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Monday, February 27, 2017

तेज पत्ते का पेड़


मन के भीतर उपजा एक छोटा सा शब्द या विचार मन की शांति को भंग करने में समर्थ है, यह तो अच्छा है कि यह उनके हाथ में है उसे उपजाएँ या नहीं, लेकिन तभी तक जब तक वे सजग रहते हैं. एक बार बेहोशी में कोई विचार उपजाया तो बात हाथ से निकल सकती है और ऊपर से तुर्रा यह कि वह शब्द एक बीज बनकर भीतर जम जायेगा और भविष्य में आलंबन मिलने पर पुनः पनप सकता है. लेकिन शब्द का जन्म किसी न किसी कामना के कारण होता है, कामना ही हर दुःख के जड़ में है, कोई उसे प्रेम का नाम दे यह उसकी स्वतन्त्रता है पर भीतर कहीं भय है जो कामना को जन्म देता है और यह भय अकेले रह जाने का है, इसका मूल भी तो मृत्यु के भय में है. वे मरना नहीं चाहते किन्तु आत्मा में स्थित रहें तो मृत्यु का भय नहीं और आत्मा में रहें तो अकेलेपन का भी भय नहीं और कामना का तो वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता. हर कामना अभाव से उपजती है, आत्मा पूर्ण है वहाँ कोई अभाव नहीं. जीवन कितना सुंदर है और वे इसे कुरूप बनाने में लगे रहते हैं. वे उन दुखों को पैदा कर लेते हैं जिनका वास्तव में कोई अस्तित्त्व ही नहीं है, वे संशय के जाल में स्वयं को फंसा लेते हैं, जहाँ विश्वास के फूल खिले हैं. उनका दुःख के प्रति लगाव तो देखते ही बनता है. वे उगते हुए सूर्य में अंगारे खोज लेते हैं और बहते हुए धारे में तलवारें खोज लेते हैं. जो उनके पास है उसकी कद्र करने की बजाय  उसके खो जाने के अज्ञात भय में रातों की नींद गंवा देते हैं !

‘जो तू है सो मैं हूँ’ इस उक्ति को जाने कितनी बार कहा, सुना था. आज पूरी तरह से अनुभव भी कर लिया. कल रात्रि सोने से पूर्व अस्तित्त्व जैसे उस पर बरसा. ऐसा अनुभव पहली बार हुआ, अज्ञात ने जैसे उसे चारों और से घेरे में ले लिया थे. अचिंतनीय भावों की वर्षा हो रही थी. शांति इतनी सघन थी कि..और तब प्रतीत हुआ कि जैसे वह है इस देह में अपनी यात्रा पूर्ण करती हुई वैसे ही अन्य आत्माएं हैं सबके साथ प्रेम का ही नाता है. जो वह है वही वे हैं, कोई भेद है ही नहीं, तभी उनके द्वारा किसी को कहा गया कटु वचन उन्हें भी दुःख दे जाता है और उनके द्वारा किसी को कहा गया प्रेमपूर्ण वचन उन्हें ही तृप्त कर जाता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को ही कहा होता है. मन और आत्मा दोनों ही परमात्मा की सन्तान हैं, आत्मा सुर है मन असुर, आत्मा कृष्ण है और मन कंस है, मन जब तक अर्जुन नहीं बन जाता उसे मरना होगा. भक्त होकर ही मन आत्मा से एक हो जाता है, रावण होकर वह आत्मा का विरोध करता है, विभीषण होकर उसकी शरण में जाता है. जून का फोन आया था सुबह, वह उसका सच्चा मीत है, उसकी आत्मा है, उसे उसने कुछ मूर्खतापूर्ण शब्द कहे जो स्वयं को ही चुभने लगे, उससे क्षमा मांगी, मन हल्का हो गया. सुबह ध्यान के वक्त भीतर कविताएँ जन्म ले रही थीं. असीम है सद्गुरू की कृपा..उनकी कृपा ही उसे यहाँ तक लायी है, परमात्मा की चौखट पर लाने वाले उसके प्यारे सद्गुरू को कोटि कोटि प्रणाम उसने भेजे.

