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Tuesday, April 16, 2019

लालकिले पर तिरंगा



आज नेट नहीं चल रहा है. लगातार वर्षा हो रही है. पिछले तीन दिनों से वे सुबह निकल नहीं पाते. जून के दफ्तर जाने के बाद जब वर्षा कुछ कम हुई, वह छाता लेकर भ्रमण पथ पर घूमने गयी. पांच-छह मजदूर वर्षा में भीगकर काम कर रहे थे, दो-तीन औरतें भी थीं. एक महिला अत्यंत बूढ़ी है पर उसे भीगने से सर्दी होने का जरा भी भय नहीं है. वह अक्सर कई बोरियां भरकर घास काटती है, अपने लिए या बेचने के लिए, पता नहीं. वर्षा में भीग रहे हैं मजदूर सो अलग पर उनके पास उचित उपकरण भी नहीं होते. सरकार की मदद इनके पास पहुँचे इसकी जिम्मेदारी कम्पनी को लेनी चाहिए. उसने सोचा चाय पिलाकर उनकी थोड़ी सी मदद कर सकती है, पर वे काम में व्यस्त थे और अब तक तो शायद वे चले ही गये हों. आज भी गुरूजी का प्रवचन सुना, हर बार सुनने पर कोई नई बात सुनने को मिलती है. वे पूरी बात सुनने का श्रम नहीं उठाते या तो उनकी क्षमता ही नहीं है. जब तक पिछले वाक्य को समझते हैं, एक वाक्य और बोला जा चुका होता है. कल जून का जन्मदिन है.

आज लालकिले से प्रधानमन्त्री का भाषण सुना, मन जोशीले भावों से भर गया है. उन्होंने कहा, हर भारतीय को शुभ संकल्प लेने हैं और उन्हें सिद्द होते हुए देखना है. आज देश में सकारात्मक माहौल बन रहा है. भारत की आजादी को सत्तर साल हो गये हैं और अब समय आ गया है कि हर भारतवासी अपने कर्त्तव्यों के प्रति सजग हो और अपने तौर पर कुछ न कुछ काम करे. वे स्वतंत्र भारत के नागरिक होने का हर लाभ उठाते हैं. देश को आगे बढ़ाने का जज्बा लेकर उन्हें साथ-साथ काम करना है. वे स्वच्छता के काम में अपना योगदान दे सकते हैं. देश की सुरक्षा के लिए काम करने वाले सैनिकों के लिए उनके दिलों में गर्व की भावना हो. देश के अंदर की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हर किसी की है. सुबह वे लोग नेहरू मैदान भी गये. लोगों की भीड़ और तिरंगे के प्रति उनके प्रेम को देखकर सभी उल्लसित थे. उनकी सोच यदि सकारात्मक होगी तो शरीर भी स्वस्थ रहेगा. पुराने कर्म अपना फल देंगे, पर वर्तमान में यदि वे सजग रहें और समभाव से उन्हें सहन करते जाएँ तो नये कर्म नहीं बंधेंगे. जून के जन्मदिन का भोज आज दोपहर को कुछ मित्रों के साथ किया.

कल ही जन्माष्टमी का उत्सव भी था, शाम को पूजा कक्ष की सफाई की. कृष्ण के चित्र पर माला चढ़ाई, कितने सुंदर लग रहे हैं कृष्ण फूलों के मध्य ! गुरूजी का जन्माष्टमी पर दिया विशेष वक्तव्य पढ़ा. देवकी देह का प्रतीक है और वसुदेव मन का. कृष्ण उनके ही भीतर जन्म लेते हैं, जब अहंकार नष्ट हो जाता है. अहंकार ही उन्हें आनंद से दूर रखता है. अभी-अभी क्लब की एक सदस्या का फोन आया. प्रेस जाने के लिए कह रही थी. इससे अच्छा है लेख ड्राइवर के हाथ ही भेज दिया जाये. उनका समय और श्रम बचेगा. जीवन कितना अनमोल है, यहाँ एक क्षण भी गंवाने जैसा नहीं है. कल दोपहर का भोजन गरिष्ठ था, रात को सिर में दर्द हो गया. सुबह नींद देर से खुली, वर्षा हो रही थी, सो आज भी टहलने नहीं जा सके. इस समय धूप निकली है.

