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Friday, March 28, 2014

भूपेन हजारिका का जादू


आज विश्व पर्यावरण दिवस है, अमलतास के पीले फूल, गुलमोहर के लाल पुष्प और एक अनजान वृक्ष के गुलाबी कुसुमों ने सारे नगर को एक कैनवास में बदल दिया है. सडकों पर भी फूल बिछे हैं जैसे किस ने रंग छिडक दिये हों. आज नये स्कूल में पहली बार नन्हे को अस्वस्थता के कारण छुट्टी लेनी पड़ी है, जून उसे अस्पताल ले गये और दवा दिलाई. इस वक्त ठीक लग रहा है. ईश्वर उसे सेहत व शक्ति दे जिससे अगले हफ्ते होने वाले इम्तहान अच्छी तरह से दे सके. कल शाम एक परिवार मिलने आया, वृद्ध माता-पिता भी थे, सारी शाम उनके साथ जो बातें कीं रात को सोते वक्त भी मन को खटखटाती रहीं. कल क्लब में भूपेन हजारिका आ रहे हैं. उसने एक सखी को साथ चलने का निमन्त्रण दिया.

आज दिगबोई जाने वाले सभी बच्चों ने व उनके माता-पिता ने सोमवार से होने वाली परीक्षाओं की तैयारी के लिए उनका घर पर रहना ही तय किया सो नन्हा जो आज जाने के लिए तैयार था, उसे घर पर ही रहकर पढ़ने का अवसर मिल गया. इस समय आठ बजे हैं, वह पिछले एक घंटे से आँखों को जबरदस्ती खोलकर geography की work book हल कर रहा है. कल छोटे भाई ने जन्मदिन की बधाई दी, इतने दिनों बाद उसे अपने आप शायद ही प्रेरणा हुई होगी, जरूर किसी ने याद दिलाया होगा. उसका कार्ड तो पहले ही मिल गया था.

कल शाम वे भूपेन हजारिका का कार्यक्रम देखने क्लब गये तो सारी सीटें भर चुकी थीं. कुछ देर जून और उसने खड़े होकर ही देखा फिर जून के एक मित्र ने अपनी सीट उसके लिए छोड़ दी, कल्पना लाजमी भी आई थीं. उसकी परिचिता एक महिला के भजन गायन से शुरुआत हुई, एक अन्य स्थानीय गायक की दो गजलें भी अच्छी थीं- 

अंदर अंदर क्या टूटा है, चेहरा क्यों कुम्हलाया है
तन्हा तन्हा रोने वालों,  कौन तुम्हें याद आया है
और
तू ख्याल है किसी और का, तुझे सोचता कोई और है

डाक्टर भूपेन हजारिका काला कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा व टोपी पहने थे. ‘दिल हूम हूम करे’ गाना सुनकर सभी मंत्र मुग्ध हो गये. उनकी कई बातों ने भी लोगों को हंसाया, लोगों की भीड़ देखने लायक थी. पूरा हाल खचाखच भरा था. वे पूरा कार्यक्रम तो नहीं देख पाए, नन्हा घर पर अकेला था, उसे अकेले छोड़कर जाना अच्छा भी नहीं लगा था पर भूपेन हजारिका को देखने का लोभ संवरण नहीं कर पायी.

आज एक सखी ने फोन किया, वह दूधवाले को कह दे कि दोदिन बाद उसे एक लीटर दूध ज्यादा दे, उसकी समझ में यह नहीं आता कि वह उसका भी दूधवाला है फिर वह उसके द्वारा क्यों कहलवाना चाहती है. खैर, वह और उसकी बातें वही जाने. आज भी वर्षा बदस्तूर जारी है पिछले दो-तीन दिनों की तरह. कल नन्हे का पहला पेपर था, परसों रात को उसे नींद नहीं आ रही थी, बच्चों को भी घबराहट का सामना करना पड़ता है पर कल वह ठीक था. कल उसने ड्राइविंग न जानने पर अफ़सोस जाहिर किया तो जून ने मजाक में एक ऐसी बात कही जो उसे अच्छी नहीं लगी. जिस तरह का सवाल उसने पूछा था शायद उसका वही उत्तर वह दे सकते थे. दुनिया में हर कोई सभी कुछ तो नहीं सीख सकता है. फिर भी वह थोड़ा उदास हो गयी.




