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Wednesday, August 20, 2014

स्टोर में चूहा


कल वे सारे कार्य कर सके जो विचारे थे. धूप तेज थी और मन में उत्साह था. कल शाम को एल मित्र परिवार अपनी यात्रा से वापस आ गया. परसों एक सखी ने  गुड़हल पर चार पंक्तियाँ लिखने की बात कही थी, पर वह भूल ही गयी, शाम को उसने फोन करके याद दिलाया. आज करवाचौथ का व्रत है, पर उसने सिर्फ एक बार विवाह के बाद मायके में यह व्रत रखा था, तब जून भी वहाँ नहीं थे. एक बार मंगनी के बाद भी. न ही जून को, न उसे व्रत आदि में विश्वास है. उसे विश्वास है अच्छाई में, नैतिकता में, सत्य और अहिंसा में, प्रतिपल निर्लोभी होकर जीने में, सम्यक जीवन दृष्टि में और स्वच्छता में, सो आज से हर दिन एक घंटा विशेष सफाई के लिए, दीवाली आने तक उनका घर दीयों के लिए तैयार हो जायेगा. आज गोयनका जी ने शिवजी , श्री राम, भगवान कृष्ण और गणेश देवता की भक्ति का वास्तविक अर्थ बताया. शिवजी प्रतिक्षण काल से घिरे रहने के बाद भी शीतलता धारण किये हैं, कामनाओं को भस्म कर चुके हैं. गणेश जी की मेधा इतनी ज्यादा है कि उन्हें हाथी का सिर चाहिए. राम त्याग की मूर्ति हैं, भाई के प्रति स्नेह का आदर्श रखते हैं. कृष्ण को वे भक्त प्रिय हैं जो अपेक्षा रहित हैं, राग-द्वेष से मुक्त हैं, निर्मल चित्त वाले हैं न कि वे जो उनके रूप का बखान तो करते हैं पर उनकी बातों को नहीं  मानते. उसे और सहनशील होना होगा और कर्मठ भी. स्वास्थ्य ( पूरे परिवार का ) के प्रति भी और सजग रहना होगा और सबसे बड़ी बात अपनी वाणी पर संयम रखना होगा. वाणी को जीतना पहली सीढी है.

पर्व प्रेरणा देते हैं. शुभ संकल्प जगाते हैं, उत्साह भरते हैं. जीवन जो एकरस प्रतीत होता है उसमें नवरस भरते हैं. अगले हफ्ते दीपावली का त्योहार आ रहा है वे सभी उत्सुक हैं. जीवन है ही क्या? कुछ पल ख़ुशी के कुछ पल उदासी के ! जीवन बहती धारा है, जो गुजर जाता है, लौटकर नहीं आता. सुख-सुविधा भी नहीं रहेगी और तप भी नहीं रहेगा, पर तप का लाभ बाद में मिलेगा. लोभवश किये कार्य और उनका त्याग दोनों ही नहीं रहेंगे पर त्याग अनासक्ति सिखाता है, मन निर्भार हो जाता है. मधुर शब्द और कटु शब्द दोनों ही नहीं रहने वाले हैं पर प्रेम, प्रेम को जन्म देता है, उसके सौदे में घाटे का कोई काम नहीं, लाभ ही लाभ है. आज बाबाजी ने उपरोक्त ज्ञान दिया. सुबह के कार्य हो चुके हैं, अभी ध्यान करेगी फिर कर्म. कई दिनों से कविताओं वाली डायरी नहीं खोली है मन में भाव तो उपजते हैं पर टिकते नहीं क्यों कि प्रयास ही नहीं किया. नन्हे ने डिबेट में भाग लिया था पर सलेक्ट नहीं हो पाया, उसने कहा लडकियाँ बहुत अच्छा बोलीं, वे लड़के समझ गये, उनका चुनाव नहीं होगा. जून कल दीवाली के लिए काफी कुछ लाए और अगले हफ्ते डिब्रूगढ़ जाकर फिर लायेंगे. वह चीजें खत्म होने ही नहीं देते पहले से ही और लाकर रख देते हैं. उसे इस बारे में कुछ सोचना नहीं पड़ता. वाकई वह बहुत भाग्यशालिनी है.