आज पूरे एक सप्ताह के बाद तैरने गयी. अच्छा लगा, अब पानी में स्वयं को नियंत्रित करना आसान लग रहा है. धीरे-धीरे ही सही कुछ बात बन रही है. पानी में ठंड जरा भी नहीं लग रही थी, न ही गर्मी. आज सुबह उठी उसके पूर्व नींद खुल गयी थी पर तमोगुण की प्रधानता के कारण कुछ देर लेटी रही. सतोगुण में टिकना कभी-कभी सहज ही होता है पर कभी-कभी नहीं. यह असजगता की ही निशानी है. कल छोटी बहन से बात हुई, उसे दाहिनी आँख में कुछ चमकदार रंग दिखाई दिए, आँख की जाँच कराने को कहा है.


Monday, July 20, 2015

जीवन की पहेली


आज जन्माष्टमी है, परमात्मा तो अजन्मा है फिर भी वह जन्म लेता है, मानवों को ज्ञान देने के लिए. कृष्ण अर्जुन के बहाने सभी को अपनी शरण में जाने का उपदेश देते हैं, जहाँ प्रेम है, शांति है आनन्द है. तब वे उसके बनाये इस सुंदर संसार को और अच्छा बनाने में सहयोग कर सकेंगे, कम से कम उसे विकृत तो नहीं करेंगे. यह जीवन एक रहस्य है और वह उसे खोलना चाहती है. कृष्ण उसे आकर्षित करते हैं ताकि वह इस खेल में शामिल हो सके. भीतर ही इसकी चाबी मिलने वाली है, भीतर जाकर जब कुछ भी नहीं मिलता तो विरह सताता है जिससे भीतर का पाप-ताप तो जल ही जाता है. मन समता में रहना सीखता है.

‘सद्गुरु’ को प्रेम करने का अर्थ है जो उन्हें प्रिय है वह भी वही करे. उन्हें ‘सेवा’ प्रिय है सो उसे भी सेवा की भावना को प्रश्रय देना होगा. अभी भी भीतर क्रोध बाकी है, किसी की कही अनावश्यक या मूर्खतापूर्ण बात उसे झुंझला जाती है. उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी भाषा, उसे मीठा बोलना नहीं आता. सत्य को सत्य कहने से कोई झिझक नहीं है पर सभी तो उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं कि  बात को उसी रूप में लें जिस रूप में कही गयी है. सच्ची बात उन्हें चुभ भी सकती है फिर कर्म बंधन में तो उसे ही बंधना पड़ेगा. सभी को आत्मा जानकर ही दोष दृष्टि से मुक्त हुआ जा सकता है. जिसे अपनी वाणी का दोष नजर नहीं आता वह विचारों का दोष कैसे देख पायेगा ?

मुहब्बत की दुनिया में होशमंदों का क्या काम
जब भी आया है पैगाम आया है दीवानों के नाम  