सरदारनी आंटी को कार्ड, फूल व छोटा सा उपहार देकर आयी है. अब उनके दिल्ली जाने से पहले सम्भवतः एकाध बार और उनसे मिलना हो. आज दायीं तरफ की पड़ोसिन का फोन आया, वे लोग भी तबादले के कारण दिल्ली जा रहे हैं. जून के एक और सहकर्मी भी जा रहे हैं, एक दिन तो सबको छोड़ना ही था, अच्छा है एक-एक कर सब बिछड़ रहे हैं. मन मुक्त रहेगा जितना उतना परमात्मा में टिकेगा. आज सुबह ध्यान में एक आकृति दिखी पहले भी कई बार दिखती है, कौन है वह ? क्या है ? कौन जानता है, कोई दिव्य आत्मा या उसका कान्हा स्वयं ही ! जून आजकल बहुत शांत हो गये हैं, वे भी अध्यात्म के पथ के यात्री हैं. परमात्मा कभी भी किसीकी पुकार अनसुनी नहीं करता, वह अनंत है, वे उसकी एक बूंद कृपा के भी आकांक्षी नहीं हो पाते अहंकार के कारण.
कल उन्हें यात्रा पर निकलना है, तैयारी अभी शेष है. मन एक भिन्न उल्लास का अनुभव कर रहा है. अभी कुछ देर पूर्व धोबी आया था, पुराना कम्प्यूटर जो उसे दिया था, चला ही नहीं, कह रहा था लौटा जायेगा. आज कढ़ी बनाई है. पिताजी को ताजा तेजपत्ता व कढ़ी पत्ता घर ले जाने का मन है. जून के मना करने के बावजूद ढेर सारे हरे पत्ते वह अपने सूटकेस में रख रहे हैं. यदि कपड़ों में कोई दाग लग जाये या गंध भर जाये इसकी परवाह किये बिना. 

Sunday, June 26, 2016

कामायनी- मुक्तिबोध की नजर में


‘प्रेम अमृत है, कामना सुरा है ! कामना की सुरा आरम्भ में तो मदहोश कर देती है, सुख का आभास देती है किंतु बाद में सिवाय पश्चाताप के कुछ हाथ नहीं आता’ ! अभी-अभी सुना यह वचन. परसों सरस्वती पूजा है. वह यूनिकोड में टंकण करके अपनी कविता हिन्दयुग्म के पाठकों के लिए भेजेगी. जून लैपटॉप इसीलिए छोड़ गये हैं. आज ही सुबह वह मुम्बई गये हैं, चार दिन बाद लौटेंगे. तब तक उसे अपने भीतर प्रेम की सुवास जगा लेनी है तथा कामना की सुरा का मद उतार फेंकना है ! मौसम पुनः सुहावना हो गया है. नैनी स्टोर की सफाई कर रही है. पिताजी बगीचे में पानी डाल रहे हैं. माँ मटर छील रही हैं, सभी कार्य में  लगे हुए हैं और वह कार्य की योजना बना रही है. नया वर्ष आरम्भ हुए इतने दिन बीत गये, एक भी नई कविता नहीं लिखी. सिंगापुर पर जो लेख लिखना है, उसकी भी शुरुआत नहीं की है. दोपहर को कामायनी पर मुक्तिबोध की पुस्तक पढ़ रही थी. मनु आत्ममोह से ग्रस्त है, वह भी तो आत्ममोह से ग्रस्त होकर ही आलस्य व मूढ़ता का शिकार हो जाती है. भीतर के खालीपन को भरने के लिए उन वस्तुओं का आश्रय लेती है जो स्वयं ही रिक्त हैं. पिछले कुछ सप्ताह ऐसे ही बीत गये, अपने भीतर जाने का अवसर नहीं मिला. बाहर की चकाचौंध देखकर मन बाहर ही भागता रहा. स्वप्न अभी तक सिंगापुर में देखे बाजारों के ही आते हैं. धन का ऐसा प्रदर्शन था वहाँ. हैती में लोग भूख से पीड़ित हैं. लेकिन वहाँ की स्वच्छता देखकर उसने कितने दिवास्वप्न देखे थे, इस नगर को सुंदर बनाने के स्वप्न, पहले अपने घर को बगीचे को सुंदर बनाना है. काम तो कितने सारे हैं. अब जुट जाना है. परसों सभी को संदेश भी भेजेगी. लोहड़ी पर फोन नन्हे के पास था सो नहीं भेज पाई थी.

