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Wednesday, December 4, 2024

दूज का चाँद

दूज का चाँद 


आज शाम को भी वे कोरोना प्रोटोकॉल का ध्यान रखते हुए टहलने नहीं गये। अब तो लॉक डाउन की अवधि भी बढ़ा दी गई है। एक ही शहर में रहने के बावजूद नन्हे को घर आये एक महीना होने वाला है। अब शायद वे लोग  माह के अंत में उसके जन्मदिन पर ही आयेंगे। लोगों ने पूजास्थलों पर जाना बंद कर दिया है, त्योहारों पर मेहमानों को बुलाना भी। कोरोना ने सबको सीमाओं में बंधना सिखा दिया है। ननदोई जी से बात हुई, उन्होंने बताया, परिवार के चार लोग अपने-अपने कमरों में बैठकर अपने-अपने मोबाइल से एक साथ लूडो खेलते हैं। उनके एक मित्र के परिवार में गाँव में ब्याह हुआ था, सौ लोग एकत्र हुए थे, कई लोगों को संक्रमण हो गया। कई देशों ने भारत को सहायता सामग्री भेजनी आरम्भ की है।देश में पहली बार एक दिन में चार लाख केस मिले हैं। 


प्रातः भ्रमण के समय शिव के मस्तक पर सजे चंद्रमा सा सुंदर चाँदी का सा चाँद गगन में चमक रहा था। शाम को पापा जी से बात हुई, वह सदा की तरह उत्साह से भरे थे।ज्ञान से भरी बातों के अलावा उन्होंने और भी कुछ बातें बतायीं। कह रहे थे, विविध भारती के कार्यक्रम विविधा पर रवींद्र नाथ टैगोर की कहानी ‘मँझली बहू’ सुनी। उनकी गली में गैस का चूल्हा ठीक करने वाला आदमी आवाज़ लगा रहा था, उसे बुलाया और अपना ३९ वर्ष पुराना गैस का चूल्हा ठीक करवाया। कारीगर ने कहा चार-पाँच वर्ष पहले भी आपने ठीक करवाया था। उसने पाइप बदल दी और नोजल्स भी। उसे याद है, जब वह कॉलेज में थी तब यह चूल्हा घर में आया था, एशियाड गेम्स हुए थे उस साल। उनका नया कलर टीवी भी तब आया था।दस दिन के बाद आज से नैनी ने काम पर आना शुरू कर दिया है। बच्चों ने ‘मातृ दिवस’ पर उसके लिए पाँच किताबों का एक सेट भेजा है। कल है मदर’स डे ।आज एक लेखिका मनोरमा कल्पना को पहली बार पढ़ा, बहुत अच्छा लिखती हैं। प्रकृति से उन्हें बहुत प्रेम है। 


कुछ देर पहले बच्चों से बात हुई, अब वे दोनों ठीक हैं। नन्हे के एक पुराने सहकर्मी के पिता का कोरोना से देहांत हो गया। शुरू में पाँच-सात दिन वह घर पर ही थे, फिर मुश्किल से अस्पताल में बेड मिला।पर घर आकर दुबारा स्वस्थ जीवन जीना उनके भाग्य में नहीं था, हृदयाघात हो गया। यह आपदा प्रकृति द्वारा आयी है या मानवों द्वारा लायी गई है, यह कोई नहीं जानता।पापाजी ने आज राजदीपसर देसाई के एक वीडियो के बारे में बताया, वह मोदी जी की आलोचना कर रहे थे। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। आज एक दुखद समाचार और मिला, उनकी सोसाइटी के फ़ैसिलिटी मैनेजर का देहांत हो गया, कुछ दिन पहले ही वह कोरोना से संक्रमित हुए थे। उनकी बेटी अभी एक वर्ष की है, पत्नी और माता-पिता भी उन पर आश्रित थे। भीतर तक हिला गया यह समाचार, तब समझ में आया जिनके प्रियजन जा रहे हैं, उन्हें कैसा लगता होगा। काफ़ी देर तक मन में पीड़ा बनी रही। स्कूटर पर आते-जाते सोसाइटी के सभी लोगों ने अक्सर उनको देखा था, अपने काम के प्रति बहुत समर्पित थे, सभी के साथ उनका अच्छा संबंध था। 