अक्ल के भटकों को राह दिखाते हुए
जिन्दगी काटी हमने दीवाना कहलाते हुए


जीवन एक पहेली है जो कभी तो लगता है कि अब बस सुलझने ही वाली है फिर अचानक इतनी उलझ जाती है कि...और यह दीवाना मन ही इस का कारण है. मन की क्रिया विधि को समझे बिना साधना पूरी नहीं हो सकती. उस दिन उस पंडित ने कहा था आपका मंगल ठीक नहीं है. सोचा हुआ कार्य पूरा नहीं होता तो उसने जोरदार शब्दों में इस पर आपत्ति की थी. पर अब लगता है उसकी बात में सत्य था. कितनी ही बार उस सच का अनुभव कर चुकी है उसके बाद से, उसके पूर्व भी होता होगा पर सजगता नहीं थी सो इसकी तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया. कल बाजार में दो नंग-धडंग बच्चों को देखकर सोचा कि इन्हें एक-एक जोड़ी कपड़े दिलाये पर कहाँ पूरी हुई यह इच्छा. सत्संग में जाने से पूर्व सोचा था कि आज सभी को इसका सही अर्थ बताना है, एक औपचारिकता ही बनता जा रहा है साप्ताहिक सत्संग, पर वहाँ जाकर कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं होती या कहे कि मन ही नहीं होता. मन स्वप्न बहुत देखता है पर पूरा करने की क्षमता नहीं है. एक सखी जो अस्वस्थ रहती है उसे बहुत कुछ कहने का मन है पर वह अपने ही विचारों के प्रति इतनी श्रद्धा रखती है कि उसके विपरीत जा कुछ कहने का साहस नहीं कर पाती. लगता है ऐसा होना सम्भवतः इसलिए भी जरूरी है कि उसके अहंकार का नाश हो, जो कर्त्ता है उसे तो जाना ही होगा. उसने स्वयं को सद्गुरु के आश्रय में रख दिया है अब जो कुछ भी होता है अथवा नहीं होता सब उन्ही का प्रसाद है.   

Tuesday, January 7, 2014

गुलजार की कविताएँ


आज सुबह से तन थका-थका लग रहा है, साथ ही मन भी, शायद नींद न पूरी होने से ऐसा हुआ है, पिछले तीन दिनों से सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती है, नींद उससे थोड़ा पहले ही टूट जाती है. मौसम आज अपेक्षाकृत गर्म है, जबकि सुबह वर्षा हुई थी. कल शाम क्लब में एक सीनियर मेम्बर ने उससे हिंदी में कुछ लिखने व बोलने का काम दिया नृत्य-नाटिका के लिए, पर शायद उन्हें उसका बोलने का तरीका नहीं भाया, खैर...कोरस की तयारी ठीक चल रही है, मीटिंग का दिन आने में चार दिन शेष हैं, फिर वह नन्हे की पढ़ाई पर ध्यान दे पायेगी. कल दोपहर मुखड़े का अभ्यास किया, सोमवार को जाने से पहले अन्तरा करेगी. कल सुबह एक सखी से बात हुई तो उसे सुझाव देने बैठ गयी बागवानी के लिए, जो उसे शायद ही अच्छा लगा हो, भविष्य में ध्यान रखेगी. क्लब से लौटने में कल देर हो गयी थी, आकर नूडल्स बनाये पहली बार डिनर में, नन्हा और जून दोनों को पसंद आये. कल ptv में ‘यह आजाद मुल्क’ एक धारावाहिक का अंश देखा, दिल को झकझोर कर रख देने वाला एक मंजर था उसमें. सारे पात्र गहरे तक उतर जाते हैं उसके...काफी तीखा व्यंग्य भी था.

आज भी क्लब गयी थी, गाने का अभ्यास नहीं हुआ पर नृत्य कलाकारों के लिए चाय का प्रबंध उसे देखना था. कल भी आना है, परसों जन्माष्टमी है, वे लोग मन्दिर जायेंगे और एक मित्र के यहाँ भी, जहां वे घर पर मन्दिर सजाते हैं. उसने फोन करके जून को क्लब आने के लिए कहा, पर निकलने में थोड़ी सी देर हो गयी, सो वह उदास थे और उन्हें देखकर वह भी.

आज ही वह दिन है, जो उनके लिए महत्वपूर्ण है, अर्थात उनकी नई कमेटी के लिए, दस बजे उसे क्लब जाना है, दोपहर को शाम के लिए ढेर सारे सैंडविचेज बनाने हैं और शाम को तो जाना ही है. कल रात देर तक नींद नहीं आई, आज के लिए बातें सोचता रहा मन, सुबह अलार्म न बजने पर भी उसी मन ने उठा दिया. आज ठीक से पढ़ा सकी, विद्या निवास मिश्र का निबन्ध ‘मेरा गाँव मेरा घर’ बहुत अच्छा है. सुबह से ही सेक्रेटरी के तीन-चार फोन आ चुके हैं, वह उससे ज्यादा ही नर्वस हैं, वह इस वक्त अंश मात्र भी नर्वस नहीं है, जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक, जो सौभाग्य से दोबारा मिल गयी है, में कई अच्छे सुझाव पढ़े, व्यक्ति को निरिक्षण करने, सुनने और समझने की कला सीखनी चाहिए और मन को हमेशा पूर्वाग्रहों से मुक्त रखना चाहिए.

