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Wednesday, February 5, 2014

पूसी की आवाजाही


कल शाम वह क्लब की वार्षिक पत्रिका के लिए बुलाई गयी मीटिंग में गयी थी. उसे हिंदी सेक्शन का काम देखना है. जून उसे समय पर छोड़ आए और बाद में लेने भी आये, उसके मन में एक ख्याल आया यदि वह स्वयं कार चलाना जानती तो उन्हें परेशान न होना पड़ता. आज पुराने वर्षों की पत्रिकाएँ खोल-खोल कर देखीं, ताकि उन लोगों के नाम देख सके जो हिंदी में लिखते हैं, उन्हें इस वर्ष भी लिखने के लिए प्रेरित करने हेतु फोन किये, कुछ ने सकारात्मक जवाब दिए. सुबह उठते ही जून ने ट्रांजिस्टर चला दिया समाचार सुनने के लिए. कल रात्रि एक स्कूल बस की दुर्घटना की हृदय विदारक खबर सुनी. बाद में बस पानी में गिर गयी. उनके दिल लेकिन पत्थर के हो चुके हैं, इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद भी जिन्दगी वैसे ही चलती रहेगी, उन माँ-बाप के आँसू सूख जायेंगे और...यहाँ अपेक्षाकृत वे सुरक्षित हैं, ज्यादा ट्रैफिक नहीं है. अभी जून का फोन आया, उन्हें अख़बार लेने बाजार जाना ही होता है, पूछ रहे थे कुछ लाना है, इतना ख्याल घर का कम लोग ही रखते होंगे. आज वह लंच में केवल फल और सलाद ही ले रही है, हफ्ते में एक दिन ऐसा करना अच्छा है. पर मन है कि...वैसे भूख पर कंट्रोल किया जा सकता है पर जब मनाही हो तो ध्यान खानों की तरफ ही जाता है.

आज सुबह ‘जागरण’ देखा, और अभी-अभी योगानन्द जी का एक भाषण पढ़ा, ईश्वर स्वयं ही संयोग उत्पन्न कर देते हैं. रात भर लगातार हुई वर्षा के कारण मौसम आज ठंडा है, कंपा देने वाली ठंड. बादल अब भी बने हैं और वैसे ही बादल उसके अंतर में भी घुमड़ रहे हैं. कल से नन्हे के इम्तहान हैं. पहला पेपर गणित का है, वह तैयारी कर रहा था फिर पढ़ाई खत्म करके टीवी देखने लगा, .बच्चे भी बस बच्चे होते हैं, पल भर में परीक्षा को भूलकर टीवी में व्यस्त हो गया. कल भी TN Seshan का इंटरव्यू बड़े मजे ले कर देख रहा था, बड़े ही होते हैं जो परीक्षा से पहले ही घबराए-घबराए से रहते हैं. अब टीवी पर चाट बनाने की विधि  बताई जा रही है, अभी-अभी नन्हा कहकर गया है. कल संगीत कक्षा में वह ठीक से गा नहीं पायी, गाने में सुर की देन तो ईश्वर ही दे सकता है, आज ईश्वर से प्रार्थना की है और स्वामी योगानन्द जी के अनुसार यदि प्रार्थना सच्ची हो तो उत्तर अवश्य मिलेगा. अभ्यास तो उसे करना ही होगा पहले की तरह ही प्रतिदिन.

आज ठंड कल से भी जयादा है. बंद कमरे में स्वेटर पहनकर भी ठंड का अहसास हो रहा है, आज ही हीटर निकलना पड़ेगा किन्तु उनका क्या जिनके पास न तो कमरा है, न स्वेटर, और हीटर की तो बात ही जिन्हें पता नहीं, उन्हें भी हीटर के बिना रहने का अभ्यास होना चाहिए जब तक कि जनवरी की कड़कती ठंड न आ जाये. नन्हे की आज हिंदी की परीक्षा है, उसे पढ़ाते हुए पिछले कुछ दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला, उसका रिजल्ट जरुर अच्छा आयेगा, वह मेहनत करता है पर नूना को लगता है वह इससे भी अच्छा कर सकता है. कल शाम वे एक डिनर पार्टी में गये, एक मित्र के विवाह की वर्षगाँठ की पार्टी में. उनकी शादी की फोटो देखकर लगा कि सारी पंजाबी शादियाँ एक सी होती हैं.

