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Wednesday, August 3, 2016

अनजानी सी गंध


आज क्लब की एक पुरानी पत्रिका के कुछ लेख पढ़े. बहुत आनंद मिला. मन में कुछ भाव जगे. पिछले पांच दिनों से डायरी नहीं खोली, न जाने कहाँ गुम थी. आज पुनः सत्संग है घर पर, देखें आज कौन-कौन आता है. जून देहली गये हैं, इतवार को लौटेंगे यानि तीन दिन बाद. उसने उन्हें याद करके लिखा-

क्यों शंकित है, क्यों पीड़ित है, हृदय तुम्हारा क्यों कम्पित है
साथी हैं हम जनम-जनम के, सुख के दुःख के हर इक पल के
किसे ढूँढ़ते नयन तुम्हारे, कैसे दर्द छिपाए दिल में
कदम-कदम संग चलना हमको, हर मोड़ पे मिलना हमको
चलो भुला दें बीती बातें, चलो मिटा दें दुःख, फरियादें
हाथ लिए हाथों में अपने, पूर्ण करेंगे सारे सपने
साथ निभाने का था वादा, तुमने न माँगा कुछ ज्यादा
जो चाहो वह सदा तुम्हारा, साँझा है यह जीवन प्यारा
तुमसे ही अपना जीवन है, तुमसे ही यह तन मन धन है
तुम ही हो सर्वस्व हमारे, तुमसे न कोई भी प्यारे
तुमने ही जीना सिखलाया, तुमसे कितना सम्बल पाया
हर उलझन को तुम सुलझाते, अपना कर्त्तव्य निभाते
तुमसे ही यह घर चलता है, तुमसे ही जीवन सजता है
परिवार को तुमने चाहा, सुंदर सा इक नीड़ बनाया
तुमने कितने उपहारों से, सोने चाँदी के हारों से
भर दी है मेरी अलमारी, जीवन सुंदर त्योहारों से..
साथी तुम संग जीवन प्यारा, तुम न हो सूना जग सारा
कैसे तुमको भूल गये हम, खुद से ही हो दूर गये हम
तुम आओगे तकती आँखें, भर दोगे सपनों से पांखें !


उसने कुछ देर नेट पर समय बिताया. गुरूजी को सुना. सुबह ध्यान में कुछ देर तो निर्विचार हो पायी थी पर अभी तक ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सब कुछ खो जाये, स्वयं का पता तो रहता ही है, लेकिन भीतर गहरी शांति है. कल शाम एक सखी के यहाँ गयी, वह कितना परेशान रहती है, उसका स्वभाव ही ऐसा हो गया है. रात को एसी चलाया था तो कैसी महक भर गयी थी कमरे में, अजीब सी गंध से ढाई बजे आँख खुल गयी थी, फिर काफी देर बाद नींद आयी. उसी समय जून भी गेस्ट हाउस में उठे थे. दीदी से बात करनी है पर फोन कहीं भी नहीं मिल रहा है, लिखा है ‘लिमिटेड सर्विस’ जाने क्या मतलब है इसका. 

Monday, April 25, 2016

मौन का सागर


भीतर मौन छा गया है, आजकल लिखना नियमित नहीं हो पाता, कभी-कभी लगता है कुछ करने को नहीं रहा, परम विश्रांति को पाया मन शायद ऐसा ही होता होगा. कोई चाहत नहीं तो कोई उद्वेग भी नहीं, कुछ पाना नहीं तो कुछ सोचना भी नहीं, इस जगत में जो प्रारब्ध शेष है उसे सहज भाव से स्वीकारना है और जितना सम्भव हो सके जगत को लौटाना है. सद्गुरू कहते हैं जगत और परमात्मा का भेद भी नहीं रहे, सब एक ही है, कोई विरोध नहीं, जब जो जैसी परिस्थिति आये उसमें वैसे ही मस्त रहना, जैसे आज सफाई कर्मचारी नहीं आया है, पर काम हो ही जायेगा.

