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Tuesday, February 18, 2014

राजस्थानी रजाई


आज उसके लिए एक अहम् दिन है. लेडीज क्लब की प्रेसिडेंट और सभी मेम्बर्स शाम को उनके यहाँ मीटिंग के लिए आने वाले हैं. planning तो की है पर सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा थोड़ा शक है. पहली बार इस तरह का अनुभव होगा. जीवन के अनेक अनुभवों में से एक ! कम्पनी के मुख्य अधिकारी की पत्नी भी जो मृदुभाषिणी हैं, आएँगी. आज सुबह के कार्यों में से न तो व्यायाम किया ( जो दिन भर व्यस्त रहने में अपने आप ही होने वाला है) न ध्यान, और ध्यान टिकता भी कैसे, हर वक्त तो मन को यह करना है, वह करना है के सिगनल सुनाई पड़ते, हर वक्त इधर-उधर के कार्यों की इतनी फ़िक्र लगी रहती है, स्थिर मन हो ईश्वर का स्मरण करने का सुअवसर कभी हाथ नहीं आता. दीदी के खत में लिखा है कि इस जन्म में तो ईश्वर सान्निध्य मिलना दुर्लभ है, कुछ कर लें. न करें तो अधूरापन, यह भावना स्थिर होकर बैठने नहीं देती, राजयोग और कर्मयोग में तो कर्मों के द्वारा भी ईश्वर प्राप्ति का मार्ग सुझाया गया है. वे क्षत्रिय वंश के हैं फिर ब्राह्मणों की तरह घंटों ध्यान में नहीं बैठ सकते, लेकिन हर छोटे-बड़े संकट में ईश्वर का स्मरण झट हो आता है, लगता है वह कहीं आस-पास ही है, उसके स्नेह भरे हाथ का स्पर्श, उसके स्नेह की गर्माहट महसूस होती है, लगता है दुनिया का कोई भी संकट आ जाये सह लेंगे क्यों कि ईश्वर उनका रक्षक साथ है.

आज बंद है, अल्फ़ा ने राज्य बंद घोषित किया था जो पूरी तरह सफल रहा. सुबह से एक भी गाड़ी जाती हुई नहीं दिखी. कल रात नींद गहरी नहीं थी, दिन भर की थकावट, फिर शाम का कार्यक्रम, जो कमी रह गयी थी वह याद आ रही थी, जो तारीफ मिली वह नहीं. खैर, समय के साथ इस मीटिंग की सुखद स्मृतियाँ ही साथ रह जाएँगी. कल उसकी पड़ोसिन ने सहायता की अच्छा लगा, उसने अपनी छात्रा को भी गाजर का हलवा और सैंडविच खिलाये, उसने तारीफ की उसी पर विश्वास हुआ. दोपहर को कुशन कवर सिले. सेक्रेटरी ने हसबैंड नाइट के लिए सभी एरिया coordinators को फोन करने कहा है, कम से कम एक घंटा लगेगा. क्लब के इस काम में कम से कम फोन से बात करने में तो एक्सपर्ट हो जाएगी. आज धूप मद्धिम सी है, उत्तर भारत का कोहरा यहाँ तक आ गया है. नन्हा मित्रों के साथ खेल रहा है और जून उस पेपर को पढ़ रहे हैं जिसे उन्हें फरवरी में present करना है. डिपार्टमेंट में उनका प्रेजेंटेशन संतोष जनक नहीं रहा था पर पहले इस तरह तैयारी भी नहीं की थी, उसने तो स्वयं को जिन्दगी के मैदान में loser मान ही लिया है पर नन्हे और जून को ऐसा नहीं करने देगी.

जून आज गोहाटी गये हैं, नाईट सुपर की ठंड से बचने के लिए राजस्थानी रजाई ले गये हैं. शाम को उन्हें पडोस से आई मूली के परांठे बना कर दिए, बहुत कोमल मूली थी. आज सुबह भी कोहरा काफी था और आज वे सारे काम भी हो गये जिनके लिये सिविल डिपार्टमेंट में कहा था, स्टोर में कोट हैंगर लगाना, झूले और सिस्टर्न पर पेंट का काम. एक मित्र के यहाँ से फोल्डिंग कॉट भी आ गयी. आज हिंदी कोर्स की पहली पुस्तक पढनी शुरू की है, पहले कोर्स में कुल बीस इकाई हैं, बहुत विस्तृत कोर्स है.