श्रद्धा और सबूरी का छोटा सा मंत्र साईं ने बरसों पूर्व बल्कि सौ वर्ष पूर्व दिया था। इस छोटे से मंत्र में कितना बड़ा ज्ञान छिपा है। धैर्य के साथ यदि कोई चले तो जीवन की कोई भी परिस्थिति उसे विचलित नहीं कर सकती, और श्रद्धावान को ही ज्ञान मिलता है, यह तो भगवद् गीता में भी कहा गया है। आज सुबह की साधना के बाद उसे भीतर चट्टान जैसी स्थिरता का अनुभव हो रहा है और एक शांति का भी। अब साधना सहज हो गई है, जैसे स्वभाव का ही एक अंग, और लेखन भी ऐसे ही है। लिखने के लिए भी कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता, कोई जैसे लिखवा लेता हो। वैसे जब यह सारी सृष्टि ही किसी व्यवस्था के द्वारा चलायी जा रही है तो चेतना भी पहले से ही मौजूद रही होगी। पाँच तत्व भी रहे होंगे। परमात्मा हर जीव के भीतर विद्यमान है। शिव कहते हैं, जब तक देह में प्राण हैं, वह जीव के साथ हैं, अर्थात उनमें हैं, और जब प्राण नहीं रहते तब जीव शिव में ही रहते हैं। एक शक्ति है जो देह व मन के माध्यम से व्यक्त हो रही है। जब वह स्वयं में टिक जाती है तो वही आत्मा है, और जब वह मन, बुद्धि के माध्यम से व्यक्त होती है, जीव कहलाती है। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्होंने बताया, कोरोना के कारण सरकार पर आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी।सरकार ने उसका क्या जवाब दिया, यह भी बताया। जून ने कोरोना काल में ईवी की देखभाल पर एक वेबिनार में भाग लिया।जिसमें एक सुझाव यह भी दिया गया,  बीच-बीच में कार के इंजन को चलाना है, नहीं तो बैटरी ख़राब हो जाएगी।   


Monday, July 18, 2016

बादलों के पार


पिछले कई दिनों से डायरी नहीं खोली, मेहमान आये और चले गये. बड़े भैया, दोनों-भाभियाँ व दोनों की बेटियां. सभी खुश थे. उन्होंने भी उनके साथ अच्छा समय गुजारा. कल का दिन ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के स्वामी मधुसूदन के नाम था. वह आजकल पदयात्रा के सिलसिले में यहाँ आए हुए हैं. आज उन्हें निमंत्रित किया था, उन्हें उसने अपनी किताबें दीं, इस समय नेट सर्फिंग कर रहे हैं. दोपहर को वे उनके साथ बच्चों की योग कक्षा में भी जायेंगे. गुरूजी तथा अपने जीवन के बारे में तथा अपनी दीक्षा के बारे में काफी कुछ उन्होंने बताया. गुरूजी से जो जुड़ जाता है, उसका जीवन बदल जाता है. कुछ दिनों पूर्व तक उसने उनका नाम भी नहीं सुना था पर आज से वे फेसबुक पर दिख सकते हैं. नन्हे से मात्र तीन वर्ष बड़े उसके बड़े पुत्र के समान ही हुए. कह रहे थे, गुरूजी सबको उसी तरह जानते हैं, जैसे वे अपने सिर के बालों को जानते हैं, जब किसी एक को खींचो तो दर्द होता है. उनके चारों ओर चेतना का महासमुद्र है, वे उसकी जानकारी में हैं.

कल रात बड़ी भाभी ने फोन पर कहा, जब वे हवाई जहाज से गोहाटी से दिल्ली जा रही थीं तो ऊपर नीला आकाश तथा नीचे श्वेत मेघ देखकर उन्हें उसकी स्मृति हो आयी, कि यदि वह इस स्वर्गिक दृश्य को देखती तो कविता लिखती. उसने उनसे कहा कल्पना में वह बादल देखकर भी कुछ लिख सकती है, सो प्रयत्न किया-
     
धरा से ऊपर, नीचे नभ से
तैरे हवा में यान हमारा,
श्वेत बादलों की शैया पर
ज्यों अटका हो एक सितारा !
निर्मल नील गगन का साया
श्वेत मेघ तिरते अम्बर में,
मानो बिखरी हो कपास शुभ्र
या बगुलों की पांत  उड़ी हो !
दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा,
ढका हुआ बादल से सब कुछ
देखो, कहीं न एक झरोखा  !
उठा धरा से पहुँचा नभ में
हम बादल के पार आ गए
छोड़ के भेदों की दुनिया
एक का ही आधार पा गए  !