Saturday, March 1, 2014

इतवार की इडली


आज की मीटिंग अच्छी रही पर लौटने में देर हो गयी, पौने नौ बजे थे, नन्हा घर पर अकेला था, उसके खाने का वक्त भी निकल चुका था, पर वह काफी समझदार है, नैनी को बुलाकर रोटी बनवा रहा था जब वह घर पहुँची. जून का फोन भी आया, वह कल शाम को वापस आ जायेंगे तो जिन्दगी में फिर क्रम आ जायेगा. सुबह छह बजे उनका फोन आया तो उनकी आवाज काफी बदली-बदली सी लगी, फिर कुछ देर बाद उनका फोन आया तो राहत मिली. सुबह-सुबह ही नैनी स्वेटर का डिजाइन पूछने आ गयी, काम में देरी हुई पर उसे भी कोई जल्दी नहीं थी. दोपहर को बहुत दिनों बाद पार्लर गयी, बालों में मेहँदी लगवाने, फिर पड़ोसिन के यहाँ, वह पिछले कई दिनों से अकेली है. दोपहर को अकेले भोजन के लिए बैठी तो पता नहीं क्यों भूख महसूस नहीं हो रही थी, समय हो गया है भोजन कर लेना चाहिए, इसलिए खा लिया.

कल रात्रि बहुत तेज वर्षा हुई, वे खिड़की खोल कर सोये थे, पानी अंदर आ गया, शुरू में वैसे ही उसे नींद नहीं आ रही थी, बाद में वर्षा की तेज आवाजों से खुल गयी, उठकर खिड़की, दरवाजा बंद किया और फिर न जाने कब नींद आ गयी. स्वप्न में एक बहुत बड़ा आयोजन देखा. कल मीटिंग में ‘हसबैंड नाइट’ का जिक्र हो रहा था, शायद इसी लिए प्रेसीडेंट ने सभी को धन्यवाद दिया और कहा कि प्रोग्राम अच्छा रहा, कमियों की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिलाया, भारतीयों की यही खासियत है कि कमियों को, गलतियों को याद भी नहीं करना चाहते कि किसी के सेंटीमेंट्स को बात लग न जाये क्यों कि समूह में काम करना आता नहीं है, हरेक अपना व्यक्तिगत लक्ष्य लेकर चलता है, खैर, आज सुबह जून के फोन से ही नींद खुली, वह आज आने वाले हैं, नन्हे और नूना का जीवन दो दिनों में थोड़ा अस्त-व्यस्त हो गया है पर रोचकता बनी हुई है, अपने मन मुताबिक सोना, जगना...पर यह जीवन क्रम यदि ज्यादा दिन चला तो अस्वस्थता को निमन्त्रण देने जैसा होगा. रात को सोचकर सोयी थी कि सुबह संगीत का अभ्यास करेगी पर इधर-उधर के कामों में ही समय हाथ से निकला जा रहा है. रात के वादे ऐसे ही होते हैं. दूध वाले से शिकायत करनी थी, एक सखी से बात करनी थी, नन्हे की आलमारी की सफाई का प्रोजेक्ट भी अधूरा है. जून के बिना जीवन भी तो अधूरा है.

