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Wednesday, June 14, 2017

जूट का झूला


कल रात्रि विश्वकर्मा पूजा के लिए एक कविता लिखी थी. जून नहीं हैं वरना आज वे उनके विभाग में होने वाली पूजा में सम्मिलित होते. रात को शुरू हुई वर्षा सुबह तक हो रही थी. परसों बड़ी भांजी से स्काइप पर बात हुई, आज छोटी बहन से हुई. उस दिन जब भांजी से उसके यहाँ जाने की बात की, वह ऐसे बात कर रही थी जैसे उसे कुछ समझ ही न आ रहा हो, उस दिन कुछ अजीब तो लगा था पर सोचा था शायद वह उसकी बात समझ न पायी हो अथवा तो उसे सुनाई ही न दी हो, पर आज छोटी बहन ने कहा, किसी कारण वश वे बच्चे को किसी से मिला नहीं रहे हैं. घर जाकर बच्चे को देखने की उत्सुकता दिखाना ठीक नहीं होगा, फोन पर ही बधाई देना ठीक रहेगा. कल शाम यात्रा की कुछ तैयारी भी कर ली है.

पूरा अक्तूबर और आधा नवम्बर भी बीत गया, आज जाकर कलम उठायी है. इसी बीच दो यात्रायें  भी कीं, पर लिखा कुछ नहीं. कल लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे कार्य सम्मुख आ गये और अब जून का इंतजार करते हुए, मलेशिया से लाये जूट के झूले पर बैठकर, जिसे उन्होंने बगीचे में लगा दिया है; पंछियों की आवाज सुनते हुए और शीतल पवन का स्पर्श अनुभूत करते हुए, जब धूप भी छनकर आ रही है और सामने हरियाली की एक चादर बिछी है, वह लिख रही है. इससे बढ़कर स्वर्ग में कौन सा सुख होता होगा जब मन में ‘उसकी’ याद बसी हो और कण-कण में वह स्वयं प्रकट होने को उत्सुक हो. जब प्रकृति का नृत्य अनवरत चलता हो. धूप-छांव का यह जो खेल सृष्टि नटी न जाने कब से खेल  रही है, उसका द्रष्टा होना कितना अनोखा अनुभव है ! नीला आकाश बिलकुल स्वच्छ है, बादल का हल्का सा टुकड़ा भी नहीं है वहाँ, बगीचा भी स्वच्छ है, अभी फूल खिलने में देर है. गमलों पर गेरुआ लगाना है, जून को याद दिलाना होगा, मंगवा लें. दोपहर को उसे दो अन्य सदस्याओं के साथ प्रेस जाना है, क्लब की पत्रिका के कम के लिए. पीछे कुछ मजदूर काम कर रहे हैं, पर वे इतना चुपचाप  हैं, पहले उसे अहसास ही नहीं हुआ उनके होने का. नन्हे का फोन आया, सुबह वह जल्दी-जल्दी उठकर केवल एक सेव खाकर ही दफ्तर जा रहा था, उसका दिन व्यस्त रहने वाला है आज, ऐसा कहकर वह दो दिन से फोन न कर पाने की बात कह रहा था.   

  फिर एक हफ्ता गुजर गया और कुछ नहीं लिखा. कुछ लिखने का मन नहीं होता, मन एक कोरा कागज बन गया है. भीतर भाव उठते हैं, कभी तो इतने अछूते होते हैं, इतने सूक्ष्म कि उन्हें शब्दों में बाँधना ऐसा है जैसे इन्द्रधनुष को रस्सी से नीचे उतारना, कितना स्थूल है शब्दों का संसार और कितना सूक्ष्म है परम का अनुभव..इसलिए आज तक इतना कुछ कहे जाने के बाद भी परमात्मा उतना ही अनछुआ है जैसा वैदिक काल में था.


Wednesday, March 1, 2017

नीला आकाश


घर आने के बाद व्यस्ततता कुछ ऐसी रही कि एक हफ्ता कैसे निकल गया पता ही नहीं चला. आज कई दिन बाद धूप खिली है, वह झूले पर बैठी है, विटामिन डी का सेवन करते हुए. भोजन बन गया है, जून का इंतजार करते हुए पिताजी टीवी देख रहे हैं. शब्द फिर जैसे उतरने लगे अपने आप ही..