भिवानी, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, जोधपुर, उपरोक्त शब्दों और फोन पर हुई बात के आधार पर एक कविता लिखनी है एक परिचिता के लिए उनके विवाह की पचीसवीं वर्षगांठ पर ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं. पुनः सुंदर वचन सुन रही है, संत कहते हैं कि आनन्द को पाने के लिए आनन्द से होकर ही गुजरना पड़ता है, जीवन को देखने की जैसी किसी की क्षमता होती है, जीवन वैसा ही दिखाई देता है. जीवन से छुटकारा धर्म का लक्ष्य नहीं, परम जीवन ही धर्म का लक्ष्य है. आनन्द के भाव से जीवन, उसका सौन्दर्य, सत्य उपलब्ध होता है. दुःख का भाव हटाकर आनन्द का भाव भीतर समोना होगा. जो जीवन को दुःख के भाव से देखना चाहता है वह गुलाब में कांटे ही देखेगा और जो जीवन को सुख के भाव से देखता है वह काँटों में फूल देखता है. दुखी, निराश व उदास चित्त अँधेरे को ही देखता है, आनन्द से भरा व्यक्ति अंधेरे को भी प्रकाश में बदल सकता है ! संसार और परमात्मा दो नहीं हैं, आनन्द के भाव में देखें तो यही संसार परमात्मा में बदल जाता है.


आज छब्बीस नवम्बर है, पिताजी की शादी की सालगिरह, माँ आज होतीं तो उनकी भी. कल नन्हा आ रहा है, इस समय ट्रेन में बैठा है. कल शाम को वह पब्लिक लाइब्रेरी की fund rasing meeting में गई. अच्छा अनुभव रहा. कल रात ध्यान के रहस्य के बारे में सुना, मन में उठते शब्दों का निरिक्षण करना चाहिए, चेतना जब किसी वस्तु को देख लेती है तो वह वस्तु विलीन हो जाती है, केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह जाती है. ऋषिमुख में श्री श्री के विचार पढ़ते-पढ़ते भी ध्यान घटित होने लगता है. वह कहते हैं, चेतना ही निकटस्थ है, मन, बुद्धि व चित्त उसके बहुत बाद है, स्मृति और कल्पना में मन की ऊर्जा व्यर्थ जाती है किन्तु चेतना यदि स्वयं में रहे अर्थात मन चेतना में खो जाये तो ऊर्जा से भर जाता है. वे व्यर्थ ही अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं. जबकि शक्ति बनाने का कार्य उनके ही हाथ में है, कैसा अद्भुत ज्ञान है यह.. जिसे पाकर सारा जगत अपना हो जाता है, सहज समाधि घटित होती है और तब सारे शास्त्र, सारे कर्मकांड, सारी किताबें छोटी पड़ जाती हैं. अनुभव से प्राप्त ज्ञान का एक कण भी उधार के ज्ञान से बड़ा है. उसका मन शांत है क्योंकि इस क्षण वह शांति के उस सागर से जुड़ा है, वह जीवित है, जड़ नहीं है, वह प्रेमपूर्ण है और वह संतुष्ट है, वह है ही नहीं ! 