पिछले तीन दिनों से डायरी नहीं खोल पाई, अभी-अभी महसूस हुआ, जायजा लिया जाये, पिछले दिनों क्या-क्या हुआ, शुक्र की शाम को जून आये, वे तीनों साथ-साथ रह कर खुश हो गये थे. शनि की सुबह जून को अदरक वाली चाय बनाकर दी, उनके गले में खराश लग रही थी, शाम वे एक मित्र के यहाँ गये, इतवार की सुबह इडली बनाई, शाम टहलने व नन्हे को पढ़ाने में बीती. जून ने कार की सफाई की, क्योंकि नैनी का बेटा ‘आता हूँ’ कहकर गायब हो गया. कल सुबह माँ से बात की, अभी तक उन्होंने अपने दाँतों का व पिता ने अपनी आँखों का इलाज करवाना शुरू नहीं किया है. टीवी पर लगातार चुनाव परिणाम प्रसारित हो रहे हैं, बीजेपी आगे है पर इतना तो तय है कि पूर्ण बहुमत से काफी पीछे है. वह Amitav Ghosh की एक किताब पढ़ रही है आजकल. बहुत सी पत्रिकाएँ भी हैं पर समय नहीं है, नन्हे के इम्तहान छह मार्च से हैं, यानि सिर्फ तीन दिनों के बाद. आज संगीत कक्षा में वह सरगम सुना सकी, अध्यापिका ने राग काफी सिखाना शुरू किया.

सुबह-सुबह सेक्रेटरी का फोन आया, आज शाम को सारे कमेटी मेम्बर्स को गेस्ट हाउस जाना है. उसे फोन करके सभी को बताना था, एक महिला को फोन किया तो पहले वे बगीचे में थीं, फिर रियाज करने बैठ गयीं, उनके पतिदेव ने संदेश ले लिया, फोन पर तो वे बेहद संजीदा caring लगे, अगर वह कभी उन्हें यह बात कहे तो वह हँसेंगी. नन्हा आज भी स्कूल नहीं गया, पर सुबह से बिना नहाये बैठा था, उसने नहाने के लिए कहा तो मुँह बना लिया. बच्चे कोई भी बंधन नहीं चाहते किसी भी तरह का नियम-कानून तो वे जानते ही नहीं, जब जिस बात का मन होगा वही करेंगे, उसे लगा यह नई पीढ़ी बिलकुल निरंकुश होती जा रही है. स्कूल में अध्यापक की बात का कोई महत्व नहीं और घर पर माँ-पिता की बात की कोई अहमियत नहीं. आज भी मौसम भला सा है, सुबह समाचार सुने, बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है, उधर UF और कांग्रेस जो एक-दूसरे के खिलाफ थे फिर एक होकर सरकार बनाने की बात कर रहे हैं, यह राजनीति का खेल आम  जनता की समझ से बाहर है. 





Friday, November 9, 2012

पहाडों के पास



चार जुलाई, अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस ! अर्जेंटीना फुटबाल विश्व कप के फाइनल में पहुंच गया है. सुबह हल्की वर्षा हुई, मौसम खुशनुमा है. जून तिनसुकिया गए हैं, कार की सर्विसिंग कराने. आज इदुल्जुहा है, जून का दफ्तर व सोनू का स्कूल भी बंद है, वह अपने मित्र के यहाँ गया है, अभी वह उसे लेकर आएगी, सुबह दूध पीकर चला गया था, अभी नाश्ता नहीं किया है, उसे कुछ भी खिलाने के लिए मनाना टेढ़ी खीर है. कल स्कूल से लौटा तो बहुत खुश था, कहने लगा बहुत मजा आया, अभी लिखाना शुरू नहीं किया है, केवल राइम्स ही सिखायीं. बनारस से पत्र आया है, माँ की तीन साड़ियां गायब हैं, आश्चर्य है. उसे भी पत्र लिखना है. छोटी बहन दीदी के पास गयी थी, उसने सोचा वह तो शायद अब अगले वर्ष ही मिल सकेगी उन सबसे.

