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Thursday, May 24, 2018

देव दत्त पटनायक की माय गीता



ग्यारह बजे हैं सुबह के. जून नये घर में हैं. काम शुरू हो गया है. मिस्त्री, प्लम्बर, बढ़ई सभी आ गये हैं. अभी कुछ देर पहले बड़ी भतीजी के लिए एक कविता लिखी. बंगाली सखी के लिए भी लिखनी है, उसके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, नये घर की बधाई दी है. एक सखी ने अपनी भतीजी के विवाह का कार्ड भेजा है.

परसों उन्हें वापस जाना है. दो दिन में घर काफी साफ हो जायेगा. जून आज भी वहीं गये हैं. नन्हा व उसके मित्र दफ्तर चले गये हैं. नन्हा कल रात देर से आया, फिर भी देर से सोया और अब उठकर चला गया है. उसकी दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं है, पर उसका काम ही ऐसा है. मानव मन व तन की सहनशक्ति अपार है. उसे परमात्मा ही शक्ति से भरता है. हर कोई अपने कर्मों के अनुसार ही पाता है तथा जीवन निर्वाह करता है. वहाँ असम में योग कक्षा सुचारुरूप से चल रही है. अब भविष्य में कभी भी उसे कहीं जाना हुआ तो मन में यह खेद नहीं रहेग कि साधिकाओं को कोई परेशानी होगी. यहाँ जो शिवकुमारी नाम की मेड आती है उसे अपने निर्धारित काम के अलावा कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती. इसी तरह लोग अपने को सीमित कर लेते हैं. असीम परमात्मा ही सीमित जीव बनकर देह में कैद हो गया है. मुक्तता का अनुभव इसी मानव देह में हो सकता है, पर मानव इतनी गहरी नींद सोया है कि उसे इस सत्य की कोई खबर ही नहीं लग पाती.

कल वे घर लौट आये हैं. इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं. मौसम बादलों भरा है. कल रात भर वर्षा हुई. बगीचा फूलों से भर गया है. डहेलिया, सिल्विया, एन्थ्रेनियम, कैलेंडुला, और भी जाने कितने फूल..एक हफ्ते में काफी परिवर्तन आ गया है मौसम में, अब बसंत पूरे निखार पर है, कंचन के विशाल वृक्षों में भी गुलाबी और श्वेत फूल दिख रहे हैं. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को योग की कुछ क्रियाएं करवायीं. छोटी बहन से स्काइप पर बात हुई. बड़े भाई को घर में पूजा करवानी है, समय कितनी तेजी से बीत जाता है. भाभी को गये दस महीने हो गये हैं. पिताजी से भी बात हुई, वे अकेले हैं, भाभी मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. भाई कल शाम को घर आ रहा है. उसने इस बार देवदत्त पटनायक की पुस्तक, ‘माइ गीता’ खरीदी एअरपोर्ट से. जून ने कहा, फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक आधे दाम में मिल रही है. पर फ्लाइट में पढ़ने का जो आनंद है, वह नहीं मिलता, फिर भी आगे से ध्यान रखना है. किताबें उसकी सबसे बड़ी मित्र हैं, ज्ञान की देवी सरस्वती इनमें ही तो बसती है !

Thursday, January 29, 2015

इदुलजुहा की रौनक


कल वह छह बजे से थोड़ा पहले उठी, दिन भर संसार का संग किया सो रात को देखे स्वप्न भी ईश्वर के नाम से संयुक्त नहीं थे. कल रात सिर में दर्द था, उस क्षण उसे सचमुच ही संसार दुखों का घर लग रहा था, जैसे शास्त्रों में वर्णन किया गया है. मन बहलाने के लिए वे चाहे लाख प्रसन्नता के उपाय कर लें लेकिन ख़ुशी टिकती नहीं, उसके लिए तो गोविन्द का ही आश्रय ही लेना पड़ेगा. उसने कृष्ण से प्रार्थना की इससे मुक्ति की ! इस जीवन का मोह नहीं रह गया है उसे, किसी भी क्षण इस कठोर दुनिया से उठ जाने के लिए तैयार है लेकिन अगला जन्म भी न हो ...इसकी गारंटी नहीं है सो...कृष्ण को आर्त भक्त नहीं भाते तो सोचा ज्ञान का आश्रय लेना चाहिए. यूँ अगर छोटी-मोटी बातों से मन व्यथित रहा तो मार्ग और भी लम्बा हो जायेगा. इस संसार में तो कहीं ठौर नजर नहीं आता, होश में आ चुके को तो कतई नहीं, पल-पल रंग बदलता है यह जग..स्वार्थ की भाषा बोलता है, पर कृष्ण की नजर से देखो तो कृष्णमय नजर आता है. फिर सब में उसी का रूप और सभी उस पथ के राही दीखते हैं. सब उसी के बनाये खेल के पात्र हों जैसे, तब कोई भेद नहीं रह जाता, कोई आक्रोश नहीं, यह सब एक महानाटक लगता है जिसके सूत्रधार कृष्ण  हैं, और तब मन शांत हो जाता है. अपनेप्रति, सम्बन्धों के प्रति और कर्त्तव्यों के प्रति सजग ! इन्द्रियां तब मन में, मन बुद्धि में, बुद्धि आत्मभाव में स्थित हो जाती है. तन फूल की तरह हल्का, मन रुई के फाहों सा ! कहीं कोई स्थूलता नहीं, कोई भारीपन नहीं, कोई अलगाव नहीं, वाष्प वत आत्मा और उसके निकट परमात्मा..   परसों वह उस सखी के साथ मृणाल ज्योति गयी थी. आज उसने बताया कि अभी वह स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं पा रही, वह उस दिन परेशान रही, असहाय बेबस, बच्चों को देखना उससे सहन नहीं हुआ. नूना को भी उस रात स्वप्न आया कि आग लगने पर बच्चों को छोड़कर वह स्वयं अपनी जान बचाने के लिए भाग आती है.

कोई जो चाहता है, वह होता नहीं, जो होता है वह भाता नहीं और जो भाता है वह टिकता नहीं...इस बात को वे जितनी गहराई से समझ लें उतना ही जीवन सरल व सरस होगा. कृष्ण कहते हैं, मन में प्रसाद हो तो यह मानसिक तप है. करने की शक्ति, जानने की शक्ति और मानने की शक्ति सबके भीतर है, जिनका सदुपयोग करना है. कृष्ण की गीता अद्भुत है, विश्व में अनोखा ग्रन्थ है यह, पढ़ो तो लगता है कृष्ण सम्मुख बैठे हैं और प्यार से समझा रहे हैं. कितने भिन्न-भिन्न कोण से वह उन्हें समझाते हैं. कभी थोडा कठोर होते हैं कभी आश्वस्त करते हुए स्नेह देते हैं, कृष्ण की तरह उनकी बोली भी निराली है ! अभी बहुत कुछ सीखना शेष है, ज्ञान का अथाह भंडार सम्मुख पड़ा है, उसमें से मोती चुगने हैं.