सुंदर वचन सुने आज. ‘जहाँ प्रेम होता है, वहाँ समर्पण होता है. घट-घट में वह साईँ रमता कटुक वचन मत बोल रे !’ शब्दों का घाव सदा के लिए इन्सान के भीतर घर कर जाता है और जो ऊंची आवाज में बोलता है, उसको भी पछताना होता है. ऊर्जा का नाश होता है सो अलग ! वाणी पर संयम साधक की पहली आवश्यकता है. आज सुबह क्रिया के बाद भीतर अनायास ही मन हुआ कि दोनों पड़ोसियों के बच्चों को सिंगापुर से लायी चॉकलेट दे. ध्यान, प्राणायाम तथा योग का यह कैसा चमत्कार है. वे साधना के द्वारा जब कुछ प्रसाद पा लेते हैं तो मानने लगते हैं कि अब यह कभी नहीं  जायेगा, किन्तु साधना छोड़ते ही मन माया का साम्राज्य स्थापित हो जाता है. सद्गुरु कहते हैं कुछ होने के लिए कुछ न होना सीखना है. खाली होना है. जब कोई स्वयं को कुछ मानता है तो अहम को चोट लगने ही वाली है. जो आकाशवत शून्य है उसे कोई हानि नहीं हो सकती. तब किसी पर कोई अधिकार न होते हुए भी सब अपने होते हैं. वे इस विशाल ब्रह्मांड के आगे शून्यवत हैं, पर  जब अपने भीतर उस शून्य को पा लेते हैं, सारा ब्रह्मांड अपना हो जाता है !


आज वसंत पंचमी है. उसने धानी वस्त्र पहने और पीत स्वेटर. सुबह साढ़े पाँच पर उठी,. कितना प्रमाद ! फिर सभी को संदेश भेजती रही. अभी तक साधना भी नहीं की. एक सखी के यहाँ मूर्ति पूजन होगा, उसने बुलाया है. उनके पीछे वाली लेन में भी पूजा का पंडाल लगा है. रात को वहाँ से तम्बोला खेलने की आवाजें आ रही थीं. मस्ती का माहौल रहा होगा, लेकिन जब तक भीतर की मस्ती का अनुभव नहीं हो जाता, बाहर की मस्ती मात्र कोलाहल बनकर रह जाती है. आह सद्गुरु योगसूत्र पर बोल रहे थे. कल व परसों उनकी बताई विधियों से ध्यान किया, अच्छा अनुभव हुआ. नन्हा उसके लिए गुरूजी की आवाज में रिकार्ड किये हुए ध्यान के कई सीडी लाया था. आज मौसम बहुत अच्छा है. बसंत के आने की सूचना देता हुआ. जून के आने में अभी दो दिन हैं, उनका ऊनी मोजा ठीक करना है, आलमारी ठीक करनी है. नन्हे का सामान भी सहेज कर रखना है. पिताजी की रजाई पर धुला कवर चढ़ाना है, पर सबसे पहले क्रिया व ध्यान करना है.    