Wednesday, April 20, 2016

भगवद प्रेम अंक -कल्याण


केवल पूजा करना ही काफी नहीं है. गुरूजी कहते हैं जो पूर्णता से उपजती है वही पूजा है, अर्थात पूर्णता से जो प्रकट हो वही भाव युक्त कर्म, वही उन्हें सजग बनाता है. आज जून गोहाटी गये हैं, वह अपने सभी कार्य बिना घड़ी की ओर देखे कर सकती है. कहा जाता है कि कोई सफल तभी हो सकता है जब समय का ध्यान रखे, पर सफलता का मानदंड क्या है, जीवन के किसी भी मोड़ पर भीतर कोई पछतावा न रहे, आत्मग्लानि न रहे. टीवी पर भगवद कथा का प्रसारण हो रहा है. शरद पूर्णिमा की रात्रि को जो रास खेला गया था उसी को आधार बनाकर. वक्ता कह रहे हैं पुरुष कभी भी यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह बुद्धि में कम है, इसलिए उसकी बुद्धि पर आक्षेप नहीं करना चाहिए. यदि ऐसा कभी महसूस हो तब भी नहीं, क्योंकि ईश्वर ने पुरुष को बुद्धि प्रधान तथा स्त्री को भावना प्रधान बनाया है. लेकिन साधक के हृदय में दोनों का अद्भुत संतुलन हो जाता है, दोनों परों की सहायता से ही पक्षी की उड़ान सम्भव है, एक से नहीं. आज कुछ लोगों को कल के सत्संग के लिए आमंत्रित किया, कल और भी फोन करने होंगे. जून उसकी किताब ‘मन के पार’ का दूसरा ड्राफ्ट बनाकर ले आये हैं, कुछ गलतियाँ थीं. उसे टाइप करने के काम में शीघ्रता करनी चाहिए, कितना कुछ लिखा हुआ पड़ा है. यूरोप पर लिखी कविताएँ उसकी सखी को अच्छी लगीं, जो अपने परिवार के साथ यूरोप घूमने गयी थी. अभी उन्हें और पढ़ने की चाह है. उसके जन्मदिन पर लिखकर ले जाएगी. परमात्मा ने उसे यह कला सौंपी है, इसका पूरा लाभ उठाना होगा जनहित में ! नन्हे ने कहा, वह सोचकर बतायेगा कि उनके साथ विदेश यात्रा पर जायेगा या नहीं. जून ने आस्ट्रिया पर काफी जानकारी मंगा ली है, वे अप्रैल के बाद कभी भी यूरोप जा सकते हैं. 

आज बड़ी भाभी का जन्मदिन  है, उनके लिए एक कविता लिखनी शुरू की है. अभी-अभी ऐसा लगा, यूँ पहले भी एकाध बार लगा है कि आजकल उसे नयी-नयी किताबें पढ़ने का शौक पहले जैसा नहीं रह गया है. यह भी कि वह सजग भी नहीं रह पाती है. कई काम जैसे असजगता में कर डालती है, ऊपर से तुर्रा यह कि वह कार्य करते समय भी यह याद रहता है कि असजग है, पर सजगता धारण नहीं करती. सद्गुरू कहते हैं कि सजग हुए बिना यह पता चलना कठिन है कि कोई असजग है, पर काम तो तब तक हो चुका होता है या हो रहा होता है. समय जैसे-जैसे बीत रहा है यह लक्षण बढ़ रहा है और वैसे ही बढ़ रहा है भीतर का आनन्द, मस्ती और नाद, प्रकाश सभी कुछ, ईश्वर ही सब कुछ है उसके सिवाय कुछ भी नहीं, यह भाव भी दृढ़तर होता जा रहा है, शायद इसलिए अब जगत फीका लगने लगा है. उपन्यास आदि में कोई रूचि नहीं रह गयी है, पढ़ना भाता है तो केवल अध्यात्म संबंधी कुछ भी. इसी महीने की अंतिम तारीख को उन्हें यात्रा पर जाना है, देव दीवाली देखने, उस पर लेख लिखेगी, आँखों देखा विवरण, फिर क्लब की पत्रिका में छपवाने देगी. कल दीवाली के लिए खरीदारी की, एक दुकान में उसे व्यर्थ क्रोध आ गया, वहाँ का वातावरण विषाक्त था, नकारात्मक ऊर्जा भरी थी, सजगता की कमी थी.