कल एक आध्यात्मिक पत्रिका का अंक मिला, परसों भी एक अंक मिला था, छोटी ननद से बात हुई तो पता चला उन्होंने ही subscribe करायी है. आज मौसम ठंडा है, कल रात आंधी-तूफान और वर्षा हुई. कल शाम ही उन्होंने भिंडी के बीज लगवाये थे, पानी डालने का काम प्रकृति ने अपने ऊपर ले लिया. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है कल उनकी शादी की सालगिरह है, परसों उन्हें यात्रा पर जाना है सो आज ही मना रहे हैं. उसे भी हेयर कट के लिए जाना है, मन के साथ-साथ देह की साज-संवार तो करनी ही पड़ती है. मानव का दुर्लभ तन ईश्वर ने ही दिया है !

कल इदुलजुहा है, उनकी नैनी के यहाँ ढेरों मेहमान आये हैं, जिनकी वह खातिरदारी कर  रही है. जून का ऑफिस बंद है. उन्हें तिनसुकिया जाना है, उसकी किताबें आ गयी हैं, जिन्हें वहाँ से लाना है. सुबह एक परिचिता के यहाँ कोरस में गाया जाने वाला गीत लेने गयी. उसे गले में खराश लग रही थी सो कुछ दिनों के लिए दही खाना बंद किया है आज से, जून ने भी कुछ दिनों से दूध-दही बंद किया है. उम्र के साथ-साथ खान-पान में कुछ परिवर्तन तो करने ही होंगे.


Monday, December 15, 2014

गीता का गीत


नन्हा विज्ञान पढ़ने गया है. उसने ‘इंडिया टुडे’ में दिली के एक चूड़ीवाले के बारे में रोचक लेख पढ़ा .पढ़ते-पढ़ते ही पता नहीं कब आँख लग गयी और स्वप्न में एक नन्हे बच्चे की गार्गलिंग जैसी ध्वनि सुनी, आवाज इतनी वास्तविक थी कि वह झट उठ गयी. चाय पीकर तरोताजा हुई और स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक का अध्ययन शुरू किया, जो उसे बहुत भाती है. संगीता अध्यापिका फिर चली गयी हैं, सो अभ्यास नहीं हो रहा. हर क्षेत्र में गुरू की आवश्यकता है. आज शाम को क्लब में मीटिंग है, वह कुछ देर ध्यान करने के बाद ही जाएगी. पहली तारीख से एक और कोर्स आरम्भ हो रहा है, पुराने प्रतिभागी भी जा सकते हैं. वे जायेंगे. पिछले महीने के अंतिम दिन ही उसे वह अनुभव हुआ था जिसने उसके जीवन को बदल दिया है.

आज ध्यान में अद्भुत शांति का अनुभव हुआ. मन की आँखों से कई अद्भुत रंग देखे. भीतर से एक ध्वनि भी आती प्रकट हुई पहले तो थोड़ा सा डर लगा पर बाद में सुनने में भली लग रही थी. अब ध्यान के लिए बैठने पर मन शीघ्र एकाग्र हो जाता है. सुबह वे उठे तो तेज हवा चल रही थी, देखते-देखते तेज वर्षा होने लगी. नन्हे को स्कूल जाना था पर नहीं गया. आज से उसके स्कूल में ‘स्पोर्ट्स मीट’ शुरू हुई है. उसे बहनों को पत्र लिखने हैं पर उस क्षण की प्रतीक्षा है जब सहज स्फुरणा होगी और कलम खुदबखुद चलने लगेगी.

कल रात जब उन्होंने गेट पर ताला लगा दिया था तो केन्द्रीय विद्यालय की अध्यापिकाएं आयी थीं फिर वे पड़ोसिन के यहाँ गयीं और वहाँ से फोन किया, पर उन्होंने फोन भी स्टैंड पर रख दिया था जो इस कमरे से दूर होने के कारण सुनाई नहीं दिया, कुल मिलाकर उनसे मुलाकत होनी नहीं बदी थी सो नहीं हुई. यूँ भी बिना इत्तला किया किसी के यहाँ इतनी देर से जाना ठीक तो नहीं है. खैर, सुबह पड़ोसिन ने ये सारी बातें फोन पर बतायीं तो नन्हे के हाथ से वह पत्र मंगवाया जो वे देने आयी थीं. कल दोपहर को कार्यक्रम है.

आज सुबह प्रवृत्ति तामसिक थी, बिस्तर छोड़ने में थोडा विलम्ब किया फिर ध्यान भी कहाँ गहन होने वाला था. कल शाम को जून के मजाक पर झुंझलाई और उससे पूर्व बातचीत में परचर्चा की. नये संगीत अध्यापक मिले हैं, अगले हफ्ते फिर जाना है. संगीत की शिक्षा मानव को ऊपर उठाती है और उसे तो उस पथ पर ही अब आगे बढ़ना है.

अक्तूबर का आरम्भ हो गया है. ‘जागरण’ में कृष्ण की गीता से आये अमृत वचन सुने तो अंतर में आह्लाद हुआ. ईश्वर महान है विभु है पर भक्त के छोटे से उर में समा सकता है. उसके दिव्य प्रेम का अनुभव ही साधक को बदल देता है. वही ज्योति बनकर चैतन्य रूप में मानव के भीतर है. वह मित्र भी है और किसी की पुकार को अनसुना कर ही नहीं सकता. ध्यान में तुष्टि बनकर वही तो साधक को प्रेरित करता है. कल शाम जून की लायी एक पुस्तक पढ़ती रही. शाम को एक सखी के यहाँ से भी श्री श्री की भी दो पुस्तकें लायी. उनकी कृपा है जो आनंद के स्रोत का पता बताया है. खबरों में सुना था, विमान दुर्घटना में श्री माधवराव सिंधिया की मृत्यु हो गयी. जीवन कितना क्षणिक है. अगले पल का भी भरोसा नहीं है. कल श्रीनगर में आतंकवादी हमले में इक्कतीस लोग मारे गये, कौन कब किस वक्त इस धरती से उठ जायेगा कौन कह सकता है सो जितना उनका जीवन है, वे पल-पल उल्लास पूर्वक जीयें, उस की याद में जीयें जो उनका पालक है, उन्हें चाहता है. आज उसने योग शिक्षक को अपने अनुभव बताये तो उन्होंने कहा, अच्छा है, पर इसे बहुत महत्व नहीं देना है. अहंकार को पोषने वाली हर शै से दूर रहना है. जिनमें उस की स्मृति बनी रहे वही क्षण मुक्ति के होते हैं शेष तो बंधन में डालने वाले ही हैं !