आज इतवार है, दिन भर व्यस्तता में गुजरा. इस समय रात्रि के दस बजने वाले हैं, जून के फोन दिन में तीन बार आए पर अभी तक माँ-पिता के गोहाटी आने की खबर नहीं मिली. राजधानी का इंजन बोगाई गाँव के पास खराब हो गया था. कल सुबह उठते ही जून का फोन आएगा, कल शाम को वे सब आ भी जायेंगे, सचमुच उन्हें कष्ट तो हुआ है, यात्रा कभी-कभी ही आरामदेह होती है.

 


Sunday, October 13, 2013

सिक्किम की सैर


फिर एक अन्तराल.. आजकल सुबह रजाई से निकलने का मन नहीं होता, ठंड बढ़ गयी है. नन्हा भी आजकल उठने में आनाकानी करता है, यूँ तो वह हर मौसम में करता है. ‘जागरण’ भी नहीं देख पाती और कोई अच्छी किताब भी नहीं पढ़ी है. कविता भी नहीं लिखी. पढ़ना-लिखना आजकल  बस अख़बार या इक्का-दुक्का पत्रिकाएँ पढ़ने तक ही सीमित रह गया है. क्लब मीट आने वाली है, पत्रिका के लिए मांगें तो प्रेरित होकर वह झट लिख सकती है, उसने सोचा ही था कि एक फोन आया क्लब की कमेटी के एक सदस्य का. इसी महीने वे लोग दार्जिलिंग जाने की बात सोच रहे हैं. साल का अंतिम महीना शुरू हुए पांच दिन बीत गये हैं, कुछ हफ्तों बाद नया साल आ जायेगा और इसी तरह साल दर साल गुजरते जायेंगे, नन्हा बड़ा हो जायेगा और...

छोटी बहन और मंझले भाई के पत्र आए हैं, जिनमें जवाब देने लायक बाते भी हैं. बहन ने अपनी जिस समस्या का जिक्र किया है वह उसके साथ भी है हूबहू वही. भाई ने अपने तबादले का जिक्र किया है. श्रीनगर में हुए बम विस्फोट में फारुख अब्दुल्ला बाल-बाल बचे, शांति और विश्वास (जो लोगों की शक्ति पर निर्भर है) की जीत होगी और हिंसा चाहे कितना भयानक रूप धारण कर ले एक दिन उसे मरना होगा क्योंकि अमन पसंद आदमी की जिन्दगी में उसकी कोई जगह नहीं. जून और नन्हा British comedy देखने के लिए तैयार हैं और वह भी कुछ देर पहले शुरू हुए सिर के दर्द को भूलकर बस हँसना चाहती है.

जून ने फोन पर बताया, २२ तारीख को उनकी सीट रिजर्व हो गयी है यानि वे दार्जिलिंग और सिक्किम जा ही रहे हैं. एक सहयात्री परिवार भी उनके साथ जा रहा है. बहुत दिनों बाद डीडी पर कवि सम्मेलन का एक अंश सुना ‘अंगड़ाई न लो चैत का आलस्य बिखर जायेगा’. अच्छी कविता थी. किसी सखी से एक किताब लायी थी, अभी शुरू भी नहीं की है, उसमें रूचि ही खत्म हो गयी है. वह बातें व्यवहारिक नहीं लगतीं या कहें कि उन पर चलना बहुत मुश्किल है. आजकल उसका अध्यात्मिक ग्राफ निचली तरफ जा रहा है फिर एक दिन कोई झटका लगेगा और ऊपर की ओर चढ़ना शुरू होगा. कभी रुककर, थम कर आराम से बैठकर अंतर में झांके तो पता चले कि वहाँ कितना सूनापन भर गया है. लेकिन दुनियादारी के प्रलोभनों में पड़ा मन कहीं विश्राम लेना ही नहीं चाहता, हर वक्त किसी न किसी उधेड़बुन में लगा ही रहता है तो भला जरूरत ही कहाँ महसूस होगी उसे तारनहार की. एक तरह से यह भी ठीक है, हर वक्त काम में लगे रहना, खाली न बैठना भी राजयोग का एक लक्ष्ण है, और उसे काम करना, करते-करते थक जाना अच्छा लगता है. जैसे कल टीटी की wall प्रैक्टिस करते समय महसूस हो रहा था.