जून ने उसकी किताब ‘मन के पार’ की अंतिम सही पांडुलिपि प्रिंट करके ला दी है. वे इसकी पांच प्रतियाँ अपने साथ ले जाने वाले हैं. कल ‘सरस्वती सुमन’ का दूसरा अंक मिला, जिसमें उसकी कविता ‘तुम्हारे कारण’ भी छपी है. आज शाम को क्लब की पत्रिका के लिए मीटिंग है, उसे हिंदी अनुभाग देखना है, ज्यादा काम नहीं होगा, हिंदी में लिखने वाली चार महिलाएं भी नहीं हैं. कल दोपहर एक सखी की भेजी ब्यूटीशियन घर आयी, उसे काम चाहिए था. परमात्मा हर तरह से उसका ख्याल रखता है. आज सुबह एक सखी से बात हुई, वह keep of the grass पढ़ रही है, बनारस की काफी चर्चा है उसमें. दस दिन बाद उन्हें भी वहीं जाना है, उसके पहले दीवाली - दीवाली की मिठाइयाँ, फुलझड़ियाँ और रोशनियाँ ! शाम को कल्याण का ‘भगवद प्रेम’ अंक पढ़ना शुरू किया है. परमात्मा को प्रेम करना ही मानव होने का सर्वोत्तम आनन्द है. उस रसपूर्ण परमात्मा के रस को पाना सारे सुखों से बढ़कर है, वही अमृत है ! प्रेम ही परमात्मा है !

Friday, September 26, 2014

साहित्य अमृत - एक पत्रिका


सत्-चित्त-आनन्द और सत-सिरी-अकाल एक ही सत्ता की ओर संकेत करते हैं, उस आनन्द को पाने के लिए ध्यान में उतरना होगा, क्योंकि इस आनन्द को कोई भौतिक इन्द्रियों से महसूस नहीं कर सकता, उसे तो निर्विकार, निर्विकल्प होकर ही अनुभव किया जा सकता है. आज जून ने उसकी किताब के प्रकाशक शर्मा जी से बात की, उन्हें किताब मिल गयी है, पर अभी तक फ्लापी नहीं देखी है. अब उन्हें धैर्य रखना होगा, उनका कार्य समाप्त हो गया है, अब शेष कार्य प्रकाशक का है. आज कोई नया स्वीपर आया है, इसके काम में सुघड़ता है. कल उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ के संपादक को वार्षिक चंदा भेजा. कल एक पुरानी डायरी में लिखी कई कविताओं को पुनः पढ़ा तो कई स्थानों पर नये शब्द सूझ गये, उसकी साहित्य यात्रा का आरम्भ धीरे-धीरे हो रहा है. नन्हा आज स्कूल गया है, आज सुबह जल्दी उठाया था उसे ताकि आराम से तैयार हो सके.  जून कल शाम को थोड़े खफा हो गये लगते थे, ‘स्क्वैश’ की सब्जी में नमक बहुत ही कम था, नन्हा और उसने खा ली पर वह नहीं खा पाए. आजकल वह उनका विशेष ख्याल नहीं रख रही है, अभी-अभी ‘ध्यान’ पर लिखी एक पुस्तक में पढ़ा, दूसरों की भावनाओं का सदा ध्यान रखना चाहिए, स्वयं को महत्व न देकर सामने वाले की ख़ुशी का ध्यान रखना चाहिए, मन जब निज स्वार्थ से ऊपर उठ जायेगा, जब अपनी ख़ुशी ही सर्वोपरि नहीं होगी तभी ध्यान सधेगा, और वास्तव में वही असली स्वार्थ सिद्धि होगी, अर्थात दूसरों का ख्याल रखकर कोई अपना ही ख्याल रख रहा होता है. घोष वाली वह किताब काफी पढ़ ली है, ‘डॉली’ उसकी एक पात्रा भी ध्यान करती है. दिल्ली की जनता CNG बसों के पर्याप्त मात्र में न होने के कारण बेहाल है, हिंसा पर उतर आए हैं लोग, उसे भतीजी का ध्यान हो आया, उसे स्कूल जाने में जरूर दिक्कत हुई होगी इस अव्यवस्था के कारण. अभी उसे दो पत्र और लिखने हैं, समय मिलते ही लिखेगी.