Thursday, July 17, 2014

मुकेश के गीत


आज बाबाजी ने भारत के मनीषियों के मनोविज्ञान की चर्चा करते हुए कहा, मन की यह विशेषता है कि वह एक साथ दो स्थितियों में नहीं रह सकता, जिस क्षण वह संतुष्ट है, दुखी नहीं है और जिस क्षण वह तृप्ति का अनुभव नहीं कर रहा, सुखी नहीं है. इस विशेषता का लाभ उठाते हुए यदि कोई दुःख में एक क्षण के लिए भी मुस्कुरा दे तो सुख बरस जायेगा, और मुस्कुराना बेवजह मुस्कुराना उसकी आदत में शामिल हो गया है. आज सुबह ऐसा लगा कि उसकी वाणी में रुक्षता आ गयी है पर सचेत थी सो संभल गयी. जून भी कल रात को थोड़ा सा उद्ग्विन दिखे, यात्रा से आने के बाद पहली बार, शायद गर्मी के कारण या नन्हे के देर तक क्लब में रह जाने के कारण. आज सुबह नन्हे के पेट में दर्द था, वह ठीक से नाश्ता भी खाकर नहीं गया, लेकिन वह जानती थी, बहादुर लड़का है, इस बात से छुट्टी नहीं लेगा. जून के साथ कल माँ के लिए साड़ी और कुछ अन्य उपहार खरीदे.

सुबह पांच बजे उठ कर बाहर आयी तो पूसी अकेली दिखी, उसने बच्चों को शायद कहीं शिफ्ट कर दिया है. आज भी विद्वान् वक्ता ने अच्छी बातें कहीं, वह भाषाएँ भी कई जानते हैं. क्लब में children meet होने वाली है, उसकी संगीत अध्यापिका बच्चों के साथ व्यस्त हैं. सो आज क्लास नहीं होगी. अस्पताल जाने के लिए उसने जून को फोन किया, कई दिनों से ऊपरी अधर के पास छोटा सा दाना उभर आया है, जो कितने उपाय करने से भी ठीक नहीं हुआ, अब डाक्टर की राय लेना ही ठीक रहेगा. संभल-संभल के चलना है, व्यर्थ ही कल्पनाओं में भ्रमित रहेंगे तो वर्तमान को कटु बना लेंगे. बीमारी का आगमन तभी होता है जब स्वास्थ्य के नियमों का पालन नहीं करते.

आज सुबह नन्हा उठ नहीं रहा था पर क्रोध नहीं आया, अच्छा लगा कि सहज शब्दों में उसे समझा सकी. जून का हृदय भी उसके प्रति स्नेह से भरा है, उसकी हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का ध्यान रखते हैं, ऐसे ही ईश्वर भी उनकी हर तरह से सहायता करता है, उन्हें इतना कुछ दिया है, उसकी हर छोटी-बड़ी मुश्किल में साथ देता है. और तब भी कृतज्ञता स्वरूप वह उसे अपना एकनिष्ठ प्रेम नहीं दे पाती.

आज बाबाजी ने फटकार लगायी, बारह साल कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह चक्कर लगाते रहें ऐसे भक्त उन्हें नहीं चाहिए, जो सातत्य भक्ति कर सकें, यात्रा पूरी करने का सामर्थ्य रखते हों वही इस क्षेत्र में आयें. कल रात को वह बेचैन थी, मन को एकाग्र रखने का प्रयास व्यर्थ हुआ, शायद उसमें श्रद्धा की कमी है, या वह कई मार्गों पर एक साथ चलने का प्रयास करती है तभी भटक जाती है. आज से वह निश्चित कर लेती है, ‘भगवद् गीता’ उसका इष्ट ग्रन्थ है, इसके अतिरिक्त वह किसी ग्रन्थ का अध्ययन फ़िलहाल अभी नहीं करेगी. कृष्ण ही उसके प्रेम का केंद्र होंगे. रास्ता एक हो उसका ज्ञान हो तो मंजिल शीघ्र मिल सकती है. गीता में भगवान ने स्वयं कहा है, एकनिष्ठ व संशय रहित होकर जो उन्हें भजता है उनके कुशल क्षेम का ध्यान वह स्वयं रखते हैं. प्रभु  जिसके राखनहार हों उसे अन्य किसी से प्रयोजन भी क्या हो सकता है. कल क्लब में छोटे-छोटे बच्चों को इतनी मधुरता से गाते देखकर अच्छा लगा, संगीत में जादू है और फिर संगीत से कोई आराधना भी कर सकता है. कल अध्यापिका ने ‘तीसरी कसम’ फिल्म का एक गीत सिखाया. सजन रे झूठ मत बोलो...मुकेश का गाया यह गीत उसने बचपन में कई बार सुना था.

आज ‘भारत बंद’ के कारण नन्हे का स्कूल बंद है, नूना ने उसे गृह कार्य करने को कहा, पर वह दूसरे-दूसरे कार्यों में व्यस्त है. कभी कभी बच्चे माता-पिता के धैर्य की परीक्षा लेने के लिए ही जैसे उनका कहा नहीं सुनते.




Saturday, July 12, 2014

खीरे का रस


गीता का एक सुंदर श्लोक है, जिसका अर्थ है, वैश्वानर अग्नि के रूप में ईश्वर उनके द्वारा खाए अन्न को पचाने में मदद करता है. ईश्वर तो हर तरह से उनकी सहायता करता है. सोचने, समझने के लिए बुद्धिबल दिया है, आत्मोद्धार के लिए आत्मबल. कल दोपहर बाद से वे व्यस्त रहे एक मित्र परिवार के साथ, जो यहाँ से जा रहे हैं. आज शाम को भी उन्हें भोजन के लिए बुलाया है. जागरण में आज की बात उसे पसंद नहीं आई. भूत-प्रेत की बातें बताकर लोगों को अन्धविश्वासी बना रहे हैं ऐसा लगा, चमत्कार की बात ही करनी है तो इस सुंदर सृष्टि की रचना अपने आप में क्या कम चमत्कार है ? आज नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आई है, धीरे-धीरे काम करती है वह. नन्हे और जून के जाने के बाद उसने नाश्ता किया कुछ देर टीवी देखा. स्कूल की एक टीचर का फोन आया, एक छात्रा के पिता को संदेह है कि उसकी कापी ठीक से जांची नहीं गयी सो री-चेक करवानी होगी. स्कूल छोड़ने के बाद भी सभी खबरें मिलती रहती हैं, कल एक टीचर ने बताया कि एक फेल हो गये बच्चे के पिता ने भूख हड़ताल करने की धमकी दी है, यदि उसे पास न किया गया. पड़ोसिन के बगीचे में कैंडीटफ्ट के फूल हो रहे हैं, उनका सुंदर गुलदस्ता उसने बनाकर दिया. उनकी जीनिया की पौध में से आठ-दस पौधे पूसी नष्ट कर चुकी है. उसने नाराज होकर उसे कुछ भी नहीं दिया, सोचकर कि वह यहाँ से चली जाये पर वह पूरे श्रद्धा भाव से टिकी रही और आज उसे उस पर दया आ गयी. ऐसे ही ईश्वर उनकी लगन चाहता है.

“उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है”. अब उसके भी जागने का वक्त आ गया है. हर क्षण मन पर नजर रखकर अतीत या भावी का चिन्तन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर इस जागृति का अनुभव किया जा सकता है. उसके बिना कोई आधार नहीं, बुद्धि भी हार जाती है एक सीमा तक तर्क करके. इस जग का नियंता जो भी है वही उनके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है. मानव उसका ही प्रतिबिम्ब है, जब वे उसे प्रसन्न करेंगे तो स्वयं भी प्रसन्न हो जायेंगे. क्योंकि प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिए वस्तु में ही परिवर्तन करना होगा. उसे प्रसन्न करने का उपाय अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करना व उससे प्रेम करना है. सद्गुणों का तो वह भंडार है, मानव उसका चिन्तन करेंगे तो वे गुण भी उनके भीतर आ जायेंगे. इतनी सी बात उसकी समझ में नहीं आती थी जो आज सुनी. दीदी इतनी बार राम का जाप क्यों करती हैं व लिखती हैं, आज स्पष्ट हुआ है.

एक लम्बा अन्तराल ! पिछले दिनों कुछ नहीं लिख पायी, एक-दो बार पेन हाथ में लिया पर बात नहीं बनी. जून आज जल्दी आकर जल्दी चले गये थे, वह जरा सुस्ताने लेटी तो खुमारी छा गयी, नींद से जागकर कुछेक छोटे-मोटे काम किये कि नन्हा आ गया, फिर जून और शाम का सिलसिला शुरू हो गया. माँ-पिता, ननद-ननदोई जी और दो प्यारे बच्चे आये और चले भी गये. उनके घर जाने में भी मात्र एक महीना रह गया है. कल शाम वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक मित्र के यहाँ गये, दिन भर धूप में फील्ड ड्यूटी करने के बाद जून के सिर में दर्द था, पर वे, “जो वादा किया है निभाना पड़ेगा”...में यकीन करते हैं. फिर वे जल्दी ही लौट आये. अगले हफ्ते उन्हें मुम्बई जाना है, off shore well के सिलसिले में. नन्हा आज छुट्टी के दिन भी स्कूल गया है, कुछ दिन बाद उसके स्कूल में science exhibition है. उसे याद आया दोनों घरों को पत्र भेजने हैं, और भेजने से पूर्व उन्हें लिखना पड़ता है. पिछले दो-एक दिन से food for health से पढकर चेहरे पर आलू व खीरे का रस लगा रही है. क्रीम बंद, देखें इस प्राकृतिक इलाज का क्या असर होता है. कल रात स्वप्न में देखा, स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया है, अर्थात वासना अभी तक मिटी नहीं, उस दिन एक परिचिता को कैसेट न देकर भी यह सिद्ध हो गया कि लोभ की जड़ें बड़ी गहरी हैं मन में, ईश्वर जो अपना आप बन कर बैठा है सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह सन्सार में फंसे हैं !










Friday, January 3, 2014

स्वर्ण जयंती समारोह


अभी-अभी भगवद् गीता का वह श्लोक पढकर आ रही है जहां भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, उन्हें श्रद्धा से भेंट की गयी एक पत्ती भी अति प्रिय है, एक स्नेह भरा हृदय...और कुछ नहीं चाहिए ईश्वर को, अब तो वैज्ञानिक भी ईश्वर की सत्ता को मानने लगे हैं. बिग बैंग का प्राइम कॉज कहें या गॉड कहें कोई सुपर पावर तो है ही, और हमारे मन में उन असीम सम्भावनाओं का खजाना छिपा है जो इस रहस्य को खोल सकती हैं. ध्यान का महत्व और भी बढ़ जाता है. कल क्लब में डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय से आये प्रोफेसर राज का भाषण बहुत रोचक था, अन्तरिक्ष व ब्रह्मांड के बारे में नई जानकारियां मिलीं, कई सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के विचार जानने को मिले. आज शाम को कोई मेहमान आयेगा शायद सुबह से ही बैठक में फूल सजाने की प्रेरणा हो रही है.

आज जून का जन्मदिन है और कल हमारे देश का भी जन्मदिन यानि जश्ने आजादी कल मनाया जायेगा. यहाँ कर्फ्यू रहेगा सुबह ६ बजे से दोपहर १२ बजे तक. कैसी विडम्बना है भारत में रहकर वे यहाँ झंडा आरोहण में भाग नहीं ले सकते. यूँ देखा जाये तो देश भक्ति मन में होनी चाहिए  अगर झंडा नहीं भी फहरा सके तो क्या ?

आज आजादी की पचासवीं सालगिरह के शुभ अवसर पर उसका मन भारतीय होने पर गर्व अनुभव कर रहा है और वह पूरे दिल से यह चाहती है कि जितनी बार भी उसका जन्म इस धरती पर हो भारत ही उसका देश हो ! टीवी पर आधी रात को हुए संसद के विशेष अधिवेशन की रिकार्डिंग आ रही है. कल रात ११ बजे तक वह जगी फिर नींद ने घेर लिया. मल्लिका साराभाई का नृत्य और ए आर रहमान का गीत संगीत दोनों ही भव्य थे. कल शाम को जून के जन्मदिन की छोटी सी पार्टी अच्छी रही सिवाय एक बात को छोड़कर, नैनी ने पहले ही चाय बनाकर रख दी और वह कड़क हो गयी. गल्ती उसी की थी, पर सब अपने लोग थे जो किसी ने कुछ नहीं कहा. आज सुबह  लालकिले की प्राचीर से प्रधान मंत्री का भाषण सुना, जो प्रेरणादायक होने के साथ कमियों की ओर ध्यान दिलाने वाला था. इस समय भीम सेन जोशी का आवाज में ‘वन्दे मातरम्’ यह प्रसिद्ध गीत बज रहा है जो बंकिम चन्द्र ने आजादी की लड़ाई के दौरान लिखा था. कुछ गीत अमर हो जाते हैं जैसे इक़बाल का तराना, सारे जहाँ से अच्छा..गांधीजी, नेहरु और सुभाष चन्द्र बोस के भाषणों के अंश सुने और मन उनके सम्मुख स्वतः झुक गया. लता मंगेशकर के गाए गीत की अभी प्रतीक्षा है. आज रात star टीवी  पर Train to Pakistan आएगी और १५ अगस्त का दिन बीत जायेगा.