आज की सुबह सामान्य दिनों की तरह ही गुजर रही है. सुबह उठी तो बादल थे, अँधेरा भी था, सूरज अभी भी बादलों के पीछे आराम कर रहा होगा. गुलजार की कविताएँ पढ़ीं, उनमें एक दर्द है और एक पहचान भी लगती है उनसे, शायद हर कवि मन एक सा धडकता है. अभी कुछ देर पूर्व उसी बातूनी सखी का फोन आया, छोटा बेटा अस्वस्थ है, वह खुद भी ठीक नहीं है, नौकरी करना क्या इतना आसान है, घर-परिवार अपना सुख-आराम सब कुछ भुलाना पड़ता है. नैनी के बेटे ने साइकिल ठीक करने के लिए सहायता मांगी है, कल दोपहर को बैक डोर पड़ोसिन आई थी, उसे यह पता भी करना था कि वह नैनी को कितने पैसे देती है, उसने अहसास दिलाया कि वह ज्यादा दे रही है. ईश्वर ने इतनी सामर्थ्य दी है तभी यह सम्भव है. कल शाम दस दिनों के बाद घर पर रहना भला लग रहा था. जून कल खेलने भी जा पाए.


Monday, March 11, 2013

भोज के वृक्ष



भारत छोडो आन्दोलन की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में आज अवकाश है, वे तिनसुकिया गए, एक और परिचिता व उसके छोटे से बेटे के साथ. शाम को एक परिवार मिलने आया, दिन भरा-भरा सा रहा. शाम को जून को थकावट हो गई, धूप में ड्राइविंग करने के कारण ही शायद.
अभी-अभी कल्याण में उसने पढ़ा, जिसके हृदय में भगवान रहते हैं वहाँ भय, विषाद, शोक, व्याकुलता, उद्वेग, निराशा, क्षोभ, संदेह, अश्रद्धा, ईर्ष्या, कायरता, द्वेष आदि का स्थान कहाँ है ? वहाँ तो निर्भयता, शक्ति, तेज, प्रकाश, प्रेम, निष्कामता, संतोष और परम आनंद का निवास होता है. जब ईश्वर अपना लेते हैं, तब वही जो कुछ विधान करेंगे, कल्याण के लिए करेंगे. दुःख हम अपनी ही भूल से अनुभव करते हैं, उस भूल को मिटाने की देर है कि चित्त स्थिर रह सकता है. जैसे स्वप्न में वह तरह-तरह की आपदाओं को झेलती है मगर यह भान होते ही कि यह तो स्वप्न है, मन शांत हो जाता है उसी तरह जीवन में कोई परेशानी हो तो उसे स्वप्न वत मानकर झेल लेना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सुदिन आएंगे ही.

  आज जन्माष्टमी है, सुबह से जो मन शांत था अभी कुछ देर पूर्व नन्हे पर झुंझला ही गया, बच्चे तो आखिर बच्चे ही हैं, काम धीरे-धीरे ही करेंगे न. आज उसने व्रत रखा है, नन्हे और उसने मिलकर मंदिर सजाया है, अच्छा लगता है ईश्वर के करीब रहना लेकिन मन फिर कहीं  और चला जाता है. कल दीदी का छब्बीस का लिखा पत्र आया और कैसा संयोग है उसी दिन उसने भी उन्हें लिखा था. कल छोटे भाई के लिए जन्मदिन का कार्ड लायी थी. नन्हे का स्कूल खुला है, जून आज किसी से लिफ्ट लेकर ऑफिस गए हैं, ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ ने चौबीस घंटे का बंद घोषित किया है, कार ले जाना ठीक नहीं था. कल शाम एक सखी के बुलाने पर वे लोग उसके यहाँ गए. लेकिन आज उसे इन दुनियादारी की बातों से मन हटाकर पूर्णता की ओर ले जाना है, जहाँ कोई उलझन नहीं..अद्भुत प्रकाश है, जिसके आगे कुछ पाना शेष नहीं रहता न ही कुछ जानना. दीदी ने लिखा है, “कहीं कुछ ऐसा पढ़ो जिसके आगे लगे कि अब और कुछ नहीं, फ़िलहाल कुछ भी नहीं, तो लिखना”. उसने सोचा अभी पढ़ेगी विवेकानंद की दूसरी पुस्तक उसमें अवश्य ही ऐसा कुछ मिलेगा.