मानक.आज सुबह जो सुना था वही इस वक्त उसके मन में घुमड़ रहा है. सत्य की राह पर चलने वाले को कदम-कदम पर ध्यान रखना पड़ता है, मन को कुसंग से बचाना है, क्रोध से भी, न जाने कितने जन्मों के संस्कार, कर्म बीजों के रूप में  जो मन में पड़े हुए हैं, जरा सा प्रोत्साहन पाते ही विकसित हो जाते हैं. हर देखे, सुने का चित्र मन पर अंकित हो जाता है, इसलिए अनावश्यक देखना भी नहीं है, सुनना भी नहीं है. जाने अनजाने वे कोई जो भी इच्छा करता है वह समय पाकर किसी न किसी रूप में जरुर पूरी होती है. दुःख को मिटाते-मिटाते और सुख की चाह करते-करते जीवन बीत जाता है, मिथ्या की सत्यता स्पष्ट नहीं होती, तपन कम नहीं होती. ज्ञान रूपी सूर्य को पीठ देकर छाया के पीछे दौड़ते हैं. जीवन में क्रम या नियम तो होना ही चाहिए, इससे ही दक्षता आती है, दक्षता से ही खुद में श्रद्धा होती है, और श्रद्धा से ही खुद को पा सकते हैं. स्वयं को कोसना स्वभाव न बन जाये, इसका अर्थ होगा अपने से तुच्छ को ज्यादा महत्व दे दिया. सुखों के पीछे की गयी अंधी दौड़ पतन के मार्ग पर ही ले जाती है. The glass palace में एक-एक कर सभी मुख्य पात्र मृत्यु के ग्रास बनते चले जाते हैं, उनका भी एक दिन यही हश्र होगा, उससे पूर्व ही सचेत होना है. जिन वस्तुओं के पा लेने पर वे गर्व से फूले नहीं समाते वे उस वक्त काम नहीं आएँगी जब जीवन की अंतिम यात्रा पर जा रहे होंगे. वास्तविक सुख कहाँ है, उसकी खोज करनी है अथवा परम सत्य की खोज करनी है. यह संसार और सारे संबंध सभी वस्तुएं सापेक्ष हैं जो प्रतिक्षण बदलती हैं लेकिन कुछ तो इन सबके पीछे है जो मानक है जिसको मानक मानकर वे उसके जैसा होना चाहते हैं. वह आगे बढ़ते तो हैं, वहाँ तक पहुंच नहीं पाते पर प्रयत्न तो यही रहता है. इस एक परम सत्ता, परम सत्य की खोज में ही वास्तविक आनन्द है, शेष सारे कार्य उनके उस एक उद्देश्य की पूर्ति के निमित्त ही होने चाहिए, उनका व्यवहार, उनका संग, उनकी वाणी इस बात के परिचायक हों कि वे उस पथ के यात्री हैं !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, और आज भी सुबह नहीं लिख पाई, ढेर सारे कपड़े प्रेस करने थे, सो बाकी सारे कार्य तो किये बीएस यही रह गया, क्योनी डायरी लिखना यानि खुद के करीब आना, और खुद के करीब आना एक खस मन स्थिति में ही सम्भव है. आज गोयनका जी आये थे, उनकी बताई विधि से ध्यान में देर तक बैठ पायी. बाबाजी ने भी इन्द्रियों को मन में, मन को बुद्धि में, बुद्धि को स्व में स्थित कर ध्यानस्थ होने की विधि बताई. कल शाम वे 'ग्लैडिएटर' देखने गये, वापस आये तो जैसे फिल्म का प्रभाव उनके मन, वाणी पर पड़ चुका था, वे एक-दूसरे से क्रोध में बात कर रहे थे. सुबह तक उसे यह असर महसूस हुआ. कल दोपहर को उसे पूसी के बच्चों की आवाजें आयीं, परसों उन्होंने अनुमान लगाया था की पूसी माँ बनने ही वाली है. कल शाम को दूर से उसे देखा, छत के निचे बनी पर छत्ती पर वह बैठी थी. कल रात में स्वप्न में एक मार्जारी को देखा, जो उन्हें पंजों से पकड़ क्र बुला रही थी, बिलकुल वैसे ही जैसे इन्सान बुलाते हैं. आज दोपहर उसने नैनी के लिए उसी के लाये कपड़े का ब्लाउज सिला कपड़ा नया तो नहीं था, पर सही हालत में था. हाथ का काम वह खुद करेगी. पूरे दो घंटे लगाये पर पता नहीं कितना सही बना है. अभी अभी एक सखी को फोन किया तो पता चला परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे तो उनके लिए तरबूज लाये थे, जून से ड्राइवर को भेजकर मंगवाने के लिए कहा है. सवा तीन हो गये हैं, नन्हा अभी तक नहीं आया है, उसका गला बभी सुख रहा है, दोपहर जून के जाने के बाद से चाय या पानी कुछ नहीं पिया है और अब एक गिलास ठंडा पानी पीने का वक्त ही रह गया है, थोड़ी ही देर में जून भी आते होंगे और उनके दिन का तीसरा भाग शुरू हो जायेगा.