Friday, December 11, 2015

उड़ते हुए तिनके



आज इतवार है दोपहर के सवा तीन बजे हैं, जून आज गोहाटी गये हैं और अगले इतवार को लौटेंगे इसी समय. टीवी पर भजन आ रहा है, हे गोविन्द ! हे गोपाल ! अब तो राखो शरण..जब किसी को अपने भीतर एक ऐसा तत्व का पता चल जाता है जो है पर जिसको देख नहीं सकते, जो सारे शब्दों से भी परे हैं तो वह रह ही नहीं जाता, जो रहता है वह इतना सूक्ष्म है और उसकी तुलना में ये मन, बुद्धि आदि इतना स्थूल मालूम पड़ता है कि शरण में जाने की बात भी बेमानी लगती है, जो शरण में जायेगा वह स्थूल है और जिसकी शरण में जायेगा वह सूक्ष्म है. मन जब तक सूक्ष्म नहीं हो जाता, निर्मल नहीं हो जाता, सारे आग्रहों से मुक्त नहीं हो जाता, सारे द्वन्द्वों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक शरण नहीं हुआ, जब वह इतना सहज हो जाये इतना पारदर्शी कि सबके आर-पार निकल जाये, कोई भी अवरोध उसके सामने अवरोध न रहे, वह जैसे यहाँ रहकर भी यहाँ का न हो, उस सूक्ष्म में तभी प्रवेश हो सकता है. यह निरंतर अभ्यास की बात है, लेकिन धीरे-धीरे उनका स्वभाव ही बन जाये, तभी वास्तव में शरणागति घटित होगी, अभी तो वे पल-पल शरण में और पल-पल अशरण में आ जाते हैं.

हिंसा रहित समाज, द्वेष रहित परिवार, कम्पन रहित रहित श्वास, विषाद रहित आत्मा, गर्व रहित ज्ञान और भी कई ऐसे बातें यदि उनके पास हों तब कहना चाहिए कि उन्होंने जीना सीखा है, जीने की कला का लाभ लिया है. आज सुबह नींद पाँच बजे से कुछ पहले खुली. क्रिया आदि की. अभी कुछ देर पूर्व ही ध्यान से उठी है. एक दृश्य में देखा कि हवा बह रही है और फर्श पर पड़े तिनकों को उड़ा रही है, यह चेतना का ही चमत्कार है कि आँखें बंद हैं पर फिर भी सब कुछ दिख रहा है. आज बच्चे अभी तक नहीं आये हैं, शायद तेज धूप के कारण या कोई दूसरा कारण होगा. जून का फोन आया था, उत्साह पूर्ण थे. इन्सान को जीवित रहने का कोई न कोई कारण तो चाहिए न, उत्साह ही जीवन की निशानी है. वृद्ध लोग कैसे नीरस हो जाते हैं, उत्साह खो देते हैं, क्योंकि करने को कुछ बचा नहीं, नन्हे बच्चे हर वक्त कुछ न कुछ करते रहते हैं, उर्जा से भरे रहते हैं. कल शाम बहुत दिनों बाद सीडी लगाकर प्राणायाम किया, आज से नियमित करेगी, जून के आ जाने के बाद भी. बच्चों का ध्यान आ रहा है, जितनी आवश्यकता उन्हें उसकी है शायद उतनी ही उसे भी उनकी. कुछ देर सासूजी से ही बात की जाये, लगता है आज वे नहीं आयेंगे.  