आज इतवार है, कल शाम से ही वह कुछ परेशान है. कारण वह जानती है पर उसका निवारण नहीं कर पा रही है. उस दिन उन्होंने वह फिल्म देखी, सामान्य ही लगी उसे. कल शाम वे मेला देखने गये, आज सुबह उसने तिरंगा सैंडविच बनाया और दिखाने के लिए सेक्रेटरी के यहाँ ले गयी, उन्हें पसंद आया और कुछ देर पहले उनका फोन आया कि वह स्टेज की सजावट की जिम्मेदारी भी ले, हॉल का प्रबंध तो वह दख ही रही थी अब यह काम....शायद यही उसकी परेशानी का सबब  है और एक बात और उसे परेशान कर रही है, पिछले कुछ दिनों से हिंसा की घटनाएँ बढ़ गयी हैं, उल्फा और बोडो दोनों ने ही असम के निर्दोष लोगोंपर हमले तेज कर दिए हैं, इन्सान कहाँ जा रहा है, इस अंधी दौड़ का कहीं तो अंत होगा. उसने ईश्वर से प्रार्थना की, वह उन्हें सही मार्ग दिखाए.

कैसी है यह विडम्बना
हँसते हैं अधर, पर आँखों में अश्रु आते भर
इक हाथ उठा, इक हाथ बढ़ा
दोनों का लक्ष्य भिन्न मगर
हिंसा का कैसा चला दौर
आजाद मुल्क आजाद फिजां
फिर क्यों न बने यह सबका घर



Sunday, December 29, 2013

बच्चों के कमरे के पर्दे


ऐसा क्यों होता है कि कभी-कभी भगवद् गीता के श्लोक और उनका अर्थ उसे पूर्णतया स्पष्ट हो जाता है और कभी-कभी वे बहुत दुरूह लगते हैं. सम्भवतः इसका कारण है उसके मन की ग्राह्य शक्ति, वह एक सी नहीं रहती. कल की मीटिंग अच्छी रही, सुबह उसने इस सिलसिले में कई फोन किये. आज नन्हे का स्कूल जल्दी बंद होगा, माह का अंतिम दिन है. कल एक परिचिता ने बताया, उसे एक जगह काम मिल गया है, ठीक-ठाक पैसे मिलेंगे, लोग हमेशा ही पैसों को महत्व देते हैं. उसने जून को बताया तो वे भी यही बोले, ज्यादा पैसों के कारण थोड़ी तकलीफ सही जा सकती है, उसे आश्चर्य हुआ. उसने पुरानी बात याद दिलाई और बिना बात के ही मन को उदास किया. बाद में सोचा तो लगा, यदि कभी जून ने उसकी स्वतन्त्रता का हनन किया भी तो एक हक के साथ पर उससे उसके अहंकार को चोट पहुँची और ...क्या वाकई इन्सान का अहंकार इतना महत्वपूर्ण होता है कि रिश्तों की भी परवाह नहीं करता, वह उस वक्त भी खुद को समझने की कोशिश कर रही थी. अर्थात उसे भान था कि वह क्या कर रही थी, यह क्रोध में किया हुआ कोई ऐसा काम नहीं था जिसके लिए बाद में पछताना पड़ता है. उसे ठेस पहुँची थी और जून उस बात को समझ नहीं रहे थे. इसी को टेकेन for ग्रांटेड कहते हैं, उसका व्यवहार अनुचित था इसमें दो राय नहीं थी और इसलिय सुबह क्षमा मांगी और अब मन शांत है. आज दोपहर उसे हिंदी की क्लास लेने जाना है सो संगीत का अभ्यास अभी कर लेना होगा.

.... “और बुखार हो गया” कल इतनी धूप में वे तीनों हिम्मत दिखाते हुए तिनसुकिया गये. वापस आकर एक घंटे के अंदर ही उसे तपन सी महसूस हुई, बुखार चढ़ रहा था. पिछले कई हफ्तों से सबके बुखार की बात सुनते-सुनते वह स्वयं पर थोड़ा ज्यादा भरोसा करने लगी थी, स्वयं को ठीक रखने में सक्षम है, कि उसे कुछ नहीं हो सकता. जून कल से उसे कोई काम करने नहीं दे रहे हैं. पर उसने सुबह से अपने नियमित सभी काम किये हैं, पढ़ाना भी और दोपहर को संगीत सीखने भी जाएगी. छोटी बहन से बात की वह भी आराम करने व स्वास्थ्य लाभ के लिए घर आयी हुई है पर माँ-पिताजी छोटी बुआ के पास गये हैं उसकी देखभाल करने, अपने ही अपनों के काम आते हैं.  सुबह नन्हे ने कहा, फिर बुखार है, फिर माथा छूकर कहा, हाँ गर्म तो है. बुखार में लेकिन मन शान्त हो जाता है. ध्यान करने का प्रयास तो नहीं किया पर करे तो अवश्य आसानी होगी.

कल शाम को ही उसका बुखार उतर गया था. यूँ सुबह से ही वह उसे धता बताने का प्रयास कर  रही थी. शाम को अचानक आये मेहमानों का स्वागत भी सामान्य ढंग से किया. जून अलबत्ता कुछ ज्यादा ध्यान रख रहे थे. कल शाम उन्होंने नन्हे के कमरे के लिए नये पर्दे काटे, थोड़े से टेढ़े कट गये और वे घबरा गये पर बाद में पता चला समस्या उतनी गम्भीर नहीं थी जितनी वे समझ रहे थे. आज दोपहर से वह सिलना शुरू करेगी. आज खत भी लिखने हैं, राखियाँ भेजनी हैं. उसे ध्यान आया मंझले चाचा के बच्चों, दोनों भाई-बहन की उम्र हो गयी है पर उनके विवाह की कोई खबर सुनाई नहीं देती, बिन माँ के बच्चे ऐसे ही होते हैं. छोटे चाचा के बच्चे भी कुछ वर्षों में विवाह के योग्य हो जायेंगे. मातापिता के अयोग्य होने की सजा निर्दोष बच्चों को भुगतनी पडती है. आज भी धूप तो है पर गर्मी कम है.