आज उसने अपना विवाह में मिला सफेद गाउन पहना है, पहले ढीला-ढाला था पर अब कुछ ठीक है. इसका अर्थ है कि जून की मेहनत कुछ सफल हो रही है. वह उसे थोड़ा सा भारी देखना चाहते हैं, हमेशा कुछ न कुछ खिलने के चक्कर में रहते हैं. इस समय दोपहर के तीन बजे हैं, अभी सोयी थी कि बांह पर चींटी काटने जैसे लगा, उठी तो पसीने से भीगी हुई थी, ठीक पंखे के नीचे सोकर यह हाल है, चींटी तो कहीं दिखी नहीं. आज उसे विद्यार्थियों का टेस्ट लेना है, कल शाम जब वे बाजार गए थे एक और छात्रा आयी थी. वह शाम के लिए पेपर सेट करने लगी.

आज उनके विवाह को पूरे साढ़े पाँच साल हो गए, सुबह-सुबह जून ने कहा, “हैप्पी सेवेंथ जुलाई”, वह पहले समझी कि वह कुछ और कहना चाहता है, जैसे, वह सुबह-सुबह नहायेगा नहीं, वह इतना अच्छा है पर ..कभी कभी. आज शनिवार होने के कारण नन्हे का स्कूल बंद है, उसका मित्र आया है, दोनों खेल रहे हैं. मौसम आज बहुत अच्छा है, ठंड-ठंडा सा और उसका मन भी शांत है... कल सुबह दो नई छात्राएं आयेंगी पढ़ने.

कल का संडे बहुत अच्छा रहा, रिमझिम वर्षा में वे लोग नामरूप गए, हरे-भरे वृक्षों औए चाय बागानों को पार करते पहाड़ों के बिलकुल निकट पहुंच गए थे. नन्हा और उसका मित्र बहुत खुश थे. कल नन्हे का जन्मदिन है, पर परसों उसका टेस्ट है के.जी.वन में दाखिले के लिए, इसलिए वे कल नहीं बल्कि परसों शाम को मनाएंगे. कुछ लोगों को ही बुलाना है, जून का कहना है कि इस बार ज्यादा लोगों को नहीं बुलाएँगे. कल रात उसने कहा कि फुटबाल मैच देखेंगे पर दोनों को नींद आ गयी. पश्चिम जर्मनी आखिर जीत गया और विंबलडन में स्टीफन..भारत का भी एक खिलाडी जूनियर वर्ग में विनर है उसका नाम इतना मुश्किल है कि.. जून को रात को नींद आने लगती है जब उसे बहुत सी बातें करनी होती हैं.


Sunday, November 4, 2012

ठंडा ठंडा संतरा



कल वह अपनी एक सहपाठिनी से एक किताब लायी थी, ‘मापन व मूल्यांकन’ स्पष्ट हो गया है, ‘टी स्कोर व जेड स्कोर’ भी बहुत अच्छी तरह समझाया है इस किताब में. कालेज गयी तो छात्राएँ परीक्षा की तिथियों के बारे में ही बात कर रही थीं, पहली मई से पन्द्रह तक परीक्षाएं हैं, हर पेपर के बीच में दो दिन का अंतराल है सिवाय मनोविज्ञान के पेपर के, टाइम टेबल  उसे तो याद भी हो गया है. ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया उसने, और किसी टीचर ने कोई आपत्ति नहीं की, पर सिन्हा मैडम ने कहा ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्यों कि अभी तक ऑफिशियली डेट्स नहीं आयी हैं, सो मिटा दिया. आज मार्च का अंतिम दिन है, यानि प्रति पेपर के हिसाब से पांच दिन मिलेंगे, उसने सोचा, अब उसे पूरी व्यूह रचना करके जुट जाना चाहिए. अब लगभग सभी विषयों का कोर्स पूरा होने को है. नन्हा आजकल देर से सोता है, उसे सुलाते हुए उसे ही नींद आ जाती है सो रात को भी देर तक पढ़ नहीं पाती. और आज जल्दी उठ भी गया है, दोपहर को सोना उसे जरा नहीं भाता.