आज सुबह अलार्म की आवाज सुनकर नींद वक्त पर खुल गयी, दरवाजा खोलते ही जानी पहचानी सी वही बिल्ली दिखाई दी, पर कल रात उसने भोजन नहीं बनाया था सो उसे रोटी नहीं दे सकी, बिस्किट दिए, उसका पेट पिचका-पिचका सा लग रहा था, शायद वह अपने लिए खाना नहीं जुटा पाती है. वे सुबह शाम ही तो दे सकते हैं, एक छोटे से जीव को पालना भी कितना प्रयास लेता है, उस दिन बरामदे में जो गंदगी उसने की, उसके बाद वे उसे बाहर ही खाना देते हैं. जो लोग पशुओं से दिल से प्यार करते हैं वे उनके द्वारा की गयी गंदगी को ख़ुशी-ख़ुशी साफ कर देते होंगे, पर ऐसा करना जून व उसके बस की बात तो बिलकुल नहीं है, नन्हा लेकिन उसका ध्यान रखता है, बच्चे स्वभाव से ही कोमल होते हैं. उसे खाना खिलाने का काम उसे ही सौंपना चाहिए. उनकी निष्ठुरता कहीं उसके हृदय को भी कठोर न बना दे.  




Tuesday, December 25, 2012

राजीव गाँधी का अस्त



उसने कहीं पढ़ा, किसी एक शहर का नाम लो...झट उत्तर आया..दुलियाजान, उसने फिर से वे पंक्तियाँ पढीं जो यहाँ आने के कुछ ही दिनों बाद लिखी थीं-

मन में भीतर तक उतर गया है
इस शहर का अक्स
वह अक्स.. जो बादलों के झुरमुट में..
कभी लबालब भर आए पोखर-तालों में
चमकती बिजलियों में.. नजर आता है
इसकी हरियाली अंदर तक फ़ैल चुकी है
पत्थर पर दूब उगाती, दीवारों से पेड़
यह धरती सब कुछ लौटा देना चाहती है
अपने गर्भ से उलीच कर.. जैसे
सब कुछ बाँट रही हो
हरियाली, रंग, चाय और तेल..
फूल इतने शोख देखे हैं कहीं
मौसम इतना नशीला
पंछी भी जैसे मधुपान कर गूंजते
दुनिया में होंगे कई शहर
पर ऐसे नाम वाला एक भी नहीं
शांत, सौम्य और सभ्य
यह अतीत में भी उसका प्रिय था
आज भी है..

मई आधा गुजर गया, पूरे एक महीने बाद उसने डायरी खोली है, कल पूरा एक महीना हो गया इस नए घर में आए हुए और इतने दिनों में कितनी ही घटनाएँ हुईं, बनारस से सभी लोग यहाँ आए, और वे सब कई जगह घूमने गए. उसके हाथ में एक बार दर्द हुआ शायद ज्यादा क्रोशिया चलाने के कारण या पता नहीं क्यों..सोनू का परीक्षा परिणाम आया, उसे एक बार बुखार हुआ, पर इतने दिनों में एक दिन भी दस मिनट का समय भी नहीं निकाल पायी. बहुत सारे बहाने मिल जायेंगे लेकिन सही बात यही है कि लिखने की इच्छा ही नहीं हुई सिवाय चिट्ठी लिखने और एकाध पत्रिका पढ़ने के, पढ़ने-लिखने से उसका सम्बन्ध ही कितना रह गया है. अफ़सोस होता है न, उसने खुद से कहा, पर बजाय अफ़सोस करने के लिखना शुरू करना चाहिए. अब कल से जून के ऑफिस जाने के बाद से पहला काम यही करेगी, अभी तो नन्हे की छुट्टियाँ भी हैं. आज सुबह एक स्वप्न देख रही थी, आज अखबार में उसके दो लेख छपे हैं, कल शाम किसी ने कहा था, आप हिंदी में आर्टिकल लिखती थीं...जैसे पिछले युग की बात हो. कोई भी शौक या रूचि हो, पनपने देने के लिए समय तो देना ही पड़ता है न, यूँ ही फालतू इधर-उधर के कामों में वक्त गंवाना क्या अच्छा है? जीवन एक ही बार मिलता है और उसका जीवन आधा तो बीत गया है, इसी महीने तीन दशक पार कर  लेगी...कुछ है गर्व से कहने के लिए किसी के पास उसके लिए? सचेत हो जाना होगा और कुछ वक्त देना होगा अपने आप को, अपने अंतर्मन को. लिखने का अभ्यास छूट जाने से हाथ में कैसा तनाव आ गया है, उसने हाथ की उंगलियों को खोला और बंद किया.