हवा सांय-सांय की आवाज लगाती
बहती जाती है
पेड़ों के झुरमुटों से
सुनहली धूप में चमक रहा होता है
जब घास का एक एक तिनका
किसी तितली के इंतजार में फूल
आँखें बिछाए तो नहीं
बैठा होता डाली के सिरे पर..
सूनी सड़क पर एकाएक
गुजर जाती है कोई साईकिल
और ठीक तभी दूर से
आवाज देती है गाड़ी
स्टेशन छोड़ दिया होगा किसी ट्रेन ने
हाथ हिल रहे होंगे, प्लेटफार्म और
ट्रेन के कूपों से बाहर हवा में
जाने किस किस के....  
आकाश नीला है
और श्वेत बगुलों से बादल
इधर-उधर डोल रहे हैं
एक पेड़ न जाने किस धुन में बढ़ता चला गया है
बादल की सफेद पृष्ठभूमि में
खिल रहा है उसका हरा रंग
जैस सफेद चादर पर हरे बूटे...
रह रह के हवा झूला जाती है झूला
जिस पर बैठ कर लिखी जा रही है कविता
परमात्मा इतना करीब है इस पल कि
नासिका में भर रही है उसकी खुशबू
और कानों में गूंज रही है बादलों की गड़गड़ाहट


अप्रैल के तीसरे साँझ की सलेटी साँझ..कोकिल रह रह कर कू..कूकू..कू..कह उठती है अमराई में. गुलमोहर की शाखें हवा में भर रही हैं अपने भीतर ओज और सुवास, ऋतू आने पर खिलने के लिए, नाच रहे हैं पीपल के गुलाबी नव पल्लव, गुड़हल का एक लाल फूल तोड़ कर डाल गया है कोई बच्चा हरी घास पर..झूम रही हैं गुलब की कलियाँ हवा के झोंकों संग. आकाश बादलों से घिरा है और कालिमा गहराती जा रही है. ठंडे लोहे के झूले का स्पर्श पैर की तली को शीतलता से भर रहा है. पेड़ अब काले होते जा रहे हैं. हवा जब माथे से बालों को पीछे सरका देती हैं तो मानो उसी का हाथ हो और तन पर चढ़ जाता है कोई नन्हा कीट तो लगता है वही मिलने आया है..कितना सुंदर है यह सब..

Tuesday, June 19, 2012

विवाह का एल्बम


अगस्त माह का पहला सोमवार ! सुबह पांच बजे ही कमरा कितना रोशन हो गया है, चमचमाती धूप से. आज तीज है, मेहँदी और झूला याद आ रहा है, इस समय बाप-बेटा दोनों सो रहे हैं, वह पिछले दिनों नियमित नहीं लिख पायी, जून से कहा पर उसकी अपनी विवशता है, वह हर काम में नूना की सहायता करना चाहता हैं, उसकी सुविधा, उसके आराम का उसे हर क्षण ध्यान रहता है और इन्हीं सब कामों में वह थक जाता है. रात को दोनों को ही नन्हें के कारण कई बार जागना पड़ता है, दिन में कभी-कभी मन व शरीर दोनों थकान से बोझिल लगते हैं, बस चुपचाप सो जाने का मन होता है. कितना बड़ा हो गया है वह, उसे पहचानने लगा है अच्छी तरह से. उसकी आवाज भी वह पहचानने लगा है. रो रहा हो तो कुछ कहते ही चुप हो जाता है. सुबह उसकी मालिश करके जब स्पंज करती है तो दूध पीते-पीते ही वह सो जाता है.
आज सुबह जून की नींद देर से खुली, कहने लगा आज देर हो गयी है आधी छुट्टी ले लेते हैं, रात्रि जागरण का असर उसकी आँखों में साफ दिखाई दे रहा था. उसने कोई जवाब नहीं दिया, जैसे उसे इस बात से कोई सरोकार नहीं था, पर बाद में उसी के कहने पर वह जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस गया. कल शाम को वह पहली बार क्लब गया था नन्हे के जन्म के बाद. लौटकर चुप-चुप ही रहा, उसे समझ नहीं आया, क्या यह नन्हें के कारण है, शायद यह स्वाभाविक ही है, सब कुछ बदल रहा है. कल उन्होंने अपने विवाह का एल्बम देखा, लगा ही नहीं कि यह उनका अतीत है, लगा जैसे किसी और का एल्बम देख रहे हैं. कितने सजे संवरे लग रहे थे उसमें और अब दिन भर कितना असत-व्यस्त सा रहता है सब कुछ.