अप्रैल का पहला दिन बीत भी गया, कल दिन भर चार्ट बनाने में ही निकल गया, आज ले गयी थी जमा करने. अब दो-तीन दिन और जाना है, उसके बाद बीच-बीच में एकाध दिन, शायद उन्नीस अप्रैल को विदाई पार्टी होगी, वह भी कुछ कविता या ऐसा ही कुछ पढ़े, ऐसा मन में विचार आया है, उसने सोचा, लिखेंगे कभी मूड होने पर....अलविदा..आज रामनवमी की छुट्टी है, घर पर उतनी पढ़ाई कर नहीं पा रही है, बल्कि कालेज डे में ज्यादा उत्साह रहता है. याद करने का काम अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, लगता है चार-पांच बार अच्छी तरह पढ़कर ही जाना होगा, रटना अब उससे हो नहीं पायेगा. ड्राइक्लीनर के यहाँ से साड़ी ले आयी है, कितनी अच्छी लग रही है कोटा चेक की यह साड़ी.

मिसेज सिन्हा भी बस..लडकियाँ उनकी रिस्पेक्ट नहीं करतीं, यही शिकायत करती हैं हमेशा, लेकिन लडकियाँ भी क्या करें..कालेज का कल अंतिम दिन हैं मन में कुछ सुगबुगा रहा है एक कविता...सभी टीचर्स के नाम और बीएड के नाम. सिन्हा मैडम ने पूछा कि कितने प्रतिशत नम्बर आएंगे, उसने साठ प्रतिशत कह दिए..इतने भी नहीं आये तो पढ़ाई किस काम की.

अप्रैल भी आधा बीत गया, जून आए थे, तीन दिन रहे और चले गए, उन्हें पहले दिल्ली फिर आस्ट्रेलिया जाना है. अगले महीने अठारह तारीख को आएंगे अब हमें ले जाने. आजकल गर्मी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिन से दोपहर में बिजली गायब हो जाती है, पंखा चलता भी है तो गर्म हवा फेंकता है, दिन भर पंखे की हवा में रहने से बदन कैसा आलस्य से भरा रहता है, मगर क्या करें ? परीक्षा में सिर्फ बारह दिन रह गए हैं, अभी तक सभी कुछ पढ़ा ही नहीं है, याद करना तो दूर, साठ प्रतिशत अंक लाना इतना आसान नहीं है.
आज उसने वह कविता पढ़ दी फेयरवैल पार्टी में. शाम को उसकी सहपाठिनी सीमा आयी थी, उसने ननद से कहा चाय के लिए, वह छोटी-छोटी दी कटोरियों में चना-मूड़ी भी लेकर आयी.

आज इतवार है, उसे जून की याद आ रही है, पिछले इतवार वह यहीं थे. आज दोपहर भर बिजली नहीं थी, गर्मी से ऑंखें और सिर भारी हो रहे हैं, दोपहर को खाना भी नहीं खाया गया, इससमय कुछ खाने का मन हो रहा है, उसने सोचा वह दूध पीकर आती है.

उसे ठंडा-ठंडा संतरा खाने का मन हो रहा है, पर कौन लाकर देगा, सुबह दूध पिया पर हजम नहीं हुआ. पता नहीं उसे क्या हुआ है. उसके साथ यह भी समस्या है की तबियत ठीक न हो किसी काम में मन नहीं लगता. उसने सोचा कि जून उसे दूर रहकर भी शुभकामना भेज रहे हैं, उसे अपने भीतर की हिम्मत जगानी होगी.




Friday, September 14, 2012

इतवार की सुबह



ग्यारह बजने में बीस मिनट, सुबह छह बजे उठने के बाद अब एक मिनट हुआ, बैठी है, डायरी लिखने का बहाना है, पैर कुछ विश्राम चाहते हैं और मन भी एक जगह रुक कर कुछ सोचना चाहता है. आज शायद जून का पत्र आये. कल दोपहर और फिर शाम को कितने घंटे व्यर्थ किये, स्वेटर का गला बनाने में, पर अभी तक नहीं बना है, उसे तो पूरा करना ही है, उसके बाद जो गणित की किताबें ली हैं, उन्हें देखना है. सोनू दादाजी के साथ आटा लेने गया है.

सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हा सोया है. सो उसे वक्त है कि दिन की शुरुआत करते हुए कुछ सोच सके. नीचे कमरे में एक तो गर्मी थी, दूसरे पडोस में टीवी की आवाज व्यवधान उत्पन्न कर रही थी, सो यहाँ उपर आ गयी है. यहाँ ठंडी हवा (धूल भरी ) आती है, यहाँ उनका बालकनी कम बाथरूम है, इस घर में इतनी समस्याएं हैं पर माँ-पिता ने कभी सोचा ही नहीं कि इसे बदला जाये. जिंदगी के चालीस साल इसी घर में गुजार दिए. माँ की तबियत ठीक नहीं है, उसे तो लगता है उनके तन की अस्वस्थता मन की ही छाया है, पर कौन समझा सकता है उन्हें. जब तक वे खुद न चाहें, वः कुछ करना ही नहीं चाहतीं, उदासीन हो गयी हैं सबसे, पर ऐसे कब तक जिया जा सकता है. वास्तविकता की दुनिया में जितनी जल्दी लौट आयें उतना ही अच्छा है. कल जून का पत्र आया वह उदास है कि उसे उनके पत्र नहीं मिल रहे हैं, पता नहीं क्यों. सुबह का एक कप दूध अभी पिया उसने, उसे समझ नहीं आता कि सुबह से बिना कुछ लिए यहाँ लोग दस-ग्यारह बजे तक कैसे रह लेते हैं. वह पुस्तक पढ़ने बैठ गयी जो प्रवेश परीक्षा के लिए लायी थी.

फिर वही कल का सा समय है, लेकिन वह नीचे कमरे में है, कपड़े प्रेस करने के लिए चादर बिछा रही थी की ननद ने बताया, पिताजी ने ऊपर कपड़े प्रेस करने को कहा है, नीचे जो बिजली खर्च होती है, उसका बिल आता है जबकि ऊपर की बिजली फ्री है, उसे समझ नहीं आता. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, पता नहीं इनमें कोई सार भी है या उसके मन का पागलपन है. कल सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे.

सुबह साढ़े पांच बजे ही उठ गयी थी, छत पर टहलने गयी, सूर्योदय के समय बहुत अच्छा लग रहा था. हर जगह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, और कुछ खामियां जैसे हर व्यक्ति की. आज इतवार है, सुबह का मीठा दूध पीते समय उसे याद आया, जून इतवार सुबह की चाय पी रहे होंगे. कैसे बीतते होंगे उनके दिन-रात, उसकी याद तो आती होगी. नन्हे ने नीचे से आवाज दी और वह उसे लेकर ऊपर आ गयी है, कह रहा है और सोयेगा और लेट गया है, देखें कितनी देर लेटता है.

Thursday, August 9, 2012

बात बन जाये



कल दोपहर ‘कादम्बिनी’ पढ़ती रही, अच्छी पत्रिका  है और इसका रूप जरा भी नहीं बदला है, वही पहले वाला है, जब वह कॉलेज में थी तब हमेशा पढ़ती थी. कल वे फिर बाजार गए थे, पैसे तो इस तरह भागते हैं जैसे कैद से निकला चूहा, आज पांच तारीख है और आधा वेतन खर्च हो चुका है. शुक्रवार को क्लब में फिल्म थी ‘प्यार झुकता नहीं’ वे एक घंटा किसी तरह बैठकर लौट आये, नन्हा एक मिनट और नहीं बैठना चाहता था हॉल में, गर्मी भी बहुत थी.