जिन्दगी, कैसे कैसे राज छिपाए हैं तूने
खुल जाये तो फट जाये कलेजा खुदा का भी
जन्नत भी यहीं है और जहन्नुम भी इधर ही
मिल जाये सही राह तो मंजिल का पता भी 

Saturday, September 14, 2013

मेले में झूला


अभी कुछ देर पहले वे टहलने के लिए निकले ही थे कि गले में कुछ चुभता सा महसूस हुआ, कुछ अजीब सा जैसे कोई लम्प हो और अभी-अभी मेडिकल गाइड में lump in throat पर पढ़ा, लिखा है, कभी-कभी यह सिर्फ तनाव की वजह से भी होता है. पर उसे लगता है यह केवल फिजिकल कारण से है, कल सलाइवा ग्लैंड में pain था उसी से जुड़ा कोई मर्ज है. आज १५ अगस्त है, आजादी के ढेर सारे तराने सुने, देवेगौड़ा जी का भाषण भी सुना. दोपहर को मित्रों के साथ सहभोज भी अच्छा रहा. इस समय टीवी पर ‘फौजी’ आया रहा है, जिससे थोड़ी देर के लिए वह lump के बारे में सोचना भी भूल गयी थी, पर अब सीरियल खत्म हो गया है और लम्प फिर याद आ गया है.

जून क्लब गये हैं, Treasure Hunt में भाग लेने, अभी दो भी नहीं बजे हैं और उसे अकेलापन (शनिवार के दिन) खटक रहा है. नन्हे के आने में अभी पूरा एक घंटा है. कुछ देर एक पत्रिका से कटिंग्स करती रही, कुछ देर पढ़ी भी और अब टीवी, पर मन कहीं  स्थिर नहीं हो रहा है. उस दिन गीता में पढ़ा ही था, राजसिक वृत्ति वाले थोड़ी देर स्थिर नहीं बैठ सकते. उनका चित्त इधर-उधर दौड़ता रहता है. सात्विक गुणों से वह दूर है और तामसिक भी ज्यादातर समय तो नहीं है फिर राजसिक प्रवृत्ति ही है जो एक कार्य में मन लगाने नहीं देती. मन को शांत, स्थिर करना ही तो अध्यात्मिक, धार्मिक व नैतिक कर्त्तव्य है. मन को साधै सब सधे.. ठीक ही कहा है किसी कवि ने. इस हफ्ते छोटे व मंझले भाई के पत्र आए हैं, सोमवार को जवाब लिखेगी जो उसका खतों के उत्तर लिखने का दिन है.

आज मौसम सुहाना है, न सर्दी न गर्मी..और वह भी ऐसी ही होना चाहती है. सुबह नन्हे को डांट कर उठाया तो, पर बाद में सुना, खुश रहने का उपाय है दूसरों को ख़ुशी देना. कल वे मेला देखने गये, ऊँचे झूले पर बैठे वह आँखें नहीं खोल पायी डर से कुछ पल के लिए, जबकि नन्हा आराम से मजे ले रहा था. उसे देखकर वह भी सामान्य हो गयी. उस दिन किसी भी टीम को खजाना नहीं मिला, इतने कठिन क्लू थे कि समय सीमा समाप्त हो गयी थी. उनके आने में अभी एक घंटा है, वह आज पहली बार coconut rice बना रही है, इस उम्मीद पर की उन्हें पसंद आयेगा.


अभी-अभी एक सखी से फोन पर बात की और दिल जैसे सुकून से भर गया. बंगाली सखी ने खत में लिखा है, मैत्री बहुमूल्य है उसे वह खोना नहीं चाहती, वह भी मित्रता खोना नहीं चाहती, किसी हद तक यह नितांत आवश्यक है. आज टीवी पर खाना खजाना में मसाला दोसा व साम्भर बनाने की विधि सीखी और उस सीखे हुए का उपयोग कर  साम्भर बना रही है. जून और नन्हे दोनों को ही पसंद है. अभी-अभी एक सखी से बात की वह मेंहदी लगाना सीखने के बाद अब पेंटिंग सीख रही है. और इसके बाद सिलाई सीखेगी. उसे भी कुछ सीखना चाहिए जैसे कि मीठा बोलना, अच्छी सी कविता लिखना, ऐसी जो उत्साह से भर दे या फिर मित्रता निभाना और पत्र लिखना. खुद को व जून और नन्हे को स्वस्थ रखना, घर का माहौल शांत व साफ-सुथरा बनाना और सुबह सवेरे जल्दी उठना. जून ने भी कहा आज, वह उठ जल्दी उठेगी तो सारा घर उठ जायेगा. और भी कुछ सीखना है पर पहले घड़ी की तरफ नजर डाल ली जाये उसने सोचा, ग्यारह बजे से पहले-पहले ही खाना तैयार हो जाना चाहिए.



  

Sunday, August 5, 2012

रवा दोसा और कटलेट



कल वह अभी स्नान ही कर रही थी कि नन्हा उठ गया और उसके बाद पढ़ना-लिखना कुछ नहीं हुआ, दोपहर को भी वह सिर्फ एक सवा घंटा ही सोया, उसके साथ व्यस्त रहते समय का पता ही नहीं चलता. दिन बीत गया और आज अभी तक वह निद्रालोक में है. जून की कल रात की ड्यूटी थी, सुबह आये, सो वह भी सो रहे हैं. कर्मचारियों की हड़ताल के कारण उनकी ड्यटी ओ.सी.एस.१ पर लगी थी. हड़ताल वापस ले ली गयी है सो सुबह छह बजे वे लौट आये, अन्यथा उन्हें आज का दिन व रात भी अकेले ही रहना पड़ता. कल उसने बड़ी बनाने के लिये दाल भिगोई थी, पीस भी दी थी, पर सुबह से वर्षा, बादल...धूप का तो नाम भी नहीं. आज गीता का चौदहवां व पन्द्रहवां अध्याय पढ़ा, सात्विक, राजसी व तामसी प्रवृत्ति वाले मनुष्यों के गुण बताए गए हैं. उसकी प्रकृति राजसी है, आखिर क्षत्रिय वंश की है.
जिस पेन से वह पहले लिखती थी, नहीं मिला शायद जून ले गए हों. आज सुबह उसने अलार्म सुना था पर फिर सो गई, सोचा जून अभी उठेंगे और उसे उठायेंगे, पर वे खुद भी देर से उठे, जल्दी-जल्दी सब करके उन्हें ऑफिस जाना पड़ा. उसे अपने व्यवहार पर आश्चर्य हुआ, उसे अपना यह व्यवहार खुद भी समझ में नहीं आता. अलार्म सुन कर उसका न उठ पाना और यह सोचना कि उसने ने भी तो सुना होगा, सुबह की नींद कितनी आलस्य भरी होती है, शायद उन्हें सुनाई ही नहीं दिया हो, उसने सोचा आज वह उनसे पूछेगी, सुबह तो समय ही नहीं था. आज क्लब में फिल्म है, Passage to India   वे जायेंगे. उसने याद करने की कोशिश की कि आज क्या पढ़ा था पर सफल नहीं हुई, उसे लगा वह आजकल पाठ पुरे मनोयोग से नहीं करती, कुछ याद नहीं रहता. इससे तो कोई लाभ नहीं सम्भवतः कुछ लाभ तो अवश्य है पर विशेष नहीं.