ध्यान, ज्ञान, व्रत तथा पवित्रता जिसके पास है, वह उपासक बन सकता है. उपासक स्वयं का निर्माण करता है, वह जगत में रहकर भी जगत से ऊपर रहता है. आज भी सुबह नींद जल्दी खुल गयी, ध्यान आदि किया. जून से बात हुई, पहले कम्पनी के अधिकारियों की हड़ताल हुई फिर वापस ले ली गयी. नन्हे से भी रात को बात की. वह फोन पर देर तक बात नहीं कर पाती, सच तो यह है कि वह वैसे भी देर तक बात नहीं कर पाती, वार्तालाप की कुशलता उसमें नहीं है, सद्गुरू कहेंगे, कुछ मान के चलो, कुछ जान के चलो, कोई सद्गुण ( अगर बातचीत की कला सद्गुण है तो ) किसी में है ऐसा मानने से वह बढ़ता है खैर ! आज सुबह कैसा स्वप्न देखा, सेंट्रल स्कूल की एक टीचर के पति की मृत्यु का अफ़सोस करने वह वहीं के एक शिक्षक के साथ गयी है पर वहाँ का नजारा ही अलग है. प्रिन्सपल हँस रहे हैं, बाद में एक अध्यापक आकर कहते हैं कि विधवा शिक्षक नौकरी छोडकर नहीं जाएँगी, कितना स्पष्ट दिख रहा था सभी कुछ, कल भी एक स्पष्ट स्वप्न देखा था. आज सुबह निश्चत किया कि साधना को गति देनी चाहिए तथा तय करना चाहिए कि लक्ष्य क्या है, उसे कब और कैसे पाया जा सकता है, कौन सा मार्ग शीघ्र वहाँ पहुंचा सकता है, ये सारी बातें तो वर्षों पहले सोचनी थीं, पर तब इतनी समझ ही कहाँ थी !


कल रात ओशो को सुना, किसी साधिका के पत्र का उत्तर दे रहे थे, रात को स्वप्न में देखा वह उसे भी दीक्षा दे रहे हैं. सुबह ध्यान में भाव जैसे उमड़े आ रहे थे. आज वर्षा हुई और तेज बादलों का गर्जन-तर्जन भी, पर इतने शोर में भी भीतर का नाद सुनाई पड़ रहा था भीतर सन्नाटा था ऐसा गहरा मौन कि अभी तक उस मौन की गूँज छायी है. उसे अपनी साधना को तीव्र करने का मौका मिला है, इसके एक-एक पल का लाभ लेना चाहिए. परमात्मा के विषय में यदि कोई गलत धारणा या अपनी महत्वाकांक्षा जो इसके आवरण में छिपी है, सबसे मुक्त करना होगा मन को, मन अथाह है तथा किस कोने में कौन सा जाला अटका है पता ही नहीं चलता. कोई द्वंद्व कोई द्वेष कोई कामना यदि भीतर कहीं छिपी हो तो उसका पता परमात्मा को है ही, वह कैसे आएगा, उसे तो पूर्ण समर्पण की तलाश है. वह सस्ता नहीं मिलता, पर वह जैसे भी मिले सस्ता ही है, क्योंकि वही तो है जिसकी कृपा से यह लगन भीतर जगी है, उसको याद भी किया तो क्या अपने बल पर, उसने चुना है उसे अपने लिए, उसके भीतर जो यह प्रेम जगा है उसका स्रोत तो वही है, जितना वह उसे ढूँढ़ रही है उससे ज्यादा वह उसकी प्रतीक्षा में है ! 