सामान्यत इस वक्त वह संगीत अभ्यास कर रही होती है, पर आज अभी तक न ही ‘ध्यान’ किया है न व्यायाम. सुबह फ्रिज की सफाई में कुछ वक्त चला गया, कुछ वक्त स्टोर से चूहा भगाने में. एक छोटा सा चूहा जाने कहाँ से घुस आया है जो छिप जाता है. फिर उन परिचित का फोन आया जो ससुराल के उनके घर गयीं थी. उनकी आवाज वह पहचान नहीं पाती, उन्हें परिचय देना पड़ता है. नैनी ने कुछ दिन उनके यहाँ काम किया पर उनके अनुसार ठीक से नहीं किया. पैसों के हिसाब को लेकर भी कुछ गलतफहमी थी, उसे वह समझाने लगीं. नैनी ने सुबह उससे हिसाब करवाया था, जो उसे ठीक से पता नहीं था, खैर वह न जाने क्या समझें और सोचें.. उसके मन में उनके लिए सहानुभति और पहले सा स्नेह ही है. वे उनके यहाँ जायेंगे दीवाली के दौरान. कल ‘वृदावन सारंग’ के दो गीत लिखाये टीचर ने. अब दोपहर को ही अभ्यास करेगी. आजकल न उसकी वाणी ही सौम्य, मधुर और अर्थपूर्ण रह गयी है न ही खान-पान में कोई परहेज, जैसा जब चाहा कह दिया, खा लिया और हृदयहीनता की तो हद ही नहीं है. जून को KBC का एडिक्शन हो गया है यह तक कह दिया. जून उसका इतना ख्याल रखते हैं और उसे उनकी छोटी सी ख़ुशी भी सहन नहीं होती. सिर्फ किताबें पढ़ लेने से या प्रवचन सुन लेने ही कोई ज्ञानी नहीं बन जाता. यह भी मन बहलाव ही है जब तक आचरण पूर्ववत् है तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या पढ़ती है या सोचती है, सोच, व्यवहार में तो झलकनी चाहिए न.







Thursday, August 30, 2012

चूहे की खिटपिट



जून का और पत्र नहीं आया. आज दोपहर छोटे भाई की शादी का कार्ड मिला, जो खुशी सामान्य हालातों में होती वह महसूस नहीं हुई, फिर भी कार्ड हिंदी में है, उन सभी का नाम है, देखकर अच्छा लगा, शादी में जायेगी. सोनू के लिये यह एक अवसर होगा, उसके जीवन की दूसरी शादी, पहली बार बुआ की शादी में वह मात्र चार महीने का था. वह भी सबसे मिल पायेगी, मामा, मामी, बुआजी और सारे रिश्तेदारों से. आज एक पत्र और आया है, गुजरात से मौसा जी का. पढ़कर सभी को अत्यधिक क्षोभ हुआ. सगे रिश्तेदार होकर लोग इस तरह का व्यवहार करते हैं. किसी की मृत्यु हो जाने के बाद उसके माता-पिता से ऐसा व्यवहार, सचमुच यह दुनिया पैसे से ही चलती है. भावनाओं से ज्यादा कीमत पैसे की ही है.

आज इतवार है, कल वह कुछ नहीं लिख सकी. आज का दिन अच्छा बीता. माँ-पिता आज शांत रहे. सुबह नन्हें ने कहा चाचा आसाम में हैं. बड़ा होकर समझ जायेगा कि चाचा कहाँ हैं. जून का पत्र कल आयेगा और चार दिन बाद तो वह आ भी रहे हैं. मौसम ठंडा हो गया है, कल रात एक के ऊपर एक दो चादर ओढ़ी तो ही सो पायी.

रात भर स्वप्न देखती रही जून आ गए हैं और पिछली  कई रातों को उसने स्वप्न में उसे देखा है. अगर वह ना आये तो? यह सोचकर अच्छा नहीं लगता, उसका पत्र भी नहीं आया..सोचा होगा जब स्वयं ही जा रहा है तो पत्र की क्या जरूरत है. कल उसने स्वप्न में एक सफेद कमीज, काली पैंट पहने लडके को दूर से आते देखा, सोचा शायद उसका भाई है पर पास आकर पता चला वह नहीं था, वह बिना उन्हें देखे आगे निकल गया. जाने वह कहाँ होगा, होगा भी या नहीं.

वह भाई की शादी में गयी और लौट भी आयी. जून आ गए थे और उसके अगले दिन वे गए. नन्हा और वह शादी में, वह स्वयं दिल्ली चले गए. वहाँ सभी से मिलना हुआ, शादी का कार्यक्रम भी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. वापसी में वह भाभी के भाई-भाभी के साथ आयी. आज ही उसने माँ को पत्र लिखा है जून को भी. यहाँ दो महीने रहने के बाद वह वापस जायेगी  अपने घर. वैसे यह भी तो अपना ही घर है बचपन के अपने घर से ज्यादा अपना घर.

