उन्होंने क्लोजअप अन्ताक्षरी देखी, अच्छा लगा यह कार्यक्रम. पर आज सुबह से उसने टीवी नहीं चलाया है, क्योंकि शनिवार है और शाम को वे देर तक देखने ही वाले हैं इसीलिए.

अगस्त का पहला दिन बेहद गर्म है, बिना पंखे के दो मिनट भी रहने से शरीर पसीने से भीग जाता है. इस वर्ष गर्मी की शुरुआत काफी देर से हुई है. ग्यारह बजने बजने को हैं, उसने लंच बना लिया है, जून आज थर्मस में चाय ले गये हैं, उनके ऑफिस में टी बॉय को लेकर कुछ झमेला चल रहा है, परसों शाम को जब वे मित्र की प्रतीक्षा कर रहे थे उन्होंने वे सब बातें उसे बतायीं.

और आज ग्यारह अगस्त आ गया, मौसम आज भीगा-भीगा सा है. कल रात से वर्षा हो रही है, पिछले दिनों लगभग रोज ही लिखने का ख्याल मन में आया पर शुरू के तीन-चार दिन सफाई में निकल गये, फिर उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं था, एक दिन सुबह दो पड़ोसिनें मिलने आ गयीं. कल वे तिनसुकिया गये, वह कुछ कपड़े खरीदने की सोच रह थी, एक नीली टी शर्ट जून के लिए, नाईट सूट नन्हे के लिए और गाउन, सलवार कमीज अपने लिए. पर जून की पसंद की टी शर्ट नहीं मिली, न ही गुसी की नाईट ड्रेस नन्हे के लिए. कल उसने इतने वर्षों में पहली बार फोन से घर बात की. आज सुबह से ही मन शांत है, उठते ही ‘जागरण’ सुना, जागरण के नाम से ही दीदी की याद आ जाती है. उन्हें खत भी लिखना है. इन्सान को आईने की तरह होना चाहिए, आईना सब देखता है और दिखाता है पर कुछ पकड़ता नहीं, संसार में रहकर भी संसार से अलग. आज शाम को एक मित्र परिवार भी आ रहा है, उनसे मिलने के लिए भी शांत होना जरूरी है, पता नहीं वे किस मूड में होंगे, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें खुशियाँ दे. नन्हे का आज चौथा यूनिट टेस्ट है, परसों शाम वे किन्ही मित्र के यहाँ थे तो वह ठीक महसूस नहीं कर रहा था, शायद बच्चे घर की महक को ज्यादा महसूस कर पाते हों. कल सुबह उठा तो ठीक था.


Tuesday, June 4, 2013

बेबी'ज डे आउट


कल रात समाचारों में सुना कि भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्री मोरार जी देसाई का निधन हो गया, जून का ऑफिस आज बंद है. परसों उन्हें घर जाना है, सो आज ही तैयारी कर लेंगे. एक वर्ष बाद यात्रा करने का विचार ही मन को आनन्दित कर रहा है. नन्हे की वार्षिक परीक्षा ठीक चल रही है, आज तीसरा पेपर है. उसने घड़ी की ओर देखा, लिखित परीक्षा हो चुकी होगी, मौखिक चल रही होगी. उसका रोल नम्बर देर से आता है, सो वह बैठे-बैठे कल की तरह बोर हो रहा होगा या मन ही मन “ब्रेकफास्ट सॉंग” याद कर रहा हो. कल दिन भर गर्मी थी पर शाम होते होते बादल इकट्ठे होने शुरू हो गये, रात भर पानी बरसता रहा, वे दूसरे कमरे में सोये थे पर उमस के कारण नींद ठीक से नहीं आयी, जून उठते ही बोले, वह रात भर नहीं सो पाए, नन्हा भी कैसे चुप रहता बोला, मुझे रात भर ठंड लगती रही. आज वे अपने कमरे में ही सोयेंगे, खुला हवादार कमरा है यह. मदर टेरेसा पर डेसमंड डेजी की किताब पढ़कर उसके मन में भी कुछ करने की प्रेरणा जगी है, रात को सोते समय ये विचार स्पष्ट होते हैं पर दिन भर के कामों में जाने कहाँ गम हो जाते हैं. फिर भी घर से आकर छोटी सी ही सही शुरुआत अवश्य करेगी.