Thursday, June 26, 2014

स्कूल की पत्रिका



आज स्कूल में बहुत काम था, एक दो शिक्षिकाओं की अनुपस्थिति के कारण उसे पूरे आठों पीरियड लेने पड़े, इस समय थकान महसूस कर रही है. एक अध्यापिका ने उससे विज्ञान के प्रश्नोत्तर के बारे में पूछा तो वह टाल गयी, बाद में लगा बता देना चाहिए था, कल स्कूल जाकर सबसे पहला काम यही करेगी. आज भी कक्षा में बच्चे बहुत शोर कर रहे थे, एक सीनियर  अध्यापिका की कक्षा के सामने से गुजरी तो देखा बच्चे शांत बैठे थे, उसका भी यह स्वप्न है शायद कल ही ऐसा हो.

आज स्कूल गयी तो मन में शुभेच्छा थी और ढेर सारा कम्पैशन, एक अध्यापिका अनुपस्थित थी उसकी कक्षा में जाकर स्वयं ही उसने कविता प्रतियोगिता के बारे में बच्चों को बताया. स्टाफ रूम में सभी अभी से आने वाले वर्ष की बातें कर रहे थे. नई शताब्दी दस्तक दे रही है. उसके कदमों की आहट दिलों की धड़कन बढ़ा रही है. कैसी होगी नई शताब्दी की प्रथम सुबह, क्या उस दिन गगन ज्यादा नीला होगा, हवा कुछ अधिक शीतल, पक्षी का स्वर मधुरतर, लोगों के दिल मिले हुए. पर इतना तो तय है पवन में आशाओं की खुशबू मिली होगी, करोड़ों लोगों के दिलों की आशाओं की खुशबू ! 

आज दो किताबें वह असावधानी वश स्कूल में ही छोड़ आई है, ध्यान उधर जाता है. संस्कृत में एक अध्यापिका ने कुछ पूछा तो व्यस्ततता के कारण ठीक से बता नहीं पायी, खैर यह जरूरी तो नहीं कि सदा वह सही ही रहे. स्कूल में रोज नई-नई बातें पता चलती हैं, पहले पता चला प्रोबेशन पीरियड लम्बा चलेगा, दूसरी बात यह कि छुट्टियों की पे नहीं मिलेगी. इन सब बातों का असर उस पर तो पड़ता नहीं क्यों कि पैसे के लिए न उसने काम किया है न कभी करेगी. उसे ध्यान आया, आज जून ने जब कहा वे यात्रा में खरीदारी नहीं करंगे तो आग्रह क्यों कर बैठी, नहीं जी, वे कुछ न कुछ तो लेंगे ही. यह आग्रह करने की मनः स्थिति जब तक रहेगी तब तक चैन नहीं है. जो कुछ उसके पास अब है वही सारी उम्र के लिए काफी है फिर और की आशा क्यों ? आशा करनी ही हो तो मन को विशाल बनाने की करनी चाहिए. जिससे सारे बच्चों को इतने स्नेह दे सके कि उन्हें उस पर भरोसा हो. बुद्धि में सामर्थ्य हो और अपने आप से शर्मिंदा न होना पड़े. आदमी क्या है यह उसके कपड़ों से नहीं उसकी आत्मा से पता चलता है, आत्मा बेदाग हो कबीर की चदरिया की तरह, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील !

कल क्लब से फोन आया, वार्षिक पत्रिका के लिए उसे लिखना भी है और हिंदी के अन्य लेखों की एडिटिंग भी करनी है. स्कूल की पत्रिका के लिए भी एक अधपिका के साथ उसे प्रेस जाना है. यदि सबकुछ ठीक रहा तो अगले बीस-पचीस दिन उसे साहित्यिक गतिविधियों में सलंग्न रखेंगे. आज उन्हें नौ बजे स्कूल जाना है, पहले गुरुद्वारा समिति की ओर से चित्रकला प्रतियोगिता है फिर पेरेंट-टीचर मीटिंग.