कल फोन आया था पड़ोस में, उन्होंने बुलाकर बात करवायी, बहुत अच्छा लगा इतने दिनों बाद जून से बात करके. अब केवल बारह दिन ही रह गए हैं, जब वह आएंगे. किसी चूहे की आवाज आ रही है जहाँ सोनू सोया है, उसके पीछे की अलमारी के पास से. आज संभवतः उन्होंने पहली बार खाना समय पर खा लिया है, तीन बजने में दस मिनट हैं, उसने सोचा कुछ लिख ले या सूची ही बना ले कि उन्हें यहाँ से क्या-क्या लेकर जाना है. कल रात स्वप्न में फिर उसे देखा, उसे लगा वह मोटरसाइकिल पर बैठाकर घुमा रहा है, और इतनी धीमे अच्छी तरह चला रहा है जैसे हवा में उड़ रही हो. कभी वह बड़ा भाई बन जाता था कभी जून कभी खुद, कुछ समझ नहीं आया कैसा स्वप्न था.
क्रमशः

Thursday, August 9, 2012

बात बन जाये



कल दोपहर ‘कादम्बिनी’ पढ़ती रही, अच्छी पत्रिका  है और इसका रूप जरा भी नहीं बदला है, वही पहले वाला है, जब वह कॉलेज में थी तब हमेशा पढ़ती थी. कल वे फिर बाजार गए थे, पैसे तो इस तरह भागते हैं जैसे कैद से निकला चूहा, आज पांच तारीख है और आधा वेतन खर्च हो चुका है. शुक्रवार को क्लब में फिल्म थी ‘प्यार झुकता नहीं’ वे एक घंटा किसी तरह बैठकर लौट आये, नन्हा एक मिनट और नहीं बैठना चाहता था हॉल में, गर्मी भी बहुत थी.

उसका पेन आज ठीक से लिख नहीं रहा है, नन्हे ने गिरा दिया था शायद उसकी निब मुड़ गयी है. कल उसकी तबियत ठीक नहीं थी, ऐसे में वह छोटी-छोटी बातों को भी गम्भीरता से लेने लगती है. हल्का सा मजाक भी सहन नहीं कर पाती. तन के साथ मन भी कैसे टूटा टूटा सा रहता है और आँखें हैं कि हर वक्त भरी-भरी सी. जून ने उसे कुछ भी करने नहीं दिया, आज वह ठीक महसूस कर रही है, कल इतवार था, शाम को टीवी पर ‘बात बन जाये’ आयी थी, मजेदार थी और दोपहर की मलयालम फिल्म भी.

सुबह के साढ़े सात ही बजे हैं पर लग रहा है दिन चढ़ आया है. कल ननद व देवर के पत्र मिले, जवाब देना है, मंझले भाई का पत्र भी आया है. कल शाम वे काफ़ी दिनों के बाद घूमने गए. उसने सोचा कि नन्हे को दूध सोते में ही पिला दे तो क्या अच्छा हो ! उठने के बाद एक गिलास दूध पीने में कितना समय लगाता है. कल के संडे रिव्यू में पढ़ा कि दूध पीना ही अच्छा नहीं है, आश्चर्य है हजारों सालों से लोग दूध पीते आ रहे हैं. एक दिन कोई लिख देगा कि अनाज खाना व सब्जियां खाना ही अच्छा नहीं है, फिर तो आदमी हवा खाकर( वह भी तो प्रदूषित है) ही जिन्दा रहेगा.

कल जून ने कहा कि ऐसा भी क्या काम होता है उसे जो ग्यारह बज जाते हैं, तो आज सुबह के दस बजकर पांच मिनट ही हुए हैं और वह अपने सारे काम कर चुकी है. वह लिखने बैठी तो नन्हा क्यों पीछे रहता, उसे भी कापी पेन दिया है, लिख रहा है कुछ अपनी भाषा में. पर उसे वही पेन चाहिए जिससे वह लिख रही है, अपने हाथ पर कुछ लिख लिया है उसने और अब हाथ धोने गया है. बच्चे भी बस...आज सुबह गिलास से दूध न पीने के लिये कितनी जिद कर रहा था पर आखिर में पी ही गया, आज से उसकी बोतल बंद. कल वे पत्रिकाएँ लेने गए, बहुत भीड़ थी, पर उनकी पसंद की एक भी पत्रिका नहीं मिली, आज फिर जायेंगे, लाइब्रेरी भी जाना है, jean plaidy की एक और किताब लाने, Barbara cartland की भी.