पीटीवी पर एक आर्टिस्ट नजीर के बनाये खूबसूरत लैंडस्केप देखे, जिनसे नजरें हटाना मुश्किल था, इतने सुंदर चित्र भी बनाये जा सकते हैं, इन्सान भी एक जादूगर से कम नहीं. आज सुबह समाचर सुनते वक्त ख्याल आया कि कहीं अचानक वह मर जाये तो इन डायरियों का क्या होगा, जून इन्हें संभाल कर तो रखेंगे या फिर यूँ ही किसी के हाथ लग जाएँ और...कल दोपहर जून एक बड़ा सा पार्सल लाये, सलाद काटने के लिए SUZI CHEF नाम की एक hand operated मशीन भी थी  उसमें, सलाद अच्छा कटता है उसमें, अभी और कुछ तो काटकर देखा नहीं है. इस बार पिकनिक पर जाने का विशेष उत्साह है, सर्दियां ज्यादा खुशनुमा हैं इस बार, धूप खिली रहती है. इस समय भी लॉन में धूप पीछे पीठ को छूती हुई निकल रही है. कल शाम गुलाब के पौधों से मिलकर झड़ चुके गुलाबों की टहनियों को काटा, गुलदाउदी के पौधों को बांधा, पानी दिया. नन्हे के लिए नाईट ड्रेस सिली, जून और नन्हे दोनों ने ही तारीफ करके उसका हौसला बढ़ाया है.





Friday, October 19, 2012

बड़ा दिन ठंडा सा



आज उसने तीन फाइलों का काम खत्म किया, अभी फाइनल का लेसन प्लान बनाना है. बैठे-बैठे उसकी कमर अकड़ गयी है, काफी देर से कुर्सी पर बैठी है और कपड़े सिलने में भी सीधा बैठना पड़ा, कितने ही सलवार-कमीज की सिलाई खुल गयी थी वही ठीक करती रही. लिखने का काम अभी भी बहुत है. शेष पढ़ाई तो बिलकुल नहीं हो रही है. लाइब्रेरी से कुछ किताबें ली थीं, उनसे भी नोट्स बनाने हैं.

इतवार के कारण कल टीवी पर महाभारत आया, सभी के साथ नन्हा भी बहुत शौक से देख रहा था. उन्हें एक परिचित परिवार के यहाँ जाना था, दो घंटे तो लग ही गये. आज कालेज शायद बंद है, अब न भी हो तो क्या, वह तो नहीं गयी है, लिखने का काम आज तो पूरा कर ही लेना चाहिए. आज सुबह उसने जून को पत्र लिखा, पोस्टमैन भी एक घंटे में आ जायेगा. आज उन्होंने दोपहर का भोजन जल्दी बना लिया है, अब कोई चिंता नहीं. सिर्फ लिखना और आराम करना दिन भर..पढ़ना-लिखना बस...एक बजे नन्हे को सुलाएगी, अभी बारह बजे हैं.
आज जून के पत्र और ग्रीटिंग कार्ड्स मिले, हमेशा की तरह मधुर से पत्र..ऐसा लगता नहीं कि उससे दूर है...या उससे दूर रहने की आदत पड़ गयी है. धीरे धीरे सम्बन्धों में स्थिरता आती है, फिर यह भौतिक दूरी मायने नहीं रखती. इतनी दूर रहकर भी वे एक-दूसरे को उसी तरह समझ सकते हैं जैसे पास रहकर. छोटी बहन का पत्र आया है, वह खुश है. माँ-पिताजी का पत्र भी आया है, छोटा भाई भी गुड़िया का पापा बन गया है. उसने सोचा आज ही जवाब दे दे तो ठीक रहेगा, फिर बाद में उपहार भेजेगी, एक स्वेटर या फ्रॉक !

अब रात को ठंड बढ़ गयी है, आज से रजाई लेनी होगी. अभी तक कम्बल से ही काम चल रहा था. परसों कालेज खुल रहे है. मेजर का काफी कार्य हो गया है, अब चार्ट बनने का काम शेष है, कल बाजार जाकर चार्ट पेपर खरीदेगी. आज क्रिसमस है, बड़ा दिन, पर उनके लिए आज का दिन बड़ा किसी भी तरह से तो नहीं है. मन बेचैन है, एक घुटन सी महसूस कर रहा है, और माहौल भी वही है कल का सा बेचैनी भरा. कल उसने जून को अधूरा पत्र लिखा अब उसका पत्र आने पर ही पूरा करेगी.

साल का अंतिम दिन और साल का अंतिम रविवार भी. कल से नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है और उसका मन हर वर्ष की तरह कई मधुर कल्पनाओं से ओत-प्रोत है...जून की स्मृति भी है तो..स्नेह की मधुर यादों के साथ उन्हें एक अच्छा खत लिखेगी और पुराने वर्ष के सभी पत्रों के जवाब भी देने हैं न...नए वर्ष में नए खत नए जवाब..!