  


Monday, June 9, 2014

अमलतास की गंध



There was a doctor, oh no ! there is a doctor, who can see the mind of patients, who believes that bodily ailments are only shadows  of mental condition. If one is sad then red cells in his blood will diminish and then he  will be exerted without sufficient  oxygen and then he will be more sad. Blood pressure will decrease and consequently spirit will be low and so on… yesterday she met a doctor which said similar things, and lo.. all her weakness, fatigue, timidness have vanished like they were not there at all. Thank you doctor.

Today is hottest day of this summer, they went for morning walk at 5-10 am, it was pleasant but not cool even at that hour. She has switched on AC and cool air is calming her down. All went well except when she scolded Nanha for doing work slowly. Now she will do her music practice and Nanha will go to his friend’s place to fetch a CD.

अभी सुबह के साढ़े आठ ही हुए हैं और तापमान ३२ डिग्री हो गया है, सुबह साढ़े चार बजे जब वे घूमने गये, तब भी धूप तेज थी. आज दोपहर को एक सखी महीनों बाद उनके यहाँ आ रही है. वे लंच साथ करेंगे और वह उसे सूट की कटिंग में मदद करेगी, उसने सोचा, इस बात के लिए उसे उसका शुक्रगुजार रहना चाहिए, पर वे कितनी जल्दी सब भुला देते हैं. ईश्वर ने उन्हें इतना कुछ बख्शा है, हर कदम पर उनका साथ देता है पर उसके प्रति भी अभिमानी मन कृतज्ञ होना नहीं चाहता, कुतर्क करता है, जीवन शांत चल रहा है, कल शाम जून ने फिर उससे शिकायत की, मगर शिकायती लहजे में नहीं, वह वैसे भी उसका बहुत ख्याल रखते हैं, कल दोपहर दफ्तर से फोन करके याद दिलाया कि उसे आयरन कैप्सूल ले लेना चाहिए. आज वे नन्हे के स्कूल गये हैं, हेड मिस्ट्रेस से मिलना है, स्कूल को कम्पनी की तरफ से सहायता दी जा सकती है या नहीं इस सिलसिले में बातचीत करनी है, यानि पूरी समाज सेवा. जून को इस तरह के कामों में बहुत आनन्द आता है. उसने पडोस की लड़की को पढ़ाना शुरू किया था, पर अब नन्हे का स्कूल भी बंद है, उसके पास समय की कमी है, सो उसकी समाज सेवा सुविधा जीवी है.

Today, it is cloudy, but not cool, stuffy and closed weather, went for morning walk, air was fresh with fragrance of amaltas and gulmohar. Yesterday  her friend came and they spent good time together. Since last one week one lady katha vachak is reciting ‘Bhagvad puran’ in her sweet voice and delightful manner, she is so energetic and full of zeal. She and one other babaji is her morning companions. They teach her to live at ease with herself, to be good to others at any cost, not give much importance to worldly things. Every thing in this world is perishable, only truth is eternal, and to know this is everyone’s goal. Jun was busy whole day yesterday but he was fresh in the morning reading computer at home. Nanha is watching TV since last one hour, enjoying his holidays.