  कल का उपवास अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया. जून को कल दोपहर दांत में दर्द था, आज तिनसुकिया गए हैं डेंटिस्ट के पास. आज उसने लंच अकेले ही खाया, जून अभी एक घंटे बाद आएंगे. शायद उन्हें रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा. कई बार जाना होगा. सुबह अलमारी की सफाई के काम में लगी रही. पढ़ने की कोशिश की पर मन नहीं लगा, रात को फिर स्वप्न देखे, इधर-उधर के, अभी उस दिन ही मरते-मरते बची थी एक स्वप्न में. शाम को उन्हें एक परिवार के साथ बैठकर “हम हैं राही प्यार के” देखनी है, कल जून का जन्म दिन है, उसने अभी-अभी एक कार्ड बनाया है. कुछ देर पहले जून को विवाह से पूर्व लिखे कुछ खत पढ़े, कितन प्रगाढ़ था उनका रिश्ता, प्यार के रिश्ते सचमुच कितने मजबूत होते हैं.

  जून का जन्मदिन अच्छा रहा, उसने केक बनाया था. घर पर ही भुजिया भी बनाई थी. पन्द्रह अगस्त पर वे तीनों नेहरु मैदान गए, झंडा आरोहण में सम्मिलित होने. कल रात को एक मधुर स्वप्न देखा, वर्षों बाद भी वह सब उसके अवचेतन में उतना ही सजीव है जितना उस क्षण था, सोलह-सत्रह वर्ष पहले की बात है जब वे पहाड़ों में रहे थे, लेकिन अब भी स्मृति पटल पर सब कुछ कितना स्पष्ट है. वर्षों से स्वप्नों में ही मिलती रही है, लगता है हर साल एक बार मिलना हो जाता है उन वादियों से. यूँ फूट-फूट कर रोना...एक अनजानी तृषा..एक अधूरा वादा लिए ही लगता है इस जग से जाना होगा...वे झरने.. वे रास्ते..वे पहाड़ कभी मिलेंगे उसे? अभी तक जैसे पोर-पोर महसूस कर रहा है वह सब कुछ..स्वप्न इतने मधुर भी हो सकते हैं ? अभी तक उसके मन का एक कोना सुरक्षित है उन यादों के लिए यह उसे स्वयं भी मालूम नहीं था, इतनी शिद्धत से महसूस कर सकती है उस छुअन को इस पल जो वर्षों पहले भी अनजानी थी और आज भी है पर स्वप्न सारे बांध तोड़ देते हैं..नदियाँ मिल जाती हैं..तट तोड़कर...और स्वप्न क्या सिर्फ उसके हिस्से में ही हैं ? और यह भी कि प्रेम सिर्फ बचपना नहीं है..प्रेम उम्र की सीमाओं से परे है. जैसे उसका मन इस समय एक अनोखे प्रेम से लबरेज है..कसक भरा प्यार उन भोज वृक्षों के लिए और फूलों की घाटी में बहती उस चांदी के समान जल धार के लिए..   