उसका पेन आज ठीक से लिख नहीं रहा है, नन्हे ने गिरा दिया था शायद उसकी निब मुड़ गयी है. कल उसकी तबियत ठीक नहीं थी, ऐसे में वह छोटी-छोटी बातों को भी गम्भीरता से लेने लगती है. हल्का सा मजाक भी सहन नहीं कर पाती. तन के साथ मन भी कैसे टूटा टूटा सा रहता है और आँखें हैं कि हर वक्त भरी-भरी सी. जून ने उसे कुछ भी करने नहीं दिया, आज वह ठीक महसूस कर रही है, कल इतवार था, शाम को टीवी पर ‘बात बन जाये’ आयी थी, मजेदार थी और दोपहर की मलयालम फिल्म भी.

सुबह के साढ़े सात ही बजे हैं पर लग रहा है दिन चढ़ आया है. कल ननद व देवर के पत्र मिले, जवाब देना है, मंझले भाई का पत्र भी आया है. कल शाम वे काफ़ी दिनों के बाद घूमने गए. उसने सोचा कि नन्हे को दूध सोते में ही पिला दे तो क्या अच्छा हो ! उठने के बाद एक गिलास दूध पीने में कितना समय लगाता है. कल के संडे रिव्यू में पढ़ा कि दूध पीना ही अच्छा नहीं है, आश्चर्य है हजारों सालों से लोग दूध पीते आ रहे हैं. एक दिन कोई लिख देगा कि अनाज खाना व सब्जियां खाना ही अच्छा नहीं है, फिर तो आदमी हवा खाकर( वह भी तो प्रदूषित है) ही जिन्दा रहेगा.

कल जून ने कहा कि ऐसा भी क्या काम होता है उसे जो ग्यारह बज जाते हैं, तो आज सुबह के दस बजकर पांच मिनट ही हुए हैं और वह अपने सारे काम कर चुकी है. वह लिखने बैठी तो नन्हा क्यों पीछे रहता, उसे भी कापी पेन दिया है, लिख रहा है कुछ अपनी भाषा में. पर उसे वही पेन चाहिए जिससे वह लिख रही है, अपने हाथ पर कुछ लिख लिया है उसने और अब हाथ धोने गया है. बच्चे भी बस...आज सुबह गिलास से दूध न पीने के लिये कितनी जिद कर रहा था पर आखिर में पी ही गया, आज से उसकी बोतल बंद. कल वे पत्रिकाएँ लेने गए, बहुत भीड़ थी, पर उनकी पसंद की एक भी पत्रिका नहीं मिली, आज फिर जायेंगे, लाइब्रेरी भी जाना है, jean plaidy की एक और किताब लाने, Barbara cartland की भी.




Friday, June 15, 2012

जन्मदिन का गीत


सुबह के सात बजे हैं. लगभग दो हफ्ते बाद वह डायरी लिख रही है. सुबह नन्हे का एक काम याद आ गया था. जून उसके लिये कमीजों का कपड़ा लाया था जब वह अस्पताल में थी. उसने आज कटिंग कर दी है बड़ी ननद सिलाई कर देगी. अभी कुछ देर पूर्व ही उसे दूध पिलाकर सुलाया था पर लगता है उठ गया है, कपड़े बदल दिये हैं, कुनमुना कर फिर सो गया. आज पहली बार वर्षा हो रही है, जब से वह दुबारा अस्पताल से आयी है. घर आने के बाद उसे बेबी जौंडिस हो गया था पुनः चार दिनों के लिये अस्पताल में रहना पड़ा. कल उन्होंने पहली बार उसकी फोटो उतारीं.
सुबह पांच बजे ही वह उठ गया था, उसके पापा भी साथ ही उठ जाते हैं, दोनों दोबारा सो गए और कितना उठाने पर भी नहीं उठ रहे थे, फिर जल्दी-जल्दी बिना नहाये-धोए चले गए हैं. मौसम सुहाना है, बादल हैं छितराए हुए, वर्षा समेटे बादल. छोटी बहन का जन्म दिन है उसे बधाई कार्ड भेजना है,कुछ पंक्तिया उसके मन में आ रही हैं-
बचपन की बीती सुधियाँ
याद दिलाने, कुछ बतलाने  
पुनः आया जन्मदिवस तुम्हारा
समेटे हुए कुछ नूतन स्वप्न
और छुपाये कई सौगातें !
तुम थीं कल नन्हीं सी गुड़िया
आज खड़ी हो जीवन पथ पर
विश्वास दिलाने, नई राह दिखाने
फिर आया शुभदिन
स्नेह सहित लो दुआ हमारी.....