Friday, March 6, 2015

परीक्षा का परिणाम


ज्ञानी कैसा होता है इसका बखान अभी सुना, बाबाजी आज अपने ब्रह्मानन्द में मस्त थे. उनकी आंखों में कितना संतोष था, कितना प्रेम और कितना अपनापन ! जब टीवी में देखकर वह अपनी सुधबुध खो देती है, मन निर्विचार हो जाता है तो उन्हें प्रत्यक्ष देखने व सुनने से कितना लाभ होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है. वह इतनी सीधी, सच्ची और सरल भाषा में बात कहते हैं कि कोई अनपढ़ भी समझ ले. वह इतनी ऊंची पदवी को प्राप्त कर चुके हैं तभी इतने सरल व सहज हैं. उधर गुरुमाँ ने भी बुल्लेशाह की काफी गाकर मन मोह लिया. ईश्वर को पाने की प्यास हृदय में तीव्रतर हो जाती है जब ऐसा सत्संग मिलता है, पर फिर सांसारिक उलझनें मन को हर ले जाती हैं. आज सुबह एक परिचिता के यहाँ फोन किया, जहाँ योग शिक्षक ठहरे हुए थे, कोर्स के दौरान सुदर्शन क्रिया करने की अनुमति लेनी थी. पर उनसे बात नहीं हो पायी. मन को सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्त करना है चाहे वह इच्छा सुदर्शन क्रिया की ही हो. आकर्षण का फल सदा ही बुरा होता है चाहे वह आकर्षण अच्छी वस्तु का या बुरी वस्तु का. ‘क्रिया’ का उद्देश्य तो मन को एकाग्र कर के बुद्धि को भेदते हुए आत्म दर्शन करना है, जो इस क्षण भी हो सकता है यदि मन को शांत कर ले. सहज प्राप्य वस्तु को स्वयं ही दुर्लभ बनाकर उसे पाने की चेष्टा ही तो कर रही है, जैसे कि उसका महत्व बढ़ जायेगा. जैसे वे सहज प्राप्य ईश्वर को, आत्मा को, भिन्न-भिन्न उपायों से खोजते फिरते हैं. मन को खाली करना है पर उसे भरते रहते रहते हैं, शब्दों से और विचारों से, जो मानसिक जुगाली का ही काम करते हैं. वह जो शब्दों से परे है शब्दों से पकड़ में नहीं आ सकता. उसने यह अनुभव किया कि कामना मुक्त होना कितना शान्तिप्रद है और कामना करना तन-मन में कितनी लहरों को उत्पन्न करता है. जून आज डिब्रूगढ़ जाने वाले हैं. लंच पर नहीं आएंगे.

इस समय साढ़े ग्यारह हुए हैं, जून आज भी अभी तक नहीं आये हैं. नन्हे को बारह बजे कोचिंग क्लास में जाना है. वह अभी कुछ देर पूर्व ही व्ययाम करके उठी है. कल शाम को दो पत्र लिखे, हफ्तों से उनका जवाब देना रह जाता था. मौसम आज बेहद अच्छा है. सुबह संगीत अभ्यास किया. अगले महीने परीक्षा है. आज छोटी बहन का फोन आया, पंजाब बार्डर पर है. अभी कब तक रहना होगा कहा नहीं जा सकता. युद्ध के बादल छा रहे हैं. उसने बताया, छोटे भांजे को पचासी प्रतिशत अंक मिले हैं, दो दिन बाद नन्हे का भी परीक्षा परिणाम आने वाला है, अभी से सभी की निगाहें टिकी हैं, कुछ लोग मिठाई खाने की बात भी कह चुके हैं. यकीनन परिणाम अच्छा ही होगा. शाम को उन्हें दो जगह जाना है. हायर सेकेंडरी स्कूल में ‘हिंदी साहित्य सभा’ के लिए तथा बाद में ‘क्रिया’ के लिए. आज मन शांत है, कल जैसी उथल-पुथल नहीं है. कल सम्भवतः उसे कुछ हो गया था, गुरू की कृपा से ‘बहुत कुछ’ होने लगा है न उसी में से ‘कुछ’.