नन्हा कल रात सो नहीं पाया मच्छरों के कारण सो अभी तक सो रहा है. वे दोनों भी कहाँ सो पाए, उसे तो बहुत देर से नींद आयी और जब नींद खुली तो जून जा चुके थे. पता नहीं कैसे उनकी मसहरी में मच्छर चले आते हैं. कल क्लब में Passage to India  देखी, कोई भी हिंदी फिल्म इस तरह दिल-दिमाग पर नहीं छायी होती, रात भर फिल्म के सीन ही आँखों के सामने आ रहे थे और अभी सुबह भी डॉ आज़िज़ की पुकार, उसका निष्पाप चेहरा. लेकिन जून को बीच में ही नन्हें को लेकर बाहर आना पड़ा, हमने तय किया है अब से एक बार में एक ही जन देखेगा, एक सोनू के साथ घर पर ही रहेगा और बाद में कहानी सुन लेगा. कल दोपहर वह जून से फिर छोटी सी बात पर नाराज हुई, कितना मन को समझाये और कितना पढ़े पर उस वक्त यह सब याद कहाँ रहता है.

कल-परसों दो दिन नही लिख सकी, परसों जून खरसांग गए थे शाम को लौट आये. कल दिन में उसने बारबरा कार्टलैंड का नॉवल lane to rescue पूरा किया, छोड़ने का मन ही नहीं होता था, लगता था सब आँखों के सामने हो रहा है. बेल बजी है सफाई कर्मचारी आया है. नन्हा अभी सोया है. कल शाम वे लोग प्रार्थना गए थे, रवा दोसा और कटलेट मंगवाया, अच्छा लगा, घर आकर दोनों टेली फिल्म देखीं अच्छी थीं दोनों ही. पता नहीं कैसे कल वे दोनों अलग-अलग सोच रहे थे कि शाम को बाहर जायेंगे किसी रेस्त्राँ में.

Tuesday, July 31, 2012

तेरी गठरी में लागा चोर



पहले कामना, फिर पूरी न होने पर क्रोध अथवा पूरी हो जाने पर मोह, यही कारण है जो मानव को बुराई की ओर अग्रसर करता है. उसने मन ही मन गीता में पढ़ा यह वचन दोहराया. आज सुबह से बल्कि कल शाम से ही बादल बने हुए हैं पर बरस नहीं रहे. कल शाम वे घर पर बिना ताला लगाये लगभग एक घंटा घर से बाहर रहे, ईश्वर की कृपा से कुछ हुआ नहीं पर मन में एक डर अवश्य था, पिछले दिनों दूसरी नयी कालोनी में हुई चोरी की बात सुनकर, जिसमें कपड़े, गहने, बिस्तर सहित चोर खाने-पीनेकी वस्तुएं तक ले गए. क्या इन चोरों के पास हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती, दूसरे को इतना नुकसान पहुँचा कर स्वयं धनवान बनने की सोचना ! चोरी से बढ़कर कोई दुष्कर्म नहीं.
उन्होने फिरसे पत्रिका क्लब खोलने का निर्णय लिया है. कल लाइब्रेरी से दो पुस्तकें और लायी है और दो पत्रिकाएँ भी. कल भाई-भाभी व माँ-पापा के पत्र मिले. नन्हा अब काफी बातें करने लगा है, बहुत से नए शब्द सीखे हैं उसने, अभी मुस्कुराते हुए उठेगा और उसके गले में बाहें डाल देगा फिर तुतलाते हुए कुछ बोलेगा आटो, या स्कूटर या फिर पापा.

टीवी का एंटीना तो लग गया पर दो घंटे काम करने के बाद फिर से तस्वीर गायब है. कल शाम की फिल्म शायद ही देख पाएँ. जून, पीछे वाले पड़ोसी और अन्य तीन-चार लोग थे कितनी मुश्किलों के बाद इतनी भारी रॉड को उठाकर वे सीधा खड़ा कर पाए और फिर जून छत से ही नहीं उतर पा रहा था. उसके बाद सबने एक और घर में लगाया अब तीसरी जगह लगाने गए हैं. नन्हा गली के उस ओर दाईं ओर के घर में गया है, वहाँ एक छोटी लड़की है आठ-दस साल की जो उसके साथ खूब खेलती है, तभी वह कुछ लिखने बैठी है. कल शाम से ही बिजली नदारद थी, अँधेरे में खेलते-खेलते नन्हा परेशान हो गया था बहुत झुंझला उठा था, ऐसे में जून भी उसे सम्भाल नहीं पाते. आज उसने पत्रों के जवाब दिए. वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही, लगता है महरी आज भी काम करने नहीं आयेगी.