Monday, February 4, 2013

चित्रकूट की शोभा



आज कृष्ण जन्माष्टमी है, टीवी पर सुबह भी और दोपहर को भी इसी उपलक्ष में अच्छे कार्यक्रम दिखाए गए. अभी-अभी सोनू देखकर सोया है, जो खुद भी एक नन्हा कन्हैया है, उनका प्यारा सा पुत्र, कितने आराम से सो रहा है, शायद कोई स्वप्न देख रहा है. आज उसका स्कूल बंद है, तभी सुबह से उसका मन लगा है उसके छोटे-छोटे कामों में हाथ बंटाते..कैसे रहेगी वह जब वह हॉस्टल में रहेगा..वह रह तो पायेगा न. यहाँ की तरह कभी घुटनों पर तो कभी हाथों पर चोट लगाकर तो नहीं आयेगा स्कूल से.

पिछले तीन-चार दिनों से..हाँ पिछले गुरुवार से ही घर में कार्य चल रहा है. दिन भर यानि सुबह सात बजे जून के दफ्तर जाने के बाद ही काम करने वाले आ जाते हैं, साढ़े तीन तक रहते हैं, अभी काफी दिन लगेंगे. उसे समझ नहीं आता कहाँ बैठे, वैसे इसमें कोई परेशानी की बात नहीं है, क्योंकि यह काम उन्होंने अपनी इच्छा से ही शुरू करवाया है. जब पूरा घर साफ हो जायेगा, नए पेंट की खुशबू से महकेगा तो यह सारी गड़बड़ी भूल जायेगी, गड़बड़ी यानि अव्यवस्था, इस कमरे का सामान उधर और उधर का इधर..अभी तो ऐसे ही चल रहा है. कल चार पत्र लिखे उसने, पिछले हफ्ते घर से पत्र नहीं आया है इस बार तो आना ही चाहिए, बहुत दिन हो गए हैं.

कल आखिर वह खत आ ही गया, जिसका उसे इंतजार था. पिता ने लिखा है, शब्दों का प्रवाह निर्झर की तरह था, और माँ को भी भाव सुंदर लगे. छोटे भाई ने अभी तक जवाब नहीं दिया है शायद वह ज्यादा ही उदास है. आज ही पिलानी से चिट्ठी भी आ गयी है, रजिस्ट्रेशन हो गया है, जून आज परीक्षा शुल्क भेज रहे हैं. नन्हा आज सुबह बिस्तर छोड़ना ही नहीं चाह रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया..एक बार तो बोला ‘रोज-रोज स्कूल जाते जाते मेरा मन स्कूल से उठ गया है’, वह जानती थी की वह जायेगा अवश्य...सिर्फ कह रहा है, उसका टेस्ट भी हो सकता है आज. घर के अंदर डिस्टेम्पर का कार्य हो चुका है आज बाहर हो रहा है, परसों से अंदर खिड़कियों की पेंटिंग का काम शुरु हो जायेगा. पिता ने लिखा है, चिंतन, अध्ययन और लेखन यूँ ही चलता रहे तो..उसे जरूर गम्भीरतापूर्वक कुछ करना चाहिए इस दिशा में. जून ने खत पढ़ा मगर कुछ नहीं कहा..कविता उनके लिए..इतनी महत्वपूर्ण नहीं है..अपना-अपना स्वभाव है, लेकिन उनका मन जब प्यार करता है तो एक कवि का सा ही लगता है..एक साथ ही वह इतने  भावुक और इतने कठोर हैं. कठोर इस माने में कि वह लोगों पर शीघ्रता से विश्वास नहीं करते..खैर.. उसने यहीं लिखना बंद किया और पत्र लिखना शुरू किया.

आज मौसम ने फिर दरियादिली दिखाई है, सुबह से टप-टप सुनाई दे रही है, नन्हा स्कूल गया है, जरूर उसके स्कूल के मैदान में पानी भर गया होगा, कल रात से जो जल अनवरत बरस रहा है. ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट हैं, मन बार-बार रामायण में पढ़ी उन सुंदर पंक्तियों की और जा रहा है जो राम चित्रकूट की शोभा का बखान करते हुए सीता से कहते हैं. सुंदर नीलधर मेघ उच्च शिखरों पर वृष्टि करते हैं फिर मन्दाकिनी की शोभा का वर्णन भी अद्भुत  है, एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य आँखों के सामने आ जाता है.