  

Wednesday, March 14, 2012

एक पत्र


इतवार को वे तिनसुकिया गए थे पूजा देखने, बहुत भीड़ थी. दुर्गापूजा के कितने सुंदर पंडाल सजाये गए थे. उससे पहले घर की सफाई की, जून ने छत व दीवारों की, नूना ने फर्श की. फिर नाश्ता बनाया और तैयार होकर निकले. एक फिल्म देखी, शाम को घर लौटे तो बहुत थकान थी.
जून को फिर से जाना पड़ा सात दिनों के लिये और एक बार फिर दिन में दो या तीन बार फोन पर मुलाकात का सिलसिला. नूना को वे दिन याद आये जब वे साथ थे, जैसे दूध में शक्कर, इस तरह घुल गए थे और अब यह अकेलापन उसे ज्यादा खल रहा था. जैसे सब कुछ होते हुए भी सब अधूरा अधूरा सा हो. उसने फोन पर बात की तो लगा जैसे कि कितने दिनों बाद उसकी आवाज सुन रही है. दिन में दूध और सेब खाकर रही पर शाम होते होते सर में दर्द होने लगा. अगले दिन सुबह सोकर उठी तो लगा सब ठीक था. दिन में वह उड़िया पड़ोसिन मिलने आयी थी बहुत बातें की, उसके पास एक खजाना है जैसे बातों का.
उसने एक पत्र लिखा जून को और कहा कि इस बार वह पिछली बार की तरह उदास नहीं है बल्कि नियमित दिनचर्या का पालन कर पा रही है. रात को मच्छरदानी लगाकर सोयी सो नींद भी अच्छी आयी. लाइब्रेरी गयी किताबें पढीं, क्रोशिया बनाया और उसका इंतजार किया फोन पर. और इसी तरह पूरा सप्ताह बीत गया.


Thursday, June 2, 2011

भूलने की आदत


रात के दस बजे हैं, उसे नींद आ रही है कल रात वे  देर तक बातें करते रहे शायद एक बजे के बाद सोये हों. नूना ने  टालस्टाय की ‘अन्ना केरेनिना’ पढनी शुरू की है. उसने सोचा, अब बत्ती बंद करती है, उसे रोशनी में नींद नहीं आती.

कल शाम नूना ने उससे पूछा आज फरवरी की अठाहरवीं तारीख है या उन्नीसवीं, इसका सीधा सा अर्थ है कि आजकल उसे  तारीखें भी याद नहीं रहतीं, न दिन व समय का ध्यान है, इतना खो गयी है वह  अपने इस छोटे से संसार में... कल कुछ लिखा भी नहीं. शनिवार को वे  डिनर पार्टी कर रहे हैं उसके सहकर्मी आएँगे. दूध वाले को ज्यादा दूध के लिये कहना था भूल गयी, और कल दोपहर दूध गैस पर रखकर भूल गयी, कुछ भी हो, यह अच्छा नहीं है कितना दुःख हुआ उसे, अच्छा हुआ वह घर पर ही था. कल शाम क्लब में intelligence beyond thoughts पर एक भाषण था, इतने दिनों के बाद इस तरह के विषय पर सुनना एक सुखद अनुभव था. लौट कर साथ-साथ खाना बनाया, वह किचन में इतनी अच्छी तरह से मदद करता है, वे और निकट आते जा रहे हैं.