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Tuesday, May 28, 2019

वृद्धा की राम राम



महिला क्लब द्वारा संचालित बच्चों के स्कूल की पत्रिका छप रही है, स्वर्ण जयंती समारोह पर. अभी-अभी उसने एक अंग्रेजी व एक हिंदी लेख की प्रूफ रीडिंग की, सोचा, क्यों न वह भी इसमें अपनी एक कविता दे जो काफी पहले बच्चों पर लिखी थी. ब्लॉग पर कुछ दिन पहले लिखी एक कविता प्रकाशित की. काव्यालय पर उसकी प्रतिक्रिया पसंद आई, ध्यान का ही जादू है, यानि परमात्मा का. उसके मन में कल की बात घूम रही है, देश आगे बढ़े इसके लिए उन्हें भी अपने तौर पर कुछ करना होगा. वह स्वच्छता रखने के लिए क्या कर सकते हैं, इस पर मिलकर चिन्तन करना होगा. स्वच्छता ही सेवा है, इस अभियान को उन्हें सफल बनाना है. बच्चों को भी इस काम में बहुत आनंद आता है.

अब एक ही श्वास में पूल की चौड़ाई पार हो जाती है, जब सहज होकर तैरती है तो पता ही नहीं चलता और दूसरा किनारा आ जाता है. कई बार इधर से उधर चक्कर लगाये. आज गहराई वाले स्थान पर भी गयी. सीढ़ी से पूरा नीचे तक, जहाँ फर्श है पूल का. पानी ने पल भर में ऊपर ला दिया. पानी उनका मित्र है, वह देव है, वह डुबाता नहीं है, यदि वे सहज रहें. तभी बच्चे शीघ्र सीख लेते हैं, आज श्वास का अभ्यास किया, एक हाथ पर देह को पानी में संतुलित रखना है, पर अभी तक मुँह ऊपर उठाकर श्वास लेना नहीं आया है. जैसे यहाँ तक पहुंची है, एक दिन वहाँ भी पहुँच जाएगी. तैरना एक सुखद अनुभव है. नाक से पानी गिर रहा है रह-रह कर, कल भी ऐसा हुआ फिर अपने आप ही ठीक हो गया.

आज सुना, धी, धृति और स्मृति बुद्धि के ये तीन रूप हैं. 'धी' समझने की शक्ति है, 'धृति' संयम करने की और  स्मृति याद रखने की शक्ति है. जो हिंसा नहीं करता, उसकी धृति शक्ति बढ़ती है. धृति ही मन का नियमन करती है, मन नियंत्रित रहता है. जहाँ सुख दिखाई देता है, मन उधर जाता है. यदि धृति भंश हुई है तो अहितकर विषयों से स्वयं को रोकने में समर्थ नहीं हो पाता मन. जिस वस्तु से हटना है, धृति यदि प्रबल हो तो हटने में देर नहीं लगती. अहितकर चीजों को भी करता रहता है. हितकारी प्रवृत्ति को धृति नहीं रोकती.

शनि और इतवार पलक झपकते बीत गये. इतवार को बच्चों ने 'शिक्षक दिवस' मनाया. बरामदे में झालर, गुब्बारे आदि लगाकर सजाया. शनिवार को वे डिब्रूगढ़ गये. कुछ देर ब्रह्मपुत्र के किनारे बैठे. जून ने एक तस्वीर उतारी जो एक सुंदर स्मृति बन गयी है. आज ब्लॉग पर कुछ विशेष पोस्ट नहीं कर पायी. हिंदी फॉण्ट को लेकर कुछ समस्या आ रही थी. उस दिन प्रिंटिंग को लेकर जो समस्या थी, उसका हल करने के लिए कम्प्यूटर इंजीनियर आया था, कल फिर आएगा. कल उन्हें मृणाल ज्योति जाना है. शिक्षक दिवस के लिए उपहार लेकर. एक नई कविता भी लिखेगी.

सुबह समय से उठे, हल्का अँधेरा था, आकाश में छाये बादलों की वजह से शायद. सुबह कई बार बल्कि रोज ही एक वृद्ध महिला ( लाठी लेकर चलती हुई )मिलती है. हर मौसम में उसकी भ्रमण के प्रति निष्ठा देखकर एक दिन उसे 'नमस्ते' कह दिया था, अब वह दूर से उन्हें देखकर ही हाथ जोड़कर 'राम राम' कहना नहीं भूलती. सुबह मृणाल ज्योति में 'शिक्षक दिवस' मनाया. दोपहर को सफाई का काम आगे बढ़ा. तीन बजने वाले हैं एक घंटे के लिए पुनः क्लब के काम से बाहर जाना है. आज अभी तक तो चाय पीने के संस्कार को हावी होने नहीं दिया है. 'व्यसन' की परिभाषा एक बार सुनी थी. जिसको पूरा करने से नुकसान होता हो और न करने से चाह बनी रहती हो, अर्थात जो आरम्भ से लेकर अंत तक दुख देने वाला है, केवल मध्य में सुखी होने का भ्रम पैदा करता है.