आज उसे एक और अनुभव हुआ, अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है, कई बार उसे लगता है कि वह इससे मुक्त हो रही है पर इसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि थोडा सा अनुकूल अवसर आने पर यह अंकुरित हो जाता है. गुरू कितने उपायों से इसे तोड़ना सिखाते हैं, पर वह उनसे ही नाराज हो जाती है. ईश्वर मानव के कार्यकलापों के साक्षी हैं, वे हर पल नजर रखते हैं, वह उपद्रष्टा हैं ! वह यह भी देखते हैं कि किस तरह वे अपने अहम् को पोषते हैं. यह जो कुछ बनने की, कुछ कर गुजरने की प्रवृत्ति है वह भी अहम् का रूप है. वह ही उन्हें कार्य करने की अनुमति देते हैं, लेकिन वह अनुमति उनके स्वभाव तथा पुर्वकर्मों द्वारा नियत किये हुए प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जीवन में जब भी कभी मानसिक उद्वेग या पीड़ा का अनुभव होता है इसके पीछे उसका अहंकार ही जिम्मेदार है. अहम् को चोट लगती है तो पीड़ा होती है और यह अहम् सत्य नहीं है मिथ्या है. इसको परत दर परत वे खोलते जाएँ तो वहाँ कुछ बचता ही नहीं. यह खोखला है, पोला है, इसका अस्तित्त्व है ही नहीं. वे इसे मान बैठे हैं. इस झूठ ने उन्हें सत्यरूपी ईश्वर से दूर किया हुआ है गुरू की नजरों में स्वयं को कुछ साबित करना भी अहम का विकृत रूप है और यह घृणित भी है. गुरू के समक्ष यदि वे अज्ञानी बनकर पूर्णतया खली होकर जायेंगे तभी तो गुरू कुछ प्रदान कर पाएंगे अन्यथा तो उनका ज्ञान ही उनके रस्ते में आयेगा. पूर्णत विनम्र होकर ही गुरू को रिझाया जा सकता है !     





Tuesday, July 31, 2012

तेरी गठरी में लागा चोर



पहले कामना, फिर पूरी न होने पर क्रोध अथवा पूरी हो जाने पर मोह, यही कारण है जो मानव को बुराई की ओर अग्रसर करता है. उसने मन ही मन गीता में पढ़ा यह वचन दोहराया. आज सुबह से बल्कि कल शाम से ही बादल बने हुए हैं पर बरस नहीं रहे. कल शाम वे घर पर बिना ताला लगाये लगभग एक घंटा घर से बाहर रहे, ईश्वर की कृपा से कुछ हुआ नहीं पर मन में एक डर अवश्य था, पिछले दिनों दूसरी नयी कालोनी में हुई चोरी की बात सुनकर, जिसमें कपड़े, गहने, बिस्तर सहित चोर खाने-पीनेकी वस्तुएं तक ले गए. क्या इन चोरों के पास हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती, दूसरे को इतना नुकसान पहुँचा कर स्वयं धनवान बनने की सोचना ! चोरी से बढ़कर कोई दुष्कर्म नहीं.
उन्होने फिरसे पत्रिका क्लब खोलने का निर्णय लिया है. कल लाइब्रेरी से दो पुस्तकें और लायी है और दो पत्रिकाएँ भी. कल भाई-भाभी व माँ-पापा के पत्र मिले. नन्हा अब काफी बातें करने लगा है, बहुत से नए शब्द सीखे हैं उसने, अभी मुस्कुराते हुए उठेगा और उसके गले में बाहें डाल देगा फिर तुतलाते हुए कुछ बोलेगा आटो, या स्कूटर या फिर पापा.

टीवी का एंटीना तो लग गया पर दो घंटे काम करने के बाद फिर से तस्वीर गायब है. कल शाम की फिल्म शायद ही देख पाएँ. जून, पीछे वाले पड़ोसी और अन्य तीन-चार लोग थे कितनी मुश्किलों के बाद इतनी भारी रॉड को उठाकर वे सीधा खड़ा कर पाए और फिर जून छत से ही नहीं उतर पा रहा था. उसके बाद सबने एक और घर में लगाया अब तीसरी जगह लगाने गए हैं. नन्हा गली के उस ओर दाईं ओर के घर में गया है, वहाँ एक छोटी लड़की है आठ-दस साल की जो उसके साथ खूब खेलती है, तभी वह कुछ लिखने बैठी है. कल शाम से ही बिजली नदारद थी, अँधेरे में खेलते-खेलते नन्हा परेशान हो गया था बहुत झुंझला उठा था, ऐसे में जून भी उसे सम्भाल नहीं पाते. आज उसने पत्रों के जवाब दिए. वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही, लगता है महरी आज भी काम करने नहीं आयेगी.