वे यात्रा से लौट आये हैं, इस बार बनारस पहले से कहीं ज्यादा अस्वच्छ लगा. उस घर में लोग भी बहुत हो गये हैं, गर्मी भी काफी थी सो वे तीनों ही वहाँ परेशान से रहे, आने से एक दिन पहले नौका विहार का आनन्द लिया जो सदा याद रहेगा, फोटोग्राफ भी अच्छे आये हैं, काशी विश्वनाथ मन्दिर भी देखा जो बहुत प्राचीन है और बहुत विशाल भी, इसी कारण तो बनारस अपनी अस्वच्छता तथा भीड़भाड़ के बावजूद पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. वे वापस आए तो उसकी पुरानी पड़ोसन बस स्टैंड पर लेने आई थी, उसका स्वागत दिल को छू गया, वह  कल कोलकाता जा रही है इलाज कराने, इंशाल्लाह वह बिलकुल ठीक हो जाये और अगले साल तक उसकी मनोकामना पूर्ण हो. कल दोपहर वह अपनी बंगाली सखी के घर गयी, वे लोग सदा के लिए दिल्ली जा रहे हैं, पहले-पहल यह खबर सुनकर वह बहुत उदास हुई थी, पर अब मन संभल गया है.

नन्हे की टेनिस की कोचिंग चल रही है, सुबह पांच बजे जाता है और दोपहर बाद भी. स्कूल बंद है सो समय ही समय है उसके पास. कल वह दोपहर को अपना एक कुरता काढ़ने में व्यस्त थी, शाम को लाइब्रेरी गये वे. आज सुबह समय निकाल कर बेडरूम की दोनों अलमारियां साफ़ कीं. दोपहर को गेस्टरूम की करने का इरादा है, फिर रह जाती है स्टोर व  किचन की सफाई तथा डाइनिंग रूम के शेल्फ की सफाई, इतवार तक पूरा घर स्वच्छ दिखेगा. नन्हा इस वक्त पडोस के मित्र के यहाँ गया है.


आज इतवार है, सुबह नाश्ता करके दोनों चले गये, नन्हा अपनी आर्ट क्लास में और जून कार को गैराज ले गये हैं. कल शाम वे उन्हें अपने दफ्तर ले गये नन्हे को कम्प्यूटर गेम खिलाने. आज मौसम गर्म है, मई शुरू हो गया है पर कल उन्होंने पहली बार एसी चलाया. शाम को जब टहलने गये तो गेस्ट हॉउस से घर तक का रास्ता बोझिल लगने लगा, जैसे-जैसे गर्मियां बढ़ती जाएँगी शामों को टहलना मुश्किल होगा, फिर रात्रि भ्रमण या प्रातः भ्रमण ही उचित होगा. नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण सुबह जल्दी उठने की आदत पड़ती ही जा रही है. कल शाम वे ‘बेबी’ज डे आउट’ का कैसेट भी लाये, अच्छी फिल्म है, छोटे से बच्चे का अभिनय काबिले तारीफ है.

Monday, April 29, 2013

बिटिया का जन्म



शनिवार को क्या व्यस्तता थी याद नहीं आ रहा और कल यानि रविवार को तो लिखने का समय होता ही नहीं. हर पल तो जून के साथ बीतता है न. शनि की दोपहर को वे एक मित्र के यहाँ गए, कैरम खेला. शाम को क्लब, जून ने "क्विज प्रतियोगिता" में भाग लिया था, उनकी टीम तीसरे नम्बर पर रही, इनाम में उन्हें लाल रंग की सुंदर सी बड़ी ट्रे मिली है. इतवार शाम उसने एक सखी (जिसको नौवां महीना चल रहा है) तथा उसके सास-ससुर को खाने पर बुलाया, उसके पति देश से बाहर गए हैं, उनके आने में अभी एक महीना है, उसे लगा, उसकी सखी बहादुर है और समझदार भी. धीरे-धीरे पता चल रहा है कि उसे अपने बारे में कितनी खुशफहमियां हैं...खैर ये खुशफहमियां और गलतफहमियाँ तो हरेक को होती हैं. कल शाम को लेखक ‘कुबेरनाथ राय’ का एक ऐसा लेख पढ़ा जिसमें बातें उसके मन की ही थीं. कितने सीधे-सरल परन्तु ओजपूर्ण शब्दों में देशप्रेम का भाव जगाने में सफल हुए हैं, देशप्रेम एक संकुचित भावना नहीं है, एक विशाल, उदार भावना है. आज पत्र लिखने का दिन भी है. बादलों के कारण वे आज सुबह देर से उठे, आज नन्हे का अवकाश है, सो देर से उठने से कोई विशेष परेशानी नहीं हुई.