Friday, July 27, 2012

नन्हें की ट्राई साइकिल



नया वर्ष आरम्भ हुए हफ्तों बीत गए, मन में विचार तो कई बार आया पर आज ही यह सुअवसर मिला है कि पेन उसके हाथ में है. उसे लिखना है यह भाव तो मन में कई बार जगा पर कार्यान्वित नहीं हो सका. वे एक महीने के लिये घर गए थे, वापसी में नन्हें को फिर सर्दी लग गयी, दिसम्बर में उत्तर भारत बहुत ठंडा होता है. उन्हें घर से आये भी दो हफ्ते हो गए हैं, पर उसका स्वास्थ्य पूरी तरह अभी तक ठीक नहीं हो पाया है. कल ससुराल से पत्र आया और आज मायके से. दोनों में उसका हाल पूछा है. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं और यह कोई माकूल वक्त नहीं है लिखने का. नन्हा और वह कुछ देर हुए उठे हैं सोकर, यदि आज शाम वर्षा नहीं हुई तो वे लोग अवश्य कहीं घूमने जायेंगे. आज दोपहर उनकी लेन के एक बंगाली महोदय की बात सुनकर हँसी भी आयी पर बाद में सोचा तो उन्हें सही पाया. वाकई उनका जीवन कितना बंधा-बंधाया है, एक ही ढर्रे का, कोई नयी बात महीनों तक नहीं होती. यहाँ ऐसा ही है. वे लाइब्रेरी जायेंगे कुछ अच्छी किताबें ही मिल सकती हैं, पर वर्षा रानी ने साथ दिया तभी तो.
दस बजने वाले हैं, उसका सभी कार्य हो चुका है, जो शेष है वह जून के आने पर ही होगा, वह फुलके उसके आने पर ही बनती है. पर आज सफाई कर्मचारी अभी तक नहीं आया. कई दिन बाद आज तेज धूप निकली है, सोनू अपनी ट्राईसाइकिल लेकर बाहर गया है, और उसे आवाजें दे रहा है, वह सड़क पर जाना चाहता है.
आज से उसने दिनचर्या में कुछ परिवर्तन किये है, फिर सोचा यदि ईश्वर सहायक रहा तो यह सफल होंगे वरना...किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है, मन पर कैसा आघात होता है, फूट फूट कर रो रहा है वह. नन्हा अभी तक सोया है, तभी वह जून के जाने के बाद झाड़-पोंछ का कार्य निपटा कर स्नान कर सकी फिर गीता पाठ और योगासन और अब यह डायरी. पिछले कुछ दिनों से उसका मन बहुत उद्वगिन है, जो करना चाहती है वह हो नहीं पाता. परसों रात कितनी सुंदर कहानी सोची थी एक-एक वाक्य स्पष्ट था पर कल जब लिखने बैठी तो जैसे दिमाग की स्लेट ही पुंछ गयी हो. इतना जीवन बीत गया पर क्या किया इतने वर्षों में, कोई सार्थक उपलब्धि नहीं, बहुत गर्व था अपनी लेखनी पर कहाँ गए वे आन्दोलित करने वाले विचार, वह जेपी पर लिखी कवितायें, वे क्रांति की बातें. जीवन की दौड़ में उसका स्थान कहाँ है ?

Monday, June 4, 2012

आटे का हलवा


लगता है वह अब दिन जल्दी ही आने वाला है, कितना उत्सुक है नव जीवन भी बाहर आने के लिये, एक छोटे बच्चे को स्वप्न में देखा पर बाद में वह दीदी की गोद में था. रात को नींद खुल गयी फिर करवट बदलते बीता कुछ समय, उसके बाद भी स्वप्न देखती रही, माँ-पिता को देखा छोटे भाई व बड़ी बहन को भी, छोटा भांजा कितना बड़ा हो गया होगा, बड़ा स्कूल जाने लगा होगा. सुबह वे जल्दी उठ गए थे, रात को जून ने कहा था सुबह जल्दी उठकर आधा घंटा बातें करेंगे, कल दिन भर वे आधा घंटा भी साथ नहीं बैठे होंगे. वह कैमरा लाया था ऑफिस से आते समय जो उसने नागपुर से किसी से मंगवाया था, सोच ही रहा था कि कैमरे के बारे में जानकारी लेने किसी के पास जाये तभी कोई अतिथि आ गए फिर वह उन्हें छोड़ने गया. शाम को वे पुनः पड़ोस के नव शिशु से मिलने गए, अश्विनी नाम रखा है उन्होंने उसका. उसे वही वस्त्र उपहार में दिये जो माँ बनारस से लायी थीं. शाम को एक बंगाली मित्र आयी, तब वे टीवी पर एक नाटक देख रहे थे, जो नूना का पढ़ा हुआ था.
आज दिन की शुरुआत बेसुरे ढंग से हुई है. बाएं पैर में हल्का दर्द है. जून शायद आज डिब्रूगढ जाये सुबह उसके लिये आटे का हलवा बनाया जो बिल्कुल अच्छा नहीं बना, पता नहीं उसे आटे का हलवा इतना पसंद क्यों है. बचपन में घर पर साल में एक बार बनने पर भी वह नहीं खाती थी. रात को अजीब सा स्वप्न देखा, स्वप्न में जून से झगड़ा होता है उसका, इतना सब होने पर यदि मन उदास हो जाये तो स्वाभाविक ही है पर जाते समय वह कह कर गया है कि खुश रहना. और अभी गीता का पांचवा अध्याय पढ़ने के बाद संभव है कुछ सांत्वना मिले.   
   

Monday, January 16, 2012

इंद्रधनुष सतरंगी नभ में


सुबह के सवा नौ बजे हैं, आधा घंटा पूर्व नूना सूखने के लिये कपड़े तार पर फैला कर इस कमरे में आयी थी. गीता खोली पढ़ने के लिये पर मन नहीं लगा, पता नहीं क्यों कभी-कभी मन बेवजह ही उदास हो जाता है. बाहर लॉन में दो कर्मचारी फेंसिंग ठीक कर रहे हैं. मिल्क कुकर आवाज दे रहा  है, दूध उबल गया है. कल रात कितने स्वप्न देखे, शाम को एक वर्ष पहले लिखी चिठ्ठी पढ़ी. एक वर्ष में कितना कुछ बदल गया है. प्यार का उमड़ता वह समुद्र अब शांत गहरे जल में बदल गया है. क्यों, कैसे, कब, क्या हो जाता है, क्या छूट जाता है, कुछ समझ नहीं आता. सत्य को स्वीकारना होगा. यही कर्त्तव्य है और कर्त्तव्य से भागना नहीं चाहिए. खुले मन से यदि सब कुछ जैसा है वैसा ही स्वीकारें तो...कितना अच्छा हो.
अब दोपहर के तीन बजे हैं, नूना खुशवन्त सिंह की पुस्तक पढ़ती रही दोपहर भर. आँखें थक गयी हैं. अभी सूजी का हलवा बनाना है शाम के नाश्ते के लिये. कल क्लब में आनंद फिल्म देखी, बाहर निकले तो आकाश में इंद्रधनुष था, कितना सुंदर लगता है इन्द्रधनुष, यहाँ उसे रामधेनु कहते हैं. जब भी इसे देखती है बचपन में पढ़ी कविता याद आ जाती है, when I behold a rainbow in the sky my heart leaps up….

  

Monday, June 27, 2011

गीता ज्ञान


समय है शाम का, वे दोनों डाइनिंग कम रायिटिंग टेबिल वाले कमरे में हैं, आज का दिन अच्छा सा था, उजला-उजला. सुबह नींद खुली छह बजे, जल्दी-जल्दी में बस हॉर्लिक्स बनाया. दोपहर बाद टीटी खेलने गए फिर लाइब्रेरी, शाम का नाश्ता और अब यहाँ हैं, पत्र लिखने हैं. आजकल नूना लोकदास बर्मन की सरल गीता पढ़ रही है पर पढ़ते वक्त जितना समझ में आता है, बाद में याद नहीं रहता, आचरण में नहीं ला पाती. जैसे क्रोधित न होने की सीख है, छोटी-छोटी बातों पर रुष्ट होना और दुखी होना नहीं छूटता. वह सोचती है कि ईश्वर उसके साथ है और वही उसे मार्ग दिखायेगा.