Friday, August 10, 2012

स्वीमिंगपूल में पहला दिन




पिछले तीन दिन वह फिर नहीं लिख सकी, सुबह न लिखे तो दिन भर व्यस्तता में याद ही नही रहता. कल रात जून के सो जाने के बाद वह कुछ देर पढ़ती रही, कल पांच पत्रिकाएँ एक साथ जो आ गयी थीं. परिणाम यह हुआ कि सुबह उसे बेहद नींद आ रही थी, वह तैयार हो रहे हैं यह नींद में कोई खबर तो कर रहा था, पर उठ नहीं पायी. बाद में उसे अच्छा नहीं लगा, खुद से वादा किया कि आगे ऐसा नहीं करेगी. जाने क्यों मन जिसे इतना चाहता है कभी उदासीन भी हो जाता है उसके प्रति, शायद ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, ऐसा कहीं पढ़ा था. उसने माँ को लिखा है कि वहाँ रहकर बी. एड करना चाहती है. उनका जवाब शायद महीने के अंत तक आ जाये.

आज उसका काम जल्दी हो गया, नन्हा अभी उठा नहीं है, कल वे उसे इस वर्ष पहली बार स्वीमिंग पूल ले गए थे. उसे बड़ा आनंद आ रहा था, एक बार तो वह पूरा पानी में ही चला गया था, कितना डर गयी थी वह, और नन्हा भी पानी में तैरने-उतराने लगा था ऊपर आने के लिये. अब वे कभी उसे पानी में अकेले नहीं छोड़ेंगे. कल दोपहर भर भी वह पढ़ती रही, इसी कारण आँख में हल्की पीड़ा थी रात को. टीवी पर ‘जिंदगी’ का अंतिम एपिसोड था, अंत सुखद था पर अप्रत्याशित. शायद इसके सिवा औए कुछ सोच ही नहीं सकते थे वे लोग. दोनों घर से पत्र आये हैं, एक शुभ समाचार मिला मंझले भाई-भाभी माता-पिता बनने वाले हैं, पर अब वे लोग यहाँ नहीं आ पाएंगे.

कल उनके नेपाली पड़ोसी अपना कलर टीवी उनके घर रख गए, घर गए हैं अपने परिवार को लाने. उन्होंने The old fox देखा, कुछ समझ में आया, कुछ नहीं, पर रंगीन टीवी की बात ही और है फिर ओनिडा हो तो और भी अच्छा है, सोने पे सुहागा. कल शाम बहुत दिनों बाद दो परिवार उनसे मिलने आये, अच्छा लगा. आज ईद है, जून के दफ्तर में अवकाश है, सोचा था आराम से उठेंगे, पर सुबह-सुबह बिजली चली गयी, गर्मी से नींद खुल गयी. उन्होंने शाक-वाटिका से भिन्डी व भुट्टे तोड़े, अंगारों की तरह गैस पर ठीक से भुन नही पाते, भीतर से कुछ कच्चे ही रह जाते हैं.

पिछले हफ्ते डायरी नहीं खोली, कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है कोई कविता आदि. आलस्य की पराकाष्ठा पर पहुँच गयी है वह, माना कि सुबह जब नन्हा साथ ही उठ जाता है तो संभव नहीं होता पर दोपहर को लिखा जा सकता है, मन भी बस कितना सुविधा-आराम सहित पसंद है. सारे किये-कराये पर इतने दिनों के नियम पर पानी फेर देता है. आज भी उसका मन हुआ वही किताब पढ़ने का, Jean pludiy की Queen Caroline अच्छी किताब है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि दिनभर उसे ही लेकर बैठो. कल वह हॉस्पिटल गयी थी, दो परिचित महिलाओं को देखने, एक ने पांच किलो की बेटी को जन्म दिया है, गोल-गोल प्यारी सी. कल छोटे भाई और बड़ी बहन के पत्र भी आये, भाई अभी घर से दूर है, अगले माह घर जायेगा तभी वह उसे जवाब लिखेगी, बहन ने एक और सवाल पूछा है, जवाब के लिये मन में कितने विचार आ रहे हैं.