  पिछले दो दिन फिर व्यस्तता में बीते, दोनों दिन सफाई में ही. किचन, स्टोर और किताबों की शेल्फ कितने अच्छे लग रहे हैं और स्वच्छता=सौंदर्य=अच्छाई. आज वही रोज के कार्य किये. कल बुआ जी का एक खत मिला और माँ-पिताजी का भी.बुआ जी के पत्र में एक बात मन को छू गयी, अपने ननदोई की मृत्यु पर उन्होंने लिखा है-

“जीवन से ही सब कुछ मिला है और मिल सकता है, किन्तु सब कुछ देकर भी जीवन नहीं मिल सकता”.

 कल शाम को वे एक सोशल विजिट पर गए, उसने बहुत दिनों बाद तांत की कोक कलर की साड़ी पहनी, अपना-आप अच्छा लग रहा था, आईना उस दिन से उसका मित्र हो गया है. परसों लाइब्रेरी से दो किताबें लायी थी, मन हो रहा है एक कहानी पढ़े और मन को किसी उच्च धरातल पर ले जाये, फिर तो भोजन की तैयारी करनी है. जून को आने में आधा घंटा तो है ही.
   पता नहीं क्यों आजकल वह बहुत जल्दी थक जाती है. कल रात टहलने गए, दो ही चक्करों में थक गयी, स्टैमिना कम हो गया है या आलस्य के कारण खुद को इतना कमजोर बना लिया है. मौसम इतना गर्म भी नहीं था, पर रात को गेस्ट रूम में बिना एसी के सोने की उनकी योजना असफल हो गयी, नन्हे ने एक सूत्र निकाला है, “जब वे सर्दियाँ खत्म होने पर एसी रूम में पहली बार सोते हैं तो बहुत अच्छा लगता है, पर छोड़ते समय बहुत कठिनाई होती है”

आज सुबह-सुबह ही पता चला कि उसकी सखी ने कल रात दो बजे बेटी को जन्म दिया है. वह क्या सोच रही होगी अपने पति की अनुपस्थिति पर इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. शाम को वे अस्पताल जायेंगे, जून पहले ही हो आए हैं. सुबह धूप तेज थी अब जाने कहाँ से बदली आ गयी है. आज ओणम है, और नन्हे के स्कूल में कहानी सुनाने की प्रतियोगिता भी, कल शाम उसे अभ्यास कराते समय ज्ञात हुआ कि अब वह बड़ा हो गया है और अपनी सुदृढ़ राय रखता है, किसी भी विषय पर, उसे बहलाना आसान नहीं है. आज दोपहर के भोजन में वह जून की पसंद पर इडली बना रही है. दूध वाले सरदार जी ने इस बार भी पनीर के लिए उतना ही परेशान किया जितना नन्हे के जन्मदिन पर किया था, इनका नाम भुल्लकड़  सरदार रख देना चाहिए. कल सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ गयी हफ्तों बाद, उसके बेटे की आँखें लाल थीं, घर आते-आते उसे भी लगने लगा कि उसकी आँख में दर्द हो रहा है, जाने क्यों मनोवैज्ञानिक असर बहुत ज्यादा होता है वस्तुओं का उस पर. आज भारत-पाकिस्तान का मैच है दोपहर बाद, जिसमें भारत की विजय की ज्यादा संभावना है.










Monday, February 20, 2012

नए घर में



कल शाम ही वे अपने घर आ गए थे. घर ! कितना प्रिय लगता है यह शब्द, जब इसके साथ अपना जुड़ा हो. दोपहर को ही जून का काम खत्म हो गया था. सारी सुबह नूना प्रेमचन्द की पुस्तक पढ़ती रही. दो सखियों की कहानी बहुत अच्छी लगी. कुछ देर मेजबान महिला की बातें सुनती रही, किस तरह उसके माता-पिता के देहांत के बाद मामा के यहाँ रहना पड़ा. आज ही उस नए घर की सफाई भी हो जायेगी जो उनका नया बसेरा बनने वाला है और एक दो दिनों में वे वहाँ चले जायेंगे.
शुक्रवार को जून दिन भर के लिये बाहर गया था, वह सामने वाले घर में आयी नन्ही बिट्टू से खेलने, दोपहर बाद लौटी तो वह भी उसके साथ चली आयी, दोनों सो गए. तभी उठे जब जून ने कालबेल बजाई. शनिवार को उन्होंने जीप के द्वारा कई चक्कर लगा कर सारा सामान नए घर में शिफ्ट किया, बड़ा सामान ट्रक से पहले ही आ गया था. शाम तक बहुत थक गए थे, पर करीने से सजा कमरा देखा तो सारी थकान उतर गयी.