कल सुबह ट्रांजिस्टर खोलते ही यह भयानक समाचार सुना, कानों को विश्वास ही नहीं हुआ. राजीव गाँधी भी इंदिरा गाँधी की तरह हिंसा के शिकार हुए अपने ही देशवासियों के हाथों, जो करोड़ों के प्रिय थे, कितना सूनापन छा गया है जैसे पूरे वातावरण में. आँखें हैं कि..और मन भी भारी है. उनके चित्र आँखों के सामने आ जा रहे हैं. पलक झपकते सब कुछ खत्म हो गया..कितना निष्ठुर होता है स्वार्थी मानव, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेता है.

करोड़ों दिलों का मौन रुदन
एक फूल की दर्दनाक मौत पर
सुना है ?
करोड़ों की आवाज..एक सूर्य के अस्त होने पर
हाँ, वह सूरज था, प्रकाश था, स्वप्न था,
प्रतीक था आशा का
हिंसा का दानव जाने अभी कितना प्यासा है ?
बापू को छीना, इंदिरागांधी  को
और अब...
क्या पत्थर के लोग बसते हैं यहाँ
या नरभक्षी...आदमखोर !
जो आँखों के स्वप्न छीन कर भर जाते हैं अंतहीन सन्नाटा
कोई पूछे उनसे
क्या उनकी प्यास खून से बुझती है ?

उदासी उसकी रग-रग में छा गयी थी, देश में जो हो रहा था उससे अलिप्त नहीं रहा जा सकता था. एक और कविता लिखी थी तब..

हम कितने दीवाने थे तब

दुनिया को बदल कर रख देंगे
स्वप्नों में खोये रहते थे
आदर्श भरा जीवन होगा, काँटों से भरा फिर पथ होगा
सम्पूर्ण क्रांति को लक्ष्य बना
हम कितने अनजाने थे तब

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार
भूख, गरीबी, अत्याचार
नहीं जानते थे तब यह, जीवन समझौतों का नाम
यथार्थ नहीं स्वप्न ही थे
हम कितने दीवाने थे तब

लेकिन उदासी का साया कितना ही घना हो, भीतर गहराई में तो आनंद छिपा है, जो बाहर आना चाहता है. यदि कोई यह समझ नहीं पाया कि आनंद के क्षण ही जीवन का वास्तविक रूप दर्शाते हैं तो वह जीवन का मर्म नहीं समझ पाया. यह बात अलग है कि किसी को पीड़ा में ही आनंद का अनुभव हो.

उसे लिखना पड़ा

बस कुछ पल और अँधेरा है
फिर किरणें घूंघट खोलेंगी
कण-कण धरती का चमकेगा
लहरों में सूरज खेलेगा
पाखी नयनों से भांप सुबह
ऊंची उड़ान पर निकलेंगे
फिर खिलना होगा फूलों का
कलियाँ ज्यों सुगबुग सी करतीं
शिशु वैसे पलने में होगा
ऊं आं कर माँ को बुलाएगा
बस थोड़ी देर अबोला है
फिर ध्वनियाँ ही ध्वनियाँ होंगी
ओ पथिक नही घबराना तुम
नदिया का थाम किनारा इक
बस आगे ही बढ़ते जाना
बुलाता तुम्हें सवेरा है
नम धरती के मखमल तन पर
खेतों में बिछे ओसों के कण
चुपचुप सी हवा की गुपचुप सुन
इक गीत हवा में उड़ा देना
मंजिल-मंजिल बढ़ते जाना
बस कुछ पल और अँधेरा है !